Saturday, 21 January 2017

प्रधानमंत्री के १० सवाल

प्रधानमंत्री के १० सवाल
० कुमार प्रशांत 


खुशी की बात है कि हम जिन्हें रात-दिन, यहां-वहां सुननते रहते हैं लेकिन जो हमें कभी नहीं सुनते उन प्रधानमंत्री ने हमसे कुछ पूछा है. ट्विटर पर किसी एप का इस्तमाल करते हुए उन्होंने १० सवाल हमारे सामने रखे हैं अौर मांग की है कि हम इनका जवाब उन्हें दें. हम प्रधानमंत्री को निराश कैसे कर सकते हैं ! इसलिए प्रधानमंत्री के निर्धारित क्रम से, प्रधानमंत्री के सवालों का, प्रधानमंत्री की अपेक्षानुसार जवाब : 
१. क्या अापको लगता है कि भारत में काला धन है ? हां, हमें लगता ही नहीं है बल्कि हम उससे रोज ही मिलते हैं जिन्हें अाप काला धन कहते हैं. मतलब भारत में अकूत काला धन है. लेकिन अापको एक राज की बात बताऊं प्रधानमंत्रीजी, हम-अाप जिसे काला धन कहते हैं, उस धन का रंग भी सफेद ही होता है. जब वह हमारे हाथ में या फिर हमारी जेब में या फिर हमारी मां के बक्से या अालमारी की साड़ी की तह में रखा होता है तो सफेद होता है जैसे ही किसी धनपति, सत्तापति या डंडापति के हाथ लगता है, काला हो जाता है. इससे अाप समझ सकते हैं कि धन काला-सफेद नहीं होता, उसे रखने वाले काले-सफेद होते हैं. 
२. क्या अापको लगता है कि काले धन व भ्रष्टाचार से लड़ने की जरूरत है ?  बिल्कुल ! बड़ी जरूरत है अौर अविलंब जरूरत है. लेकिन प्रधानमंत्रीजी, यह भी कहना चाहता हूं कि यह लड़ाई वे नहीं लड़ सकते जिनकी जेबों में या कमरों में भ्रष्टाचार से कमाया या हड़पा काला धन रखा हुअा है. इस लड़ाई का सिपाही वही बन सकता है जिसने न तो काला धन कमाया हो, न हड़पा हो. वही प्रभु यीशु की सदियों पहले कही बात कि पहला पत्थर वह मारे …. 
३. भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार द्वारा अब तक किए गए प्रयास पर अाप क्या कहेंगे ? पिछली कांग्रेसी सरकार ने भ्रष्टाचार को सरकार चलाने का शिष्टाचार बना दिया था. उस सरकार का बनना ही अपने-अाप में एक घोटाला था. उस नाते देश को एक पूरे बहुमत की सरकार मिली अौर उसने सरकारी प्रक्रिया में चल रहे असीमित भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास किया, यह बड़े राहत की बात है. मोदी सरकार को इस बात का पूरा श्रेय है कि उसने भ्रष्टाचार से लथपथ देश का राजनीतिक वातावरण बदला. लेकिन हर किसान जानता है कि  मौसम बदलने से खेती नहीं होती. मौसम के अनुकूल बुवाई-निराई करो तो फसल अाती है. वह काम कौन कर रहा है अौर कहां, यह हमें पता नहीं है. 
४. भ्रष्टाचार के खिलाफ अब तक मोदी सरकार द्वारा की गई काररवाई पर अाप क्या कहेंगे ? पहली बात तो यही कहूंगा कि कोई यह तो बताए कि काररवाई क्या हुई अौर किनके खिलाफ हुई ? राजू, ललित मोदी, माल्या से ले कर बैं कों के उन बड़े अफसरानों तक, जिन्होंने बैंकिंग के सारे नियमों को ताक पर रख कर अनाप-शनाप कर्ज दिए अौर हमारे पैसे बट्टेखाते में डाल दिया, उनके खिलाफ कुछ हुअा क्या ? कभी किसी भ्रष्ट अधिकारी को पकड़ लेना या किसी को निशानदेही वाला नोट लेते हुए पकड़ लेना जैसी वारदातें पहले भी होती रही हैं, अाज भी होती हैं. एमसीएक्स का गुब्बारा तो मनमोहन सरकार के दौर में ही फूटा था. शेयर बाजार के कितने ही दलालों की धड़-पकड़ पहले भी होती रही है. अायकर विभाग अपने ‘अधिकारियों की अाय’ का सबसे बड़ा अौर सुरक्षित स्थान पहले भी था, अाज भी है. पहले भी कर चोरों को ‘दान-दया’ के मौके दिए जाते थे अौर उनसे मिली ‘चवन्नी’ को अपनी उपलब्धि के तौर पर देश को बताया जाता था. यही अाज भी हो रहा है. रक्षा सौदों में दलाली का चलन अाम रहा है जिसे पिछले रक्षामंत्री ने नियंत्रित करने की कोशिश की थी, अाज के रक्षामंत्री भी कर रहे हैं. हमारी सरहदें पहले भी अशांत थीं, अाज कुछ ज्यादा ही अशांत हैं. मुंहतोड़ जवाब देने की बात कह कर देश को पहले से ज्यादा उन्मादित किया जा रहा है लेकिन सैनिकों को इस तरह जान गंवाना पड़ रहा है, यह किसी सरकार की सफलता के खाते में तो नहीं रखा जा सकता है. कुछ छिटपुट काररवाइयों अौर हवा में तैरती कहानियों से अलग मोदी सरकार ने कुछ किया हो तो हमें मालूम नहीं. देश को जो मालूम ही नहीं है, उसके बारे में वह बताएगा भी तो क्या !  
५ अौर ६ . ५००-१००० के नोटों की बंदी के मोदी सरकार के कदम के बारे में अाप क्या कहेंगे ? क्या अापको लगता है कि नोटबंदी काले धन, भ्रष्टाचार अौर अातंकवाद पर लगाम लगाने में कारगर है ?  अब हम कुछ भी क्यों कहें ? जब अापको पूछना चाहिए था तब तो अापने किसी ने नहीं पूछा, बस फैसला सुना दिया ! अब  जबकि जाल में फंस गए हैं अाप, तब पूछ रहे हैं. अौर फिर हमारे मन में यह शंका भी बनी हुई है कि हम अापसे कहेंगे कुछ अौर अाप हमारे हवाले से देश से कहेंगे कुछ !! फिर भी अापने पूछा है तो इतना कहना जरूरी है कि यह नोटबंदी नहीं, देश की अार्थिक नसबंदी है. इसका असर न तो कालेधन पर होगा, न जाली नोटों पर अौर न अातंकी नेटवर्क पर. हो रहा भी नहीं है, क्योंकि अापने नोटों पर हमला किया, कालेधन के नेटवर्क पर नहीं ! अापने देखा कि नहीं अापका नया २००० कीमत का रंगीन नोट भी काला हो चुका है ? अभी जो नोट ठीक से लोगों तक पहुंचा भी नहीं है, वह काले धंधेबाजों तक पहुंच गया, इससे अापको उनके शक्तिशाली नेटवर्क का अंदाजा होगा. वैसे अापको यह अंदाजा पहले से ही होगा, क्योंकि कालेधन का यही तो नेटवर्क है जो अाजाद हिंदुस्तान के अब तक के सबसे महंगे चुनाव के दौरान सबसे अधिक सक्रिय था अौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाने में जिसका सबसे भयंकर इस्तेमाल अापने ही किया था. राजसत्ता का यही तंत्र है प्रधानमंत्रीजी जो सबसे ज्यादा काला धन बनाता है अौर सबसे अधिक कालेधन का इस्तेमाल करता है. भाजपा समेत देश का एक ऐसा राजनीतिक दल बता दीजिए प्रधानमंत्रीजी जो कालेधन का अकूत चुनावी फंड न रखता हो.  
