Saturday, 5 September 2026

15 अगस्त 1947 : 20 जुलाई 2026

तो जंतर-मंतर अब भी मोदी सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है. 1 सितंबर को सारे देश के देखा कि सर्वोच्च न्यायालय में सरकार घुटनों पर थी और कॉकरोच जनता पार्टी के युवा कमर सीधी करबदलता भारत देख रहे थे. देश ने इतना ही नहीं देखा बल्कि यह भी देखा कि इस नये भारत ने एक तरफ इन युवाओं का हाथ पकड़ रखा था तो दूसरी तरफ 62 साल की वकील वृंदा ग्रोवर का हाथ भी पकड़ रखा था. इतिहास जेनजी की उम्र नहींपरिवर्तन की जेनजी वाली आत्मिक तड़प को दर्ज करता है. जन्मवर्ष नहींजन्मकर्म आपका चारित्र्य निर्धारित करता है. हमने देखा कि अपनी सफलता के इस चरम पल में वृंदा ग्रोवर भी उतनी ही शालीन विनम्रता से खड़ी थींजितनी शालीन विनम्रता से सौरभ दासरत्ना सिंह आदि खड़े थे. इतिहास आज भी विनम्रता की शक्ति को पहचानता है. 

     इतिहास अपनी अनंत यात्रा में कभी-कभी गहरे मोड़ लेता है;  और उस मोड़ के साथ ही वह पिछला सब कुछ पीछे छोड़ करनई दिशा में प्रयाण कर जाता है. फिर उस मोड़ से पहले की किसी भी बात काकिस रवायत काकिसी तर्क का कोई संदर्भ नहीं रह जाता है. वहां से एक अलग ही यात्रा शुरू हो जाती है. जो ज़हीन व गहरे अर्थ में स्वतंत्रचेता मुल्क होते हैंवे इतिहास के साथ इस नई यात्रा पर निकल पड़ते हैं. कुछ लोगसमाज का एक कोई वर्ग यह नहीं कर पाता है. वह फॉसिल्स बन जाता है और इतिहास को पीछे खींचने की कसरत में दरिद्र से दरिद्रतर होता जाता है. यह मनुष्य-मात्र की वह सांस्कृतिक यात्रा है जिसमें जो छूटा वह बूरा ! 

   अगर आपका हाल आंख के अंधे नाम नयनसुख’ वाला न होतो आप भी देख-समझ रहे होंगे कि 20 जुलाई 2026 के बाद देश बदल रहा है. भाषा बदल रही हैतेवर बदल रहे हैं. पिछले 12 सालों में देश ऐसा बना दिया गया था कि सभी चोर-चोर मौसेरे भाई वाला खेल खेलने में लगे थे. सरकार गुंडों का सरताज बनी आएं-बाएं-साएं कुछ भी किए जा रही थीबाकी गुंडों की बारात में शामिल भीड़ भर बन कर आराम फरमा रहे थे. सारी संवैधानिक संस्थाएं- न्यायपालिकाकार्यपालिकाकैगचुनाव आयोगसीबीआईइडी,इंकम टैक्स आदि-आदि सभी नौकरशाही के पुर्जे बन करगणेश आरती का थाल घुमाते हुए खुश थे कि हम भी इस तस्वीर में हैं तो ! सबसे ख़ुश था फौज-पुलिस-प्रशासन तथा मीडिया के नाम से अपना धंधा चलाने वाले कारपोरेट ! हर चारित्र्यविहीन सत्ता इनके बल पर ही जीती है. 

   फिर कुछ हुआ - जंतर मंतर पर कोई मंतर हुआ और सारा आलम ही बदल गया. हैट से खरगोश निकालने से भी बड़ा कोई जादू हुआ. 20 जुलाई 2026 को देश भर से आए युवाओं की पिटाई हुई. बेरहम व गैर-कानूनी पिटाई-ठुकाई-गोली-गाली सब हुई युवकों की लेकिन उनकी हर मार के निशान उभरे गृहमंत्री की पीठ परप्रधानमंत्री की फैशनस्टेटमेंट देती कोमल काया पर ! एक दिन के कुछ घंटों में कोई दानवी प्रशासन ऐसा पिलपिला हो जा सकता हैयह कौन सोच सकता था. फिर हमने देखा कि जंतर मंतर पर पिटने वाले लड़के के सामने घुटनों के बल बैठी सरकार ! इस्तीफा ही नहीं हुआनाक भी रगड़नी पड़ी. 

    अब वे ही लड़के देश का एजेंडा तय कर रहे हैं. वे कह रहे हैं : स्कूल ठीक करोहम देखने आ रहे हैं ! वे सच में देखने पहुंच भी रहे हैं. हर स्कूल वहां की सरकार को नंगा कर जा रहा है. वे पूछ रहे हैं : जवाबदेही किसकी है जिसकी है वह आगे आए व स्कूल को बच्चों के पढ़ने लायक बनाए ! उन पर हमले हुए हैंसरकारों ने उनको धमकियां दी हैंसरकारी दल ने गुंडों के झुंड उन पर छोड़ दिए हैं. लेकिन अपूर्व धीरज व अतुलनीय साहस के साथ वे स्कूल ठीक करो !’ का जाप करते अपना कार्यक्रम आगे बढ़ा रहे हैं. वे चुनाव आयोग से पूछ रहे हैं कि आपको इवीएम में ऐसी निजी दिलचस्पी क्यों है?; वे एथनॉल मंत्री से पूछ रहे हैं कि चीनी का दाम इस तरह बढ़ा है तो मिठास आप तक कैसे पहुंची?;वे गोदी मीडिया से पूछ रहे हैं कि सीधा-सच्चा समाचार लोगों तक पहुंचाने का धंधा बंद करआपने चरणवंदना का यह जो नया धंधा शुरू किया हैइसका लाइसेंस अलग से लिया क्याकाग़ज़ दिखाओ या फिर मीडिया के नाम से जैसी सहूलियतें बटोरते आ रहे होवह सब वापस करो ! अचानक हम देख रहे हैं कि पिछले 12 सालों से झाल-मंजीरा ले कर बाराती बने जो फिर रहे थेवे सब कपड़े बदलने लगे हैं : “ ये घोषणा हो चुकी है मेला लगेगा यहां पर/ हर आदमी घर पहुंच कर कपड़े बदलने लगा है !

    सर्वोच्च अदालत को याद हो आया है कि उसका काम सत्ता का रास्ता बुहारना नहींसंविधान नाम की किताब की धूल झाड़ना है. पुलिस एफआईआर दर्ज भी करने लगी है व युवकों पर दर्ज अपनी मनमाना एफआईआर की वापसी के लिए गिड़गिड़ाने भी लगी है. पीएम केयर का वैसा ही शर्मनाक खुलासा हुआ है जैसा चुनावी बांड का हुआ था. तब चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बहुत चीप हरकत की थी. अब हर तरह की चीप हरकत कर चुके चीफ जस्टिस सूर्यकांत असमंजस में पड़े हैंक्योंकि अब यहां से नीचे जाने की गुंजाइश नहीं है. 

