Saturday, 12 January 2019

अजनबी न्याय के पालक


सर्वोच्च न्यायालय के तेवर अौर तरीकों अौर फैसलों को हम तब समझना नहीं चाहते थे जब श्री दीपक मिश्रा इसकी सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे थे; अब जब वे वहां नहीं हैं अौर श्री रंजन गोगई वहां विराजमान हैं, हम सर्वोच्च न्यायालय के तेवर अौर तरीकों अौर फैसलों को समझ नहीं पा रहे हैं. हार-थक कर मैं कह रहा हूं कि न्याय की तो महान्यायपालिका जाने, हम न तब महान्यायपालिका को अपना मान पा रहे थे, न अाज मान पा रहे हैं. जब मैं ‘अपना’ कहता हूं तब ‘निजी’ के अर्थ में नहीं, सार्वजनिक निजता व हक के अर्थ में कहता हूं. इस अर्थ में कि  संविधान की झूठी व खोखली खोटी अाड़ ले कर जब मेरी तरह के हजारों लोग अापातकाल की नकली घोषणा का दंश झेलते हुए जेलों में बंद थे, तब भी यह महान्यायपालिका हमारे लिए अजनबी साबित हुई थी; अाज भी मसला सीबीअाई का हो कि रफाल का कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का, यह अजनबी ही साबित हो रही है.

मुझे शिकायत इसकी नहीं है कि रामजन्मभूमि का फैसला अभी-के-अभी अौर देश की अकाट्य जनभावना को देखते हुए हिंदुअों के पक्ष में क्यों नहीं किया जा रहा है. मैं नहीं मानता हूं कि हिंदुअों के नाम की राजनीति-धर्मनीति-धननीति पर पलने वाले लोग किसी जनभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये ही ताकतें हैं जो जनभावना को विकृत,पतित अौर उत्तेजित करने का काम करती हैं अन्यथा कोई जिन्ना इस देश को बांट नहीं सकता था, अौर न बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर सकता था. सर्वोच्च न्यायालय से मेरी यही शिकायत है कि वह अपनी जिम्मेवारियों के प्रति बाबूशाहों जैसी उदासीनता बरतता है; देश की भावात्मक एकता जिस पतले धागे से लटका कर रखी गई है उसकी नजाकत वह समझता नहीं है. वह उस एलीट वर्ग का नुमाइंदा बन गया है जो इस खामख्याली में जीता है कि हवा उसके इशारे पर बहती है अौर उसके रोके रुकती है. ऐसी मानसिकता नहीं होती तो कोई कारण नहीं था कि मंदिर-मस्जिद विवाद को सुनने के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ गठित करते वक्त ही गोगई साहब उसके सदस्यों की पात्रता की जांच नहीं कर लेते. क्या न्यायमूर्ति ललित को यह याद नहीं था कि वे इस मामले में कल्याण सिंह के वकील बन कर खड़े हो चुके हैं ? यह रिकार्ड तो सर्वोच्च न्यायालय में भी होगा, अौर संविधान पीठ का गठन करते समय इसकी जांच-पड़ताल भी की गई होगी ? फिर यह कैसा खेल है कि इतने विस्फोटक मामले में अाप किसी अफीमची की तरह नजर अाएं ? यह भी हो सकता है कि गोगई साहब को भी अौर ललित साहब को भी यह पता रहा हो अौर उन्होंने सोच-समझ कर यह फैसला किया हो कि संविधान पीठ में उनका रहना गलत नहीं होगा. राजीव धवन साहब ने ऐसा ही कहा भी कि वे अदालत के ध्यान में यह तथ्य ला रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है िक उन्हें ललित साहब के संविधान पीठ में रहने पर एतराज है. लेकिन नये साल की पहली-पहली सुनवाई में दिखाई यह दिया कि जैसे गोगई साहब नींद से जागे. उन्होंने वहीं-के-वहीं ललित साहब से बात की, वहीं-के-वहीं ललित साहब ने यह नैतिक फैसला लिया कि उन्हें इस पीठ से हट जाना चाहिए अौर वहीं-के-वहीं यह घोषणा की गई कि अब सुनवाई २९ जनवरी को होगी अौर तब तक संविधान पीठ का नया सदस्य चुन लिया जाएगा. जब अापको यह सब वहीं-के-वहीं करना पड़े तो इसका सीधा मतलब है कि अापने तभी-का-तभी वह नहीं किया जो कर लेना चाहिए था. इतनी गैर-दरकारी !!
   
मुझे शिकायत इसकी नहीं है कि अालोक वर्मा को सीबीअाई के प्रमुख के पद से क्यों हटाया गया. शिकायत इसकी है कि इस पूरे प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय जोकर जैसा क्यों नजर अाया ? संभव ही है कि अालोक वर्मा इस पद के योग्य न हों, कि उन पर लगे अारोपों में तथ्य हो लेकिन क्या यह सब 36 घंटे पहले पता नहीं था ? सरकारें सीबीअाई को अपनी मुट्ठी में करना चाहती हैं, यह कौन नहीं जानता है अौर उसका किसी सरकार की मुट्ठी में जाना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है, यह भी हम जानते हैं. इसलिए इसकी स्वायत्तता का संरक्षण अौर उसकी चाक-चौबंद व्यवस्था करना संसद का काम है. संसद अपनी जिम्मेवारी निभाने में चूक करती है तो सर्वोच्च न्यायालय को वह भूमिका निभानी चाहिए. इसलिए सरकार ने रात के अंधेरे में जो हमला किया था उसे न्यायालय ने ठीक ही निरस्त किया अौर उनकी बहाली की. लेकिन इसे कैसे समझा जाए कि एक तरफ तो सरकार को झिड़क कर अदालत सीबीअाई के मुखिया को पद पर बहाल करती है अौर दूसरी तरफ कह देती है कि अाप नीतिगत फैसले नहीं ले सकते. अब सीबीअाई चलेगी कैसे ? वह संस्थान है ही ऐसा कि मुखिया फैसले लेता है तो वह संस्थान चलता है. अब अदालत बताए कि क्या वह संस्थान का प्रमुख इसलिए बहाल करती है कि वह काम न करे, न करने को कहे लेकिन संस्थान चलता रहे ? सीबीअाई का प्रमुख एक दिन के लिए भी हो उसे काम करने का पूरा अधिकार मिलना ही चाहिए. सरकार ने उसे पिजड़े में बंद तोता बना लिया था, अापने पिंजड़े में बंद उस तोते की जान ही ले ली ! तो अब पिंजड़े में बचा क्या ? मरा हुअा तोता !! अौर केवल 36 घंटे बाद अापने यह भी घोषणा कर दी कि यह मरा हुअा तोता भी ऐसा नहीं है कि इसे पिंजड़े में रखा जा सके ! मेरे जैसा साधारण नागरिक पूछना चाहता है कि मी लार्ड, अगर यही सच था तो इतना सारा नाटक खड़ा क्यों किया था अापने ?


हमारे संविधान के मुताबिक हमारी न्यायपालिका की ताकत असीम है लेकिन उसी संविधान के मुताबिक उसके पास जन-स्वीकृति के अलावा दूसरा कोई अाधार नहीं है. न्यायपालिका पर जनता का भरोसा अौर नौकरशाही द्वारा उसके अादेशों का पालन ही उसे अजेय बनाता है. जब विधायिका उसके इस अाधार को कमजोर करना चाहती हो तब क्या न्यायपालिका को ज्यादा सचेत व ज्यादा संवेदनशील नहीं होना चाहिए ? जवाब कौन देगा ? (12.01.2019)

Wednesday, 26 December 2018

अाअो हे नव वर्ष !



कैलेंडर बदलने से जिनका नया साल अाता है उन्हें उनका नया साल मुबारक हो ! लेकिन कपड़े बदलने से अादमी कब, कहां नया हुअा है. अाप देखें कि प्रकृति भी, उसके समस्त वन-वृक्ष-पौधे भी जब तक नये उल्लास के नये पल्लव अपने भीतर कहीं गहरे उतर कर पा नहीं लेते, वसंत उतरता ही नहीं है. हम भी अपने भीतर उतरें गहरे कहीं, अौर खोजें कि क्या है वह सब जो हमें नया सोचने, करने अौर बनने से रोकता है ? क्यों बाहरी हर सजावट हमें भीतर से रसहीन अौर हतवीर्य छोड़ जाती है ? ऐसा क्यों है कि हमारी जनसंख्या बढ़ती जाती है अौर हमारा जन छोटा भी अौर अकेला भी अौर निरुपाय भी होता जाता है ? अच्छे दिन की चाह क्यों हमें बुरे मंजर की तरफ धकेलती है ? 

