Tuesday, 19 May 2026

ऐसी न्यायपालिका किसे चाहिए ?

 हमारे पांच राज्यों में चुनाव क्या हुए कि उनके नतीजों ने पचासियों सवाल खड़े कर दिए हैं; और हर सवाल ऐसे कि जिनके जवाब हमारे अब तक के लोकतांत्रिक इतिहास में खोजे नहीं मिलते हैं. ऐसे सारे सवाल अखबारों की सुर्खियों से भी ग़ायब हैं, क्योंकि अखबार जैसा जो हमारे यहां कुछ बचा है, उनकी सुर्खियां अब बनती नहीं हैं, बनी-बनाई मिलती हैं. ऐसे ही मिलते हैं वे सारे लोग जो बगैर किसी गहरी विशेषज्ञता के विशेषज्ञ घोषित कर दिए जाते हैं. सारे सवाल इन दो पाटों के बीच पिस रहे हैं. 

   अगर ऐसा नहीं होता तो ऐसा कैसे होता कि चुनाव में अधिकाधिक मतदाता भाग लेंइसकी य़ुक्ति निकालने की जगह चुनाव आयोग वह रास्ता निकाल लाता जिससे कम-से-कम मतदाता चुनाव में हिस्सा ले सकें एसआईआर या सर’ इसी काम के लिए ईजाद की गई वह अनैतिक व असंवैधानिक युक्ति है जिसका पूरा श्रेय सरकार व आयोग के बीच की जुगलबंदी को जाता है. 

   देश की मतदाता सूची बनानाउसे जांचते व सुधारते रहना चुनाव आयोग का - एकमात्र चुनाव आयोग का - दायित्व है. एक से दूसरे चुनाव के बीच का सारा समय इस आयोग के पास संविधान द्वारा दिया दूसरा कोई काम नहीं होता है सिवा इसके कि वह अपनी मतदाता सूची को पाक-साफ बनाए. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह अयोग्य भी है और अपराधी भी. अगर वह ऐसा कहता है कि इस या उस सरकार ने घुसपैठिए घुसा करमतदाता सूची दूषित कर दी हैतो उसे देश को बताना ही पड़ेगा कि उसने कबकहांकिससे इसकी शिकायत की कि फलां सरकार मतदाता सूची को अपने राजनीतिक हित में दूषित कर रही है वह यह साबित कर दे कि उसने समय परसही एजेंसी को मतदाता सूची के साथ किए जा रहे बलात्कार की शिकायत की थीतो बात पटरी पर आ जाती. लेकिन अचानक नींद से जागे किसी शराबी की तरह वह मतदाताओं पर टूट पड़े और सरकार उसे ऐसे मतदाता-संहार की इजाज़त दे भी दे तो भी यह नितांत अनैतिक व असंवैधानिक है. संविधान कभी भी और कहीं भी चुनाव आयोग को ऐसा अधिकार नहीं देता है. संवैधानिक दायित्व के पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति या संस्थान असंवैधानिक व अनैतिक रास्ते पर चल पड़े तो सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि उसके हाथ बांध दिए जाएं. 

   ऐसी हाथबंदी कौन कर सकता है ?       

   लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में ऐसी उलझी हुई स्थितियां बड़े काम की होती हैं. उनसे संविधान व लोकतांत्रिक नैतिकता दोनों उजागर भी होती हैं और सशक्त भी. लेकिन यहां एक पेंच है. ऐसा तभी हो सकता है जब संवैधानिक प्रावधान व लोकतांत्रिक नैतिकता की उलझनें संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर से पैदा हुई हों. जब उलझनें संविधान को झांसा देनेउसे तोड़-मरोड़ कर अपनी मुट्ठी में कर लेने की पतनशील चालबाजियों से से पैदा हुई हों तब वे दीमक की तरह संविधान व लोकतंत्र दोनों को खोखला करने लगती हैं. ऐसा इसलिए है कि लोकतंत्र अंततः एक नैतिक अवधारणा है जिसे संविधान ने कानूनी जामा पहनाया है. नैतिकता तभी तक स्वस्थ व गतिशील रहती है जब तक समाज सजग व सक्रिय रहता हैसंवैधानिक संस्थाएं अपनी परंपराओं का ससम्मान पालन करती हैं तथा विधायिका से फासला बना कर चलती हैं. न्यायपालिका विधायिका के साथ मिलकर जब गणेश आरती करने लगती हैतब सब कुछ गोबर गणेश हो जाता है.   

   संविधान के निर्माता इसके प्रति बेहद सावधान थे कि लोकतांत्रिक चेतना व संवैधानिक प्रावधान हमारे लिखे शब्दों से एक हद तक ही सुरक्षित व संरक्षित हो सकती है. इसलिए उन्होंने संविधान में ही ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की व्यवस्था खड़ी की जो लोकतंत्र की जड़ें सींचेंसंरक्षण के लिए बाड़ें खड़ी करें. विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका व मीडिया ही नहींदूसरी भी कई संरचनाएं बनाई गईं कि जिनका काम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मज़बूत बनाना व लोकतांत्रिक चेतना को स्वस्थ व गतिशील बनाना है. 

   इतना सब करने के बाद भी संविधान निर्माताओं के मन में शंका बनी रही कि सत्तालोलुप सरकारें व कायर-चापलूस नौकरशाही के कारण यह खतरा कभी भी उभर सकता है जब लोकतंत्र का ढांचा बना रहे लेकिन उसकी आत्मा का लोप हो जाए. ऐसा जब भी होगालोकतंत्र एक बाजारू व्यवस्था भर रह जाएगा जिससे सभी निहित स्वार्थ फ़ुटबॉल खेलेंगे. ऐसी शंका में से जन्म हुआ न्यायपालिका की संवैधानिक अवधारणा का ! संविधान ने न्याय-व्यवस्था के भीतर ही एक ऐसी न्यायपालिका की संरचना की जो सबसे पहले व सबसे अंत तक संविधान के शब्दों की संरक्षक रहेगी तथा संविधान की आत्मा को प्रखरता से स्थापित करेगी.          

   हमारे संविधान ने एकमात्र न्यायपालिका के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई कि जिसे संविधान के अलावा दूसरे किसी का बोझ नहीं ढोना हैसंविधान के अलावा दूसरे किसी की नहीं सुननी हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं कहना हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं देखना है. उसने न्यायपालिका से कहा कि संविधान ही आपके लिए गीताक़ुरानजपजीगुरूग्रंथ साहबबाइबिलअवेस्ता व दूसरे किसी भी विश्वास-ग्रंथ की जगह रहेगा. उसने एकमात्र इसी संस्थान की कुंडली में लिख दिया कि इसे हमेशा विपक्ष में ही रहना है - राजनीतिक दलों व संगठनों वाला विपक्ष नहींसंवैधानिक विपक्ष ! न्यायपालिका के हाथ में संविधान का गांडीव देकर उसने कह दिया : तुम्हारी नजर हमेशा उस मछली की आंख पर होनी चाहिए कि जो संविधान की मर्यादा से बाहर जा रही हो - फिर वह राष्ट्रपति हो कि प्रधानमंत्री कि राज्यपाल कि लोकसभा व राज्यसभा का अध्यक्षविधायिका हो या कार्यपालिका कि मीडिया. उसे इतना सजग व संवेदनशील रहना ही होगा कि देश के किसी भी कोने मेंकिसी एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी होती है तो वह तनक उठे व उस व्यक्ति के साथ तब तक खड़ी रहे जब तक यह साबित न हो जाए कि उस व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को स्थगित या सीमित किए बिना सरकार अपने संवैधानिक दायित्व की पूर्ति नहीं कर सकती थी. यह सुनिश्चित होने के बाद भी न्यायपालिका को यह देखते रहना है व सुनिश्चित करते रहना है कि उस व्यक्ति के नागरिक अधिकार व उसकी संवैधानिक गरिमा का हनन न हो. संविधान ने ऐसी न्यायपािलका बनाई और फिर ख़ुद को भी उसके ही हाथ में सौंप दिया - ‘ मेरा संरक्षण और मेरा संवर्धन भी तुम्हारा दायित्व है. यह तुम्हारे होने की सार्थकता भी है और यही तुम्हारे होने की कसौटी भी है.’ 

   क्या हमारी न्यायपालिका को इस दायित्व का अहसास है क्या हमारी न्यायपािलका लोकतंत्र के कठघरे में खड़ी हो करगीता पर हाथ रख कर शपथपूर्वक कह सकती है कि लोकतंत्र के संरक्षण व संवर्धन का दायित्व उसने सौ टंच निभाया है सौ टंच इसलिए कह रहा हूं कि संविधान का आधा-अधूरा निर्वाह अर्थहीन अवधारणा है. संविधान या तो हैया नहीं है ! अगर संविधान है तो श्रीमान सूर्यकांत हमें बताएं कि यह कैसे संभव हुआ कि बंगाल में 90 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम विभिन्न कारणों से मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए क्या चुनाव आयोग को चुनाव के ठीक पहले ऐसा करने का अधिकार है श्रीमान सूर्यकांत सर्वोच्च न्यायालय के जिन गलियारों से गुज़र कर रोज़ अपने चैंबर में पहुंचते हैंउन गलियारों में सर’ की गूंज लंबे वक्त से गूंजती रही है. श्रीमान सूर्यकांत समेत भारत की सर्वोच्च अदालत का एक भी जज ऐसा नहीं है कि जो कह सके कि उसने यह गूंज सुनी ही नहीं ! सुनीतो फिर किया क्या किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर आपत्ति उठती हो तो उसकी बारीक जांच-परख जरूरी होती है. उसमें समय भी लगता है. लेकिन जब भी आपत्ति उठे तो संविधान से बंधी न्यायपालिका सबसे पहले क्या करेगी संवैधानिक विवाद के केंद्र में आने वाले संस्थान या व्यक्ति को वह पहला आदेश यह देगी कि पीछे हटो व इंतजार करो ! 

