Friday, 19 June 2026

एक युद्ध जिसमें सभी पराजित हुए

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार भी मानते हैं और हमारे प्रधानमंत्री भी मानते हैं, तो मैं भी वही मान कर कह रहा हूं कि जब किसकी मान कर चलें यह पता न चलता हो तब डोनल्ड ट्रंप की मान कर चलना चाहिए. सो, डोनल्ड ट्रंप की मान कर मैं मान रहा हूं कि अमरीका-ईरान युद्ध समाप्त हो चुका है. ट्रंप ने सबको कह दिया है : अपने-अपने जहाज खोलो और तेल की धार बहने दो ! 

   इस खबर से अच्छी दूसरी कोई ख़बर इस वर्ष आई नहीं. जो इस अच्छी ख़बर को सुनने के लिए जिंदा नहीं बचे उनकी संख्या कोई बता सकता है आसमान से बरसती मौत के बीच जा कर यह कौन गिन सकता है कितनी लाशें बिछी पड़ी हैं ! महाभारत के मैदान में तोसूरज ढलने के साथ युद्ध की समाप्ति होती थी और फिर सब मैदान में मुर्दे समेटने व घायलों को चिकित्सा के लिए ले जाने उतरते थे. उनका शील था कि फिर सूर्योदय से पहले युद्ध नहीं होता था. अब हम सभ्य हो गए हैं तो हमारी दुनिया अपनी असभ्यता के प्रदर्शन का कोई वक्त नहीं मानती है. उसकी बनाई मौत कभीकहीं भीकहीं से भी बरस सकती है. इसलिए युद्ध के जो सारे आंकड़े हमें बताए जा रहे हैं वे उसी हद तक विश्वसनीय हैं जिस हद तक ट्रंप या मोदी या पुतीन या नेतन्याहू विश्वसनीय हैं. फिर भी एक अनुमान के मुताबिक इस युद्ध में 540 अमरीकी, 26इस्राइली मारे गए, 7,700 सैनिक व नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए. 

   अब बचता है ईरान जिसके आंकड़े कभी भी जाने नहीं जा सकते हैंक्योंकि वहां मौतें नहीं हुईंसमूल विनाश हुआ. वहां के सुप्रीम लीडर खामनेई सहित शासन के सर्वोच्च 40 लोग मारे गए. बाकी सारा ईरान धूल-धूल कर दिया गया. तो फिर हम क्या करें उन सब मारे गए नागरिकों-सैनिकों से सर झुका कर माफी मांगें - और हमारा सर शर्म से झुका होना चाहिए. शर्म इस बात का कि इस 21वीं सदी में भी दुनिया में कुछ दादा बचे हैं ऐसे कि जो कमजोर व निरीह राष्ट्रों का दिनदहाड़े बलात्कार करते हैं और हम निरुपाय दर्शक भर रह जाते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत वे सारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं आज कितनी नपुंसक व बांझ साबित हो रही हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने मानवमात्र की सौगंध खा कर बनाया था. आज अमरीका की स्वतंत्रता देवी अपने ही संविधान व संकल्प के फटे पन्ने ले कर बिसुर रही है.  

   ईरान जीत कर भी शांत है. वह किसी के सामने झुका नहीं है. अमरीका हार कर  भी अकड़ व धौंस दिखा रहा हैजबकि वह भूलुंठित है. अपराधहार व अपमान छुपाने के लिए ऐसी मुद्रा जरूरी होती है. ट्रंप का अमरीका ऐसा मान कर चला था कि युद्ध छेड़ना व जीतना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. ऐसे अहंकारियों के लिए यह समझना मुश्किल होता है कि समय के साथ दुनिया बदलती है. आज ट्रंप-काल में अमरीका जितना टुच्चा व खोखला हो गया हैउसे  दुनिया पहचान रही है. अमरीकी नागरिक जितनी जल्दी उसे पहचान लें व बदल लेंउतना ही भला होगा. आज वह हारा भर हैकल उसे पानी देनेवाला भी कोई नहीं होगा.  

   समझौते के जो 14 बिंदु सामने आए हैंवे अगर सच्चे हैं व अंतिम हैं तो वे अमरीका की चौतरफा पराजय की घोषणा करते हैं. एक अध्ययन बताता है कि 110दिन के इस युद्ध में कोई 170 लाख करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. अमरीका की 10 लाख करोड़ रुपयों की मिसाइलें  फुक गईंअरबों रुपयों की कीमत के 2 फ़ाइटर जेट गिराए गए.  खाड़ी देशों में बने अमरीका के 6 बड़े सैनिक अड्डेजिन्हें वह ईगल आई’ - गरुड़ की नज़र - कहता था तथा दावा करता था कि इससे वह सारी दुनिया की निगरानी करता हैतबाह हुए हैं. समझौते के मुताबिक अमरीका क्षतिपूर्ति के नाम से 28 लाख करोड़ रुपयों का हर्जाना ईरान को देगा और अमरीकी कंपनियों में लगे करीब 2.5 लाख करोड़ की ईरानी राशि को प्रतिबंध मुक्त करेगा. यह सब आत्मसमर्पण के बराबर है. 

   ईरान के सीमित संख्या के कमजोरपरंपरागत हथियारों ने कैसे अमरीका की अत्याधुनिक हत्यारी मशीनों को धूल कर दिया फौजी रणनीति के माहिर तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं. मैं कह रहा हूं कि हथियारों के पीछे बैठा आदमी जब अपनी लड़ाई के अौचित्य के बारे में नि:शंक होता है तो हथियार कई गुना ज्यादा मारक हो जाते हैं. लेकिन अपने युद्ध की नैतिक भूमिका जब उसे समझती नहीं है और वह अपराधी हत्यारे की भूमिका में ला खड़ा किया जाता हैतब न वह और न उसकी मशीनें काम कर पाती हैं. सच तो यह है कि युद्धमात्र बुरा होता हैमानवद्रोही होता है. लेकिन जब वह एक नैतिक डोर से बंधकर सामने आता हैतो नतीजा बदल देता है. अमरीकी सैनिकों-सेनापतियों को यही पता नहीं था कि आखिर हम लड़ क्यों रहे हैं ईरान का हर फौजी जानता था कि वह न्याय व अपने राष्ट्र  के स्वाभिमान के लिए लड़ रहा है. मुझे अक्सर याद आता है उस यूक्रेनी लड़की का कथन : “ रूस आज लड़ाई बंद कर देता है तो इस क्षेत्र में आज ही शांति आ जाती हैहम यूक्रेनी आज लड़ाई बंद कर दें तो हमारा आज ही विनाश हो जाएगा.” अस्तित्व व विनाश के बीच का चुनाव ही यूक्रेन को ताक़त देता हैवही ईरान को इतना अजेय बना रहा है. 

   दूसरी पराजय हुई खाड़ी देशों की. तेल की कमाई से धन्नासेठ बने ये सारे देश आज अपने ध्वस्त तेल-उद्योग के सामने सर धुन रहे हैं. युद्ध आज रुका है तो तल के इनके कुएं आज ही काम शुरू नहीं कर सकते. ऐसा भी नहीं है कि कल ही ट्रंप डॉलर ले कर हाज़िर हो जाएंगे. ख़ुद ही ख़ुद को अमरीका का उपनिवेश मान कर जी रहे ये देश अपनी दौलत व अमरीकी सरपरस्ती में जमीन से ऊपर ही चलते रहे थे. आज वे सब एकदम लुटे-पिटेईरान को ख़ुद से अंगुली भर ऊंचा पा रहे हैं. वे आज अपना यह विश्वास हारे बैठे हैं कि अमरीकी छाया तले वे सब सुरक्षित हैं. उनकी धरती पर अमरीकी सैन्य अड्डों का जो भग्नावशेष बचा है,  उसे समुद्र में तिरोहित करें कि नये सिरे से संवारेयह न अमरीका को सूझ रहा हैन इन मुल्कों को. खाड़ी देशों की यह सम्मिलित पराजय अब वहां नया राजनीतिक समीकरण बनाएगी जिसके केंद्र में ईरान होगा.  

   तीसरी पराजय मिली है इस्राइल को. हमेशा किसी चतुर लोमड़ी-सा सबके उच्छिष्ट में मुंह मारते फिरना इस्राइल की अंतरराष्ट्रीय भूमिका रही है. आज उसका मुंह भी खाली हैहाथ भी. पराजित व अपमानित ट्रंप ने अपने छूंछे क्रोध में उसे ऐसी फटकार लगाई है कि इस्राइल उसे कभी भूल नहीं सकेगा. ट्रंप ने सीधे ही कहा है कि युद्ध समाप्ति की मेरी घोषणा के बाद तेरी जुर्रत कैसे हुई कि तूने मिसाइल चलाई याद रखफैसला अमरीका करता हैबाकी सब उसे मानते भर हैं. अपनी अौकात में रह. अमरीका न हो तेरे साथ तो ऐसे युद्ध में तू दो घंटे भी ठहर नहीं सकता है. ऐसी अंतरराष्ट्रीय फटकार के बाद नेतन्याहू को हिम्मत नहीं हुई कि वे सीधे अमरीका को जवाब दे सकें. अपने एक अधिकारी से उन्होंने दबे स्वर में कहलवाया है कि यह समझौता अमरीका का अपना मामला है जिससे इस्राइल का कोई नाता नहीं है. नेतन्याहू को पता है कि जो मामला अमरीका का हैवह खुद-ब-खुद इस्राइल का मामला भी बन जाता है.  इस्राइल ने ऐसा नहीं किया तो वह अंतरराष्ट्रीय जगत में पंगु बन जाएगा. ट्रंप भी जानते हैंनेतन्याहू भी पहचानते हैं कि इस्राइल का अस्तित्व अमरीकी कृपा से ही बना व टिका है. इस्राइल के पास दौलत भी अकूत हैबुद्धि भी लेकिन एक स्वाभिमानी राष्ट्र की नैतिक आधारशिला उसके पास नहीं है. भारत समेत सबके लिए यह समझना जरूरी है कि नैतिकता आदर्श मात्र नहीं हैव्यक्ति व राष्ट्र की रीढ़ है. आज का पराजित इस्राइल भी चीख-चीख कर नया नेतृत्व मांग रहा है जो उसे इस्राइल के नागरिक ही दे सकते हैं. 