    अापने कहा कि नोटबंदी काले धन पर हमला है, अापके वित्तमंत्री कह रहे हैं कि यह नायाब योजना कागजी मुद्रा की जगह प्लास्टिक मनी लाने की है. अाप दोनों अलग-अलग लक्ष्यों के लिए एक ही हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं क्या ? ये दोनों ही बातें एक-दूसरे को काटती हैं अौर दोनों ही जमीनी हकीकत से कोसों दूर हैं. न तो सभी नागरिकों का बैंक खाता खोलना कोई स्वस्थ अार्थिक कदम है अौर न प्लास्टिक मुद्रा चलाना किसी बीमारी का इलाज है. दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं है. समाज हमेशा इस तरह की बातों में संतुलन के साथ चलना चाहता है. भारतीय समाज तो इस मामले में ज्यादा ही अाग्रही है कि उसकी जेब में नोट होने चाहिए, उसके पास चिल्लर पैसे होने चाहिए. इसमें पिछड़ेपन जैसी या काला धन रखने जैसी बात नहीं है. अांकड़े अापके ही हैं जो बता रहे हैं कि जिन जनधन खातों में, पिछले कई महीनों से दो कौड़ी की रकम भी जमा नहीं हुई थी, उनमें २१ लाख करोड़ रुपये जमा हो गये हैं. यह अधिकांशत: काला धन है जिसे छुपाने का अापने एक अासान रास्ता दे दिया. अार्थिक ढांचे में से सारा रुपया निकाल लेने के कारण अचानक ही जो शून्य पैदा हुअा, लोगों में जो घबराहट पैदा हुई, जालसाजिए जानते हैं कि यही नायाब मौका है कि जाली नोटों से सारा शून्य भर दिया जाए. सीमा पर मारे गए अातंकवादियों की जेब से अापके २००० का नोट निकला, तो  इससे क्या समझना चाहिए ?   
७. नोटबंदी से रियल एस्टेट, उच्च शिक्षा अौर स्वास्थ्य सेवाएं अाम जन की पहुंच में अा जाएंगी ?   ऐसा कुछ भी नहीं होगा, क्योंकि रियल एस्टेट, उच्च शिक्षा अौर स्वास्थ्य सेवाअों को दुधारू गाय बना कर, उन्हें दूहने में लगे प्राय: हर संस्थान के पीछे कोई-न-कोई प्रभावी राजनीतिज्ञ खड़ा है. हर राज्य में, हर पार्टी के कितने ही सांसद-विधायक-खास लोग ऐसे हैं कि राजनीति जिनका ‘साइड बिजनेस’ है, मुख्य काम तो वे रियल एस्टेट का या शिक्षा माफिया का या हॉस्पिटल बिजनेस का करते हैं. जब तक राजनीति एक ‘ अतिरिक्त धंधे’ की तरह की जाती रहेगी अौर पार्टियां उसे स्वीकार कर चलेंगी, तब तक अाम जन की बात करना घड़ियाली अांसू बहाने वाले पेशेवर को भी हंस पड़ने पर मजबूर कर देगी. 
८. भ्रष्टाचार, काले धन, अातंकवाद के खिलाफ की गई इस काररवाई से क्या अापको असुविधा का सामना करना पड़ा ?  जिस दिन अापने नोटबंदी की घोषणा की, उस दिन से अाज तक के अखबार देख लीजिए कि टीवी चैनल देख लीजिए कि खरामा-खरामा अपनी ही दिल्ली की सड़कों पर घूम लीजिए, अापको अपने सवाल का जवाब मिल जाएगा. अौर यह भी न करना हो तो अपनी ही घोषणा फिर से पढ़ लीजिए कि अापने देश में रामराज लाने अौर इसे सोने की तरह दमकीला बनाने के लिए ५० दिन मांगे हैं. मतलब कि अापने यह माना ही है कि ५० दिनों की असुविधा के बाद देश को जन्नत का अहसास अाप कराएंगे. तो वह असुविधा तो हुई ही है, हो ही रही है. जानें तक गई हैं, मार-पीट हुई है अौर पुलिस ने बैंकों की लाइन में लगे परेशान-हाल लोगों की ऐसी पिटाई भी की है मानो वे दंगाई हों. फिर भी लोगों ने पर्याप्त धैर्य से इन सारी परेशानियों का सामना किया है. यह धैर्य अच्छा है या बुरा ? असहायता या निरुपायता से जो सर पा अा पड़े, उसे सह लेना सामाजिक बुराई है. लेकिन परिस्थिति को समझते हुए धीरज से चलना सयानापन है. लोगों ने दोनों का परिचय दिया है. इसमें कहीं बदला लेने का वह सुख-भाव भी शामिल है जिसे अापने ‘गरीब चैन से सो रहा है अौर अमीर नींद की गोलियां खोज रहा है’ जैसे भाव से प्रकट किया है. लेकिन वह अमीर कहीं किसी कतार में खड़ा नजर नहीं अाया, अाप या अापका कोई मंत्री, कोई राज्यपाल कि कोई सांसद-विधायक किसी कतार में नहीं दिखाई दिया. अापने जिन नोटों की बंदी की वे ही नोट तो अापके-उनके पास भी होंगे न ! फिर कैसे चला अापका या उनका घर ? कैसे चल रहा है ? सवाल तो कई हैं लेकिन अब एक बड़ा सवाल जो सबके मन में है वह यह है कि अच्छे दिन के अाने का जैसा अंतहीन इंतजार हमें करना पड़ रहा है वैसा ही इंतजार इन ५० दिनों के पूरा होने का भी करना पड़ेगा क्या ? इसका जवाब सिर्फ अापके पास है.  
९. क्या अापको लगता है कि भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले अब काले धन, भ्रष्टाचार अौर अातंकवाद के समर्थन में लड़ाई लड़  रहे हैं ?   अगर असहमति राष्ट्रद्रोह है, तो अापकी बात सही है. अगर अापको ऐसा मानने अौर देश को कहने में गर्व की अनुभूति होती है कि राजनीतिक बिरादरी के अापके सारे साथी काला बाजारियों की दलाली करते हैं, भ्रष्ट्राचारियों की जेब में रहते हैं अौर उनकी अातंकवादियों से सांठगांठ है, तो हमारे कहने के लिए बच क्या जाता है ? अपनी बिरादरी के लिए इतना हीन भाव अगर अापके मन में है तो अापके हाथों में लोकतंत्र कितने दिन सुरक्षित रहता है, यह देखना होगा. येनकेनप्रकारेण सत्ता में बने रहना अाज की राजनीति का मूलमंत्र है जिसका जाप अाप भी अौर वे भी करते हैं.  फिर इतना अहंकार क्यों ? 