नये साल की दहलीज पर खड़े हैं हम तो जरा बीतते वर्ष के करीब चलें, जरा भीतर उतरें ! दीखता है न कि नया करने की कोशिशें कम नहीं हुई हैं. सरकारों ने कागजों पर कितनी ही बड़ी अौर कल्याणकारी योजनाएं लिखीं, बनाई अौर सफल भी कर ली हैं लेकिन धरती पर कोई रंग पकड़ता नहीं है. हमने भी काफी जद्दोजहद की है कि हमारे अौर हमारों के हालात बदलें अौर शुभमंगल हो. लेकिन जैसे होते-होते बात बिगड़ जाती है, चढ़ते-चढ़ते पांव फिसल जाते हैं, पकड़ते-पकड़ते हाथ छूट जाता है. यह जाता हुअा साल भी तो अभी-अभी, बारह माह पहले ही नया-नया अाया था ! इतनी जल्दी पुराना कैसे हो गया ? जवाब में लिखा है किसी ने : पूत के पांव / पालने में मत देखो / वह अपने पिता के / फटे जूते पहनने अाया है ! तो पिता के जूते फटे ही क्यों होते हैं ? अौर क्यों ऐसा सिलसिला बना है कि हर पिता अपने बच्चे को अौर वह बच्चा अपने बच्चे को अौर वह अपने बच्चे को … ऐसा लंबा सिलसिला फटे जूतों का ही है ? नहीं, जूते नहीं, हमारे मन फटे हैं ! इसकी सिलाई करनी है ताकि यह साबुत हो जाए. 

अाप देखेंगे तो समझेंगे कि चादर हो कि मन कि समाज, सभी अनगिनत धागों से मिल कर बने हैं. बड़ी जटिल बुनावट है - दीखती नहीं है लेकिन बांधे रखती है. लेकिन चादर हो कि मन कि समाज, बस एक धागा खींचो तो सारा बिखर जाता है. रेशा-रेशा हवा में उड़ जाता है. लगता है कि अभी-अभी जो साकार था, मजबूत था अौर बड़ी मोहकता से चलता चला जाता था वह नकली था, कमजोर था अौर दिखावटी था. जो बिखर सकता है, टूट सकता है, उसे संभालने की विशेष जुगत करनी पड़ती है न ! घरों में भी टूटने वाली क्रॉकरी अालमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में, बच्चों अौर काम करने वाली बाइयों की पहुंच से ऊपर रखते हैं न ! ऐसा ही हमें मन के साथ भी अौर समाज के साथ भी करना चाहिए. जहां चोट लगने की गुंजाइश हो वहां से इन दोनों को बचाते हैं. गालिब तो कब के कह गये न : दिल ही तो नहीं संगो-खिश्त/ गम से न भर अाए क्यूं / रोएंगे हम हजार बार /  कोई हमें रुलाए क्यों. यही खेल समझना है हमें कि इंसानी दिल इतना नाजुक अौर मनमौजी है कि कहीं भी, किसी से भी चोट खा जाता है, तो उसे चोट पहुंचाने का कोई अायोजन होना नहीं चाहिए; अौर ऐसा कोई कुफ्र हो ही गया हो तो हजारो-हजार लोग, लाखों-लाख हाथ-पांव ले कर उसकी मरम्मत में लग जाएं. यह जरूरी ही नहीं है, एकमात्र मानवीय कर्तव्य है, हमारे मनुष्य होने की निशानी है. न कोई जाति, न कोई धर्म, न कोई भाषा, न कोई प्रांत, न कोई देश, न कोई विदेश, न कोई काला, न कोई गोरा, न कोई अमीर, न कोई गरीब ! बस इंसान !! …यह नया है. यह नया मन है. हमारे मन में उमगी यह नई कोंपल है. विनोबा कहते थे कि अब हम इतने बड़े हो गये हैं अौर इतने करीब अा गये हैं कि कामना भी करेंगे तो जय जगत की करेंगे ! जगत की जय नहीं होगी तो अकेले हिंदुस्तान की जय संभव भी नहीं अौर काम्य भी नहीं; अौर जगत की जय होती है तो हिंदुस्तान की जय तो उसी में समाई हुई है. 

यह अाता हुअा नया साल- २०१९ - सच में नया हो जाएगा यदि इस साल हम सब एक-दूसरे से संवाद करने का संकल्प करेंगे. अापसी संवाद लोकतंत्र की अाधारभूत शर्त है. संवाद करो अौर विश्वास करो : यह नये साल का हमारा नारा होना चाहिए. हमारे देश जैसी विभिन्नता वाले समाज में तो संवाद अौर विश्वास प्राणवायु हैं. जितना विश्वास करेंगे उतना नजदीक अाएंगे; जितनी बातचीत करेंगे उतनी शंकाएं कटेंगी. शक वह जहरीला सांप है जिसके काटे का कोई इलाज नहीं. यह सांप अ-संवाद की बांबी में रहता है अौर अविश्वास की खुराक पर पलता है.  इसलिए हम जिनसे सहमत नहीं हैं उन तक विश्वास के पुल से पहुंचेंगे अौर वहां संवाद की छोटी-बड़ी गलियां बनाएंगे. इसलिए सरकार कश्मीर में वार्ता करे कि न करे, कश्मीर से हमारी वार्ता बंद नहीं होनी चाहिए, कश्मीरियों से हमारा संवाद खत्म नहीं होना चाहिए, कश्मीरियों पर हमारा विश्वास टूटना नहीं चाहिए. 

हर पुल बड़ी मेहनत से बनता है अौर हर पुल के जन्म के साथ ही उसके टूटने-दरकने की संभावना भी जन्म लेती है. लेकिन हम पुल बनाना बंद तो नहीं करते हैं न ! हां, मरम्मत की तैयारी रखते हैं. फिर इंसानों के बीच पुल बनाने में हिचक कैसी ? टूटेगा तो मरम्मत करेंगे ! हमें छत्तीसगढ़ के माअोवादियों के बीच, पूर्वांचल के अलगाववादियों के बीच, राम मंदिर को गदा की भांति भांजने वालों के बीच, अोवैशियों की कर्कश चीख के बीच, हाशिमपुरा-बुलंदशहर के अांसुअों के बीच लगातार-लगातार जाना है क्योंकि इसके बिना हम कैलेंडर कितने भी बदल लें, कोई भी साल नया नहीं हो सकेगा. 

ऐसा ही नया साल १९३२ में अाया था अौर गांधीजी ने किसी  को लिखा था : देखता हूं कि तुम नये साल में क्या निश्चय करते हो ! जिससे न बोले हो, उससे बोलो; जिससे न मिले हो उससे मिलो; जिसके घर न गये हो उसके घर जाअो; अौर यह सब इसलिए करो कि दुनिया लेनदार है अौर हम देनदार हैं. १९३२ का नया साल, २०१९ में भी हमारी राह देख रहा है क्योंकि इतने वर्ष निकल गये, नया साल तो अाया ही नहीं ! 
सूरज-सी इस चीज को हम सब देख चुके / सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह ! ( 27.12.2018)                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   

अदालत में खड़ी है अदालत



मैं इन दिनों खुद ही तै नहीं कर पा रहा हूं कि मेरी कलम स्याही से चलती है या अांसुअों से ? कभी फैज साहब ने खून में अंगुलियां डुबो कर लिखने की बात लिखी थी लेकिन हम कहां फैज हैं ! मुझे तो शक यह भी होता है कि हमारी कलम में स्याही भी भरी है कि नहीं ? अगर स्याही होती तो कभी तो दीखता कि दिल या दिमाग पर कोई दाग छूटा है ? नहीं, मैं लोगों की बात नहीं कर रहा हूं. उनका दिल-दिमाग तो साबूत है. पांच राज्यों में हुए चुनावों के परिणामों से इतना तो पता चलता ही है. मैं तो अपने अांसुअों की बात कर रहा हूं अौर अदालत की बात कर रहा हूं. 

