गांधी और उनसे जुड़े इतिहास के बारे में संघ परिवारी जब भी कुछ कहते या लिखते हैं, मैं उसे पढ़ने या उसका जवाब देने की सोचता भी नहीं हूं. इसलिए कि उनकी अवधारणाओं की पीछे निरपवाद रूप से सावरकर-गोलवलकर की वे फूहड़ सीखें होती हैं जिनका आधार मात्र गांधी-द्वेष व अंग्रेजों की गुलामी से प्रेम होता है. इनका इतिहास से और सत्य से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता है. लेकिन इस बार मैं अपना रवैया बदल कर यह लिख रहा हूं, क्योंकि 31 जनवरी 2026 के अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में, राम माधव ने नाथूराम गोडसे की आड़ में छिप कर गांधी पर वार करने की बचकानी कोशिश की है. राम माधव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मान्य प्रवक्ता हैं जो संघ परिवार की चिर-परिचित रणनीति के मुताबिक, अलग-अलग मंचों से, अलग-अलग भूमिका में अपनी एक-सी ही बातें रखते रहते हैं. इन दिनों किसी ‘इंडिया फाउंडेशन’ के मंच से वे अपनी बात रख रहे हैं.
अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका हिंदी करूं तो कुछ ऐसा बनता है : शैतान बाइबिल को उद्धृत कर आपको भरमाना चाहता है. राम माधव का पूरा लेख कुछ ऐसा ही है जो गांधी के बारे में या इतिहास के बारे में या गांधी-हत्या के इतिहास के बारे में कम, उनकी अपनी मंशा के बारे में ज्यादा बताता है. उनकी कुल मंशा यही है कि नाथूराम गोडसे की आड़ में गांधी-हत्या को जायज ऐतिहासिक आधार दिया जाए. इन दिनों राम माधव की या संघ परिवारी बौद्धिकों की योजनाबद्ध कोशिश चल रही है कि जीते जी जो गांधी कभी हाथ नहीं आए, अब दूसरे रास्ते उनका काम तमाम किया जाए. इतिहास की यह त्रासदी उन सबको झेलनी पड़ती है जिन्होंने इतिहास बनाने का उद्यम कभी किया ही नहीं. किया है तो बस इतना ही कि इतिहास के साथ खेला है. जो डोर आपने कभी हाथ में धरी ही नहीं, उस डोर पर जब आप अपनी पतंग उड़ाना चाहते हैं तो आपकी पतंग भी व आप भी चारो खाने चित्त गिरते हैं. संघ परिवार के साथ हमेशा ऐसा ही होता है.
बक़ौल राम माधव, “ नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या इसलिए की कि उनका आरोप था कि गांधीजी ने तब राष्ट्रघात किया था, जब उन्होंने देश के विभाजन को अपनी स्वीकृति दी थी. नाथूराम का मानना था कि यदि गांधीजी ने ईमानदारी से पाकिस्तान का विरोध किया होता तो न मुहम्मद अली जिन्ना, न ब्रिटिश ही पाकिस्तान बना पाते.”
जब आप इतिहास को इस तरह उद्धृत कर, आगे बढ़ जाते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि आप उस स्थापना का समर्थन करते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो गांधी का कोई भी अध्येता ऐसे उद्धरण के बाद यह जरूर लिखता कि नाथूराम गोडसे की ऐसी धारणा का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं था, क्योंकि गांधीजी ने कभी भी देश विभाजन को स्वीकृति नहीं दी थी. यदि नाथूराम का यह कथन अदालत में दिए उनके बयान “ मैंने गांधी को क्यूं मारा” से लिया गया है, तो इतिहास का हर अध्येता यहां यह भी लिखता कि अदालत का यह बयान, जिसे संघ परिवार छपवाता ही रहता है, न तो कोई ऐतिहासिक दस्तावेज है, न अब यह कोई छिपी बात रह गई है कि यह सब लिखा तो सावरकर ने था जिसे नाथूराम के मुंह से कहलवाया गया था. संघ परिवार की रणनीति रही है कि झूठ सौ मुंह से निरंतर बोला जाए तो कुछ वक्त के लिए वह सच का दर्जा पा लेता है. राम माधव ने तो ‘गांधीजी की ईमानदारी’ पर ऊंगली उठाने वाली सावरकर-नाथूराम की बात से भी असहमति नहीं लिखी ! गांधीजी अपनी हर बात ईमानदारी से कहते थे व अपना हर कदम ईमानदारी से उठाते थे, इतनी ईमानदारी से कि उसके पीछे पागलों-से पड़ जाते थे, यह तो ‘गांधीजी के दुश्मन’ भी मानते थे. फिर देश विभाजन का उन्होंने ‘ईमानदारी से विरोध’ नहीं किया, ऐसी बात यदि सावरकर-नाथूराम ने कही, तो क्या आप इतिहास के अध्येता बन कर उसका प्रचार करेंगे; या उससे अपनी असहमति ज़ाहिर करेंगे ?