   ऐसा क्यों नहीं किया गया बिहार के वक्त सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा दिखाया कि वह मतदाता सूची के मामले में आयोग की मनमानी चलने नहीं देगा. फटकार-धमकी-लांछन-उपहास क्या नहीं था कि जिससे सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को नवाजा नहीं. सर्वोच्च न्यायालय के खाते में बस एक ही बात बाकी रह गई थी : संविधान के प्रति अपनी एकनिष्ठ प्रतिबद्धता की घोषणा ! वह प्रतिबद्धता पहले दिन से नहीं थीसो बिहार में चुनाव लूट लिया गया. संविधान को धोखा दे करसंवैधानिक नैतिकता को रौंद कर एक अनैतिक गठबंधन को उसी तरह सरकार बनाने का मौका दिया गया जिस तरह महाराष्ट्र में दिया गया था. इससे लोकतंत्र को कुछ भी हासिल नहीं हुआन्यायपालिका अनैतिकता के दायरे में आ गई. 

   कैसा विद्रूप है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की सर्वज्ञात बात किसी पाठ्य-पुस्तक में लिख दी गई तो श्रीमान सूर्यकांत आग-बबूला हो गए. ख़ुद ही इसका संज्ञान ले कर पुस्तक बनाने वाली समिति पर वे ऐसे टूट पड़े मानो दुर्वासा ऋषि अवतरित हुए हों. सरकार भी त्राहिमाम-त्राहिमाम की मुद्रा में आ गई. सबने अपने कदम पीछे खींच लिये. मामला रफा-दफा कर दिया गया. लेकिन चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में खुली धांधली करते अधिकारी का वीडियो सामने आने पर भी सर्वोच्च न्यायालय में खलबली नहीं मची. न वह अधिकारीन चंडीगढ़ का चुनाव आयुक्तकोई भी  बर्खास्त हुआन उसे किसी भी संवैधानिक दायित्व के लिए आजीवन अयोग्य घोषित किया गया. बससबकी सुविधा का रास्ता यह निकाला गया कि नया मेयर घोषित कर दिया गया. यह संविधान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध संस्थान का नैतिक आचरण नहीं थाधूर्त नौकरशाही की चालबाजी थी. 

    जब वोट चोरी का साक्ष्य सामने आयाएकाधिक बारएकाधिक निर्वाचन क्षेत्रों के संदर्भ में आया तब न्यायपालिका ने क्या किया उसने चुनाव आयोग को तुरंत ही कठघरे में नहीं बुलाया. न्यायाधीशों की तरह संविधान के पंडित न हों हमफिर भी हम ऐसे मामले में पहला आदेश यही जारी करते कि वोट चोरी के साक्ष्य की जांच के लिए न्यायालय की समिति गठित की जा रही हैऔर जब तक यह जांच पूरी नहीं हो जातीयह चुनाव आयोग दूसरा कोई भी चुनाव संचालित नहीं कर सकेगा. चुनाव यदि संसदीय लोकतंत्र की नसों में दौड़ने वाला लहू हैतो उसे बोतल में बंद करने की इज़ाजत कैसे दी जा सकती है इसलिए तत्काल न्यायिक जांच का आदेश जरूरी था. वह हुआ होता तो इस पतनशील व्यवस्था पर लगाम लग जाती.   

   बंगाल के बारे में मेरे जैसा सामान्य विवेक व लोकतंत्र के प्रति असामान्य आस्था रखने वाला व्यक्ति एक ही आदेश देता कि बंगाल में चुनाव घोषित समय से ही होंगे लेकिन चुनाव आयोग के निकम्मेपन के कारणउसे विधानसभा के पिछले चुनाव की मतदाता सूची का ही पालन करना होगा. चुनाव से काफी पहले मतदाता सूची जांच-परख ली जाए ताकि उसे ले कर मतदाता के मन में कोई आशंका न रह जाएयह दायित्व चुनाव आयोग का है. अगर वह अपने दायित्व के निर्वाह में विफल रही है तो उसकी सजा उसे मिलनी चाहिएन कि संवैधानिक प्रक्रिया को. 

   मतदाता व मतदान दोनों ही भय व पक्षपात मुक्त होने ही चाहिए. इस दिशा में चुनाव आयोग के हर प्रयत्न का स्वागत व समर्थन होना चाहिए. संविधान ने आयोग के वर्चस्व की ऐसी व्यवस्था कर भी रखी है और अब तक ऐसा ही होता भी आया है. बंगाल में कुछ ख़ास भी था क्योंकि कांग्रेसी सिद्धार्थ शंकर राय ने वाम हिंसा कावाम ने कांग्रेसी हिंसा काममता बनर्जी ने वाम हिंसा का और फिर ममता बनर्जी ने मोदी-शाह हिंसा का उससे बड़ी हिंसा संयोजित कर मुकाबला किया था. 

   इस बार पासा पलटाक्योंकि ममता की हिंसा को भाजपा-चुनाव आयोग-राज्यतंत्र की तिहरी हिंसा का मुकाबला करना पड़ा और वह इसमें पिट गई. बंगाल में राजनीतिक हिंसा व चुनावी गुंडागर्दी को जायज़-सा माना जाता है. लेकिन बिहार से चल कर बंगाल पहुंची चुनाव आयोग-सरकार की जुगलबंदी के सिलसिले की अनदेखी करेंगे हम तो भ्रमित भी होंगे व गलत नतीजों पर भी पहुंचेंगे. 

   क्या न्यायपालिका ने बंगाल में यह नहीं देखा कि इस बार हिंसा का आयोजन दिल्ली से हुआ हैउसकी कमान चुनाव आयोग ने संभाल रखी हैभद्रजन जिसे हेटस्पीच’ कहते हैं लेकिन संविधान जिसे लोकतंत्र की जड़ पर प्रहार मानता हैवैसा कारनामा प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर ऐरागैरा-नत्थूखैरा करने में लगा है लाखों मतदाताओं के नाम रद्द करने की धौंस से नागरिकों में लाचारी व अपमान का माहौल बनामनमाने प्रशासनिक फेर-बदल ने स्थानीय स्वायत्ता को धूल-धूल कर दियासुरक्षा-बलों की छावनी जिस तरह बंगाल में उतारी गईउसने एक तरफ़ बंगाली मतदाताओं को भयाक्रांत किया तो दूसरे बंगालियों को हमलावर भी बना दिया. 

   कई लोग कह रहे हैं कि ममता की सांप्रदायिक हिंसा से बंगाल पहली बार मुक्ति हुआ. ऐसा कहने वालों से कोई पूछे कि लोकतंत्र के संदर्भ में दलीय हिंसा और सत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा में फर्क होता है या नहीं दलीय हिंसा दल की पराजय के साथ खत्म हो जाती हैसत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा राजनीतिक संस्कृति बन जाती है. दिल्ली ने बंगाल में यही किया. न्यायपालिका को यह नहीं दिखा कि चुनाव के दौरान बंगाल का पूरा प्रशासनपुलिस-सुरक्षा बलप्रचार-तंत्र सारा कुछ बंगाल पर बाहर से ला कर लाद दिया गया था यदि ममता बनर्जी बहुत भ्रष्टसांप्रदायिक ताकतों को लामबंद करने वालीहिंसा भड़काने वाली बला की अलोकप्रिय मुख्यमंत्री थींतो उन्हें हराने के लिए दृढ़ मतदाता व निष्पक्ष चुनाव से अधिक की जरूरत क्यों पड़ी क्यों भाजपा की संपूर्ण दिल्ली-मंडली बंगालवासी बन गई जीत भारतीय जनता पार्टी की हो कि ममता बनर्जी कीबंगाल की जनता की क़िस्मत बहुत बदलने वाली नहीं है. भगवा ज़हर मन में भरा न हो तो 2014 से आज तक भाजपा शासित राज्यों की जनता का हाल देख लें तो जवाब मिल जाएगा. लेकिन जिन्हें भगवा की चाह हैउन्हें लोकतंत्र से क्या मतलब !   

   सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का अहसास है क्या कि जब-जब उसे संविधान के संरक्षण में चीते की फुर्ती से आगे आना चाहिए थातब-तब वह गीदड़ की कायरता से घिरा बैठा मिला ! भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में आपातकाल एक विभाजक रेखा बनाता है. वहां से देखें कि नागरिक स्वतंत्रता का सवाल हो कि प्रेस पर सेंसरशिप का कि नक्सली बता करराज्य द्वारा अनगिनत लोगों की हत्या कावोट चोरी का या मतदाता सूची में मनमानी दखलंदाजी का,  ऐसा क्यों है कि संविधान की प्रतिष्ठा और राज्य के आतंक के बीच चुनाव का नाज़ुक क्षण जब भी आता हैहमारी न्यायपालिका को लकवा मार जाता है कायरता व कमजोरी को खोखले शब्दों व तर्कों से कौन ढक सका है ऐसी कोशिशें आपको और बेपर्दा कर जाती हैं. बाबरी मस्जिद ध्वंस का सवाल हो कि चुनावी बौंड की वैधता कान्यायपालिका अपेक्षित प्रखरता से सामने नहीं आ पाती हैतो क्यों जवाब गांधी देते हैं : जिन्हें हम संवैधानिक संस्थाएं कहते हैं वे सब निर्णायक क्षणों में सत्ता के साथ खड़ी दिखाई देंगीक्योंकि अंतत: ये सब उसके ही उपकरण हैं. इसलिए भगवा आतंकवाद की तीन गोलियां खाने के दिन तक वे इसी युक्ति में लगे थे कि इस देश की लोकतांत्रिक चेतना को कैसे मज़बूत व प्रभावी बनाया जाए.   