अदालत क्या कर रही है अौर क्या कह रही है, यह समझना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है. क्या अदालत यह समझ पा रही है कि हमारे लड़खड़ाते लोकतंत्र में वह अाखिरी खंभा है जहां हमारी नजर ही नहीं, हमारी अास्था भी टिकी है ? उसकी एक चूक, उसकी एक भूल, उसकी एक कमजोरी अौर उसका एक सतही रवैया हमारे लड़खड़ाते विश्वास को वैसी गहरी चोट दे जाता है जैसी चोट रफाल के मामले में लगी है. सवाल किसी को अपराधी या किसी को निरपराधी करार देने का नहीं है. वह तो अापका अधिकार क्षेत्र है ही, सवाल है अापके रवैये का; सवाल है कि अाप जो कर व कह रहे हैं क्या उससे न्यायालय की सदाशयता में, उसकी विश्वसनीयता में इजाफा होता है ? सवाल है कि रफाल के अौर ऐसे ही कई मामलों में अदालत ने जो निर्णय सुनाया अौर जिस भाषा में, जिन तर्कों के साथ सुनाया उससे ऐसा क्यों लगा कि हम देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला नहीं, सरकार का कोई हैंडअाउट पढ़ रहे हैं ? ऐसा नहीं है कि मेरे जैसे अनगिनत लोग अदालत से अपनी पसंद का फैसला सुनना चाहते हैं. नहीं, हम सुनना चाहते हैं सिर्फ वह जो तर्कसंगत, विधानसम्मत अौर सच व न्याय की अंतिम हद तक शोध के बाद कहा जा रहा हो.  

          अदालत बंद लिफाफे में रख कर दिया किसी का सच सच में सच मान लेती है जबकि सच यह है कि लिफाफे में क्या लिखा है, यह उनमें से किसी को मालूम नहीं है जो प्रतिवादी बन कर अदालत में पहुंचे हैं ? क्या अदालत अौर वादी के बीच प्रेमपत्रों के लेनदेन से न्याय तै किया जाएगा ? जिसने लिखा उसे मालूम था कि वह झूठ लिख रहा है; जिसने पढ़ा वह कहता है कि वह उसे समझ नहीं पाया, तो बीच में मारा कौन गया ? सच अौर न्याय ही न ! हमें इससे अापत्ति है. हमें इस चलताऊ मानसिकता से अापत्ति है.   
  शोराबुद्दीन के मामले में सारे अारोपियों को रिहा करते हुए अदालत ने कहा कि वह बेबस है, क्योंकि उसके सामने वैसे साक्ष्य लाए ही नहीं गये जो उसे मामले की तह तक पहुंचाते, अौर इसलिए अपराधियों को सजा देना संभव नहीं हुअा. इसके दो मतलब हुए. एक यह कि अदालत ने जो फैसला सुनाया वह अदालत की समझ से ही न्यायसम्मत नहीं है. तो ऐसा फैसला अापने सुनाया ही क्यों ? दूसरा यह कि न्यायपालिका यदि न्याय तक नहीं पहुंच पाती है तो वह अपने उस कर्तव्य से च्युत होती है जो संविधान ने उसे सौंपा है अौर जिसके लिए समाज उसका बोझा ढोता है. इन दोनों को समझने के बाद तो यही पूछना शेष रह जाता है कि मी लार्ड, फिर अाप अपनी दूकान बढ़ाते क्यों नहीं ? हमने न्याय-व्यवस्था बनाई ही इसलिए अौर उसका कमरतोड़ बोझ उठाए हम फिर रहे हैं तो इसलिए कि हमें एक ऐसे संस्थान की जरूरत लगती है कि जो सच तक पहुंचने में कुछ भी उठा नहीं रखता हो. यहां तो अाप अपने कमरे से बाहर बिखरे सच को देखने-समझने, उस तक चलने अौर उसे उलटने-पलटने तक को तैयार नहीं होते हैं. अाप तो चाहते हैं कि सच खुद चल कर अाप तक अाए, अापको झकझोर कर जगाए अौर कहे कि देखो, जागो मैं यहां सामने बैठा हूं ! अगर ऐसा ही होना है तो फिर हमें अाप जैसा सफेद हाथी पालना ही क्यों चाहिए? जज लोया का मामला जिस तरह निबटाया गया, क्या उससे न्याय तक पहुंचने का संतोष अदालत को मिला ? समाज को मिला ?  राफेल के मामले में जिस तरह प्रतिवादी पक्ष के किसी तर्क को फैसले में शामिल ही नहीं किया गया, उससे देश को उसकी सारी शंकाअों का जवाब मिल गया ? सोहराबुद्दीन कत्ल के सारे अारोपियों को जिस बेबसी से रिहा कर दिया गया, २१० गवाहों में से ९२ गवाहों के मुकर जाने का अदालत ने कोई संज्ञान ही नहीं लिया, क्या उससे लगता है कि अदालत ने सच तक पहुंचने की कोशिश की ? सच तक पहुंचना अदालत का धर्म है. इस या उस किसी भी  कारण से यदि वह सच तक नहीं पहुंच पाती है तो वह धर्मच्युत होती है. फिर उसके किसी भी फैसले का मतलब क्या रह जाता है ? क्या इससे कहीं बेहतर स्थिति यह नहीं होती कि जिन मामलों में वह सत्य तक नहीं पहुंच पा रही हो, उनका फैसला स्थगित कर दे अौर नये रास्तों से सत्य तक पहुंचने की कोशिश करे ? गवाहों के मुकरने के पीछे कौन है, इसका पता ही लगाया जाना चाहिए बल्कि गवाही का पेशा करने वालों को कड़ी सजा भी देनी चाहिए. रफाल के मामले में अदालत ने फौज के अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाने की सावधानी बरती तो बंद लिफाफे में जिन एजेंसियों के नाम के अाधार पर सौदे को पाक-साफ बताने की बात कही गई थी, उन्हें भी बुला कर क्यों नहीं पूछ लिया ? पूछ लिया होता तो बंद लिफाफा खुल जाता अौर फैसला करने में अदालत को एक नया अाधार मिल जाता. तो क्या अदालत चूक गई ? नहीं, यह चूक नहीं है, अपने दायित्व के प्रति उदासीनता का प्रमाण है. 

भारतीय संविधान अौर भारतीय समाज दोनों अपनी व्यवस्थाअों को संपूर्णता में देखते हैं. दोनों मानते हैं कि संसद को कानून बनाने में संपूर्णता बरतनी चाहिए मतलब अाप किसी भी कानूनी प्रावधान का सामाजिक, अार्थिक, धार्मिक, नैतिक पहलू देखे बिना राजनीतिक लाभ-हानि के अाधार पर फैसला नहीं ले सकते. वह कार्यपालिका को भी ऐसी परिपूर्ण भूमिका में देखना चाहती है. न्यायपालिका को भी वह इससे कम में स्वीकार करने को तैयार नहीं है. अदालत यह जितनी जल्दी समझ ले उतना ही उसका भी भला है अौर देश का भी. ( 25.12.2018)   


गेंद अब राहुल गांधी के पाले में है



हाल ऐसे हैं कि रोयें कि हंसे, सूझ नहीं रहा है ! होने को यह 5 राज्यों में हुअा विधान सभा का चुनाव भर ही था। लेकिन 2014 में, दिल्ली पहुंचने की नरेंद्र मोदी की जिद अौर जल्दी  की सफलता के बाद अालम ऐसा बनाया गया मानो नरेंद्र मोदी सारे तार्किक विश्लेषणों से ऊपर हैं।  कुछ ऐसा मानो नरेंद्र मोदी किसी राजनीतिक दल के अवसरवादी नेता नहीं, कोई अवतार हैं। यह बात इस तरह फैलाई गई कि दूसरे तो दूसरे, खुद नरेंद्र मोदी भी इसे सही मान कर चलने लगे। कांग्रेस अौर उसका नेतृत्व कर रहे नेहरू-परिवार पर उनकी बचकानी व क्षुद्र छींटाकशी पर वे खुद मुदित होते रहे लेकिन वे अौर उनके दरबारी यह पहचान नहीं पाये कि इन सब कारणों से देश का अाम अादमी उनसे विमुख होता गया। इसलिए नहीं कि वह नेहरू या कि उनके परिवार का भक्त है। नेहरू अौर उनके परिवार के राज की अच्छाइयों अौर बुराइयों से वह परिचित ही नहीं है, वही है जिसको वह फला है, जिसे उसने भुगता है। इसलिए वह अापसे वह अाख्यान नहीं, यह सच्चाई सुनना चाहता था कि अाप क्या हैं, क्या करते हैं अौर क्या कर सकते हैं। २०१४ से अब तक इसका जवाब नहीं मिला। अापका सीना ५६ इंच का है कि नहीं, यह अापका निजी मामला है, उस सीने में क्या है यह सबका मामला है। अाम अादमी वही देखना व महसूस करना चाहता था। वहां उसे हवा अौर केवल हवा मिली।