देश विभाजन के पीछे का इतिहास लंबा है, और किन-किन ताकतों की क्या-क्या भूमिका रही है, यह सब जानना जरूरी भी है. लेकिन इस लेख में अभी वह सब समेटना संभव नहीं है. इतना जानना जरूरी है कि जिन्ना की मुस्लिम लीग व सावरकर मार्का हिंदू संगठनों की रची सांप्रदायिक आग की हर लपट से जूझते हुए गांधीजी जब देश भर में ‘मानवी दमकल’ बने भाग रहे थे, तभी दिल्ली में बैठे सभी रंग-ढंग ने नेताओं ने अंग्रेजों के साथ मिल कर विभाजन का नक्शा बनाया था. इसकी एक भी लकीर गांधी न तो खींची थी, न गांधी के मश्विरे से बनी थी. फिर भी राम माधव ने लेख के अंत में अपना मंतव्य लिखा है कि ‘विभाजन’ के हालात पैदा करने के आरोप से गांधी पूरी तरह बरी नहीं किए जा सकते हैं. आगे वे पूछते हैं : “ लेकिन क्या वे इसके लिए अकेले जिम्मेवार थे ?” फिर ख़ुद ही जवाब देते हैं : “ गोडसे ऐसा मानते थे, देश नहीं मानता था.” लेकिन राम माधव यह नहीं लिख सके देश जो मानता था, पूरा संघ परिवार वह कभी मानता ही कहां था ?
नोआखाली का अपना अभियान पूरा कर, 77 साल के गांधी जब 1947 में दिल्ली लौटे तब तक विभाजन की शतरंज पर सारी गोटियां बिठाई जा चुकी थीं. अब वहां कोई भी उत्सुक नहीं था कि बंटवारे की चर्चा इस बूढ़े से की जाए - सभी वाइसरायों की तरह नये वाइसराय माउंटबेटन को भी लंदन ने इस बूढ़े की तरफ से सावधान किया था; जिन्ना तो गांधी से जितनी दूरी रखनी संभव थी, उतनी दूरी रखते ही थे; कांग्रेस के सारे बड़े नेता अब गांधी से दूरी ही नहीं रख रहे थे बल्कि उनसे बच कर चल रहे थे. यह इस हद तक था कि अंतत: गांधी ने ही सरदार को कुछ ऐसा लिखा कि मैं यहां जब से आया हूं, ऐसा महसूस कर रहा हूं कि एक मैं ही हूं कि जिसके पास कोई काम नहीं है… आप सबके पास तो पल भर का भी समय नहीं है. जब बंटवारे की बात उनके साथ बांटने को भी कोई तैयार नहीं था तब कोई ऐसा कैसे लिख सकता है कि बंटवारे की परिस्थिति बनाने की जिम्मेवारी से गांधी भी बरी नहीं किए जा सकते हैं ? समझना ही हो तो यह समझना आसान है कि गांधी का ऐसे माहौल में काम करना कितना कठिन रहा होगा. लेकिन कांग्रेस के लिए गांधी की पूर्ण उपेक्षा संभव नहीं थी, न गांधी उदासीन रहने को किसी तरह तैयार थे. इसलिए बात धीरे-धीरे खुलती गई कि जवाहरलाल, सरदार, मौलाना आजाद, आचार्य कृपालानी आदि सबने विभाजन को नैतिक व लिखित स्वीकृति दे दी है. गांधी ने इन सबको बड़ी कठोरता से अपने कठघरे में खड़ा भी किया. लेकिन दोषरोपण से बात पूरी तो होती नहीं थी, क्योंकि गांधी सितंबर 1940 में कहा अपना यह कथन भूले नहीं थे : “ भारत को दो टुकड़ों में बांटना भारत को एनार्की में झोंक देने से भी बुरा होगा. इसे तो बर्दाश्त किया ही नहीं जा सकता है. मैं उन सबसे कहूंगा : भारत का विभाजन करने से पहले आपको मेरा विभाजन करना होगा… विभाजन मेरी लाश पर ही होगा !” इसलिए जो बाजी कांग्रेस हार चुकी थी, उसे पलटने का लगभग असंभव-सा काम गांधी ने आप ही अपने सर ले लिया. इसे गांधी या दुर्भाग्य कहिए या जिन्ना का सौभाग्य कि इतिहास जब इस मोड़ पर पहुंचा तब सिंध के जी.एम. सैयद, सीमा प्रांत के डॉ. खान साहब, पंजाब के खिजर हयात खान जैसे लोग दुनिया छोड़ कर जा चुके थे. ये सब होते तो जिन्ना को मुसलमानों की एकमात्र आवाज बनने का मौका मिलता ही नहीं और ये तीनों गांधी के साथ खड़े होते. लेकिन काल जिन पन्नों को पलट देता है, उन्हें फिर कौन खोल सकता है.