   यह बात बार-बार कहने की व न्यायपािलका द्वारा लगातार दोहराने की है कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत भारतीय राज्य की कृपा से नहीं है. यह हमें हमारे संविधान से स्वत: ही मिलती है. संविधान ने किसी कोई चुनाव आयोग कोकिसी सरकार कोलोकसभा या राज्यसभा के किसी अध्यक्ष को याकि किसी राज्यपाल को अपवादस्वरूप भी ऐसी मनमानी शक्ति नहीं दी है कि वह नागरिक को उसकी नागरिकता से या मतदाता को उसके मतदान के अधिकार से वंचित कर दे. बुलंद आवाज में यह सत्य कहना व इसे स्थापित करना आज न्यायपालिका का दायित्व है जिसमें वह बार-बार विफल होती है. इतना बड़ा सफेद हाथी हमने इसलिए पाल रखा है कि गाढ़े वक्त में वह लोक के साथ खड़ा होन कि तंत्र की तरफदारी करे. लेकिन लगता हैहमारी न्यायपालिका सरकारी नौकरशाही का हिस्सा बन कर रह गई है.

   निर्भीक तटस्थता से लैस मतदाता ही हमारे लोकतंत्र की अंतिम आशा है जो न्यायपालिकाविधायिकाकार्यपालिका व मीडिया को  अंकुश में रखेगा. ( 16.05.2026)

Thursday, 7 May 2026

जब कैमरा बोला करता था …

 26 अप्रैल 2026 को जब रघु राय ने अपने कैमरे का शटर दबाया होगा, तब उन्हें इल्म हुआ होगा कि उनका कैमरा बंद हो गया है. अब वह न कभी खुलेगा, न कभी बोलेगा ! 

   उनका कैमरा बोलता था. रघु राय के कैमरे में व दूसरों के कैमरे में यही फर्क था. दूसरों का कैमरा बोलता नहीं थादेखता थारघु राय का कैमरा गूंगा होने को तैयार नहीं था. वह बोलता था. महान कनाडियन कैमराकार यूसुफ कार्श का कैमरा नहीं बोलता थाउनके पोट्रेट बोलते थे. उनके पोट्रेट के पात्रों की आंतरिक विशेषताओं को उनका कैमरा जैसे छू लेता था. वह कहता कुछ नहीं थाहमारे सामने उस व्यक्ति को खड़ा कर देता था. 

   मैंने ऐसा ही कुछ पहली बार पटना की उस मित्र-मंडली में कहा था जिसमें रघु राय भी मौजूद थे. चेहरे पर सदा खिली रहने वाली आत्मीय मुस्कान के साथ वे मुझे सुन रहे थे : रघु राय के फोटोग्राफ्स बोलते हैं इसलिए हमें उनके पास ठहरना पड़ता है ताकि उन्हें सुन सकेंरघु राय के फोटोग्राफ्स दौड़ते हैं इसलिए हमें उनके साथ तेज दौड़ लगानी पड़ती है ताकि कहीं पीछे न छूट जाएं ! मुझे कई बार लगा है कि उनके फोटोग्राफ्स की एक श्रृंखला देखते-देखते सांस फूलने लगती है. 

   मैं आज कहना चाहता हूं कि रघु राय हमारे दौर के सबसे तेज रफ्तार कैमराकार थे जो गतिशब्द व चित्रतीनों का अप्रतिम संतुलन साध पाते थे. मैं यह आज इसलिए कहना चाहता हूंक्योंकि रघु राय अब नहीं हैं. अब वह आंख नहीं है जो कैमरे से जुड़ कर वह संसार उजागर कर जाती थी जिसे देखते हुए भी हम देख नहीं पाते थे. उनकी आंखों में कैमरा लगा था और उस कैमरे में महाभारतवाले संजय की आंख लगी थी. कई लोग कहते रहेउनकी विदाई-लेखों में भी लिखा जा रहा है कि वे आलादर्जे के न्यूज-फोटोग्राफर थे. रघु राय के परिचय में जब ऐसा कहा जाता है तब मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई जवाहरलाल नेहरू के परिचय में कहे कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे. यह परिचय सच है लेकिन जवाहरलालजी का इससे बौना परिचय दूसरा हो नहीं सकता है. वे बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ भारत के प्रधानमंत्री भी थे. रघु राय बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ न्यूज-फोटोग्राफर भी थे. 

   हम बहुत कम समय तक एक-दूसरे को जानते रहे. फिर एकदम अलग हो गए. फिर इधर के दिनों मेंजब मैं दिल्ली आया तो फिर कुछ मिलना हुआ. इसलिए निजता का मेरा कोई दावा नहीं है. लेकिन 1974 से जो शुरू हुईवह सौहार्दपूर्ण पहचान बनी रही. मैंने उनसे भी कहा था और आज भी उसे दोहराता हूं कि रघु राय के कैमरे को 1974-77 के दौर में वह संस्कार मिला जिसने उन्हें फोटोग्राफर से कहीं आगे खड़ा कर दिया. अपना कैमरा ले कर जब रघु राय जयप्रकाश नारायण व उनके आंदोलन के क़रीब पहुंचे तब उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका कैमरा यहां से अपना चरित्र बदलने वाला है. मुझे पता नहीं है कि रघु राय 1974 से पहले जयप्रकाश से परिचित थे य़ा नहीं. कभी पूछा नहींकभी `ऐसी बात निकली नहीं. लेकिन सिताबदियारा की वह रात मुझे खूब याद है जब दिन भर की तूफानी सभाओं व सार्वजनिक जयकारों-हाहाकारों से निकल कर हम देर शाम जयप्रकाश के पैतृक गांव सिताबदियारा पहुंचे थे. 

   अपना वह गांव और अपना वह खपड़ैल मकान जयप्रकाश को बहुत प्यारा था. उसकी उष्मा में वे विभोर हो कर रहते थे - चाहे जितना रह सकें !  उस शाम बेहद थके होने के बाद भी वे वैसे ही मगन-मन थे. वहां जगह भी कम थीसुविधाएं तो और भी कमऔर उसमें औचक आ पहुंचे 10-15 शहरी मेहमान ! सबकी व्यवस्था थी. सबको उनकी जगह पहुंचा करखाना आदि करवा कर थोड़ी राहत मिली. जयप्रकाश भी थकान आदि से निबट कर थोड़े स्थिर हुए तो सब मेहमानों की व्यवस्था आदि की जानकारी ली. बिस्तरमच्छरदानीपीने का पानीबाथरूम सब पूछा : ‘ इनमें से कुछ होंगे जिन्हें सोने से पहले चाय-कॉपी की जरूरत होती होगी. वह सब पूछा न ?’ पूछा तो था लेकिन बहुत आग्रह से नहींइसलिए जवाब में थोड़ा संशय था...रात भी ज्यादा हो रही हैसोने वाले सो भी गए होंगे… व्यवस्थापकों का जवाब पूरा भी नहीं हुआ था कि जयप्रकाश बिस्तर से नीचे उतरे और बोले : ‘ चलेजरा देख लूं !’ 

   मेहमानों में संकोच भरी खलबली हुई. इतनी रात गएथके जयप्रकाश एक-एक के बिस्तरे तक पहुंचेबड़ी आत्मीयता से जो पूछना-बताना थावह सब किया- यहां सुविधाएं कम हैंपरेशानी होगी आपकोसुबह कितने बजे उठते हैंनहाने का गर्म पानी यहां मिल जाएगाचाय कितने बजे लेंगेचाय के साथ क्या लेंगे… मैं देख रहा था कि रघु राय सिकुड़ते जा रहे थे. जिसके पीछे कैमरा ले कर वे सुबह से भाग रहे थेवह अब उनके कैमरे की जद से बाहरउनके सामने खड़ा थाऔर उन्हें अपने कैमरे में बंद कर रहा था. 

   “ आपने रोका क्यों नहीं… दिन भर मैंने इस बूढ़े आदमी को जवानों को मात देने वाली एनर्जी से काम करते देखा है… अब हमारी बेहूदा-सी जरूरतों की चिंता में…” रघु राय को सूझ नहीं रहा था कि वे कैसेक्या कहें… शब्द बता नहीं पा रहे थे कि वे कैसा महसूस कर रहे थे… फिर हम देर रात तक सिताबदियारा के कच्चे रास्तों पर हल्के कदमों व दबी आवाज में बात करते घूमते रहे … वे एक इवेंट कवर करने आए थेऔर यहां मिला उन्हें एक ऐसा व्यक्ति जो इतिहास समेटता हुआइतिहास बदल रहा था… आप देखिए नन यह कैमरा मेरा बनाया हैन मेरे कैमरे के सामने जो घट रहा है वह मेरा रचा है… सब मुझे बना-बनाया मिला है. मैं कर तो इतना ही रहा हूं न कि शटर दबा रहा हूं… रघु राय कुछ और कहते कि मैंने टोका : शटर तो मैं भी दबा सकता हूं लेकिन उसमें से रघु राय का फोटो बनेगा नहींक्योंकि कहांकब व कैसे शटर दबाना है यह न मशीन को मालूम हैन मशीन के सामने घटती घटनाओं को… यह तो रघु राय को ही पता है… कला व कलाकार के बीच का यह रिश्ता ही अंतिम सत्य है… ऐसी कितनी ही बातें उस रात हुईं… जयप्रकाश कर क्या रहे हैंलोकतंत्र के विकास में इस आंदोलन का रोल क्या हैदमन के सामने बहादुरी से खड़े इन नौजवानों की प्रेरणा क्या है जैसी कितनी ही बातें हम कर गए… रघु राय तब अपने फोटो का नया एंगल खोज रहे थे. जिसे हम न्यूज-फोटोग्राफी कह कर निकल जाते हैं और जो न्यूज़ के साथ ही दम तोड़ जाती हैरघु राय उसके पार जाते थे क्योंकि वे क्षण को नहींवक्त को दर्ज करने वाले कैमराकार थे. 

