Friday, 31 July 2026

जेन-झी सुनो !

   मैं, जो अब उम्र की 76वीं सीढ़ी पार करने जा रहा हूं, नहीं जानता हूं कि यह जेन-झी  क्या है ! अगर यह गणित का वैसा ही अर्थहीन खेल है जैसा इसे बतलाया जा रहा है, तो मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है. कुंडली बांचनेवाले, रेखाओं से भविष्य बतलानेवाले, सितारों व ग्रहों का हिसाब लगा कर भूत-भविष्य तय करनेवाले खेल मुझे खेल से ज्यादा कभी कुछ लगे ही नहीं. इसलिए कौन, कौन से वर्ष-खंड में पैदा हुआ है, इससे उसका जेनरेशन तय करनेवाला खेल भी मुझे मतलब का नहीं लगता है.  

   मैं उम्र का फर्क समझता हूं. मैं ताज़ादम शरीर की कीमत जानता व मानता हूं. मैं जानता हूं और मानता हूं कि तुमजो मुझसे 50-60 वर्ष बाद पैदा हुए होमुझसे ज्यादा दौड़ सकते होहवा में उड़ सकते होशिखर से छलांग मार सकते होबादलों में जा सकते होचांद-सितारे छू सकते हो. यह सब कभी मैंने भी किया हैआज भी ऐसा करने की हसरत रखता हूं. लेकिन कर नहीं सकताक्योंकि हमारा हो कि तुम्हारायह शरीर है तो एक मशीनऔर हर मशीन की तरह इसकी एक एक्सपायरी डेट भी है. कारखानों की मशीनों की एक्सपायरी डेट उस पर लिखी आती है. यहां मजा यह है कि हमारी एक्सपायरी डेट है तो ज़रूर ही लेकिन हममें से किसी को उसका पता नहीं है. इसलिए फिर हमारे हाथ में बच रहता है उमंग से भरा मनसंकल्प से भरा दिल और सपनों से भरी आंखें ! अगर जेन-झी से तुम्हारा मतलब इन सबसे है तो मैं तुम सबके बराबर और तुम सबके साथ जेन-झी हूं. 

   मैं उस महात्मा गांधी से प्रेरित हूं जिसने 80 साल की उम्र तक - यानी गोली से मारे जाने तक - अपने सपनों के हर हत्यारे से अथक लड़ाई कीऔर जब मारा गया तो भी उसने इस तरह मौत को गले लगाया कि सारी दुनिया ने सर झुका कर यही कहा कि जीना भी ऐसा ही होमरना भी ऐसा ही. अभी-अभीतुम्हारे आसपास से ही एक आवाज उठी जो मैंने सुनी. वह कह रही थी : जेन-झी यानी जेनरेशन गांधी ! यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारे साथ हूंमुझे साथ ले लो ! 

   मैं जंतर-मंतर पर लगातार था और तुम लोगों को खुलते-खिलतेरचते-मिटातेनाचते-गातेअपने सपनों को साझा करते देख रहा था. मैं तुम्हारी गति भी देख रहा थातुम्हारी कल्पनाशीलता भी. मैं अनशन की तुम्हारी दृढ़ता भी देख रहा थातुम्हारा संयम भी. मैं इन सबको जोड़ कर कहूं तो कहूंगा कि मैं नया भारत देख रहा था. इस भारत में कुछ फिसलन भी थीलड़खड़ाहट भीकुछ बेढ़बपना भी थाकुछ अनगढ़ता भी ! मैं भी तो इन सबके साथ ही जीता-बढ़ता आया हूं. यह हमारे साथ चलनेवाली परछाईं है और मुझे अपनी परछाई कभी भी बोझ नहीं लगती है. तुम सब मुझे मेरे जैसे ही लगते हो. हम सबको समझना इतना ही है कि जो अनावश्यक हैअसंस्कृत हैकुरूप हैहमें ऊपर उठाता नहींनीचे खींचता हैउन सबसे मुक्ति पानी है. जैसे सांप केंचुल छोड़ता है नवैसे ही इन सबको हमें छोड़ते चलना है. यह आसान नहीं है लेकिन इसके बिना कल्याण भी नहीं है. इसलिए बोलने-लिखने-गाने-नारे लगाने तथा संवाद करने में हर फिसलन से हमें बचना है.  