   चौथी पराजय हुई है ईरान की. हम भूल नहीं सकते हैं कि शाह व खामनेई ने ईरान को कभी भी समानता व समता में माननेवाला राष्ट्र बनने नहीं दिया. इन दोनों ने ईरान की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का जैसा क्रूर दमन किया हैवह एक शर्मनाक कहानी है. ईरान से आज हमारी सहानुभूति राष्ट्र के रूप में नहींदबंगई का प्रतिकार करने के साहस के कारण है. लेकिन हम एक क्षण के लिए भी भूल नहीं सकते कि मुल्लाई अंधता ने ईरान में नागरिक अधिकारों व महिलाओं की सामाजिक स्थिति की कैसी गत बना रखी थी. लेकिन इस पूरे युद्ध के दौरान कदम-दर-कदम ईरान के नागरिकों ने न केवल अपूर्व साहस दिखलाया बल्कि अपूर्व एकता का परिचय भी दिया. उन्होंने इस सरकार की अनैतिक भूमिका को भुला कर याद रखा सिर्फ अपने राष्ट्र को. इनके त्यागबलिदान व बहादुरी ने वह प्रतिकार खड़ा किया जिसके आगे ट्रंप ढेर हुए. ईरान के अंदर से विद्रोह फूटेगा और हम उस पर अपनी रोटी सेंकेंगेट्रंप की यह आशा पूरी नहीं हुई तो उसका पूरा श्रेय ईरान की जनता को है. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को याद रखना चाहिए कि अपनी जनता से हार करउन्होंने यह युद्ध जीता है. इसलिए अब सुप्रीम लीडर को अपनी जनता का सम्मान भी करना होगा और उसके सारे लोकतांत्रिक अधिकार बहाल करने होंगे. ऐसा नहीं हुआ और ईरान की जनता को अपने लिए फिर सड़कों पर उतरना पड़ा तो ईरान की जीत कड़वी पराजय में बदल जाएगी.      

   और फिर बचते हैं हम ! हम भी पराजित हुए हैंअंतरराष्ट्रीय राजनीति के जोकर साबित हुए हैं. युद्ध से ठीक पहले इस्राइल जा कर प्रधानमंत्री ने जैसी बचकानी समझ का परिचय दियाउसने देश को उपहास का पात्र बना दिया. इस्राइल ने हमें अपने जाल में फांसा और फिर ट्रंप के हवाले कर दिया. ट्रंप ने हमें अपमानित भी कियाविपन्न भी बनाया और गन्ने के रसहीन फोंक-सा फेंक भी दिया. जब हम यूक्रेनी ख़ून की नदी से छान-छान कर सस्ता रूसी तेल लाने को अपनी उपलब्धि बता रहे थे तभी ट्रंप की एक हुड़की ने हमें रसातल में पहुंचा दिया. फिर यह भी हुआ कि सब तरह सेहर स्तर पर विपन्न पाकिस्तान ने इस युद्ध में से अपने लिए एक अंतरराष्ट्रीय भूमिका खोज निकाली लेकिन हम जोकर बने कभी रूस तो कभी अमरीका के धक्के खाते रहे. आज वही पराजित ट्रंप फ़्रांस मेंमोदीजी को अपनी बग़ल में बिठा कर उनकी खूबसूरती’ का बखान करते हैं और कहते हैं कि यदि मोदी के रहते भारत पर किसी ने हमला किया तो अमरीका भारत की मदद में आएगा. इतनी फूहड़ता ! ट्रंप भाईअपनी मदद की सोचो. लेकिन हमने देखा कि अपना सर्वस्व हार चुका हमारा मीडिया ट्रंप को सामने करमोदी जी की अभ्यर्थना कर रहा हैतो हमारा पतन किस हद तक हुआ हैयह सामने है. हार जीत में बदल सकती हैपराजय हड्डियों में प्रवेश कर जाती है. महर्षि वेद व्यास ने कहा और गणपति ने लिखा जो महाभारतवह बताता है कि युद्ध में जय-पराजय होती हैमहायुद्ध में मात्र पराजय होती है- सबकी पराजय ! ( 19.06.2026)

Friday, 12 June 2026

आप लोकतंत्र के योग्य हैं कि नहीं

     जब भारत की न्यायपालिका के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत साहब, भारतीय गर्मी से बेहाल अपने 77 न्यायाधीशों की टोली लेकर केंद्रीय कानून मंत्री के शीतल साये में लंदन में छुट्टियां मनाते हुए, बैडमिंटन खेल रहे थे, मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग सरकार के साथ मिल कर बैडमिंटन खेल रहा था. नतीजा यह हुआ कि मध्यप्रदेश के किसी चुनाव अधिकारी ने कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा की उम्मीदवारी का पर्चा खारिज कर दिया. वे बैठे-बैठे हार गईं. अदालत की मौन सहमति से  भारतीय जनता पार्टी के सभी 3 उम्मीदवार बैठे-बैठे जीत गए. यह हमारा नया लोकतंत्र है. फैसला आपको करना है कि आप इस लोकतंत्र के लायक हैं या नहीं. 

मध्यप्रदेश में हार कर मीनाक्षीजी की कांग्रेस जब चुनाव आयोग के दरवाजे पहुंची तो उसे बताया गया कि आज दरवाजा बंद है. जब खुलेगा तब आना. एकदम सौ टंच खरा लोकतंत्र है यह ! याद कीजिएजब बिहार से बंगाल तक करोड़ों मतदाता अपना वोट नहीं डाल सके थे और वे सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पहुंचे तो न्यायालय ने भी यही कहा था : आज न्याय का दरवाजा बंद है. जल्दी क्या हैअगले चुनाव में वोट डाल लेना ! ऐसा समभाव ! नेता आएं कि जनतादरवाजा बंद है तो बंद है. लोकतंत्र ऐसा ही होना चाहिए- सबके लिए समभाव ! 

वैसे मीनाक्षीजी और राहुल गांधी की कांग्रेस को यह पहचानना चाहिए कि वे दोनों हार तो तभी गए थे जब उन्हें अपने 62 विधायकों को हवाई जहाज में बिठा कर कर्नाटक भेजना जरूरी लगा था. कांग्रेस अपने पतन की यह दशा समझ पा रही है पिछले लंबे समय से राहुल गांधी अपने कांग्रेस के संगठन को संवारने की जो कोशिशें कर रहे हैंवह कहां पहुंची हैइसका एक नमूना मध्यप्रदेश के वे 62 विधायक हैं जिनका ख़ुद पर या जिन पर संगठन का इतना भी भरोसा नहीं है कि वे किसी भी हाल में संघी-जाल में नहीं फंसेंगे. जब कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व के सबसे नाज़ुक दौर से गुजर रही हैसारा देश देख रहा है कि राहुल-प्रियंका अपना सारा बल समेट कर इसे पटरी पर लाने में जुटे हैंसंघ परिवार इनसे भयभीत है और अपनी पूरी ताकत व चातुरी से इन्हें बदसूरत साबित करने में लगा हैतब राहुल-प्रियंका को इतना भरोसा भी नहीं है कि उनके विधायक न खरीदे जा सकते हैंन डराए जा सकते हैं. उनके विधायकों में इतना राजनीतिक शील भी नहीं बचा है कि वे अपने नेतृत्व से बता दें कि वे न डरेंगेन बिकेंगे. क्या कांग्रेस में सिंधिया-संस्कृति से अलग कुछ भी नहीं बचा हैराहुल गांधी की कोशिशों से कुछ भी नहीं बना है कांग्रेस के संकट का असली चेहरा यही है. 

कांग्रेस के इस आंतरिक पतन को भाजपा का वाह्य व आंतरिक पतन पहचानता है. वह उसका फायदा उठाता है. संघ परिवार हमेशा से इसी दर्शन में मानता आया है कि अपना फायदा ही पहला व अंतिम फायदा है. वह जो मानता हैउसी अनुरूप चलता है. कांग्रेस अब कुछ मानती नहीं हैवह केवल चाहती है. चाहने से कुछ मिलता नहीं हैयह वह भूल गई है.  यह कांग्रेस का संकट है. वह इस सच को पहचाने कि नहींवह इससे जूझे कि नहींयह वह जाने. 

ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी के साथ हुआ. अपनी तृणमूल कांग्रेस को उन्होंने कभी समझाया ही नहीं कि इस तृण का मूल कहां है. उन्हें सत्ता की तलाश थीसो उन्होंने यही सच सबको समझाया कि सत्ता जैसे व जहां मिलेहथियानी है. इस अंधेअनैतिक दर्शन में इतनी ही संभावना है कि वह आपको दो-चार चुनाव जिता दे. उसने ममताजी को जिता दिया. वे जीतती गईंऔर फिर हार गईं. ऐसी हारीं कि अब वापसी संभव नहीं है. सारे क्षेत्रीय दल इसी दर्शन से चलते आए हैं और अपनी वक्ती जीत को अपनी असली ताक़त मान कर फूलते रहे हैं. गुब्बारा फूलने की भी एक हद तो होती है न ! फिर वह फूट जाता है. फूट जाता हैतो फिर फूलता नहीं है. नेतृत्व की कसौटी यही है कि वह बताए-सिखाए कि हवा कबकितनी भरनी है और कब ठहर जाना है. इसलिए प्राय: सभी क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की अंतिम कगार पर हैं. तमिलनाड के थलपति विजय इससे कुछ सीख सकेंतो सीखें. उनके सामने संभावनाओं का संसार खुला धरा है. उस संसार को समेटने का इल्म उनमें है कि नहींविजय को साबित करना है. वे दूसरे चंद्रबाबू नायडू बनेंगे तो हाराकिरी करेंगे. 

भारतीय राजनीति भी आज अत्यंत संभावनाओं के समक्ष खड़ी है. एक तरफ संघ परिवार है जो सत्ता का सत्य समझ चुकी है और इसलिए वह ऐसा हर कुछ कबूलती जा रही है जो उसके ही घोषित आदर्शों के विपरीत है. संघ जिस रास्ते पर चल पड़ा है उससे उसकी वापसी भी मुश्किल है. आज इनके हाथ से सत्ता निकल जाए तो यह सारा ढांचा खोखला हो कर भहरा जाएगा. इस सरकार की भी अपनी कोई नैतिक रीढ़ नहीं है. यह सत्ता-लोभ की गोंद से चिपकी हुई है और सांप्रदायिकता व दूसरी तमाम संकीर्णताओं के उन्माद को अपनी ताकत बना रही है. यह बहुमत खो चुकी है और जिस बैसाखी पर यह चल रही है वह लगातार कमजोर होती जा रही है.

दूसरी तरफ खंड-खंड विपक्ष है. राजनीतिक सार्थकता की निम्नतम पायदान पर यह खड़ा है. इसे यहां से उठना ही हैक्योंकि इससे नीचे जाने की कोई जगह नहीं है. राहुल गांधी को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने न केवल कांग्रेस को खड़ा रखा है बल्कि विपक्ष का राष्ट्रीय कद भी बना कर रखा है. इंडिया गठबंधन कांग्रेस की अक्षमता व दूसरे घटकों की बेमाप आकांक्षा का शिकार रहा है. ये सभी साथ आने के लिए साथ नहीं आएअपना-अपना सिक्का जमाने व जताने के लिए साथ आए. इन्होंने राज्यों को राज की तरह बांट लिया - बंगाल ममता काउत्तरप्रदेश अखिलेश काबिहार यशस्वी कामहाराष्ट्र उद्धव कावामपंथियों ने केरल को अपना घोषित कर लियाकश्मीर अब्दुल्ला-मुफ्ती की अपनी खिचड़ी कश्मीर में.   कांग्रेस को इन सबने अपने राज से दूर रखने की सावधानी रखी और अब हाल यह है कि ये सब टके सेर हुए जा रहे हैं. ये चाहते थे कि जो उच्छिष्ट बचा हैराहुल उसी में सीमित रहें. इस हाल में भी राहुल भारत से छोटी पहचान से जुड़े नहीं. 

उन्होंने इन सबसे अलग हो कर जब कदम बाहर निकाला तो भारत जोड़ो की हवा बहाई. भाजपा को पता है कि जाति-धर्म-भाषा-लिंग से ऊपर उठी यह भारतीयता उसके लिए खतरा है और राहुल कांग्रेस को साथ ले कर देश में यह भाव जगा सकते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर छुटभैय्या राहुल को पप्पू और नेहरूवाली कांग्रेस को नाकारा साबित करने में जुटी रही. शुरू में इसने एक माहौल बनाया भी जिसे अंधभक्तों ने ख़ूब उछाला. लेकिन इतिहास भी अपना चक्र पूरा करता ही है. अब उस माहौल की हवा निकल रही है. यह नई राजनीतिक बेचैनी है जो संघ परिवार को घेरती जा रही है. 

जब दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की बेचैनी फैली हो तभी नई पहल का सही समय होता है. तिकड़म अलग चीज है. इस कला में भारतीय जनता पार्टी व सरकार को महारत हासिल है. जिसने नैतिकतासंविधानलोकतांत्रिक परंपरा आदि-आदि को गंदे कपड़ों-सा उतार फेंका होउन सबके लिए ऐसी महारत हासिल करना संभव है. भारतीय जनता पार्टी इसी मुकाम पर खड़ी है. वह कोई नई पहल नहीं कर सकती है. इसलिए कोई नई पहल संभव है तो इंडिया’ की तरफ से संभव है. शर्त यह है कि वह पहल शुद्ध होसंविधानसम्मत होलोकतंत्र के बुनियादी असूलों को पूरा करती है और सारे देश को समेट कर चलती हो. विपक्ष वाली तिकड़मों की भी यहां जगह नहीं होगी. क्या कांग्रेस के नेतृत्ववाली इंडिया’ में यह समझ व प्रतीति है देश यही समझना चाहता हैदेश यही होता हुआ देखना चाहता है. ( 13.06.2026) 

                                                                                                                                     

Tuesday, 2 June 2026

किसी वैभव का इंतजार

क्रिकेट जैसे तेज खेल मेंउसकी आईपीएल जैसी गलाकाट स्पर्धा वाली श्रृंखला में भी जब ठहराव व उबासी आने लगे तब किसी वैभव सूर्यवंशी की जरूरत पड़ती है. वह आता है और ऐसा विस्फोट करता है कि सारी जड़ताऊब व पस्ती की चिंदियां उड़ जाती हैं. क्रिकेट फिर निखर उठता है. और कमाल यह भी है कि वैभव का खेल क्रिकेट की सारी बारीकियों व नजाकत को संभाल कर चलता है. उसका खेल छक्का उड़ाने की डंडेबाजी नहीं हैक्रिकेट का संपन्न विस्तार है वह. क़रीब से देखिए तो आप पाएंगे कि वैभव गावस्करसचिन और क्रिस गेल का वैसा मिश्रण है जिसमें वीरेंद्र सहवाग की छौंक भी लगती रहती है. अभी वह आया ही हैठीक से उसके पांव भी जमे नहीं हैं लेकिन उसने बड़ी गहराई से क्रिकेट का व्याकरण बदल दिया है. 

   भारतीय समाज को और उसकी राजनीतिक बुनावट को भी किसी वैभव सूर्यवंशी का इंतजार है. आज हमारा सामाजिक-राजनीतिक माहौल  इतना बेजान व प्रेरणाहीन हो गया है कि अब उसमें से अधिकाधिक पतन व सडांध ही निकल सकती है. यह माहौल बना रहा व इसे हम खींचते व चलाते रहे तो हमारा सारा समाज अंधकूप में अधिकाधिक गिरता जाएगा. वह लगातार गिरा रहा है. 

    जब देश की सर्वोच्च न्यायपालिका यह कहे कि लाखों-लाख मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में से काट देना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है कि जिससे हमारी नींद हराम हो : “ इस बार न सहीआप अगली बार वोट डाल लेना !” तो हमारी न्यायपालिका के पतन का अंदाजा लगाया जा सकता है. वह फैसला सुनाती है कि चुनाव आयोग को पूरा संवैधानिक अधिकार है कि वह मतदाता सूची को दुरुस्त करती रहे और इसलिए बिहार से बंगाल तक चली सर’ की प्रक्रिया पूर्णतः वैध है. कोई अदालत से पूछे कि किसनेकब कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेवारी नहीं है कब कहा वह उसकी ही जिम्मेवारी है जिसे उसने निभाया नहीं है. वह अपनी उस विफलता का ठीकरा मतदाता के सर कैसे फोड़ सकती है ?

    चुनाव आयोग मतदाताओं का आका नहीं हैमतदाताओं की सुविधा देखने व मतदान का विधिसम्मत संचालन करने की एक एजेंसी भर है. हमारा संविधान उसे मनमाना करने की इजाजत नहीं देता है. चुनाव से ठीक पहलेबग़ैर किसी मान्य प्रक्रिया के व मतदाताओं को न्यायपूर्ण समय दिए बिना मतदाताओं के नाम काटने व जोड़ने का अधिकार चुनाव आयोग को हैयह कहां लिखा है संविधान में मी लार्डसंविधान आप ही नहींहम भी पढ़ते हैंउसे आप ही नहींहम भी समझते हैं. इसलिए हमें समझाइए तो कि सर’ की प्रक्रिया के बारे में संविधान कहता क्या है ?                          