   बिहार आंदोलन में गति व उमंग का विस्फोट हुआ था. रघु राय उसे पकड़ सके थेक्योंकि वे उसे समझ सके थे. उनका कैमरा साक्षी-भाव नहीं रखता थावह भागीदार बन सका था. बिहार आंदोलन के उनके फोटो का संकलन बिहार शोज़ द वे’ आप देखें तो समझ सकेंगे कि वे लिखे शब्दों व विवरणों को व्यर्थ-सा बना देते हैं,क्योंकि वे सारे फोटोग्राफ्स बोलते भी हैंभागते भी हैं. लेकिन आपको एकदम अलग रघु राय मिलते हैं जब आप मदर टेरेसा के पास उन्हें देखते हैं. उनका कैमरा वहां ध्यान करता मिलता है : नि:शब्द प्रार्थना ! रूपाकार नहींकरुणा ही आकार ले लेती है. संगीतकारों की उनकी श्रृंखला मुझे इसलिए बहुत प्रिय है कि कैमरे को उस तरह गाते कभी सुना नहीं था. इंदिरा गांधी का उनका अलबम एकदम अलग भाषा में बोलता है - सत्ता की धमक-चमक व आतंक का रस वहां हर ओर बिखरा मिलता है. 

   वह सारा कुछ जो काल की हथेली पर उन्होंने बिखरा रखा थाअब सिमट चुका है. उसमें कुछ नया जोड़ने वाली आंख नहीं रही. कैमरा भी हैविषय भी हैं लेकिन रघु राय नहीं हैं. 

वह वादा भी अब कभी पूरा नहीं होगा जो जयपुर में गांधी-वाटिका बनाते समय उन्होंने मुझसे किया था : कुमारआपकी गांधी-वाटिका के लिए मैंने कुछ अलग सोच रखा है… मैं वह आपको दूंगा…  

   वह वाटिका भी अब श्रीहीन हो चुकी है

( 28.04.2026)                                  

Thursday, 16 April 2026

वह एक रात !

     एक ही रात में - 7 अप्रैल 2026 - हजारों साल पुरानी व समृद्ध ईरानी सभ्यता के अस्तित्व को धरती से मिटा देने की मनोरोगी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद क्या हुआ ? अखबारी दुनिया के लोग कहेंगे कि उसके बाद 15 दिनों का युद्धविराम हुआ. 

   मैं कहूंगा कि नहींयह तो हुआ हीऔर वह भी हुआ जो संभवत: मानवीय सभ्यता के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. ट्रंप की कयामत की रात की घोषणा के बाद न ईरान के सत्ताधारियों नेन ईरान की बलिदानी जनता ने किसी के आगे गुहार लगाईन हाथ फैलायान माफी मांगी. स्त्री-पुरुष-बच्चियां-बच्चे कोई कहीं रोता-कलपता भी नहीं दिखा. पिछले 40 दिनों से वेखंडहर होते जा रहे अपने देश को सीने से लगाएआसमान से बरसते विनाश का सामना कर रहे थेआक्रमणकारी ट्रंपगैरतहीन,धूर्त नेतन्याहू और इनके सफरमैना खाड़ी देशों को लगातार हथियारों से जवाब भी दे रहे थेहालांकि वे जानते थे कि वे अब ज्यादा दिनों तक जवाब देने की हालत में नहीं हैं…   

   लेकिन 40 दिनों बाद आज, 7 अप्रैल को लड़ाई बदल गई थी. वे ही सब युद्ध की नई कुंडली लिखने सड़कों पर निकल आए थेजो युद्ध जारी रख सकने  की हालत में नहीं बचे थे.  ईरान के जिन आण्विक संयंत्रों कोपुलों-राजमार्गोंनागरिक सुविधा के दूसरे तंत्रोंपूजा-स्थलों और सांस्कृतिक केंद्रों को बमों से ध्वस्त कर देने की घोषणा ट्रंप ने की थीहमने देखा कि अपने-अपने ध्वस्त घरों से निकल-निकल कर ईरानी नागरिक इस सभी स्थलों को घेर कर खड़े होते गए… कोई शोर नहींकोई नारेबाजी नहींसब एकदम शांत थे. लेकिन हर जगह लोग-ही-लोग थे… कोई कह तो नहीं रहा था लेकिन जैसे कहीं सेकोई आसमानी घोषणा कर रहा था :  हम यहां खुले में खड़े हैंचलाएं ट्रंप उनके पास जो भी है. ईरान के मशहूर संगीतकार अली घामसारी ने एक संयंत्र के सामने वाली सड़क पर दरी बिछाई और अपना वाद्य बजाने लगे. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने शांत पर दृढ़ आवाज में बताया: मरने की तैय़ारी रखनेवालों की सूची में अब तक 1.40 करोड़ ईरानी नागरिकों ने अपना नाम दर्ज करवाया है और उसमें पहला नाम मेरा है. 

    यह ईरान के लिए कयामत की रात थी जिसे उसने कमाल की रात में बदल दिया था. 

   किसी ने देखा या नहीं देखा पता नहीं लेकिन इन बलिदानी ईरानियों की किसी कतार में महात्मा गांधी भी खड़े थे ! दुनिया के जिस भी कोने में लोग वीरता से बलिदान देने निकलते हैंयह अधनंगा फकीर’ वहां अपनी हाजिरी लगाता ही है. जयप्रकाश ने कभी हंगरी मेंकभी तिब्बत मेंकभी बांग्लादेश में तो कभी चेकोस्लोवाकिया में इस गांधी को पहचाना था और उसके साथ खड़े हुए थे.  

   गांधी ने कहा था : विवश कायरता से कहीं भला होता है निडर बलिदान ! गांधी की अहिंसा का उपहास करने वाले किताबी बुद्धिजीवी व हिंदुत्व की अहंकारी भाषा में अपनी कायरता छिपाते रहने वाले कहां पहचान सकेंगे कि गांधी ने जिस चरम साहस की बात कही थीईरानी जनता में वह साहस 7 अप्रैल 2026 को मूर्तिमान हुआ था. 

   यही अमरीका था और उसके ही परमाणु बम थे कि जिनसे हिरोशिमा-नागासाकी का अकल्पनीय विनाश हो चुका था. तब किसी ने पूछा था गांधी से : आप परमाणु बम का अहिंसा से कैसे मुकाबला करेंगे पूछने वाले ने सोचा था कि गांधी निरुत्तर रह जाएंगे लेकिन गांधी ने जवाब टाला नहींवे हिचके भी नहीं. कहा : विनाश का मुकाबला अकंप वीरता से ही किया जा सकता है. उन्होंने बात साफ की : जब बम ले कर आसमान में विमान आएगा तब मैं किसी खाई-खंदक में छुपूंगा नहींबल्कि खुले मैदान में निकल आऊंगा और अपलक उस विमान को देखता रहूंगा जो संपूर्ण विनाश ले कर आया है. मैं जानता हूं कि उस विमान का पायलट उस ऊंचाई से मुझे देख नहीं सकेगा लेकिन मैं तो उसे अपलक देख सकूंगा. बम उन सबको मार जाएगा जो बचने की कोशिश करेंगेलेकिन वह उन सबको मार ही नहीं सकेगा जो मरने का भय छोड़ करउसकी आंखों-में-आंखें डाले सकेंगे ! … फिल्मी डायलॉग है : जो डर गया वो मर गयागांधी कहते हैं : करो या मरो ! 

   कायर सवाल पूछते ही रहते थे : ऐसा हो सकता है क्या सामने से आती मौत की तरफ कैसे देखता रह सकता है कोई गांधी कैसी अविश्वसनीय-अव्यवहारिक बात कह रहे हैं ! 7 अप्रैल 2026 के बाद कोई ऐसा नहीं कह सकेगा. ईरान की बहादुर जनता ने विनाश के समक्ष आत्मबल का सर्जन करने की गांधी की कल्पना के समर्थन में अपना वोट दे दिया है. जो कल तक अहिंसक कल्पना थीआज हकीकत बन गई है. गांधी कहते हैं : छिप कर भी मारे जाओगे लेकिन उस मौत में से असहायता व कायरता निकलेगीमौत की आंखों में आंखें डाल कर मरोगे तो उसमें से चरम वीरता निकलेगी जो मारने वालों को असहाय व व्यर्थ बना देगी.  

   युद्धहिंसा,विनाश और शत्रुता के खिलाफ जो सदा ही अपनी आवाज़ बुलंद करता रहामानव-मन में गहरी पैठी हिंसा व प्रतिशोध की भावना की जड़ें अहर्निश काटता रहाजो इन सबके विरुद्ध आज तक मनुष्य द्वारा उठाई सबसे अटूटसशक्त व सक्रिय आवाज हैउस गांधी के लिए युद्धहिंसाप्रतिशोध  अजनबी नहीं थे. वह युद्ध के मोर्चे पर फौजी अधिकारी बन कर उतरा थादो-दो विश्वयुद्ध की विभीषिका उसने देखी व झेली थीउसने अपने मुल्क की नवजात आजादी पर पड़ोसी का फौजी हमला देखा था और उससे युद्ध करने वाली फौज को आशीर्वाद भी दिया थाअपनी हत्या के पांच प्रयासों के बावजूद बगैर किसी कड़वाहट के उसने मानवीय आजादी व गरिमा का अपना अभियान जारी रखा थाजैसा सांप्रदायिक उन्माद संसार ने पहले देखा नहीं था वैसे सांप्रदायिक उन्माद में पांव-पांव लगातार भटकता रहा था वहसांप्रदायिक हिंसा के कई थपेड़े उसने झेले थे और फिर उसी सांप्रदायिक आग में जल कर वह भस्म हुआ था. तो हम कह सकते हैं कि गांधी ने युद्ध के खिलाफ तमाम उम्र युद्ध ही लड़ा ! आज ईरान ने कहा है : हर युद्ध के अंत में बचते हैं गांधी हीक्योंकि वे हिंसाघृणा व प्रतिशोध के सामने कभी सर नहीं झुकाते हैं. ( 11.04.2026)                 

Sunday, 8 March 2026

इतिहास से खेलिए नहीं !