   अब हम जंतर-मंतर से बाहर आते हैं. वहां तुम सबने क्या-क्या कियावह गाथा इतिहास दर्ज कर चुका है. वह उसे दोहराता भी रहेगा. हम क्यों दोहराएं ! वह भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णिम अध्याय है. तुम्हारी बोली से किसी सत्ता का अहंकार टूट गया है. वह औचक देख रही है कि यह आंधी आई कहां सेऔर वह किसी शिकारी कुत्ते-सी सूंघ रही है कि यह किधर जा रही है. जब सत्ता-प्राप्ति अंतिम सत्य बन जाती है तब अहंकार बारूद का काम करता हैऔर बारूद है तो वह फटेगा ही ! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक आदमी का इस्तीफा नहीं हैसत्ता के अहंकार के टूटने की गूंज है. वह टूटा यह अच्छा हुआ. लेकिन तुम याद रखना कि चोट खाया सांप ज्यादा ख़तरनाक होता है. राष्ट्र जब भीड़ में बदल दिया जाता है तब वह हत्यारा हो उठता है जिसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. देशप्रेम व राष्ट्रवाद दो सर्वथा भिन्न भाव ही नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के विरोधी भाव भी हैं. 

   इसलिए सुनो जेन-झीअब तुम्हें तोड़ने के सारे संभव तीर चलाए जाएंगेसारे हथकंडे अपनाए जाएंगे. तुम्हारे साथी खरीदे-बेंचे जाएंगेतुम्हारे सामने जेन-झी  की एक नई जमात खड़ी कर दी जाएगी. तुम आसानी से देश भर में न घूम पाओगेन जी पाओगे. राजनीतिक दलों का जंगल तुम्हारे सामने खुला है ताकि तुम उनमें से किसी में अंटक-भटक जाओ. हर जगह तुम्हारे सामने एक जंतर-मंतर होगा जो सवाल करेगा व जवाब भी पूछेगा. इसलिए निजी जीवन में साफ व संयमित रहो. एक-दूसरे से जितना संभव होसंवाद बनाओ. लगातार-लगातार देश भर के अपने युवकों के बीच जाओ. अपने बीच की खाइयां पाटो. याद रखो कि प्रतिवाद में सारा कुछ नकारात्मक चल भी जाता हैपरिवर्तन का आंदोलन नकारात्मक भीसकारात्मक भीरचनात्मक भी और दूरगामी भी- ऐसे सारे तत्वों का एक पुंज होता है. हमें वह पुंज तैयार करना है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआधर्मेद्र प्रधानों के इस्तीफे होते भी रहेंगे लेकिन तंत्र पर लोक की - जेन-झी  की !- पकड़ कैसे बने व बनी रहेइसका जवाब हमें खोजना हैसिद्ध करना है. अगर हम यह कर सके तो दुनिया भर का लोकतंत्र हमारा ऋणी रहेगा.

   क्यूबा के अमर क्रांतिकारी चे ग्वुवेएराजिनकी तस्वीर तुम्हारे टी-शर्टों पर मैं देखता रहा हूंवे जब भारत आए और गांधी को थोड़ा जाना-समझा तो राजघाट जा कर लिखा कि क्रांति का एक तरीका यह भी हैयह तो हम जानते ही नहीं थे ! इतिहास तुम्हें  ऐसा कहने का अवसर नहीं देगाक्योंकि तुम चे के बहुत-बहुत बाद पैदा हुए हो. तुम्हारे पास जानकारियों की अत्यंत कुशल व व्यापक तकनीक है. इसलिए हमें विचार-संपन्न होना होगा. दूसरी विपन्नताएं चल भी जाएंगीविचारों व विकल्पों की विपन्नता नहीं चलेगी. 