१०. क्या अाप कोई सुझाव देना चाहेंगे ?  सत्ता जब कभी विनीत भाव से हमसे राय-मश्विरा करने की मुद्रा धारती है तो डर लगता है. असहमति राष्ट्रद्रोह हो अौर सवाल पूछना असहिष्णुता हो तो कुछ भी कहना खतरे को अामंत्रित करना होता है. फिर भी अापने अच्छे भाव से ही पूछा है, यह मान कर बस इतना ही : ठोकरें खा कर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब / वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज निभा ही दिया !   
( 25.11.2016)                 

ट्रंप की जीत : अमरीका की हार

ट्रंप की जीत : अमरीका की हार 
० कुमार प्रशांत  

यह हिलेरी क्लिंटन की हार का स्यांपा नहीं है अौर न यह डोनाल्ड ट्रंप की जीत से पैदा हुई खीज ही है. ये दोनों ( या इन दोनों से िवपरीत !) मनोभाव अमरीकियों को प्रदर्शित करने हैं क्योंकि यह उनका अांतरिक मामला है. हमें यदि खेद है तो वह इस बात का कि अपने सांस्कृतिक अारोहण में हम सारी दुनिया में एक-एक कदम पीछे हट रहे हैं. यह ज्यादा ही पीड़ाजनक अौर किसी हदतक अपमानजनक भी लगता है क्योंकि हम देखते हैं कि ऊर्द्धगामी एक कदम बढ़ाने अौर वहां पांव को स्थिर करने में मानवता को अपना पूरा प्राण-बल जोड़ना पड़ता है जबकि वहां से फिसलने के लिए बस कोई एक ट्रंप काफी होता है. 
अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव हम सबकी दिलचस्पी का विषय इसलिए नहीं होता है कि वह कोई महाशक्ति है. हमारी दिलचस्पी इसलिए होती है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व के कई-कई सवालों पर हमारी सदा की तनातनी के बाद भी अमरीका कई अर्थों में दुनिया की अाशाअों का केंद्र है. उसका लोकतंत्र के समर्थन में खड़े रहना अौर दुिनया भर के प्रगतिशील तबकों, विचारों अौर धाराअों से जुड़े रहना बहुत मतलब रखता है. हिलेरी क्लिंटन अौर डोनाल्ड जॉन ट्रंप के बीच ऐसा कोई धागा नहीं जो हमें जोड़ता हो. हां, जहां तक हिलेरी क्लिंटन का सवाल है, एक धागा जरूर था जो हमें किसी हद तक उनकी तरफ खींचता था अौर वह था उनका अौरत होना ! यह वैसा ही है जैसे सड़ी-गली राजनीतिक व्यवस्था में ही किसी मायावती के लिए मन का एक कोना जरा गीला होना ! नहीं तो हिलेरी क्लिंटन अपने पति राष्ट्रपति क्लिंटन के काल में भी अौर फिर अोबामा के विदेशमंत्री के रूप में भी कभी प्रेरणादायी या सामान्य अमरीकी नौकरशाह से अलग कुछ रही नहीं हैं. उनकी पराजय के पीछे भी इन्ही तत्वों का हाथ रहा है कि वे देश में उत्साह नहीं जगा सकीं, अाशा का संचार नहीं कर सकीं. वे ट्रंप की जुमलेबाजियों का कोई प्रभावी जवाब नहीं तैयार कर सकीं. अपने चुनाव के खर्च के िलए उन्होंने पैसा बहुत जमा किया लेकिन विश्वास नहीं कमाया. शायद कहीं यह भाव भी रहा कि उन जैसी अनुभवी राजनीतिज्ञ के सामने राजनीति से अनजान ट्रंप को कहीं टिकेंगे भी क्या ! शायद यह भी कहीं रहा कि वे ऐसी अकेली उम्मीदवार हैं जिनके समर्थन में दो-दो राष्ट्रपति मैदान में हैं ! सो राष्ट्रपति बनने की कोशिश में दो-दो राष्ट्रपतियों को पराजित करवा कर, वे दो-दो बार पराजित हुईँ. 
लेकिन ट्रंप की कहानी देखने के लिए हम बहुत नहीं फिर भी थोड़ा पीछे चलते हैं. १९८८-८९ में अमरीका ने अपने ४० वें राष्ट्रपति के रूप में चुना था रोनाल्ड रीगन को. कभी हॉलिवुड में अभिनेता रहे अौर फिर गवर्नर रहे रीगन की इसके अलावा दूसरी कोई विशेषता नहीं थी कि वे जाने-पहचाने चेहरे थे अौर फिल्मी संवादनुमा शैली में बातें करते थे. यहां से अमरीकी राष्ट्रपतियों के पतन की एक नई कहानी शुरू होती है. फिर ४१ वें राष्ट्रपति के रूप में उप-राष्ट्रपति जॉर्ज हरबर्ट वाकर बुश चुने गये. ४३वें राष्ट्रपति के रूप में इनके स्वनामधन्य पुत्र जॉर्ज वाकर बुश चुने गये. रीगन से शुरू हो कर २००९ तक के कालखंड को हम अमरीका के सबसे भोंडे काल में गिन सकते हैं जब अमरीका का अार्थिक रुतबा अौर उसकी राजनीतिक नेतृत्व-क्षमता रसातल में पहुंचती गई. सोवियत संघ के बिखरने के बाद अमरीकी वर्चस्व बनाने की फूहड़ कोशिशों में सारी दुनिया में युद्ध भड़काने, अातंकवाद को संगठित स्वरूप देने अौर फिर अोसामा बेन लादेन तथा दूसरे अातंकी संगठनों का भूत खड़ा करने अादि का यही काल है. यही काल है जब अातंकी वर्ल्ड टावर पर हवाई जहाज दे मारते हैं अौर अमरीका घुटनों के बल झुकता-गिरता दिखाई देता है. राष्ट्रपति बुश की पहली प्रतिक्रिया किसी चूहे-सी बदहवास होती है अौर फिर किसी पागल हाथी की तरह वे अफगानिस्तान, ईराक अादि पर हमला करते हैं अौर सारी दुनिया को अांखें दिखाते हैं. ‘जो हमारे साथ नहीं, वह अातंकवादियों के साथ’ जैसी कबिलाई मानसिकता जगाने वाला अमरीका यहां से उभरता है. इस अमरीका के पास संसार को देने-कहने को कुछ नहीं था. बौना नेतृत्व राष्ट्र-मन को लिलिपुट के नाप का बना देता है. इसी दौर में भारत अमरीकी के लिए नया पाकिस्तान बनने की रजामंदी दिखाता है. यह अटलबिहारी वाजपेयी काल था. फिर तो मनमोहन-काल अाया अौर अब मोदी-काल ! हम कहां से चल कर कहां पहुंचे हैं !! 
अमरीका का यह युद्धोन्मत्त काल अाम अमरीकी को मौत अौर निराशा से अलग कुछ दे नहीं सकता था. बैंकों-बीमा कंपनियों का अभूतपूर्व भ्रष्टाचार अमरीका की चूलें हिला गया अौर अार्थिक मंदी ने जड़ पकड़ ली. अमरीकी अार्थिक सत्ता कभी इतनी खोखली नहीं दिखाई दी थी जितनी बुश-काल के इस अंतिम दौर में दिखाई दी. महंगाई, बेरोजगारी अौर उत्पादन में गिरावट का यह काल अमरीका का अात्मविश्वास हिला गया. ऐसे में बराक अोबामा सामने अाए.  एक अश्वेत अमरीकी ने अमरीका की कमान संभालने की सोची, यही काफी था कि सफेद चमड़ी के अाभिजात्य का ढोंग ढोने वाला अमरीका उसे कुचल-मसल देता ! लेकिन लस्त-पस्त अमरीका में इतना बल बचा कहां था ! निराशा की इसी गर्त में से अोबामा ने अाशा की हांक लगाई. यह बुझती लौ की बत्ती बढ़ाने जैसा काम था. श्वेत अमरीका देखता रहा अौर बाकी का अमरीका अोबामा के साथ हो लिया ! अोबामा ने सारा बल लगा कर मतदाताअों के सामने जो अमरीका खड़ा किया वह युद्धों से बाहर निकलने, मंदी अौर बेरोजगारी से छूटने अौर सामाजिक न्याय की मांग करने वाला अमरीका था. श्वेतवादियों ने अोबामा के रूप में उभरता यह खतरा नहीं देखा, ऐसा नहीं था. वे अंत-अंत तक कोशिश करते रहे कि यह अश्वेत अादमी सफल न हो लेकिन बात उनके बूते की रह नहीं गई थी. अोबामा जीते अौर अमरीका खड़ा हुअा.
अोबामा दूसरी बार भी राष्ट्रपति चुने गये हालांकि उन्हें इस बार पहले से कम समर्थन मिला. इसमें अोबामा की अपनी विफलताएं भी थीं, अमरीकी समाज व प्रशासन की सडांध भी थी लेकिन यह भी था, अौर खूब था कि सारे श्वेतवादियों के अपनी मोर्चाबंदी कर ली थी. लेकिन यह सारा प्रसंग तो अोबामा-काल की समीक्षा का है. अभी हम देख तो यह रहे हैं न कि ट्रंप का उभरना अौर जीतना कैसे हुअा, तो ट्रंप ने उन सारे धागों को काटना शुरू किया जिन्हें अोबामा ने जोड़ा था. ट्रंप का पूरा अभियान उस तर्ज पर चला जिस तर्ज पर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने का अपना अभियान चलाया था. ट्रंप ने भी अपने समाज की अांतरिक बीमारियों को खूब उभारा अौर उसका दोष कुछ खास समुदाअों पर थोप दिया. उन सारी ताकतों को खुलेअाम धमकी दी जो अोबामा-काल में उभरे थे. उन्होंने अमरीका को याद दिलाया कि यह सफेद चमड़ी वालों का देश है जिस पर कालों का, संसार भर से अा जुटे अश्वेतों का, मुसलमानों का दवाब बहुत बढ़ गया है; उन्होंने अमरीका को उस शान की याद दिलाई जब दुनिया उसकी ठोकरों में हुअा करती थी. उसने अमरीका को पूंजी की ताकत की याद दिलाई अौर कहा कि इसका बल हो तुम्हारे पास तो तुम बादशाह हो अौर संसार की किसी भी अौरत को किसी भी तरह, कहीं भी दबोच सकते हो. यह किसी ट्रंप की निजी जिंदगी को नंगा करने जैसी बात नहीं है. पैसे को भगवान मानने वाला यह वह दर्शन है जो श्वेत अमरीका को घुट्टी में पिलाया जाता है. ट्रंप की जीत के साथ ही वह अमरीका हार गया है जिसे अब्राहम लिंकन से ले कर बराक अोबामा तक ने बनाने की कोशिश की थी. 
७० साल के ट्रंप बहुत अमीर ठेकेदार व्यापारी हैं जिनका भवन निर्माण का धंधा है. वे टीवी की दुनिया में चमकते-दमकते दिखाई देते रहे हैं. अमरीका ने जिस अादमी को अपना ४५वां राष्ट्रपति चुना है, वह अमरीकी समाज का गंभीर अध्येता, राजनीतिक-सामाजिक कर्मी कभी नहीं रहा है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वह अमरीकी समाज का हिस्सा ही नहीं रहा है. वह उस अमरीका को जानता, मानता अौर चाहता रहा है जो डॉलर की ताकत से शिखर पर विराजता है. इसलिए अौरतों का समाज, कालों का समाज, अश्वेतों का समाज, गरीबों का समाज से ले कर असीमित उपभोग, पर्यावरण का नुकसान, अार्थिक विषमता, अपराध की दुनिया, हथियारों की होड़, अमरीकी समाज का बंदूक-प्रेम अादि कुछ भी ट्रंप की दुनिया का हिस्सा नहीं है. चिंता इस बात की नहीं है कि वे अनुभवहीन हैं बल्कि इस बात की है कि वे इन अनुभवों से परे हैं. वे जिन विश्वासों के साथ बड़े हुए हैं अौर जो अब उनके अपने विश्वास हैं, वे सभी अाज अमरीका में अौर अाज के संसार में प्रतिगामी विश्वास हैं. ऐसा राष्ट्रपति अमरीका के लिए भी अौर संसार के लिए भी बोझ बनेगा.  
जीत के बाद अचानक ट्रंप की बातें बदल गईं. वे कह रहे हैं कि अब चुनाव पूरा हुअा तो यह घाव भरने का समय है. घाव दिए किसने अौर क्यों, इस बारे में कुछ न कहते हुए वे ‘ सबका साथ : सबका विकास’ कह रहे थे. मंच पर कुछ अौर मंच के नीचे व पर्दे के पीछे कुछ की त्रासदी हम लंबे समय से झेल रहे हैं. अब अमरीका व संसार की बारी है. २० जनवरी २०१७ के बाद ट्रंप अपने पत्ते चलना शुरू करेंगे अौर तब हम देखेंगे कि उनके पास कितने ट्रंप कार्ड हैं.   