  

गांधी और उनसे जुड़े इतिहास के बारे में संघ परिवारी जब भी कुछ कहते या लिखते हैंमैं उसे पढ़ने या उसका जवाब देने की सोचता भी नहीं हूं. इसलिए कि उनकी अवधारणाओं की पीछे निरपवाद रूप से सावरकर-गोलवलकर की वे फूहड़ सीखें होती हैं जिनका आधार मात्र गांधी-द्वेष व अंग्रेजों की गुलामी से प्रेम होता है. इनका इतिहास से और सत्य से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता है. लेकिन इस बार मैं अपना रवैया बदल कर यह लिख रहा हूंक्योंकि 31 जनवरी 2026 के अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस’ मेंराम माधव ने नाथूराम गोडसे की आड़ में छिप कर गांधी पर वार करने की बचकानी कोशिश की है. राम माधव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मान्य प्रवक्ता हैं जो संघ परिवार की चिर-परिचित रणनीति के मुताबिकअलग-अलग मंचों सेअलग-अलग भूमिका में अपनी एक-सी ही बातें रखते रहते हैं. इन दिनों किसी इंडिया फाउंडेशन’ के मंच से वे अपनी बात रख रहे हैं. 

    अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका हिंदी करूं तो कुछ ऐसा बनता है : शैतान बाइबिल को उद्धृत कर आपको भरमाना चाहता है. राम माधव का पूरा लेख कुछ ऐसा ही है जो गांधी के बारे में या इतिहास के बारे में या गांधी-हत्या के इतिहास के बारे में कमउनकी अपनी मंशा के बारे में ज्यादा बताता है. उनकी कुल मंशा यही है कि नाथूराम गोडसे की आड़ में गांधी-हत्या को जायज ऐतिहासिक आधार दिया जाए. इन दिनों राम माधव की या संघ परिवारी बौद्धिकों की योजनाबद्ध कोशिश चल रही है कि जीते जी जो गांधी कभी हाथ नहीं आएअब दूसरे रास्ते उनका काम तमाम किया जाए. इतिहास की यह त्रासदी उन सबको झेलनी पड़ती है जिन्होंने इतिहास बनाने का उद्यम कभी किया ही नहीं. किया है तो बस इतना ही कि इतिहास के साथ खेला है. जो डोर आपने कभी हाथ में धरी ही नहींउस डोर पर जब आप अपनी पतंग उड़ाना चाहते हैं तो आपकी पतंग भी व आप भी चारो खाने चित्त गिरते हैं. संघ परिवार के साथ हमेशा ऐसा ही होता है. 

 बक़ौल राम माधव, “ नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या इसलिए की कि उनका आरोप था कि गांधीजी ने तब राष्ट्रघात किया थाजब उन्होंने देश के विभाजन को अपनी स्वीकृति दी थी. नाथूराम का मानना था कि यदि गांधीजी ने ईमानदारी से पाकिस्तान का विरोध किया होता तो न मुहम्मद अली जिन्नान ब्रिटिश ही पाकिस्तान बना पाते.

जब आप इतिहास को इस तरह उद्धृत करआगे बढ़ जाते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि आप उस स्थापना का समर्थन करते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो गांधी का कोई भी अध्येता ऐसे उद्धरण के बाद यह जरूर लिखता कि नाथूराम गोडसे की ऐसी धारणा का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं थाक्योंकि गांधीजी ने कभी भी देश विभाजन को स्वीकृति नहीं दी थी. यदि नाथूराम का यह कथन अदालत में दिए उनके बयान “ मैंने गांधी को क्यूं मारा” से लिया गया हैतो इतिहास का हर अध्येता यहां यह भी लिखता कि अदालत का यह बयानजिसे संघ परिवार छपवाता ही रहता हैन तो कोई ऐतिहासिक दस्तावेज हैन अब यह कोई छिपी बात रह गई है कि यह सब लिखा तो सावरकर ने था जिसे नाथूराम के मुंह से कहलवाया गया था. संघ परिवार की रणनीति रही है कि झूठ सौ मुंह से निरंतर बोला जाए तो कुछ वक्त के लिए वह सच का दर्जा पा लेता है. राम माधव ने तो गांधीजी की ईमानदारी’ पर ऊंगली उठाने वाली सावरकर-नाथूराम की बात से भी असहमति नहीं लिखी ! गांधीजी अपनी हर बात ईमानदारी से कहते थे व अपना हर कदम ईमानदारी से उठाते थेइतनी ईमानदारी से कि उसके पीछे पागलों-से पड़ जाते थेयह तो गांधीजी के दुश्मन’ भी मानते थे. फिर देश विभाजन का उन्होंने ईमानदारी से विरोध’ नहीं कियाऐसी बात यदि सावरकर-नाथूराम ने कहीतो क्या आप इतिहास के अध्येता बन कर उसका प्रचार करेंगेया उससे अपनी असहमति ज़ाहिर करेंगे ?   

देश विभाजन के पीछे का इतिहास लंबा हैऔर किन-किन ताकतों की क्या-क्या भूमिका रही हैयह सब जानना जरूरी भी है. लेकिन इस लेख में अभी वह सब समेटना संभव नहीं है. इतना जानना जरूरी है कि जिन्ना की मुस्लिम लीग व सावरकर मार्का हिंदू संगठनों की रची सांप्रदायिक आग की हर लपट से जूझते हुए गांधीजी जब देश भर में मानवी दमकल’ बने भाग रहे थेतभी दिल्ली में बैठे सभी रंग-ढंग ने नेताओं ने अंग्रेजों के साथ मिल कर विभाजन का नक्शा बनाया था. इसकी एक भी लकीर गांधी न तो खींची थीन गांधी के मश्विरे से बनी थी. फिर भी राम माधव ने लेख के अंत में अपना मंतव्य लिखा है कि विभाजन’ के हालात पैदा करने के आरोप से गांधी पूरी तरह बरी नहीं किए जा सकते हैं. आगे वे पूछते हैं : “ लेकिन क्या वे इसके लिए अकेले जिम्मेवार थे ?” फिर ख़ुद ही जवाब देते हैं : “ गोडसे ऐसा मानते थेदेश नहीं मानता था.” लेकिन राम माधव यह नहीं लिख सके देश जो मानता थापूरा संघ परिवार वह कभी मानता ही कहां था 

नोआखाली का अपना अभियान पूरा कर77 साल के गांधी जब 1947 में दिल्ली लौटे तब तक विभाजन की शतरंज पर सारी गोटियां बिठाई जा चुकी थीं. अब वहां कोई भी उत्सुक नहीं था कि बंटवारे की चर्चा इस बूढ़े से की जाए - सभी वाइसरायों की तरह नये वाइसराय माउंटबेटन को भी लंदन ने इस बूढ़े की तरफ से सावधान किया थाजिन्ना तो गांधी से जितनी दूरी रखनी संभव थीउतनी दूरी रखते ही थेकांग्रेस के सारे बड़े नेता अब गांधी से दूरी ही नहीं रख रहे थे बल्कि उनसे बच कर चल रहे थे. यह इस हद तक था कि अंतत: गांधी ने ही सरदार को कुछ ऐसा लिखा कि मैं यहां जब से आया हूंऐसा महसूस कर रहा हूं कि एक मैं ही हूं कि जिसके पास कोई काम नहीं है… आप सबके पास तो पल भर का भी समय नहीं है. जब बंटवारे की बात उनके साथ बांटने को भी कोई तैयार नहीं था तब कोई ऐसा कैसे लिख सकता है कि बंटवारे की परिस्थिति बनाने की जिम्मेवारी से गांधी भी बरी नहीं किए जा सकते हैं समझना ही हो तो यह समझना आसान है कि गांधी का ऐसे माहौल में काम करना कितना कठिन रहा होगा. लेकिन कांग्रेस के लिए गांधी की पूर्ण उपेक्षा संभव नहीं थीन गांधी उदासीन रहने को किसी तरह तैयार थे. इसलिए बात धीरे-धीरे खुलती गई कि जवाहरलालसरदारमौलाना आजादआचार्य कृपालानी आदि सबने विभाजन को नैतिक व लिखित स्वीकृति दे दी है. गांधी ने इन सबको बड़ी कठोरता से अपने कठघरे में खड़ा भी किया. लेकिन दोषरोपण से बात पूरी तो होती नहीं थीक्योंकि गांधी सितंबर 1940 में कहा अपना यह कथन भूले नहीं थे : “ भारत को दो टुकड़ों में बांटना भारत को एनार्की में झोंक देने से भी बुरा होगा. इसे तो बर्दाश्त किया ही नहीं जा सकता है. मैं उन सबसे कहूंगा : भारत का विभाजन करने से पहले आपको मेरा विभाजन करना होगा… विभाजन मेरी लाश पर ही होगा !”  इसलिए जो बाजी कांग्रेस हार चुकी थीउसे पलटने का लगभग असंभव-सा काम गांधी ने आप ही अपने सर ले लिया. इसे गांधी या दुर्भाग्य कहिए या जिन्ना का सौभाग्य कि इतिहास जब इस मोड़ पर पहुंचा तब सिंध के जी.एम. सैयदसीमा प्रांत के डॉ. खान साहबपंजाब के खिजर हयात खान जैसे लोग दुनिया छोड़ कर जा चुके थे. ये सब होते तो जिन्ना को मुसलमानों की एकमात्र आवाज बनने का मौका मिलता ही नहीं और ये तीनों गांधी के साथ खड़े होते. लेकिन काल जिन पन्नों को पलट देता हैउन्हें फिर कौन खोल सकता है.   