   बदलना बहुत कुछ है लेकिन जो बदला हैबदल रहा है वह बहुत बड़ा है. अब सरकार कोनौकरशाही कोदूसरी सभी संवैधानिक संस्थाओं को याद रखना चाहिए कि वे 20 जुलाई 2026 के बाद के हिंदुस्तान में है जिसमें 19 जुलाई 2026 वाला कुछ भी नहीं चलेगा.  

   15 अगस्त 1947 के बाद भी इतिहास ने एक ऐसा ही निर्णायक मोड़ लिया था. अब उस सारी बातोंतर्कोंबहसोंअवधारणाओं का कोई संदर्भ है ही नहीं जो14 अगस्त 1947 तक जेरे-बहस थीं. 1947 की हमारी संविधान सभा दलीय आधार पर बनी आज की संसद से कहीं अधिक जहीन व राष्ट्रमन की प्रातिनिधिक संस्था थी जिसने कोई तीन साल लंबे विमर्श के बाद आजाद देश के आजाद मनउसकी आजाद पहल तथा उसकी पसंद के आजाद रास्तों की दिशा खोजी थी. तब भी असहमतियां थींबहुमत-अल्पमत तक बात पहुंचती थी लेकिन सबके सामने चुनौती एक ही थी : राष्ट्रमन को सहमति के बिंदु तक कैसे लाया जाए. फिर आया संविधान जिसने इन सारे प्रयासों को एक दिशा दे दी. रास्ता खोजने की आजादी सबको मिली लेकिन दिशा तय कर दी गई. बहुमत से बनी संसद को सब कुछ करने की आजादी मिली लेकिन संविधान का बुनियादी चरित्र बदलने की आजादी उसे भी नहीं दी गई. जैसे संविधान का बुनियादी चारित्र्य नहीं बदल सकते हैं आप वैसे ही संविधान सभा द्वारा निर्धारित दिशा से अलग या उलटी दिशा में आप नहीं जा सकते हैं. 15 अगस्त 1947 ने सबसे कह दिया - संसदन्यायपालिकाकार्यपालिका और सब तरह के मीडिया से कह दिया कि अपनी मर्यादा समझो और उसका पालन करो. गांधी ने बलिदान दे कर उस पर अपनी मुहर लगा दी.   

   मनुस्मृति में क्या अच्छा हैकम अच्छा है या एकदम बुरा हैयह सारी बहस संविधान सभा में होती रही लेकिन अंतिम निर्णय यह हुआ कि आजाद भारत में मनुस्मृति का कोई संदर्भ होगा ही नहीं. यह हिंदू-मुस्लिम-सिख-पारसी-ईसाई की भावना का सवाल नहीं रहाआजाद हिंदुस्तान में मनुस्मृति का संदर्भ ही समाप्त हो गया. इसका मुर्दा ढोने की इजाजत 15 अगस्त 1947 के बाद किसी को नहीं है - राहुल गांधी भी उसका संदर्भ ले कर नाहक की बात छेड़ रहे हैं. जातीय आधार पर खड़गेजी की बात तो छोड़िएकिसी का भी शुद्धिकरण नहीं किया जा सकता हैक्योंकि आजाद भारत में कोई अशुद्ध है ही नहीं. हमारी न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है कि वह ऐसे हर मामले का स्वत: संज्ञान ले और संवैधानिक अपराध का मुकदमा दायर करे. जो किसी भी स्तर परकिसी भी तर्क से उसका समर्थन करे उसे भी संवैधानिक अपराधी घोषित करे.   

   राष्ट्रभाषा कातिरंगे काराष्ट्रगान कामनुस्मृति काछूआछूत काजमींदारी का देशी रियासतों के विलय काश्रमिक अधिकार आदि का सवाल आज बहस का सवाल नहीं रहा. लंबी बहस व खींचतान के बाद संविधान सभा ने इसे एक निष्कर्ष पर पहुंचा दिया है तथा संविधान ने उसे स्वीकृति दे दी है. इसलिए हमारे लिए वंदे मातरम् का पहला दो बंद ही अस्तित्व में है. बंकिम बाबू ने कबक्या सोच कर उसके नये बंद लिखेयह साहित्य के विद्यार्थी चाहें तो पढ़ेंदेश के लिए वह अर्थहीन है. भारत मां के सौंदर्य का आल्हादित करने वाला पहला दो बंद ही है जो राष्ट्रगीत के रूप में मान्य है. 

   रवि बाबू ने जन गण मन उतना ही थोड़े लिखा था जितना हम राष्ट्रगान के रूप में मान्य करते व गाते हैं ! वह भी लंबा हैऔर मैं ऐसे संस्थानों को जानता हूं जो उसे पूरा-का-पूरा गाते हैं. वे कविता की दृष्टि से गाते हैंतो गाएं लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि संविधान ने जिसे मान्य किया हैउतना ही जन गण मन हमारे लिए संदर्भ रखता है. किसी लोकसभा को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने बहुमत के बल पर नया राष्ट्रगान हम पर थोप दे. जिस तरह संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदल सकते आपउसी तरह राष्ट्रमन में बहते अनेकता के प्रवाहों को एकता की डोर से बांधने की संविधान की दिशा को आप अवरुद्ध नहीं कर सकते. न्यायपालिका ऐसी ही निगरानी के लिए ही बना रखी है हमने. वह अपना दायित्व पूरा करने में विफल होगी तो जन गण मन का भाग्यविधाता आगे बढ़ कर अपनी भूमिका निभाएगा. सरकार कोसंसद कोन्यायपालिका कोकार्यपालिका व मीडिया को यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि जिस भाग्यविधाता ने अपने संविधान द्वारा आप सबकी रचना की हैउसे यह जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी विफल संरचनाओं को ठीक करेबदले या कुछ दूसरा ही रच दे. 

   यही लोकतंत्र का असली मतलब हैयही उसकी अंतर्निहित शक्ति है.  गांधी इसी शक्ति को संयोजित करने में अंतिम सांस तक लगे रहेआज जेनजी इसी शक्ति का अहसास हमें करा रहा है. ( 02.09.2026)

Wednesday, 12 August 2026

लूट की यह योजना किस ‘अमित शाह’ ने बनाई

   यह सरकार मार पड़ने पर इस्तीफे ही नहीं देती हैघमंड में उठाया अपना क़दम भी वापस लेती है. सौजन्यता नहीं है इसके पासइसलिए माफी नहीं मांगती है. यूपीआई भुगतान के बारे में टेढ़ा मुंह बना कर जो सारा शुल्क हम पर दे मारा था अभी-अभी इसनेजब चौतरफा मार पड़ी तो उसे वापस ले लिया लेकिन कुछ इस तरह जैसे कुछ हुआ ही न हो ! 

