Tuesday, 19 May 2026

ऐसी न्यायपालिका किसे चाहिए ?

 हमारे पांच राज्यों में चुनाव क्या हुए कि उनके नतीजों ने पचासियों सवाल खड़े कर दिए हैं; और हर सवाल ऐसे कि जिनके जवाब हमारे अब तक के लोकतांत्रिक इतिहास में खोजे नहीं मिलते हैं. ऐसे सारे सवाल अखबारों की सुर्खियों से भी ग़ायब हैं, क्योंकि अखबार जैसा जो हमारे यहां कुछ बचा है, उनकी सुर्खियां अब बनती नहीं हैं, बनी-बनाई मिलती हैं. ऐसे ही मिलते हैं वे सारे लोग जो बगैर किसी गहरी विशेषज्ञता के विशेषज्ञ घोषित कर दिए जाते हैं. सारे सवाल इन दो पाटों के बीच पिस रहे हैं. 

   अगर ऐसा नहीं होता तो ऐसा कैसे होता कि चुनाव में अधिकाधिक मतदाता भाग लेंइसकी य़ुक्ति निकालने की जगह चुनाव आयोग वह रास्ता निकाल लाता जिससे कम-से-कम मतदाता चुनाव में हिस्सा ले सकें एसआईआर या सर’ इसी काम के लिए ईजाद की गई वह अनैतिक व असंवैधानिक युक्ति है जिसका पूरा श्रेय सरकार व आयोग के बीच की जुगलबंदी को जाता है. 

   देश की मतदाता सूची बनानाउसे जांचते व सुधारते रहना चुनाव आयोग का - एकमात्र चुनाव आयोग का - दायित्व है. एक से दूसरे चुनाव के बीच का सारा समय इस आयोग के पास संविधान द्वारा दिया दूसरा कोई काम नहीं होता है सिवा इसके कि वह अपनी मतदाता सूची को पाक-साफ बनाए. अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह अयोग्य भी है और अपराधी भी. अगर वह ऐसा कहता है कि इस या उस सरकार ने घुसपैठिए घुसा करमतदाता सूची दूषित कर दी हैतो उसे देश को बताना ही पड़ेगा कि उसने कबकहांकिससे इसकी शिकायत की कि फलां सरकार मतदाता सूची को अपने राजनीतिक हित में दूषित कर रही है वह यह साबित कर दे कि उसने समय परसही एजेंसी को मतदाता सूची के साथ किए जा रहे बलात्कार की शिकायत की थीतो बात पटरी पर आ जाती. लेकिन अचानक नींद से जागे किसी शराबी की तरह वह मतदाताओं पर टूट पड़े और सरकार उसे ऐसे मतदाता-संहार की इजाज़त दे भी दे तो भी यह नितांत अनैतिक व असंवैधानिक है. संविधान कभी भी और कहीं भी चुनाव आयोग को ऐसा अधिकार नहीं देता है. संवैधानिक दायित्व के पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति या संस्थान असंवैधानिक व अनैतिक रास्ते पर चल पड़े तो सबसे पहला काम यह होना चाहिए कि उसके हाथ बांध दिए जाएं. 

   ऐसी हाथबंदी कौन कर सकता है ?       

   लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विकास में ऐसी उलझी हुई स्थितियां बड़े काम की होती हैं. उनसे संविधान व लोकतांत्रिक नैतिकता दोनों उजागर भी होती हैं और सशक्त भी. लेकिन यहां एक पेंच है. ऐसा तभी हो सकता है जब संवैधानिक प्रावधान व लोकतांत्रिक नैतिकता की उलझनें संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर से पैदा हुई हों. जब उलझनें संविधान को झांसा देनेउसे तोड़-मरोड़ कर अपनी मुट्ठी में कर लेने की पतनशील चालबाजियों से से पैदा हुई हों तब वे दीमक की तरह संविधान व लोकतंत्र दोनों को खोखला करने लगती हैं. ऐसा इसलिए है कि लोकतंत्र अंततः एक नैतिक अवधारणा है जिसे संविधान ने कानूनी जामा पहनाया है. नैतिकता तभी तक स्वस्थ व गतिशील रहती है जब तक समाज सजग व सक्रिय रहता हैसंवैधानिक संस्थाएं अपनी परंपराओं का ससम्मान पालन करती हैं तथा विधायिका से फासला बना कर चलती हैं. न्यायपालिका विधायिका के साथ मिलकर जब गणेश आरती करने लगती हैतब सब कुछ गोबर गणेश हो जाता है.   

