Friday, 22 November 2024

खाली संविधान !

         तो राहुल गांधी के सबसे धारदार हथियार की धार भोथरी करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक ऐसा झूठ बोला कि जिस बराबरी का झूठ खोजना उनके संसार में भी मुश्किल है. झूठ की शिफत यही है कि उसे हर बार पिछले से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बोलना चाहिए अन्यथा उसकी तासीर बेअसर हो जाएगी. प्रधानमंत्री इस कला के माहिर उस्ताद हैं. वे झूठ भी बोलते हैं - याकि झूठ ही बोलते हैं ! - और सार्वजनिक विमर्श का स्तर इतना गिराते जाते हैं कि शालीनता, विवेक, ज्ञान आदि के खड़े होने की जगह ही न बचे. जवाब में फिर दूसरी तरफ से भी उसी स्तर की बातें आती हैं.   

लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी अपने भाषणों में भारतीय संविधान की लाल रंग की एक आवृत्ति दिखाते घूमते रहे. उनका कहना है कि भारतीय संविधान में वह सब कुछ है जो आंबेडकरजी, गांधीजी, फुलेजी आदि के दर्शन में है. वे समझाते हैं कि जनता के अधिकार, जनता की शिक्षा, जनता का आरक्षण, जनता का रोजगार, जनता की आजादी आदि सभी इसी संविधान से निकलती है और प्रधानमंत्री इसी संविधान को समाप्त करना चाहते हैं. बक़ौल राहुल गांधी प्रधानमंत्री व भारतीय जनता पार्टी ऐसा इसलिए चाहती है कि उसे समता व बराबरी का समाज नहीं चाहिए. वे इससे जुड़ी तमाम दूसरी बातें भी कहते हैं. राहुल गांधी जो कर रहे हैं, वह सब सही है, ऐसा तो कैसे कहें हम लेकिन हम यह कहना जरूर चाहते हैं कि राहुल जो कह रहे हैं, उस पर गहराई से विचार होना चाहिए. 

लेकिन किसी विचार की बात तो दूर, प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी को ऐसा जवाब दिया कि जिसका सर है, न पांव ! प्रधानमंत्री दहाड़ कर बोले, बार-बार बोले और हर बार नई मुद्रा में बोले कि राहुल गांधी संविधान की जो किताब दिखाते हैं उसके भीतर कुछ लिखा ही नहीं है. वह खाली है. राहुल गांधी ने अपनी अगली सभा में फिर किताब दिखाई लेकिन इस बार उसे खोल कर भी दिखाया. उसमें बाजाप्ता लिखा हुआ था. वह खाली नहीं थी. अभी तक किसी ने उस किताब की ऐसी कोई प्रति सार्वजनिक भी नहीं की है जो ऊपर से लाल हो लेकिन भीतर से खाली हो. 

हमारा संविधान प्रधानमंत्री ने पढ़ा हो कि नहीं, देखा तो जरूर होगा. उसके सामने दंडवत होते वक्त भी उन्हें अनुमान तो हुआ ही होगा कि वह एक खासा भारी-भरकम ग्रंथ है. उतना बड़ा ग्रंथ उस गुटके में समा ही नहीं सकता है. तो संविधान का सार बताने वाला वह प्रतीक संस्करण है. कांग्रेस ने तुरंत ही वह फोटो भी छाप दिया जिसमें प्रधानमंत्री स्वंय ही तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को वही लाल संस्करण भेंट कर रहे हैं. तो क्या प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को कोरा गुटका दे कर झांसा दिया था. अगर नहीं, तो राहुल गांधी ऐसा झूठा काम क्यों करेंगे जो तभी-के-तभी, वहीं-के-वहीं पकड़ा जा सके ! पप्पू कैसा भी पप्पू हो, ऐसा फेंकू तो नहीं हो सकता ! 

अब अपना अमृत-प्रवचन दे कर प्रधानमंत्री देश से बाहर चले गए. भारतीय जनता पार्टी उनके इस झूठ को सन्नाटे में डुबो कर ही झेल सकती है. वह झेल रही है. लेकिन इससे भारतीय जनता पार्टी को हासिल क्या हुआ ? राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में अब अपनी ऐसी जगह तो बना ही ली है कि उन्हें प्रधानमंत्री वापस पप्पू साबित नहीं कर सकते. सहमति-असहमति, योग्यता-अयोग्यता सब अपनी जगह है लेकिन कांग्रेस को भी राहुल को उसी तरह ढोना है जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी को ढोना है. यह दोनों पार्टियों का अंदरूनी मामला है. लेकिन किसी को यह हक कैसे मिल सकता है कि वह मतदाता को ऐसा मूर्ख माने और चुनाव-प्रचार को इतनी फूहड़ता से ले !    

चुनाव प्रचार को झूठ का बवंडर और अर्थहीन जुमलों का ऐसा जंगल बना दिया गया है कि वहां लोकशिक्षण की जगह ही बाकी नहीं रही है.  चुनाव प्रचार मतदाता को जागरूक करने का नहीं, उसके ही पैसे से उसे मूर्ख बनाने का सबसे बड़ा संवैधानिक आयोजन बन गया है. सारी संवैधानिक संस्थाएं इस शर्मनाक प्रहसन की मूक दर्शक भर हैं. देश के सार्वजनिक व वैधानिक जगत का ऐसा पतन संविधान निर्माताओं की कल्पना में नहीं रहा होगा. 1977 के अत्यंत नाजुक लोकसभा चुनाव के वक्त भी कम नहीं थे ऐसे ज्ञानी-धुरंधर जो जयप्रकाश नारायण को समझाते रहे थे कि साधारण लोग कहां समझेंगे आपकी यह लोकतंत्र व तानाशाही की बात ! “ दो में से एक चुनना है : लोकतंत्र या तानाशाही !” का सीधा नारा दे कर, वे यह कहते हुए आगे निकल गए कि आप लोग अपनी समझ की फिक्र कीजिए, जनता की नहीं! साधारण मतदाता ने वह चुनौती समझी और लोकतंत्र उभर आया.     

संविधान की किताब दिखा कर चुनाव की तासीर बदलने की राहुल की कोशिश आज भी जारी है. कांग्रेस संगठन में कोई राजनीतिक समझ होती तो वह इसी का बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकती थी. जब सामने वैचारिक शून्यता का घटाटोप रचा जा रहा हो, तब आपकी सामान्य वैचारिक बातें भी जड़ जमा लेती हैं. लेकिन कांग्रेस में ऐसी समझ होती तो उसका ऐसा हाल होता ही क्यों! कोई चिढ़ कर जवाब देता है कि जहां राहुल गांधी की अपनी सरकारें हैं, वहां भी तो वह सब नहीं हो रहा है जो राहुल गांधी कह रहे हैं. बात गलत नहीं है लेकिन यह राहुल गांधी की बात का जवाब नहीं है. जिस तरह मतदाताओं को नंगों-कंगलों-भीखमंगों की भीड़ समझ कर रुपये बांटने की नई शैली चली है, जिसमें कांग्रेस-भाजपा में एक-दूसरे को मात देने की होड़ चल रही है, वह भी इस बात का जवाब नहीं है कि संविधान में कैसा भारत बनाने का सपना दर्ज है, और वैसा भारत बनाने का क्या रास्ता संविधान बताता है. सबसे बड़ा क्षद्म यह है कि अब सभी संविधान की शपथ लेते हैं, उसे पढ़ता कोई नहीं है. अभी-अभी सेवानिवृत हुए हमारे सर्वोच्च न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ साहब ने तो बाकायदा घोषणा ही कर दी कि संविधान पढ़ना ईश्वर का काम है, न्यायपालिका का काम ईश्वर से पूछ लेना भर है. 

देश इतना खोखला बना दिया गया है, मतदाता इतनी बार, इतनी तरह से छला गया है कि आज सारा कुछ संविधान में सिमट आया है. प्रधानमंत्री भले खिल्ली उड़ाएं कि राहुल गांधी खाली संविधान दिखा रहे हैं, देश को आज जरूरत खाली संविधान की ही है. खाली संविधान की कसौटी पर विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका को कसने की ताकत देश एक बार पा ले तो गाड़ी पटरी पर लौट सकती है. मीडिया संस्थानों का विष-दंत भी संविधान ही तोड़ सकता है. मतदाता को यह ताकत व यह दृष्टि खाली संविधान से ही मिल सकती है. हम सब अपनी-अपनी जगह पर इसके औजार बनें तो 1977 का चमत्कार फिर दोहराया जा सकता है. ( 20.11.2024)  

Sunday, 17 November 2024

हारते अमरीका की हार

जोनाथन स्विफ्ट की अमर कृति ‘गुलिवर की यात्राएं’ पढ़ी है आपने ! उसमें गुलिवर घूमते-खोजते एक ऐसे मुल्क में पहुंच जाता है, जहां बौनों का राज है. लगता है,हमारा इतिहास भी घूमते-घूमते ऐसी ही दुनिया में पहुंच गया है जहां सब तरफ बौनों का बोलबाला है भी, होता भी जा रहा है - पुतिन, जिनपिंग, नेतन्याहू,मोदी,मैक्रों, स्टारमर,शोल्ज आदि-आदि. इस सूची के सबसे नये सदस्य हैं डोनल्ड ट्रंप ! वैसे इस अर्थ में ट्रंप नये नहीं हैं कि उनका बौनापन अमरीका भी और दुनिया भी पहले देख व भुगत चुकी है. शोक है तो इस बात का उन्होंने आम अमरीकी को भी अपनी तरह ही बौना बना दिया है. इसमें भी उनकी कोई शिफत नहीं है. इतिहास बताता है कि इंसान व उसका समाज फिसलन की तरफ आसानी से ले जाया जा सकता है, और फिसलन निष्प्रयास नीचे-से-नीचे ही जाती जाती है. ट्रंप फिसलते अमरीका की फिसलन को न केवल तेज करेंगे बल्कि उसे बहुत कुरूप व कर्कश बना देंगे. यह अनुमान नहीं है, अनुभव है. इसलिए मुझे यह लिखना पड़ रहा है कि ट्रंप की यह जीत हारते अमरीका की हार है. किसी व्यक्ति की जीत किसी समाज की हार कैसे बन जाती है, यह अमरीका भी समझेगा और हम भी.      