   जब तुम जंतर-मंतर से निकल कर अपने घरों में पहुंचोगे तो पाओगे कि अपना घर भी धर्मेंद्र प्रधानों से भरा है. हमें घर-घर में उनका मुकाबला करना है. वहां जेन-झी है ही नहीं. गांधी ने धुर 1948 में कहा था न कि मुझे अब जो लड़ाई लड़नी है वह साम्राज्यवाद से लड़ी लड़ाई से भी ज्यादा दुर्धर्ष होगीक्योंकि यह अपनों से है. तुम्हें भी अपने हर घर मेंहर कमरे में यह लड़ाई लड़नी होगी. इसके बिना सफलता होगी नहींटिकेगी नहीं. इसलिए घर में फैली व फैलाई जा रही हर संकीर्णता से मुखर होकर- अपनों के सामने सत्याग्रह करो  ! 

   घर से बाहर आओगे तो समझ सकोगे कि पिछले कोई पंद्रह सालों में इस सरकार ने योजनापूर्वक भारतीय राष्ट्र की तमाम सांस्कृतिक-शैक्षणिक-सामाजिक-बौद्धिक व्यवस्थाओं में उसी सांप्रदायिक संगठन के लोगों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया है जो नैतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से देश के सबसे विपन्न लोगों का हिंसक जमावड़ा है. इनसे कदम-कदम परहर स्तर पर लड़ना होगा. हमें सीखना होगा कि गांधी ने इन्हें कैसे भारतीय समाज के चित्त से करीब-करीब बाहर ही कर दिया था. इसी बौखलाहट में इन्होंने उनकी हत्या की थी. इसलिए इनसे अंतिम लड़ाई हम पर उधार है.   

   नीट व दूसरी परीक्षाओं का पेपर लीक किसी चूक की वजह से नहीं हुआ है. जब सारा देश एक धंधे में बदल दिया जाता है तब हर कुछ बिकता है- परीक्षाएं भीपेपर भीराम मंदिर व दूसरे तमाम धर्मों के प्रतीक-स्थलों का चढ़ावा भीनौकरियां भीरोज़गार भीन्याय भीसपने भी ! सोचो नजब सरकार ही बिकाऊ विधायकों व सांसदों से बनाने का नया फ़ैशन चलाया गया हैतब क्या है जो बाज़ार में नहीं हैबिकाऊ नहीं है 

   तो लड़ाई यहां है जेन-झी ! लड़ोगे न जो नहीं लड़ेगा वह गणित से भले जेन-झी कहलाएहोगा वह कायर ! तो जेन-का और जेन-झी में से चुनना है तुम्हें ! ( 31.07.2026)

Thursday, 9 July 2026

बात एक जुगनू की !

    अंधकार जब बेहद घना होता है तब जुगनू भी रास्ता दिखाने लगते हैं. जुगनू इसलिए बहुत अच्छे व जरूरी होते हैं, क्योंकि वे सूरज की बाट नहीं जोहते; अंधकार है तो जुगनू हैं और वे अंधकार को चुनौती देने से चूकते नहीं हैं. इंसानों में रोशनी की आस बनी रहे, जुगनू इसलिए ही होते हैं. जुगनू पल-पल में दमक कर बताते रहते हैं कि निराश होने से बेहतर है कि रोशनी की तरफ़ देखो, क्योंकि रोशनी का एक मतलब आशा भी होता है. 

   आज मैं बार-बार जुगनू की बात क्यों कर रहा हूं इसलिए कि हमारे बीच एक जस्टिस माधव जयाजीराव जमादार हैं जिनके हाथ में एक संविधान है. जस्टिस जमादार हमारी दिशाहीन व अंधेरी न्यायपालिका के जुगनू हैं. 

