Friday, 31 July 2026

जेन-झी सुनो !

   मैं, जो अब उम्र की 76वीं सीढ़ी पार करने जा रहा हूं, नहीं जानता हूं कि यह जेन-झी  क्या है ! अगर यह गणित का वैसा ही अर्थहीन खेल है जैसा इसे बतलाया जा रहा है, तो मुझे इसमें दिलचस्पी नहीं है. कुंडली बांचनेवाले, रेखाओं से भविष्य बतलानेवाले, सितारों व ग्रहों का हिसाब लगा कर भूत-भविष्य तय करनेवाले खेल मुझे खेल से ज्यादा कभी कुछ लगे ही नहीं. इसलिए कौन, कौन से वर्ष-खंड में पैदा हुआ है, इससे उसका जेनरेशन तय करनेवाला खेल भी मुझे मतलब का नहीं लगता है.  

   मैं उम्र का फर्क समझता हूं. मैं ताज़ादम शरीर की कीमत जानता व मानता हूं. मैं जानता हूं और मानता हूं कि तुमजो मुझसे 50-60 वर्ष बाद पैदा हुए होमुझसे ज्यादा दौड़ सकते होहवा में उड़ सकते होशिखर से छलांग मार सकते होबादलों में जा सकते होचांद-सितारे छू सकते हो. यह सब कभी मैंने भी किया हैआज भी ऐसा करने की हसरत रखता हूं. लेकिन कर नहीं सकताक्योंकि हमारा हो कि तुम्हारायह शरीर है तो एक मशीनऔर हर मशीन की तरह इसकी एक एक्सपायरी डेट भी है. कारखानों की मशीनों की एक्सपायरी डेट उस पर लिखी आती है. यहां मजा यह है कि हमारी एक्सपायरी डेट है तो ज़रूर ही लेकिन हममें से किसी को उसका पता नहीं है. इसलिए फिर हमारे हाथ में बच रहता है उमंग से भरा मनसंकल्प से भरा दिल और सपनों से भरी आंखें ! अगर जेन-झी से तुम्हारा मतलब इन सबसे है तो मैं तुम सबके बराबर और तुम सबके साथ जेन-झी हूं. 

   मैं उस महात्मा गांधी से प्रेरित हूं जिसने 80 साल की उम्र तक - यानी गोली से मारे जाने तक - अपने सपनों के हर हत्यारे से अथक लड़ाई कीऔर जब मारा गया तो भी उसने इस तरह मौत को गले लगाया कि सारी दुनिया ने सर झुका कर यही कहा कि जीना भी ऐसा ही होमरना भी ऐसा ही. अभी-अभीतुम्हारे आसपास से ही एक आवाज उठी जो मैंने सुनी. वह कह रही थी : जेन-झी यानी जेनरेशन गांधी ! यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारे साथ हूंमुझे साथ ले लो ! 

   मैं जंतर-मंतर पर लगातार था और तुम लोगों को खुलते-खिलतेरचते-मिटातेनाचते-गातेअपने सपनों को साझा करते देख रहा था. मैं तुम्हारी गति भी देख रहा थातुम्हारी कल्पनाशीलता भी. मैं अनशन की तुम्हारी दृढ़ता भी देख रहा थातुम्हारा संयम भी. मैं इन सबको जोड़ कर कहूं तो कहूंगा कि मैं नया भारत देख रहा था. इस भारत में कुछ फिसलन भी थीलड़खड़ाहट भीकुछ बेढ़बपना भी थाकुछ अनगढ़ता भी ! मैं भी तो इन सबके साथ ही जीता-बढ़ता आया हूं. यह हमारे साथ चलनेवाली परछाईं है और मुझे अपनी परछाई कभी भी बोझ नहीं लगती है. तुम सब मुझे मेरे जैसे ही लगते हो. हम सबको समझना इतना ही है कि जो अनावश्यक हैअसंस्कृत हैकुरूप हैहमें ऊपर उठाता नहींनीचे खींचता हैउन सबसे मुक्ति पानी है. जैसे सांप केंचुल छोड़ता है नवैसे ही इन सबको हमें छोड़ते चलना है. यह आसान नहीं है लेकिन इसके बिना कल्याण भी नहीं है. इसलिए बोलने-लिखने-गाने-नारे लगाने तथा संवाद करने में हर फिसलन से हमें बचना है.  

   अब हम जंतर-मंतर से बाहर आते हैं. वहां तुम सबने क्या-क्या कियावह गाथा इतिहास दर्ज कर चुका है. वह उसे दोहराता भी रहेगा. हम क्यों दोहराएं ! वह भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णिम अध्याय है. तुम्हारी बोली से किसी सत्ता का अहंकार टूट गया है. वह औचक देख रही है कि यह आंधी आई कहां सेऔर वह किसी शिकारी कुत्ते-सी सूंघ रही है कि यह किधर जा रही है. जब सत्ता-प्राप्ति अंतिम सत्य बन जाती है तब अहंकार बारूद का काम करता हैऔर बारूद है तो वह फटेगा ही ! धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा एक आदमी का इस्तीफा नहीं हैसत्ता के अहंकार के टूटने की गूंज है. वह टूटा यह अच्छा हुआ. लेकिन तुम याद रखना कि चोट खाया सांप ज्यादा ख़तरनाक होता है. राष्ट्र जब भीड़ में बदल दिया जाता है तब वह हत्यारा हो उठता है जिसे राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है. देशप्रेम व राष्ट्रवाद दो सर्वथा भिन्न भाव ही नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के विरोधी भाव भी हैं. 

   इसलिए सुनो जेन-झीअब तुम्हें तोड़ने के सारे संभव तीर चलाए जाएंगेसारे हथकंडे अपनाए जाएंगे. तुम्हारे साथी खरीदे-बेंचे जाएंगेतुम्हारे सामने जेन-झी  की एक नई जमात खड़ी कर दी जाएगी. तुम आसानी से देश भर में न घूम पाओगेन जी पाओगे. राजनीतिक दलों का जंगल तुम्हारे सामने खुला है ताकि तुम उनमें से किसी में अंटक-भटक जाओ. हर जगह तुम्हारे सामने एक जंतर-मंतर होगा जो सवाल करेगा व जवाब भी पूछेगा. इसलिए निजी जीवन में साफ व संयमित रहो. एक-दूसरे से जितना संभव होसंवाद बनाओ. लगातार-लगातार देश भर के अपने युवकों के बीच जाओ. अपने बीच की खाइयां पाटो. याद रखो कि प्रतिवाद में सारा कुछ नकारात्मक चल भी जाता हैपरिवर्तन का आंदोलन नकारात्मक भीसकारात्मक भीरचनात्मक भी और दूरगामी भी- ऐसे सारे तत्वों का एक पुंज होता है. हमें वह पुंज तैयार करना है. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआधर्मेद्र प्रधानों के इस्तीफे होते भी रहेंगे लेकिन तंत्र पर लोक की - जेन-झी  की !- पकड़ कैसे बने व बनी रहेइसका जवाब हमें खोजना हैसिद्ध करना है. अगर हम यह कर सके तो दुनिया भर का लोकतंत्र हमारा ऋणी रहेगा.

   क्यूबा के अमर क्रांतिकारी चे ग्वुवेएराजिनकी तस्वीर तुम्हारे टी-शर्टों पर मैं देखता रहा हूंवे जब भारत आए और गांधी को थोड़ा जाना-समझा तो राजघाट जा कर लिखा कि क्रांति का एक तरीका यह भी हैयह तो हम जानते ही नहीं थे ! इतिहास तुम्हें  ऐसा कहने का अवसर नहीं देगाक्योंकि तुम चे के बहुत-बहुत बाद पैदा हुए हो. तुम्हारे पास जानकारियों की अत्यंत कुशल व व्यापक तकनीक है. इसलिए हमें विचार-संपन्न होना होगा. दूसरी विपन्नताएं चल भी जाएंगीविचारों व विकल्पों की विपन्नता नहीं चलेगी. 