दुनिया में धन और दमन की कलई जैसे-जैसे खुलती जा रही है, अमरीका बौना होता जा रहा है. उसके पास यही दो हथियार रहे हैं जिनसे उसने अपनी पहचान व ताकत बनाई थी. अब दुनिया के बाजार में उसके डॉलर का वह डर नहीं रहा, और यह भी जाहिर होता जा रहा है कि हथियारों की मारक शक्ति से कहीं बड़ी है इंसानों की संकल्प शक्ति ! यह वही बात जिसे महात्मा गांधी ने दुनिया की महाशक्तियों को बताने-समझाने की कोशिश की थी. 

गांधी दुनिया के अंगुली भर देशों में भी नहीं गए थे लेकिन दुनिया देखी बहुत थी. इसलिए बहुत कुछ ऐसा कहते-समझाते रहे थे जिसे समझने में हमें सदियां लग गईं.  अभी भी हम उन्हें लेकर भटकते ही रहते हैं. वे कभी अमरीका नहीं गए. कई बार, कई विशिष्ट अमरीकियों ने, जिनमें अलबर्ट आइंस्टाइन भी थे, आग्रह किया था कि वे अमरीका आएं. गांधी ने कभी कुछ कह कर, तो कभी कुछ और कह कर बात टाल दी थी. आइंस्टाइन को लिख दिया कि मैं उस दिन की प्रतीक्षा में हूं कि जब अपने सेवाग्राम आश्रम में मैं आपका स्वागत कर सकूंगा. मतलब यह कि आप यहां आएं, मैं अमरीका आने की नहीं सोचता हूं.                   

दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए जब गांधी इंग्लैंड आए तो यह दवाब कई तरफ से बनाया गया कि अब जब आप यहां तक आ ही गए हैं तो अमरीका भी आ जाइए. अमरीका में गांधी के कई चाहक व प्रिय भी थे, तो उनका अमरीका होते आना कतई असंगत नहीं होता. लेकिन गांधी ने कहा तो इतना ही कि मैंने अपने देश में ही कोई सिद्धि हासिल नहीं की है अब तक, तो अमरीका को वहां आ कर क्या दे सकूंगा ! फिर यह भी जोड़ दिया कि जब तक अमरीका दौलत के पीछे की अपनी अंधी दौड़ से बाहर नहीं आता है, मेरे वहां आने का कोई मतलब नहीं होगा. 

अमरीका उस अंधी दौड़ से बाहर तो कभी नहीं आया, उसने सारी दुनिया को अपने जैसी ही अंधी दौड़ में दौड़ा दिया. जिन्हें ट्रंप अवैध अप्रवासी कहते हैं, जिन दूसरे मूल के वैध अमरीकियों को श्वेत अमरीकी जलती आंखों से देखते हैं, वे सब इसी अंधी दौड़ के धावक हैं. अमरीका ने सारी दुनिया से साम-दाम-दंड-भेद के बल पर जो दौलत निचोड़ी है, ये सब उसमें हिस्सेदारी मांगते हैं. अगर दौलत लूट लाना वैध है तो उसमें हिस्सेदारी अवैध कैसे है, यह समझना बहुत टेढ़ी खीर तो नहीं है. 

इस अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते अब अमरीका का भी और दुनिया का भी दम टूट रहा है. यह स्थिति इसलिए भी ज्यादा घातक बन गई है क्योंकि उदार-लोकतांत्रिक ताकतों की अयोग्यता की वजह से हर देश में निराशा व्याप्त है. सामान्य जीवन जीना इतना कठिन व खतरों से भरा बन गया है कि इंसान हर नई आवाज की तरफ लपक रहा है. यदि उदार-लोकतांत्रिक ताकतों ने ईमानदारी से अपने-अपने देशों की वैकल्पिक ताकतों को संयोजित कर वह कुछ हासिल किया होता जिसकी ललक आम आदमी को होती है, तो दक्षिणपंथी-तानाशाही ताकतें इस तरह वापसी नहीं कर पातीं. लेकिन सत्ता को अंतिम प्राप्य मान कर बैठ जाने वाला तथाकथित उदार-लोकतांत्रिक नेतृत्व व्यापक निराशा व असंतोष का जनक बन गया है. बाइडन जैसों को एक दिन के लिए भी राष्ट्रपति क्यों बनना चाहिए था ? कमला हैरिस को हारना ही था क्योंकि वे बाइडन से अलग थी ही नहीं. इसलिए राष्ट्रपति बदलते हैं, अमरीका नहीं बदलता है. बराक ओबामा जैसा आदमी आया तो वह भी कुछ बदल नहीं सका. तो फिर ट्रंप से कैसी शिकायत ! लेकिन शिकायत है - गहरी व तीखी शिकायत है. 

कमजोर होने में और कमजोर करने में बहुत बड़ा फर्क है. ट्रंप बिरादरी के बौनों की हकीकत यह है कि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है - न दिशा, न साहस, न सपने, न उदारता. उनके पास कहने के लिए भी कुछ उदार, कुछ मानवीय, कुछ उदात्त नहीं है. उनके पास सत्ता का दंभ व मनमानापन है, अकूत सार्वजनिक धन है, असहमति से घृणा है, असहमतों के प्रति क्रूरता है. बौनों की जो सूची मैंने शुरू में दी है, वे सब इन्हीं ताकतों के बल पर टिके हैं. 

ट्रंप कमजोर होते अमरीका को जल्दी व ज्यादा कमजोर कर देंगे क्योंकि उनके पास महंगाई, बेरोजगारी को हल करने की कूवत नहीं है. वे अवैध अप्रवासियों का भूत उसी तरह खड़ा कर रहे हैं जिस तरह हमारे यहां अल्पसंख्यकों का भूत खड़ा किया जाता है. इसमें बदला लेने की मनुष्य की हीन भावना को उकसाया जाता है. यह उकसावा आसान भी है तथा यह आपको दूसरी जिम्मेवारियों से बच निकलने की गली भी देता है. अपने पिछले पांच साल के राष्ट्रपति-काल में ट्रंप ने अमरीकी समाज की एक भी मुसीबत का हल नहीं निकाला, अमरीका को हर तरह से उपहास का पात्र जरूर बनाया. उनमें अपनी हार स्वीकार करने की शालीनता भी नहीं रही. उन्होंने अमरीकी समाज के गुंडा-तत्वों को ललकार कर बुनियादी लोकतांत्रिक शील की भी खटिया खड़ी कर दी. वे आगे भी ऐसा ही करेंगे, क्योंकि इसके अलावा वे कुछ जानते नहीं हैं

. हमारा हाल यह है कि हमें प्रिय मित्र ट्रंप’ की जीत ऐसी लग रही है मानो डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के राष्ट्रपति का नहीं, भारत के राष्ट्रपति का चुनाव जीता है. उनके चुनाव जीतने से जितने खुश अमरीकी नहीं हैं, उससे ज्यादा भारत के सत्ताधारी व उस मानसिकता के लोग खुश हैं. अपने यहां के लोकसभा चुनाव में, उनके तईं जो कसर रह गई थी, मानो अमरीका ने ट्रंप जो चुन कर वह कसर पूरी कर दी है. यह भारत के अमरीका बनने का नया अध्याय है. यह हारते अमरीका के हारने के नये अध्याय का प्रारंभ है. ( 09.11.2024)

Thursday, 31 October 2024

आपका आभार चंद्र्चूड साहब!

   भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने हम पर, कई बार, कई तरह के उपकार किए हैं. जाते-जाते एक और बड़ा उपकार कर गए वे कि हमें बता गए कि न्यायपालिका के फैसले जज साहबान नहीं, भगवान करते हैं. बेचारे संविधान निर्माताओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे जिस न्यायपालिका का खाका खींच रहे हैं, उसे भगवान इस तरह ‘ हाइजैक’ कर लेंगे. चंद्रचूड़ साहब ने ही हमें यह भी बताया कि कैसे ऐसा किया जा सकता है कि अपराधियों को कोई सजा न दी जाए लेकिन उनके अपराध को असंवैधानिक बता कर वाहवाही लूटी जाए ! और यह भी कि एक सरकार को असंवैधानिक रास्तों से बनी सरकार करार दे कर भी वैध घोषित कर दिया जाए !    

