Thursday, 9 July 2026

बात एक जुगनू की !

    अंधकार जब बेहद घना होता है तब जुगनू भी रास्ता दिखाने लगते हैं. जुगनू इसलिए बहुत अच्छे व जरूरी होते हैं, क्योंकि वे सूरज की बाट नहीं जोहते; अंधकार है तो जुगनू हैं और वे अंधकार को चुनौती देने से चूकते नहीं हैं. इंसानों में रोशनी की आस बनी रहे, जुगनू इसलिए ही होते हैं. जुगनू पल-पल में दमक कर बताते रहते हैं कि निराश होने से बेहतर है कि रोशनी की तरफ़ देखो, क्योंकि रोशनी का एक मतलब आशा भी होता है. 

   आज मैं बार-बार जुगनू की बात क्यों कर रहा हूं इसलिए कि हमारे बीच एक जस्टिस माधव जयाजीराव जमादार हैं जिनके हाथ में एक संविधान है. जस्टिस जमादार हमारी दिशाहीन व अंधेरी न्यायपालिका के जुगनू हैं. 

   हमारी अदालतों का यह हाल है कि वे क्या कहती हैंकिससे कहती हैं और उनके कहे का क्या होता हैयह देखना उसने छोड़ दिया है. समाज ने भी अदालत की तरफ़ से मुंह फेर लिया है. समाज समझता है कि जो चमकता नहीं है वह जुगनू नहींएक फतिंगा है. अदालत कहती रहती है कि जमानत नियम हैजेल अपवाद हैउसी अदालत ने पिछले पांच से अधिक सालों से उमर ख़ालिदसरजील इमाम आदि को जेलों में बंद कर रखा है. न मुकदमा शुरू होता हैन सुनवाई होती हैन उन्हें ज़मानत दी जाती है. वे जेल के अंधेरे में बंद हैं तो सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद के रचे अंधेरे में डूबा है. यह समाज को कॉक्रोच मानता है और उससे जितनी दूरी संभव है उतनी बनाए रखता है और हर संभव तरीके से सत्ता की मदद करता है. आज से 106 साल पहले महात्मा गांधी ने अदालतों के बारे में एक निष्कर्ष हमारे सामने रखा था : “ अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं.” हमारे न्यायविदों ने गांधी के इस कथन में एक संशोधन कर लिया था : अदालतों की नहींऔपनिवेशिक अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं. लेकिन ये लोग कितने गलत साबित हो रहे हैं ! औफनिवेशिक और लोकतांत्रिक अदालत में चरित्रत: कोई भेद बचा ही नहीं है.  

   मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस जामदार ने अभी-अभी मुंबई में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह कहा जो इस देश की अदालतों को 2014 के बाद कई-कई बार कहना चाहिए था. 2014 से पहले भी कहना चाहिए था. लेकिन तब राहत यह थी कि अदालत नहीं बोल पाती थी तो समाज बोलता थासमाज चूकता था तो अदालत बोलती थी. लेकिन 2014 के बाद योजनापूर्वक इन दोनों को चुप कराया जाने लगा और आज हालत यह है कि इस देश में सिर्फ एक ही आदमी है जो मन की बात कर सकता है. बाकी सबको बता दिया गया है कि आपका मन और आपकी बात अपने तक रखिएवरना … 

   जस्टिस जामदार ने इससे इंकार कर दिया. वे बोले और एकदम साफ बोले : देश को एक सरकार का ग़ुलाम बनाने की मुहिम चल रही है और पुलिस उसे साकार करने में जुटी है. पुलिस यह भूल गई है कि वह जनता की सेवक हैकिसी सरकार या उसके नेताओं की नहीं. उन्होंने पूछा कि सरकार की मुखालफत करनाविरोध प्रदर्शन आयोजित करनानरेंद्र मोदी या अमित शाह के लिए मुर्दाबाद के नारे लगाना आदि कब से व कैसे अपराध हो गया उन्होंने मुंबई पुलिस को कठघरे में खड़ा कर पूछा कि सैयद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी को किस संवैधानिक धारा के तहत आपने तड़ीपार या जिलाबदर करने का आदेश दिया 