   जब तुम जंतर-मंतर से निकल कर अपने घरों में पहुंचोगे तो पाओगे कि अपना घर भी धर्मेंद्र प्रधानों से भरा है. हमें घर-घर में उनका मुकाबला करना है. वहां जेन-झी है ही नहीं. गांधी ने धुर 1948 में कहा था न कि मुझे अब जो लड़ाई लड़नी है वह साम्राज्यवाद से लड़ी लड़ाई से भी ज्यादा दुर्धर्ष होगीक्योंकि यह अपनों से है. तुम्हें भी अपने हर घर मेंहर कमरे में यह लड़ाई लड़नी होगी. इसके बिना सफलता होगी नहींटिकेगी नहीं. इसलिए घर में फैली व फैलाई जा रही हर संकीर्णता से मुखर होकर- अपनों के सामने सत्याग्रह करो  ! 

   घर से बाहर आओगे तो समझ सकोगे कि पिछले कोई पंद्रह सालों में इस सरकार ने योजनापूर्वक भारतीय राष्ट्र की तमाम सांस्कृतिक-शैक्षणिक-सामाजिक-बौद्धिक व्यवस्थाओं में उसी सांप्रदायिक संगठन के लोगों को ठूंस-ठूंस कर भर दिया है जो नैतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से देश के सबसे विपन्न लोगों का हिंसक जमावड़ा है. इनसे कदम-कदम परहर स्तर पर लड़ना होगा. हमें सीखना होगा कि गांधी ने इन्हें कैसे भारतीय समाज के चित्त से करीब-करीब बाहर ही कर दिया था. इसी बौखलाहट में इन्होंने उनकी हत्या की थी. इसलिए इनसे अंतिम लड़ाई हम पर उधार है.   

   नीट व दूसरी परीक्षाओं का पेपर लीक किसी चूक की वजह से नहीं हुआ है. जब सारा देश एक धंधे में बदल दिया जाता है तब हर कुछ बिकता है- परीक्षाएं भीपेपर भीराम मंदिर व दूसरे तमाम धर्मों के प्रतीक-स्थलों का चढ़ावा भीनौकरियां भीरोज़गार भीन्याय भीसपने भी ! सोचो नजब सरकार ही बिकाऊ विधायकों व सांसदों से बनाने का नया फ़ैशन चलाया गया हैतब क्या है जो बाज़ार में नहीं हैबिकाऊ नहीं है 

   तो लड़ाई यहां है जेन-झी ! लड़ोगे न जो नहीं लड़ेगा वह गणित से भले जेन-झी कहलाएहोगा वह कायर ! तो जेन-का और जेन-झी में से चुनना है तुम्हें ! ( 31.07.2026)

Thursday, 9 July 2026

बात एक जुगनू की !

    अंधकार जब बेहद घना होता है तब जुगनू भी रास्ता दिखाने लगते हैं. जुगनू इसलिए बहुत अच्छे व जरूरी होते हैं, क्योंकि वे सूरज की बाट नहीं जोहते; अंधकार है तो जुगनू हैं और वे अंधकार को चुनौती देने से चूकते नहीं हैं. इंसानों में रोशनी की आस बनी रहे, जुगनू इसलिए ही होते हैं. जुगनू पल-पल में दमक कर बताते रहते हैं कि निराश होने से बेहतर है कि रोशनी की तरफ़ देखो, क्योंकि रोशनी का एक मतलब आशा भी होता है. 

   आज मैं बार-बार जुगनू की बात क्यों कर रहा हूं इसलिए कि हमारे बीच एक जस्टिस माधव जयाजीराव जमादार हैं जिनके हाथ में एक संविधान है. जस्टिस जमादार हमारी दिशाहीन व अंधेरी न्यायपालिका के जुगनू हैं. 

   हमारी अदालतों का यह हाल है कि वे क्या कहती हैंकिससे कहती हैं और उनके कहे का क्या होता हैयह देखना उसने छोड़ दिया है. समाज ने भी अदालत की तरफ़ से मुंह फेर लिया है. समाज समझता है कि जो चमकता नहीं है वह जुगनू नहींएक फतिंगा है. अदालत कहती रहती है कि जमानत नियम हैजेल अपवाद हैउसी अदालत ने पिछले पांच से अधिक सालों से उमर ख़ालिदसरजील इमाम आदि को जेलों में बंद कर रखा है. न मुकदमा शुरू होता हैन सुनवाई होती हैन उन्हें ज़मानत दी जाती है. वे जेल के अंधेरे में बंद हैं तो सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद के रचे अंधेरे में डूबा है. यह समाज को कॉक्रोच मानता है और उससे जितनी दूरी संभव है उतनी बनाए रखता है और हर संभव तरीके से सत्ता की मदद करता है. आज से 106 साल पहले महात्मा गांधी ने अदालतों के बारे में एक निष्कर्ष हमारे सामने रखा था : “ अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं.” हमारे न्यायविदों ने गांधी के इस कथन में एक संशोधन कर लिया था : अदालतों की नहींऔपनिवेशिक अदालतों की सबसे बड़ी बुराई यह है कि ये सरकार की सत्ता को बल देती हैं. लेकिन ये लोग कितने गलत साबित हो रहे हैं ! औफनिवेशिक और लोकतांत्रिक अदालत में चरित्रत: कोई भेद बचा ही नहीं है.  

   मुंबई हाईकोर्ट के जस्टिस जामदार ने अभी-अभी मुंबई में एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान वह कहा जो इस देश की अदालतों को 2014 के बाद कई-कई बार कहना चाहिए था. 2014 से पहले भी कहना चाहिए था. लेकिन तब राहत यह थी कि अदालत नहीं बोल पाती थी तो समाज बोलता थासमाज चूकता था तो अदालत बोलती थी. लेकिन 2014 के बाद योजनापूर्वक इन दोनों को चुप कराया जाने लगा और आज हालत यह है कि इस देश में सिर्फ एक ही आदमी है जो मन की बात कर सकता है. बाकी सबको बता दिया गया है कि आपका मन और आपकी बात अपने तक रखिएवरना … 

   जस्टिस जामदार ने इससे इंकार कर दिया. वे बोले और एकदम साफ बोले : देश को एक सरकार का ग़ुलाम बनाने की मुहिम चल रही है और पुलिस उसे साकार करने में जुटी है. पुलिस यह भूल गई है कि वह जनता की सेवक हैकिसी सरकार या उसके नेताओं की नहीं. उन्होंने पूछा कि सरकार की मुखालफत करनाविरोध प्रदर्शन आयोजित करनानरेंद्र मोदी या अमित शाह के लिए मुर्दाबाद के नारे लगाना आदि कब से व कैसे अपराध हो गया उन्होंने मुंबई पुलिस को कठघरे में खड़ा कर पूछा कि सैयद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी को किस संवैधानिक धारा के तहत आपने तड़ीपार या जिलाबदर करने का आदेश दिया 

   बात यह थी कि वहीद साहब ने सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी बना रखी है और वे सरकार से जब भीजिस भी मुद्दे पर असहमत होते हैंउसका खुलासा करने सड़कों पर उतर आते हैं फिर बात नागरिकता क़ानून की हो या बाबरी मस्जिद की या ज्ञानव्यापी मंदिर में नमाज़ पर रोक की. वे अपनी पार्टी के बैनर से अपना विरोध दर्ज कराते हैं. अब तक किसी भी पुलिस थाने में ऐसा एक मामला भी दर्ज नहीं है कि वहीद साहब के प्रदर्शन में तोड़-फोड़ हुई हो कि हुल्लड़बाजी हुई हो. वे इतने बड़े नेता नहीं हैं कि इतने बड़े हंगामे आयोजित करवा सकें. वे मुसलमान हैं तो मुसलमानों के सवाल उठाते हैंऐसा एतराज़ उठाने वालों को बताना चाहिए कि आज कौन है कि जो अपने समुदाय या अपने वोटबैंक से बाहर के सवाल उठाता है भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक से बाहर का हिंदुस्तान पहचानती नहीं है सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि वह कहती भी है कि उसे मुस्लिम वोट की ज़रूरत ही नहीं है. इसलिए पूछना जरूरी हो जाता है कि मुंबई पुलिस को वाहिद साहब से एतराज क्यों है दरअसल एतराज़ मुंबई पुलिस को नहींपुलिस को अपनी निजी सेना मानने वाले सत्त्ताधारियों को है. वे जानते हैं कि असहमति की आवाज को ज़मीन पर मौका मिला तो वह आसमान छा लेती है. इसलिए वे हमेशा सावधान रहते हैं कि असहमति की आवाज कहीं से उठेउसे उठने से पहले ही दबोच लेना है. उसने यह विभाग पुलिस को सौंप रखा है कि वह सबको डरा कर रखे. सत्ता के खेत-खलिहान में पुलिस का इस्तेमाल आज बिजूका की तरह किया जा रहा है. पुलिस-तंत्र अपने इस अशोभनीय इस्तेमाल के बारे में चूं भी नहीं करता है. 