हम आपसे कहना चाहते हैं कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत किसी सरकार या आयोग या अदालत की कृपा से नहीं है. यह हमें हमारे बनाए संविधान से मिली है और हमने ही इसके संरक्षण व संवर्धन के लिए विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका आदि बनाई है. हम मतदाता स्थाई हैंआप समेत बाकी सारी संरचनाएं अस्थाई हैं. यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि ज्ञानियों की समझ में न आए. लेकिन जो बारीक बात समझने में दिक़्कत आती है वह बात है लोकतंत्र की ! यह राजतंत्र की मानसिकता से न समझा जा सकता हैन चलाया जा सकता है. इसके लिए एक अलग प्रतिबद्धता व अनुशासन की जरूरत है जिसका हमारे यहां सिरे से अभाव है. जैसे औपनिवेशिक शासन की चाकरी में लगी नौकरशाही रातोंरात स्वतंत्र देश की सेवा करने वाली सेना नहीं बन सकती हैवैसे ही औपनिवेशिक मानसिकता से आप लोकतांत्रिक न्यायपालिका का दायित्व नहीं निभा सकते हैं. जिस न्यायपालिका ने आपातकाल में हमारे जीवन के अधिकार को भी राज्य की कृपा पर छोड़ कर अपना मुंह फेर लिया थावह आज इतनी संवेदनशील व विवेकवान हो जाएगी कि संविधान के साथ खड़ी रहेऐसी खामख्याली हम नहीं पालते हैं. इसलिए हम आग्रह करते हैं कि न्यायपालिका की ऊंची कुर्सी पर बैठ कर नहींज़मीन पर आ कर हमसे संवाद कीजिए. आपकी भाषा में कहूंतो कॉक्रोच जहां रहते हैंवहां पहुंचिए. 

   हमें आप बता सकें तो बताएं कि डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी प्रमुख गुरुमीत राम 16वीं बार पैरोल पा बाहर आ गए हैंतो कैसे कैदियों के भी संवैधानिक अधिकार हैंऔर उनका पालन भी होना चाहिए लेकिन कोई न्यायमूर्ति बताएं तो हमें कि संविधान में इस तरह पैरोल बांटने की व्यवस्था कहां है ?      

     ‘नीट’ की परीक्षा का पेपर लीक होना आज इतना स्वाभाविक हो गया है कि अगर वह न हो तोउस झटके से ही लोग मूर्छित हो जाएंगे. इसलिए हमारे ओडिशा से देश को उपहार में दिया गया देश का शिक्षामंत्री बड़ी आसानी से बोल पड़ता है : ‘ कोई बात नहींहम यह परीक्षा रद्द करपरीक्षा की नई तारीख घोषित कर रहे हैंऔर हमारी उदारता देखिए कि हम इस परीक्षा के लिए बच्चों से फ़ीस भी नहीं लेंगे. हताश-निराश बच्चों को वे डपटते हैं : अरे पैसा नहीं ले रहे हैं नअब जान लोगे क्या ?’ अगले चुनाव में वोट डाल लेनाअगली परीक्षा दे लेना, अगली बार पैरोल नहीं देंगे भाई जैसे जुमले प्राणहीन व्यवस्था का प्रमाण देते हैं. 

   सीबीएसई की परीक्षा की कापियां कौन जांचता है सच कहूं तो मुझे मालूम नहीं था कि यह काम भी अब कंप्यूटर कर रहा है. 17,68,962 छात्रों की कॉपियां स्कैन कर कंप्यूटर में डाली गईंऔर परीक्षकों से कहा गया कि कंप्यूटर के पर्दे के सामने बैठ करइन कॉपियों की ऑनस्क्रीन जांच कीजिए व छात्रों के भविष्य की घोषणा कीजिए. स्कैनर कैसा हैस्कैन छवि कितनी साफ हैपरीक्षक कंप्यूटर से कितना परिचित हैवह ऐसी जांच-प्रक्रिया से कितना सहज हैइस काम के लिए उसका प्रशिक्षण कबकैसे व कितना हुआ है आदि बातें व्यर्थ हैं. अपना कंप्यूटर है न तो बात खत्म ! गांधीजी ने मशीनों के पीछे की इसी अंधी दौड़ से मानवता को सावधान किया था. कॉपियों का परीक्षण अध्यापक प्रत्यक्ष करते थेउसमें ऐसी क्या खामी थी कि आपने शिक्षक की जगह मशीनों को दे दी ?  आप मशीनों से वोटिंग और मशीनों से कॉपियों की जांच में कोई साम्य पाते हैं दोनों जगह कोशिश यह है कि इस प्रक्रिया को आदमी की पहुंच से दूर कर दिया जाए. इधर आलम यह है कि आदमी ही तो लोकतंत्र की प्राथमिक व अंतिम इकाई है ! उससे जितनी दूर जाएंगे आपलोकतंत्र से उतनी ही दूरी बनती जाएगी. गांधी डाइरेक्ट डिमोक्रेसी’ का संधान चाहते थेआप डिमोक्रेसी’ का डाइरेक्शन’ ही बदल देना चाहते हैं.  

     4,04,319 छात्रों ने अपनी स्कैन कॉपियों की मांग की हैताकि उसकी फिर से समीक्षा की जा सके. आपकी ही बनाई यह व्यवस्था भी हैतो शिक्षा मंत्रालय के हाथ-पांव फूल रहे हैं और वह बहाने बना रही है. स्कैन कॉपियों की फिर से जांच की यह प्रक्रिया मुफ्त भी नहीं है. बच्चों से इसके लिए खासी रकम वसूली जा रही है. किसकी जिम्मेवारी है यह कौन किससे पूछे आप ख़ुद से भी जवाब नहीं देते हैंप्रेसवार्ता भी नहीं करते ! तो गूंगों का समाज बनेगा क्या अदालत इसकी तरफ कैसे ध्यान देगीवह तो सत्ता-संस्थानों की वैधता स्थापित करने में जुटी हुई है. उसके पास समय कहां है कि वह पूछे कि जिस सरकार के पास कल तक पेट्रोल-डीजल-गैस का पर्याप्त भंडार थावह चुनाव खत्म होने की रात से ही खत्म कैसे हो गयाहर दिन इनकी कीमतों में बढ़ोत्तरी कैसे व क्यों हो रही है अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के भाव व हमारे भाव में कोई तर्कसंगत संतुलन है क्या कहा जा रहा है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा हैतो लोगों का गला कटा जा रहा हैयह आपको नहीं दीखता है

               कभी जयप्रकाश नारायण ने कहा था : भ्रष्टाचार ऊपर से चल कर नीचे तक पहुंचता है. गंगोत्री में ही जहर मिला हो तो नीचे गंगा का प्रवाह शुद्ध कैसे हो सकता है ऐसे सवाल पूछने वाला व इनके जवाब के लिए जूझ पड़ने वाला कोई वैभव सूर्यवंशी हमें चाहिए. हमें उसका इंतज़ार नहीं करना हैउसकी खोज में निकल पड़ना है. यह किसी दूसरे के लिए आह्वान नहीं हैआंतरिक प्रतीति है. ( 28.05.2026)   

Tuesday, 19 May 2026

ऐसी न्यायपालिका किसे चाहिए ?

 हमारे पांच राज्यों में चुनाव क्या हुए कि उनके नतीजों ने पचासियों सवाल खड़े कर दिए हैं; और हर सवाल ऐसे कि जिनके जवाब हमारे अब तक के लोकतांत्रिक इतिहास में खोजे नहीं मिलते हैं. ऐसे सारे सवाल अखबारों की सुर्खियों से भी ग़ायब हैं, क्योंकि अखबार जैसा जो हमारे यहां कुछ बचा है, उनकी सुर्खियां अब बनती नहीं हैं, बनी-बनाई मिलती हैं. ऐसे ही मिलते हैं वे सारे लोग जो बगैर किसी गहरी विशेषज्ञता के विशेषज्ञ घोषित कर दिए जाते हैं. सारे सवाल इन दो पाटों के बीच पिस रहे हैं. 

   अगर ऐसा नहीं होता तो ऐसा कैसे होता कि चुनाव में अधिकाधिक मतदाता भाग लेंइसकी य़ुक्ति निकालने की जगह चुनाव आयोग वह रास्ता निकाल लाता जिससे कम-से-कम मतदाता चुनाव में हिस्सा ले सकें एसआईआर या सर’ इसी काम के लिए ईजाद की गई वह अनैतिक व असंवैधानिक युक्ति है जिसका पूरा श्रेय सरकार व आयोग के बीच की जुगलबंदी को जाता है. 

   देश की मतदाता सूची बनानाउसे जांचते व सुधारते रहना चुनाव आयोग का - एकमात्र चुनाव आयोग का - दायित्व है. एक से दूसरे चुनाव के बीच का सारा समय इस आयोग के पास संविधान द्वारा दिया दूसरा कोई काम नहीं होता है सिवा इसके कि वह अपनी मतदाता सूची को पाक-साफ बनाए. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह अयोग्य भी है और अपराधी भी. अगर वह ऐसा कहता है कि इस या उस सरकार ने घुसपैठिए घुसा करमतदाता सूची दूषित कर दी हैतो उसे देश को बताना ही पड़ेगा कि उसने कबकहांकिससे इसकी शिकायत की कि फलां सरकार मतदाता सूची को अपने राजनीतिक हित में दूषित कर रही है वह यह साबित कर दे कि उसने समय परसही एजेंसी को मतदाता सूची के साथ किए जा रहे बलात्कार की शिकायत की थीतो बात पटरी पर आ जाती. लेकिन अचानक नींद से जागे किसी शराबी की तरह वह मतदाताओं पर टूट पड़े और सरकार उसे ऐसे मतदाता-संहार की इजाज़त दे भी दे तो भी यह नितांत अनैतिक व असंवैधानिक है. संविधान कभी भी और कहीं भी चुनाव आयोग को ऐसा अधिकार नहीं देता है. संवैधानिक दायित्व के पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति या संस्थान असंवैधानिक व अनैतिक रास्ते पर चल पड़े तो सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि उसके हाथ बांध दिए जाएं. 