कांग्रेस अौर राहुल गांधी ने उस हवा को पकड़ने की कोशिश की। उन्हें इस बात का श्रेय देना ही पड़ेगा कि २०१४ की चुनावी लड़ाई में बुरी तरह पिटने के बाद भी वे मैदान से हटे नहीं अौर मुट्ठी भर सांसदों अौर धेला भर कार्यकर्ता ने कांग्रेस को जिंदा रखा। ‘पप्पू’ ने ‘गप्पू’ को सांस लेने का मौका नहीं दिया ! धीरे-धीरे देश में एक नया राजनीतिक विमर्श खड़ा होता गया जो चकाचौंध करने की तमाम चालों के बावजूद जड़ पकड़ता गया। नरेंद्र मोदी अौर उनकी सरकार की फूहड़ काररवाइयों ने लगातार इस विमर्श को मजबूत किया। इसका विस्तार होता गया। विपक्ष की तमाम ताकतें, जो नवसिखुए राहुल को कमान देने या उनके साथ काम करने से हिचकते रही थीं, धीरे-धीरे पर्दे के पीछे चली गईं। वे मतदाताअों को साथ लेने की कोशिश के बिना ही वोटों की राजनीित करते रहे, इधर राहुल ने लड़ाई को जनता के बीच पहुंचाया। अाज हम देखते हैं कि राहुल ही विपक्ष का चेहरा बन गये हैं - कहें तो एकमात्र विश्वसनीय, टिकाऊ चेहरा ! अब कोई ‘पप्पू’ की बात नही करता है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में बनी कांग्रेस की सरकारें दरअसल राहुल की निजी जीत हैं; ठीक वैसे ही जैसे २०१४ की जीत  एकमात्र नरेंद्र मोदी की जीत करार दी गई थी। 

लेकिन राहुल गांधी ने देश में जो विमर्श खड़ा किया अौर उसे चुनावी जीत तक पहुंचाया, सर्वोच्च न्यायालय ने तुरंत ही उन दोनों की हवा निकाल दी। उसने यह तब किया जब गुब्बारे में हवा सबसे ज्यादा थी। ‘चौकीदार चोर है’ कहते हुए सारे देश में माहौल खड़ा करने वाले राहुल गांधी को अाज अदालत ने चौराहे पर बने कठघरे में खड़ा कर दिया है अौर देश उनसे पूछ रहा है कि चोर कौन है अौर कैसे है, यह तो बताइए ! राहुल गांधी के पास अब कोई विकल्प नहीं है। अभी ही अौर यही वक्त है कि राहुल गांधी के पास चौकीदार को चोर बताने वाला जो भी प्रमाण है, उसे देश के सामने रख दें। उन्होंने जिस तरह देश को बताया कि चौकीदार ने कैसे चोरी की,  अौर यह भी कि चोरी का पैसा अनिल अंबानी की जेब में  गया, वैसा विवरण बिना साक्ष्य के दिया ही नहीं जा सकता है। वह छिपा हुअा साक्ष्य देश के सामने रखने का यही, अौर यही वक्त है। अदालती फैसले के बाद हवा यह बनी है कि यह सब हवा भर था ! यह हवा यदि गाढ़ी हो गई, जिसकी पूरी संभावना है, तो कांग्रेस व राहुल गांधी के लिए २०१९ में खड़े होने की जगह नहीं बचेगी।

लोग अदालती पेंचीदगियों में नहीं जाते हैं। कपिल सिब्बल कह सकते हैं कि अदालत के सामने क्या नुक्ता था अौर अदालत ने किस नुक्ते की पड़ताल नहीं की। अदालत कह सकती है कि वह संविधान की किस धारा के तहत, किस मामले का कौन सा हिस्सा ही जांच सकती थी, अौर कौन-सा पहलू ऐसा है कि जिसे उसे जांचना नहीं था। कानून का यह जंगल उनके काम का हो सकता है जो उस जंगल का व्यापार करते हैं। लेकिन मामला तो उनका है न जो इतना ही जानते हैं, अौर जान सकते हैं कि अदालत में अाप एक चोर को ले कर गये थे अौर अदालत ने कहा - यह चोर नहीं है ! २०१९ का चुनाव इसी के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। राहुल ने ही अपने चुनाव की यह कुंडली लिखी है, अौर राहुल को ही इस ग्रह के निवारण का रास्ता खोजना है। एक सवाल अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा अौर प्रशांत भूषण से भी पूछा जाना चाहिए कि जिस मामले का पूरा तथ्यात्मक विवरण ले कर अाप सारे देश में घूम रह थे, वह कैसा था कि जिसे अदालत ने विचार योग्य भी नहीं माना ?

एक अौर सवाल अदालत से पूछना चाहिए। वह जिस भी मामले की सुनवाई करती है उसे अधूरा सुन कैसे सकती है, अौर अधूरा फैसला कैसे दे सकती है ? अगर चोरी का एक मुकदमा अापके पास लाया गया है तो उसे सुनना या न सुनना, यह फैसला जरूर अापके अधिकार क्षेत्र में अाता है, लेकिन यह अाप कैसे कह सकते हैं कि अाप सिर्फ इतना जांचेंगे कि चोर दाहिने कमरे से अाया था या नहीं ? मुकदमा तो चोरी का है - मुझे लगता है कि चोर दाहिने कमरे से अाया तो मैंने वह कहा; अाप सारी संभावनाएं जांच कर बताएं कि चोर दाहिने कमरे से अाया या नहीं; दाहिने से नहीं अाया तो बताएं कि वह किधर से अाया; याकि यह बताएं कि वह अाया ही नहीं, कि चोरी हुई ही नहीं। हमने अब तक यह समझा है कि राफेल सौदे में रक्षा सौदों की मान्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया; उसमें सहयोगी संस्थान का चयन सरकारी दवाब से हुअा; उसकी कीमत का निर्धारण इस तरह हुअा कि अधिक कीमत दे कर हमें कम जहाज मिले तथा इस बीच में अरबों रुपयों की हेराफेरी हुई। यह पूरा मामला है कि िजसकी जांच अदालत को करनी थी। कौन, कौन-से मुद्दे को उसके पास अाया है, यह नहीं,  अदालत के लिए सबसे अहम यह है कि सच्चाई तक कैसे पहुंचा जाए, जो सच्चाई उसकी पकड़ में अाई वह देश को कैसे बताई जाए। सच्चाई तक पहुंचना ही उसका धर्म है, उसका पेशा है अौर उसके होने का मतलब है। राफेल सौदे को शक के धुंधलके में छोड़ देना इसलिए भी गलत है कि हमारा सार्वजनिक जीवन जिस कदर जहरीला हुअा है उसमें यह कुशंका लगातार फैलती रहेगी अौर सडांध फैलती रहेगी । 

अदालत ने अपना काम पूरा नहीं किया। सरकार तो चाहती ही नहीं है िक सच खोजा जाए। बचते हैं सिर्फ राहुल गांधी। वे अब न अदालत का इंतजार करें, न जेपीसी का। अबतक वे जिस जानकारी के अाधार पर राफेल की बातें कर रहे थे, वह सारा कुछ खोल कर देश के सामने रख दें अन्यथा २०१९  की खुली लड़ाई वे अभी ही हार जाएंगे। ( 17.12.2018 ) 


                          