   जस्टिस जामदार ने जैसे ही पुलिस-तंत्र को कठघरे में खड़ा कियासारे देश में उनकी बात की गूंज उठी. पता नहीं कि कितने दिनों बाद किसी जज ने संविधान की बात इस तरह उठाई कि एक कोई लिखित दस्तावेज है जिससे किसी भी लोकतांत्रिक संरचना को बाहर जाने की इजाजत हम नहीं दे सकते ! संविधान के सामने सर झुका करसंविधान का सर झुकाने का खेल इतने समय सेइतनी तरह से खेला जा रहा है कि संविधान हास्यास्पद बन कर रह गया है. न्यायपालिका संविधान देख कर नहींसत्ता का मुंह देख कर बोलती है. वह जितना ज्यादा बोलती हैउतनी ही गूंगी हुई जाती है. 

   जामदार साहब ने इस अशोभनीय चलन पर ऊंगली उठाई है. उन्होंने जो कहा है वह एकदम सामान्य संवैधानिक बात है. कोई भी सरकार अपनी फौज-पुलिसइडी-आईटी-सीबीआई-कैग-यूएपीए आदि-आदि की मदद से नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हाथ नहीं डाल सकती हैक्या यह हमारी प्राथमिक कक्षा की किताबों में नहीं लिखा है जो बच्चों को पता हैवह मुंबई पुलिस का पता नहीं है उसके लिए जस्टिस जामदार को आगे आना पड़ेतो यह मुंबई पुलिस के लिए डूब मरने की बात है. उसे कितने पानी में डूब मरना चाहिएयह हम नहीं बताते हैं. यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वह अपने पतन की सजा स्वंय ही तय करे. 

   लेकिन जस्टिस जामदार के सवाल की जद में ख़ुद उनकी न्यायपालिका भी आती है जो विधायिका-कार्यपालिका के साथ गणेश आरती करती तो मिलती हैसंविधान पढ़ती नहीं मिलती है. राम मंदिर में लूट या डकैती की जैसी अपमानजनक वारदातें होती रही हैंक्या अदालत भी उस अपराध की भागीदार नहीं है संविधान को बाजू रख करभगवान के निर्देश से जिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की सबसे ऊंची कुर्सी के पीछे छिप कर यह मंदिर बनवायाक्या उनसे नहीं पूछना चाहिए कि मंदिर में चल रहे इस घोटाले के बारे में उनके भगवान का क्या निर्देश है न्यायपालिका जब संविधान को छोड़ कर किसी दूसरे की आरती उतारने लगती है तब वह उसी लोकतंत्र का गला घोंटने लगती है जिसने उसे जन्म भी दिया व विशेषाधिकारों से नवाजा भी है.  जस्टिस जामदार दूसरों से ऊंगली भर ऊंचे नज़र आते हैंतो इसलिए कि उन्होंने फिर से भगवान को नहींसंविधान को बहस के केंद्र में ला दिया है. हमारा संविधान ही हमारी न्यायपालिका का भगवान है. जिन्होंने दूसरा कोई भगवान खोज लिया हैउन्हें न्यायमूर्ति की कुर्सी छोड़ देनी चाहिए. हमें आश्वस्ती मिलती हृै जब हम पाते हैं कि अंधश्रद्धा और अंधभक्ति के इस दौर में जस्टिस जामदार जैसे लोग भी हैं जो सिर्फ हैं नहीं बल्कि जिंदा भी हैं- जुगनू की तरह ! 

   वसीम बरेलवी साहब ने इसे ही लक्ष्य कर कहा है न : “ उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है / जो जिंदा हो तो जिंदा नज़र आना जरूरी है. ( 09.07.2026)    

Monday, 29 June 2026

लोकतंत्र का एंकाउंटर हो रहा है

 बिहार की राजधानी पटनापटना से निकट भोजपुरअौर भोजपुर का नया चर्चित चेहरा भरत तिवारी ! कहानी की तरह जो बात हर कहीं कही व छापी जा रही हैवह कुछ यूं है कि कुछ लोग भरत तिवारी को अपराधी करार दे रहे हैंकुछ उन्हें रॉबिनहुड का अवतार बता रहे हैं. लेकिन इन सारी अावाजों व शोर के बीच जो बात उभर ही नहीं पा रही है वह है राज्य द्वारा नागरिकों का शिकार !. इसे एनकाउंटर कहिए या फेक एनकाउंटर कहिएहत्या कहिए या शिकार कहिएसच्ची व ठोस हकीकत यह है कि एक कोई भरत तिवारी नाम का युवक था कि जो पुलिस के काबू में नहीं आ रहा था. पुलिस ने अात्मसमर्पण के बाद उसे घेर करखुले आसमान के नीचे  गोली मार कर काबू में कर लिया. पुलिस के मुताबिक जो अपराधी थावह नहीं रहा तो कहानी तमाम होती है. लेकिन क्या सच में कहानी तमाम होती है ? 

         2005 का गुजरात ! सारा देश सोहराबुद्दीन शेख नाम के आतंकी के एंकाउंटर की कहानी से गूंज रहा था. तब आलम ऐसा बनाया गया था मानो अातंकियों का कोई अंतरराष्ट्रीय गैंग है जिसने गुजरात में अपनी तमाम ताकत झोंक दी है. वहां से पुलिस-अातंकवादियों के मुठभेड़ की रोज एक-न-एक कहानी सामने अाती ही थीअौर कमाल यह था कि हर कहानी के अंत में अातंकवादी’ मारे जाते थेपुलिस को खरोंच तक नहीं आती थी. ऐसा कैसे होता है कि जान लेने की पूरी तैयारी से आए अातंकवादी ताश के पत्तों से ढह जाते थे पुलिस लाशें गिनती थीप्रशासन उनका प्रदर्शन करता था अौर कहता था कि सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी इनके निशाने पर थी. हमने उसका काम तमाम कर दिया. अाज सोहराबुद्दीन शेख व एनकाउंटर के ऐसे तमाम मामले अदालतों में गहरे शक के घेरे में हैंअौर कई मामले ऐसे भी हैं कि जिनमें अदालत ने तथाकथित अपराधियों को निर्दोष बता दिया है. 

         आतंकी कार्रवाईयों का चरम था मुंबई बमब्लास्ट उस केस में भी सालों मुकदमे के बाद भी पुलिस-प्रशासन अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका कि वह जिन्हें अातंकवादी या अातंकीषड्यंत्र का सफरमैना कह रहा हैउसमें सत्य व तथ्य हैं. वर्षों जेल में रहने के बाद एक-एक कर वे सभी निरीह लोग रिहा होते गए जिनका जीवन बर्बाद हो चुका था. क्या ये सब निर्दोष थे कौन कहे पुलिस ने किसी को ऐसा कहने लायक़ नहीं छोड़ा ! लेकिन यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि पुलिस की अपनी भूमिका पर अदालत को गहरा संदेह है. 

         हैदराबाद का 2019 का वह मामला याद कीजिए जब वहां की पुलिस ने लोगों का दिन-दहाड़े एंकाउंटर किया था अौर कारण यह बताया था कि ये अपराधी पुलिस से उसका हथियार छीन करउस पर हमला करने की कोशिश में थे. पुलिस ने बड़ी वाहवाही लूटी कि उसने ऐसे दुर्दांत अपराधियों का काम तमाम कर दिया. बाद में इस कहानी के दूसरे पन्ने खुले अौर खुलते चले गए. अाखिरी पन्ना यह कहता है कि जिस तरह इन अपराधियों का काम तमाम किया गयाउसे पुलिसिया गुंडागर्दी कहना चाहिए. अांध्रप्रदेश हाईकोर्ट की यह टिप्पणी किसी भी पुलिस संगठन को सर उठा कर चलने देगी क्या जिसमें वह कहती है कि पुलिस वर्दीधारी गुंडों की जमात है ?     

