Saturday, 5 September 2026

जंतर-मंतर से संविधान तक: बदलते भारत की कहानी

तो जंतर-मंतर अब भी मोदी सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है. 1 सितंबर को सारे देश के देखा कि सर्वोच्च न्यायालय में सरकार घुटनों पर थी और कॉकरोच जनता पार्टी के युवा कमर सीधी करबदलता भारत देख रहे थे. देश ने इतना ही नहीं देखा बल्कि यह भी देखा कि इस नये भारत ने एक तरफ इन युवाओं का हाथ पकड़ रखा था तो दूसरी तरफ 62 साल की वकील वृंदा ग्रोवर का हाथ भी पकड़ रखा था. इतिहास जेनजी की उम्र नहींपरिवर्तन की जेनजी वाली आत्मिक तड़प को दर्ज करता है. जन्मवर्ष नहींजन्मकर्म आपका चारित्र्य निर्धारित करता है. हमने देखा कि अपनी सफलता के इस चरम पल में वृंदा ग्रोवर भी उतनी ही शालीन विनम्रता से खड़ी थींजितनी शालीन विनम्रता से सौरभ दासरत्ना सिंह आदि खड़े थे. इतिहास आज भी विनम्रता की शक्ति को पहचानता है. 

     इतिहास अपनी अनंत यात्रा में कभी-कभी गहरे मोड़ लेता है;  और उस मोड़ के साथ ही वह पिछला सब कुछ पीछे छोड़ करनई दिशा में प्रयाण कर जाता है. फिर उस मोड़ से पहले की किसी भी बात काकिस रवायत काकिसी तर्क का कोई संदर्भ नहीं रह जाता है. वहां से एक अलग ही यात्रा शुरू हो जाती है. जो ज़हीन व गहरे अर्थ में स्वतंत्रचेता मुल्क होते हैंवे इतिहास के साथ इस नई यात्रा पर निकल पड़ते हैं. कुछ लोगसमाज का एक कोई वर्ग यह नहीं कर पाता है. वह फॉसिल्स बन जाता है और इतिहास को पीछे खींचने की कसरत में दरिद्र से दरिद्रतर होता जाता है. यह मनुष्य-मात्र की वह सांस्कृतिक यात्रा है जिसमें जो छूटा वह बूरा ! 

   अगर आपका हाल आंख के अंधे नाम नयनसुख’ वाला न होतो आप भी देख-समझ रहे होंगे कि 20 जुलाई 2026 के बाद देश बदल रहा है. भाषा बदल रही हैतेवर बदल रहे हैं. पिछले 12 सालों में देश ऐसा बना दिया गया था कि सभी चोर-चोर मौसेरे भाई वाला खेल खेलने में लगे थे. सरकार गुंडों का सरताज बनी आएं-बाएं-साएं कुछ भी किए जा रही थीबाकी गुंडों की बारात में शामिल भीड़ भर बन कर आराम फरमा रहे थे. सारी संवैधानिक संस्थाएं- न्यायपालिकाकार्यपालिकाकैगचुनाव आयोगसीबीआईइडी,इंकम टैक्स आदि-आदि सभी नौकरशाही के पुर्जे बन करगणेश आरती का थाल घुमाते हुए खुश थे कि हम भी इस तस्वीर में हैं तो ! सबसे ख़ुश था फौज-पुलिस-प्रशासन तथा मीडिया के नाम से अपना धंधा चलाने वाले कारपोरेट ! हर चारित्र्यविहीन सत्ता इनके बल पर ही जीती है. 

   फिर कुछ हुआ - जंतर मंतर पर कोई मंतर हुआ और सारा आलम ही बदल गया. हैट से खरगोश निकालने से भी बड़ा कोई जादू हुआ. 20 जुलाई 2026 को देश भर से आए युवाओं की पिटाई हुई. बेरहम व गैर-कानूनी पिटाई-ठुकाई-गोली-गाली सब हुई युवकों की लेकिन उनकी हर मार के निशान उभरे गृहमंत्री की पीठ परप्रधानमंत्री की फैशनस्टेटमेंट देती कोमल काया पर ! एक दिन के कुछ घंटों में कोई दानवी प्रशासन ऐसा पिलपिला हो जा सकता हैयह कौन सोच सकता था. फिर हमने देखा कि जंतर मंतर पर पिटने वाले लड़के के सामने घुटनों के बल बैठी सरकार ! इस्तीफा ही नहीं हुआनाक भी रगड़नी पड़ी. 