मेरा भी इस्तीफा


यह खेल अच्छा है ! अाप कल तो अच्छे-बुरे जैसे भी थे, थे; अच्छी हैसियत, अच्छी सुविधाएं, अच्छा पैसा अौर अच्छी शोहरत सब पा अौर समेट रहे थे. अगर कहीं, कोई परेशानी होती भी होगी तो वह अाप ही जानते थे, या फिर अापके अाका ! हम अगर जानते थे तो इतना ही कि अाप जहां हैं वहां से जो होना चाहिए था, जो सुना जाना चाहिए था, जो कहा जाना चाहिए था अौर जब, जो किया जाना चाहिए था, वह न कहा गया, न सुना गया अौर न किया गया। बाकी सब कुछ ठीक था, ठीक चल रहा था अौर एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाने के सारे प्रयास भी चल रहे थे। अनुभवी लोग कह रहे थे कि हां, ठीक ही है ! लोकतांत्रिक जिम्मेवारियां इसी तरह निभाई जाती हैं, निभाई जानी चाहिए।… अौर फिर एक दिन हम सुनते हैं कि अापने इस्तीफा दे दिया ! जैसे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने 10 दिसंबर को इस्तीफा दे दिया। 9 दिसंबर तक हम यही जानते थे कि उनके अौर भारत सरकार के बीच कुछ मतभेद हैं। क्या मतभेद थे ? रिजर्व बैंक के गवर्नर की खिड़की के परदों का रंग कैसा हो, इस पर मतभेद था; याकि लंबे समय से बीमार देश के अर्थतंत्र को स्वस्थ करने की जद्दोजगद में लगे, लंबे समय से बीमार वित्तमंत्री को अपना इलाज किस डॉक्टर से कराना चाहिए, इस पर मतभेद था ? बीमार वित्रमंत्री के स्वस्थ दिखाये जाते बयान तो कभी-कभार पढ़ने को िमल भी जाते थे, हमारी बैंकिंग व्यवस्था के शीर्षपुरुष को भी देश की वित्तीय स्थिति के बारे में कुछ कहना है, यह तो हमें कभी पता भी न चला। 

रघुराम राजन जबतक रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, हमें पता चलता रहा कि पैसा सिर्फ दीखता नहीं है, वह बोलता भी है। रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक की वैसी ही लोकतांत्रिक साख बना दी जैसी कभी चुनाच अायोग की शेषण साहब ने बनाई थी। वैसी साख बनाना बहुत कठिन होता है, क्योंकि वैसी साख बाजार में मिलती नहीं है, कमानी पड़ती है। नरेंद्र मोदी-अरुण जेटली की जोड़ी रघुराम राजन जैसे गवर्नर को पचा नहीं सकेगी, यह अंदेशा सारे देश को था। इसलिए जब रघुराम राजन को सरकार ने दोबारा गवर्नर बनाने में अानाकानी की तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। किसी को हैरानी नहीं हुई क्योंकि हम सभी जानते थे कि देश के सबसे बड़े बैंक अौर सबसे अहमन्य सरकार के बीच रिश्ते ऐसे नहीं हैं कि वे लंबा चल सकेंगे। रघुराम राजन ने पद छोड़ने अौर ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी पर जाने से पहले कहा कि वे नितांत निजी कारणों से इस्तीफा दे रहे हैं। जो वे कह रहे थे उसमें विमर्श संभव नहीं था। बेटी नहीं चाहती है कि मैं अागे भी रिजर्व बैंक का गवर्नर रहूं याकि बीवी को बाजार ले जाने का समय मैं नहीं निकाल पाता हूं, इसलिए अब गवर्नर नहीं रहना चाहता अादि नितांत निजी कारण ऐसे हैं कि इन पर देश कहे भी तो क्या ! 

लेकिन देश जिस दौर से गुजर रहा है, यह सामान्य दौर नहीं है। देश भयंकर अार्थिक संकट से गुजर रहा है, सरकार अांकड़े बदलने अौर छिपाने का सारा खेल खेलने के बाद भी यह छिपा कैसे सकती है कि विकास-दर लगातार गिरता जा रहा है, मंहगाई पर किसी तरह का अंकुश काम नहीं कर रहा है, बेरोजगारी खतरनाक हद तक पहुंच गई है अौर स्वत: रोजगार पैदा करने वाले विकास की कोई रूपरेखा हम बना नहीं पा रहे हैं। खुदरा व्यापार अौर छोटे कारोबारी, जो किसी भी अर्थ-व्यवस्था की नींव के पत्थर होते हैं, बुरी तरह कुचल दिए गये हैं अौर विश्व बाजार में हमारे रुपये की साख खतरे में है। शिक्षा-व्यवस्था हमारे भविष्य से ऐसा खेल कर रही है कि वर्तमान अौर भविष्य दोनों नष्ट हो रहे हैं। यह देखने के लिए किसी दिव्य दृष्टि की जरूरत नहीं है कि समाज का माफियाकरण तेजी से हो रहा है - शिक्षा माफिया; स्वास्थ्य माफिया; शराब माफिया; किसान माफिया; रक्षा सौदा माफिया; चुनाव माफिया; विकास माफिया अादि-अादि पूरा समाज लीलते जा रहे हैं अौर राजनीतिक माफिया मुस्करा रहा है। 

यह भारतीय लोकतंत्र का असामान्य दौर है। वे सभी इसके अपराधी हैं जो निर्णायक पदों पर बैठ कर सामान्य ढंग से काम चला रहे हैं। कभी कवि ‘दिनकर’ ने इनके लिए ही लिखा था : समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध/ जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। तो समय के पन्नों पर दर्ज है कि जब रघुराम राजन ने इस्तीफा दिया तो उर्जित पटेल ने उनके छोड़े जूते में ऐसे पांव धर दिया मानो उन्हें इसके खाली होने का इंतजार था। अौर फिर अार्थतंत्र में ऐसा कत्लेअाम हुअा जैसा किसी ने न देखा था, न सुना था। नोटबंदी हुई। किसने की ? उस प्रधानमंत्री ने जिसकी अार्थिक समझ का रोना अाज भी देश रो रहा है। लेकिन अभी हम नोटबंदी सही या गलत की बात नहीं कर रहे बल्कि नोटबंदी जिस तरह हुई उसकी बात कर रहे हैं। मुद्रा अौर मुद्रा से जुड़ी तमाम फैसलों की जिम्मेवारी भी रिजर्व बैंक की होती है अौर देश के हर वाशिंदे के प्रति वह जवाबदेह भी है। अाखिर हमारे हर नोट पर वही तो लिखित वचन देता है कि यह कागज का टुकड़ा नहीं, मुद्रा है जो हर हाल में अपनी कीमत के बराबर की कीमत अापको देगी। रिजर्व बैंक इसके लिए वचनबद्ध है। लेकिन एक रात, एक अादमी अाकर देश से कह देता है कि जिसे अाप मुद्रा समझ रहे हैं वह रद्दी का कागज भर है अौर उसे अाप रद्दी के भाव भी बेच नहीं सकते, अौर रिजर्व बैंक इतना भी कह नहीं सका कि यह फैसला उसकी सहमति से हुअा है अौर हमने प्रधानमंत्री से कहा है कि इसका एलान वे ही करें। उर्जित पटेल एक शब्द नहीं बोले। करोड़ों-करोड़ भारतीय, जिन्होंने रिजर्व बैंक पर भरोसा किया था, पशुअों की तरह हांक कर सड़कों पर ला दिए गये, रिजर्व बैंक कुछ नहीं बोला। जिन्होंने रिजर्व बैंक की सफेद मुद्रा का चेहरा काला कर दिया था, वे सब कहीं भी परेशान नहीं थे। काला धन जिनकी नसों में दौड़ता है वे सारे राजनीतिबाज अपने खेल में लगे रहे, देश की बैंकिंग व्यवस्था जिस अाम अादमी के कंधों पर सवारी करती है, वह गंदी सड़कों-गलियों में अपमानित किया जाता रहा, बैंकों व दूसरे सरकारी महकमों में जलील किया जाता रहा लेकिन रिजर्व बैंक ने कुछ भी नहीं कहा। उसने तो दबी जुबान से कभी यह भी नहीं कहा कि नोटबंदी का फैसला न तो उसका था अौर न वह उससे सहमत था। अाप वह पूरा दौर देख जाइए, अापको उस वक्त के अार्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम का एक शब्द भी कहीं दर्ज नहीं मिलेगा कि नोटबंदी का निर्णय उन्हें अंधेरे में रख कर लिया गया; उनका एक शब्द भी नहीं कहीं मिलेगा कि जीएसटी का फैसला भी अौर उसका कार्यान्वयन भी गलत है। वे उस पूरे असामान्य समय में, अपनी मालदार कुर्सी पर बैठे सामान्य समय काटते रहे। फिर ‘निजी कारणों’ से नौकरी छोड़ दी, अौर दूसरी मालदार नौकरी पर विदेश चले गये। वहां बैठे-ठाले एक किताब लिखी अौर अब देश में अा कर उस किताब की बिक्री सुनिश्चित करने में लगे हैं। अब वे उन सारी कमियों-कमजोरियों की सविस्तार बात कर रहे हैं जो उनके विचार से मोदी-जेटली मार्का अर्थतंत्र की पहचान है। ऐसा ही अब उर्जित पटेल करेंगे। हम उनकी किताब भी पढ़ेंगे कि कैसे मोदी-जेटली रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म करते जा रहे हैं, असामान्य अार्थिक संकट से देश को उबारने के लिए जो एक संवैधानिक कोष रिजर्व बैंक के पास रखा होता है, वह पैसा भी मोदी-जेटली अपने चुनावी वादों को पूरा करने में उड़ा देना चाहते हैं अौर मैं, उर्जित पटेल अपनी गर्दन हथेली पर ले कर उनके सामने खड़ा हो गया। प्रमाण पूछते हैं तो पढ़िये मेरी यह किताब ! इसे कहते हैं : अाम तो  अाम/ गुठलियों के दाम ! 