10 नवम्बर 2016

Tuesday, 25 October 2016

ऐ दिल है मुश्किल…

कहने को लोग उन्हें ‘पेज थ्री पर्सनैलिटी’ कहते हैं, मैं उन्हें चूहों की जमात कहता हूं. अपने ही जेब के भार से बोझिल लेकिन व्यक्तित्वहीन इस जमात का यह सबसे बुरा दौर है जब वह एकदम नंगा हो गया है लेकिन न कह पा रहा है, न लड़ पा रहा है, न हंस पा रहा है और न रो पा रहा है ! इसे कहते हैं भई गति सांप-छछुंदर की ! और आप देखिए तो कि ऐसी गति को कौन लोग पहुंचे हैं : श्रीमान अमिताभ बच्चन, करण जौहर, मुकेश भट्ट, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह, महाराष्ट्र की एक पिद्दी-सी राजनीतिक पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे, फिल्म उद्योग के तीन बड़े नाम सिद्धार्थराय कपूर, साजिद नडियाडवाला तथा फॉक्स स्टार स्टूडियो के कोई विजय सिंह. इन सबने मिल कर एक ऐसी सशक्त फिल्म बनाई है जिसने देश की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अवस्था का वैसा पर्दाफाश किया है जैसा कोई दूसरा कभी कर ही नहीं सका. फिल्म का नाम है ऐ दिल है मुश्किल ! जब कहीं जरा-सी भी आहट होती है तो तीसमारखां चूहों में कैसी खलबली मचती है और सभी कैसे अपने-अपने बिलों में जा समाते हैं, इस पर बनी यह अब तक की सबसे सशक्त फिल्म है.  

करण जौहर हमारे सिनेमा के प्रतिनिधि नामों में नहीं हैं और उनकी फिल्में रुपये भले गिनती हों, किसी खास गिनती में नहीं आती हैं. लेकिन  अक्सर मूर्खता व शालीनता की हद पार कर जाने वाले करण जौहर ने अपनी एक बेबाक छवि जरूर गढ़ी थी जो आज अपमानित अवस्था में, टूटी-फूटी पड़ी है और उनके पास रोने को एक आंसू या कहने को एक शब्द  नहीं हैं. आज वे और उनका पूरा मुंबइया फिल्म उद्योग किसी बंधुआ मजदूर की तरह दिखाई दे रहा है तो इसलिए कि राज ठाकरे की देशभक्ति की गाज उस पर गिरी है. राज ठाकरे की यह देशभक्ति उनकी अपनी आसन्न राजनीतिक मौत को टालने की अंतिम कोशिश में से पैदा हुई है. 

पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय समाज और संविधान पर लगातार सर्जिकल स्ट्राइक हो रहे हैं. ऐसा करके और ऐसा करने की छूट दे कर केंद्र सरकार देशभक्ति का वह बुखार पैदा करना चाहती है जिसे वह चुनाव में भुना सके. राज ठाकरे ने इस मौके को पहचाना और बहती गंगा में हाथ धोने की चाल चली. उन्होंने यह फरमान जारी कर दिया कि मुंबइया फिल्मों मे काम कर रहे सारे पाकिस्तानी कलाकार भारत छोड़ कर चले जाएं - समय और तारीख उन्होंने तै कर दी ! न महाराष्ट्र सरकार ने न मोदी सरकार ने पलट कर पूछा कि भारतीय संविधान की स्वीकृति से भारत आए किसी भी विदेशी नागरिक को देश  से निकल जाने का आदेश राज ठाकरे कैसे दे रहे हैं ? यह अधिकार इन्हें किसने दिया ? ऐसा सवाल किसी ने नहीं पूछा तो क्यों ? इसका जवाब यह है कि महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार में शामिल हो कर भी रोज-ब-रोज उसकी ऐसी-तैसी कर रही शिव सेना को धूल चटाने का मानो ठेका राज ठाकरे को दिया गया है ! यह चूहों की राजनीति है ! 

राज ठाकरे की चुनौती ने पाकिस्तानी कलाकारों का जो भी किया हो, भारतीय फिल्मकारों को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया; और वह भी किनको, तो करण जौहर, शाहरुख खान और सलमान खान को ! ये सारे नाम मुंबइया फिल्म उद्योग की नाक समझे जाते हैं. शाहरुख अपनी पिछली  पिटाइयों से बेहोश-से हैं लेकिन सलमान खान और करण जौहर ने बड़े तेवर से राज ठाकरे को जवाब दिया कि कला और राजनीति की दुनिया अलग-अलग होती है. कलाकार देशी-विदेशी नहीं होता, कलाकार होता है; उसकी स्वतंत्रता पर हाथ डालने की कोशिश हम कबूल नहीं करते ! सलमान, करण आदि जब बोलते हैं तो गूंज होती ही है ! बात गूंजी और फैलने लगी. राज ठाकरे ने इन सबकी सड़क पर पिटाई करने का एलान किया तो उनके छुटभैय्यों ने सिनेमाघरों पर हमला करने की बाजाप्ता सार्वजनिक घोषणा कर दी. कोई कुछ नहीं बोला - न महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पूछा राज ठाकरे से कि मुख्यमंत्र मैं हूं कि आप; न महाराष्ट्र पुलिस के आला अधिकारियों ने राज ठाकरे से कहा कि सड़क की गुंडागर्दी का मुकाबला करना उसे आता है ! कोई बोला तो फिल्म उद्योग के कलाकार बोले और पते की बात बोले. फिल्मी लोगों को दूसरों के लिखे डायलॉग बोलने से अधिक भी कुछ बोलना आता है, यह पता चला. फिल्मी दुनिया की अपनी आवाज इस तरह बनने लगी कि पल भर को ठाकरे-फडणवीस खेमा सन्नाटे में आ गया. तभी इसकी हवा निकाली मुंबइया फिल्मों के सिरमौर माने जानेवाले अमिताभ बच्चन ने ! जब उनके हमपेशा लोगों को सड़क पर पीटने की धमकी दी जा रही थी तब उनके साथ आवाज उठाने की जगह अमिताभ बच्चन ने, चोर दरवाजे से राज ठाकरे के पुत्र का अपने घर पर स्वागत किया. अवसर था अमिताभ के जन्मदिन का. उन्होंने राज ठाकरे के पुत्र का अपने घर पर ‘धन्यभाग हमारे’ वाली शैली में स्वागत किया और राज ठाकरे द्वारा भेजा जन्मदिन का वह तोहफा कबूल किया जो राज ठाकरे की कलम से बने उनके ही कार्टूनों का फ्रेम था.  अमिताभ ने गदगद भाव से उसे कबूल ही नहीं किया बल्कि बेटे को अपना घर भी घुमाया और फिर राज ठाकरे के घर पर अपनी भी सौगात भेजी ताकि रिश्तों में कोई पेंच बाकी न रहे. उन्होंने गलती से यह नहीं कहा कि राज ठाकरे का भेजा जन्मदिन का निजी तोहफा मैं स्वीकार करता हूं लेकिन उनकी राजनीति को अस्वीकार करता हूं.   