   संविधान के निर्माता इसके प्रति बेहद सावधान थे कि लोकतांत्रिक चेतना व संवैधानिक प्रावधान हमारे लिखे शब्दों से एक हद तक ही सुरक्षित व संरक्षित हो सकती है. इसलिए उन्होंने संविधान में ही ऐसी संवैधानिक संस्थाओं की व्यवस्था खड़ी की जो लोकतंत्र की जड़ें सींचेंसंरक्षण के लिए बाड़ें खड़ी करें. विधायिकाकार्यपालिकान्यायपालिका व मीडिया ही नहींदूसरी भी कई संरचनाएं बनाई गईं कि जिनका काम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मज़बूत बनाना व लोकतांत्रिक चेतना को स्वस्थ व गतिशील बनाना है. 

   इतना सब करने के बाद भी संविधान निर्माताओं के मन में शंका बनी रही कि सत्तालोलुप सरकारें व कायर-चापलूस नौकरशाही के कारण यह खतरा कभी भी उभर सकता है जब लोकतंत्र का ढांचा बना रहे लेकिन उसकी आत्मा का लोप हो जाए. ऐसा जब भी होगालोकतंत्र एक बाजारू व्यवस्था भर रह जाएगा जिससे सभी निहित स्वार्थ फ़ुटबॉल खेलेंगे. ऐसी शंका में से जन्म हुआ न्यायपालिका की संवैधानिक अवधारणा का ! संविधान ने न्याय-व्यवस्था के भीतर ही एक ऐसी न्यायपालिका की संरचना की जो सबसे पहले व सबसे अंत तक संविधान के शब्दों की संरक्षक रहेगी तथा संविधान की आत्मा को प्रखरता से स्थापित करेगी.          

   हमारे संविधान ने एकमात्र न्यायपालिका के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई कि जिसे संविधान के अलावा दूसरे किसी का बोझ नहीं ढोना हैसंविधान के अलावा दूसरे किसी की नहीं सुननी हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं कहना हैसंविधान के अलावा दूसरा कुछ नहीं देखना है. उसने न्यायपालिका से कहा कि संविधान ही आपके लिए गीताक़ुरानजपजीगुरूग्रंथ साहबबाइबिलअवेस्ता व दूसरे किसी भी विश्वास-ग्रंथ की जगह रहेगा. उसने एकमात्र इसी संस्थान की कुंडली में लिख दिया कि इसे हमेशा विपक्ष में ही रहना है - राजनीतिक दलों व संगठनों वाला विपक्ष नहींसंवैधानिक विपक्ष ! न्यायपालिका के हाथ में संविधान का गांडीव देकर उसने कह दिया : तुम्हारी नजर हमेशा उस मछली की आंख पर होनी चाहिए कि जो संविधान की मर्यादा से बाहर जा रही हो - फिर वह राष्ट्रपति हो कि प्रधानमंत्री कि राज्यपाल कि लोकसभा व राज्यसभा का अध्यक्षविधायिका हो या कार्यपालिका कि मीडिया. उसे इतना सजग व संवेदनशील रहना ही होगा कि देश के किसी भी कोने मेंकिसी एक व्यक्ति की भी गिरफ्तारी होती है तो वह तनक उठे व उस व्यक्ति के साथ तब तक खड़ी रहे जब तक यह साबित न हो जाए कि उस व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को स्थगित या सीमित किए बिना सरकार अपने संवैधानिक दायित्व की पूर्ति नहीं कर सकती थी. यह सुनिश्चित होने के बाद भी न्यायपालिका को यह देखते रहना है व सुनिश्चित करते रहना है कि उस व्यक्ति के नागरिक अधिकार व उसकी संवैधानिक गरिमा का हनन न हो. संविधान ने ऐसी न्यायपािलका बनाई और फिर ख़ुद को भी उसके ही हाथ में सौंप दिया - ‘ मेरा संरक्षण और मेरा संवर्धन भी तुम्हारा दायित्व है. यह तुम्हारे होने की सार्थकता भी है और यही तुम्हारे होने की कसौटी भी है.’ 