   न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने हमें स्वंय ही बताया कि रामजन्मभूमि विवाद ( या बाबरी मस्जिद विवाद ?) का क्या हल निकाला जाए, जब महीनों तक उन्हें यह सूझ ही नहीं रहा था, “ तब मैं ईश्वर की शरण में गया. मैंने उनसे प्रार्थना की कि अब आप ही कोई रास्ता बताइए….और रास्ता उन्होंने बताया. मेरा पक्का विश्वास है कि जब भी आप आस्था के साथ भगवान की शरण में जाते हैं, तो वे रास्ता बताते ही हैं.” जिसे हम-आप सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के रूप में जानते हैं, वह फैसला भगवान की तरफ से सीधे चंद्रचूड़ साहब को सुझाया गया था, यह जानते ही मेरे मन में पहला सवाल यह आया कि यह सुनवाई तो पांच जजों की बेंच ने की थी, तो भगवान ने सीधे चंद्रचूड़ साहब को ही रास्ता बताने के लिए क्यों चुना ? देखता हूं कि तब इस बेंच में सर्वोच्च न्यायाधीश रंजन गोगई, बाद में सर्वोच्च न्यायाधीश बने एस.ए. बोरडे, अब के सर्वोच्च न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़, जो सर्वोच्च तक नहीं पहुंच सके वे अशोक भूषण तथा एस.अब्दुल नजीर थे. क्या ये सारे न्यायमूर्ति भगवान की शरण में नहीं गए ? क्या गोगई साहब को भगवान ने ही बताया कि वत्स, धैर्य धरो, तुम्हारे लिए राज्यसभा का रास्ता बनाता हूं ? बोरडे साहब को बताया कि बच्चा, खामोश रहोगे तो यह सर्वोच्च कुर्सी तुम्हारी होगी ? यदि देश की सबसे बड़ी अदालत में यही नजीर है तो नजीर साहब भी तो अपने खुदा की रहमत में गए होंगे न ! क्या उन्हें खुदा ने कहा कि मुझे जो फैसला देना था, वह मैंने तुम्हारे चंद्रचूड़ साहब के भगवान को बता दिया है. खुदा व भगवान का झगड़ा खड़ा किए बिना वह चंद्रचूड़ जो कहे, तुम उसे मान लेना ? मुझे नहीं पता कि भगवान या खुदा ने एक-एक से बात करने की इतनी जहमत क्यों उठाई ! उन्हें कहना ही था तो चंद्रचूड़ साहब सहित पूरी बेंच से सिर्फ इतना ही कहते कि संविधान ठीक से देख लेना क्योंकि वही तुम्हारा भगवान है. न इसे कम कुछ, न इसे ज्यादा कुछ ! वैसे मुझे अब लग रहा है कि चंद्रचूड़ साहब ठीक ही कह रहे हैं कि रामजन्मभूमि का फैसला भगवान का बताया फैसला है. भगवान के फैसले अक्सर इंसानों की समझ में नहीं आते हैं. इस फैसले के साथ भी ऐसा ही है.   

   चंद्रचूड़ साहब व हमारे जज साहबान की दिक्कत यह है कि वे मामले की सुनवाई नहीं करते हैं, वे हालात के भगवान होने के भ्रम में जीते हैं. वे इंसान हैं और उन्हें एक संविधान दिया गया है जो उनकी गीता, कुरान, बाइबल, जपुजी, गुरुग्रंथ साहब या अवेस्ता आदि है. इस संविधान के पन्नों के बाहर का जगत उनके लिए मिथ्या है. यह थोड़ा कठिन तो है लेकिन उनकी संवैधानिक सच्चाई यही है कि वे आज और अभी में जीने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उनके अधिकार-क्षेत्र में यह आता ही नहीं है कि वे यह देखें कि उनका निर्णय संतुलन बिठा कर चलता है या नहीं. यह देखना जिनका काम है वे जब बेड़ा गर्क कर देते हैं तब तो देश आपके पास आता है, और चाहता है कि आप बेड़ा गर्क करने वाले ( करने वालों ) का बेड़ा गर्क करें. हर मामले में संविधान क्या कहता है, और क्या करने को कहता है, देश आपसे इतना ही जानना चाहता है. 

   हरियाणा के चुनाव में संवैधानिक व्यवस्थाओं से बाहर जाने की जितनी शिकायतें चंद्रचूड़ साहब की अदालत में पेश की गईं, उनकी पड़ताल कर उन्हें लगा कि ये बेबुनियाद हैं, तो एक आदेश से उसे खारिज कर देना था. चंद्रचूड़ साहब ने वैसा नहीं किया. उन्होंने आपत्ति उठाने वालों पर तंज कसा कि क्या आप चाहते हैं कि हम जीती हुई सरकार को शपथ-ग्रहण करने से रोक दें ? हां, चंद्रचूड़ साहब, मैं कहना चाहता हूं कि यदि संविधान की कसौटी पर कसने के बाद आपको लगता है कि यह जो सरकार बनने जा रही है वह असंवैधानिक रास्ते से सत्ता में पहुंचना चाह रही है, तो आपको उसे शपथ लेने से रोकना ही चाहिए. यह संवैधानिक दायित्व है जिसके निर्वाह में ही आपके होने की सार्थकता है. अगर आपको लगता है कि इस सरकार को शपथ ग्रहण करने से रोकना असंवैधानिक होगा, तो आरोप को रद्द कर देना भर काफी है. जो सवाल आपने पूछा वह पैदा ही नहीं होता है कि “ क्या हम जीती हुई सरकार को शपथ-ग्रहण करने से रोक दें ?” यह संविधान प्रदत्त आपके अधिकार-क्षेत्र से बाहर की बात है. ऐसा ही मामला महाराष्ट्र की उस सरकार की वैधानिकता के बारे में भी है जो बगैर संवैधानिक जांच-पड़ताल के चलती चली गई; और आज वहां दूसरा चुनाव आ गया है लेकिन आपकी अदालत में मामला खिंचता ही चला जा रहा है. अब आपके फैसले का आना, न आना अर्थहीन हो गया है. लेकिन अगर यह सरकार असंवैधानिक साबित हुई तो महाराष्ट्र की जनता की अदालत में आप व आपकी अदालत हमेशा के लिए अपराधी बन खड़ी रहेगी. न्याय में देरी अन्याय के बराबर होती है, यह आप कैसे भूल सकते हैं ! 

   आप अपने घर में किसकी व कैसे पूजा करते हैं, यह आपका अधिकार भी है, आपकी निजी स्वतंत्रता भी है. लेकिन उसका सार्वजनिक प्रदर्शन ? यह न तो शोभनीय है, न संस्कारी; न भारत के धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक जीवन से मेल खाता है. यह धर्मनिरपेक्षता हमारे यहां आसमान से नहीं टपकी है बल्कि उस संविधान से हमें मिली है जिसके संरक्षण की शपथ आप खाते हैं. फिर अपने धार्मिक विश्वासों का सार्वजनिक प्रदर्शन, घर के गणपति-पूजन का राष्ट्रीय प्रसारण कैसे आपके गले उतर सकता है ? यह तर्क बहुत छूंछा है कि न्यायपालिका व विधायिका के लोग आपस में मिलते-जुलते रहते ही हैं. उनका सार्वजनिक समारोहों में मिल जाना एक बात है, पारिवारिक व निजी अनुष्ठांनों में एक-दूसरे से गलबहियां करना दूसरी बात है. संविधान चीख-चीख कर कहता है कि न्यायाधीशों की संवैधानिक प्रतिबद्धता होनी ही नहीं चाहिए, इस तरह दीखनी भी चाहिए कि समाज मान्य हो. सत्ता की ऊंगलियों पर नाचने वाले जजों के उदाहरण जब आम हों, जब संविधान द्वारा सत्ता व अधिकारों के स्पष्ट बंटवारे के बावजूद विधायिका-कार्यपािलका-न्यायपालिका अपनी लोकतंत्रसम्मत भूमिका समझने में इस कदर भटकती हो, तब सर्वोच्च न्यायाधीश का प्रधानमंत्री के साथ अपने घर में गणेश-पूजा करना गणेश-शील के एकदम विपरीत जाता है. यह सवाल किसी व्यक्ति का किसी व्यक्ति से नाते-रिश्ते का नहीं है, लोकतंत्र की लक्ष्मण-रेखा को पहचानने व उसकी मर्यादा में रहने का है. 

   संविधान कानून की किताब मात्र नहीं है, लोकतंत्र का आईना भी है. उस आईने में न तो इस सरकार की छवि उज्ज्वल है, न आपकी न्यायपालिका की.  इसलिए तो राष्ट्र विकल हो कर हर नये सर्वोच्च न्यायाधीश के पास जाता है कि शायद इसके पास संविधान की तराजू के अलावा दूसरा कुछ न हो. पता नहीं कैसे यह धारणा बनी थी कि धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ऐसे न्यायाधीश हैं, कि उनके पास वह संवैधानिक अनुशासन है कि जो न्यायपालिका की छवि निखार सकता है. आपने वह भ्रम तोड़ दिया, इसके लिए हम भारी मन से आपके आभारी हैं. (31.10.2024)

Sunday, 25 August 2024

लड़की किसे चाहिए ?