   ऐसी हाथबंदी कौन कर सकता है ?       

   लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में ऐसी उलझी हुई स्थितियां बड़े काम की होती हैं. उनसे संविधान व लोकतांत्रिक नैतिकता दोनों उजागर भी होती हैं और सशक्त भी. लेकिन यहां एक पेंच है. ऐसा तभी हो सकता है जब संवैधानिक प्रावधान व लोकतांत्रिक नैतिकता की उलझनें संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर से पैदा हुई हों. जब उलझनें संविधान को झांसा देनेउसे तोड़-मरोड़ कर अपनी मुट्ठी में कर लेने की पतनशील चालबाजियों से से पैदा हुई हों तब वे दीमक की तरह संविधान व लोकतंत्र दोनों को खोखला करने लगती हैं. ऐसा इसलिए है कि लोकतंत्र अंततः एक नैतिक अवधारणा है जिसे संविधान ने कानूनी जामा पहनाया है. नैतिकता तभी तक स्वस्थ व गतिशील रहती है जब तक समाज सजग व सक्रिय रहता हैसंवैधानिक संस्थाएं अपनी परंपराओं का ससम्मान पालन करती हैं तथा विधायिका से फासला बना कर चलती हैं. न्यायपालिका विधायिका के साथ मिलकर जब गणेश आरती करने लगती हैतब सब कुछ गोबर गणेश हो जाता है.   

   संविधान के निर्माता इसके प्रति बेहद सावधान थे कि लोकतांत्रिक चेतना व संवैधानिक प्रावधान हमारे लिखे शब्दों से एक हद तक ही सुरक्षित व संरक्षित हो सकती है. इसलिए उन्होंने संविधान में ही ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की व्यवस्था खड़ी की जो लोकतंत्र की जड़ें सींचेंसंरक्षण के लिए बाड़ें खड़ी करें. विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका व मीडिया ही नहींदूसरी भी कई संरचनाएं बनाई गईं कि जिनका काम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मज़बूत बनाना व लोकतांत्रिक चेतना को स्वस्थ व गतिशील बनाना है. 

   इतना सब करने के बाद भी संविधान निर्माताओं के मन में शंका बनी रही कि सत्तालोलुप सरकारें व कायर-चापलूस नौकरशाही के कारण यह खतरा कभी भी उभर सकता है जब लोकतंत्र का ढांचा बना रहे लेकिन उसकी आत्मा का लोप हो जाए. ऐसा जब भी होगालोकतंत्र एक बाजारू व्यवस्था भर रह जाएगा जिससे सभी निहित स्वार्थ फ़ुटबॉल खेलेंगे. ऐसी शंका में से जन्म हुआ न्यायपालिका की संवैधानिक अवधारणा का ! संविधान ने न्याय-व्यवस्था के भीतर ही एक ऐसी न्यायपालिका की संरचना की जो सबसे पहले व सबसे अंत तक संविधान के शब्दों की संरक्षक रहेगी तथा संविधान की आत्मा को प्रखरता से स्थापित करेगी.          

   हमारे संविधान ने एकमात्र न्यायपालिका के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई कि जिसे संविधान के अलावा दूसरे किसी का बोझ नहीं ढोना हैसंविधान के अलावा दूसरे किसी की नहीं सुननी हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं कहना हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं देखना है. उसने न्यायपालिका से कहा कि संविधान ही आपके लिए गीताक़ुरानजपजीगुरूग्रंथ साहबबाइबिलअवेस्ता व दूसरे किसी भी विश्वास-ग्रंथ की जगह रहेगा. उसने एकमात्र इसी संस्थान की कुंडली में लिख दिया कि इसे हमेशा विपक्ष में ही रहना है - राजनीतिक दलों व संगठनों वाला विपक्ष नहींसंवैधानिक विपक्ष ! न्यायपालिका के हाथ में संविधान का गांडीव देकर उसने कह दिया : तुम्हारी नजर हमेशा उस मछली की आंख पर होनी चाहिए कि जो संविधान की मर्यादा से बाहर जा रही हो - फिर वह राष्ट्रपति हो कि प्रधानमंत्री कि राज्यपाल कि लोकसभा व राज्यसभा का अध्यक्षविधायिका हो या कार्यपालिका कि मीडिया. उसे इतना सजग व संवेदनशील रहना ही होगा कि देश के किसी भी कोने मेंकिसी एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी होती है तो वह तनक उठे व उस व्यक्ति के साथ तब तक खड़ी रहे जब तक यह साबित न हो जाए कि उस व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को स्थगित या सीमित किए बिना सरकार अपने संवैधानिक दायित्व की पूर्ति नहीं कर सकती थी. यह सुनिश्चित होने के बाद भी न्यायपालिका को यह देखते रहना है व सुनिश्चित करते रहना है कि उस व्यक्ति के नागरिक अधिकार व उसकी संवैधानिक गरिमा का हनन न हो. संविधान ने ऐसी न्यायपािलका बनाई और फिर ख़ुद को भी उसके ही हाथ में सौंप दिया - ‘ मेरा संरक्षण और मेरा संवर्धन भी तुम्हारा दायित्व है. यह तुम्हारे होने की सार्थकता भी है और यही तुम्हारे होने की कसौटी भी है.’ 

   क्या हमारी न्यायपालिका को इस दायित्व का अहसास है क्या हमारी न्यायपािलका लोकतंत्र के कठघरे में खड़ी हो करगीता पर हाथ रख कर शपथपूर्वक कह सकती है कि लोकतंत्र के संरक्षण व संवर्धन का दायित्व उसने सौ टंच निभाया है सौ टंच इसलिए कह रहा हूं कि संविधान का आधा-अधूरा निर्वाह अर्थहीन अवधारणा है. संविधान या तो हैया नहीं है ! अगर संविधान है तो श्रीमान सूर्यकांत हमें बताएं कि यह कैसे संभव हुआ कि बंगाल में 90 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम विभिन्न कारणों से मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए क्या चुनाव आयोग को चुनाव के ठीक पहले ऐसा करने का अधिकार है श्रीमान सूर्यकांत सर्वोच्च न्यायालय के जिन गलियारों से गुज़र कर रोज़ अपने चैंबर में पहुंचते हैंउन गलियारों में सर’ की गूंज लंबे वक्त से गूंजती रही है. श्रीमान सूर्यकांत समेत भारत की सर्वोच्च अदालत का एक भी जज ऐसा नहीं है कि जो कह सके कि उसने यह गूंज सुनी ही नहीं ! सुनीतो फिर किया क्या किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर आपत्ति उठती हो तो उसकी बारीक जांच-परख जरूरी होती है. उसमें समय भी लगता है. लेकिन जब भी आपत्ति उठे तो संविधान से बंधी न्यायपालिका सबसे पहले क्या करेगी संवैधानिक विवाद के केंद्र में आने वाले संस्थान या व्यक्ति को वह पहला आदेश यह देगी कि पीछे हटो व इंतजार करो ! 

   ऐसा क्यों नहीं किया गया बिहार के वक्त सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा दिखाया कि वह मतदाता सूची के मामले में आयोग की मनमानी चलने नहीं देगा. फटकार-धमकी-लांछन-उपहास क्या नहीं था कि जिससे सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को नवाजा नहीं. सर्वोच्च न्यायालय के खाते में बस एक ही बात बाकी रह गई थी : संविधान के प्रति अपनी एकनिष्ठ प्रतिबद्धता की घोषणा ! वह प्रतिबद्धता पहले दिन से नहीं थीसो बिहार में चुनाव लूट लिया गया. संविधान को धोखा दे करसंवैधानिक नैतिकता को रौंद कर एक अनैतिक गठबंधन को उसी तरह सरकार बनाने का मौका दिया गया जिस तरह महाराष्ट्र में दिया गया था. इससे लोकतंत्र को कुछ भी हासिल नहीं हुआन्यायपालिका अनैतिकता के दायरे में आ गई. 

   कैसा विद्रूप है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की सर्वज्ञात बात किसी पाठ्य-पुस्तक में लिख दी गई तो श्रीमान सूर्यकांत आग-बबूला हो गए. ख़ुद ही इसका संज्ञान ले कर पुस्तक बनाने वाली समिति पर वे ऐसे टूट पड़े मानो दुर्वासा ऋषि अवतरित हुए हों. सरकार भी त्राहिमाम-त्राहिमाम की मुद्रा में आ गई. सबने अपने कदम पीछे खींच लिये. मामला रफा-दफा कर दिया गया. लेकिन चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में खुली धांधली करते अधिकारी का वीडियो सामने आने पर भी सर्वोच्च न्यायालय में खलबली नहीं मची. न वह अधिकारीन चंडीगढ़ का चुनाव आयुक्तकोई भी  बर्खास्त हुआन उसे किसी भी संवैधानिक दायित्व के लिए आजीवन अयोग्य घोषित किया गया. बससबकी सुविधा का रास्ता यह निकाला गया कि नया मेयर घोषित कर दिया गया. यह संविधान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध संस्थान का नैतिक आचरण नहीं थाधूर्त नौकरशाही की चालबाजी थी. 