हमेशा ऐसा ही होता है. अमिताभ हमेशा सावधान रहते हैं कि वे अपनी बारीक राजनीति चलाते रहें लेकिन किसी विवाद में न पड़ें. हर जगह से साफ बच निकलने में ही उन्हें अपनी चातुरी नजर आती है. राज ठाकरे के लिए यह संकेत था. चतुर राजनेता की तरह उन्होंने इसे पकड़ लिया. इस वक्त भी दूसरे फिल्मकारों का जमीर जागता तो ठाकरे मार्का राजनीति के कल-पुर्जे ढीले किए जा सकते थे लेकिन जिनके अपने कल-पुर्जे ही ढीले हों, वे क्या करें ! सब अपने-अपने बिलों में जा घुसे ! राज ठाकरे ने फिर वह पत्ता चला जो हमेशा ही फिल्मवालों के होश ठिकाने ला देता है. उन्होंने फरमान जारी िकया कि जिन फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकारों ने काम किया है, वे उनको रिलीज नहीं होने देंगे.  

इस गुंडागर्दी को केंद्र व महाराष्ट्र की सरकार ने मौन ने पूरा समर्थन दिया. उनका मौन खुली घोषणा कर रहा था कि देशभक्ति का जैसा उन्माद खड़ा करने में हम लगे हैं उसमें सहायक होने वाली हर शक्ति को अभी खुली छूट है. उनके लिए देश में न कोई कानून है, न पुलिस, न सरकार ! जब सत्ता व वोट का सवाल हो तब लोकतंत्र और संविधानसम्मत स्वतंत्रताएं कोई मानी नहीं रखतीं. 

ऐसे ही मौकों पर नागरिक-शक्ति सत्ता को उसकी अौकात बताती है. यहीं व्यक्ति की परीक्षा होती है - उसकी आस्था की, उसके आत्मबल की. लेकिन फिल्म रिलीज नहीं हो सकेगी, पैसे का नुकसान होगा, यह भय इतना बड़ा हुआ कि सारे फिल्मी शेर चूहे बनने लगे. सभी वही राग अलापने लगे जो सरकार चाहती थी. इस वक्त हिम्मत से आगे आ कर करण जौहर या सलमान खान या प्रोड्यूसर्स गिल्ड के मुकेश भट्ट ने कहा होता कि भले फिल्म रिलीज न  हो, हम किसी समझौते को तैयार नहीं हैं, तो हवा बदल जाती ! यह कहने की जरूरत ही नहीं है कि करण जौहर या सलमान खान या इन जैसी दूसरी बड़ी फिल्मी हस्तियों के पास इतना पैसा है एक फिल्म के अंटक जाने से रोटी के लाले नहीं पड़ जाएंगे. लेकिन पैसा ही है जो आपको चूहा बना देता है. मुकेश भट्ट ने प्रोड्यूसर्स गिल्ड की तरफ से शरणागत होने का झंडा लहराया. कई फिल्मी हस्तियों के साथ वे गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिले और फिर उन्हें यह दिव्य ज्ञान हुआ कि देश  का लोकतंत्र नहीं, सत्ता और संपत्ति सबसे बड़ा सत्य होता है. 

गृहमंत्री ने उन्हें समझौता कर लेने की कड़ी सलाह दी. सभी मुंबई लौटे और मुख्यमंत्री फडणवीस ने अपने घर पर राज ठाकरे की अदालत सजाई. सभी अपराधी उसमें हाजिर हुए. अब राज ठाकरे भारतीय जनता पार्टी के वैसे मोहरे थे जैसे उनके चाचा कभी कांग्रेस के मोहरे थे. इतिहास दोहराया जा रहा था. कभी कांग्रेस ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निबटाने के लिए बाल ठाकरे और शिव सेना को खड़ा किया था; कभी अकाली दल से निबटने के लिए इंदिरा गांधी की सहमति से ज्ञानी जैल सिंह ने भिंडरावाले को खड़ा किया था.उसी शिव सेना ने महाराष्ट्र में और भिंडरावाले ने पंजाब में जैसी आग लगाई, वह इतिहास हम जानते हैं और उसमें देश कितना और कैसे जला, यह भी इतिहास में दर्ज है. वही खेल, ज्यादा खतरनाक ढंग अब भारतीय जनता पार्टी खेल रही है. 

राज ठाकरे की अदालत में त्रिसूत्री फैसला हुआ: करण जौहर अपनी फिल्म की शुरुआत में फौज के शहीदों को सलाम करने वाली घोषणा दिखाएंगे ताकि देशद्रोह का उनका पाप कट सके; आगे कभी किसी पाकिस्तानी को, किसी भी हैसियत में अपनी फिल्म से नहीं जोड़ेंगे ताकि उनकी देशभक्ति सदा दिखाई देती रहे तथा वे सेना कल्याण कोष में ५ करोड़ रुपयों का दान देंगे. सरकारसमेत ‘सभी अपराधियों’ ने इस पर दस्तखत किए और तब कहीं जा कर करण जौहर अपनी फिल्म दर्शकों तक ला पाए हैं. इतना ही नहीं हुआ, इसके साथ कई दूसरी बातें भी हुईं. मतलब राजा ने यानी राज ने यह भी कहा कि प्रोड्यूसर्स गिल्ड किसी पाकिस्तानी को अपने यहां फिल्मों में कोई काम नहीं देने का लिखित प्रस्ताव करेगा और उसकी प्रति सरकारी मंत्रालयों को, अखबारों को भेजेगा. और यह भी कि उन सारी फिल्मों को भी सेना कल्याण कोष के लिए ५ करोड़ रुपये रक्षामंत्री को देने होंगे जिन्होंने पाकिस्तानी कलाकारों को लिया है. रक्षामंत्री को ५ करोड़ का चेक देते हुए वे अपना फोटो अखबारों में प्रकाशित करवाएंगे ताकि पक्का प्रमाण हो जाए. इस तरह सरकारों को अर्थहीन करते हुए और सारी संवैधानिक व्यवस्था को अपमानित करते हुए राज ठाकरे ने अपनी पार्टी के लिए थोड़ा अॉक्सीजन जुटा लिया. लेकिन ऐसा करते हुए इन लोगों के समाज में कितना जहर और अविश्वास भर दिया है, क्या इसका हिसाब किसी के पास है ? 

सवाल पाकिस्तानी कलाकारों का नहीं है. हमारी सारी फिल्में उनके बिना ही बनती हैं. एकाध अपवाद होती हैं. सरकार की अनुमति से विदेशी कलाकार यहां आते हैं जैसे खिलाड़ी, वैज्ञानिक, शिक्षक आदि आते हैं. सरकार जब चाहे, इनका आना रोक सकती है. फिल्मकार जब चाहें, इन्हें काम देना बंद कर सकते हैं. सरकार को यह अधिकार संविधान ने दिया है और कोई भारतीय नागरिक इससे बाहर तो नहीं जा सकता ! सवाल एकदम सीधा है कि क्या कोई सरकार या कोई नागरिक संविधान के बाहर जा सकता है ? अपवादों की बात छोड़ दें तो संविधान के बाहर जाना देशद्रोह है. अब आप फैसला करें कि इस मामले में देशद्रोह का इल्जाम किस पर आता है.   