इसके बाद की कहानी एकदम सीधी-सपाट है. उसे मुख्तसर में मैं ऐसे सुना सकता हूं : 

विभाजन टालने की अपनी कोशिश में गांधी सबसे पहले नये वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन के दरवाजे पहुंचे. उनके पास माउंटबेटन से न कहने को बहुत कुछ थान शिकायत करने को. माउंटबेटन से सब कुछ जानने-समझने के बाद गांधी ने उनसे इतना ही कहा कि आप जो करना चाहते हैंउसमें जल्दीबाजी मत कीजिए. मुझे थोड़ा वक्त चाहिए. माउंटबेटन का जवाब एकदम सीधा था : मैं किसी जल्दीबाजी में नहीं हूं. मैं एक कैलेंडर के साथ यहां भेजा गया हूं. मुझे उसके भीतर सत्ता हस्तांतरण का काम पूरा करना ही हैफिर यह काम देश के विभाजन के साथ हो या विभाजन के बिनायह देखना आप सबका काम है. विभाजन के बिना हो तो मुझे खुशी होगी  ( यह वह झूठ था जिसे लगातार बोलते रहने की भूमिका माउंटबेटन को दी गई थी) लेकिन विभाजन ही रास्ता बचा हो तो मैं उधर जाने से भी पीछे नहीं हटूंगा. 

गांधी समझ गए कि यह पहला दरवाजा बंद है. 

अब उन्होंने पाकिस्तान का झंडा उठाए मुहम्मद अली जिन्ना का दरवाजा खटखटाया : आपको पाकिस्तान ही चाहिए न ! वह भी हो जाएगा… हम एक बार अंग्रेजों को यहां से विदा कर लें फिर आपस में बैठ कर बंटवारा भी कर लेंगे … 

जिन्ना साहब ने टका-सा जवाब दिया : नहींयह बंटवारा तो अंग्रेजों की उपस्थिति में ही हो जाना चाहिए. आप हिंदुओं का बहुमत है. हम दोनों के बीच अंग्रेज नहीं रहे तो पता नहीं आप लोग हमारा क्या हाल करेंगे

गांधी समझ गए कि यह दूसरा दरवाजा भी बंद है.

अब वे अपने जवाहर व सरदार के दरवाजे पहुंचे: एक रास्ता है जिससे विभाजन तत्काल टल सकता है… आप दोनों माउंटबेटन से कहें कि वे भारत की सत्ता जिन्ना साहब को सौंप दें तथा जिन्ना साहब केवल लीग के लोगों को ले कर अपनी सरकार बनाएं. कांग्रेस बाहर से लीग की सरकार का समर्थन करेगी. 

राम माधव ने इस प्रसंग का जिक्र तो किया है लेकिन साथ में अपनी टिप्पणी भी जोड़ी है : “ नेहरू व पटेल ने इसका कड़ा विरोध किया.” यह तथ्य वे कहां से निकाल लाए प्यारेलालजी की जिस किताब, ‘द लास्ट फेज’ या पूर्णाहुति’ का बड़े अनमने ढंग सेअपने मतलब से राम माधव ने जिक्र किया हैउसमें ऐसा कुछ तो नहीं लिखा है. 

यह कहानी थोड़ा पीछे से शुरू होती है. 1 अप्रैल 1947 को गांधी ने अपना यह विचित्र प्रस्ताव’ सबसे पहले निजी बातचीत में वाइसराय माउंटबेटन के सामने रखा. जिस विभाजन को कांग्रेस में चाहता कोई नहीं था लेकिन जिसके सामने सभी निरुपाय थेउसे पीछे ठेल करदेश को एक नई संभावना के सामने खड़ा करने की उनकी यह ठोस योजना थी. इस योजना में वे जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रहे थेऔर कांग्रेस को इस प्रस्ताव के लिए राजी करने की जिम्मेवारी भी ले रहे थे. 

निजी स्तर पर रखे गांधी के इस प्रस्ताव से माउंटबेटन के होश उड़ गए. उन्हें जिस विभाजन को साकार करने का जिम्मा दे कर यहां भेजा गया थागांधी उसमें पलीता लगा रहे थे. माउंटबेटन समझ गए और अपनी टीम से बातचीत में उन्होंने कहा भी कि गांधी का यह प्रस्ताव ऐसा है जिसे जिन्ना आसानी से मना नहीं कर सकेंगे. उन्होंने भारतीय नौकरशाहों की अपनी टीम को समझाया कि गांधी के इस प्रस्ताव के खिलाफ माहौल बनाना हमारा पहला काम है. लंबे समय से साम्राज्य के आकाओं के साथ काम कर रहे वी.पी.मेनन को माउंटबेटन ने इस अभियान की कमान सौंपी. वी.पी. मेनन ने एक गुप्त दस्तावेज तैयार किया : गांधी की योजना के संदर्भ में हमारी रणनीति ! 

  मेनन सरदार के खास सलाहकार थे. सरदार लीग के साथ कैसा भी नाता रखने के प्रबल विरोधी तथा विभाजन के प्रस्ताव के पीछे मजबूती से खड़े थे. सरदार को अपने पाले में करने के पीछे इन्हीं मेनन को लगाया गया. जिस सुबह गांधी ने माउंटबेटन से अपनी योजना बताई थीउसी दोपहर हम मेनन को सरदार के साथ बैठा पाते हैं. इसके बाद पटेल-माउंटबेटन की मुलाकात भी हुई. 5 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन के साथ दोपहर का खान खाने जिनको आमंत्रित किया गयावे थे नेहरू के परम मित्र कृष्ण मेनन. उन्हें नेहरू को संभालने का काम सौंपा गया. पूरी टीम की सम्मिलित कोशिश एक ही थी : किसी भी तरह गांधी-प्रस्ताव दम तोड़ दे. 

मौलाना आजाद से जब माउंटबेटन ने गांधी-प्रस्ताव का जिक्र किया तो उनके जवाब वे हैरान रह गए. मौलाना ने कहा कि ऐसी बात तो गांधी ही सोच सकते हैं और यह बड़ा उपयुक्त’ प्रस्ताव है : मुझे तो लगता है कि जिन्ना इसे कबूल कर लेंगे. माउंटबेटन के लिए आफत और बड़ी हो गई. 

9 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन ने जिन्ना के सामने यह प्रस्ताव रखा लेकिन गांधी के प्रस्ताव के रूप में नहींअपने प्रस्ताव के रूप में : मेरा सपना ही समझिए इसे ! मैं चाहता हूं कि भारत की केंद्रीय सरकार प्रधानमंत्री जिन्ना के नेतृत्व में बने. माउंटबेटन ने इस मुलाकात के बारे में इस तरह लिखा है : … मेरे प्रस्ताव रखने के बाद जिन्ना लंबे समय तक मुझसे अपनी दूसरी बातें कहते रहे जैसे मेरे सपने वाली बात कहीं दर्ज ही नहीं हुई… फिर अचानक हीबिना किसी प्रसंग के बोले : तो आप मुझे भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं ! … उनके चेहरे की चमक से माउंटबेटन समझ गए कि यह बात कहीं उनके भीतर पहुंच गई है. यह चमकीली संभावना जिन्ना को भविष्य के बारे में सचेत कर गई हैयह माउंटबेटन ने साफ समझ लिया. उनकी आफत और बड़ी हो गई. वे कल्पना कर पा रहे थे कि यह प्रस्ताव जब गांधी के मुंह से जिन्ना सुनेंगे तो क्या आलम होगा.        

  अब हम उस तीसरे दरवाजे की तरफ लौटते हैं जहां गांधी सरदार और जवाहरलाल से अपने इस प्रस्ताव का जिक्र कर रहे हैं. माउंटबेटन को वे जो पहले ही बता चुके थेवही उन्होंने इन दोनों को भी बताया. दोनों में से किसी ने भी उसका मुखर विरोध नहीं किया लेकिन गांधी को यह समझते देर नहीं लगी कि उनका प्रस्ताव दोनों को रास नहीं आया. उन्माद के बल पर अपनी शर्तें  मनवाने का लीग का रवैयासांप्रदायिक दंगों व अंतरिम सरकार का कटु अनुभव दोनों को सावधान कर रहा था. उनमें लीग के प्रति गहरी हिकारत भरी थीतो आश्चर्य कैसा ! लेकिन इतिहास कई बार हमें ऐसी जगह ला खड़ा करता है जहां बड़ी संभावनाओं को साकार करने लिएअपना जहर ख़ुद ही पीना पड़ता है. गांधी के सामने सबसे अहम सवाल था कि विभाजन टाल करअंग्रेजों की चाल कैसे विफल की जाए. वे यह भी जान रहे थे कि अंग्रेजों के इस खेल में जिन्ना उनके खास मोहरे हैं. उस मोहरे को बेकाम करने का रास्ता भी उन्हें निकालना था. नेहरू-सरदार दोनों ने एक-सी ही बात कही: आप कह रहे हैं तो हम इसका विरोध नहीं करेंगे लेकिन यह प्रस्ताव ले कर हम देश के सामने नहीं आएंगे. यह काम आपको स्वयं ही करना होगा. और यह भी कि इसकी जो प्रतिक्रिया देश भर में होगीउसमें भी हम आपके साथ खड़े नहीं रह सकेंगे. वह दावानल भी आपको अकेले ही झेलना होगा. 

यह तीसरा दरवाजा इस तरह बंद हुआ. 

कांग्रेस पर अपने असर का उनका आकलन गलत साबित हो रहा था. किसी से भी उन्हें सहमति तो दूरसहानुभूति भी नहीं मिली. बस एक बादशाह खान थे जो चट्टान की तरह उनके साथ खड़े थे. जयप्रकाश मार्का समाजवादीजिन्हें गांधी चाहते भी थे और मानते भी थेजिन्हें वे साथ लेना भी चाहते थेवे सब विभाजन के विरोध में तो थे लेकिन गांधी के साथ नहीं थे. फिर भी गांधी तो गांधी थे. आसानी से हार कैसे मानते ! 