यह कायरता है कि बहादुरी ? फैसला अाप करेंगे या वक्त ! तब तक अाप मेरा भी इस्तीफा ले लीजिए ताकि मैं भी एक किताब लिख कर देश के प्रति अपनी जिम्मेवारी पूरी करूं ! ( 11.12.2018 ) 

दोस्ती का गलियारा

    
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भी अंदाजा नहीं होगा कि वे जिस करतारपुर गलियारे को बनाने व खोलने की शुरुअात कर रहे हैं, उससे भारतीय राजनीति के गलियारों में ऐसे विस्फोट होने लगेंगे. क्रिकेट की भाषा में कहूं तो यह इमरान का वह बाउंसर है जिसे ‘डक’करने को भारतीय राजनीति मजबूर हो गई है. यह बेहद हास्यास्पद अौर बचकाना है. 

यह सोच भी हैरान करने वाला है कि हमने इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही पाकिस्तान के साथ राजनीतिक पहल की सारी बागडोर नवजोत सिंह सिद्धू के हाथ में सौंप दी है. सिद्धू ने राजनीति के पिच पर कभी गंभीर बल्लेबाजी नहीं की है. उनकी राजनीतिक समझ कपिल शर्मा शो में बनी अौर परवान चढ़ी है. वे दलों के दलदल में उतर कर कुर्सी पकड़ने वाले राजनीतिज्ञ हैं. उनको दल अौर अाका बदलते देर नहीं लगती है. अाज वे राहुल गांधी की कांग्रेस में हैं अौर पंजाब के सबसे नौसिखुअा मंत्री हैं .वे पाकिस्तान के साथ की हमारी राजनीति की डोर संभालें अौर केंद्र सरकार अपने बचाव में बयान जारी करे, उनके चैनल इमरान की लानत-मलानत करे, सिद्धू की देशभक्ति पर सवाल खड़े करें, क्या यह भी कपिल शर्मा शो का ही हिस्सा नहीं लगता ? यह बात यहां तक पहुंचi है कि केंद्र सरकार के दो मंत्री भी गलियारा कार्यक्रम में उपस्थित थे लेकिन वे बेजुबान बलि के बकरे से ज्यादा कुछ नहीं थे. इधर सिद्धू थे तो उधर इमरान ! यह रंग यहां तक जमा कि इमरान ने यह कह कर कूटनीतिक छक्का ही मार दिया कि भारत-पाक दोस्ती सिद्धू के प्रधानमंत्री बनने पर ही हो सकेगी, ऐसे हालात हम न बनाएं.

लेकिन इमरान खान ने गलियारा दिवस पर अौर फिर दूसरे दिन भारतीय पत्रकारों से बातचीत करते  हुए जो कुछ कहा, वह फब्तियां कसने या खिल्ली उड़ाने जैसी बात नहीं है.  ये बातें बहुत दूर तक जा सकती हैं यदि सीमा के दोनों तरफ की सरकारें मजबूत मन से चलें. इधर हाल के दिनों में दूसरे किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नेइतनी साफ बातें नहीं की हैं. यही मौका है कि हम पाकिस्तान को जांचने की तैयारी करें. हम न भूलें कि अाज इमरान उसी तरह अनुभवहीन हैं जिस तरह 2014 में दिल्ली पहुंचे नरेंद्र मोदी थे. अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कितनी ही बचकानी हरकतें की थीं उनकी सरकार ने ! उन्हें लगा था कि गले लगाने, झूला झूलने, ड्रम बजाने, हर विदेशी दौरे में प्रायोजित भीड़ जुटा कर अपनी लोकप्रियता का दावा पेश करने से ले कर विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को उनके पहले नाम से पुकारने से राजनीति अलग धरातल पर ले जाई जा सकती है. धीरे-धीरे यह सब अर्थहीन होता गया. यह सारी चमक फीकी पड़ने लगी. अब न चमक बची नहीं है, न उसका भ्रम. 

इमरान के साथ भी ऐसा हो सकता है. पाकिस्तान की राजनीति की रीढ़ तो कभी बनी ही नहीं. वह जन्म से ही इस या उस कंधे पर सवार हो कर ही चली है. इसलिए पूरी संभावना है कि जल्दी ही इमरान कोई कंधा पकड़ेंगे. इसलिए हमारी कूटनीतिक प्रौढ़ता इसमें है कि इमरान वहां कमजोर पड़ें इससे पहले हम उन्हें मजबूत बनाने की पहल करें. मजबूत अौर निर्णायक इमरान हमारी भी अौर इस उपमहाद्वीप की भी जरूरत है. दूसरी तरफ इमरान के अपने अस्तित्व के लिए इस उपमहाद्वीप में भारत की प्रभावी उपस्थिति जरूरी है. यह किसी का किसी के प्रति अनुराग नहीं, ठोस राजनीतिक सच है. तो क्या अौर कैसी पहल होनी चाहिए ? पहली पहल तो यही होनी चाहिए कि हमारी सरकार उल्टे-सीधे लोगों से, उल्टी-सीधी बयानबाजी न करवाए. इमरान को उन सारी बातों के बोझ तले न दबाएं हम जो उनके पहले के लोगों ने किया है. उनसे वे सवाल भी न पूछे जाएं जिनका जवाब जिन्हें देना चाहिए था, वे अब पाकिस्तान से कहीं दूर, अपनी बेईमानी की कमाई से अाराम की जिंदगी जी रहे हैं. हम पाकिस्तान से अाज की अौर अभी की बात करें.  अगर इमरान कहते हैं कि वे, उनकी सरकार, उनकी फौज अौर उनका मुल्क जहां तक भारत के साथ रिश्ते सुधारने का सवाल है, एक राय हैं, तो हमें उन्हें उस राय का खुलासा करने का अवसर देना चाहिए. 

कश्मीर को इमरान दोनों देशों के बीच का जिंदा सवाल मानते हैं. वह है. हम भी मानते हैं लेकिन हम यह भी जानते हैं कि कश्मीर को बीच में रख कर अब तक पाकिस्तान ने बहुत खेल खेला है. इमरान ने भी उस दिन कबूल किया कि गलतियां दोनों तरफ से हुई हैं. तो हम उन्हें तुरंत मौका दें कि वे हमारी गलतियां बताएं अौर अपनी कबूलें. ट्रंप ने गणतंत्र दिवस का अतिथि बनने का हमारा अामंत्रण शायद इसी कारण स्वीकार नहीं किया तो हम यह मौका इमरान को दें. सार्क में मोदी न जाएं क्योंकि भारत सरकार ने इस मामले में एक भूमिका ले रखी है. तो पाकिस्तान उसका सम्मान करे अौर भारत अाने का हमारा निमंत्रण स्वीकार करे. वे हमारे मेहमान बन कर अाएं, हमारा गणतंत्र दिवस देखें अौर फिर भारत-पाक वार्ता में बैठें. इस प्रस्ताव से, अभी-के-अभी उनकी कसौटी हो जाएगी. बात तो एक कदम के सामने दो कदम चलने की हुई है न ! 