   हमारी अदालतों का यह हाल है कि वे क्या कहती हैंकिससे कहती हैं और उनके कहे का क्या होता हैयह देखना उसने छोड़ दिया है. समाज ने भी अदालत की तरफ़ से मुंह फेर लिया है. समाज समझता है कि जो चमकता नहीं है वह जुगनू नहींएक फतिंगा है. अदालत कहती रहती है कि जमानत नियम हैजेल अपवाद हैउसी अदालत ने पिछले पांच से अधिक सालों से उमर ख़ालिदसरजील इमाम आदि को जेलों में बंद कर रखा है. न मुकदमा शुरू होता हैन सुनवाई होती हैन उन्हें ज़मानत दी जाती है. वे जेल के अंधेरे में बंद हैं तो सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद के रचे अंधेरे में डूबा है. यह समाज को कॉक्रोच मानता है और उससे जितनी दूरी संभव है उतनी बनाए रखता है और हर संभव तरीके से सत्ता की मदद करता है. आज से 106 साल पहले महात्मा गांधी ने अदालतों के बारे में एक निष्कर्ष हमारे सामने रखा था : “ अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं.” हमारे न्यायविदों ने गांधी के इस कथन में एक संशोधन कर लिया था : अदालतों की नहींऔपनिवेशिक अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं. लेकिन ये लोग कितने गलत साबित हो रहे हैं ! औफनिवेशिक और लोकतांत्रिक अदालत में चरित्रत: कोई भेद बचा ही नहीं है.  

   मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस जामदार ने अभी-अभी मुंबई में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह कहा जो इस देश की अदालतों को 2014 के बाद कई-कई बार कहना चाहिए था. 2014 से पहले भी कहना चाहिए था. लेकिन तब राहत यह थी कि अदालत नहीं बोल पाती थी तो समाज बोलता थासमाज चूकता था तो अदालत बोलती थी. लेकिन 2014 के बाद योजनापूर्वक इन दोनों को चुप कराया जाने लगा और आज हालत यह है कि इस देश में सिर्फ एक ही आदमी है जो मन की बात कर सकता है. बाकी सबको बता दिया गया है कि आपका मन और आपकी बात अपने तक रखिएवरना … 

   जस्टिस जामदार ने इससे इंकार कर दिया. वे बोले और एकदम साफ बोले : देश को एक सरकार का ग़ुलाम बनाने की मुहिम चल रही है और पुलिस उसे साकार करने में जुटी है. पुलिस यह भूल गई है कि वह जनता की सेवक हैकिसी सरकार या उसके नेताओं की नहीं. उन्होंने पूछा कि सरकार की मुखालफत करनाविरोध प्रदर्शन आयोजित करनानरेंद्र मोदी या अमित शाह के लिए मुर्दाबाद के नारे लगाना आदि कब से व कैसे अपराध हो गया उन्होंने मुंबई पुलिस को कठघरे में खड़ा कर पूछा कि सैयद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी को किस संवैधानिक धारा के तहत आपने तड़ीपार या जिलाबदर करने का आदेश दिया 

   बात यह थी कि वहीद साहब ने सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी बना रखी है और वे सरकार से जब भीजिस भी मुद्दे पर असहमत होते हैंउसका खुलासा करने सड़कों पर उतर आते हैं फिर बात नागरिकता क़ानून की हो या बाबरी मस्जिद की या ज्ञानव्यापी मंदिर में नमाज़ पर रोक की. वे अपनी पार्टी के बैनर से अपना विरोध दर्ज कराते हैं. अब तक किसी भी पुलिस थाने में ऐसा एक मामला भी दर्ज नहीं है कि वहीद साहब के प्रदर्शन में तोड़-फोड़ हुई हो कि हुल्लड़बाजी हुई हो. वे इतने बड़े नेता नहीं हैं कि इतने बड़े हंगामे आयोजित करवा सकें. वे मुसलमान हैं तो मुसलमानों के सवाल उठाते हैंऐसा एतराज़ उठाने वालों को बताना चाहिए कि आज कौन है कि जो अपने समुदाय या अपने वोटबैंक से बाहर के सवाल उठाता है भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक से बाहर का हिंदुस्तान पहचानती नहीं है सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि वह कहती भी है कि उसे मुस्लिम वोट की ज़रूरत ही नहीं है. इसलिए पूछना जरूरी हो जाता है कि मुंबई पुलिस को वाहिद साहब से एतराज क्यों है दरअसल एतराज़ मुंबई पुलिस को नहींपुलिस को अपनी निजी सेना मानने वाले सत्त्ताधारियों को है. वे जानते हैं कि असहमति की आवाज को ज़मीन पर मौका मिला तो वह आसमान छा लेती है. इसलिए वे हमेशा सावधान रहते हैं कि असहमति की आवाज कहीं से उठेउसे उठने से पहले ही दबोच लेना है. उसने यह विभाग पुलिस को सौंप रखा है कि वह सबको डरा कर रखे. सत्ता के खेत-खलिहान में पुलिस का इस्तेमाल आज बिजूका की तरह किया जा रहा है. पुलिस-तंत्र अपने इस अशोभनीय इस्तेमाल के बारे में चूं भी नहीं करता है. 