    अब वे ही लड़के देश का एजेंडा तय कर रहे हैं. वे कह रहे हैं : स्कूल ठीक करोहम देखने आ रहे हैं ! वे सच में देखने पहुंच भी रहे हैं. हर स्कूल वहां की सरकार को नंगा कर जा रहा है. वे पूछ रहे हैं : जवाबदेही किसकी है जिसकी है वह आगे आए व स्कूल को बच्चों के पढ़ने लायक बनाए ! उन पर हमले हुए हैंसरकारों ने उनको धमकियां दी हैंसरकारी दल ने गुंडों के झुंड उन पर छोड़ दिए हैं. लेकिन अपूर्व धीरज व अतुलनीय साहस के साथ वे स्कूल ठीक करो !’ का जाप करते अपना कार्यक्रम आगे बढ़ा रहे हैं. वे चुनाव आयोग से पूछ रहे हैं कि आपको इवीएम में ऐसी निजी दिलचस्पी क्यों है?; वे एथनॉल मंत्री से पूछ रहे हैं कि चीनी का दाम इस तरह बढ़ा है तो मिठास आप तक कैसे पहुंची?;वे गोदी मीडिया से पूछ रहे हैं कि सीधा-सच्चा समाचार लोगों तक पहुंचाने का धंधा बंद करआपने चरणवंदना का यह जो नया धंधा शुरू किया हैइसका लाइसेंस अलग से लिया क्याकाग़ज़ दिखाओ या फिर मीडिया के नाम से जैसी सहूलियतें बटोरते आ रहे होवह सब वापस करो ! अचानक हम देख रहे हैं कि पिछले 12 सालों से झाल-मंजीरा ले कर बाराती बने जो फिर रहे थेवे सब कपड़े बदलने लगे हैं : “ ये घोषणा हो चुकी है मेला लगेगा यहां पर/ हर आदमी घर पहुंच कर कपड़े बदलने लगा है !

    सर्वोच्च अदालत को याद हो आया है कि उसका काम सत्ता का रास्ता बुहारना नहींसंविधान नाम की किताब की धूल झाड़ना है. पुलिस एफआईआर दर्ज भी करने लगी है व युवकों पर दर्ज अपनी मनमाना एफआईआर की वापसी के लिए गिड़गिड़ाने भी लगी है. पीएम केयर का वैसा ही शर्मनाक खुलासा हुआ है जैसा चुनावी बांड का हुआ था. तब चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बहुत चीप हरकत की थी. अब हर तरह की चीप हरकत कर चुके चीफ जस्टिस सूर्यकांत असमंजस में पड़े हैंक्योंकि अब यहां से नीचे जाने की गुंजाइश नहीं है. 

   बदलना बहुत कुछ है लेकिन जो बदला हैबदल रहा है वह बहुत बड़ा है. अब सरकार कोनौकरशाही कोदूसरी सभी संवैधानिक संस्थाओं को याद रखना चाहिए कि वे 20 जुलाई 2026 के बाद के हिंदुस्तान में है जिसमें 19 जुलाई 2026 वाला कुछ भी नहीं चलेगा.  

   15 अगस्त 1947 के बाद भी इतिहास ने एक ऐसा ही निर्णायक मोड़ लिया था. अब उस सारी बातोंतर्कोंबहसोंअवधारणाओं का कोई संदर्भ है ही नहीं जो14 अगस्त 1947 तक जेरे-बहस थीं. 1947 की हमारी संविधान सभा दलीय आधार पर बनी आज की संसद से कहीं अधिक जहीन व राष्ट्रमन की प्रातिनिधिक संस्था थी जिसने कोई तीन साल लंबे विमर्श के बाद आजाद देश के आजाद मनउसकी आजाद पहल तथा उसकी पसंद के आजाद रास्तों की दिशा खोजी थी. तब भी असहमतियां थींबहुमत-अल्पमत तक बात पहुंचती थी लेकिन सबके सामने चुनौती एक ही थी : राष्ट्रमन को सहमति के बिंदु तक कैसे लाया जाए. फिर आया संविधान जिसने इन सारे प्रयासों को एक दिशा दे दी. रास्ता खोजने की आजादी सबको मिली लेकिन दिशा तय कर दी गई. बहुमत से बनी संसद को सब कुछ करने की आजादी मिली लेकिन संविधान का बुनियादी चरित्र बदलने की आजादी उसे भी नहीं दी गई. जैसे संविधान का बुनियादी चारित्र्य नहीं बदल सकते हैं आप वैसे ही संविधान सभा द्वारा निर्धारित दिशा से अलग या उलटी दिशा में आप नहीं जा सकते हैं. 15 अगस्त 1947 ने सबसे कह दिया - संसदन्यायपालिकाकार्यपालिका और सब तरह के मीडिया से कह दिया कि अपनी मर्यादा समझो और उसका पालन करो. गांधी ने बलिदान दे कर उस पर अपनी मुहर लगा दी.   