             पूरा कोलकाता पहले गुस्से से लाल हुआ, फिर जल-भुन कर राख हुआ ! अस्पताल में ही नहीं, वह राख कोलकाता शहर में भी सब दूर फैली. जुलूस-धरना-प्रदर्शन चला तो लगातार चलता ही रहा. उसे भाजपा समेत विपक्षी दलों ने उकसाया-भड़काया जरूर लेकिन वह जल्दी ही कोलकाता के भद्रजनों के आक्रोश में बदल गया. ऐसा जब भी होता है, बंगाल से ज्यादा खतरनाक भद्रजन आपको खोजे नहीं मिलेंगे. ममता बनर्जी यह अच्छी तरह जानती हैं क्योंकि इसी भद्रजन के आक्रोश ने, उन्हें मार्क्सवादी साम्यवादियों का पुराना गढ़ तोड़ने में ऐसी मदद की थी कि वे तब से अब तक लगातार सत्ता में बनी हुई हैं. लेकिन सत्ता ऐसा नशा है एक जो जानते हुए भी आपको सच्चाई से अनजान बना देता है. ममता भी जल्दी ही बंगाल के भद्रजनों की इस ताकत से अनजान बनती गईं. 

   किसी भी अन्य मुख्यमंत्री की तरह सत्ता के तेवर तथा सत्ता की हनक से उन्होंने बलात्कार व घिनौनी क्रूरता के साथ लड़की रेजिंडेंट डॉक्टर की हत्या के मामले को निबटाना चाहा. लेकिन उस मृत डॉक्टर की अतृप्त आत्मा जैसे उत्प्रेरक बन कर काम करने लगी. जैसे हर प्रदर्शन-जुलूस-नारे-पोस्टर के आगे-आगे वह डॉक्टर खुद चल रही थी. ऐसी अमानवीय वारदातों को दबाने-छिपाने-खारिज करने की हर कोशिश को विफल होना ही था. वह हुई  और कोलकाता का आर.जी.कर अस्पताल, ममता की राजनीतिक साख व संवेदनशील छवि के लिए वाटर-लू साबित हुआ. अब ममता भी हैं, उनकी सत्ता भी है लेकिन सब कुछ कंकाल मात्र है. 

   यह आग कोलकाता से निकल कर देश भर में फैल गई. मामला डॉक्टरों का था जो वैसे भी कई कारणों से सारे देश में हैरान-परेशान हैं. सो देश भर की सूखी लकड़ियों में आग पकड़ गई. आंच सुप्रीमकोर्ट तक पहुंच गई. नागरिक अधिकारों, संवैधानिक व्यवस्था, प्रेस की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ले कर सत्ता के मर्यादाविहीन आचरण तक के सभी मामलों में देश में जैसी आग लगी हुई है, उसकी कोई लपट जिस तक नहीं पहुंचती है, उस अदालत को यह लपट अपने-आप कैसे दिखाई दे गई, कहना कठिन है. मणिपुर की लड़कियों को जो नसीब नहीं हुआ, कोलकाता की उस डॉक्टरनी को वह नसीब हुआ- भले आन व जान देने के बाद!  सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फ़ानन में अपनी अदालत बिठा दी और कड़े शब्दों में अपनी व्यवस्था भी दे दी, एक निगरानी समिति भी बना दी जिसकी निगरानी वह स्वयं करेगी. मैं हैरान हूं कि हमारी न्यायपालिका, जो इसकी निगरानी भी नहीं कर पाती है कि उसके फैसलों का सरकारें कहां-कब व कितना पालन करती हैं, वह डॉक्टरों पर हिंसा की जांच भी करेगी व उसकी निगरानी भी रखेगी, यह कैसे होगा ! लेकिन अदालत कब सवाल सुनती है ! अगर वह सुनती तो उसे सुनायी दिया होता कि सत्ता की शह से जब समाज में व्यापक कानूनहीनता का माहौल बनाया जाता है, तब राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक-नैतिक-आर्थिक एनार्की का बोलबाला बनता है. कानूनविहीनता का आलम देश में बने तो यह सीधा न्यायपालिका का मामला है, क्योंकि संविधान के जरिये देश ने यही जिम्मेवारी तो उसे सौंपी है. न्यायपालिका के होने का यही, और एकमात्र यही औचित्य है. 2014 से अब तक अदालतों को यह दिखाई नहीं दिया तो अंधेरा और किसे कहते हैं ? बताते हैं कि कोलकाता के अस्पताल में जब वह अनाचार हुआ तो वहां भी अंधेरा था.   

   कोलकाता की घटना के बाद यौनाचार व यौनिक हिंसा की कितनी ही वारदातों की खबरें देश भर से आने लगीं. लगा जैसे कोई बांध टूटा है ! पता नहीं, ऐसा कहना भी कितना सही है. जब घर-घर में ऐसी वारदातें हो रही हों, जब सब तरफ हिंसक उन्माद खड़ा किया जा रहा हो तब कोई कैसे कहे कि यह जो सामने है, यह पूरी तस्वीर है !  

   यह सब हुआ, होना चाहिए था. आगे भी होता रहेगा. प्रधानमंत्री यूक्रेन की आग बुझा कर लौटेंगे तो चुनावी आग में इस मामले को होम कर, धू-धू जलाएंगे. लेकिन जो नहीं पूछा गया और जिसका जवाब नहीं मिला वह यह सवाल है कि लड़की किसे चाहिए ? आर.जी.कर अस्पताल में जो अनाचार व अत्याचार हुआ, वह डॉक्टर पर नहीं हुआ, लड़की पर हुआ. वह लड़की डॉक्टर थी और वह जगह अस्पताल थी, यह संयोग है. महाराष्ट्र में जो हुआ वह स्कूल था, और जिनके साथ हुआ वे छोटी बच्चियां थीं. तो जो यौन हिंसा हो रही है, उसके केंद्र में लड़की है जिसका स्थान, जिसकी उम्र, जिसका पेशा आदि अर्थहीन है. तो सवाल वहीं खड़ा है कि लड़की किसे चाहिए ? जवाब यह है कि हर किसी को लड़की चाहिए : व्यक्तित्वविहीन लड़की ! शरीर चाहिए. वह स्त्री-पुरुष के बीच जो नैसर्गिक आकर्षण है, उस रास्ते मिले कि प्यार नाम की जो सबसे अनजानी-अदृश्य भावना है, उस रास्ते मिले या डरा-धमका कर, छीन-झपट कर, मार-पीट कर मिले. वह मिल जाए, यह हवस है; मिल जाने के बाद हमारे मन में उसकी प्रतिष्ठा नहीं मिलती है. इसलिए घर, जो लड़की के बिना न बनता है, न चलता है, लड़की के लिए सबसे भयानक जगह बन जाता है जहां उसकी हस्ती की मजार मिलती है. हर घर में लड़की होती है लेकिन मिलती किसी घर में नहीं है. इसकी अपवाद लड़कियां भी होंगी लेकिन वे नियम को साबित ही करती हैं.   

   इसलिए समस्या को इस छोर से देखने व समझने की जरूरत है. अंधी-कुसंस्कृति की नई-नई पराकाष्ठा छूती राजनीति व जाति-धर्म-पौरुष जैसे शक्ति-संतुलन का मामला यदि न हो, तो भी स्त्री के साथ अमानवीय व्यवहार होता है. ऐसी हर अमानवीय घटना हमें बेहद उद्वेलित कर जाती है. दिल्ली के निर्भया-कांड के बाद से हम देख रहे हैं कि ऐसा उद्वेलन बढ़ता जा रहा है. यह शुभ है. लेकिन यह भीड़ का नहीं, मन का उद्वेलन भी बने तो बात बने. स्त्री-पुरुष के बीच का नैसर्गिक आकर्षण और उसमें से पैदा होने वाला प्यार का गहरा व मजबूत भाव हमारे अस्तित्व का आधार है. वह बहुत पवित्र है, बहुत कोमल है, बहुत सर्जक है. लेकिन इसके उन्माद में बदल जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. यह नदी की बाढ़ की तरह है. नदी भी चाहिए, उसमें बहता-छलकता पानी भी चाहिए, बारिश भी चाहिए, वह धुआंधार भी चाहिए लेकिन बाढ़ नहीं चाहिए. तो बांध मजबूत चाहिए. कई सारे बांध प्रकृति ने बना रखे हैं. दूसरे कई सारे सांस्कृतिक बांध समाज को विकसित करने पड़ते हैं. समाज जीवंत हो, प्रबुद्ध हो व गतिशील साझेदारी से अनुप्राणित हो तो वह अपने बांध बनाता रहता है. 

   परिवार में स्त्री का बराबर का सम्मान व स्थान, परिवार के पुरुष को सांस्कृतिक अनुशासन के पालन की सावधान हिदायत, समाज में यौनिक विचलन की कड़ी वर्जना, कानून का स्पष्ट निर्देश व उसकी कठोर पालना से ऐसा बांध बनता है जिसे तोड़ने आसान नहीं होगा. प्यार की ताकत समर्पण में ही नहीं, उसके अपमान की वर्जना में भी प्रकट होनी चाहिए. नहीं देखता-पढ़ता या सुनता हूं कि किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी को, किसी पत्नी ने अपने पति को, किसी मां ने अपने बेटे को, किसी बहन ने अपने भाई को यानी किसी स्त्री ने अपने दायरे में आने वाले किसी भी पुरुष-संबंध को रिश्ते से, परिवार से बाहर कर दिया हो क्योंकि उससे यौनिक अपराध हुआ है. बलात्कारी को यदि यह अहसास हो, उसके आसपास ऐसे उदाहरण हों कि यौनिक हिंसा के साथ ही वह समाज व परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो जाएगा, तो यह एक मजबूत बांध बना सकता है. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. वह समाज को तब तक ही ठेंगे पर रखता है जब तक उसे विश्वास होता है कि वह समाज को हांक ले जाएगा. ऐसा इसलिए होता है कि आज अधिकांशत: समाज जीवंत, संवेदनशील मनुष्यों की जमात नहीं, भीड़ भर है. भीड़ में से मनुष्य को निकाल लाना बड़ी दुर्धर्ष मनुष्यता का काम है. लेकिन बांध बनाना कब आसान रहा है ! 