पाकिस्तान के साथ हमारे अनुभव इतने बुरे रहे हैं कि उधर से बहने वाली हर हवा पर दिल्ली की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे अौर सावधानी से ही उभरेगी, यह बात पाकिस्तान को समझनी चाहिए. इसलिए सदाशयता के एक नहीं, कई प्रमाण इमरान को देने होंगे; देते रहने पड़ेंगे. हम ऐसे हम कदम को शक की नजर से नहीं, भरोसे से देखें. पाकिस्तान देखे कि गलियारे का काम तेजी से अौर ठीक से पूरा हो; जिस हाफिज सईद के अपराध की बात प्रकारांतर से उन्होंने  कबूल की है, पाकिस्तान में उनकी अाजादी को तुरंत प्रतिबंधित किया जाये; दाऊद इब्राहिम का पाकिस्तान में होना वे कबूल करें अौर पहले कदम के तौर पर पाकिस्तान में ही उस पर मुकदमा दायर करें; सीमा पर हो रही अातंकी घुसपैठ अौर फौज की बेजा हरकतों पर प्रभावी रोक लगाएं- ऐसी रोक जो हमें दिखाई भी दे अौर महसूस भी हो. ये कुछ प्रारंभिक कदम हैं जो भारत का भरोसा मजबूत कर सकते हैं. भारत का भरोसा मजबूत करना भारत के साथ पक्षपात करना या भारत के सामने झुकना नहीं है, जैसे इमरान को गणतंत्र दिवस पर अामंत्रित करना पाकिस्तान की चापलूसी नहीं है. अाप विश्वास का अाधार नहीं खड़ा करेंगे तो दोनों में से कोई भी पक्ष पहल नहीं कर सकेगा अौर पहल नहीं होगी तो यह जड़ता नहीं टूटेगी. 


इमरान का पाकिस्तान इसे समझे अौर मोदी का हिंदुस्तान सकारात्मक रवैया रखे तो यह गलियारा हमारी दोस्ती का राजमार्ग बन सकता है. ( 1.12.18)  