इसके बाद की कहानी एकदम सीधी-सपाट है. उसे मुख्तसर में मैं ऐसे सुना सकता हूं :
विभाजन टालने की अपनी कोशिश में गांधी सबसे पहले नये वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन के दरवाजे पहुंचे. उनके पास माउंटबेटन से न कहने को बहुत कुछ था, न शिकायत करने को. माउंटबेटन से सब कुछ जानने-समझने के बाद गांधी ने उनसे इतना ही कहा कि आप जो करना चाहते हैं, उसमें जल्दीबाजी मत कीजिए. मुझे थोड़ा वक्त चाहिए. माउंटबेटन का जवाब एकदम सीधा था : मैं किसी जल्दीबाजी में नहीं हूं. मैं एक कैलेंडर के साथ यहां भेजा गया हूं. मुझे उसके भीतर सत्ता हस्तांतरण का काम पूरा करना ही है, फिर यह काम देश के विभाजन के साथ हो या विभाजन के बिना, यह देखना आप सबका काम है. विभाजन के बिना हो तो मुझे खुशी होगी ( यह वह झूठ था जिसे लगातार बोलते रहने की भूमिका माउंटबेटन को दी गई थी) लेकिन विभाजन ही रास्ता बचा हो तो मैं उधर जाने से भी पीछे नहीं हटूंगा.
गांधी समझ गए कि यह पहला दरवाजा बंद है.
अब उन्होंने पाकिस्तान का झंडा उठाए मुहम्मद अली जिन्ना का दरवाजा खटखटाया : आपको पाकिस्तान ही चाहिए न ! वह भी हो जाएगा… हम एक बार अंग्रेजों को यहां से विदा कर लें फिर आपस में बैठ कर बंटवारा भी कर लेंगे …
जिन्ना साहब ने टका-सा जवाब दिया : नहीं, यह बंटवारा तो अंग्रेजों की उपस्थिति में ही हो जाना चाहिए. आप हिंदुओं का बहुमत है. हम दोनों के बीच अंग्रेज नहीं रहे तो पता नहीं आप लोग हमारा क्या हाल करेंगे…
गांधी समझ गए कि यह दूसरा दरवाजा भी बंद है.
अब वे अपने जवाहर व सरदार के दरवाजे पहुंचे: एक रास्ता है जिससे विभाजन तत्काल टल सकता है… आप दोनों माउंटबेटन से कहें कि वे भारत की सत्ता जिन्ना साहब को सौंप दें तथा जिन्ना साहब केवल लीग के लोगों को ले कर अपनी सरकार बनाएं. कांग्रेस बाहर से लीग की सरकार का समर्थन करेगी.
राम माधव ने इस प्रसंग का जिक्र तो किया है लेकिन साथ में अपनी टिप्पणी भी जोड़ी है : “ नेहरू व पटेल ने इसका कड़ा विरोध किया.” यह तथ्य वे कहां से निकाल लाए ? प्यारेलालजी की जिस किताब, ‘द लास्ट फेज’ या ‘पूर्णाहुति’ का बड़े अनमने ढंग से, अपने मतलब से राम माधव ने जिक्र किया है, उसमें ऐसा कुछ तो नहीं लिखा है.