    जब वोट चोरी का साक्ष्य सामने आयाएकाधिक बारएकाधिक निर्वाचन क्षेत्रों के संदर्भ में आया तब न्यायपालिका ने क्या किया उसने चुनाव आयोग को तुरंत ही कठघरे में नहीं बुलाया. न्यायाधीशों की तरह संविधान के पंडित न हों हमफिर भी हम ऐसे मामले में पहला आदेश यही जारी करते कि वोट चोरी के साक्ष्य की जांच के लिए न्यायालय की समिति गठित की जा रही हैऔर जब तक यह जांच पूरी नहीं हो जातीयह चुनाव आयोग दूसरा कोई भी चुनाव संचालित नहीं कर सकेगा. चुनाव यदि संसदीय लोकतंत्र की नसों में दौड़ने वाला लहू हैतो उसे बोतल में बंद करने की इज़ाजत कैसे दी जा सकती है इसलिए तत्काल न्यायिक जांच का आदेश जरूरी था. वह हुआ होता तो इस पतनशील व्यवस्था पर लगाम लग जाती.   

   बंगाल के बारे में मेरे जैसा सामान्य विवेक व लोकतंत्र के प्रति असामान्य आस्था रखने वाला व्यक्ति एक ही आदेश देता कि बंगाल में चुनाव घोषित समय से ही होंगे लेकिन चुनाव आयोग के निकम्मेपन के कारणउसे विधानसभा के पिछले चुनाव की मतदाता सूची का ही पालन करना होगा. चुनाव से काफी पहले मतदाता सूची जांच-परख ली जाए ताकि उसे ले कर मतदाता के मन में कोई आशंका न रह जाएयह दायित्व चुनाव आयोग का है. अगर वह अपने दायित्व के निर्वाह में विफल रही है तो उसकी सजा उसे मिलनी चाहिएन कि संवैधानिक प्रक्रिया को. 

   मतदाता व मतदान दोनों ही भय व पक्षपात मुक्त होने ही चाहिए. इस दिशा में चुनाव आयोग के हर प्रयत्न का स्वागत व समर्थन होना चाहिए. संविधान ने आयोग के वर्चस्व की ऐसी व्यवस्था कर भी रखी है और अब तक ऐसा ही होता भी आया है. बंगाल में कुछ ख़ास भी था क्योंकि कांग्रेसी सिद्धार्थ शंकर राय ने वाम हिंसा कावाम ने कांग्रेसी हिंसा काममता बनर्जी ने वाम हिंसा का और फिर ममता बनर्जी ने मोदी-शाह हिंसा का उससे बड़ी हिंसा संयोजित कर मुकाबला किया था. 

   इस बार पासा पलटाक्योंकि ममता की हिंसा को भाजपा-चुनाव आयोग-राज्यतंत्र की तिहरी हिंसा का मुकाबला करना पड़ा और वह इसमें पिट गई. बंगाल में राजनीतिक हिंसा व चुनावी गुंडागर्दी को जायज़-सा माना जाता है. लेकिन बिहार से चल कर बंगाल पहुंची चुनाव आयोग-सरकार की जुगलबंदी के सिलसिले की अनदेखी करेंगे हम तो भ्रमित भी होंगे व गलत नतीजों पर भी पहुंचेंगे. 

   क्या न्यायपालिका ने बंगाल में यह नहीं देखा कि इस बार हिंसा का आयोजन दिल्ली से हुआ हैउसकी कमान चुनाव आयोग ने संभाल रखी हैभद्रजन जिसे हेटस्पीच’ कहते हैं लेकिन संविधान जिसे लोकतंत्र की जड़ पर प्रहार मानता हैवैसा कारनामा प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर ऐरागैरा-नत्थूखैरा करने में लगा है लाखों मतदाताओं के नाम रद्द करने की धौंस से नागरिकों में लाचारी व अपमान का माहौल बनामनमाने प्रशासनिक फेर-बदल ने स्थानीय स्वायत्ता को धूल-धूल कर दियासुरक्षा-बलों की छावनी जिस तरह बंगाल में उतारी गईउसने एक तरफ़ बंगाली मतदाताओं को भयाक्रांत किया तो दूसरे बंगालियों को हमलावर भी बना दिया. 

   कई लोग कह रहे हैं कि ममता की सांप्रदायिक हिंसा से बंगाल पहली बार मुक्ति हुआ. ऐसा कहने वालों से कोई पूछे कि लोकतंत्र के संदर्भ में दलीय हिंसा और सत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा में फर्क होता है या नहीं दलीय हिंसा दल की पराजय के साथ खत्म हो जाती हैसत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा राजनीतिक संस्कृति बन जाती है. दिल्ली ने बंगाल में यही किया. न्यायपालिका को यह नहीं दिखा कि चुनाव के दौरान बंगाल का पूरा प्रशासनपुलिस-सुरक्षा बलप्रचार-तंत्र सारा कुछ बंगाल पर बाहर से ला कर लाद दिया गया था यदि ममता बनर्जी बहुत भ्रष्टसांप्रदायिक ताकतों को लामबंद करने वालीहिंसा भड़काने वाली बला की अलोकप्रिय मुख्यमंत्री थींतो उन्हें हराने के लिए दृढ़ मतदाता व निष्पक्ष चुनाव से अधिक की जरूरत क्यों पड़ी क्यों भाजपा की संपूर्ण दिल्ली-मंडली बंगालवासी बन गई जीत भारतीय जनता पार्टी की हो कि ममता बनर्जी कीबंगाल की जनता की क़िस्मत बहुत बदलने वाली नहीं है. भगवा ज़हर मन में भरा न हो तो 2014 से आज तक भाजपा शासित राज्यों की जनता का हाल देख लें तो जवाब मिल जाएगा. लेकिन जिन्हें भगवा की चाह हैउन्हें लोकतंत्र से क्या मतलब !   

   सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का अहसास है क्या कि जब-जब उसे संविधान के संरक्षण में चीते की फुर्ती से आगे आना चाहिए थातब-तब वह गीदड़ की कायरता से घिरा बैठा मिला ! भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में आपातकाल एक विभाजक रेखा बनाता है. वहां से देखें कि नागरिक स्वतंत्रता का सवाल हो कि प्रेस पर सेंसरशिप का कि नक्सली बता करराज्य द्वारा अनगिनत लोगों की हत्या कावोट चोरी का या मतदाता सूची में मनमानी दखलंदाजी का,  ऐसा क्यों है कि संविधान की प्रतिष्ठा और राज्य के आतंक के बीच चुनाव का नाज़ुक क्षण जब भी आता हैहमारी न्यायपालिका को लकवा मार जाता है कायरता व कमजोरी को खोखले शब्दों व तर्कों से कौन ढक सका है ऐसी कोशिशें आपको और बेपर्दा कर जाती हैं. बाबरी मस्जिद ध्वंस का सवाल हो कि चुनावी बौंड की वैधता कान्यायपालिका अपेक्षित प्रखरता से सामने नहीं आ पाती हैतो क्यों जवाब गांधी देते हैं : जिन्हें हम संवैधानिक संस्थाएं कहते हैं वे सब निर्णायक क्षणों में सत्ता के साथ खड़ी दिखाई देंगीक्योंकि अंतत: ये सब उसके ही उपकरण हैं. इसलिए भगवा आतंकवाद की तीन गोलियां खाने के दिन तक वे इसी युक्ति में लगे थे कि इस देश की लोकतांत्रिक चेतना को कैसे मज़बूत व प्रभावी बनाया जाए.   

   यह बात बार-बार कहने की व न्यायपािलका द्वारा लगातार दोहराने की है कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत भारतीय राज्य की कृपा से नहीं है. यह हमें हमारे संविधान से स्वत: ही मिलती है. संविधान ने किसी कोई चुनाव आयोग कोकिसी सरकार कोलोकसभा या राज्यसभा के किसी अध्यक्ष को याकि किसी राज्यपाल को अपवादस्वरूप भी ऐसी मनमानी शक्ति नहीं दी है कि वह नागरिक को उसकी नागरिकता से या मतदाता को उसके मतदान के अधिकार से वंचित कर दे. बुलंद आवाज में यह सत्य कहना व इसे स्थापित करना आज न्यायपालिका का दायित्व है जिसमें वह बार-बार विफल होती है. इतना बड़ा सफेद हाथी हमने इसलिए पाल रखा है कि गाढ़े वक्त में वह लोक के साथ खड़ा होन कि तंत्र की तरफदारी करे. लेकिन लगता हैहमारी न्यायपालिका सरकारी नौकरशाही का हिस्सा बन कर रह गई है.