          हमारा संविधान कहता है कि आप इस तरह किसी की कहानी तमाम नहीं कर सकते ! फिर संविधान अागे कहता है कि पुलिस का काम अपराध की रोकथाम करना है अौर जो अपराधी बेकाबू हो जाए उसे गिरफ्तार करन्यायालय में ला खड़ा करना है ताकि न्यायालय उसे संविधान के मुताबिक सजा दे सके. अदालत ने जो सजा दीउसके साथ उस व्यक्ति को जेल तक पहुंचा देना पुलिस का काम है. संविधान इससे अधिक या इससे आगे पुलिस की किसी भूमिका को मान्य नहीं करता है. लेकिन यहीं एक पेंच खड़ा होता है कि संविधान ही यह भी कहता है कि अात्मररक्षा  में किसी की जान चली जाएतो उसे सामान्य अपराध नहीं माना जाएगा है. संविधान की इसी धारा की अाड़ में वह सारी मनमानी चलती है कि जिसे हम यहां एंकाउंटर या फेक एंकाउंटर या पुलिस-अपराधी मुठभेड़ कह रहे हैं. 

         ऐसा जाली मुकाबला सरकार व नागरिकों के बीचसंविधान व उसकी बनाई एजेंसियों के बीच भी इन दिनों ख़ूब चल रहा है. एसआईआर इसका सबसे ख़तरनाक उदाहरण है. संविधान को बाजू करजब अाप निहत्थे नागरिकों को घेर करउनका तमाम कर देते हो तब इसे लोकतंत्र का एंकाउंटर कहते हैं. अाप देखिए कि यहां बंदूक़ चुनाव आयोग के हाथ में हैट्रिगर पर अंगुली सत्ताधारियों की है अौर संविधान न्यायपालिका के काले लबादे की जेब में धरा घुट रहा है.  

         संविधान या ऐसे तमाम दस्तावेजों की एक दिक्कत है — उनके शब्द और उनके हेतु के बीच एक खाई है. शब्द व अर्थ  के बीच ऐसी खाई हर जगह है और यह एकदम स्वाभाविक भी हैक्योंकि शब्द हमेशा बेजान होते हैं. शब्द जो कहना चाहते हैंवे तभी पूरी तरह कह पाते हैं जब कोई उन शब्दों को आचरण में उतारता है. शब्द आचरण में उतरते ही बला के शक्तिवान हो उठते हैं. लेकिन जब अाप शब्दों को अाचरण से दूर कर देते हैं तो वे बेजान व अर्थहीन हो जाते हैं. मसलनसंविधान ने कहा कि पुलिस अपराधी को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा करेयही उसका काम है. न अागेन पीछे. अब पुलिस भी जानती है अौर हम भी जानते हैं कि अपराधी हाथ बांध कर तो सामने आएगा नहीं कि लो पुलिस भाईहम यहां खड़े हैं, अाअो अौर अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी पूरी कर लो ! वह भागेगाधोखा देगाधमकी देगाकभी हमला भी कर सकता है लेकिन पुलिस को अपनी संवैधानिक भूमिका यदि याद हैतो वह ऐसी तमाम कोशिशें को नाकाम करते हुएबगैर उत्तेजित होते हुए उसे घेरती रहेगीबांधती-साधतीनिरुपाय करती रहेगी. चूहा-बिल्ली का यह खेल लंबा नहीं चल सकता हैक्योंकि अपराधी या अातंकी हमेशा कमजोर पिच पर खेलता होता है व उसका बल्ला भी खोखला होता है. नियमतः चलने वाली पुलिस के पीछे सारा देशपूरे-का-पूरा संविधान खड़ा होता है. तो अंततः वह अपराधी टूटेगा हीइधर वह टूटाउधर पुलिस को अपना काम पूरा करने का मौका मिला. इसमें जितना वक्त लगेगापुलिस को जितना धैर्य रखना पड़ेगावह संविधान के पालन की कीमत है. लोकतंत्र की यह कम-से-कम क़ीमत है जिसे सबको अदा करनी चाहिए. पुलिस अपनी विफलताभ्रष्ट अाचरणअपने ऊपर के अधिकारियों के अहं की तुष्टि याकि सत्ताधीशों के स्वार्थ को पूरा करने का अौजार बन जाती है तब एंकाउंटर वाला रास्ता खुलता है.  

         वह स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली हिदायत याद रखें हम कि भले कई अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निरपराध को सजा नहीं मिलनी चाहिए. यह हिदायत अपराधियों को नजरंदाज करने या उन्हें किसी तरह की छूट देने की बात नहीं करती है. यह बताना चाहती है कि अपराधी व निरपराधी के बीच एक अत्यंत पतली लकीर होती है जिसे कोई पार न कर जाएइसकी सावधानी प्रशासन कोसरकार को रखनी ही चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो समाज एक ऐसे जंगल में बदल जाएगा जिसमें हर शक्तिवान अपने से कम शक्तिवान का शिकार खेलेगा. हम ऐसे जंगल में रहना चाहते हैं कि समाज में इसके जवाब में अाप जो कहेंगे उससे निर्धारित होगा कि अाप लोकतंत्र के नागरिक हैं या किसी के पोशीदा हेतु को पूरा करने के अौजार ? ( 26.06.2026)  

 

Friday, 19 June 2026

एक युद्ध जिसमें सभी पराजित हुए

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार भी मानते हैं और हमारे प्रधानमंत्री भी मानते हैं, तो मैं भी वही मान कर कह रहा हूं कि जब किसकी मान कर चलें यह पता न चलता हो तब डोनल्ड ट्रंप की मान कर चलना चाहिए. सो, डोनल्ड ट्रंप की मान कर मैं मान रहा हूं कि अमरीका-ईरान युद्ध समाप्त हो चुका है. ट्रंप ने सबको कह दिया है : अपने-अपने जहाज खोलो और तेल की धार बहने दो ! 

   इस खबर से अच्छी दूसरी कोई ख़बर इस वर्ष आई नहीं. जो इस अच्छी ख़बर को सुनने के लिए जिंदा नहीं बचे उनकी संख्या कोई बता सकता है आसमान से बरसती मौत के बीच जा कर यह कौन गिन सकता है कितनी लाशें बिछी पड़ी हैं ! महाभारत के मैदान में तोसूरज ढलने के साथ युद्ध की समाप्ति होती थी और फिर सब मैदान में मुर्दे समेटने व घायलों को चिकित्सा के लिए ले जाने उतरते थे. उनका शील था कि फिर सूर्योदय से पहले युद्ध नहीं होता था. अब हम सभ्य हो गए हैं तो हमारी दुनिया अपनी असभ्यता के प्रदर्शन का कोई वक्त नहीं मानती है. उसकी बनाई मौत कभीकहीं भीकहीं से भी बरस सकती है. इसलिए युद्ध के जो सारे आंकड़े हमें बताए जा रहे हैं वे उसी हद तक विश्वसनीय हैं जिस हद तक ट्रंप या मोदी या पुतीन या नेतन्याहू विश्वसनीय हैं. फिर भी एक अनुमान के मुताबिक इस युद्ध में 540 अमरीकी, 26इस्राइली मारे गए, 7,700 सैनिक व नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए. 

   अब बचता है ईरान जिसके आंकड़े कभी भी जाने नहीं जा सकते हैंक्योंकि वहां मौतें नहीं हुईंसमूल विनाश हुआ. वहां के सुप्रीम लीडर खामनेई सहित शासन के सर्वोच्च 40 लोग मारे गए. बाकी सारा ईरान धूल-धूल कर दिया गया. तो फिर हम क्या करें उन सब मारे गए नागरिकों-सैनिकों से सर झुका कर माफी मांगें - और हमारा सर शर्म से झुका होना चाहिए. शर्म इस बात का कि इस 21वीं सदी में भी दुनिया में कुछ दादा बचे हैं ऐसे कि जो कमजोर व निरीह राष्ट्रों का दिनदहाड़े बलात्कार करते हैं और हम निरुपाय दर्शक भर रह जाते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत वे सारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं आज कितनी नपुंसक व बांझ साबित हो रही हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने मानवमात्र की सौगंध खा कर बनाया था. आज अमरीका की स्वतंत्रता देवी अपने ही संविधान व संकल्प के फटे पन्ने ले कर बिसुर रही है.  