   क्या हमारी न्यायपालिका को इस दायित्व का अहसास है क्या हमारी न्यायपािलका लोकतंत्र के कठघरे में खड़ी हो करगीता पर हाथ रख कर शपथपूर्वक कह सकती है कि लोकतंत्र के संरक्षण व संवर्धन का दायित्व उसने सौ टंच निभाया है सौ टंच इसलिए कह रहा हूं कि संविधान का आधा-अधूरा निर्वाह अर्थहीन अवधारणा है. संविधान या तो हैया नहीं है ! अगर संविधान है तो श्रीमान सूर्यकांत हमें बताएं कि यह कैसे संभव हुआ कि बंगाल में 90 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम विभिन्न कारणों से मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए क्या चुनाव आयोग को चुनाव के ठीक पहले ऐसा करने का अधिकार है श्रीमान सूर्यकांत सर्वोच्च न्यायालय के जिन गलियारों से गुज़र कर रोज़ अपने चैंबर में पहुंचते हैंउन गलियारों में सर’ की गूंज लंबे वक्त से गूंजती रही है. श्रीमान सूर्यकांत समेत भारत की सर्वोच्च अदालत का एक भी जज ऐसा नहीं है कि जो कह सके कि उसने यह गूंज सुनी ही नहीं ! सुनीतो फिर किया क्या किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर आपत्ति उठती हो तो उसकी बारीक जांच-परख जरूरी होती है. उसमें समय भी लगता है. लेकिन जब भी आपत्ति उठे तो संविधान से बंधी न्यायपालिका सबसे पहले क्या करेगी संवैधानिक विवाद के केंद्र में आने वाले संस्थान या व्यक्ति को वह पहला आदेश यह देगी कि पीछे हटो व इंतजार करो ! 

   ऐसा क्यों नहीं किया गया बिहार के वक्त सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा दिखाया कि वह मतदाता सूची के मामले में आयोग की मनमानी चलने नहीं देगा. फटकार-धमकी-लांछन-उपहास क्या नहीं था कि जिससे सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को नवाजा नहीं. सर्वोच्च न्यायालय के खाते में बस एक ही बात बाकी रह गई थी : संविधान के प्रति अपनी एकनिष्ठ प्रतिबद्धता की घोषणा ! वह प्रतिबद्धता पहले दिन से नहीं थीसो बिहार में चुनाव लूट लिया गया. संविधान को धोखा दे करसंवैधानिक नैतिकता को रौंद कर एक अनैतिक गठबंधन को उसी तरह सरकार बनाने का मौका दिया गया जिस तरह महाराष्ट्र में दिया गया था. इससे लोकतंत्र को कुछ भी हासिल नहीं हुआन्यायपालिका अनैतिकता के दायरे में आ गई. 

   कैसा विद्रूप है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की सर्वज्ञात बात किसी पाठ्य-पुस्तक में लिख दी गई तो श्रीमान सूर्यकांत आग-बबूला हो गए. ख़ुद ही इसका संज्ञान ले कर पुस्तक बनाने वाली समिति पर वे ऐसे टूट पड़े मानो दुर्वासा ऋषि अवतरित हुए हों. सरकार भी त्राहिमाम-त्राहिमाम की मुद्रा में आ गई. सबने अपने कदम पीछे खींच लिये. मामला रफा-दफा कर दिया गया. लेकिन चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में खुली धांधली करते अधिकारी का वीडियो सामने आने पर भी सर्वोच्च न्यायालय में खलबली नहीं मची. न वह अधिकारीन चंडीगढ़ का चुनाव आयुक्तकोई भी  बर्खास्त हुआन उसे किसी भी संवैधानिक दायित्व के लिए आजीवन अयोग्य घोषित किया गया. बससबकी सुविधा का रास्ता यह निकाला गया कि नया मेयर घोषित कर दिया गया. यह संविधान के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध संस्थान का नैतिक आचरण नहीं थाधूर्त नौकरशाही की चालबाजी थी. 