Tuesday, 16 October 2018

बा: बापू की साथी


गांधी : 150

मां ब्रजकुंवरी अौर पिता गोकुलदास मकनजी की बेटी कस्तूर … तारीख तो पक्की किसी को पता नहीं लेकिन सन् सबको याद है कि 1868 था जब वह पैदा हुई थी. फिर हुअा यह कि 14 साल की कस्तूर अौर 13 साल के मोहन दास का विवाह 1882 में हुअा। कस्तूर ने न कभी अपने जीवन के बारे में अौर न जिसके जीवन में उसका प्रवेश हुअा, उसके जीवन के बारे में कभी सपने में भी वह सोचा होगा जो हुअा अौर जो उसे मिला। 1882 से 1944 तक वे एक ज्वालामुखी के साथ रहती रहीं; एक तूफान के संग तिनके की तरह उड़ती रहीं; एक अतल गहरी चेतना को थाहने की कोशिश करती रहीं, अौर इन सारे झंझावातों के बीच खुद को भरपूर संभालती रहीं। इसी क्रम में वे कस्तूर से कस्तूर गांधी बनीं, कस्तूर बा बनीं अौर फिर बा बन कर अनंत में विलीन हो गईं। अौर अपनी इस पूरी जीवन-यात्रा में वे एक चुनौती बनी रहीं - अपने लिए भी; महात्मा गांधी के लिए भी; उनके विचारों अौर उनके यम-नियमों के लिए भी; उनके साथी-सहयोगियों के लिए भी। बा जब तक रहीं एक शाश्वत चुनौती बनी रहीं। 
बैरिस्टर मोहन दास अपनी कस्तूर अौर अपने बच्चों को जैसी िंजदगी देने की अभिलाषा ले कर दक्षिण अफ्रीका अाए थे, उसे उन्होंने पूरा नहीं किया, ऐसा नहीं था। दक्षिण अफ्रीका पहुंच कर युवा बैरिस्टर गांधी ने खूब नाम कमाया अौर भरपूर नामा भी बटोरा ! लेकिन सफलता व वैभव की हवा पर सवार उड़ती पतंग सरीखी जिंदगी उनका रास्ता कभी नहीं थी। वे तो बचपन से ही हवाअों पर सवारी करने वाले अादमी थे। ऐसा नहीं होता तो तमाम तरह की कमजोरियों अौर फिसलनों से घिरा मोहन वहां से निकल ही कैसे पाता ! लेकिन बचपन से किशोरावस्था तक मोहन दास उनसे निकलता ही गया। फिर बैरिस्टर मोहन दास करमचंद गांधी इंग्लैंड में इन सबसे कटता-बचता अागे बढ़ा।   फिर वह पहुंचा दक्षिण अफ्रीका। यहां अा कर सफलता व वैभव में खो जाने के अवसर कम नहीं थे। लेकिन जो खो जाए वह गांधी ही क्या ! 
लेकिन कस्तूर का क्या ? वे तो नहीं अाई थीं दक्षिण अफ्रीका वह जीने के लिए जिसमें बैरिस्टर गांधी ने धीरे-धीरे उन्हें डाल दिया। एक सामान्य, घरेलू महिला जैसी शांत, भरी-पूरी जिंदगी की कल्पना करती है, बा उससे अलग कुछ नहीं चाहती थीं।  वे जो चाहती थीं उससे एकदम विपरीत जिंदगी उन्हें मिली। ऐसी जिंदगी कि कोई लड़की कह उठे कि यह भी कोई जिंदगी है ! उन्होंने कहा; अपनी तरह से यह भी कहा अौर दूसरा भी बहुत कुछ कहा, कई मौकों पर कहा लेकिन जिंदगी के अर्थ की तलाश में खोये मोहन दास ने न उसे सुना, न उसका समय उसे दिया। फिर कस्तूर ने क्या किया ? कड़ी असहमति जताते हुए भी खुद को बड़ी कड़ाई से मोहन दास के अनुकूल बनाने की कोशिश की। असहमति जताना यानी सामने चुनौती पेश कर देना ! चुनौती का जवाब तो उसे देना होता है न जिसे चुनौती मिली है, सो हम बार-बार मोहन दास को जवाब देते पाते हैं। उनकी शरीर-श्रम की अनिवार्यता की शर्त; उनकी सब जाति-धर्म को एक साथ, एक समान बरतने की शर्त; परिजन-अन्य जन का भेद न करने की शर्त; छुअाछूत अौर देशी-विलायती अादमी का ख्याल न करने की शर्त; अौरत-मर्द की दूरी व बराबरी की शर्त; सार्वजनिक धन व निजी संपत्ति का विभेद पालने की शर्त; अपने अौर दूसरों के बच्चों की पढ़ाई व प्राथमिकता में फर्क न करने की शर्त ! … शर्त-शर्त-शर्त !!! इतने  सारे  यम- नियम से लदे-फदे मोहन दास जीवन का अर्थ खोज रहे थे, कस्तूर अपना पति अौर अपने बच्चों का पिता खोज रही थी। इसलिए मोहन दास के लिए कस्तूर अौर कस्तूर के लिए मोहन दास चुनौती बने रहे। चुनौती ऐसी सीधी कि मोहन दास तिलमिलाहट से उफन उठे अौर अनजान देश में, एकाकी रात में सीधे बांह से पकड़ कर घर से बाहर निकाल देने का उपक्रम किया; अौर सामने से ‘तुम्हें शर्म नहीं  अाती!’ की चुनौती ऐसी उठी कि शर्म से गड़ कर, पश्चाताप के अांसुअों में सराबोर हो गये। कस्तूर की दी चुनौती हवा में टंगी रही लेकिन पत्नी का प्यार उन्हें खींच कर पति के पास ले गया अौर स्नेह से पति को पास ले कर बोली : तुम भी तो इंसान हो न !… बा ने वहां से चलते हुए यहां तक की यात्रा पूरी की कि अागा खान जेल में मृत बा के पास पाषाणवत् बैठे बापू को ख्याल अाया कि अब नये तरह से जीवन जीना सीखना होगा मुझे- बा के बिना जीवन ! 
बा खास कुछ पढ़ी-लिखी नहीं थीं। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भी बापू ने चाहा था कि वे प़ना-लिखना अच्छे से सीख लें। लेकिन बा ने इसमें दिल डाला ही नहीं। इसलिए  बापू के साथ रहते हुए भी, उस दौर में उन्होंने खास कुछ पढ़ा-लिखा नहीं। फिर बा को हम चंपारण में पाते हैं। गांधी अब खासे महात्मा बन चुके हैं। बड़े लोगों का उनका साथ है, बड़ी बातों से उनका सरोकार है। लेकिन उनकी समझ व उनकी कार्य-शैली ऐसी है जो जमीन छोड़ कर नहीं चलती है। इसलिए चंपारण का काम अागे बढ़ाने के लिए वे महादेव भाई को बुलाते हैं अौर बा को साथ लाते हैं। 
बा ने चंपारण में जो काम किया अौर जिस तरह किया अभी उसका पूरा अाकलन बाकी है। चंपारण के जीवन में गांधी का सहज प्रवेश हो सका तो इसके पीछे उनकी अनोखी कार्यशैली तो थी ही, बा की मजबूत व सक्षम उपस्थिति भी थी। बा के कारण बापू के लिए चंपारण के घर के द्वार खुले। चंपारण में बापू को दो काम सबसे जरूरी लगे - पढ़ाई व सफाई ! बा को उन्होंने इन दो मोर्चों की जिम्मेवारी सौंपी अौर बा ने अपूर्व कुशलता से इन दोनों मोर्चों पर काम भी किया अौर चंपारण के जन-जीवन से नये सिपाही तैयार भी किए। चंपारण के काम से अौर देश के दूसरे कामों से बापू को चंपारण से निकलना भी पड़ता था लेकिन बा चंपारण में तब तक डटी रहीं जब तक चंपारण का काम स्थानीय लोगों को सौंप कर बापू ने वहां से विदाई न ले ली। लेकिन चंपारण में हम बा को एक परिपक्व सामाजिक कार्यकर्ता बनते पाते हैं । 
  वे बापू के राजनीति कामों व उसके पीछे की बारीकियों को समझती भी कम ही थीं अौर उनमें हाथ भी नहीं डालती थीं। वे तब बंबई में बापू के साथ ही थीं जब 8 अगस्त 1942 को बापू ने भारत छोड़ो अांदोलन की घोषणा की। उसके बाद, उन्होंने वे भयानक गिरफ्तारियां देखीं जो पौ फटने से पहले बापू समेत सारे नेताअों की हुई। कौन कहां पकड़ा गया अौर गिरफ्तार कर कौन कहां भेजा गया, किसी  को पता नहीं था। बापू भी बंबई के मणि भवन से गिरफ्तार कर कहां ले जाए गये, यह किसी को पता नहीं था। लेकिन एक बात सबको पता थी कि 9 अगस्त 1942 की शाम को बंबई की चौपाटी पर वह अामसभा रखी गई है जिसे बापू को संबोधित करना है। सवाल सीधा था - चौपाटी की सभा को अब कौन संबोधित करेगा ? बा को इस गाढ़े वक्त अपनी भूमिका तै करने में थोड़ी देर भी नहीं लगी। वे सहज ही बोल उठीं : मैं उस सभा को संबोधित करूंगी ! बापू की अनुपस्थिति भरने के लिए भारत छोड़ो अांदोलन की उस पहली सभा को संबोधित करने वे अपनी पहल से पहुंची थीं लेकिन सभा-समारोहों में बोलने की पहल उन्होंने कभी नहीं की। 
अपने अौर अपने बच्चों के प्रति बापू की तथाकथित कठोरता का पहला निशाना वे ही बनती थीं लेकिन बापू पर लगने वाले हर निशाने का जवाब देने को वे हमेशा तत्पर मिलती थीं। देश-दुनिया की तमाम बड़ी हस्तियां बापू के इर्द-गिर्द मंडराती थीं अौर बा उन सबके बीच, िबना किसी दावेदारी के अपनी अलग जगह बनाए रखती थीं।  
ऐसी बा हर उस महिला के लिए, अौर हर उस इंसान के लिए चुनौती थीं, अौर अाज भी हैं जो अपनी सामान्यता की हीनता में दबा-सिकुड़ा रह जाता है। सामान्यता वह कच्चा माल है जिससे असामान्यता का पक्का लोहा तैयार होता है। इसलिए हम सबकी सामान्यता हीनता में सिकुड़ने के लिए नहीं बल्कि लगातार मांजने के लिए है। हम बा को यह उद्यम करते पाते हैं। बा को यह पहचानने में काफी समय लगा कि वे जिस पुरुष के साथ रह रही हैं वह सामान्य पुरुष नहीं, कुछ एकदम अलग अौर कोई नई चीज है। इस अलग अौर नये अादमी को कदम-दर-कदम बनते अौर बनने के क्रम में विफल होते, फिसलते भी उन्होंने देखा है। इसलिए स्वाभाविक है कि बापू के प्रति उनका नजरिया अौर उनकी प्रतिक्रिया दूसरों से भिन्न होती है। लेकिन एक बार यह सब पहचान लेने के बाद अौर इस पहचान के स्थिर हो जाने के बाद वे उस पुरुष की अाभा से लड़ती अौर खुद को अारोपित करती कहीं नहीं मिलती हैं बल्कि उसकी अौर अपनी निजता का दायरा बना कर जीने लगती हैं। इसे साथी कहते हैं। वह साथी नहीं है जो हरदम गर्दन पर सवार रहे।  साथी वह भी नहीं है जो तुमसे विमुख हो जाए अौर अपनी उदासीन दुनिया में छुप जाये।  साथी वह है जो अपनी अौर तुम्हारी, दोनों की अस्मिता को पूरा अवकाश देते हुए तुम्हारा दायित्व स्वीकार करे। यह दोतरफा चलने वाली प्रक्रिया है। बा अौर बापू के बीच यह प्रक्रिया बड़े अनोखे ढंग  से निष्पन्न होती है। वे बापू की अधिकांश पहल से असहमत होती हैं। बापू का गाय का दूध पीना छोड़ना भी उन्हें समझ में नहीं अाता है लेकिन बापू को बकरी का दूध पीने का विकल्प भी वे ही सुझाती हैं। वे अपने सबसे बड़े बेटे हरिलाल के प्रति बापू के रवैये से सर्वथा सहमत नहीं हैं अौर उसका पतन देख कर खून के अांसू रोती हैं। बापू को जिम्मेवार भी बताती हैं। लेकिन वे इसकी भी प्रत्यक्षदर्शी हैं कि हरिलाल का पतन बापू को कितने गहरे मथता रहता है अौर वे कैसी दारुण अात्मपीड़ा से गुजरते हैं। इसलिए हरिलाल को संबालने की कोशिश करते हुए वे बापू के प्रति न कोई अन्याय करती हैं न हरिलाल के किसी अन्याय का अनुत्तरित जाने देती हैं। वे बापू के हर अनशन से असहमत होती हैं। प्रतिवाद करती हैं, कई तरह के सवाल खड़े करती हैं। बापू अपनी इस बा को समझते भी हैं अौर उनका भरपूर मान भी करते हैं। इसलिए हर अवसर पर, अपने हर कदम का अकाट्य जवाब देते हैं। बा उन तर्कों को काटती नहीं हैं, काट सकती भी नहीं हैं क्योंकि बापू के उद्भट साथियों-सहयोगियों ने वह सारा कुछ कर के देख लिया होता है। वे अपना सब कुछ उड़ेलने के बाद, बापू के निर्णय को साड़ी के पल्लू से बांध कर अलग नहीं हट जाती हैं बल्कि अपनी निष्ठा के साथ उससे जुड़ जाती हैं। यह बापू का साथी होने की कसौटी है। 
बापू की 150वीं जन्मजयंती का यह वर्ष है। बा होतीं तो 151 वर्ष की होतीं। यह पत्नी का उम्र में बड़ा होना भी तो एक चुनौती ही है न ! दोनों ने इस चुनौती का तो अस्तित्व ही मिटा दिया है। यह करीब-करीब एकाकार होने की अवस्था है। क्या यह संगत होगा कि गांधी:150 के अवसर पर इन दोनों की अलग-अलग पहचान उभारी जाए जबकि बा की जीवन-साधना ही बापू की छाया में विलीन रहना थी? बापू ही वह अस्तित्व-कण थे जिनमें घुल कर बा खुद को सार्थक मानती थीं। इस अत्यंत निजी व नाजुक संदर्भ को न जानने वालों को ऐसा क्यों लगे कि बापू के नाम पर बा उन पर उसी तरह थोपी जा रही हैं जिस तरह अाज के ‘परिवार-के-परिवार’ अौर नातेदार-के-नातेदार सारे देश पर लादे जा रहे हैं ? जरूरत इस बात की है कि हम सब अपनी-अपनी अास्था व समझ से बा की 151वीं जन्मजयंती मनाएं अौर महिलाअों के स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण की स्थितियां अपने भीतर भी अौर समाज के भीतर भी पैदा करें। गांधी:150 किसी व्यक्ति का नहीं, एक विशिष्ठ चेतना के अवगाहन का अवसर है, हम यह न भूलें, न इस अहसास से भटकें. बा स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व का एक मजबूत अाख्यान लिखती हैं जिसकी धुरी स्पर्धा नहीं, साथीपन है। बा को भी अौर बापू को भी ऐसी साथियों की बहुत जरूरत है। ( 30.09.2018)