यह सरकार मार पड़ने पर इस्तीफे ही नहीं देती है, घमंड में उठाया अपना क़दम भी वापस लेती है. सौजन्यता नहीं है इसके पास, इसलिए माफी नहीं मांगती है. यूपीआई भुगतान के बारे में टेढ़ा मुंह बना कर जो सारा शुल्क हम पर दे मारा था अभी-अभी इसने, जब चौतरफा मार पड़ी तो उसे वापस ले लिया लेकिन कुछ इस तरह जैसे कुछ हुआ ही न हो !
सारा देश पूछ रहा है कि जंतर-मंतर पर पुलिसिया हैवानियत का आदेश किसने दिया था ? जवाब कोई नहीं दे रहा है. इस सरकार के एक सत्वहीन मंत्री की बात को यदि थोड़ा बदल कर कहूं तो इस सरकार में जवाब नहीं दिए जाते हैं. एक मंत्री लगा रखा है भाई लोगों ने, संसदीय कार्यमंत्री, जो रोज अपनी भी और पार्टी की भी किरकिरी करवा रहा है लेकिन एक वाक्य में यह नहीं बता पा रहा है कि देश का गृहमंत्री कहां गायब है. छोटा-सा प्रश्न जवाब न मिलने से बड़ा-से-बड़ा होता जा रहा है और कल तक जो सरकार 56 इंच की बनी फिरती थी, क्षुद्रतर होती जा रही है.
देश की अर्थमंत्री निर्मला सीतारमन से जितने अनर्थ करवाए जा रहे हैं, उनकी अब गिनती करनी भी हमने छोड़ दी है. हमने गिनना छोड़ दिया है, लेकिन निर्मलाजी ने गलतियां करना थोड़े ही छोड़ा है ! सो एकदम ही अर्थहीन हो चुकी संसद में उन्होंने टैक्सेशन एंड अदर लॉस (एमेंडमेंट) बिल पेश कर दिया. सरकार को पता था कि इस पर कोई बहस नहीं होगी, क्योंकि विपक्ष जब इस सरकार के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रहा है, तो वह इसके कारनामों पर बहस क्यों करेगा !
डॉक्टर लोहिया ने कहा था: जब सड़कें सूनी हो जाती हैं, तब संसद आवारा हो जाती है. इसी वजन की एक दूसरी बात भी कही जा सकती है : जब संसद गूंगी हो जाती है, तब लोक बोलने लगता है. वह बोल रहा है और इतनी जोर से बोल रहा है कि सरकार ने अपने कान व दिमाग बंद कर लिए हैं. इसलिए मैं यह सवाल उठा रहा हूं कि निर्मलाजी ने यह जो बिल पेश किया, इस बिल का जनक कौन है ? वे स्वयं नहीं हैं, यह तो मैं जानता हूं. लेकिन हर उपभोक्ता को, हर स्तर पर कैसे निचोड़ा जाए, इसकी यह काइयां योजना वित्त मंत्रालय के किस अधिकारी ने बनाई थी, मैं यह जानना चाहता हूं. मैं जानना चाहता हूं कि इस योजना का ‘अमित शाह’ कौन है ? क्या निर्मलाजी बताएंगी या उनके भीतर भी कोई किरण रिजूजू जाग गया है जो बहुत बोलेगा लेकिन मतलब का एक जवाब नहीं देगा ?
यह बिल, जो अब कानून बन गया है, कहता है कि यूपीआई, रूपे या डेबिट कार्ट या ऐसी किसी भी माध्यम से आप जो भी भुगताने करेंगे, उसकी फीस भी आपको चुकानी पड़ेगी. उस पर अब यह लीपापोती की जा रही है कि इसे या उसे फी नहीं लगेगी, एकदम मुफ्त रहेगा यह. लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा सीधी बात कह रहे हैं कि इन सारी प्रक्रियाओं का खर्च तो आता ही है; खर्च आता है तो भुगतान भी किसी को तो करना ही होगा! संजय मल्होत्रा साहब से मेरा सवाल इतना ही है कि आप जिसे ‘किसी को’ कह कर पतली गली से निकल जाना चाहते हैं, वह हम ही क्यों हैं ?