   बात यह थी कि वहीद साहब ने सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी बना रखी है और वे सरकार से जब भीजिस भी मुद्दे पर असहमत होते हैंउसका खुलासा करने सड़कों पर उतर आते हैं फिर बात नागरिकता क़ानून की हो या बाबरी मस्जिद की या ज्ञानव्यापी मंदिर में नमाज़ पर रोक की. वे अपनी पार्टी के बैनर से अपना विरोध दर्ज कराते हैं. अब तक किसी भी पुलिस थाने में ऐसा एक मामला भी दर्ज नहीं है कि वहीद साहब के प्रदर्शन में तोड़-फोड़ हुई हो कि हुल्लड़बाजी हुई हो. वे इतने बड़े नेता नहीं हैं कि इतने बड़े हंगामे आयोजित करवा सकें. वे मुसलमान हैं तो मुसलमानों के सवाल उठाते हैंऐसा एतराज़ उठाने वालों को बताना चाहिए कि आज कौन है कि जो अपने समुदाय या अपने वोटबैंक से बाहर के सवाल उठाता है भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक से बाहर का हिंदुस्तान पहचानती नहीं है सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि वह कहती भी है कि उसे मुस्लिम वोट की ज़रूरत ही नहीं है. इसलिए पूछना जरूरी हो जाता है कि मुंबई पुलिस को वाहिद साहब से एतराज क्यों है दरअसल एतराज़ मुंबई पुलिस को नहींपुलिस को अपनी निजी सेना मानने वाले सत्त्ताधारियों को है. वे जानते हैं कि असहमति की आवाज को ज़मीन पर मौका मिला तो वह आसमान छा लेती है. इसलिए वे हमेशा सावधान रहते हैं कि असहमति की आवाज कहीं से उठेउसे उठने से पहले ही दबोच लेना है. उसने यह विभाग पुलिस को सौंप रखा है कि वह सबको डरा कर रखे. सत्ता के खेत-खलिहान में पुलिस का इस्तेमाल आज बिजूका की तरह किया जा रहा है. पुलिस-तंत्र अपने इस अशोभनीय इस्तेमाल के बारे में चूं भी नहीं करता है. 

   जस्टिस जामदार ने जैसे ही पुलिस-तंत्र को कठघरे में खड़ा कियासारे देश में उनकी बात की गूंज उठी. पता नहीं कि कितने दिनों बाद किसी जज ने संविधान की बात इस तरह उठाई कि एक कोई लिखित दस्तावेज है जिससे किसी भी लोकतांत्रिक संरचना को बाहर जाने की इजाजत हम नहीं दे सकते ! संविधान के सामने सर झुका करसंविधान का सर झुकाने का खेल इतने समय सेइतनी तरह से खेला जा रहा है कि संविधान हास्यास्पद बन कर रह गया है. न्यायपालिका संविधान देख कर नहींसत्ता का मुंह देख कर बोलती है. वह जितना ज्यादा बोलती हैउतनी ही गूंगी हुई जाती है. 

   जामदार साहब ने इस अशोभनीय चलन पर ऊंगली उठाई है. उन्होंने जो कहा है वह एकदम सामान्य संवैधानिक बात है. कोई भी सरकार अपनी फौज-पुलिसइडी-आईटी-सीबीआई-कैग-यूएपीए आदि-आदि की मदद से नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हाथ नहीं डाल सकती हैक्या यह हमारी प्राथमिक कक्षा की किताबों में नहीं लिखा है जो बच्चों को पता हैवह मुंबई पुलिस का पता नहीं है उसके लिए जस्टिस जामदार को आगे आना पड़ेतो यह मुंबई पुलिस के लिए डूब मरने की बात है. उसे कितने पानी में डूब मरना चाहिएयह हम नहीं बताते हैं. यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह अपने पतन की सजा स्वंय ही तय करे. 

   लेकिन जस्टिस जामदार के सवाल की जद में ख़ुद उनकी न्यायपालिका भी आती है जो विधायिका-कार्यपालिका के साथ गणेश आरती करती तो मिलती हैसंविधान पढ़ती नहीं मिलती है. राम मंदिर में लूट या डकैती की जैसी अपमानजनक वारदातें होती रही हैंक्या अदालत भी उस अपराध की भागीदार नहीं है संविधान को बाजू रख करभगवान के निर्देश से जिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की सबसे ऊंची कुर्सी के पीछे छिप कर यह मंदिर बनवायाक्या उनसे नहीं पूछना चाहिए कि मंदिर में चल रहे इस घोटाले के बारे में उनके भगवान का क्या निर्देश है न्यायपालिका जब संविधान को छोड़ कर किसी दूसरे की आरती उतारने लगती है तब वह उसी लोकतंत्र का गला घोंटने लगती है जिसने उसे जन्म भी दिया व विशेषाधिकारों से नवाजा भी है.  जस्टिस जामदार दूसरों से ऊंगली भर ऊंचे नज़र आते हैंतो इसलिए कि उन्होंने फिर से भगवान को नहींसंविधान को बहस के केंद्र में ला दिया है. हमारा संविधान ही हमारी न्यायपालिका का भगवान है. जिन्होंने दूसरा कोई भगवान खोज लिया हैउन्हें न्यायमूर्ति की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए. हमें आश्वस्ती मिलती हृै जब हम पाते हैं कि अंधश्रद्धा और अंधभक्ति के इस दौर में जस्टिस जामदार जैसे लोग भी हैं जो सिर्फ हैं नहीं बल्कि जिंदा भी हैं- जुगनू की तरह ! 

   वसीम बरेलवी साहब ने इसे ही लक्ष्य कर कहा है न : “ उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है / जो जिंदा हो तो जिंदा नज़र आना जरूरी है. ( 09.07.2026)