   मनुस्मृति में क्या अच्छा हैकम अच्छा है या एकदम बुरा हैयह सारी बहस संविधान सभा में होती रही लेकिन अंतिम निर्णय यह हुआ कि आजाद भारत में मनुस्मृति का कोई संदर्भ होगा ही नहीं. यह हिंदू-मुस्लिम-सिख-पारसी-ईसाई की भावना का सवाल नहीं रहाआजाद हिंदुस्तान में मनुस्मृति का संदर्भ ही समाप्त हो गया. इसका मुर्दा ढोने की इजाजत 15 अगस्त 1947 के बाद किसी को नहीं है - राहुल गांधी भी उसका संदर्भ ले कर नाहक की बात छेड़ रहे हैं. जातीय आधार पर खड़गेजी की बात तो छोड़िएकिसी का भी शुद्धिकरण नहीं किया जा सकता हैक्योंकि आजाद भारत में कोई अशुद्ध है ही नहीं. हमारी न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है कि वह ऐसे हर मामले का स्वत: संज्ञान ले और संवैधानिक अपराध का मुकदमा दायर करे. जो किसी भी स्तर परकिसी भी तर्क से उसका समर्थन करे उसे भी संवैधानिक अपराधी घोषित करे.   

   राष्ट्रभाषा कातिरंगे काराष्ट्रगान कामनुस्मृति काछूआछूत काजमींदारी का देशी रियासतों के विलय काश्रमिक अधिकार आदि का सवाल आज बहस का सवाल नहीं रहा. लंबी बहस व खींचतान के बाद संविधान सभा ने इसे एक निष्कर्ष पर पहुंचा दिया है तथा संविधान ने उसे स्वीकृति दे दी है. इसलिए हमारे लिए वंदे मातरम् का पहला दो बंद ही अस्तित्व में है. बंकिम बाबू ने कबक्या सोच कर उसके नये बंद लिखेयह साहित्य के विद्यार्थी चाहें तो पढ़ेंदेश के लिए वह अर्थहीन है. भारत मां के सौंदर्य का आल्हादित करने वाला पहला दो बंद ही है जो राष्ट्रगीत के रूप में मान्य है. 

   रवि बाबू ने जन गण मन उतना ही थोड़े लिखा था जितना हम राष्ट्रगान के रूप में मान्य करते व गाते हैं ! वह भी लंबा हैऔर मैं ऐसे संस्थानों को जानता हूं जो उसे पूरा-का-पूरा गाते हैं. वे कविता की दृष्टि से गाते हैंतो गाएं लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि संविधान ने जिसे मान्य किया हैउतना ही जन गण मन हमारे लिए संदर्भ रखता है. किसी लोकसभा को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने बहुमत के बल पर नया राष्ट्रगान हम पर थोप दे. जिस तरह संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदल सकते आपउसी तरह राष्ट्रमन में बहते अनेकता के प्रवाहों को एकता की डोर से बांधने की संविधान की दिशा को आप अवरुद्ध नहीं कर सकते. न्यायपालिका ऐसी ही निगरानी के लिए ही बना रखी है हमने. वह अपना दायित्व पूरा करने में विफल होगी तो जन गण मन का भाग्यविधाता आगे बढ़ कर अपनी भूमिका निभाएगा. सरकार कोसंसद कोन्यायपालिका कोकार्यपालिका व मीडिया को यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि जिस भाग्यविधाता ने अपने संविधान द्वारा आप सबकी रचना की हैउसे यह जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी विफल संरचनाओं को ठीक करेबदले या कुछ दूसरा ही रच दे. 

   यही लोकतंत्र का असली मतलब हैयही उसकी अंतर्निहित शक्ति है.  गांधी इसी शक्ति को संयोजित करने में अंतिम सांस तक लगे रहेआज जेनजी इसी शक्ति का अहसास हमें करा रहा है. ( 02.09.2026)