   ईरान जीत कर भी शांत है. वह किसी के सामने झुका नहीं है. अमरीका हार कर  भी अकड़ व धौंस दिखा रहा हैजबकि वह भूलुंठित है. अपराधहार व अपमान छुपाने के लिए ऐसी मुद्रा जरूरी होती है. ट्रंप का अमरीका ऐसा मान कर चला था कि युद्ध छेड़ना व जीतना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. ऐसे अहंकारियों के लिए यह समझना मुश्किल होता है कि समय के साथ दुनिया बदलती है. आज ट्रंप-काल में अमरीका जितना टुच्चा व खोखला हो गया हैउसे  दुनिया पहचान रही है. अमरीकी नागरिक जितनी जल्दी उसे पहचान लें व बदल लेंउतना ही भला होगा. आज वह हारा भर हैकल उसे पानी देनेवाला भी कोई नहीं होगा.  

   समझौते के जो 14 बिंदु सामने आए हैंवे अगर सच्चे हैं व अंतिम हैं तो वे अमरीका की चौतरफा पराजय की घोषणा करते हैं. एक अध्ययन बताता है कि 110दिन के इस युद्ध में कोई 170 लाख करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. अमरीका की 10 लाख करोड़ रुपयों की मिसाइलें  फुक गईंअरबों रुपयों की कीमत के 2 फ़ाइटर जेट गिराए गए.  खाड़ी देशों में बने अमरीका के 6 बड़े सैनिक अड्डेजिन्हें वह ईगल आई’ - गरुड़ की नज़र - कहता था तथा दावा करता था कि इससे वह सारी दुनिया की निगरानी करता हैतबाह हुए हैं. समझौते के मुताबिक अमरीका क्षतिपूर्ति के नाम से 28 लाख करोड़ रुपयों का हर्जाना ईरान को देगा और अमरीकी कंपनियों में लगे करीब 2.5 लाख करोड़ की ईरानी राशि को प्रतिबंध मुक्त करेगा. यह सब आत्मसमर्पण के बराबर है. 

   ईरान के सीमित संख्या के कमजोरपरंपरागत हथियारों ने कैसे अमरीका की अत्याधुनिक हत्यारी मशीनों को धूल कर दिया फौजी रणनीति के माहिर तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं. मैं कह रहा हूं कि हथियारों के पीछे बैठा आदमी जब अपनी लड़ाई के अौचित्य के बारे में नि:शंक होता है तो हथियार कई गुना ज्यादा मारक हो जाते हैं. लेकिन अपने युद्ध की नैतिक भूमिका जब उसे समझती नहीं है और वह अपराधी हत्यारे की भूमिका में ला खड़ा किया जाता हैतब न वह और न उसकी मशीनें काम कर पाती हैं. सच तो यह है कि युद्धमात्र बुरा होता हैमानवद्रोही होता है. लेकिन जब वह एक नैतिक डोर से बंधकर सामने आता हैतो नतीजा बदल देता है. अमरीकी सैनिकों-सेनापतियों को यही पता नहीं था कि आखिर हम लड़ क्यों रहे हैं ईरान का हर फौजी जानता था कि वह न्याय व अपने राष्ट्र  के स्वाभिमान के लिए लड़ रहा है. मुझे अक्सर याद आता है उस यूक्रेनी लड़की का कथन : “ रूस आज लड़ाई बंद कर देता है तो इस क्षेत्र में आज ही शांति आ जाती हैहम यूक्रेनी आज लड़ाई बंद कर दें तो हमारा आज ही विनाश हो जाएगा.” अस्तित्व व विनाश के बीच का चुनाव ही यूक्रेन को ताक़त देता हैवही ईरान को इतना अजेय बना रहा है. 

   दूसरी पराजय हुई खाड़ी देशों की. तेल की कमाई से धन्नासेठ बने ये सारे देश आज अपने ध्वस्त तेल-उद्योग के सामने सर धुन रहे हैं. युद्ध आज रुका है तो तल के इनके कुएं आज ही काम शुरू नहीं कर सकते. ऐसा भी नहीं है कि कल ही ट्रंप डॉलर ले कर हाज़िर हो जाएंगे. ख़ुद ही ख़ुद को अमरीका का उपनिवेश मान कर जी रहे ये देश अपनी दौलत व अमरीकी सरपरस्ती में जमीन से ऊपर ही चलते रहे थे. आज वे सब एकदम लुटे-पिटेईरान को ख़ुद से अंगुली भर ऊंचा पा रहे हैं. वे आज अपना यह विश्वास हारे बैठे हैं कि अमरीकी छाया तले वे सब सुरक्षित हैं. उनकी धरती पर अमरीकी सैन्य अड्डों का जो भग्नावशेष बचा है,  उसे समुद्र में तिरोहित करें कि नये सिरे से संवारेयह न अमरीका को सूझ रहा हैन इन मुल्कों को. खाड़ी देशों की यह सम्मिलित पराजय अब वहां नया राजनीतिक समीकरण बनाएगी जिसके केंद्र में ईरान होगा.  

   तीसरी पराजय मिली है इस्राइल को. हमेशा किसी चतुर लोमड़ी-सा सबके उच्छिष्ट में मुंह मारते फिरना इस्राइल की अंतरराष्ट्रीय भूमिका रही है. आज उसका मुंह भी खाली हैहाथ भी. पराजित व अपमानित ट्रंप ने अपने छूंछे क्रोध में उसे ऐसी फटकार लगाई है कि इस्राइल उसे कभी भूल नहीं सकेगा. ट्रंप ने सीधे ही कहा है कि युद्ध समाप्ति की मेरी घोषणा के बाद तेरी जुर्रत कैसे हुई कि तूने मिसाइल चलाई याद रखफैसला अमरीका करता हैबाकी सब उसे मानते भर हैं. अपनी अौकात में रह. अमरीका न हो तेरे साथ तो ऐसे युद्ध में तू दो घंटे भी ठहर नहीं सकता है. ऐसी अंतरराष्ट्रीय फटकार के बाद नेतन्याहू को हिम्मत नहीं हुई कि वे सीधे अमरीका को जवाब दे सकें. अपने एक अधिकारी से उन्होंने दबे स्वर में कहलवाया है कि यह समझौता अमरीका का अपना मामला है जिससे इस्राइल का कोई नाता नहीं है. नेतन्याहू को पता है कि जो मामला अमरीका का हैवह खुद-ब-खुद इस्राइल का मामला भी बन जाता है.  इस्राइल ने ऐसा नहीं किया तो वह अंतरराष्ट्रीय जगत में पंगु बन जाएगा. ट्रंप भी जानते हैंनेतन्याहू भी पहचानते हैं कि इस्राइल का अस्तित्व अमरीकी कृपा से ही बना व टिका है. इस्राइल के पास दौलत भी अकूत हैबुद्धि भी लेकिन एक स्वाभिमानी राष्ट्र की नैतिक आधारशिला उसके पास नहीं है. भारत समेत सबके लिए यह समझना जरूरी है कि नैतिकता आदर्श मात्र नहीं हैव्यक्ति व राष्ट्र की रीढ़ है. आज का पराजित इस्राइल भी चीख-चीख कर नया नेतृत्व मांग रहा है जो उसे इस्राइल के नागरिक ही दे सकते हैं. 