   सारा देश पूछ रहा है कि जंतर-मंतर पर पुलिसिया हैवानियत का आदेश किसने दिया था जवाब कोई नहीं दे रहा है. इस सरकार के एक सत्वहीन मंत्री की बात को यदि थोड़ा बदल कर कहूं तो इस सरकार में जवाब नहीं दिए जाते हैं. एक मंत्री लगा रखा है भाई लोगों नेसंसदीय कार्यमंत्रीजो रोज अपनी भी और पार्टी की भी किरकिरी करवा रहा है लेकिन एक वाक्य में यह नहीं बता पा रहा है कि देश का गृहमंत्री कहां गायब है. छोटा-सा प्रश्न जवाब न मिलने से बड़ा-से-बड़ा होता जा रहा है और कल तक जो सरकार 56 इंच की बनी फिरती थीक्षुद्रतर होती जा रही है. 

   देश की अर्थमंत्री निर्मला सीतारमन से जितने अनर्थ करवाए जा रहे हैंउनकी अब गिनती करनी भी हमने छोड़ दी है. हमने गिनना छोड़ दिया हैलेकिन निर्मलाजी ने गलतियां करना थोड़े ही छोड़ा है ! सो एकदम ही अर्थहीन हो चुकी संसद में उन्होंने टैक्सेशन एंड अदर लॉस (एमेंडमेंट) बिल पेश कर दिया. सरकार को पता था कि इस पर कोई बहस नहीं होगीक्योंकि विपक्ष जब इस सरकार के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रहा हैतो वह इसके कारनामों पर बहस क्यों करेगा !

   डॉक्टर लोहिया ने कहा था: जब सड़कें सूनी हो जाती हैंतब संसद आवारा हो जाती है. इसी वजन की एक दूसरी बात भी कही जा सकती है : जब संसद गूंगी हो जाती हैतब लोक बोलने लगता है. वह बोल रहा है और इतनी जोर से बोल रहा है कि सरकार ने अपने कान व दिमाग बंद कर लिए हैं. इसलिए मैं यह सवाल उठा रहा हूं कि निर्मलाजी ने यह जो बिल पेश कियाइस बिल का जनक कौन है वे स्वयं नहीं हैंयह तो मैं जानता हूं. लेकिन हर उपभोक्ता कोहर स्तर पर कैसे निचोड़ा जाएइसकी यह काइयां योजना वित्त मंत्रालय के किस अधिकारी ने बनाई थीमैं यह जानना चाहता हूं. मैं जानना चाहता हूं कि इस योजना का अमित शाह’ कौन है क्या निर्मलाजी बताएंगी या उनके भीतर भी कोई किरण रिजूजू जाग गया है जो बहुत बोलेगा लेकिन मतलब का एक जवाब नहीं देगा ?

   यह बिलजो अब कानून बन गया हैकहता है कि यूपीआईरूपे या डेबिट कार्ट या ऐसी किसी भी माध्यम से आप जो भी भुगताने करेंगेउसकी फीस भी आपको चुकानी पड़ेगी. उस पर अब यह लीपापोती की जा रही है कि इसे या उसे फी नहीं लगेगीएकदम मुफ्त रहेगा यह. लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा सीधी बात कह रहे हैं कि इन सारी प्रक्रियाओं का खर्च तो आता ही हैखर्च आता है तो भुगतान भी किसी को तो करना ही होगा! संजय मल्होत्रा साहब से मेरा सवाल इतना ही है कि आप जिसे किसी को’ कह कर पतली गली से निकल जाना चाहते हैंवह हम ही क्यों हैं 

   ईमानदारी की बात यह है कि बैंकों का यह सारा जंजाल आपने खड़ा किया है. हम तो अपनी थोड़ी-बहुत आय और बहुत सारे खर्च का संतुलन बिठाते-बिठाते ही दोहरे हुए जा रहे थे. जो थोड़ा-बहुत अगली फ़सल या ज़रूरत के लिए बचा पाते थे वह घर में ही रखा रहता था. बैकों का यह सारा जाल आपने बुना ताकि हमारे घर में बचे-रखे पैसों तक भी आपकी पहुंच बन सके. पैसों से पैसे बनानापैसों वालों तक पैसा पहुंचाना आपकी योजना थीहमारी नहीं. हम अपना पैसा लेकर बैंकों में आ जाएंइसके लिए कितनी कसरत की आपने ! तरह-तरह प्रलोभन दिए आपनेहमें सुरक्षा व व्याज का लालच दिया. हमारा पैसा हमारे देश के विकास में लगाया जाएगायह प्रलोभन भी कम नहीं था. हम फंसते गएआप फंसाते गए. फिर भी हमारा रिश्ता आमने-सामने का था. हम नियमित बैंक जाते थेआमने-सामने बैठ कर अपना काम निबटाते थेअपने पासबुक में अपना पैसा दर्ज करा कर लौटते थे. 

   हमने कहां कहा कि हमें कोई तकलीफ है! आपने ही कहा कि हम आपकी तकलीफ़ कम करना चाहते हैं. अब आपको पासबुक ढोना नहीं होगाहम आपको स्टेटमेंट भेजेंगे. फिर वह स्टेटमेंट कागज से इलेक्ट्रोनिक कर दिया आपने. हमसे पूछा भी नहीं कि भाईआपकी इलेक्ट्रोनिक पहुंच है भी कि नहीं हम चुप रहेक्योंकि तथाकथित आधुनिकता दूसरा कुछ करे या न करेडराती बहुत है. आपने बैंकों का अपना महल खड़ा करना शुरू किया और हमें किनारे करने लगे. हम यह देख तो रहे थेसमझ कम पा रहे थे. आपने हमारा सारा पैसा अपनी मुट्ठी में कर लिया. ऐसा हाल कर दिया आपने कि हम अपना पैसा निकालना चाहें तो आपका रवैया ऐसा होता है जैसे हम खैरात मांग रहे हैंकि किसी दूसरे का पैसा उड़ाने की फिक्र में हैं हम. काउंटर के उस तरफ बैठा आदमी कब आदमी नहींमशीन बन गयाहम पहचान नहीं सके. अब वह बात नहीं करता हैफॉर्म थमाता है. वह हमेशा ही चाय पीनेमोबाइल पर बतियाने या लंबे लंच पर रहता है जबकि हम कतार में लगा दिए जाते हैं. हमने यह भी देखा कि बैंकों की सूरत संवरती जा रही हैउनका मकान ऊंचा व चमकदार होता जा रहा है. वेतन-भत्ता बढ़ाने की अंतहीन मांगें व बैंकों के हड़ताल पर जाने का नजारा भी हम देखते रहे. 

   फिर हमने देखा कि आपने हमें जितने भी प्रलोभन दिए गए थेवे एक-एक कर वापस लिए जाने लगे. हमें अपना ही पैसा किश्तों में मिलने लगाहमारे ही पैसों में विभिन्न कारणों से कटौती की जाने लगीफिर हमसे बिना पूछेमीनिमम बैलेंस की तलवार हमारे ऊपर चलाई गईफिर कहा गया कि पैसे चेक से निकालते हो तो उस चेक की कीमत भी आपको देनी होगीकि आप दिन में इतनी बार ही पैसा निकाल सकते होअपने पैसे का ड्राफ्ट बनवाया तो उसकी क़ीमत अलग से देनी होगी. आपने सूदखोरी पर कानूनी बंदिश लगाई ताकि सरकारी सूदखोरी निर्बाध चल सके. 