ईमानदारी की बात यह है कि बैंकों का यह सारा जंजाल आपने खड़ा किया है. हम तो अपनी थोड़ी-बहुत आय और बहुत सारे खर्च का संतुलन बिठाते-बिठाते ही दोहरे हुए जा रहे थे. जो थोड़ा-बहुत अगली फ़सल या ज़रूरत के लिए बचा पाते थे वह घर में ही रखा रहता था. बैकों का यह सारा जाल आपने बुना ताकि हमारे घर में बचे-रखे पैसों तक भी आपकी पहुंच बन सके. पैसों से पैसे बनाना, पैसों वालों तक पैसा पहुंचाना आपकी योजना थी, हमारी नहीं. हम अपना पैसा लेकर बैंकों में आ जाएं, इसके लिए कितनी कसरत की आपने ! तरह-तरह प्रलोभन दिए आपने; हमें सुरक्षा व व्याज का लालच दिया. हमारा पैसा हमारे देश के विकास में लगाया जाएगा, यह प्रलोभन भी कम नहीं था. हम फंसते गए, आप फंसाते गए. फिर भी हमारा रिश्ता आमने-सामने का था. हम नियमित बैंक जाते थे, आमने-सामने बैठ कर अपना काम निबटाते थे, अपने पासबुक में अपना पैसा दर्ज करा कर लौटते थे.
हमने कहां कहा कि हमें कोई तकलीफ है! आपने ही कहा कि हम आपकी तकलीफ़ कम करना चाहते हैं. अब आपको पासबुक ढोना नहीं होगा, हम आपको स्टेटमेंट भेजेंगे. फिर वह स्टेटमेंट कागज से इलेक्ट्रोनिक कर दिया आपने. हमसे पूछा भी नहीं कि भाई, आपकी इलेक्ट्रोनिक पहुंच है भी कि नहीं ? हम चुप रहे, क्योंकि तथाकथित आधुनिकता दूसरा कुछ करे या न करे, डराती बहुत है. आपने बैंकों का अपना महल खड़ा करना शुरू किया और हमें किनारे करने लगे. हम यह देख तो रहे थे, समझ कम पा रहे थे. आपने हमारा सारा पैसा अपनी मुट्ठी में कर लिया. ऐसा हाल कर दिया आपने कि हम अपना पैसा निकालना चाहें तो आपका रवैया ऐसा होता है जैसे हम खैरात मांग रहे हैं; कि किसी दूसरे का पैसा उड़ाने की फिक्र में हैं हम. काउंटर के उस तरफ बैठा आदमी कब आदमी नहीं, मशीन बन गया, हम पहचान नहीं सके. अब वह बात नहीं करता है, फॉर्म थमाता है. वह हमेशा ही चाय पीने, मोबाइल पर बतियाने या लंबे लंच पर रहता है जबकि हम कतार में लगा दिए जाते हैं. हमने यह भी देखा कि बैंकों की सूरत संवरती जा रही है, उनका मकान ऊंचा व चमकदार होता जा रहा है. वेतन-भत्ता बढ़ाने की अंतहीन मांगें व बैंकों के हड़ताल पर जाने का नजारा भी हम देखते रहे.
फिर हमने देखा कि आपने हमें जितने भी प्रलोभन दिए गए थे, वे एक-एक कर वापस लिए जाने लगे. हमें अपना ही पैसा किश्तों में मिलने लगा, हमारे ही पैसों में विभिन्न कारणों से कटौती की जाने लगी; फिर हमसे बिना पूछे, मीनिमम बैलेंस की तलवार हमारे ऊपर चलाई गई; फिर कहा गया कि पैसे चेक से निकालते हो तो उस चेक की कीमत भी आपको देनी होगी; कि आप दिन में इतनी बार ही पैसा निकाल सकते हो; अपने पैसे का ड्राफ्ट बनवाया तो उसकी क़ीमत अलग से देनी होगी. आपने सूदखोरी पर कानूनी बंदिश लगाई ताकि सरकारी सूदखोरी निर्बाध चल सके.