भयभीत करण जौहर, मुकेश भट्ट जैसों ने टीवी पर आ कर, बड़ी संजीदगी से कहना शुरू कर दिया कि हम देशभक्त हैं, हम सबसे पहले भारतीय हैं, उसके बाद ही कुछ और ! इन्हें यह भी नहीं बताना चाहिए कि आज से पहले वे क्या थे ? अ-भारतीय थे ? क्या अपनी पसंद के कलाकारों के साथ अपने मन की फिल्म बनाना और देशभक्ति साथ-साथ नहीं चलती है ? क्या किसी दूसरे के आदेश और धमकी से देशभक्त बनना अंतत: देशद्रोह नहीं है ? और अंत में यह भी कि जिस देश में एक नहीं, एक साथ कई-कई स्वार्थों की सरकारें चलती हों और वे सब हिंदुस्तान में से अपने-अपने स्वार्थ का हिस्सा मांगती हों, उस देश में देशभक्ति जैसा शब्द एक-दूसरे को दी गई गाली जैसा लगता है. ( 25.10.2016)                                                                                                                                                                                                                                                                   

Wednesday, 19 October 2016

तलाक दो !

तलाक दो ! 
० कुमार प्रशांत  

मानो देश में बहस व विवादों की कमी थी कि ‘तीन तलाक’ की अमानवीय प्रथा को ले कर लोग मैदान में उतर अाए हैं ! अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तथा उनकी तरह के कितने ही मुस्लिम संगठन व कितने ही मुल्ला-मौलवी हर तरफ चीख-चिल्ला रहे हैं कि ‘ तीन तलाक’ शरिया कानून का हिस्सा है अौर हम इससे किसी को खेलने की इजाजत नहीं दे सकते ! ये सभी इस तेवर में बात कर रहे हैं मानो देश में न कोई सरकार है, न कानून, न अदालत अौर न समाज ! जो कुछ भी है वह मुसलमान होने का दावा करने वाले मुट्ठी भर मौलाना-मौलवी हैं जो यह तै करेंगे कि इस मुल्क में क्या होगा, क्या नहीं होगा !!  
मैं ऐसा लिख भी रहा हूं अौर ठिठक भी रहा हूं क्योंकि यदि इनमें से कोई उन्मत्त मौलाना मुझसे यही पूछ बैठे कि इस देश में कौन, किससे, कहां क्रिकेट खेलेगा यह उद्धव ठाकरे की शिव सेना तै कर सकती है अौर पिच खोद कर, मैच नामुमकिन बना दे सकती है तो हम क्यों नहीं कर सकते, तो मैं जवाब नहीं दे पाऊंगा. मैं जोर से कहना चाहता हूं कि ‘तीन तलाक’ के बारे में सरकार ने अदालत में अपनी राय रखी है तो कुछ भी असंगत या गलत नहीं किया है लेकिन अगर राज ठाकरे की मनसे यह ऐलान करती है कि पाकिस्तानी कलाकारों को इतने घंटे के भीतर मुंबई अौर भारत खाली कर देना है, अौर उनकी गुंडा फौज सड़कों पर उतर अाती है अौर महाराष्ट्र सरकार या केंद्र सरकार इतना भी नहीं कह पाती है कि किसी को राज्य या देश छोड़ने का फरमान देने का अधिकार उसका है, गली-नुक्कड़ पर बैठे लोगों का नहीं तो फिर सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा हो ही जाता है. जब अाप शान से यह कहते सड़कों पर उतरते हैं कि राम जन्मभूमि हमारी अास्था का मामला है अौर इसमें किसी अदालत को बोलने का अधिकार नहीं है तो मुल्ला-मौलवियों को अाप ऐसा कहने से कैसे रोकेंगे कि शरिया कानून अदालत, संविधान अौर देश से ऊपर है अौर इस बारे में कोई बात हो ही नहीं सकती है ? लोकतंत्र ऐसा विधान है जिसमें हर सवाल पर बात हो सकती है अौर किसी भी विवाद में सरकार या अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. हां, इनमें से कोई भी गलत हस्तक्षेप करेगा तो संविधान ही हमें यह अधिकार देता है कि हम उसके खिलाफ अदालत में या संसद में जा सकते हैं. लोकतंत्र के इस विधान को अांख दिखाने वाले हिंदुत्व वाले हों कि संघ परिवार वाले कि अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वाले कि किसी दूसरे नाम से मुसलमानों या दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की तरफदारी करने वाले, सबको यह समझ लेना चाहिए, अौर अंतिम तौर पर समझ लेना चाहिए कि संविधान अौर अदालत की व्यवस्था के सामने सबको झुकना ही होगा अन्यथा इस देश का भूगोल व इतिहास सलामत नहीं रह सकता है. 
अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह मूर्खतापूर्ण बात की है तीन तलाक के सवाल पर जनमत संग्रह करवाया जाए ! वे चुनौती दे रहे हैं कि ९० फीसदी महिलाएं शरिया कानून के पक्ष में होंगी ! होंगी, हो सकती हैं लेकिन इससे तीन तलाक सही कैसे साबित होता है ? अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वालों को इस बात का इल्म है कि इस देश में अगर इस सवाल पर जनमत संग्रह करवाया जाए कि मुसलमानों को हिंदुस्तान में रहने देना चाहिए या नहीं तो कौन कहां खड़ा होगा ? जाति, छूअाछूत, अॉनर कीलिंग अादि-अादि सामाजिक कुरीतियों पर अगर जनमत संग्रह करवाया जाए तो देश का अाईन बदलना पड़ेगा !  अमरीका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक अोबामा को श्वेत चमड़ी वाले काले मन के अमरीकियों से क्या-क्या न सुनना व झेलना पड़ा ! अमरीका में यदि जनमत संग्रह हो कि अश्वेतों को, जो जन्मना अमरीकी नहीं है उन्हें राष्ट्रपति बनने का अधिकार देना चाहिए या नहीं, तो अमरीकी समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा ! इसलिए नहीं कि अमरीका कोई बुरा मुल्क है याकि भारत बहुत पिछड़ा हुअा देश है.  रूहानी अौर जहनी तौर पर उलझे हुए समाजों का मन बहुत धीरे-धीरे बदलता है, बड़ी मुश्किल से नई बातों के लिए तैयार होता है. उसे लगातार प्रगतिशील कानूनों की मदद देनी पड़ती है, चुस्त व बा-ईमान सरकारों को संभल कर चलना अौर चलाना पड़ता है, समाज पर नैतिक असर रखने वालों को बार-बार रास्ते पर अा कर, रास्ता बताना पड़ता है, जनमत बनाने की मुहिम चलानी पड़ती है. अगर ऐसे सवालों पर जनमत करवाएंगे अाप तो अपना ही कुरुप चेहरा दुनिया को दिखाएंगे ! 
तलाक एक जरूरी सामाजिक व्यवस्था है. स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध जब अर्थहीन हो जाएं, एक-दूसरे को अपमानित करने, हीन दिखाने अौर हिंसा का शिकार करने तक पहुंचें इससे पहले ही वैसे संबंध से मनुष्य की मुक्ति मनुष्यता के विकास में अगला कदम है. यह अाधुनिकता का अभिशाप नहीं है, अाधुनिक समझ है जो यह मानती है कि स्त्री अौर पुरुष दोनों ही एक सी संवेदना से जीने वाले अौर एक-दूसरे की बेपनाह जरूरत महसूस करने वाले प्राणी हैं लेकिन उनका साथ अाना हर बार, हर कहीं श्रेयस्कर नहीं होता है, नहीं हो सकता है. इसलिए विफल साथ से निकल कर, अपनी जिंदगी के नये मुकाम खोजने की सहज अाजादी मनुष्य को होनी ही चाहिए. लेकिन तलाक की व्यवस्था ऐसी भी नहीं बनाई जा सकती है जिसका पलड़ा किसी एक के पक्ष में इतना झुका रहे कि वह उसे दमन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करे. इसलिए तलाक के लिए पारिवारिक स्वीकृति हो, अगर बच्चे हैं तो उनके भावी की पूरी फिक्र हो, रिश्ते टूटने को सामाजिक मान्यता हो, एक अवधि विशेष तक दोनों को अपने संबंधों पर पुनर्विचार करने की बाध्यता हो, फिर अदालत में उनके मामले पर विचार हो अौर फिर तलाक तक पहुंचें हम, इसकी व्यवस्था बनानी पड़ी है. अगर वैवाहिक जीवन में ऐसी स्थिति बनती हो कि कोई किसी को अपमानित करे, अस्तित्वहीन व व्यक्तित्वहीन जीने को मजबूर करे तो यह निजी धािर्मक मान्यताअों  से निकल कर, राष्ट्रीय सवाल बन जाता है. इसलिए यहां किसी धार्मिक जमात के पर्सनल लॉ का कोई संदर्भ ही नहीं बनता है. स्त्री हो या पुरुष, अपने हर नागरिक के स्वाभिमान की रक्षा में राज्य या अदालत को सामने अाना ही चाहिए. ऐसे मामले में हम मनुस्मृति को या शरिया कानून को या पारसी पंचायत को या चर्च को नहीं, संविधान को देखेंगे जो बताता है कि लोकतंत्र का धर्म क्या है. यह संविधान अपूर्ण भी हो सकता है अौर हम उससे असहमत भी हो सकते हैं फिर भी उसे तब तक मानना ही होगा जब तक हम उससे बेहतर कुछ गढ़ नहीं लेते. अाखिर मनुष्य के रूप में हम सब भी तो अपूर्ण अौर कमतर ही हैं न लेकिन इससे किसी को यह अधिकार नहीं मिल जाता है कि वह समाज में कत्लेअाम मचा दे. 
तीन तलाक की व्यवस्था अाज बन रहे भारतीय समाज के साथ कदमताल नहीं कर सकती है जैसे सैकड़ों शादियां करने वाला राजवंश अाज के समाज में जी नहीं सकता. अाज के समाज में सती-प्रथा नहीं चल सकती है, दलितों को दोयम दर्जे का बताना व बनाना नहीं चल सकता है वैसे ही तीन तलाक की व्यवस्था भी नहीं चल सकती है. मुस्लिम समाज में अाधुनिक सोच वाले कई लोग अौर कई सारी महिलाएं इसे पसंद नहीं करती हैं. कई जागरूक मुस्लिम महिलाएं इसका मुखर विरोध करती हैं अौर अपने देश-समाज को जगा कर पूछती हैं कि हमारे लिए अापने क्या व्यवस्था बनाई है ? क्या उन्हें यह जवाब दिया जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र के पास उनके लिए कोई जगह नहीं है ? ऐसा जवाब देने वाला संविधान, ऐसा जवाब देने वाली सरकार अौर ऐसा जवाब स्वीकार करने वाला समाज एक साथ ही पतन की राह जाएंगे. इसका एक ही जवाब है, अौर हो सकता है कि संविधान, सरकार अौर समाज कहे कि हमारे धार्मिक विश्वास, हमारे सामाजिक रीति-रिवाज चाहे जितने अलग हों, जब सवाल नागरिक की हैसियत का उठेगा तब न कोई धर्म, न कोई जाति, न कोई संप्रदाय अौर न लिंग का भेद होगा. नागरिकता के संदर्भ में सारे देश में सबको शरीक करने वाला एक ही संविधान चलेगा. 
इस सरकार की परेशानी यह है कि इसकी झोली में भरोसा नाम का माल है ही नही ! इसे सरकार के रूप में देश का भरोसा जीतना होगा. जब तक ऐसा नहीं हो पाता है तब तक सामाजिक परिवर्तन के हर सवाल पर इसे वातावरण बनाने की पुरजोर कोशिश करनी होगी.  वातावरण बनाना मतलब धमकी देना, संख्या का भय पैदा करना, सरकारी तेवर दिखलाना अौर  गाय, सिनेमा, लव जेहाद, पलायन अादि-अादि की गर्हित चालें चलना नहीं होता है. यह सब तो बने या बनते वातावरण में पलीता लगाना है. अदालत में अपना पक्ष रख देने के बाद सरकार को अौर उसके भोंपुअों को न कुछ कहना चाहिए, न करना चाहिए ! एक लंबा, गहन विमर्श सारे देश में चले - तीन तलाक के बारे में भी अौर समान नागरिक कानून के बारे में भी ! फिर अदालत भी अपनी राय कहे. फिर देखें कि समाज कहां पहुंचता है. जितना विमर्श चलेगा, वातावरण तैयार होगा.  
मुस्लिम समाज के रहनुमाअों के अागे अाने की यह घड़ी है. उन्हें यह कहना ही होगा कि तलाक दो, अभी दो; अौर तीन नहीं, एक ही दो : हर कठमुल्ली सोच को तलाक दो ! करीब दो दर्जन इस्लामी देशों में तीन तलाक की स्वीकृति नहीं है अौर वहां मुसलमान अौर शरिया सब सलामत हैं. मतलब सीधा है - खोट मन में है जिससे सबको तलाक लेना जरूरी है.  ( 14.10.2016)                                                                                                                                                                           