   हमने कहां मांगा था कि हमें एटीएम मशीन लगा दो आपने लगाईहमारी सुविधा के लिए नहींअपनी कमाई बढ़ाने के लिए. उस मशीन से आपने अपना किराया बचायाआदमी रखने का खर्च बचाया. जब हमने आपकी यह मनमानी क़बूल कर ली तो आपने धीरे से उस मशीन का पैसा वसूलना शुरू कर दिया. बैंकों की व्याज-दर कम-से-कम होती गईऔर आप हमारे ही पैसों से खुले बाजार में सट्टा खेल-खेल कर करोड़ों-अरबों बनाने लगे. आपने इतनी इंसानियत भी नहीं दिखाई कि जिसके पैसों पर ऐश कर रहे होउसे अपनी कमाई में हिस्सेदारी भी दें. बैंक अधिकारियों के लगातार बढ़ते वेतन-भत्ते देखोउनकी दूसरी सारी सुविधाएं देखोउनमें कदम-कदम पर पनपता भ्रष्टाचार देखो और फिर हिसाब लगाओ कि बैंक खाताधारकों के हित में हैं कि सत्ता के लिए दुधारू गाय हैं तुम आसानी से समझ सकोगे कि यह सत्ता व संपत्ति का भयंकर गठजोड़ है. 

   फिर एक सुबह किसी क्षद्मधारी ने घोषणा कर दी कि आज से नकद खरीद-भुगतान बंद करोइलेक्ट्रोनिक विधि अपनाओ. नहीं भाई नहींहमें नकद खरीद-फरोख्त में कोई परेशानी नहीं थी. तुम्हें थी कि तुम हम पर वैसा काबू नहीं कर पा रहे थे जैसा तुम चाहते थे. हमारा पैसा व हम आजाद रहेंइससे तुम्हें परेशानी थी. तुमने अपने पंजे में हमारा सब कुछ समेट लेने के इरादे से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान हम पर लाद दिया. यह भी हमने निभाया. अब निर्मला बहन कह रही हैं कि आपको इस सुविधा की कीमत भी देनी होगी. कैसी सुविधा कोई हमें समझाए कि हमारे पैसों की भीख आपने मांगी थीआपने देश के विकास की कसमें खाई थींआपने कहा था कि इन पैसों से सट्टा नहीं खेलेंगेआपने कहा था कि आप जब चाहेंगे अपना पैसा निकाल सकेंगेआपने कहा था कि हम आपके पैसे पर व्याज भी देंगे. वह सब हवा हो गया. हमारा पैसा आपकी मुट्ठी में हर तरह से बंद होता गया. अब आप उस मशीन का पैसा भी हमसे वसूल रहे हैं जिसकी हमने मांग भी नहीं की थी ! 

   तुम अपनी सुविधाएं सब वापस ले लोहमारा पैसा सारा हमें लौटा दो और फिर दिखाओ हमें पैसा कमाने की अपनी कला ! तुम्हारा निकम्मापन तो ऐसा है कि अपनी एक योजना भी ठिकाने से बना-चला नहीं सकते होतुम्हारे बनाए भवन व पुल व रास्ते सब बनते नहीं हैं कि धराशाय़ी हो जाते हैं ! ठेकेदारों पर कभी-कभार जुर्माना तो होता हैठेकेदारों के ठेकेदार पर कभी जुर्माना हुआ है आज तक किसी एक सरकार ने भी अपने ऐसे निकम्मेपन का हर्जाना सार्वजनिक कोष में जमा किया है कहां से करोगे कि तुम्हारे पास एक धेला भी ऐसा नहीं है कि जो हमारा नहीं है. तुम्हारा अस्तित्व हमारे वोट से हैतुम्हारा वैभव हमारे नोट से है. और तब निर्मला बहन किसे आंखें दिखा रही हैं जब सारी नकदी अपनी मुट्ठी में करनी थी तब रात के अंधेरे में नोटबंदी की महामूर्खता कीजब मध्यम रोजगार-धंधे को खत्म कर व्यापार-धंधे पर एकाधिकार करना था तब जीएसटी का काला क़ानून लाद दिया. लेकिन निर्मला बहन को मालूम हो कि न मालूम होपैसों से झूठ बोला जा सकता हैपैसा कभी झूठ नहीं बोलता है. वह आज फिर यह सच बोल रहा है कि देश के अर्थतंत्र पर निर्मला बहन व उनके भाइयों का कोई काबू नहीं है. वह ऐसी कटी पतंग है जो कभी डॉलर तो कभी रूबल की तरफ़ उड़ती है और दोनों उसे जब चाहें लूट लेते हैं. यह कोई अर्थतंत्र हुआ क्या ?

   बात यहां पहुंच गई है. यूपीआई से भुगतान हम करें या न करेंजवाब आपको देना ही होगा कि इस योजना का अमित शाह’ कौन है ? ( 11.08.2026)

Friday, 31 July 2026

जेन-झी सुनो !

   मैं, जो अब उम्र की 76वीं सीढ़ी पार करने जा रहा हूं, नहीं जानता हूं कि यह जेन-झी  क्या है ! अगर यह गणित का वैसा ही अर्थहीन खेल है जैसा इसे बतलाया जा रहा है, तो मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है. कुंडली बांचनेवाले, रेखाओं से भविष्य बतलानेवाले, सितारों व ग्रहों का हिसाब लगा कर भूत-भविष्य तय करनेवाले खेल मुझे खेल से ज्यादा कभी कुछ लगे ही नहीं. इसलिए कौन, कौन से वर्ष-खंड में पैदा हुआ है, इससे उसका जेनरेशन तय करनेवाला खेल भी मुझे मतलब का नहीं लगता है.  

   मैं उम्र का फर्क समझता हूं. मैं ताज़ादम शरीर की कीमत जानता व मानता हूं. मैं जानता हूं और मानता हूं कि तुमजो मुझसे 50-60 वर्ष बाद पैदा हुए होमुझसे ज्यादा दौड़ सकते होहवा में उड़ सकते होशिखर से छलांग मार सकते होबादलों में जा सकते होचांद-सितारे छू सकते हो. यह सब कभी मैंने भी किया हैआज भी ऐसा करने की हसरत रखता हूं. लेकिन कर नहीं सकताक्योंकि हमारा हो कि तुम्हारायह शरीर है तो एक मशीनऔर हर मशीन की तरह इसकी एक एक्सपायरी डेट भी है. कारखानों की मशीनों की एक्सपायरी डेट उस पर लिखी आती है. यहां मजा यह है कि हमारी एक्सपायरी डेट है तो ज़रूर ही लेकिन हममें से किसी को उसका पता नहीं है. इसलिए फिर हमारे हाथ में बच रहता है उमंग से भरा मनसंकल्प से भरा दिल और सपनों से भरी आंखें ! अगर जेन-झी से तुम्हारा मतलब इन सबसे है तो मैं तुम सबके बराबर और तुम सबके साथ जेन-झी हूं. 