यह कहानी थोड़ा पीछे से शुरू होती है. 1 अप्रैल 1947 को गांधी ने अपना यह ‘विचित्र प्रस्ताव’ सबसे पहले निजी बातचीत में वाइसराय माउंटबेटन के सामने रखा. जिस विभाजन को कांग्रेस में चाहता कोई नहीं था लेकिन जिसके सामने सभी निरुपाय थे, उसे पीछे ठेल कर, देश को एक नई संभावना के सामने खड़ा करने की उनकी यह ठोस योजना थी. इस योजना में वे जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रहे थे, और कांग्रेस को इस प्रस्ताव के लिए राजी करने की जिम्मेवारी भी ले रहे थे.
निजी स्तर पर रखे गांधी के इस प्रस्ताव से माउंटबेटन के होश उड़ गए. उन्हें जिस विभाजन को साकार करने का जिम्मा दे कर यहां भेजा गया था, गांधी उसमें पलीता लगा रहे थे. माउंटबेटन समझ गए और अपनी टीम से बातचीत में उन्होंने कहा भी कि गांधी का यह प्रस्ताव ऐसा है जिसे जिन्ना आसानी से मना नहीं कर सकेंगे. उन्होंने भारतीय नौकरशाहों की अपनी टीम को समझाया कि गांधी के इस प्रस्ताव के खिलाफ माहौल बनाना हमारा पहला काम है. लंबे समय से साम्राज्य के आकाओं के साथ काम कर रहे वी.पी.मेनन को माउंटबेटन ने इस अभियान की कमान सौंपी. वी.पी. मेनन ने एक गुप्त दस्तावेज तैयार किया : गांधी की योजना के संदर्भ में हमारी रणनीति !
मेनन सरदार के खास सलाहकार थे. सरदार लीग के साथ कैसा भी नाता रखने के प्रबल विरोधी तथा विभाजन के प्रस्ताव के पीछे मजबूती से खड़े थे. सरदार को अपने पाले में करने के पीछे इन्हीं मेनन को लगाया गया. जिस सुबह गांधी ने माउंटबेटन से अपनी योजना बताई थी, उसी दोपहर हम मेनन को सरदार के साथ बैठा पाते हैं. इसके बाद पटेल-माउंटबेटन की मुलाकात भी हुई. 5 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन के साथ दोपहर का खान खाने जिनको आमंत्रित किया गया, वे थे नेहरू के परम मित्र कृष्ण मेनन. उन्हें नेहरू को संभालने का काम सौंपा गया. पूरी टीम की सम्मिलित कोशिश एक ही थी : किसी भी तरह गांधी-प्रस्ताव दम तोड़ दे.
मौलाना आजाद से जब माउंटबेटन ने गांधी-प्रस्ताव का जिक्र किया तो उनके जवाब वे हैरान रह गए. मौलाना ने कहा कि ऐसी बात तो गांधी ही सोच सकते हैं और यह ‘बड़ा उपयुक्त’ प्रस्ताव है : मुझे तो लगता है कि जिन्ना इसे कबूल कर लेंगे. माउंटबेटन के लिए आफत और बड़ी हो गई.
9 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन ने जिन्ना के सामने यह प्रस्ताव रखा लेकिन गांधी के प्रस्ताव के रूप में नहीं, अपने प्रस्ताव के रूप में : मेरा सपना ही समझिए इसे ! मैं चाहता हूं कि भारत की केंद्रीय सरकार प्रधानमंत्री जिन्ना के नेतृत्व में बने. माउंटबेटन ने इस मुलाकात के बारे में इस तरह लिखा है : … मेरे प्रस्ताव रखने के बाद जिन्ना लंबे समय तक मुझसे अपनी दूसरी बातें कहते रहे जैसे मेरे सपने वाली बात कहीं दर्ज ही नहीं हुई… फिर अचानक ही, बिना किसी प्रसंग के बोले : तो आप मुझे भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं ! … उनके चेहरे की चमक से माउंटबेटन समझ गए कि यह बात कहीं उनके भीतर पहुंच गई है. यह चमकीली संभावना जिन्ना को भविष्य के बारे में सचेत कर गई है, यह माउंटबेटन ने साफ समझ लिया. उनकी आफत और बड़ी हो गई. वे कल्पना कर पा रहे थे कि यह प्रस्ताव जब गांधी के मुंह से जिन्ना सुनेंगे तो क्या आलम होगा.