   जस्टिस जामदार ने जैसे ही पुलिस-तंत्र को कठघरे में खड़ा कियासारे देश में उनकी बात की गूंज उठी. पता नहीं कि कितने दिनों बाद किसी जज ने संविधान की बात इस तरह उठाई कि एक कोई लिखित दस्तावेज है जिससे किसी भी लोकतांत्रिक संरचना को बाहर जाने की इजाजत हम नहीं दे सकते ! संविधान के सामने सर झुका करसंविधान का सर झुकाने का खेल इतने समय सेइतनी तरह से खेला जा रहा है कि संविधान हास्यास्पद बन कर रह गया है. न्यायपालिका संविधान देख कर नहींसत्ता का मुंह देख कर बोलती है. वह जितना ज्यादा बोलती हैउतनी ही गूंगी हुई जाती है. 

   जामदार साहब ने इस अशोभनीय चलन पर ऊंगली उठाई है. उन्होंने जो कहा है वह एकदम सामान्य संवैधानिक बात है. कोई भी सरकार अपनी फौज-पुलिसइडी-आईटी-सीबीआई-कैग-यूएपीए आदि-आदि की मदद से नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हाथ नहीं डाल सकती हैक्या यह हमारी प्राथमिक कक्षा की किताबों में नहीं लिखा है जो बच्चों को पता हैवह मुंबई पुलिस का पता नहीं है उसके लिए जस्टिस जामदार को आगे आना पड़ेतो यह मुंबई पुलिस के लिए डूब मरने की बात है. उसे कितने पानी में डूब मरना चाहिएयह हम नहीं बताते हैं. यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह अपने पतन की सजा स्वंय ही तय करे. 

   लेकिन जस्टिस जामदार के सवाल की जद में ख़ुद उनकी न्यायपालिका भी आती है जो विधायिका-कार्यपालिका के साथ गणेश आरती करती तो मिलती हैसंविधान पढ़ती नहीं मिलती है. राम मंदिर में लूट या डकैती की जैसी अपमानजनक वारदातें होती रही हैंक्या अदालत भी उस अपराध की भागीदार नहीं है संविधान को बाजू रख करभगवान के निर्देश से जिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की सबसे ऊंची कुर्सी के पीछे छिप कर यह मंदिर बनवायाक्या उनसे नहीं पूछना चाहिए कि मंदिर में चल रहे इस घोटाले के बारे में उनके भगवान का क्या निर्देश है न्यायपालिका जब संविधान को छोड़ कर किसी दूसरे की आरती उतारने लगती है तब वह उसी लोकतंत्र का गला घोंटने लगती है जिसने उसे जन्म भी दिया व विशेषाधिकारों से नवाजा भी है.  जस्टिस जामदार दूसरों से ऊंगली भर ऊंचे नज़र आते हैंतो इसलिए कि उन्होंने फिर से भगवान को नहींसंविधान को बहस के केंद्र में ला दिया है. हमारा संविधान ही हमारी न्यायपालिका का भगवान है. जिन्होंने दूसरा कोई भगवान खोज लिया हैउन्हें न्यायमूर्ति की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए. हमें आश्वस्ती मिलती हृै जब हम पाते हैं कि अंधश्रद्धा और अंधभक्ति के इस दौर में जस्टिस जामदार जैसे लोग भी हैं जो सिर्फ हैं नहीं बल्कि जिंदा भी हैं- जुगनू की तरह ! 

   वसीम बरेलवी साहब ने इसे ही लक्ष्य कर कहा है न : “ उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है / जो जिंदा हो तो जिंदा नज़र आना जरूरी है. ( 09.07.2026)