उन्होंने फिर नेहरू-सरदार को विश्वास में लेने की पहल की : तुम लोगों ने माउंटबेटन को विभाजन की स्वीकृति का वादा किया है तो मैं तुम लोगों से वादाखिलाफी करने को कैसे कह सकता हूं. तुम दोनों इतना करो कि माउंटबेटन से कहो कि हम अपने वादे से मुकरते नहीं हैं लेकिन हम गांधी की सहमति के बिना इससे आगे नहीं जा सकेंगे. आपको गांधी को तैयार करना होगा. उन्हें मुझसे बात करने दोमैं कोई रास्ता निकाल लूंगा ! गांधी इन दोनों से जो कोरा चेक मांग रहे थेवह तो इन दोनों ने कब का माउंटबेटन को दस्तखत कर के दे दिया था ! दोनों के पास गांधी को देने के लिए कोरे इंकार के अलावा अब बचा ही क्या था !  

इतिहास तेजी से गांधी को पीछे छोड़ता जा रहा था. 

तीनों दरवाजों का हाल जानने के बाद अब गांधी ने सारी परिस्थिति का अपना आकलन किया : आम तौर पर विभाजन के बारे में मेरी राय के साथ आज जनमानस नहीं है. क्या इस नाज़ुक वक्त में जन-भावना के खिलाफ जाने का अभियान मुझे चलाना चाहिए इस वक्त कांग्रेस का प्रमुख नेतृत्व भी मेरे साथ नहीं है. आज मैं जवाहरलालसरदारमौलानाराजेन बाबूराजाजी जैसा दूसरा नेतृत्व खड़ा करूंयह संभव नहीं है. मुसलमानों पर मेरा जो असर थावह भी आज नहीं रहा है. लीग उनसे मनमाना खेल करवा रही है. अंग्रेज किसी भी तरह विभाजन से पीछे हटेंगे नहीं. ऐसे में मैं किसी आंदोलन की बात देश के सामने रखता हूंतो देश की जनता को अंग्रेजों-लीगियों-कांग्रेसियों के तिहरे दमन की चक्की में पिसना होगा. कोई उनकी रक्षा के लिए सामने नहीं आएगा. मुझे यह भी दिखता है कि देश में आपाधापी का माहौल बनेगा तो संभव हैरियासतों को भारत के खिलाफ भड़का कर अंग्रेज आज की मुसीबत को गहरा कर दें. बाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों को एक साथ फट पड़ने का मौका देना अभी सही होगा ?  मैंने तो अपनी लाश पर बंटवारे की बात कही थीयहां तो निरीह लोगों की लाशें बिछ जाएंगी… यह सारा कुछ गांधी ने कभी स्वगतकभी पत्र मेंकभी चर्चा में अपनी तरह से कहा. जैसे हर लड़ाई में सेनापति परिस्थितियों का आकलन करता हैगांधी ने भी कियाजैसे हर सेनापति अपनी रणनीति में जरूरी बदलाव करता हैगांधी ने भी वैसा ही किया. उन्होंने लड़ाई का मोर्चा बदलने का निश्चय किया.

11 अप्रैल 1947 को उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखा : मैंने आपके सामने जो एक प्रस्ताव रखा था उस बारे में पंडित नेहरू से मैंने कई बार छोटी-छोटी चर्चाएं कींकल रात हम दोनों के बीच एकांत में लंबी बातचीत भी हुई. कांग्रेस कार्यसमिति के दूसरे भी कई सदस्यों से मेरी बात हुई. मुझे खेद है कि सिवा बादशाह खान के मैं इनमें से किसी को भी अपने प्रस्ताव के साथ जोड़ नहीं सका… इसलिए अब आप मुझे बाद कर के ही आगे की सोचें… अंतरिम सरकार में जो कांग्रेसजन हैं वे सब देश के तपे-तपाये सेवक हैं और उनकी राय ही कांग्रेस की आधिकारिक राय है… मैं अब बिहार जा रहा हूं… 

आगे-पीछे की बहुत सारी बातें छोड़ कर अब हम गांधी को बिहार जाने दें और यह समझने की कोशिश करें कि राम माधव ने जिसे वह उलझनजिसे अपने आखिरी दिनों में गांधी सुलझा नहीं सके’ कहा हैक्या वैसी कोई उलझन गांधी में आपको दिखाई देती है वे शुरू से अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे. विभाजन चाहने व करने वाली ताकतों का हर स्तर पर मुकाबला करते रहे. विभाजक ताकतों को सीधी चुनौती देते रहे. लेकिन इतिहास सीधी रेखा में चलता कहां है ! इसलिए नये रास्ते व नये मौके बनाने व पहचानने पड़ते हैं. 

गांधी ने कभी भी विभाजन का समर्थन नहीं कियातब भी नहीं जब उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति को संबोधित करते हुए कहा कि विभाजन का जो फैसला आपके नेताओं ने किया हैउसे स्वीकार कर लीजिए. यह विभाजन की स्वीकृति नहींबाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों के एक साथ फट पड़ने से देश को बचाने की उनकी कोशिश थी. गांधी उलझन में थे या दूसरे वे सभी जो विभाजन चाहते तो नहीं थे लेकिन इंकार भी नहीं कर पा रहे थेजो दिल से विभाजन चाहते तो थे लेकिन किसी दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने की चालाकी में लगे थे या जो विभाजन से अपनी स्वार्थ सिद्धि चाहते थेउलझन में थे गांधी से अपनी असहमति बताने वाले राम माधव या दूसरे कोई कभी यह क्यों नहीं बताते हैं कि उन्होंने विभाजन रोकने या टालने के लिए क्या किया संघ परिवार अपने प्रयासों के बारे में भी तो देश को कुछ बताए ! लेकिन वहां तो एकदम सन्नाटा है. 


06/02/26

                                                                                                                                     

 

जो कार्नी नहीं कह सके …

2026 में मैं अपनी बात 1948 से शुरू करूंतो आप एतराज तो नहीं करेंगे मैं भी क्या करूंऔर आप भी क्या करेंगे कि इतिहास इसी तरह हमारे साथ चलता हैऔर हम कहते हैं कि इतिहास स्वयं को दोहराता है !… 

वह 27 जनवरी 1948 की सुबह थी. सांप्रदायिक हिंसा की अकल्पनीय आग में झुलसतेअपने खास साथियों के बदले तेवर से आहतएकदम अकेले पड़ गए महात्मा गांधी बाजी पलटने की अपनी आखिरी कोशिश का नक्शा बनाने में लगे थे कि उस रोज सुप्रसिद्ध अमरीकी पत्रकार विन्सेंट शीन मुलाकात के लिए पहुंचे. गांधी के लिए शीन केवल पत्रकार होते तो उन्हें आज मिलने का वक्त न मिला होताक्योंकि गांधी हर तरह की मुलाकात से तब इंकार कर रहे थे. शीन गांधी के आत्मीय अध्येता भी थे. इसलिए गांधी ने उन्हें बुला लिया था. लेकिन आज शीन गहरी उलझन में थे. उनका व्यथित मन कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था तभी वे गांधी तक पहुंचे थे. जिस दूसरे विश्वयुद्ध का शीन ने गांधी से अलग जा करजी-जान से समर्थन किया थामित्र-राष्ट्रों के पक्ष में ख़ुद को झोंक दिया थाउसकी असलियत अब सामने आ रही थी जो बेहद कुरूप व डरावनी थी. 

“ लोकतंत्र को मजबूत बनाने के अच्छे उद्देश्य से जो विश्वयुद्ध लड़ा गयाउसका परिणाम इतना उल्टा क्यों आया ?  एक हिटलर का मुकाबला करने जो लोग निकले थेआज उनके भीतर से कितने ही छोटे-बड़े हिटलर पैदा हो गए हैं !” शीन का सवाल था.

“ सारा खेल साधनों का है !”, गांधी ने नि:शंक जवाब दिया, “ साध्य अच्छा होइतना काफी नहीं हैसाधन शुद्ध होंयह उससे भी ज्यादा जरूरी है. अशुद्ध साधन अच्छे साध्य को भी विकृत बना देते हैं.

“ क्या हर स्थिति मेंहर वक्त ऐसा ही होता है ?”

“ हमेशा ऐसा ही होता हैहोगाक्योंकि सत्य बदलता नहीं है.” 

यह 1948 की दिल्ली थीआज हम 2026 के दावोस में हैं. दोनों के बीच सिर्फ 78 साल का फासला नहीं है बल्कि यह भी है कि आज हमारे बीच कोई गांधी नहीं हैं. हम यहां गांधी को नहींकनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को सुन रहे हैं. वे दावोस के वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम में कह रहे हैं कि महाशक्तियों के वर्चस्व के खिलाफ हम दोयम शक्तियोंको इकट्ठा होना होगा. वे कह रहे हैं कि अमरीकी साम्राज्यवादी शक्तियों का मुकाबला करने की सशस्त्र ताकत नहीं होगी हमारी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे : “ वह देश जिसके पास अपनी ज़रूरत का खाना नहीं हैजिसके पास अपनी जरूरत की ऊर्जा नहीं हैजो अपनी रक्षा में स्वंय समर्थ नहीं हैउसके लिए आज की दुनिया में ज्यादा कुछ विकल्प है नहीं. जब अंतरराष्ट्रीय विधि-विधान आपका संरक्षण नहीं कर सकते तब आपको अपना संरक्षण स्वयं करना होता है.” 

यह संभवतः: पहला ही अवसर था जब नाटो के मंच सेकिसी यूरोपीय देश ने अमरीका का नाम ले करउसके वर्चस्व को ललकारा ही नहीं बल्कि उससे छूटने के लिए नाटो देशों के साथ आने की बात कही. स्वाभाविक ही था कि डोनल्ड ट्रंप कार्नी से खार खाए बैठे हैं और चीख रहे हैं कि अमरीका के बिना कनाडा एक बड़ा जीरो है जिसे हम उसकी औकात बता देंगे ! यह अंतरराष्ट्रीय संवाद की नई भाषा है. हम भारतीय तो 2014 से ही ऐसी भाषा के आदी हो गए हैं. 