अब हम उस तीसरे दरवाजे की तरफ लौटते हैं जहां गांधी सरदार और जवाहरलाल से अपने इस प्रस्ताव का जिक्र कर रहे हैं. माउंटबेटन को वे जो पहले ही बता चुके थे, वही उन्होंने इन दोनों को भी बताया. दोनों में से किसी ने भी उसका मुखर विरोध नहीं किया लेकिन गांधी को यह समझते देर नहीं लगी कि उनका प्रस्ताव दोनों को रास नहीं आया. उन्माद के बल पर अपनी शर्तें मनवाने का लीग का रवैया, सांप्रदायिक दंगों व अंतरिम सरकार का कटु अनुभव दोनों को सावधान कर रहा था. उनमें लीग के प्रति गहरी हिकारत भरी थी, तो आश्चर्य कैसा ! लेकिन इतिहास कई बार हमें ऐसी जगह ला खड़ा करता है जहां बड़ी संभावनाओं को साकार करने लिए, अपना जहर ख़ुद ही पीना पड़ता है. गांधी के सामने सबसे अहम सवाल था कि विभाजन टाल कर, अंग्रेजों की चाल कैसे विफल की जाए. वे यह भी जान रहे थे कि अंग्रेजों के इस खेल में जिन्ना उनके खास मोहरे हैं. उस मोहरे को बेकाम करने का रास्ता भी उन्हें निकालना था. नेहरू-सरदार दोनों ने एक-सी ही बात कही: आप कह रहे हैं तो हम इसका विरोध नहीं करेंगे लेकिन यह प्रस्ताव ले कर हम देश के सामने नहीं आएंगे. यह काम आपको स्वयं ही करना होगा. और यह भी कि इसकी जो प्रतिक्रिया देश भर में होगी, उसमें भी हम आपके साथ खड़े नहीं रह सकेंगे. वह दावानल भी आपको अकेले ही झेलना होगा.
यह तीसरा दरवाजा इस तरह बंद हुआ.
कांग्रेस पर अपने असर का उनका आकलन गलत साबित हो रहा था. किसी से भी उन्हें सहमति तो दूर, सहानुभूति भी नहीं मिली. बस एक बादशाह खान थे जो चट्टान की तरह उनके साथ खड़े थे. जयप्रकाश मार्का समाजवादी, जिन्हें गांधी चाहते भी थे और मानते भी थे, जिन्हें वे साथ लेना भी चाहते थे, वे सब विभाजन के विरोध में तो थे लेकिन गांधी के साथ नहीं थे. फिर भी गांधी तो गांधी थे. आसानी से हार कैसे मानते !
उन्होंने फिर नेहरू-सरदार को विश्वास में लेने की पहल की : तुम लोगों ने माउंटबेटन को विभाजन की स्वीकृति का वादा किया है तो मैं तुम लोगों से वादाखिलाफी करने को कैसे कह सकता हूं. तुम दोनों इतना करो कि माउंटबेटन से कहो कि हम अपने वादे से मुकरते नहीं हैं लेकिन हम गांधी की सहमति के बिना इससे आगे नहीं जा सकेंगे. आपको गांधी को तैयार करना होगा. उन्हें मुझसे बात करने दो, मैं कोई रास्ता निकाल लूंगा ! गांधी इन दोनों से जो कोरा चेक मांग रहे थे, वह तो इन दोनों ने कब का माउंटबेटन को दस्तखत कर के दे दिया था ! दोनों के पास गांधी को देने के लिए कोरे इंकार के अलावा अब बचा ही क्या था !
इतिहास तेजी से गांधी को पीछे छोड़ता जा रहा था.