   निर्भीक तटस्थता से लैस मतदाता ही हमारे लोकतंत्र की अंतिम आशा है जो न्यायपालिकाविधायिकाकार्यपालिका व मीडिया को  अंकुश में रखेगा. ( 16.05.2026)

Thursday, 7 May 2026

जब कैमरा बोला करता था …

 26 अप्रैल 2026 को जब रघु राय ने अपने कैमरे का शटर दबाया होगा, तब उन्हें इल्म हुआ होगा कि उनका कैमरा बंद हो गया है. अब वह न कभी खुलेगा, न कभी बोलेगा ! 

   उनका कैमरा बोलता था. रघु राय के कैमरे में व दूसरों के कैमरे में यही फर्क था. दूसरों का कैमरा बोलता नहीं थादेखता थारघु राय का कैमरा गूंगा होने को तैयार नहीं था. वह बोलता था. महान कनाडियन कैमराकार यूसुफ कार्श का कैमरा नहीं बोलता थाउनके पोट्रेट बोलते थे. उनके पोट्रेट के पात्रों की आंतरिक विशेषताओं को उनका कैमरा जैसे छू लेता था. वह कहता कुछ नहीं थाहमारे सामने उस व्यक्ति को खड़ा कर देता था. 

   मैंने ऐसा ही कुछ पहली बार पटना की उस मित्र-मंडली में कहा था जिसमें रघु राय भी मौजूद थे. चेहरे पर सदा खिली रहने वाली आत्मीय मुस्कान के साथ वे मुझे सुन रहे थे : रघु राय के फोटोग्राफ्स बोलते हैं इसलिए हमें उनके पास ठहरना पड़ता है ताकि उन्हें सुन सकेंरघु राय के फोटोग्राफ्स दौड़ते हैं इसलिए हमें उनके साथ तेज दौड़ लगानी पड़ती है ताकि कहीं पीछे न छूट जाएं ! मुझे कई बार लगा है कि उनके फोटोग्राफ्स की एक श्रृंखला देखते-देखते सांस फूलने लगती है. 

   मैं आज कहना चाहता हूं कि रघु राय हमारे दौर के सबसे तेज रफ्तार कैमराकार थे जो गतिशब्द व चित्रतीनों का अप्रतिम संतुलन साध पाते थे. मैं यह आज इसलिए कहना चाहता हूंक्योंकि रघु राय अब नहीं हैं. अब वह आंख नहीं है जो कैमरे से जुड़ कर वह संसार उजागर कर जाती थी जिसे देखते हुए भी हम देख नहीं पाते थे. उनकी आंखों में कैमरा लगा था और उस कैमरे में महाभारतवाले संजय की आंख लगी थी. कई लोग कहते रहेउनकी विदाई-लेखों में भी लिखा जा रहा है कि वे आलादर्जे के न्यूज-फोटोग्राफर थे. रघु राय के परिचय में जब ऐसा कहा जाता है तब मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई जवाहरलाल नेहरू के परिचय में कहे कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे. यह परिचय सच है लेकिन जवाहरलालजी का इससे बौना परिचय दूसरा हो नहीं सकता है. वे बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ भारत के प्रधानमंत्री भी थे. रघु राय बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ न्यूज-फोटोग्राफर भी थे. 

   हम बहुत कम समय तक एक-दूसरे को जानते रहे. फिर एकदम अलग हो गए. फिर इधर के दिनों मेंजब मैं दिल्ली आया तो फिर कुछ मिलना हुआ. इसलिए निजता का मेरा कोई दावा नहीं है. लेकिन 1974 से जो शुरू हुईवह सौहार्दपूर्ण पहचान बनी रही. मैंने उनसे भी कहा था और आज भी उसे दोहराता हूं कि रघु राय के कैमरे को 1974-77 के दौर में वह संस्कार मिला जिसने उन्हें फोटोग्राफर से कहीं आगे खड़ा कर दिया. अपना कैमरा ले कर जब रघु राय जयप्रकाश नारायण व उनके आंदोलन के क़रीब पहुंचे तब उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका कैमरा यहां से अपना चरित्र बदलने वाला है. मुझे पता नहीं है कि रघु राय 1974 से पहले जयप्रकाश से परिचित थे य़ा नहीं. कभी पूछा नहींकभी `ऐसी बात निकली नहीं. लेकिन सिताबदियारा की वह रात मुझे खूब याद है जब दिन भर की तूफानी सभाओं व सार्वजनिक जयकारों-हाहाकारों से निकल कर हम देर शाम जयप्रकाश के पैतृक गांव सिताबदियारा पहुंचे थे. 

   अपना वह गांव और अपना वह खपड़ैल मकान जयप्रकाश को बहुत प्यारा था. उसकी उष्मा में वे विभोर हो कर रहते थे - चाहे जितना रह सकें !  उस शाम बेहद थके होने के बाद भी वे वैसे ही मगन-मन थे. वहां जगह भी कम थीसुविधाएं तो और भी कमऔर उसमें औचक आ पहुंचे 10-15 शहरी मेहमान ! सबकी व्यवस्था थी. सबको उनकी जगह पहुंचा करखाना आदि करवा कर थोड़ी राहत मिली. जयप्रकाश भी थकान आदि से निबट कर थोड़े स्थिर हुए तो सब मेहमानों की व्यवस्था आदि की जानकारी ली. बिस्तरमच्छरदानीपीने का पानीबाथरूम सब पूछा : ‘ इनमें से कुछ होंगे जिन्हें सोने से पहले चाय-कॉपी की जरूरत होती होगी. वह सब पूछा न ?’ पूछा तो था लेकिन बहुत आग्रह से नहींइसलिए जवाब में थोड़ा संशय था...रात भी ज्यादा हो रही हैसोने वाले सो भी गए होंगे… व्यवस्थापकों का जवाब पूरा भी नहीं हुआ था कि जयप्रकाश बिस्तर से नीचे उतरे और बोले : ‘ चलेजरा देख लूं !’ 

   मेहमानों में संकोच भरी खलबली हुई. इतनी रात गएथके जयप्रकाश एक-एक के बिस्तरे तक पहुंचेबड़ी आत्मीयता से जो पूछना-बताना थावह सब किया- यहां सुविधाएं कम हैंपरेशानी होगी आपकोसुबह कितने बजे उठते हैंनहाने का गर्म पानी यहां मिल जाएगाचाय कितने बजे लेंगेचाय के साथ क्या लेंगे… मैं देख रहा था कि रघु राय सिकुड़ते जा रहे थे. जिसके पीछे कैमरा ले कर वे सुबह से भाग रहे थेवह अब उनके कैमरे की जद से बाहरउनके सामने खड़ा थाऔर उन्हें अपने कैमरे में बंद कर रहा था. 

   “ आपने रोका क्यों नहीं… दिन भर मैंने इस बूढ़े आदमी को जवानों को मात देने वाली एनर्जी से काम करते देखा है… अब हमारी बेहूदा-सी जरूरतों की चिंता में…” रघु राय को सूझ नहीं रहा था कि वे कैसेक्या कहें… शब्द बता नहीं पा रहे थे कि वे कैसा महसूस कर रहे थे… फिर हम देर रात तक सिताबदियारा के कच्चे रास्तों पर हल्के कदमों व दबी आवाज में बात करते घूमते रहे … वे एक इवेंट कवर करने आए थेऔर यहां मिला उन्हें एक ऐसा व्यक्ति जो इतिहास समेटता हुआइतिहास बदल रहा था… आप देखिए नन यह कैमरा मेरा बनाया हैन मेरे कैमरे के सामने जो घट रहा है वह मेरा रचा है… सब मुझे बना-बनाया मिला है. मैं कर तो इतना ही रहा हूं न कि शटर दबा रहा हूं… रघु राय कुछ और कहते कि मैंने टोका : शटर तो मैं भी दबा सकता हूं लेकिन उसमें से रघु राय का फोटो बनेगा नहींक्योंकि कहांकब व कैसे शटर दबाना है यह न मशीन को मालूम हैन मशीन के सामने घटती घटनाओं को… यह तो रघु राय को ही पता है… कला व कलाकार के बीच का यह रिश्ता ही अंतिम सत्य है… ऐसी कितनी ही बातें उस रात हुईं… जयप्रकाश कर क्या रहे हैंलोकतंत्र के विकास में इस आंदोलन का रोल क्या हैदमन के सामने बहादुरी से खड़े इन नौजवानों की प्रेरणा क्या है जैसी कितनी ही बातें हम कर गए… रघु राय तब अपने फोटो का नया एंगल खोज रहे थे. जिसे हम न्यूज-फोटोग्राफी कह कर निकल जाते हैं और जो न्यूज़ के साथ ही दम तोड़ जाती हैरघु राय उसके पार जाते थे क्योंकि वे क्षण को नहींवक्त को दर्ज करने वाले कैमराकार थे. 

   बिहार आंदोलन में गति व उमंग का विस्फोट हुआ था. रघु राय उसे पकड़ सके थेक्योंकि वे उसे समझ सके थे. उनका कैमरा साक्षी-भाव नहीं रखता थावह भागीदार बन सका था. बिहार आंदोलन के उनके फोटो का संकलन बिहार शोज़ द वे’ आप देखें तो समझ सकेंगे कि वे लिखे शब्दों व विवरणों को व्यर्थ-सा बना देते हैं,क्योंकि वे सारे फोटोग्राफ्स बोलते भी हैंभागते भी हैं. लेकिन आपको एकदम अलग रघु राय मिलते हैं जब आप मदर टेरेसा के पास उन्हें देखते हैं. उनका कैमरा वहां ध्यान करता मिलता है : नि:शब्द प्रार्थना ! रूपाकार नहींकरुणा ही आकार ले लेती है. संगीतकारों की उनकी श्रृंखला मुझे इसलिए बहुत प्रिय है कि कैमरे को उस तरह गाते कभी सुना नहीं था. इंदिरा गांधी का उनका अलबम एकदम अलग भाषा में बोलता है - सत्ता की धमक-चमक व आतंक का रस वहां हर ओर बिखरा मिलता है. 