   यह हमारी खुद से लड़ाई है. लड़का डराएगा नहीं, लड़की लुभाएगी नहीं, तभी दोनों एक-दूसरे के प्रति सहज-स्वस्थ-सुंदर रिश़्ता बना व निभा पाएंगे. फिर बच जाएंगी दुर्घटनाएं जिन्हें संभालने-सुधारने-स्वस्थ बनाने का काम घर-समाज-कानून मिल कर करेंगे. अगर ऐसा कुछ बोध समाज को हुआ तो कोलकाता के उस अस्पताल की वह डॉक्टर सच में हम सबकी डॉक्टर बन जाएगी. ( 26.08.2024) 

                                                                                                                                     

Saturday, 10 August 2024

राहुल गांधी की जाति क्या है

   तो भरी संसद में, लोकसभा के अध्यक्ष की उपस्थिति में सत्ता पक्ष के एक सांसद ने दूसरे को भद्दी ( सामान्य सामाजिक सभ्यता के नाते भी और संविधान के नाते भी भद्दी ! ) गाली दी. फिर क्या हुआ ? अध्यक्ष ने इसे सामान्य मामले की तरह लिया और कहा कि वे गाली को फिर से सुनेंगे और फिर जो जरूरी होगा, वह करेंगे. सत्ता पक्ष के दूसरे सांसदों ने क्या किया ? कई खिलखिला कर बेशर्मी से हंसे; कई प्रतिशोध की जहरीली मुद्रा में उछल पड़े कि चलो, किसी ने तो इस आदमी का उस तरह अपमान किया जिस तरह हम भी करना चाहते तो थे लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी ! कुछ थे शायद जो असमंजस में चुप रहे लेकिन उनके चेहरे पर भाव ऐसा था मानो बात तो गलत है लेकिन अपनी पार्टी की तरफ से कही गई है, तो क्या बोलें और कैसे बोलें ! 

   आप समझ ही गए होंगे कि प्रसंग उस दिन का है जिस दिन भारतीय जनता पार्टी के सुप्रसिद्ध विवेकहीन सांसद अनुराग ठाकुर ने, कांग्रेस के सांसद व प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी के लिए कहा कि “ जिसकी जाति का पता नहीं, वह जाति गणना की मांग कर रहा है !” वे समझ रहे थे कि वे जो बोलने जा रहे हैं उसकी चोट भी लगेगी और उसकी गूंज भी उठेगी. इसलिए, गला साफ़ कर, अध्यक्ष का ध्यान खींचते उन्होंने पूरी तैयारी से, समां बांध कर यह गाली दी.

    राहुल गांधी की दिक्कत यह है कि महाभारत में जैसे अर्जुन को मछली की आंख मात्र दिखाई दी थी, दूसरा कुछ नहीं, वैसे ही उन्हें जातीय गणना का सवाल दिखाई देता है, उससे आगे-पीछे कुछ नहीं. यह उपमा उनकी ही दी हुई है. भारतीय जनता पार्टी का हाल भी ऐसा ही है. उसे इस मांग को एकदम सिरे से खारिज करने के आगे या पीछे दूसरा कुछ दीखता नहीं है. ( उसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जरूर दीखते हैं लेकिन वे जानते हैं कि नीतीश कुमार की आवाज जब तक गुम है, तब तक वे उन्हें देख कर भी, अनदेखा कर ही सकते हैं ! )  

   हम कहते हैं : राहुल गांधी-अनुराग ठाकुर में दोनों सही या दोनों गलत हो सकते हैं; या कोई एक गलत व दूसरा सही हो सकता है. लेकिन दोनों को अपनी-अपनी सही या गलत राय रखने का और उसे जाहिर करने का भी पूरा अधिकार है. यह अधिकार हम सबको जन्मसिद्ध मिला है जैसा कि बालगंगाधर तिलक ने स्वराज्य के लिए कहा था. लेकिन बालगंगाधर तिलक को तब जो अधिकार नहीं मिला था लेकिन हमें मिला है, वह यह है कि हमें अपनी राय रखने व उसे जाहिर करने का जन्मजात अधिकार तो है ही, संवैधानिक अधिकार भी है. तो हमारे तरकस में तिलक महाराज से एक वाण अधिक है. राहुल गांधी जातीय गणना की मांग करें और अनुराग ठाकुर उसका विरोध करें, इसमें आपत्ति जैसी कोई बात नहीं है. इन दो के बीच लोकसभा अध्यक्ष की कोई भूमिका है ही नहीं. लेकिन अनुराग ठाकुर अपनी राय भी न कहें, जातीय गणना के सवाल पर अपनी पार्टी का रुख भी स्पष्ट न करें लेकिन राहुल गांधी को भद्दी गाली दें, तो फिर लोकसभा के अध्यक्ष की भी सीधी भूमिका बन जाती है, अनुराग ठाकुर सीधे कठघरे में खड़े हो जाते हैं. इसलिए जो सवाल अखिलेश यादव ने पर्याप्त गंभीरता व जरूरी तेवर के साथ लोकसभा में पूछा, वही सवाल देश का हर साबित दिमाग आदमी अनुराग ठाकुर से, लोकसभा अध्यक्ष से, भारतीय जनता पार्टी से तथा ‘ईश्वरीय प्रधानमंत्री’ नरेंद्र मोदी से पूछ रहा है कि भाई, आप किसी से उसकी जाति कैसे पूछ सकते हैं ? यह हमारे तरकश का वह तीर है जो संविधान ने हमको दिया है. आप किस को जातिसूचक गाली नहीं दे सकते; आप संस्थानों में जातीय भेद-भाव नहीं कर सकते; आप जातीय टिप्पणियां कर किसी का अपमान नहीं कर सकते. मुख्तसर में यह कि आप किसी से उसकी जाति नहीं पूछ सकते. 

   जब अनुराग ठाकुर की बीमार, गंदी मानसिकता पकड़ी गई और उनके शातिर दिमाग ने हिसाब लगा लिया कि जातीय श्रेष्ठता का उनका तीर जहां पहुंचना था, पहुंच गया, तब उन्होंने उसी कायरता का परिचय दिया जैसी कायरता जातीय श्रेष्ठता का छूंछा भाव ओढ़ने वालों की पहचान है. जिससे कायरता भी शर्मिंदा होने लगे ऐसी कायरता से वे कहने लगे कि मैंने नाम तो नहीं लिया; मैंने कोई गाली तो नहीं दी; मैंने जाति तो नहीं पूछी. किया उन्होंने यह सब लेकिन इसे कबूल करने का साहस उनमें नहीं था. होता भी कहां से, क्योंकि साहस नैतिक धरोहर है, कुर्सी-पार्टी-मंत्रीपद की इजारेदारी नहीं. 

   अनुराग ठाकुर ने पूरी तैयारी से, सोच-विचार कर राहुल गांधी को गाली दी क्योंकि राहुल गांधी की बात का, तर्क का उनके पास कोई जवाब नहीं था. जब आपकी बौद्धिक औकात होती नहीं है तब आप गालियों का सहारा लेते हैं. बेचारे अनुराग ठाकुर पर दया ही की जा सकती है ! वे अपने सर के नाप से बड़ा जूता पहन कर चलते हैं और बार-बार उस जूते की मार खा कर चारो खाने चित्त गिरते हैं. जब वे किसी आमसभा में,  सार्वजनिक रूप से चिल्ला-चिल्ला कर सामूहिक गालियां दे कर, गोली मारने का नारा लगवा रहे थे, तब भी उनका पतन देख कर उबकाई आती थी, सदन में भी उस रोज़ वे ऐसी ही पतनावस्था में थे. “ जिसकी जात का पता नहीं” कहने के पीछे वही गंदी मानसिकता थी जिस गंदी मानसिकता से कोई कहता है, “ तेरे बाप का ठिकाना नहीं…!” यह गंदी गाली किसी औरत को छिनाल या रखैल या कुलटा कहने, किसी पुरुष को चरित्रहीन या स्त्रीबाज कहने, किसी बच्चे को एक बाप का नहीं या अवैध कहने जैसी गंदी बात है. यह सांस्कृतिक हीनता है जो श्रेष्टता बन कर चीखती है और अंतत: आपको ही नंगा  कर जाती है. 

   राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी, राजीव गांधी के पिता फीरोज गांधी, राहुल गांधी की मां इंदिरा गांधी, राहुल गांधी के नाना जवाहरलाल नेहरू, उनके पिता मोतीलाल नेहरू और उनकी मां स्वरूप रानी देवी, जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू व जवाहरलाल नेहरू की बहनें आदि सब-की-सब हमारे स्वतंत्रता संग्राम की मान्य हस्तियां हैं. इन सबने अपनी तरह से वह इतिहास बनाया है जिसके एक छोटे कोने में भी उन सबकी उपस्थिति नहीं मिलती है जो आज सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हैं. हम नेहरू खानदान के हर सदस्य से असहमत हो सकते हैं लेकिन उन्हें जाति या धर्म की गाली देने जैसी हीनतर मानसिकता का प्रदर्शन नहीं कर सकते. जातिवादियों को पता होना चाहिए कि संविधान ने उनसे यह हक़ छीन लिया है. 

   राहुल गांधी ने ठीक ही कहा कि उन्हें न अनुराग ठाकुर की माफी चाहिए, न उन्होंने इसकी मांग ही की है. उन्होंने यह भी कहा कि वे जो लड़ाई लड़ रहे हैं, जाति का सवाल उठा रहे हैं, उसके जवाब में गालियां मिलनी ही हैं. हम को भी मालूम है, राहुल गांधी को भी मालूम है कि भारतीय समाज में सदियों से जातीय-न्याय की मांग करने वालों को कम-से-कम जो मिला है, वह गाली ही है. लेकिन अब अब हमारे और उनके बीच एक संविधान भी है जो इसे वर्जित करता है. लोकसभा में संविधान द्वारा वर्जित काम अनुराग ठाकुर ने किया है, तो उनकी संवैधानिक सदस्यता कैसे बरकरार रह सकती है ? अध्यक्ष ने इसे तब अनसुना कर दिया. सुना कि बाद में इस टिप्पणी को काररवाई से बाहर निकाल दिया. 

   अध्यक्ष ने जिस गुगली से अनुराग ठाकुर को बोल्ड होने से बचाया, उसी गुगली से ‘ईश्वरीय प्रधानमंत्री’ क्लीनबोल्ड हो सकते हैं. अध्यक्ष ने जिस टिप्पणी को काररवाई से बाहर निकाल दिया, उसे ही अपनी जोरदार अनुशंसा के साथ प्रधानमंत्री ने सारे देश को भेज दिया. यह भी तो संविधान का उल्लंघन है ! संविधान बदलने की घोषित मंशा से चुनाव लड़ कर परास्त हुए ‘ईश्वरीय प्रधानमंत्री” को संसद में संविधान को धूल करने का विशेषाधिकार तो प्राप्त है नहीं. तो अब लोकसभा के बिरले अध्यक्ष बिरला क्या करेंगे ? वे विपक्ष को सदन से निलंबित करने तथा विपक्ष को आंखें दिखाने के अलावा कुछ करने की हैसियत रखते हैं क्या ? और फिर यह सवाल भी बन ही जाता है कि अनुराग ठाकुर ने जो किया व कहा उसकी योजना प्रधानमंत्री की स्वीकृति व सहमति से पहले ही बन गई थी तभी तो प्रधानमंत्री ने, जो तब लोकसभा में अनुपस्थित थे, अनुराग ठाकुर भाषण के तुरंत  बाद उस पूरे भाषण को ‘रि-ट्विट’ किया !     

   अनुराग ठाकुर की बात इतनी मासूम नहीं थी. जाति-व्यवस्था से बीमार इस समाज में जाति को आदमी होने की हमारी हैसियत से जोड़ दिया गया है. कहते ही हैं न कि जो जाती नहीं है वह जाति है. अनुराग ठाकुर उसी बीमार-समाज के प्रतिनिधि हैं. संघवादी सोच ही इस बीमारी से ग्रसित है. इसलिए राहुल गांधी की जाति क्या है, इसका जवाब वही है जो राहुल गांधी ने उस दिन लोकसभा में दिया : उन्होंने पलट कर अनुराग ठाकुर से उनकी जाति नहीं पूछी. ( 04.08.2024)  

Tuesday, 16 July 2024

गोली की बोली

 अमरीका में फिर बंदूक गरजी ! जो भी सुनेगा, पलट कर पूछेगा कि कब; क्योंकि वहां अकारण, असमय व सबसे अप्रत्याशित जगहों पर गोली बरसा कर दो-पांच-दस लोगों-बच्चों-महिलाओं को मार गिराना आम खबर की तरह होता है. यह अमरीकी समाज है जहां पागलपन सामान्य-सा बन गया है. लेकिन इस बार जो हुआ उसके निशाने पर पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे. छटांक भर की दूरी से मौत उन्हें छू कर निकल गई - उनका कान मौत के रास्ते में आ गया तो वह बेचारा थोड़ा घायल हो गया. घटना को देखने व जाननेवाले और गोली खाने से बच जाने वाले ट्रंप बता रहे हैं कि यह ईश्वर ही था कि जो उन्हें बचा ले गया. कैसा विद्रूप है कि जब हमारी जान बच जाती है तब हमें ईश्वर की साक्षात उपस्थिति महसूस होती है, जब हम दूसरों की जान लेते हैं तब कहां का ईश्वर और कहां की उसकी साक्षात उपस्थिति !  दुख में सुमरन सब करैं/ सुख में करे ना कोई / जो सुख में सुमरन करैं/ तो दुख काहे को होई ! इसलिए ट्रंप पर चली गोली के समर्थन या विरोध का सवाल नहीं है. सवाल गोली की इस बोली को समझने व समझाने का है.  

अपने-अपने देश में गोली की बोली से बात करने में जो सभी सत्ताधीश हैं, वे सभी अमरीका में गोली की बोली की इस घटना से सदमे में हैं — कम-से-कम ऐसा दिखा तो रहे ही हैं !! हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी को सदमा लगा है कि ‘मेरे मित्र ट्रंप’ के साथ ऐसा हादसा हुआ ! मोदीजी, अगर ट्रंप आपके मित्र नहीं होते तो ? फिर भी सदमा होता ? इतना होता कि आप बयान दे कर अपना सदमा जगजाहिर करते ? सोचिएगा ! आपने कहा कि राजनीति में हिंसा की कोई जगह नहीं है. अगर यह सच है तो हिंसा, घृणा, द्वेष, झूठ, हिंसक भाषा व हिंसक मुद्रा की छौंक से चलने वाली आपकी अब तक की राजनीति क्या है ? हिंसा के पनपने व फूटने की जमीन जितनी तरह से तैयार हो सकती है, उतनी तरह से पिछले 10 सालों में आपकी तरफ से तैयार की गई है. 

दुनिया के दूसरे कुछ हुक्मरानों ने भी गोली की बोली पर ऐतराज उठाया है. इनमें इसराइल के बेंजामिन नेतन्याहू भी हैं और फ्रांस के मैक्रां भी. ये भी और दूसरे सारे भी कह रहे हैं कि हमारे सभ्य समाज में ऐसी हिंसा की कोई जगह नहीं है. किसी ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में हिंसा नहीं चल सकती. ये सच में ऐसा मानते हैं, इसलिए कह रहे हैं; या कह रहे हैं कि हम सच में ऐसा मान लें कि ये सच में ऐसा मानते हैं ? मामला बहुत जटिल है, क्योंकि झूठ को सच बनाना और फिर उसे सच मानना बहुत-बहुत बड़ा झूठ है. 

हिंसा घटना नहीं है. हिंसा मनोवृत्ति है. जब आप हिंसा को एक परिणामकारी रास्ता मानते हैं तब किसी गांधी की हत्या की लंबी साजिश रचते हैं और प्रार्थना के लिए जाते 80 साल के वृद्ध को, प्रार्थना-स्थल पर पहुंचने से पहले ही भगवान के पास पहुंचा देते हैं. हाथ भी नहीं कांपता है आपका, और इतने लंबे वर्षों में कभी प्रायश्चित का भाव भी नहीं उभरा आपमें ! हम कायर इतने होते हैं कि उस हत्या के 76 साल बाद भी, एक दशक से ज्यादा समय से सत्ता की चादर अोढ़े रखने के बाद भी, कायरता की धुंध इतनी घनी है कि हर संभव मौकों पर वे सब गांधी की विरुदावलि गाते हैं लेकिन यह कह नहीं पाते हैं कि यह हत्या हमने की है ! जो हिंसक होते हैं वे कायर ही होते हैं; याकि ऐसे कहें कि जो कायर होते हैं, वे ही हिंसक भी होते हैं. 

मैं मणिपुर की हिंसा की बात न भी करूं तो भी यह तो कहना ही होगा न कि  मोदीजी की भारत सरकार न यूक्रेन की हिंसा के बारे में कभी कुछ बोली, न गजा की हिंसा के बारे में बोली. मित्रों की हिंसा हिंसा नहीं होती है, मित्रों पर हिंसा ही हिंसा होती है, नैतिकता की ऐसी परिभाषा कितनी हिंसक है, इसका हिसाब कोई गांधी ही लगा सकते हैं. भारत की यह चुप्पी और अब यह मुखरता राष्ट्रीय शर्म का सबब है. बेंजामिन नेतन्याहू को भी ट्रंप पर चली गोली से एतराज है, जब कि गजा में दनादन चलती अपनी अमानवीय गोलियों पर उन्हें कभी एतराज नहीं हुआ. फ्रांस में पिछले दिनों हुए विरोध प्रदर्शन को गोली की बोली से ही मैक्रां ने चुप कराया था. और जिस अमरीका में यह गोली चली, उस अमरीका में राष्ट्रपति बाइडन ने उन बच्चों के साथ क्या किया था जो फलस्तीनियों के लिए न्याय की आवाज लगाते हुए वहां के अधिकांश विश्वविद्यालयों में जमा हुए थे ? 