   मैं उस महात्मा गांधी से प्रेरित हूं जिसने 80 साल की उम्र तक - यानी गोली से मारे जाने तक - अपने सपनों के हर हत्यारे से अथक लड़ाई कीऔर जब मारा गया तो भी उसने इस तरह मौत को गले लगाया कि सारी दुनिया ने सर झुका कर यही कहा कि जीना भी ऐसा ही होमरना भी ऐसा ही. अभी-अभीतुम्हारे आसपास से ही एक आवाज उठी जो मैंने सुनी. वह कह रही थी : जेन-झी यानी जेनरेशन गांधी ! यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारे साथ हूंमुझे साथ ले लो ! 

   मैं जंतर-मंतर पर लगातार था और तुम लोगों को खुलते-खिलतेरचते-मिटातेनाचते-गातेअपने सपनों को साझा करते देख रहा था. मैं तुम्हारी गति भी देख रहा थातुम्हारी कल्पनाशीलता भी. मैं अनशन की तुम्हारी दृढ़ता भी देख रहा थातुम्हारा संयम भी. मैं इन सबको जोड़ कर कहूं तो कहूंगा कि मैं नया भारत देख रहा था. इस भारत में कुछ फिसलन भी थीलड़खड़ाहट भीकुछ बेढ़बपना भी थाकुछ अनगढ़ता भी ! मैं भी तो इन सबके साथ ही जीता-बढ़ता आया हूं. यह हमारे साथ चलनेवाली परछाईं है और मुझे अपनी परछाई कभी भी बोझ नहीं लगती है. तुम सब मुझे मेरे जैसे ही लगते हो. हम सबको समझना इतना ही है कि जो अनावश्यक हैअसंस्कृत हैकुरूप हैहमें ऊपर उठाता नहींनीचे खींचता हैउन सबसे मुक्ति पानी है. जैसे सांप केंचुल छोड़ता है नवैसे ही इन सबको हमें छोड़ते चलना है. यह आसान नहीं है लेकिन इसके बिना कल्याण भी नहीं है. इसलिए बोलने-लिखने-गाने-नारे लगाने तथा संवाद करने में हर फिसलन से हमें बचना है.  

   अब हम जंतर-मंतर से बाहर आते हैं. वहां तुम सबने क्या-क्या कियावह गाथा इतिहास दर्ज कर चुका है. वह उसे दोहराता भी रहेगा. हम क्यों दोहराएं ! वह भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णिम अध्याय है. तुम्हारी बोली से किसी सत्ता का अहंकार टूट गया है. वह औचक देख रही है कि यह आंधी आई कहां सेऔर वह किसी शिकारी कुत्ते-सी सूंघ रही है कि यह किधर जा रही है. जब सत्ता-प्राप्ति अंतिम सत्य बन जाती है तब अहंकार बारूद का काम करता हैऔर बारूद है तो वह फटेगा ही ! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक आदमी का इस्तीफा नहीं हैसत्ता के अहंकार के टूटने की गूंज है. वह टूटा यह अच्छा हुआ. लेकिन तुम याद रखना कि चोट खाया सांप ज्यादा ख़तरनाक होता है. राष्ट्र जब भीड़ में बदल दिया जाता है तब वह हत्यारा हो उठता है जिसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. देशप्रेम व राष्ट्रवाद दो सर्वथा भिन्न भाव ही नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के विरोधी भाव भी हैं. 

   इसलिए सुनो जेन-झीअब तुम्हें तोड़ने के सारे संभव तीर चलाए जाएंगेसारे हथकंडे अपनाए जाएंगे. तुम्हारे साथी खरीदे-बेंचे जाएंगेतुम्हारे सामने जेन-झी  की एक नई जमात खड़ी कर दी जाएगी. तुम आसानी से देश भर में न घूम पाओगेन जी पाओगे. राजनीतिक दलों का जंगल तुम्हारे सामने खुला है ताकि तुम उनमें से किसी में अंटक-भटक जाओ. हर जगह तुम्हारे सामने एक जंतर-मंतर होगा जो सवाल करेगा व जवाब भी पूछेगा. इसलिए निजी जीवन में साफ व संयमित रहो. एक-दूसरे से जितना संभव होसंवाद बनाओ. लगातार-लगातार देश भर के अपने युवकों के बीच जाओ. अपने बीच की खाइयां पाटो. याद रखो कि प्रतिवाद में सारा कुछ नकारात्मक चल भी जाता हैपरिवर्तन का आंदोलन नकारात्मक भीसकारात्मक भीरचनात्मक भी और दूरगामी भी- ऐसे सारे तत्वों का एक पुंज होता है. हमें वह पुंज तैयार करना है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआधर्मेद्र प्रधानों के इस्तीफे होते भी रहेंगे लेकिन तंत्र पर लोक की - जेन-झी  की !- पकड़ कैसे बने व बनी रहेइसका जवाब हमें खोजना हैसिद्ध करना है. अगर हम यह कर सके तो दुनिया भर का लोकतंत्र हमारा ऋणी रहेगा.

   क्यूबा के अमर क्रांतिकारी चे ग्वुवेएराजिनकी तस्वीर तुम्हारे टी-शर्टों पर मैं देखता रहा हूंवे जब भारत आए और गांधी को थोड़ा जाना-समझा तो राजघाट जा कर लिखा कि क्रांति का एक तरीका यह भी हैयह तो हम जानते ही नहीं थे ! इतिहास तुम्हें  ऐसा कहने का अवसर नहीं देगाक्योंकि तुम चे के बहुत-बहुत बाद पैदा हुए हो. तुम्हारे पास जानकारियों की अत्यंत कुशल व व्यापक तकनीक है. इसलिए हमें विचार-संपन्न होना होगा. दूसरी विपन्नताएं चल भी जाएंगीविचारों व विकल्पों की विपन्नता नहीं चलेगी. 

   जब तुम जंतर-मंतर से निकल कर अपने घरों में पहुंचोगे तो पाओगे कि अपना घर भी धर्मेंद्र प्रधानों से भरा है. हमें घर-घर में उनका मुकाबला करना है. वहां जेन-झी है ही नहीं. गांधी ने धुर 1948 में कहा था न कि मुझे अब जो लड़ाई लड़नी है वह साम्राज्यवाद से लड़ी लड़ाई से भी ज्यादा दुर्धर्ष होगीक्योंकि यह अपनों से है. तुम्हें भी अपने हर घर मेंहर कमरे में यह लड़ाई लड़नी होगी. इसके बिना सफलता होगी नहींटिकेगी नहीं. इसलिए घर में फैली व फैलाई जा रही हर संकीर्णता से मुखर होकर- अपनों के सामने सत्याग्रह करो  ! 