   वह सारा कुछ जो काल की हथेली पर उन्होंने बिखरा रखा थाअब सिमट चुका है. उसमें कुछ नया जोड़ने वाली आंख नहीं रही. कैमरा भी हैविषय भी हैं लेकिन रघु राय नहीं हैं. 

वह वादा भी अब कभी पूरा नहीं होगा जो जयपुर में गांधी-वाटिका बनाते समय उन्होंने मुझसे किया था : कुमारआपकी गांधी-वाटिका के लिए मैंने कुछ अलग सोच रखा है… मैं वह आपको दूंगा…  

   वह वाटिका भी अब श्रीहीन हो चुकी है

( 28.04.2026)                                  

Thursday, 16 April 2026

वह एक रात !

     एक ही रात में - 7 अप्रैल 2026 - हजारों साल पुरानी व समृद्ध ईरानी सभ्यता के अस्तित्व को धरती से मिटा देने की मनोरोगी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद क्या हुआ ? अखबारी दुनिया के लोग कहेंगे कि उसके बाद 15 दिनों का युद्धविराम हुआ. 

   मैं कहूंगा कि नहींयह तो हुआ हीऔर वह भी हुआ जो संभवत: मानवीय सभ्यता के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था. ट्रंप की कयामत की रात की घोषणा के बाद न ईरान के सत्ताधारियों नेन ईरान की बलिदानी जनता ने किसी के आगे गुहार लगाईन हाथ फैलायान माफी मांगी. स्त्री-पुरुष-बच्चियां-बच्चे कोई कहीं रोता-कलपता भी नहीं दिखा. पिछले 40 दिनों से वेखंडहर होते जा रहे अपने देश को सीने से लगाएआसमान से बरसते विनाश का सामना कर रहे थेआक्रमणकारी ट्रंपगैरतहीन,धूर्त नेतन्याहू और इनके सफरमैना खाड़ी देशों को लगातार हथियारों से जवाब भी दे रहे थेहालांकि वे जानते थे कि वे अब ज्यादा दिनों तक जवाब देने की हालत में नहीं हैं…   

   लेकिन 40 दिनों बाद आज, 7 अप्रैल को लड़ाई बदल गई थी. वे ही सब युद्ध की नई कुंडली लिखने सड़कों पर निकल आए थेजो युद्ध जारी रख सकने  की हालत में नहीं बचे थे.  ईरान के जिन आण्विक संयंत्रों कोपुलों-राजमार्गोंनागरिक सुविधा के दूसरे तंत्रोंपूजा-स्थलों और सांस्कृतिक केंद्रों को बमों से ध्वस्त कर देने की घोषणा ट्रंप ने की थीहमने देखा कि अपने-अपने ध्वस्त घरों से निकल-निकल कर ईरानी नागरिक इस सभी स्थलों को घेर कर खड़े होते गए… कोई शोर नहींकोई नारेबाजी नहींसब एकदम शांत थे. लेकिन हर जगह लोग-ही-लोग थे… कोई कह तो नहीं रहा था लेकिन जैसे कहीं सेकोई आसमानी घोषणा कर रहा था :  हम यहां खुले में खड़े हैंचलाएं ट्रंप उनके पास जो भी है. ईरान के मशहूर संगीतकार अली घामसारी ने एक संयंत्र के सामने वाली सड़क पर दरी बिछाई और अपना वाद्य बजाने लगे. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने शांत पर दृढ़ आवाज में बताया: मरने की तैय़ारी रखनेवालों की सूची में अब तक 1.40 करोड़ ईरानी नागरिकों ने अपना नाम दर्ज करवाया है और उसमें पहला नाम मेरा है. 

    यह ईरान के लिए कयामत की रात थी जिसे उसने कमाल की रात में बदल दिया था. 

   किसी ने देखा या नहीं देखा पता नहीं लेकिन इन बलिदानी ईरानियों की किसी कतार में महात्मा गांधी भी खड़े थे ! दुनिया के जिस भी कोने में लोग वीरता से बलिदान देने निकलते हैंयह अधनंगा फकीर’ वहां अपनी हाजिरी लगाता ही है. जयप्रकाश ने कभी हंगरी मेंकभी तिब्बत मेंकभी बांग्लादेश में तो कभी चेकोस्लोवाकिया में इस गांधी को पहचाना था और उसके साथ खड़े हुए थे.  

   गांधी ने कहा था : विवश कायरता से कहीं भला होता है निडर बलिदान ! गांधी की अहिंसा का उपहास करने वाले किताबी बुद्धिजीवी व हिंदुत्व की अहंकारी भाषा में अपनी कायरता छिपाते रहने वाले कहां पहचान सकेंगे कि गांधी ने जिस चरम साहस की बात कही थीईरानी जनता में वह साहस 7 अप्रैल 2026 को मूर्तिमान हुआ था. 

   यही अमरीका था और उसके ही परमाणु बम थे कि जिनसे हिरोशिमा-नागासाकी का अकल्पनीय विनाश हो चुका था. तब किसी ने पूछा था गांधी से : आप परमाणु बम का अहिंसा से कैसे मुकाबला करेंगे पूछने वाले ने सोचा था कि गांधी निरुत्तर रह जाएंगे लेकिन गांधी ने जवाब टाला नहींवे हिचके भी नहीं. कहा : विनाश का मुकाबला अकंप वीरता से ही किया जा सकता है. उन्होंने बात साफ की : जब बम ले कर आसमान में विमान आएगा तब मैं किसी खाई-खंदक में छुपूंगा नहींबल्कि खुले मैदान में निकल आऊंगा और अपलक उस विमान को देखता रहूंगा जो संपूर्ण विनाश ले कर आया है. मैं जानता हूं कि उस विमान का पायलट उस ऊंचाई से मुझे देख नहीं सकेगा लेकिन मैं तो उसे अपलक देख सकूंगा. बम उन सबको मार जाएगा जो बचने की कोशिश करेंगेलेकिन वह उन सबको मार ही नहीं सकेगा जो मरने का भय छोड़ करउसकी आंखों-में-आंखें डाले सकेंगे ! … फिल्मी डायलॉग है : जो डर गया वो मर गयागांधी कहते हैं : करो या मरो ! 

   कायर सवाल पूछते ही रहते थे : ऐसा हो सकता है क्या सामने से आती मौत की तरफ कैसे देखता रह सकता है कोई गांधी कैसी अविश्वसनीय-अव्यवहारिक बात कह रहे हैं ! 7 अप्रैल 2026 के बाद कोई ऐसा नहीं कह सकेगा. ईरान की बहादुर जनता ने विनाश के समक्ष आत्मबल का सर्जन करने की गांधी की कल्पना के समर्थन में अपना वोट दे दिया है. जो कल तक अहिंसक कल्पना थीआज हकीकत बन गई है. गांधी कहते हैं : छिप कर भी मारे जाओगे लेकिन उस मौत में से असहायता व कायरता निकलेगीमौत की आंखों में आंखें डाल कर मरोगे तो उसमें से चरम वीरता निकलेगी जो मारने वालों को असहाय व व्यर्थ बना देगी.  

   युद्धहिंसा,विनाश और शत्रुता के खिलाफ जो सदा ही अपनी आवाज़ बुलंद करता रहामानव-मन में गहरी पैठी हिंसा व प्रतिशोध की भावना की जड़ें अहर्निश काटता रहाजो इन सबके विरुद्ध आज तक मनुष्य द्वारा उठाई सबसे अटूटसशक्त व सक्रिय आवाज हैउस गांधी के लिए युद्धहिंसाप्रतिशोध  अजनबी नहीं थे. वह युद्ध के मोर्चे पर फौजी अधिकारी बन कर उतरा थादो-दो विश्वयुद्ध की विभीषिका उसने देखी व झेली थीउसने अपने मुल्क की नवजात आजादी पर पड़ोसी का फौजी हमला देखा था और उससे युद्ध करने वाली फौज को आशीर्वाद भी दिया थाअपनी हत्या के पांच प्रयासों के बावजूद बगैर किसी कड़वाहट के उसने मानवीय आजादी व गरिमा का अपना अभियान जारी रखा थाजैसा सांप्रदायिक उन्माद संसार ने पहले देखा नहीं था वैसे सांप्रदायिक उन्माद में पांव-पांव लगातार भटकता रहा था वहसांप्रदायिक हिंसा के कई थपेड़े उसने झेले थे और फिर उसी सांप्रदायिक आग में जल कर वह भस्म हुआ था. तो हम कह सकते हैं कि गांधी ने युद्ध के खिलाफ तमाम उम्र युद्ध ही लड़ा ! आज ईरान ने कहा है : हर युद्ध के अंत में बचते हैं गांधी हीक्योंकि वे हिंसाघृणा व प्रतिशोध के सामने कभी सर नहीं झुकाते हैं. ( 11.04.2026)