    जब वोट चोरी का साक्ष्य सामने आयाएकाधिक बारएकाधिक निर्वाचन क्षेत्रों के संदर्भ में आया तब न्यायपालिका ने क्या किया उसने चुनाव आयोग को तुरंत ही कठघरे में नहीं बुलाया. न्यायाधीशों की तरह संविधान के पंडित न हों हमफिर भी हम ऐसे मामले में पहला आदेश यही जारी करते कि वोट चोरी के साक्ष्य की जांच के लिए न्यायालय की समिति गठित की जा रही हैऔर जब तक यह जांच पूरी नहीं हो जातीयह चुनाव आयोग दूसरा कोई भी चुनाव संचालित नहीं कर सकेगा. चुनाव यदि संसदीय लोकतंत्र की नसों में दौड़ने वाला लहू हैतो उसे बोतल में बंद करने की इज़ाजत कैसे दी जा सकती है इसलिए तत्काल न्यायिक जांच का आदेश जरूरी था. वह हुआ होता तो इस पतनशील व्यवस्था पर लगाम लग जाती.   

   बंगाल के बारे में मेरे जैसा सामान्य विवेक व लोकतंत्र के प्रति असामान्य आस्था रखने वाला व्यक्ति एक ही आदेश देता कि बंगाल में चुनाव घोषित समय से ही होंगे लेकिन चुनाव आयोग के निकम्मेपन के कारणउसे विधानसभा के पिछले चुनाव की मतदाता सूची का ही पालन करना होगा. चुनाव से काफी पहले मतदाता सूची जांच-परख ली जाए ताकि उसे ले कर मतदाता के मन में कोई आशंका न रह जाएयह दायित्व चुनाव आयोग का है. अगर वह अपने दायित्व के निर्वाह में विफल रही है तो उसकी सजा उसे मिलनी चाहिएन कि संवैधानिक प्रक्रिया को. 

   मतदाता व मतदान दोनों ही भय व पक्षपात मुक्त होने ही चाहिए. इस दिशा में चुनाव आयोग के हर प्रयत्न का स्वागत व समर्थन होना चाहिए. संविधान ने आयोग के वर्चस्व की ऐसी व्यवस्था कर भी रखी है और अब तक ऐसा ही होता भी आया है. बंगाल में कुछ ख़ास भी था क्योंकि कांग्रेसी सिद्धार्थ शंकर राय ने वाम हिंसा कावाम ने कांग्रेसी हिंसा काममता बनर्जी ने वाम हिंसा का और फिर ममता बनर्जी ने मोदी-शाह हिंसा का उससे बड़ी हिंसा संयोजित कर मुकाबला किया था. 

   इस बार पासा पलटाक्योंकि ममता की हिंसा को भाजपा-चुनाव आयोग-राज्यतंत्र की तिहरी हिंसा का मुकाबला करना पड़ा और वह इसमें पिट गई. बंगाल में राजनीतिक हिंसा व चुनावी गुंडागर्दी को जायज़-सा माना जाता है. लेकिन बिहार से चल कर बंगाल पहुंची चुनाव आयोग-सरकार की जुगलबंदी के सिलसिले की अनदेखी करेंगे हम तो भ्रमित भी होंगे व गलत नतीजों पर भी पहुंचेंगे. 

   क्या न्यायपालिका ने बंगाल में यह नहीं देखा कि इस बार हिंसा का आयोजन दिल्ली से हुआ हैउसकी कमान चुनाव आयोग ने संभाल रखी हैभद्रजन जिसे हेटस्पीच’ कहते हैं लेकिन संविधान जिसे लोकतंत्र की जड़ पर प्रहार मानता हैवैसा कारनामा प्रधानमंत्री से ले कर भाजपा का हर ऐरागैरा-नत्थूखैरा करने में लगा है लाखों मतदाताओं के नाम रद्द करने की धौंस से नागरिकों में लाचारी व अपमान का माहौल बनामनमाने प्रशासनिक फेर-बदल ने स्थानीय स्वायत्ता को धूल-धूल कर दियासुरक्षा-बलों की छावनी जिस तरह बंगाल में उतारी गईउसने एक तरफ़ बंगाली मतदाताओं को भयाक्रांत किया तो दूसरे बंगालियों को हमलावर भी बना दिया. 