   घर से बाहर आओगे तो समझ सकोगे कि पिछले कोई पंद्रह सालों में इस सरकार ने योजनापूर्वक भारतीय राष्ट्र की तमाम सांस्कृतिक-शैक्षणिक-सामाजिक-बौद्धिक व्यवस्थाओं में उसी सांप्रदायिक संगठन के लोगों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया है जो नैतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से देश के सबसे विपन्न लोगों का हिंसक जमावड़ा है. इनसे कदम-कदम परहर स्तर पर लड़ना होगा. हमें सीखना होगा कि गांधी ने इन्हें कैसे भारतीय समाज के चित्त से करीब-करीब बाहर ही कर दिया था. इसी बौखलाहट में इन्होंने उनकी हत्या की थी. इसलिए इनसे अंतिम लड़ाई हम पर उधार है.   

   नीट व दूसरी परीक्षाओं का पेपर लीक किसी चूक की वजह से नहीं हुआ है. जब सारा देश एक धंधे में बदल दिया जाता है तब हर कुछ बिकता है- परीक्षाएं भीपेपर भीराम मंदिर व दूसरे तमाम धर्मों के प्रतीक-स्थलों का चढ़ावा भीनौकरियां भीरोज़गार भीन्याय भीसपने भी ! सोचो नजब सरकार ही बिकाऊ विधायकों व सांसदों से बनाने का नया फ़ैशन चलाया गया हैतब क्या है जो बाज़ार में नहीं हैबिकाऊ नहीं है 

   तो लड़ाई यहां है जेन-झी ! लड़ोगे न जो नहीं लड़ेगा वह गणित से भले जेन-झी कहलाएहोगा वह कायर ! तो जेन-का और जेन-झी में से चुनना है तुम्हें ! ( 31.07.2026)

Thursday, 9 July 2026

बात एक जुगनू की !

    अंधकार जब बेहद घना होता है तब जुगनू भी रास्ता दिखाने लगते हैं. जुगनू इसलिए बहुत अच्छे व जरूरी होते हैं, क्योंकि वे सूरज की बाट नहीं जोहते; अंधकार है तो जुगनू हैं और वे अंधकार को चुनौती देने से चूकते नहीं हैं. इंसानों में रोशनी की आस बनी रहे, जुगनू इसलिए ही होते हैं. जुगनू पल-पल में दमक कर बताते रहते हैं कि निराश होने से बेहतर है कि रोशनी की तरफ़ देखो, क्योंकि रोशनी का एक मतलब आशा भी होता है. 

   आज मैं बार-बार जुगनू की बात क्यों कर रहा हूं इसलिए कि हमारे बीच एक जस्टिस माधव जयाजीराव जमादार हैं जिनके हाथ में एक संविधान है. जस्टिस जमादार हमारी दिशाहीन व अंधेरी न्यायपालिका के जुगनू हैं. 

   हमारी अदालतों का यह हाल है कि वे क्या कहती हैंकिससे कहती हैं और उनके कहे का क्या होता हैयह देखना उसने छोड़ दिया है. समाज ने भी अदालत की तरफ़ से मुंह फेर लिया है. समाज समझता है कि जो चमकता नहीं है वह जुगनू नहींएक फतिंगा है. अदालत कहती रहती है कि जमानत नियम हैजेल अपवाद हैउसी अदालत ने पिछले पांच से अधिक सालों से उमर ख़ालिदसरजील इमाम आदि को जेलों में बंद कर रखा है. न मुकदमा शुरू होता हैन सुनवाई होती हैन उन्हें ज़मानत दी जाती है. वे जेल के अंधेरे में बंद हैं तो सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद के रचे अंधेरे में डूबा है. यह समाज को कॉक्रोच मानता है और उससे जितनी दूरी संभव है उतनी बनाए रखता है और हर संभव तरीके से सत्ता की मदद करता है. आज से 106 साल पहले महात्मा गांधी ने अदालतों के बारे में एक निष्कर्ष हमारे सामने रखा था : “ अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं.” हमारे न्यायविदों ने गांधी के इस कथन में एक संशोधन कर लिया था : अदालतों की नहींऔपनिवेशिक अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं. लेकिन ये लोग कितने गलत साबित हो रहे हैं ! औफनिवेशिक और लोकतांत्रिक अदालत में चरित्रत: कोई भेद बचा ही नहीं है.  

   मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस जामदार ने अभी-अभी मुंबई में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह कहा जो इस देश की अदालतों को 2014 के बाद कई-कई बार कहना चाहिए था. 2014 से पहले भी कहना चाहिए था. लेकिन तब राहत यह थी कि अदालत नहीं बोल पाती थी तो समाज बोलता थासमाज चूकता था तो अदालत बोलती थी. लेकिन 2014 के बाद योजनापूर्वक इन दोनों को चुप कराया जाने लगा और आज हालत यह है कि इस देश में सिर्फ एक ही आदमी है जो मन की बात कर सकता है. बाकी सबको बता दिया गया है कि आपका मन और आपकी बात अपने तक रखिएवरना … 

   जस्टिस जामदार ने इससे इंकार कर दिया. वे बोले और एकदम साफ बोले : देश को एक सरकार का ग़ुलाम बनाने की मुहिम चल रही है और पुलिस उसे साकार करने में जुटी है. पुलिस यह भूल गई है कि वह जनता की सेवक हैकिसी सरकार या उसके नेताओं की नहीं. उन्होंने पूछा कि सरकार की मुखालफत करनाविरोध प्रदर्शन आयोजित करनानरेंद्र मोदी या अमित शाह के लिए मुर्दाबाद के नारे लगाना आदि कब से व कैसे अपराध हो गया उन्होंने मुंबई पुलिस को कठघरे में खड़ा कर पूछा कि सैयद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी को किस संवैधानिक धारा के तहत आपने तड़ीपार या जिलाबदर करने का आदेश दिया 

   बात यह थी कि वहीद साहब ने सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी बना रखी है और वे सरकार से जब भीजिस भी मुद्दे पर असहमत होते हैंउसका खुलासा करने सड़कों पर उतर आते हैं फिर बात नागरिकता क़ानून की हो या बाबरी मस्जिद की या ज्ञानव्यापी मंदिर में नमाज़ पर रोक की. वे अपनी पार्टी के बैनर से अपना विरोध दर्ज कराते हैं. अब तक किसी भी पुलिस थाने में ऐसा एक मामला भी दर्ज नहीं है कि वहीद साहब के प्रदर्शन में तोड़-फोड़ हुई हो कि हुल्लड़बाजी हुई हो. वे इतने बड़े नेता नहीं हैं कि इतने बड़े हंगामे आयोजित करवा सकें. वे मुसलमान हैं तो मुसलमानों के सवाल उठाते हैंऐसा एतराज़ उठाने वालों को बताना चाहिए कि आज कौन है कि जो अपने समुदाय या अपने वोटबैंक से बाहर के सवाल उठाता है भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक से बाहर का हिंदुस्तान पहचानती नहीं है सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि वह कहती भी है कि उसे मुस्लिम वोट की ज़रूरत ही नहीं है. इसलिए पूछना जरूरी हो जाता है कि मुंबई पुलिस को वाहिद साहब से एतराज क्यों है दरअसल एतराज़ मुंबई पुलिस को नहींपुलिस को अपनी निजी सेना मानने वाले सत्त्ताधारियों को है. वे जानते हैं कि असहमति की आवाज को ज़मीन पर मौका मिला तो वह आसमान छा लेती है. इसलिए वे हमेशा सावधान रहते हैं कि असहमति की आवाज कहीं से उठेउसे उठने से पहले ही दबोच लेना है. उसने यह विभाग पुलिस को सौंप रखा है कि वह सबको डरा कर रखे. सत्ता के खेत-खलिहान में पुलिस का इस्तेमाल आज बिजूका की तरह किया जा रहा है. पुलिस-तंत्र अपने इस अशोभनीय इस्तेमाल के बारे में चूं भी नहीं करता है. 