तीनों दरवाजों का हाल जानने के बाद अब गांधी ने सारी परिस्थिति का अपना आकलन किया : आम तौर पर विभाजन के बारे में मेरी राय के साथ आज जनमानस नहीं है. क्या इस नाज़ुक वक्त में जन-भावना के खिलाफ जाने का अभियान मुझे चलाना चाहिए ? इस वक्त कांग्रेस का प्रमुख नेतृत्व भी मेरे साथ नहीं है. आज मैं जवाहरलाल, सरदार, मौलाना, राजेन बाबू, राजाजी जैसा दूसरा नेतृत्व खड़ा करूं, यह संभव नहीं है. मुसलमानों पर मेरा जो असर था, वह भी आज नहीं रहा है. लीग उनसे मनमाना खेल करवा रही है. अंग्रेज किसी भी तरह विभाजन से पीछे हटेंगे नहीं. ऐसे में मैं किसी आंदोलन की बात देश के सामने रखता हूं, तो देश की जनता को अंग्रेजों-लीगियों-कांग्रेसियों के तिहरे दमन की चक्की में पिसना होगा. कोई उनकी रक्षा के लिए सामने नहीं आएगा. मुझे यह भी दिखता है कि देश में आपाधापी का माहौल बनेगा तो संभव है, रियासतों को भारत के खिलाफ भड़का कर अंग्रेज आज की मुसीबत को गहरा कर दें. बाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों को एक साथ फट पड़ने का मौका देना अभी सही होगा ? मैंने तो अपनी लाश पर बंटवारे की बात कही थी, यहां तो निरीह लोगों की लाशें बिछ जाएंगी… यह सारा कुछ गांधी ने कभी स्वगत, कभी पत्र में, कभी चर्चा में अपनी तरह से कहा. जैसे हर लड़ाई में सेनापति परिस्थितियों का आकलन करता है, गांधी ने भी किया; जैसे हर सेनापति अपनी रणनीति में जरूरी बदलाव करता है, गांधी ने भी वैसा ही किया. उन्होंने लड़ाई का मोर्चा बदलने का निश्चय किया.
11 अप्रैल 1947 को उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखा : मैंने आपके सामने जो एक प्रस्ताव रखा था उस बारे में पंडित नेहरू से मैंने कई बार छोटी-छोटी चर्चाएं कीं, कल रात हम दोनों के बीच एकांत में लंबी बातचीत भी हुई. कांग्रेस कार्यसमिति के दूसरे भी कई सदस्यों से मेरी बात हुई. मुझे खेद है कि सिवा बादशाह खान के मैं इनमें से किसी को भी अपने प्रस्ताव के साथ जोड़ नहीं सका… इसलिए अब आप मुझे बाद कर के ही आगे की सोचें… अंतरिम सरकार में जो कांग्रेसजन हैं वे सब देश के तपे-तपाये सेवक हैं और उनकी राय ही कांग्रेस की आधिकारिक राय है… मैं अब बिहार जा रहा हूं…
आगे-पीछे की बहुत सारी बातें छोड़ कर अब हम गांधी को बिहार जाने दें और यह समझने की कोशिश करें कि राम माधव ने जिसे ‘वह उलझन, जिसे अपने आखिरी दिनों में गांधी सुलझा नहीं सके’ कहा है, क्या वैसी कोई उलझन गांधी में आपको दिखाई देती है ? वे शुरू से अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे. विभाजन चाहने व करने वाली ताकतों का हर स्तर पर मुकाबला करते रहे. विभाजक ताकतों को सीधी चुनौती देते रहे. लेकिन इतिहास सीधी रेखा में चलता कहां है ! इसलिए नये रास्ते व नये मौके बनाने व पहचानने पड़ते हैं.
गांधी ने कभी भी विभाजन का समर्थन नहीं किया; तब भी नहीं जब उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति को संबोधित करते हुए कहा कि विभाजन का जो फैसला आपके नेताओं ने किया है, उसे स्वीकार कर लीजिए. यह विभाजन की स्वीकृति नहीं, बाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों के एक साथ फट पड़ने से देश को बचाने की उनकी कोशिश थी. गांधी उलझन में थे या दूसरे वे सभी जो विभाजन चाहते तो नहीं थे लेकिन इंकार भी नहीं कर पा रहे थे; जो दिल से विभाजन चाहते तो थे लेकिन किसी दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने की चालाकी में लगे थे या जो विभाजन से अपनी स्वार्थ सिद्धि चाहते थे, उलझन में थे ? गांधी से अपनी असहमति बताने वाले राम माधव या दूसरे कोई कभी यह क्यों नहीं बताते हैं कि उन्होंने विभाजन रोकने या टालने के लिए क्या किया ? संघ परिवार अपने प्रयासों के बारे में भी तो देश को कुछ बताए ! लेकिन वहां तो एकदम सन्नाटा है.
06/02/26