हमने कहां मांगा था कि हमें एटीएम मशीन लगा दो ? आपने लगाई; हमारी सुविधा के लिए नहीं, अपनी कमाई बढ़ाने के लिए. उस मशीन से आपने अपना किराया बचाया, आदमी रखने का खर्च बचाया. जब हमने आपकी यह मनमानी क़बूल कर ली तो आपने धीरे से उस मशीन का पैसा वसूलना शुरू कर दिया. बैंकों की व्याज-दर कम-से-कम होती गई, और आप हमारे ही पैसों से खुले बाजार में सट्टा खेल-खेल कर करोड़ों-अरबों बनाने लगे. आपने इतनी इंसानियत भी नहीं दिखाई कि जिसके पैसों पर ऐश कर रहे हो, उसे अपनी कमाई में हिस्सेदारी भी दें. बैंक अधिकारियों के लगातार बढ़ते वेतन-भत्ते देखो, उनकी दूसरी सारी सुविधाएं देखो, उनमें कदम-कदम पर पनपता भ्रष्टाचार देखो और फिर हिसाब लगाओ कि बैंक खाताधारकों के हित में हैं कि सत्ता के लिए दुधारू गाय हैं ? तुम आसानी से समझ सकोगे कि यह सत्ता व संपत्ति का भयंकर गठजोड़ है.
फिर एक सुबह किसी क्षद्मधारी ने घोषणा कर दी कि आज से नकद खरीद-भुगतान बंद करो, इलेक्ट्रोनिक विधि अपनाओ. नहीं भाई नहीं, हमें नकद खरीद-फरोख्त में कोई परेशानी नहीं थी. तुम्हें थी कि तुम हम पर वैसा काबू नहीं कर पा रहे थे जैसा तुम चाहते थे. हमारा पैसा व हम आजाद रहें, इससे तुम्हें परेशानी थी. तुमने अपने पंजे में हमारा सब कुछ समेट लेने के इरादे से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान हम पर लाद दिया. यह भी हमने निभाया. अब निर्मला बहन कह रही हैं कि आपको इस सुविधा की कीमत भी देनी होगी. कैसी सुविधा ? कोई हमें समझाए कि हमारे पैसों की भीख आपने मांगी थी, आपने देश के विकास की कसमें खाई थीं, आपने कहा था कि इन पैसों से सट्टा नहीं खेलेंगे, आपने कहा था कि आप जब चाहेंगे अपना पैसा निकाल सकेंगे, आपने कहा था कि हम आपके पैसे पर व्याज भी देंगे. वह सब हवा हो गया. हमारा पैसा आपकी मुट्ठी में हर तरह से बंद होता गया. अब आप उस मशीन का पैसा भी हमसे वसूल रहे हैं जिसकी हमने मांग भी नहीं की थी !
तुम अपनी सुविधाएं सब वापस ले लो, हमारा पैसा सारा हमें लौटा दो और फिर दिखाओ हमें पैसा कमाने की अपनी कला ! तुम्हारा निकम्मापन तो ऐसा है कि अपनी एक योजना भी ठिकाने से बना-चला नहीं सकते हो; तुम्हारे बनाए भवन व पुल व रास्ते सब बनते नहीं हैं कि धराशाय़ी हो जाते हैं ! ठेकेदारों पर कभी-कभार जुर्माना तो होता है, ठेकेदारों के ठेकेदार पर कभी जुर्माना हुआ है ? आज तक किसी एक सरकार ने भी अपने ऐसे निकम्मेपन का हर्जाना सार्वजनिक कोष में जमा किया है ? कहां से करोगे कि तुम्हारे पास एक धेला भी ऐसा नहीं है कि जो हमारा नहीं है. तुम्हारा अस्तित्व हमारे वोट से है, तुम्हारा वैभव हमारे नोट से है. और तब निर्मला बहन किसे आंखें दिखा रही हैं ? जब सारी नकदी अपनी मुट्ठी में करनी थी तब रात के अंधेरे में नोटबंदी की महामूर्खता की; जब मध्यम रोजगार-धंधे को खत्म कर व्यापार-धंधे पर एकाधिकार करना था तब जीएसटी का काला क़ानून लाद दिया. लेकिन निर्मला बहन को मालूम हो कि न मालूम हो, पैसों से झूठ बोला जा सकता है, पैसा कभी झूठ नहीं बोलता है. वह आज फिर यह सच बोल रहा है कि देश के अर्थतंत्र पर निर्मला बहन व उनके भाइयों का कोई काबू नहीं है. वह ऐसी कटी पतंग है जो कभी डॉलर तो कभी रूबल की तरफ़ उड़ती है और दोनों उसे जब चाहें लूट लेते हैं. यह कोई अर्थतंत्र हुआ क्या ?
बात यहां पहुंच गई है. यूपीआई से भुगतान हम करें या न करें, जवाब आपको देना ही होगा कि इस योजना का ‘अमित शाह’ कौन है ? ( 11.08.2026)