डोनाल्ड ट्रंप खुद हिंसा भड़काने व नागरिकों को भीड़ में बदल कर, हिंसा के लिए उकसाने के सबसे बड़े अपराधी हैं. अमरीकी अखबार उनके बारे में लिखते रहे हैं कि वे बला के झूठे, सड़कछाप आदमी हैं जो संयोगवश राष्ट्रपति बन गया था. उन पर अमरीकी अदालतों में मुकदमे भी चल रहे हैं जिसे पूर्व राष्ट्रपति को मिले विशेषाधिकार की आड़ में ट्रंप धता बताने में लगे हैं. पिछली बार राष्ट्रपति का चुनाव हारने के बाद भी वे जिस तरह गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं हुए उसने, और जिस तरह उन्होंने अपने समर्थकों को कैपिटल हिल्स में घुस जाने तथा हिंसा, लूटपाट मचाने के लिए ललकारा तथा उस सारे हंगामे को चालना दी उसने, अमरीकी लोकतंत्र का चेहरा खासा धुंधला कर दिया है. ट्रंप जब तक राष्ट्रपति रहे, व्हाइट हाऊस से सफेद चमड़ी का अहंकार, सत्ता की बदबू तथा दौलतमंदों का कुसंस्कार ही अमरीका की पहचान बना रहा. चुनाव जीतना व देश के सर्वोच्च पदों पर जा कर बैठ जाना जैसे भारत में किसी नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है - बल्कि उल्टा ही है ! - वैसे ही अमरीका में भी है. मैं तो कहूंगा कि भारत और अमरीका नहीं, सारी दुनिया के लिए यही सच है. 

आज अधिकांश अमरीकी नहीं चाहते हैं, न बाइडन की पार्टी ही चाहती है कि बाइडन फिर से राष्ट्रपति बनने की कोशिश करें. उनकी दूसरी योग्यताओं की बात न भी करें हम तो भी यह तो सभी जान व देख रहे हैं कि बाइडन शारीरिक रूप से राष्ट्रपति बनने लायक नहीं हैं. लेकिन बाइडन खुद को खुद ही सर्टिफिकेट देते जाते हैं कि मैं हर तरह से राष्ट्रपति बनने लायक हूं : “ या तो मैं या भगवान ही इस बारे कोई दूसरा फैसला कर सकते हैं !” इसे लोकतांत्रिक हिंसा कहते हैं भाई ! 

असहिष्णुता, घृणा, अंधी स्पर्धा, झूठ, हिंसा आदि कुछ अलग-अलग वृत्तियां नहीं हैं. ये सब एक-दूसरे की संतानें हैं. समाज में आप जैसी वृत्तियों को चालना देते हैं वैसी ही लहरें उसमें उठती हैं. अमरीका में चुनावी बुखार चढ़ता जा रहा है जिसे उन्माद में बदलने की कोशिश में डोनाल्ड ट्रंप लगे हैं. वे जानते हैं कि अमरीकी समाज के दूसरे कई घटकों के खिलाफ उन्माद व असहिष्णुता फैला कर ही वे व्हाइट हाउस में दोबारा प्रवेश पा सकते हैं. वे अपने मित्र से सीखते हों शायद कि यदि यही सब कर के तीसरी बार सत्ता पाई जा सकती है, तो दूसरी बार क्यों नहीं ? 

सत्ता सबसे बड़ा सच है, तो हिंसा सबसे बड़ा हथियार है. इसलिए सारे सत्तावान इस सबसे बड़े हथियार पर अपना एकाधिकार चाहते हैं. ( 16.07.2024)  

Friday, 5 July 2024

यह जो हमारी संसद है !

 हमारी नई लोकसभा अभी बनी ही है लेकिन चल नहीं पा रही है. चल पाएगी, इसमें शक है. चल कर भी क्या कर पाएगी, कह नहीं सकते. कहावत बहुत पुरानी है जो हर अनुभव के साथ नई होती रहती है कि “ पूत के पांव पालने में ही दीख जाते हैं.” जो पांव दीख रहा है, वह शुभ नहीं है. यदि मैं भूलता नहीं हूं तो कवि विजयदेव नारायण साही ने इस कहावत में एक दूसरी मार्मिक पंक्ति जोड़ दी थी : “ पूत के पांव पालने में मत देखो/ वह पिता के फटे जूते पहनने आया है.” इस लोकसभा के बारे में यही पंक्ति बार-बार मन में गूंज रही है. 

   जिस पार्टी ने, जिन पार्टियों के साथ जोड़ बिठा कर सरकार बनाई है, उन सबको मालूम है कि यह वक्ती व्यवस्था है. कौन, पहले, किसे और कब लंगड़ी मारता है, इसी पर इस लोकसभा का भविष्य टिका है; और यह तो सारे संविधानतज्ञ जानते हैं कि लोकसभा के भविष्य पर ही सांसद नाम के निरीह प्राणियों का भविष्य टिका होता है. निरीह इसलिए कह रहा हूं कि पिछले कम-से-कम 10 सालों से हमारे सांसदों का एक ही काम रहा है, जिसे वे बड़ी शिद्दत से निभाते हैं : सरकार ही दी हुई सामने की मेज बजाना या भगवान की दी हुई हथेलियों से तालियां बजाना. प्रधानमंत्री जब, जहां कहें, वे अपना काम ईमानदारी से करते हैं. विपक्ष भी ऐसा ही करता है. फर्क है तो बस इतना कि उसके पास कोई प्रधानमंत्री नहीं होता है. इस बार उसके पास एक ‘छाया प्रधानमंत्री’ जरूर है जिसकी छाया कब तक, कहां तक रहती है, देखना बाकी है. हम दुआ करते हैं कि अंग्रेजी के ‘शैडो प्राइमिनिस्टर’ का मक्खीमार अनुवाद भले उसे ‘छाया प्रधानमंत्री’ कहे, नेता प्रतिपक्ष कभी इस प्रधानमंत्री की छाया न बनें. न उनकी छाया में रहें, न उनको छाया दें. 

   लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव हुआ ही नहीं, संख्या बल से उसे लोकसभा पर थोप दिया गया. विपक्ष ने अपनी तरफ से भी एक उम्मीदवार का नाम आगे बढ़ाया जरूर था जिसे ऐन वक्त पर पीछे  खींच लिया गया. जब ऐसा ही करना था तब उसकी घोषणा करने की जरूरत ही क्या थी ? कांग्रेस ने बाद में तर्क दिया कि हम सहयोग व सद्भावना का माहौल बनाना चाहते थे, इसलिए चुनाव टाल गए. भाई, जो आपके बीच कहीं है ही नहीं, वह आप बनाना ही क्यों चाहते थे; और जो है ही नहीं, वही बनाना था तो अपना उम्मीदवार आगे ही क्यों करना था ? प्रतिबद्धताविहीन ऐसे निर्णय दूसरों को मजबूत बनाते हैं और आपकी किरकिरी करवाते हैं. 

   ओम बिरला को दोबारा लोकसभा का अध्यक्ष बनाने के पीछे प्रधानमंत्री का एक ही मकसद था, व है : विपक्ष को अंतिम हद तक अपमानित करना ! बिरला कभी इस पद के योग्य नहीं थे; आज भी नहीं हैं. विद्वता, कार्यकुशलता, व्यवहार कुशलता, वाकपटुता तथा सदन में गरिमामय माहौल बनाए रखने जैसे किसी भी गुण से उनका नाता नहीं रहा है, यह हमने पिछले पांच सालों में देखा है. पता नहीं विपक्ष ने उनका इतना स्वागत व गुणगान क्यों किया ! वह सब जो किया गया वह बहुत खोखला था और जो खोखला होता है वह जल्दी ही टूट व बिखर जाता है. वही अब हो रहा है. 

   बिरलाजी का यह गुण जरूर हम जानते हैं कि वे प्रधानमंत्री की धुन पर सतत नाचते रह सकते हैं. लेकिन यह गुण तो सारे सरकारी सांसदों में है. आप ‘प्रसाद’ से ‘त्रिवेदी’ तक किसी की भी परीक्षा ले कर देख सकते हैं. लेकिन ओम बिरला ने पिछली संसद में जिस तरह विपक्ष को तिरस्कृत व अपमानित किया था, उसे ही दोहराने के लिए इस बार भी उन्हें ही प्रधानमंत्री ने आगे किया है ताकि विपक्ष व देश समझे कि कहीं, कुछ भी बदला नहीं है. इसलिए नई लोकसभा के पहले ही दिन वे अपने पुराने अवतार में दिखाई दिए. जिस असभ्यता से उन्होंने दीपेंद्र हुड्डा को अपमानित किया; शशि थरूर के ‘जय संविधान’ कहने से तिलमिलाए, विपक्ष के सांसदों को कब उठना-कब बैठना सिखाने की फब्ती कसी वह सब यह समझने के लिए पर्याप्त है कि उन्हें क्या करने का निर्देश हुआ है. 