   कई लोग कह रहे हैं कि ममता की सांप्रदायिक हिंसा से बंगाल पहली बार मुक्ति हुआ. ऐसा कहने वालों से कोई पूछे कि लोकतंत्र के संदर्भ में दलीय हिंसा और सत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा में फर्क होता है या नहीं दलीय हिंसा दल की पराजय के साथ खत्म हो जाती हैसत्तातंत्र की योजनाबद्ध हिंसा राजनीतिक संस्कृति बन जाती है. दिल्ली ने बंगाल में यही किया. न्यायपालिका को यह नहीं दिखा कि चुनाव के दौरान बंगाल का पूरा प्रशासनपुलिस-सुरक्षा बलप्रचार-तंत्र सारा कुछ बंगाल पर बाहर से ला कर लाद दिया गया था यदि ममता बनर्जी बहुत भ्रष्टसांप्रदायिक ताकतों को लामबंद करने वालीहिंसा भड़काने वाली बला की अलोकप्रिय मुख्यमंत्री थींतो उन्हें हराने के लिए दृढ़ मतदाता व निष्पक्ष चुनाव से अधिक की जरूरत क्यों पड़ी क्यों भाजपा की संपूर्ण दिल्ली-मंडली बंगालवासी बन गई जीत भारतीय जनता पार्टी की हो कि ममता बनर्जी कीबंगाल की जनता की क़िस्मत बहुत बदलने वाली नहीं है. भगवा ज़हर मन में भरा न हो तो 2014 से आज तक भाजपा शासित राज्यों की जनता का हाल देख लें तो जवाब मिल जाएगा. लेकिन जिन्हें भगवा की चाह हैउन्हें लोकतंत्र से क्या मतलब !   

   सर्वोच्च न्यायालय को इस बात का अहसास है क्या कि जब-जब उसे संविधान के संरक्षण में चीते की फुर्ती से आगे आना चाहिए थातब-तब वह गीदड़ की कायरता से घिरा बैठा मिला ! भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में आपातकाल एक विभाजक रेखा बनाता है. वहां से देखें कि नागरिक स्वतंत्रता का सवाल हो कि प्रेस पर सेंसरशिप का कि नक्सली बता करराज्य द्वारा अनगिनत लोगों की हत्या कावोट चोरी का या मतदाता सूची में मनमानी दखलंदाजी का,  ऐसा क्यों है कि संविधान की प्रतिष्ठा और राज्य के आतंक के बीच चुनाव का नाज़ुक क्षण जब भी आता हैहमारी न्यायपालिका को लकवा मार जाता है कायरता व कमजोरी को खोखले शब्दों व तर्कों से कौन ढक सका है ऐसी कोशिशें आपको और बेपर्दा कर जाती हैं. बाबरी मस्जिद ध्वंस का सवाल हो कि चुनावी बौंड की वैधता कान्यायपालिका अपेक्षित प्रखरता से सामने नहीं आ पाती हैतो क्यों जवाब गांधी देते हैं : जिन्हें हम संवैधानिक संस्थाएं कहते हैं वे सब निर्णायक क्षणों में सत्ता के साथ खड़ी दिखाई देंगीक्योंकि अंतत: ये सब उसके ही उपकरण हैं. इसलिए भगवा आतंकवाद की तीन गोलियां खाने के दिन तक वे इसी युक्ति में लगे थे कि इस देश की लोकतांत्रिक चेतना को कैसे मज़बूत व प्रभावी बनाया जाए.   