   चौथी पराजय हुई है ईरान की. हम भूल नहीं सकते हैं कि शाह व खामनेई ने ईरान को कभी भी समानता व समता में माननेवाला राष्ट्र बनने नहीं दिया. इन दोनों ने ईरान की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का जैसा क्रूर दमन किया हैवह एक शर्मनाक कहानी है. ईरान से आज हमारी सहानुभूति राष्ट्र के रूप में नहींदबंगई का प्रतिकार करने के साहस के कारण है. लेकिन हम एक क्षण के लिए भी भूल नहीं सकते कि मुल्लाई अंधता ने ईरान में नागरिक अधिकारों व महिलाओं की सामाजिक स्थिति की कैसी गत बना रखी थी. लेकिन इस पूरे युद्ध के दौरान कदम-दर-कदम ईरान के नागरिकों ने न केवल अपूर्व साहस दिखलाया बल्कि अपूर्व एकता का परिचय भी दिया. उन्होंने इस सरकार की अनैतिक भूमिका को भुला कर याद रखा सिर्फ अपने राष्ट्र को. इनके त्यागबलिदान व बहादुरी ने वह प्रतिकार खड़ा किया जिसके आगे ट्रंप ढेर हुए. ईरान के अंदर से विद्रोह फूटेगा और हम उस पर अपनी रोटी सेंकेंगेट्रंप की यह आशा पूरी नहीं हुई तो उसका पूरा श्रेय ईरान की जनता को है. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को याद रखना चाहिए कि अपनी जनता से हार करउन्होंने यह युद्ध जीता है. इसलिए अब सुप्रीम लीडर को अपनी जनता का सम्मान भी करना होगा और उसके सारे लोकतांत्रिक अधिकार बहाल करने होंगे. ऐसा नहीं हुआ और ईरान की जनता को अपने लिए फिर सड़कों पर उतरना पड़ा तो ईरान की जीत कड़वी पराजय में बदल जाएगी.      

   और फिर बचते हैं हम ! हम भी पराजित हुए हैंअंतरराष्ट्रीय राजनीति के जोकर साबित हुए हैं. युद्ध से ठीक पहले इस्राइल जा कर प्रधानमंत्री ने जैसी बचकानी समझ का परिचय दियाउसने देश को उपहास का पात्र बना दिया. इस्राइल ने हमें अपने जाल में फांसा और फिर ट्रंप के हवाले कर दिया. ट्रंप ने हमें अपमानित भी कियाविपन्न भी बनाया और गन्ने के रसहीन फोंक-सा फेंक भी दिया. जब हम यूक्रेनी ख़ून की नदी से छान-छान कर सस्ता रूसी तेल लाने को अपनी उपलब्धि बता रहे थे तभी ट्रंप की एक हुड़की ने हमें रसातल में पहुंचा दिया. फिर यह भी हुआ कि सब तरह सेहर स्तर पर विपन्न पाकिस्तान ने इस युद्ध में से अपने लिए एक अंतरराष्ट्रीय भूमिका खोज निकाली लेकिन हम जोकर बने कभी रूस तो कभी अमरीका के धक्के खाते रहे. आज वही पराजित ट्रंप फ़्रांस मेंमोदीजी को अपनी बग़ल में बिठा कर उनकी खूबसूरती’ का बखान करते हैं और कहते हैं कि यदि मोदी के रहते भारत पर किसी ने हमला किया तो अमरीका भारत की मदद में आएगा. इतनी फूहड़ता ! ट्रंप भाईअपनी मदद की सोचो. लेकिन हमने देखा कि अपना सर्वस्व हार चुका हमारा मीडिया ट्रंप को सामने करमोदी जी की अभ्यर्थना कर रहा हैतो हमारा पतन किस हद तक हुआ हैयह सामने है. हार जीत में बदल सकती हैपराजय हड्डियों में प्रवेश कर जाती है. महर्षि वेद व्यास ने कहा और गणपति ने लिखा जो महाभारतवह बताता है कि युद्ध में जय-पराजय होती हैमहायुद्ध में मात्र पराजय होती है- सबकी पराजय ! ( 19.06.2026)

Friday, 12 June 2026

आप लोकतंत्र के योग्य हैं कि नहीं

     जब भारत की न्यायपालिका के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत साहब, भारतीय गर्मी से बेहाल अपने 77 न्यायाधीशों की टोली लेकर केंद्रीय कानून मंत्री के शीतल साये में लंदन में छुट्टियां मनाते हुए, बैडमिंटन खेल रहे थे, मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग सरकार के साथ मिल कर बैडमिंटन खेल रहा था. नतीजा यह हुआ कि मध्यप्रदेश के किसी चुनाव अधिकारी ने कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा की उम्मीदवारी का पर्चा खारिज कर दिया. वे बैठे-बैठे हार गईं. अदालत की मौन सहमति से  भारतीय जनता पार्टी के सभी 3 उम्मीदवार बैठे-बैठे जीत गए. यह हमारा नया लोकतंत्र है. फैसला आपको करना है कि आप इस लोकतंत्र के लायक हैं या नहीं. 

मध्यप्रदेश में हार कर मीनाक्षीजी की कांग्रेस जब चुनाव आयोग के दरवाजे पहुंची तो उसे बताया गया कि आज दरवाजा बंद है. जब खुलेगा तब आना. एकदम सौ टंच खरा लोकतंत्र है यह ! याद कीजिएजब बिहार से बंगाल तक करोड़ों मतदाता अपना वोट नहीं डाल सके थे और वे सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पहुंचे तो न्यायालय ने भी यही कहा था : आज न्याय का दरवाजा बंद है. जल्दी क्या हैअगले चुनाव में वोट डाल लेना ! ऐसा समभाव ! नेता आएं कि जनतादरवाजा बंद है तो बंद है. लोकतंत्र ऐसा ही होना चाहिए- सबके लिए समभाव ! 

वैसे मीनाक्षीजी और राहुल गांधी की कांग्रेस को यह पहचानना चाहिए कि वे दोनों हार तो तभी गए थे जब उन्हें अपने 62 विधायकों को हवाई जहाज में बिठा कर कर्नाटक भेजना जरूरी लगा था. कांग्रेस अपने पतन की यह दशा समझ पा रही है पिछले लंबे समय से राहुल गांधी अपने कांग्रेस के संगठन को संवारने की जो कोशिशें कर रहे हैंवह कहां पहुंची हैइसका एक नमूना मध्यप्रदेश के वे 62 विधायक हैं जिनका ख़ुद पर या जिन पर संगठन का इतना भी भरोसा नहीं है कि वे किसी भी हाल में संघी-जाल में नहीं फंसेंगे. जब कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व के सबसे नाज़ुक दौर से गुजर रही हैसारा देश देख रहा है कि राहुल-प्रियंका अपना सारा बल समेट कर इसे पटरी पर लाने में जुटे हैंसंघ परिवार इनसे भयभीत है और अपनी पूरी ताकत व चातुरी से इन्हें बदसूरत साबित करने में लगा हैतब राहुल-प्रियंका को इतना भरोसा भी नहीं है कि उनके विधायक न खरीदे जा सकते हैंन डराए जा सकते हैं. उनके विधायकों में इतना राजनीतिक शील भी नहीं बचा है कि वे अपने नेतृत्व से बता दें कि वे न डरेंगेन बिकेंगे. क्या कांग्रेस में सिंधिया-संस्कृति से अलग कुछ भी नहीं बचा हैराहुल गांधी की कोशिशों से कुछ भी नहीं बना है कांग्रेस के संकट का असली चेहरा यही है. 

कांग्रेस के इस आंतरिक पतन को भाजपा का वाह्य व आंतरिक पतन पहचानता है. वह उसका फायदा उठाता है. संघ परिवार हमेशा से इसी दर्शन में मानता आया है कि अपना फायदा ही पहला व अंतिम फायदा है. वह जो मानता हैउसी अनुरूप चलता है. कांग्रेस अब कुछ मानती नहीं हैवह केवल चाहती है. चाहने से कुछ मिलता नहीं हैयह वह भूल गई है.  यह कांग्रेस का संकट है. वह इस सच को पहचाने कि नहींवह इससे जूझे कि नहींयह वह जाने. 