आगे चलने से पहले हम इतिहास का एक दूसरा पन्ना भी पलटते चलते हैं. तब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था. तथाकथित मित्र-राष्ट्रों ने विजेता की भूमिका में दुनिया की कुंडली लिखनी शुरू कर दी थी. वे देशों के मनमाना विभाजन किए जा रहे थाअरबों की धरती पर बंदूक का हल चला कर इसराइल की खेती की जा रही थी. ऐसे वक्त में जवाहरलाल नेहरू नाम का एक आदमी सामने आया. उसने कहा था कि हम महाशक्तियों के इस खेल में किसी की तरफ नहीं हैं. हमारा रास्ता तीसरा है. तटस्थ राष्ट्रों का हम अपना संगठन बनाएंगे. महाशक्तियों के निर्दयी अंतरराष्ट्रीय खेल के बीच यह परम साहस की सोच थीअंधेरे में लगाई एक वीरतापूर्ण छलांग थी. कोई जवाहरलाल ही ऐसी पहल कर सकता थाक्योंकि उसने गांधी की छाया में सांस ली थी. 

नेहरू के आवाज उठाई तो साथ आ जुड़े इंडोनेशिया के सुकार्णोंमिस्र के गमाल नासेर. फिर तो यह बात रफ़्तार पकड़ गई और एक वक्त 120 देश इसमें शामिल हुए. यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो भी साथ आ खड़े हुए. रूसी व अमरीकी खेमा कौतुक से इस नई शक्ति के उदय को देखता रहा. जवाहरलाल ने 120 देशों की तरफ से कहा कि हम वे हैं जो अपना रास्ता ख़ुद बनाते हैं. लेकिन यह साहसी पहल धीरे-धीरे बिखरने लगीक्योंकि सवाल सिर्फ राजनीतिक तटस्थता का नहीं थासवाल तो शक्ति की पूरी अवधारणा का था. शक्ति की अवधारणा वैसी ही हो जैसी महाशक्तियों की हैतब तटस्थता सधती नहीं है. साध्य व साधन के विवेक की जो बात गांधी शीन को समझा रहे थेजवाहरलाल न उसे समझ सकेन समझा सके. आज तटस्थ राष्ट्रों की वह सारी परिकल्पना ढह चुकी हैतो इसलिए कि तटस्थ राष्ट्रों के मानक भी महाशक्तियों जैसे ही थे. इसलिए हम यह शोकांतिका भी देखते हैं कि तटस्थ राष्ट्रों के मलबे में से एक-के-बाद एक तानाशाह या एकाधिकारी शासक उभर आए. नासेरसुकार्णोएंक्रूमाटीटो आदि सबने सत्ता अपनी जेब में रखी ली. अपवाद रहे केवल जवाहरलाल जो तटस्थ कितने रहे यह विवाद का विषय है लेकिन लोकतंत्र को सीने से लगाए रहेइसकी गवाही इतिहास भी देता है.  

मार्क कार्नी क्या यह समझ पाते हैं कि तटस्थता का यह पूरा भव्य दर्शन क्यों विफल हुआ इसलिएसिर्फ इसलिए कि जवाहरलाल समेत सारे तटस्थ नेताओं की आंखों में सपना तो यही था कि हम अमरीका या रूस जैसे कैसे बनें. जवाहरलाल अपने भारत के लिए अमरीका-रूस की एक विचित्र-सी खिंचड़ी बनाने में व्यस्त थे. यहां भी हाल वैसा ही है. कार्नी के कनाडा समेत नाटो के सभी देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आज तक अमरीकी त्रिशूल भांजते चले हैं. अमरीका से ज्यादा अमरीकी बनने की होड़ में इन देशों ने वह सब किया जो अमरीका ने चाहा. वे लुटेरी अमरीकी राजनीति के सिपाही बने रहेलूट में हिस्सेदारी करते रहे. कनाडा तो जी-7 के उस क्लब का सदस्य रहा जो सारी दुनिया में पूंजी के बल पर अट्टहास करता रहा है. यह बात अलग है कि आका जितनी छूट देता थाइन्हें उतने से ही संतोष करना होता था. जंगल का एक सच यह है कि शेर अपना शिकार खा कर जो बचा-खुचा छोड़ देता हैभेड़िए और सियार उसका भोग लगाते हैं. इसलिए कार्नी ने यह नहीं कहा कि मध्यम शक्तियों’ को शक्ति की नई परिभाषा बनानी होगी तथा उसका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पालन भी करना होगा. कार्नी ने यह नहीं कहा कि सारा यूरोप अमरीका का उच्छिष्ठ खाता रहा है. उन्होंने दुख भरे शब्दों में यह जरूर कहा कि हम मध्यम शक्ति’ वालों ने गलत क्या-क्या किया लेकिन यह नहीं कहा उन गलतियों से बचने के लिए अब कनाडा क्या-क्या अलग करेगा हम देख ही तो रहे हैं कि उसी ट्रंप की कृपादृष्टि पाने की कोशिशें आज भी चल रही हैं.

बोर्ड ऑफ पीस का जो नया पासा ट्रंप महाशय ने फेंका हैउसे लपकने वालों की कमी नहीं है. यह नया नाटो हैयह नया संयुक्त राष्ट्रसंघ बनाने की चालाकी है इस सावधानी के साथ कि अब कोई अमरीकी सत्ता को ( ट्रंप को !) आंख न दिखा सके. इसलिए ट्रंप ने घोषणा की है कि बोर्ड अॉफ पीस का अध्यक्ष अमेरिका का राष्ट्रपति नहींडोनल्ड ट्रंप हैं जिन्हें कोई हटा नहीं सकता है. उन्होंने यह भी बता दिया है कि आज जो भी इस बोर्ड की सदस्यता लेंगे वे केवल 3 सालों के लिए सदस्य रहेंगे. स्थायी सदस्यता उन्हें ही मिलेगी जो सदस्यता के पहले वर्ष में ही अमरीकी खजाने में 1 बीलियन डॉलर की फीस नकद भरेंगे. जिस बोर्ड अॉफ पीस की आधी-अधूरी परिकल्पना ट्रंप महाशय ने सिर्फ गजा के संदर्भ रखी थीअब सारी दुनिया उसके दायरे में आ गई है. जब ट्रंप का दावा सारी दुनिया में युद्ध रुकवाने का है तो वे उसकी कीमत सारी दुनिया की स्वायत्तता को अपनी मुट्ठी में कर के क्यों न वसूलें !  

भारत ने तो देश-दुनिया के उन सारे सवालों के बारे में मौन धार लिया है जिनके बारे में कोई नैतिक भूमिका न लें आप तो उसे राजनीतिक चातुरी नहींराजनीतिक कायरता या अवसरवादिता कहते हैं. इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आज भारत की कोई हैसियत नहीं है याकि जैसा ट्रंप बार-बार साबित करते रहते हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय विदूषक भर रह गया है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया की जो बंदरबांट चली हैउसका आधार रूसी व अमरीकी गुटों का निहित स्वार्थ रहा है. अब रूसी गुट जैसा कुछ बचा नहीं है. इधर के दिनों में रूस-चीन गुट-सा जो दिखाई देता हैवह अमरीकी गुट से डरे पुतिन-जिनपिंग की चालबाजी भर है. जो एक-दूसरे से भयभीत होंजैसे उनकी साझेदारी संभव नहीं है वैसे ही जिनका एक-दूसरे पर रत्ती भर भरोसा न होउनकी साझेदारी भी संभव नहीं है. चोरों की साझेदारी भी इसलिए निभती है कि वे एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं. 

ले-दे कर बच रहा था अमरीकी खेमा जिसके साथ नाटो थापाकिस्तान भी जिसे नमस्कार करता थाहिंदुस्तान तो घुटनों पर ही थाइसराइल तथा ऐसे ही दूसरे मुल्क भी थे जिन्हें अॉक्सीजन के लिए अमरीका की तरफ देखना पड़ता था. ट्रंप ने इन सबमें पलीता लगा दिया. यह पागलपन नहीं है. अमेरिका फर्स्ट’ का शंखनाद हो कि मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का उद्घोष हो ( विश्वगुरू !)दोनों कहते यही हैं कि दुनिया में दूसरा कोई भी ऐसा न बचे कि जिसकी गर्दन तनी रहे. इसलिए ट्रंप हैंइसलिए अमरीका है. 

हम ऐसे अमेरिका के सामने हैंऔर हमें उसके साथ अपना रिश्ता सुनिश्चित करना है. नरेंद्र मोदी के भारत ने तय किया था कि ट्रंप के कंधों पर बैठ कर भारत को बड़ा दीखना है. वह सारी फूहड़ डिप्लोमेसी आज सड़क किनारे धूल खाती पड़ी हैक्योंकि ट्रंप जैसों को अपने कंधों की बराबरी का कोई देश नहीं चाहिए. इसलिए कार्नी हों कि मैक्रोंन कि खुमैनी कि दूसरे कोईहर किसी को अंतिम तौर पर समझ लेना चाहिए कि छोटा अमेरिका बनने की हसरत न पालेंक्योंकि बड़े ट्रंप साहब को ऐसी बराबरी सख्त नापसंद है. 

कार्नी मध्यम शक्ति’ की जिस नई भूमिका की बात करते हैं वह अपना रास्ता गढ़ने की बात है. लेकिन इसमें एक पेंच है. अपना रास्ता दूसरों को दबा या कुचल कर न बनाया जा सकता हैन उस पर चला जा सकता है. अपनी पसंद का रास्ता बनाने व उस पर चलने की कीमत अदा करनी पड़ती है जिसे गांधी साधन की शुद्धता’ कहते हैं. जो साधन की शुद्धता की  कीमत अदा करने को तैयार नहीं होते हैं उन्हें ट्रंप के अंगूठे के नीचे जीने की आदत बना लेनी चाहिए. ( 27.01.2026)