   जस्टिस जामदार ने जैसे ही पुलिस-तंत्र को कठघरे में खड़ा कियासारे देश में उनकी बात की गूंज उठी. पता नहीं कि कितने दिनों बाद किसी जज ने संविधान की बात इस तरह उठाई कि एक कोई लिखित दस्तावेज है जिससे किसी भी लोकतांत्रिक संरचना को बाहर जाने की इजाजत हम नहीं दे सकते ! संविधान के सामने सर झुका करसंविधान का सर झुकाने का खेल इतने समय सेइतनी तरह से खेला जा रहा है कि संविधान हास्यास्पद बन कर रह गया है. न्यायपालिका संविधान देख कर नहींसत्ता का मुंह देख कर बोलती है. वह जितना ज्यादा बोलती हैउतनी ही गूंगी हुई जाती है. 

   जामदार साहब ने इस अशोभनीय चलन पर ऊंगली उठाई है. उन्होंने जो कहा है वह एकदम सामान्य संवैधानिक बात है. कोई भी सरकार अपनी फौज-पुलिसइडी-आईटी-सीबीआई-कैग-यूएपीए आदि-आदि की मदद से नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हाथ नहीं डाल सकती हैक्या यह हमारी प्राथमिक कक्षा की किताबों में नहीं लिखा है जो बच्चों को पता हैवह मुंबई पुलिस का पता नहीं है उसके लिए जस्टिस जामदार को आगे आना पड़ेतो यह मुंबई पुलिस के लिए डूब मरने की बात है. उसे कितने पानी में डूब मरना चाहिएयह हम नहीं बताते हैं. यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह अपने पतन की सजा स्वंय ही तय करे. 

   लेकिन जस्टिस जामदार के सवाल की जद में ख़ुद उनकी न्यायपालिका भी आती है जो विधायिका-कार्यपालिका के साथ गणेश आरती करती तो मिलती हैसंविधान पढ़ती नहीं मिलती है. राम मंदिर में लूट या डकैती की जैसी अपमानजनक वारदातें होती रही हैंक्या अदालत भी उस अपराध की भागीदार नहीं है संविधान को बाजू रख करभगवान के निर्देश से जिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की सबसे ऊंची कुर्सी के पीछे छिप कर यह मंदिर बनवायाक्या उनसे नहीं पूछना चाहिए कि मंदिर में चल रहे इस घोटाले के बारे में उनके भगवान का क्या निर्देश है न्यायपालिका जब संविधान को छोड़ कर किसी दूसरे की आरती उतारने लगती है तब वह उसी लोकतंत्र का गला घोंटने लगती है जिसने उसे जन्म भी दिया व विशेषाधिकारों से नवाजा भी है.  जस्टिस जामदार दूसरों से ऊंगली भर ऊंचे नज़र आते हैंतो इसलिए कि उन्होंने फिर से भगवान को नहींसंविधान को बहस के केंद्र में ला दिया है. हमारा संविधान ही हमारी न्यायपालिका का भगवान है. जिन्होंने दूसरा कोई भगवान खोज लिया हैउन्हें न्यायमूर्ति की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए. हमें आश्वस्ती मिलती हृै जब हम पाते हैं कि अंधश्रद्धा और अंधभक्ति के इस दौर में जस्टिस जामदार जैसे लोग भी हैं जो सिर्फ हैं नहीं बल्कि जिंदा भी हैं- जुगनू की तरह ! 

   वसीम बरेलवी साहब ने इसे ही लक्ष्य कर कहा है न : “ उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है / जो जिंदा हो तो जिंदा नज़र आना जरूरी है. ( 09.07.2026)    

Monday, 29 June 2026

लोकतंत्र का एंकाउंटर हो रहा है

 बिहार की राजधानी पटनापटना से निकट भोजपुरअौर भोजपुर का नया चर्चित चेहरा भरत तिवारी ! कहानी की तरह जो बात हर कहीं कही व छापी जा रही हैवह कुछ यूं है कि कुछ लोग भरत तिवारी को अपराधी करार दे रहे हैंकुछ उन्हें रॉबिनहुड का अवतार बता रहे हैं. लेकिन इन सारी अावाजों व शोर के बीच जो बात उभर ही नहीं पा रही है वह है राज्य द्वारा नागरिकों का शिकार !. इसे एनकाउंटर कहिए या फेक एनकाउंटर कहिएहत्या कहिए या शिकार कहिएसच्ची व ठोस हकीकत यह है कि एक कोई भरत तिवारी नाम का युवक था कि जो पुलिस के काबू में नहीं आ रहा था. पुलिस ने अात्मसमर्पण के बाद उसे घेर करखुले आसमान के नीचे  गोली मार कर काबू में कर लिया. पुलिस के मुताबिक जो अपराधी थावह नहीं रहा तो कहानी तमाम होती है. लेकिन क्या सच में कहानी तमाम होती है ? 

         2005 का गुजरात ! सारा देश सोहराबुद्दीन शेख नाम के आतंकी के एंकाउंटर की कहानी से गूंज रहा था. तब आलम ऐसा बनाया गया था मानो अातंकियों का कोई अंतरराष्ट्रीय गैंग है जिसने गुजरात में अपनी तमाम ताकत झोंक दी है. वहां से पुलिस-अातंकवादियों के मुठभेड़ की रोज एक-न-एक कहानी सामने अाती ही थीअौर कमाल यह था कि हर कहानी के अंत में अातंकवादी’ मारे जाते थेपुलिस को खरोंच तक नहीं आती थी. ऐसा कैसे होता है कि जान लेने की पूरी तैयारी से आए अातंकवादी ताश के पत्तों से ढह जाते थे पुलिस लाशें गिनती थीप्रशासन उनका प्रदर्शन करता था अौर कहता था कि सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी इनके निशाने पर थी. हमने उसका काम तमाम कर दिया. अाज सोहराबुद्दीन शेख व एनकाउंटर के ऐसे तमाम मामले अदालतों में गहरे शक के घेरे में हैंअौर कई मामले ऐसे भी हैं कि जिनमें अदालत ने तथाकथित अपराधियों को निर्दोष बता दिया है. 