ऐसा ही कुछ ममता बनर्जी के साथ हुआ. अपनी तृणमूल कांग्रेस को उन्होंने कभी समझाया ही नहीं कि इस तृण का मूल कहां है. उन्हें सत्ता की तलाश थीसो उन्होंने यही सच सबको समझाया कि सत्ता जैसे व जहां मिलेहथियानी है. इस अंधेअनैतिक दर्शन में इतनी ही संभावना है कि वह आपको दो-चार चुनाव जिता दे. उसने ममताजी को जिता दिया. वे जीतती गईंऔर फिर हार गईं. ऐसी हारीं कि अब वापसी संभव नहीं है. सारे क्षेत्रीय दल इसी दर्शन से चलते आए हैं और अपनी वक्ती जीत को अपनी असली ताक़त मान कर फूलते रहे हैं. गुब्बारा फूलने की भी एक हद तो होती है न ! फिर वह फूट जाता है. फूट जाता हैतो फिर फूलता नहीं है. नेतृत्व की कसौटी यही है कि वह बताए-सिखाए कि हवा कबकितनी भरनी है और कब ठहर जाना है. इसलिए प्राय: सभी क्षेत्रीय दल अपने अस्तित्व की अंतिम कगार पर हैं. तमिलनाड के थलपति विजय इससे कुछ सीख सकेंतो सीखें. उनके सामने संभावनाओं का संसार खुला धरा है. उस संसार को समेटने का इल्म उनमें है कि नहींविजय को साबित करना है. वे दूसरे चंद्रबाबू नायडू बनेंगे तो हाराकिरी करेंगे. 

भारतीय राजनीति भी आज अत्यंत संभावनाओं के समक्ष खड़ी है. एक तरफ संघ परिवार है जो सत्ता का सत्य समझ चुकी है और इसलिए वह ऐसा हर कुछ कबूलती जा रही है जो उसके ही घोषित आदर्शों के विपरीत है. संघ जिस रास्ते पर चल पड़ा है उससे उसकी वापसी भी मुश्किल है. आज इनके हाथ से सत्ता निकल जाए तो यह सारा ढांचा खोखला हो कर भहरा जाएगा. इस सरकार की भी अपनी कोई नैतिक रीढ़ नहीं है. यह सत्ता-लोभ की गोंद से चिपकी हुई है और सांप्रदायिकता व दूसरी तमाम संकीर्णताओं के उन्माद को अपनी ताकत बना रही है. यह बहुमत खो चुकी है और जिस बैसाखी पर यह चल रही है वह लगातार कमजोर होती जा रही है.

दूसरी तरफ खंड-खंड विपक्ष है. राजनीतिक सार्थकता की निम्नतम पायदान पर यह खड़ा है. इसे यहां से उठना ही हैक्योंकि इससे नीचे जाने की कोई जगह नहीं है. राहुल गांधी को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने न केवल कांग्रेस को खड़ा रखा है बल्कि विपक्ष का राष्ट्रीय कद भी बना कर रखा है. इंडिया गठबंधन कांग्रेस की अक्षमता व दूसरे घटकों की बेमाप आकांक्षा का शिकार रहा है. ये सभी साथ आने के लिए साथ नहीं आएअपना-अपना सिक्का जमाने व जताने के लिए साथ आए. इन्होंने राज्यों को राज की तरह बांट लिया - बंगाल ममता काउत्तरप्रदेश अखिलेश काबिहार यशस्वी कामहाराष्ट्र उद्धव कावामपंथियों ने केरल को अपना घोषित कर लियाकश्मीर अब्दुल्ला-मुफ्ती की अपनी खिचड़ी कश्मीर में.   कांग्रेस को इन सबने अपने राज से दूर रखने की सावधानी रखी और अब हाल यह है कि ये सब टके सेर हुए जा रहे हैं. ये चाहते थे कि जो उच्छिष्ट बचा हैराहुल उसी में सीमित रहें. इस हाल में भी राहुल भारत से छोटी पहचान से जुड़े नहीं. 

उन्होंने इन सबसे अलग हो कर जब कदम बाहर निकाला तो भारत जोड़ो की हवा बहाई. भाजपा को पता है कि जाति-धर्म-भाषा-लिंग से ऊपर उठी यह भारतीयता उसके लिए खतरा है और राहुल कांग्रेस को साथ ले कर देश में यह भाव जगा सकते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर छुटभैय्या राहुल को पप्पू और नेहरूवाली कांग्रेस को नाकारा साबित करने में जुटी रही. शुरू में इसने एक माहौल बनाया भी जिसे अंधभक्तों ने ख़ूब उछाला. लेकिन इतिहास भी अपना चक्र पूरा करता ही है. अब उस माहौल की हवा निकल रही है. यह नई राजनीतिक बेचैनी है जो संघ परिवार को घेरती जा रही है. 

जब दोनों तरफ अपनी-अपनी तरह की बेचैनी फैली हो तभी नई पहल का सही समय होता है. तिकड़म अलग चीज है. इस कला में भारतीय जनता पार्टी व सरकार को महारत हासिल है. जिसने नैतिकतासंविधानलोकतांत्रिक परंपरा आदि-आदि को गंदे कपड़ों-सा उतार फेंका होउन सबके लिए ऐसी महारत हासिल करना संभव है. भारतीय जनता पार्टी इसी मुकाम पर खड़ी है. वह कोई नई पहल नहीं कर सकती है. इसलिए कोई नई पहल संभव है तो इंडिया’ की तरफ से संभव है. शर्त यह है कि वह पहल शुद्ध होसंविधानसम्मत होलोकतंत्र के बुनियादी असूलों को पूरा करती है और सारे देश को समेट कर चलती हो. विपक्ष वाली तिकड़मों की भी यहां जगह नहीं होगी. क्या कांग्रेस के नेतृत्ववाली इंडिया’ में यह समझ व प्रतीति है देश यही समझना चाहता हैदेश यही होता हुआ देखना चाहता है. ( 13.06.2026) 

                                                                                                                                     

Tuesday, 2 June 2026

किसी वैभव का इंतजार

क्रिकेट जैसे तेज खेल मेंउसकी आईपीएल जैसी गलाकाट स्पर्धा वाली श्रृंखला में भी जब ठहराव व उबासी आने लगे तब किसी वैभव सूर्यवंशी की जरूरत पड़ती है. वह आता है और ऐसा विस्फोट करता है कि सारी जड़ताऊब व पस्ती की चिंदियां उड़ जाती हैं. क्रिकेट फिर निखर उठता है. और कमाल यह भी है कि वैभव का खेल क्रिकेट की सारी बारीकियों व नजाकत को संभाल कर चलता है. उसका खेल छक्का उड़ाने की डंडेबाजी नहीं हैक्रिकेट का संपन्न विस्तार है वह. क़रीब से देखिए तो आप पाएंगे कि वैभव गावस्करसचिन और क्रिस गेल का वैसा मिश्रण है जिसमें वीरेंद्र सहवाग की छौंक भी लगती रहती है. अभी वह आया ही हैठीक से उसके पांव भी जमे नहीं हैं लेकिन उसने बड़ी गहराई से क्रिकेट का व्याकरण बदल दिया है. 

   भारतीय समाज को और उसकी राजनीतिक बुनावट को भी किसी वैभव सूर्यवंशी का इंतजार है. आज हमारा सामाजिक-राजनीतिक माहौल  इतना बेजान व प्रेरणाहीन हो गया है कि अब उसमें से अधिकाधिक पतन व सडांध ही निकल सकती है. यह माहौल बना रहा व इसे हम खींचते व चलाते रहे तो हमारा सारा समाज अंधकूप में अधिकाधिक गिरता जाएगा. वह लगातार गिरा रहा है. 

    जब देश की सर्वोच्च न्यायपालिका यह कहे कि लाखों-लाख मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में से काट देना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है कि जिससे हमारी नींद हराम हो : “ इस बार न सहीआप अगली बार वोट डाल लेना !” तो हमारी न्यायपालिका के पतन का अंदाजा लगाया जा सकता है. वह फैसला सुनाती है कि चुनाव आयोग को पूरा संवैधानिक अधिकार है कि वह मतदाता सूची को दुरुस्त करती रहे और इसलिए बिहार से बंगाल तक चली सर’ की प्रक्रिया पूर्णतः वैध है. कोई अदालत से पूछे कि किसनेकब कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेवारी नहीं है कब कहा वह उसकी ही जिम्मेवारी है जिसे उसने निभाया नहीं है. वह अपनी उस विफलता का ठीकरा मतदाता के सर कैसे फोड़ सकती है ?