   राहुल गांधी ने जब यह कहा कि उनका माइक बंद क्यों किया गया है, तो अध्यक्ष का जवाब आया कि मैंने पहले भी यह व्यवस्था दी है, और आपको फिर से कहता हूं कि मेरे पास माइक का कोई बटन नहीं है. अध्यक्ष का बटन कहां है, यह तो सभी जानते हैं  लेकिन अभी जवाब तो यह आना था न कि माइक बंद कैसे हुआ और किसने किया ?  क्या अध्यक्ष की जानकारी व अनुमति के बगैर ही कोई, कहीं से बैठ कर लोकसभा की काररवाई में दखल दे रहा है ? लोकसभा न हुई, ईवीएम मशीन हो गई ! अगर ऐसा है तो अध्यक्ष चाहिए ही क्यों ? जो अनदेखा- अनजाना आदमी बटन बंद कर सकता है, वही लोकसभा चला भी सकता है. इंडिया गठबंधन को तब तक न लोकसभा जाना चाहिए, न राज्यसभा जब तक कि यह बता न दिया जाए कि माइक बंद किसने किया था, किसकी अनुमति या निर्देश से किया था ? और यह भी व्यवस्था बना दी जाए कि सांसदों को बोलने से रोका तो जा सकता है, माइक बंद नहीं किया जा सकता है. यह सांसदों का अपमान व तिरस्कार है जिसे किसी भी हाल में परंपरा में बदलने नहीं देना चाहिए. 

   परंपरा की बात है तो यह समझना जरूरी है कि विपक्ष के नेता की भी परंपराएं हैं.  इस अध्यक्ष को न वे परंपराएं पता हैं, न विपक्ष के नेता का मतलब इसे मालूम है. जिस सांसदों का जन्म ही 10 साल पहले हुआ है, उनकी यह त्रासदी स्वाभाविक है. उनकी तो आंखें जब से खुली हैं तब से उन्होंने यही देखा-जाना है कि लोकसभा का मतलब एक ही आदमी होता है. भाई, यह एकदम सच नहीं है. जैसे यह परंपरा है कि अध्यक्ष जब खड़ा हो जाए तो सभी सांसदों को बैठ जाना चाहिए; प्रधानमंत्री जब बोल रहा हो तब सांसदों को शांति से उसे सुनना चाहिए; वैसी ही परंपरा यह भी है कि विपक्ष का नेता जब बोल रहा हो तब उसे अध्यक्ष द्वारा बार-बार टोकना, बार-बार समय का भान कराना, क्या बोलें, क्या न बोलें आदि का निर्देश देना गलत है, अशिष्टता है, लोकतांत्रिक परंपरा का उल्लंघन है. आखिर परंपराएं बनती कैसे हैं और उन्हें ताकत कहां से मिलती है ? परंपराएं कानूनी प्रावधानों से भी अधिक मान्य क्यों होती हैं ? सिर्फ इसलिए कि कोई भी उन्हें तोड़ता नहीं है. संविधान प्रदत्त शक्तिवान भी उनका शालीनता से पालन कर, उसे और अधिक मजबूत व काम्य बनाते हैं. राष्ट्रगान चल रहा हो तब राष्ट्रपति के सामने से धड़फड़ाते हुए निकल कर अपनी कुर्सी पकड़ने वाला लोकसभा अध्यक्ष हो कि राष्ट्रपति प्रवेश करें तब भी अपनी कुर्सी पर बैठा रहने वाला प्रधानमंत्री हो, ये सब परंपराओं को ठेस पहुंचाती हैं. निश्चित अवधि में समय निकाल कर प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति से मिलना व उन्हें देश-दुनिया के बारे में सरकारी रवैये की जानकारी देना भी एक स्वस्थ परंपरा है जिसका पालन सिरे से बंद है. वैसे यह बात भी अपनी जगह है ही कि राष्ट्रपति जब व्यक्तित्वहीन कठपुतली की भूमिका से संतुष्ट कुर्सी पर बैठा हो तब ऐसी परंपरा कोई निभाए भी क्यों ?   

   यह लंगड़ी व पतनशील गठबंधनों की संसद है जो जब तक रहेगी, राष्ट्र व लोकतंत्र को शर्मसार करती रहेगी. विपक्ष के नेता व संपूर्ण विपक्ष को लगातार यह दबाव बनाए रखना चाहिए कि यह संसद सुधरे या टूटे ! 

   अंधभक्त अपनी फिक्र आप करें लेकिन हम-आप तो सोचें कि ऐसा क्यों है कि सत्तापक्ष के सारे शब्द इतने खोखले लगते हैं ? शिक्षामंत्री ठीक ही तो कह रहे थे कि ‘नीट’ के बारे में हम विपक्ष के सारे सवालों का जवाब देने को तैयार हैं. वे कह तो रहे थे लेकिन उनके हाव-भाव व तेवर यह कहते सुनाई यह दे रहे थे कि कर लो जो करना हो, हम कोई चर्चा नहीं करेंगे. ऐसा इसलिए था कि इसी मंत्री ने, इसी ‘नीट’ के बारे में लगातार यही कहा था कि न कोई लीक हुआ है, न कोई घोटाला हुआ है, सब विपक्ष का कराया हुआ है. “न कोई घुसा था, न कोई घुसा है”, वाला प्रधानमंत्री का बयान इसी तरह चीन में कुछ दूसरा ही सुनाई दिया, और वे हमारी सीमा के भीतर ज्यादा खुल कर अपना काम करने लगे. यह वह संसद है जिसके शब्दों का कोई मोल ही नहीं रह गया है. शेरो-शायरी भी हो रही है, कहावतें भी दोहराई जा रही हैं, प्रधानमंत्री बड़े-बड़े विचारकों-दार्शनिकों के उद्धरण भी ला-ला कर पढ़ते हैं लेकिन सब-के-सब इतने प्रभावहीन क्यों हो जाते हैं ? इसलिए कि उनके पीछे विश्वसनीयता का बल नहीं है. आस्थाहीन प्रवचन आत्माहीन कंकाल की तरह होता है. 

   राहुल गांधी चाहें न चाहें, वे कसौटी पर हैं. कभी रहा होगा लेकिन आज नेता विपक्ष शोभा का पद नहीं है. आज यह पद विकल्प खड़ा करने की चुनौती का पद है. विपक्ष को वक्त की सीधी चुनौती यह है कि क्या पंडित जवाहरलाल के दौर वाली संसद वापस लाने की कूवत उसमें है ? नेहरू वाली संसद इसलिए कह रहा हूं कि हमने वहीं से अपना सफर शुरू किया था और लगातार फिसलते हुए यहां आ पहुंचे हैं. तो कैसे कहूं कि उस दौर से भी बेहतर संसद बनानी चाहिए ! पहले  वहां तक तो पहुंचो, जहां से गिरे थे; फिर उससे ऊपर उठने की बात करेंगे.  

   राहुल गांधी व इंडिया गठबंधन ने संविधान की किताब दिखा-दिखा कर प्रधानमंत्री को जिस तरह चुनाव में पीटा, उसकी काट उन्होंने यह निकाली कि लोकसभा अध्यक्ष को मोहरा बना कर आपातकाल की निंदा का प्रस्ताव पारित करवाया. यह उस घटिया विज्ञापन की तरह था कि “ उसकी कमीज मुझसे सफेद कैसे ?” लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि कांग्रेस को इससे बौखलाने की क्या जरूरत थी ? कोई 50 साल पहले हुई चूक, जिसे इंदिरा गांधी ने, कांग्रेस अध्यक्ष ने कई बार सार्वजनिक रूप स्वीकार किया है, उसे ले कर कांग्रेस अब क्यों बिलबिलाती है ? वह इतिहास की बात हो गई. उसके बाद से कांग्रेस ने संविधान से वैसा कोई खेल खेलने की कोशिश तो की नहीं है. यह भी याद रखना चाहिए कि जनता पार्टी की अल्पजीवी सरकार ने 1977 में ऐसी संवैधानिक व्यवस्था खड़ी भी कर दी है कि किसी सरकार के लिए आपातकाल लगाना असंभव-सा है. फिर आपातकाल का जिक्र आने पर इतना मुंह छिपाने की जरूरत नहीं है. एक गलती हुई जिससे हम दूर निकल आए हैं, कांग्रेस यह क्यों नहीं कहती है ? 

   इतिहास का जवाब देना हो तो संघ परिवार को देना है कि जिस संविधान में इसकी कभी आस्था नहीं रही, जिस तिरंगे को इसने कभी स्वीकार नहीं किया, जिस राष्ट्रगान को इसने कभी माना नहीं, जिस राष्ट्रपिता को इसने कभी मान नहीं दिया, जिस भारतीय समाज की संरचना को यह हमेशा तोड़ने में लगी रही, उसी की आड़ में यह सत्ता में आ कर बैठी है, तो इसमें कैसी नैतिकता व ईमानदारी है ? कांग्रेस की तरह यह सरकार नहीं कह सकती है कि 50 साल पहले हमारे तब के नेतृत्व से एक चूक हुई थी. यह तो आज भी उसी सावरकरी एजेंडा को मानती है, और उसी को लागू करने का मौका ढूंढ़ती रहती है. इस कठघरे में विपक्ष सरकार को खड़ा कर सकेगा तभी अपनी भूमिका निभा सकेगा.  (01.07.2024)