Friday, 7 October 2016

पाक से न सही कश्मीर से तो बात करें हम

        तो पाकिस्तान ने बातचीत बंद करने का मन बना कर रखा है. कभी हम तो कभी वे ऐसा मन बनाते ही रहते हैं - कभी खुद तो कभी बाहरी निर्देश से ! सवाल एक ही है जो पाकिस्तान बनने से आज तक चला चला आ रहा है: कौन किससे बात करे ? दोनों देशों में बनती और बदलती सरकारों की कसौटी भी इसी एक सवाल पर होती रही है कि किसने किससे, कब और कहां बातचीत की. भारत में तो एकदम प्रारंभ से ही लोकतांत्रिक सरकारें रही हैं, पाकिस्तान में सरकारों का चरित्र लगातार बनता-बिगड़ता रहा है - कभी लोकतांत्रिक तो कभी फौजतांत्रिक ! बातचीत फिर भी दांवपेंचों में फंसती रहती है. 
        
लेकिन एक सवाल है जिससे हम मुंह चुराते हैं: क्या बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच ही होनी है ? इस विवाद के दो ही घटक हैं ? ऐसा मानना सच भी नहीं है और उचित भी नहीं. भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी बातचीत होगी, कश्मीर के लोग उसका तीसरा कोण होंगे ही. एक तरफ यह इतिहास का वह बोझ है जिसे उठा कर हमें किसी ठौर पहुंचा ही देना है; दूसरी तरफ यह हमारी दलीय राजनीति का वह कुरूप चेहरा है जिस पर स्वार्थ की झुर्रियां पड़ी हैं. ६० वर्षों से अधिक समय में भी हम कश्मीर को इस तरह अपना नहीं सके कि वह अपना बन जाए. जब सत्ता का सवाल आया तो पिता मुफ्ती से ले कर बेटी मेहबूबा तक से भारतीय जनता पार्टी ने रिश्ते बना लिए अन्यथा उसकी खुली घोषणा तो यही थी न कि ये सब देशद्रोही ताकतें हैं जिनके साथ हाथ मिलाना तो दूर, साथ बैठना भी कुफ्र है. कुछ ऐसा ही रवैया कांग्रेस का भी रहा है और नेशनल कांफ्रेंस का भी. सब हाथ मिला कर सत्ता में जाते रहे हैं और सत्ता हाथ से जाते ही एक-दूसरे पर कालिख उछालते रहे हैं. लेकिन इन सबके बावजूद न नेशनल कांफ्रेंस, न कांग्रेस, न भारतीय जनता पार्टी और न महरूम मुफ्ती ही कभी ऐसी हैसियत बना सके कि कह सकें कि कश्मीर का अवाम उनके साथ है. ऐसा दावा एक ही आदमी का था और सबसे खरा भी था और वे थे शेख अब्दुल्ला ! बाकी सारे-के-सारे नाम हाशिए पर कवायद करने वाले ही रहे. शेख साहब की बहुत सारी ताकत जेलों में जाया हुई और बहुत सारी उन्होंने भटकने में गंवा दी. फिर जो सत्ता हाथ में आई उसे ले कर वे भी व्यामोह में फंसे और अौसत दर्जे के राजनीतिज्ञ बन कर रह गये. किसी लालू यादव की तरह उन्हें भी अपना उत्तराधिकारी अपने परिवार में ही मिला. पाकिस्तान हमारी यह दुखती रग पहचानता रहा है और उसका फायदा उठा कर, कश्मीर के अलगाववादियों को उकसाता भी रहा है. आज की स्थिति यह है कि कश्मीर में किसी भारत के पांव धरने की जगह नहीं है. कश्मीरी अवाम और नवजवान के मन में भारत की तस्वीर बहुत डरावनी और धृणा भरी है. ऐसा क्यों हुआ, यह कहानी बहुत लंबी है और उसके पारायण में से आज कुछ निकलने वाला भी नहीं है.