         आतंकी कार्रवाईयों का चरम था मुंबई बमब्लास्ट उस केस में भी सालों मुकदमे के बाद भी पुलिस-प्रशासन अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका कि वह जिन्हें अातंकवादी या अातंकीषड्यंत्र का सफरमैना कह रहा हैउसमें सत्य व तथ्य हैं. वर्षों जेल में रहने के बाद एक-एक कर वे सभी निरीह लोग रिहा होते गए जिनका जीवन बर्बाद हो चुका था. क्या ये सब निर्दोष थे कौन कहे पुलिस ने किसी को ऐसा कहने लायक़ नहीं छोड़ा ! लेकिन यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि पुलिस की अपनी भूमिका पर अदालत को गहरा संदेह है. 

         हैदराबाद का 2019 का वह मामला याद कीजिए जब वहां की पुलिस ने लोगों का दिन-दहाड़े एंकाउंटर किया था अौर कारण यह बताया था कि ये अपराधी पुलिस से उसका हथियार छीन करउस पर हमला करने की कोशिश में थे. पुलिस ने बड़ी वाहवाही लूटी कि उसने ऐसे दुर्दांत अपराधियों का काम तमाम कर दिया. बाद में इस कहानी के दूसरे पन्ने खुले अौर खुलते चले गए. अाखिरी पन्ना यह कहता है कि जिस तरह इन अपराधियों का काम तमाम किया गयाउसे पुलिसिया गुंडागर्दी कहना चाहिए. अांध्रप्रदेश हाईकोर्ट की यह टिप्पणी किसी भी पुलिस संगठन को सर उठा कर चलने देगी क्या जिसमें वह कहती है कि पुलिस वर्दीधारी गुंडों की जमात है ?     

          हमारा संविधान कहता है कि आप इस तरह किसी की कहानी तमाम नहीं कर सकते ! फिर संविधान अागे कहता है कि पुलिस का काम अपराध की रोकथाम करना है अौर जो अपराधी बेकाबू हो जाए उसे गिरफ्तार करन्यायालय में ला खड़ा करना है ताकि न्यायालय उसे संविधान के मुताबिक सजा दे सके. अदालत ने जो सजा दीउसके साथ उस व्यक्ति को जेल तक पहुंचा देना पुलिस का काम है. संविधान इससे अधिक या इससे आगे पुलिस की किसी भूमिका को मान्य नहीं करता है. लेकिन यहीं एक पेंच खड़ा होता है कि संविधान ही यह भी कहता है कि अात्मररक्षा  में किसी की जान चली जाएतो उसे सामान्य अपराध नहीं माना जाएगा है. संविधान की इसी धारा की अाड़ में वह सारी मनमानी चलती है कि जिसे हम यहां एंकाउंटर या फेक एंकाउंटर या पुलिस-अपराधी मुठभेड़ कह रहे हैं. 

         ऐसा जाली मुकाबला सरकार व नागरिकों के बीचसंविधान व उसकी बनाई एजेंसियों के बीच भी इन दिनों ख़ूब चल रहा है. एसआईआर इसका सबसे ख़तरनाक उदाहरण है. संविधान को बाजू करजब अाप निहत्थे नागरिकों को घेर करउनका तमाम कर देते हो तब इसे लोकतंत्र का एंकाउंटर कहते हैं. अाप देखिए कि यहां बंदूक़ चुनाव आयोग के हाथ में हैट्रिगर पर अंगुली सत्ताधारियों की है अौर संविधान न्यायपालिका के काले लबादे की जेब में धरा घुट रहा है.  

         संविधान या ऐसे तमाम दस्तावेजों की एक दिक्कत है — उनके शब्द और उनके हेतु के बीच एक खाई है. शब्द व अर्थ  के बीच ऐसी खाई हर जगह है और यह एकदम स्वाभाविक भी हैक्योंकि शब्द हमेशा बेजान होते हैं. शब्द जो कहना चाहते हैंवे तभी पूरी तरह कह पाते हैं जब कोई उन शब्दों को आचरण में उतारता है. शब्द आचरण में उतरते ही बला के शक्तिवान हो उठते हैं. लेकिन जब अाप शब्दों को अाचरण से दूर कर देते हैं तो वे बेजान व अर्थहीन हो जाते हैं. मसलनसंविधान ने कहा कि पुलिस अपराधी को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा करेयही उसका काम है. न अागेन पीछे. अब पुलिस भी जानती है अौर हम भी जानते हैं कि अपराधी हाथ बांध कर तो सामने आएगा नहीं कि लो पुलिस भाईहम यहां खड़े हैं, अाअो अौर अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी पूरी कर लो ! वह भागेगाधोखा देगाधमकी देगाकभी हमला भी कर सकता है लेकिन पुलिस को अपनी संवैधानिक भूमिका यदि याद हैतो वह ऐसी तमाम कोशिशें को नाकाम करते हुएबगैर उत्तेजित होते हुए उसे घेरती रहेगीबांधती-साधतीनिरुपाय करती रहेगी. चूहा-बिल्ली का यह खेल लंबा नहीं चल सकता हैक्योंकि अपराधी या अातंकी हमेशा कमजोर पिच पर खेलता होता है व उसका बल्ला भी खोखला होता है. नियमतः चलने वाली पुलिस के पीछे सारा देशपूरे-का-पूरा संविधान खड़ा होता है. तो अंततः वह अपराधी टूटेगा हीइधर वह टूटाउधर पुलिस को अपना काम पूरा करने का मौका मिला. इसमें जितना वक्त लगेगापुलिस को जितना धैर्य रखना पड़ेगावह संविधान के पालन की कीमत है. लोकतंत्र की यह कम-से-कम क़ीमत है जिसे सबको अदा करनी चाहिए. पुलिस अपनी विफलताभ्रष्ट अाचरणअपने ऊपर के अधिकारियों के अहं की तुष्टि याकि सत्ताधीशों के स्वार्थ को पूरा करने का अौजार बन जाती है तब एंकाउंटर वाला रास्ता खुलता है.  

         वह स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली हिदायत याद रखें हम कि भले कई अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निरपराध को सजा नहीं मिलनी चाहिए. यह हिदायत अपराधियों को नजरंदाज करने या उन्हें किसी तरह की छूट देने की बात नहीं करती है. यह बताना चाहती है कि अपराधी व निरपराधी के बीच एक अत्यंत पतली लकीर होती है जिसे कोई पार न कर जाएइसकी सावधानी प्रशासन कोसरकार को रखनी ही चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो समाज एक ऐसे जंगल में बदल जाएगा जिसमें हर शक्तिवान अपने से कम शक्तिवान का शिकार खेलेगा. हम ऐसे जंगल में रहना चाहते हैं कि समाज में इसके जवाब में अाप जो कहेंगे उससे निर्धारित होगा कि अाप लोकतंत्र के नागरिक हैं या किसी के पोशीदा हेतु को पूरा करने के अौजार ? ( 26.06.2026)