    चुनाव आयोग मतदाताओं का आका नहीं हैमतदाताओं की सुविधा देखने व मतदान का विधिसम्मत संचालन करने की एक एजेंसी भर है. हमारा संविधान उसे मनमाना करने की इजाजत नहीं देता है. चुनाव से ठीक पहलेबग़ैर किसी मान्य प्रक्रिया के व मतदाताओं को न्यायपूर्ण समय दिए बिना मतदाताओं के नाम काटने व जोड़ने का अधिकार चुनाव आयोग को हैयह कहां लिखा है संविधान में मी लार्डसंविधान आप ही नहींहम भी पढ़ते हैंउसे आप ही नहींहम भी समझते हैं. इसलिए हमें समझाइए तो कि सर’ की प्रक्रिया के बारे में संविधान कहता क्या है ?                          

हम आपसे कहना चाहते हैं कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत किसी सरकार या आयोग या अदालत की कृपा से नहीं है. यह हमें हमारे बनाए संविधान से मिली है और हमने ही इसके संरक्षण व संवर्धन के लिए विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका आदि बनाई है. हम मतदाता स्थाई हैंआप समेत बाकी सारी संरचनाएं अस्थाई हैं. यह इतनी भी बारीक बात नहीं है कि ज्ञानियों की समझ में न आए. लेकिन जो बारीक बात समझने में दिक़्कत आती है वह बात है लोकतंत्र की ! यह राजतंत्र की मानसिकता से न समझा जा सकता हैन चलाया जा सकता है. इसके लिए एक अलग प्रतिबद्धता व अनुशासन की जरूरत है जिसका हमारे यहां सिरे से अभाव है. जैसे औपनिवेशिक शासन की चाकरी में लगी नौकरशाही रातोंरात स्वतंत्र देश की सेवा करने वाली सेना नहीं बन सकती हैवैसे ही औपनिवेशिक मानसिकता से आप लोकतांत्रिक न्यायपालिका का दायित्व नहीं निभा सकते हैं. जिस न्यायपालिका ने आपातकाल में हमारे जीवन के अधिकार को भी राज्य की कृपा पर छोड़ कर अपना मुंह फेर लिया थावह आज इतनी संवेदनशील व विवेकवान हो जाएगी कि संविधान के साथ खड़ी रहेऐसी खामख्याली हम नहीं पालते हैं. इसलिए हम आग्रह करते हैं कि न्यायपालिका की ऊंची कुर्सी पर बैठ कर नहींज़मीन पर आ कर हमसे संवाद कीजिए. आपकी भाषा में कहूंतो कॉक्रोच जहां रहते हैंवहां पहुंचिए. 

   हमें आप बता सकें तो बताएं कि डेरा सच्चा सौदा के बलात्कारी प्रमुख गुरुमीत राम 16वीं बार पैरोल पा बाहर आ गए हैंतो कैसे कैदियों के भी संवैधानिक अधिकार हैंऔर उनका पालन भी होना चाहिए लेकिन कोई न्यायमूर्ति बताएं तो हमें कि संविधान में इस तरह पैरोल बांटने की व्यवस्था कहां है ?      

     ‘नीट’ की परीक्षा का पेपर लीक होना आज इतना स्वाभाविक हो गया है कि अगर वह न हो तोउस झटके से ही लोग मूर्छित हो जाएंगे. इसलिए हमारे ओडिशा से देश को उपहार में दिया गया देश का शिक्षामंत्री बड़ी आसानी से बोल पड़ता है : ‘ कोई बात नहींहम यह परीक्षा रद्द करपरीक्षा की नई तारीख घोषित कर रहे हैंऔर हमारी उदारता देखिए कि हम इस परीक्षा के लिए बच्चों से फ़ीस भी नहीं लेंगे. हताश-निराश बच्चों को वे डपटते हैं : अरे पैसा नहीं ले रहे हैं नअब जान लोगे क्या ?’ अगले चुनाव में वोट डाल लेनाअगली परीक्षा दे लेना, अगली बार पैरोल नहीं देंगे भाई जैसे जुमले प्राणहीन व्यवस्था का प्रमाण देते हैं. 

   सीबीएसई की परीक्षा की कापियां कौन जांचता है सच कहूं तो मुझे मालूम नहीं था कि यह काम भी अब कंप्यूटर कर रहा है. 17,68,962 छात्रों की कॉपियां स्कैन कर कंप्यूटर में डाली गईंऔर परीक्षकों से कहा गया कि कंप्यूटर के पर्दे के सामने बैठ करइन कॉपियों की ऑनस्क्रीन जांच कीजिए व छात्रों के भविष्य की घोषणा कीजिए. स्कैनर कैसा हैस्कैन छवि कितनी साफ हैपरीक्षक कंप्यूटर से कितना परिचित हैवह ऐसी जांच-प्रक्रिया से कितना सहज हैइस काम के लिए उसका प्रशिक्षण कबकैसे व कितना हुआ है आदि बातें व्यर्थ हैं. अपना कंप्यूटर है न तो बात खत्म ! गांधीजी ने मशीनों के पीछे की इसी अंधी दौड़ से मानवता को सावधान किया था. कॉपियों का परीक्षण अध्यापक प्रत्यक्ष करते थेउसमें ऐसी क्या खामी थी कि आपने शिक्षक की जगह मशीनों को दे दी ?  आप मशीनों से वोटिंग और मशीनों से कॉपियों की जांच में कोई साम्य पाते हैं दोनों जगह कोशिश यह है कि इस प्रक्रिया को आदमी की पहुंच से दूर कर दिया जाए. इधर आलम यह है कि आदमी ही तो लोकतंत्र की प्राथमिक व अंतिम इकाई है ! उससे जितनी दूर जाएंगे आपलोकतंत्र से उतनी ही दूरी बनती जाएगी. गांधी डाइरेक्ट डिमोक्रेसी’ का संधान चाहते थेआप डिमोक्रेसी’ का डाइरेक्शन’ ही बदल देना चाहते हैं.  

     4,04,319 छात्रों ने अपनी स्कैन कॉपियों की मांग की हैताकि उसकी फिर से समीक्षा की जा सके. आपकी ही बनाई यह व्यवस्था भी हैतो शिक्षा मंत्रालय के हाथ-पांव फूल रहे हैं और वह बहाने बना रही है. स्कैन कॉपियों की फिर से जांच की यह प्रक्रिया मुफ्त भी नहीं है. बच्चों से इसके लिए खासी रकम वसूली जा रही है. किसकी जिम्मेवारी है यह कौन किससे पूछे आप ख़ुद से भी जवाब नहीं देते हैंप्रेसवार्ता भी नहीं करते ! तो गूंगों का समाज बनेगा क्या अदालत इसकी तरफ कैसे ध्यान देगीवह तो सत्ता-संस्थानों की वैधता स्थापित करने में जुटी हुई है. उसके पास समय कहां है कि वह पूछे कि जिस सरकार के पास कल तक पेट्रोल-डीजल-गैस का पर्याप्त भंडार थावह चुनाव खत्म होने की रात से ही खत्म कैसे हो गयाहर दिन इनकी कीमतों में बढ़ोत्तरी कैसे व क्यों हो रही है अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के भाव व हमारे भाव में कोई तर्कसंगत संतुलन है क्या कहा जा रहा है कि तेल कंपनियों को घाटा हो रहा हैतो लोगों का गला कटा जा रहा हैयह आपको नहीं दीखता है

               कभी जयप्रकाश नारायण ने कहा था : भ्रष्टाचार ऊपर से चल कर नीचे तक पहुंचता है. गंगोत्री में ही जहर मिला हो तो नीचे गंगा का प्रवाह शुद्ध कैसे हो सकता है ऐसे सवाल पूछने वाला व इनके जवाब के लिए जूझ पड़ने वाला कोई वैभव सूर्यवंशी हमें चाहिए. हमें उसका इंतज़ार नहीं करना हैउसकी खोज में निकल पड़ना है. यह किसी दूसरे के लिए आह्वान नहीं हैआंतरिक प्रतीति है. ( 28.05.2026)