        अब आज अगर हमारे सोचने और करने के लिए कुछ बचता है तो वह यह है कि पाकिस्तान हमसे बात करे कि ना करे, हम कश्मीर में एक सुनियोजित ‘संवाद सत्याग्रह’ करें. सरकार, फौज और राजनीतिक दल यह सत्याग्रह कर ही नहीं सकते क्योंकि इनके पास सत्य का एक अंश भी आज की तारीख में बचा नहीं है. तो फिर इस सत्याग्रह में शामिल कौन हो ? यह काम देश के नवजवानों को करना होगा. सरकार जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करा कर पीछे चली जाए.  सारे देश में मुनादी हो कि कश्मीर के अपने भाइयों से बातचीत करने के लिए युवकों-युवतियों की जरूरत है. देश के विश्वविद्यालयों से, युवा संगठनों से, गांधी संस्थाओं के लोगों से व्यापक संपर्क किया जाए और इनकी मदद से ‘संवाद सत्याग्रह’ के सैनिकों का आवेदन मंगवाया जाए. स्थिति की गंभीरता को समझने वाले ५०० से १००० युवकों-युवतियों का चयन हो. उनका एक सप्ताह  का प्रशिक्षण शिविर हो. जयप्रकाश नारायण के साथ मिल कर कश्मीर के सवाल पर लंबे समय तक, उसके विभिन्न पहलुओं पर काम करने वाले गांधी शांति प्रतिष्ठान को ऐसे शिविर के आयोजन और संचालन के लिए अधिकृत किया जाए. इस शिविर को पूरा करने का मतलब यह होना चाहिए कि युवाओं की यह टोली कश्मीर समस्या को हर पहलू से जानती व समझती है. यह जानकारी और कश्मीरी लोगों के प्रति गहरी सच्ची संवेदना ही इनका हथियार होगा.

     ये संवेदनशील, प्रशिक्षित युवा अनिश्चित काल मान कर कश्मीर पहुंचें और कश्मीर घाटी में विमर्श का एक अटूट सिलसिला शुरू हो और अबाध चले; फिर जवाब में गाली हो कि गोली ! और हमें कश्मीर के लोगों पर पूरा भरोसा करना चाहिए कि वे घटना-क्रम से व्यथित हैं, चालों-कुचालों के कारण भटके और उग्र भी हैं लेकिन पागल नहीं हैं. ऐसा ही मान कर तो गांधी भी नोआखाली पहुंचे थे न ! देश के विभिन्न कोनों से निकली और कश्मीर की धरती पर एक हुई ८ से १० सदस्यों की टोलियां जब एक साथ, यहां-वहां हर कहीं, उनको जानने, उनसे सुनने, सारा कुछ सुनने पहुंचेंगी तो व्यथा की कठोरता भी पिघलेगी और गुस्से की गाली-गोली भी जल्दी ही व्यर्थ होने लगेगी. यह हिम्मत का काम है, धीरज का काम है और संवेदनापूर्वक करने का काम है.  कश्मीरी लोगों और युवाओं में बनी हुई संपूर्ण संवादहीनता और उग्रता को हम शोर या धमकी के एक झटके से तोड़ नहीं सकेंगे. इसलिए यह सत्याग्रह धीरता, दृढ़ता और सदाशयता तीनों की समान मात्रा की मांग करता है.

   यह सत्याग्रह इसलिए कि कश्मीर यह समझ सके कि वह जितना घायल है, बाकी का देश भी उतना ही घायल है. कश्मीर यह समझ सके कि राजनीतिक बेईमानी का शिकार अकेला वह नहीं है, क्षेत्रीय असंतुलन केवल उसके हिस्से में नहीं आया है, फौज-पुलिस के जख्मों से केवल उसका सीना चाक नहीं हुआ है और यह भी कि फौज-पुलिस का अपना सीना भी उतना ही रक्तरंजित है. ‘संवाद सत्याग्रह’ के युवा सैनिकों को यह जानना है कि कश्मीर दरअसल चाहता क्या है; और यह ‘सत्याग्रह’ उसे यह बताना भी चाहेगा कि वह जो चाहता है वह संभव कितना है. चंद्र खिलौना तो किसे मिला है आज तक ? कश्मीर के युवा और नागरिक यह समझेंगे कि एक अधूरे लोकतंत्र को संपूर्ण बनाने की लोकतांत्रिक लड़ाई हमें रचनी है, उसके सिपाही भी और उसके हथियार गढ़ने भी हैं और उसे सफलता तक पहुंचाना भी है. क्यों लड़ें हम ऐसी लड़ाई ? क्योंकि इस लड़ाई के बिना उन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे जिनसे कश्मीर भी और हम सब भी परेशान हैं और हलकान हुए जा रहे हैं.  हो सकता है, कश्मीर हमसे उलट कर कहे कि वह इस देश को ही अपना नहीं मानता है तो इस देश के लोकतंत्र की वह फिक्र क्यों करे ? ठीक है, यह भी सही लेकिन कश्मीर को यह बताना तो होगा ही कि उसका जो भी देश होगा, पाकिस्तान हो या कि कोई स्वतंत्र देश ही सही, वहां भी सवाल तो सारे यही होंगे. कश्मीरी युवा चाहें तो पाकिस्तानी युवाओं से बात करें, म्यांमार और अफगानी युवाओं से बात करें कि श्रीलंकाई युवाओं से बात करें, जवाब एक ही मिलेगा कि जवाब किसी के पास है नहीं ! तख्त, तिजोरी और तलवार के बल पर चलने वाला तंत्र दुनिया में हर कहीं एक ही काम कर रहा है - वह लोक की पीठ पर बैठा, उसकी गर्दन दबा रहा है.
यह सच सबसे पहले मोहनदास करमचंद गांधी ने पहचाना था और इससे लड़ने का रास्ता भी खोजा था. आजादी के बाद ८० साल के उस आदमी ने अभी सांस भी नहीं ली थी कि किसी ने पूछा : बापू, जुलूस, धरना, जेल, हड़ताल आदि सब अब किस काम के ! अब तो देश भी आजाद हो गया और सरकार भी अपनी है. अब आगे की लड़ाई का आपका हथियार क्या होगा ? क्षण भर की देर लगाए बिना जवाब दिया उन्होंने : अब आगे की लड़ाई मैं जनमत के हथियार से लड़ूंगा !


    ३० जनवरी को हमारी गोली खा कर गिरने से पहले जो अंतिम दस्तावेज लिखा उन्होंने उसमें भी इसी को रेखांकित किया कि लोकतंत्र के िवकास-क्रम में, एक ऐसी अवस्था आनी ही है जब तंत्र बनाम लोक के बीच एक निर्णायक लड़ाई होगी; और उस लड़ाई में लोक की निर्णायक जीत हो, इसकी तैयारी हमें आज से ही करनी है.  कोई ६८ साल पहले की यह वह भविष्यवाणी है और आज के हम हैं ! रूप व आवाज बदल-बदल कर वह लड़ाई सामने आती है और हमें पराजित कर निकल जाती है. कश्मीर भी समझे और हम सब भी समझें कि इस लड़ाई में अगर लोक को सबल और सफल होना है, तो ‘संवाद सत्याग्रह’ तेज बनाना होगा. कभी ऐसा वक्त भी आएगा कि जब कश्मीर देश के दूसरे कोनों में पहुंच कर ‘संवाद सत्याग्रह’ चलाएगा. ऐसा ही एक अपूर्व ‘संवाद सत्याग्रह’ जयप्रकाश नारायण ने आजादी के बाद, नगालैंड में चलाया था और वह संवादहीनता तोड़ी थी जिसे तोड़ने में राजनीतिक तिकड़में और फौजी बहादुरी नाकाम हुई जा रही थी. इतिहास का यह अध्याय इतिहासकारों पर उधार है कि पूर्वांचल आज देश से जुड़ा है और अलगाववाद की आवाजें वहां से कम ही उठती हैं, तो यह कैसे संभव हुआ ? खुले संवाद में गजब की शक्ति होती है बशर्ते कि उसके पीछे कोई छुपा एजेंडा न हो.

   क्या हम अपनी कसौटी करने के लिए, पाकिस्तान से नहीं सही तो नहीं, कश्मीर से ‘संवाद सत्याग्रह’ आयोजित कर सकते हैं ? देखना है कि जवाब किधर से आता है ! ( 5.05.2016)

चंपारण -जहां से गांधी को भारत अौर भारत को गांधी मिले