   यह बात बार-बार कहने की व न्यायपािलका द्वारा लगातार दोहराने की है कि हमारी नागरिकता व मतदाता की हमारी हैसियत भारतीय राज्य की कृपा से नहीं है. यह हमें हमारे संविधान से स्वत: ही मिलती है. संविधान ने किसी कोई चुनाव आयोग कोकिसी सरकार कोलोकसभा या राज्यसभा के किसी अध्यक्ष को याकि किसी राज्यपाल को अपवादस्वरूप भी ऐसी मनमानी शक्ति नहीं दी है कि वह नागरिक को उसकी नागरिकता से या मतदाता को उसके मतदान के अधिकार से वंचित कर दे. बुलंद आवाज में यह सत्य कहना व इसे स्थापित करना आज न्यायपालिका का दायित्व है जिसमें वह बार-बार विफल होती है. इतना बड़ा सफेद हाथी हमने इसलिए पाल रखा है कि गाढ़े वक्त में वह लोक के साथ खड़ा होन कि तंत्र की तरफदारी करे. लेकिन लगता हैहमारी न्यायपालिका सरकारी नौकरशाही का हिस्सा बन कर रह गई है.

   निर्भीक तटस्थता से लैस मतदाता ही हमारे लोकतंत्र की अंतिम आशा है जो न्यायपालिकाविधायिकाकार्यपालिका व मीडिया को  अंकुश में रखेगा. ( 16.05.2026)

Thursday, 7 May 2026

जब कैमरा बोला करता था …

 26 अप्रैल 2026 को जब रघु राय ने अपने कैमरे का शटर दबाया होगा, तब उन्हें इल्म हुआ होगा कि उनका कैमरा बंद हो गया है. अब वह न कभी खुलेगा, न कभी बोलेगा ! 

   उनका कैमरा बोलता था. रघु राय के कैमरे में व दूसरों के कैमरे में यही फर्क था. दूसरों का कैमरा बोलता नहीं थादेखता थारघु राय का कैमरा गूंगा होने को तैयार नहीं था. वह बोलता था. महान कनाडियन कैमराकार यूसुफ कार्श का कैमरा नहीं बोलता थाउनके पोट्रेट बोलते थे. उनके पोट्रेट के पात्रों की आंतरिक विशेषताओं को उनका कैमरा जैसे छू लेता था. वह कहता कुछ नहीं थाहमारे सामने उस व्यक्ति को खड़ा कर देता था. 

   मैंने ऐसा ही कुछ पहली बार पटना की उस मित्र-मंडली में कहा था जिसमें रघु राय भी मौजूद थे. चेहरे पर सदा खिली रहने वाली आत्मीय मुस्कान के साथ वे मुझे सुन रहे थे : रघु राय के फोटोग्राफ्स बोलते हैं इसलिए हमें उनके पास ठहरना पड़ता है ताकि उन्हें सुन सकेंरघु राय के फोटोग्राफ्स दौड़ते हैं इसलिए हमें उनके साथ तेज दौड़ लगानी पड़ती है ताकि कहीं पीछे न छूट जाएं ! मुझे कई बार लगा है कि उनके फोटोग्राफ्स की एक श्रृंखला देखते-देखते सांस फूलने लगती है. 

   मैं आज कहना चाहता हूं कि रघु राय हमारे दौर के सबसे तेज रफ्तार कैमराकार थे जो गतिशब्द व चित्रतीनों का अप्रतिम संतुलन साध पाते थे. मैं यह आज इसलिए कहना चाहता हूंक्योंकि रघु राय अब नहीं हैं. अब वह आंख नहीं है जो कैमरे से जुड़ कर वह संसार उजागर कर जाती थी जिसे देखते हुए भी हम देख नहीं पाते थे. उनकी आंखों में कैमरा लगा था और उस कैमरे में महाभारतवाले संजय की आंख लगी थी. कई लोग कहते रहेउनकी विदाई-लेखों में भी लिखा जा रहा है कि वे आलादर्जे के न्यूज-फोटोग्राफर थे. रघु राय के परिचय में जब ऐसा कहा जाता है तब मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई जवाहरलाल नेहरू के परिचय में कहे कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे. यह परिचय सच है लेकिन जवाहरलालजी का इससे बौना परिचय दूसरा हो नहीं सकता है. वे बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ भारत के प्रधानमंत्री भी थे. रघु राय बहुत कुछ और भी थे जिसके साथ न्यूज-फोटोग्राफर भी थे. 

   हम बहुत कम समय तक एक-दूसरे को जानते रहे. फिर एकदम अलग हो गए. फिर इधर के दिनों मेंजब मैं दिल्ली आया तो फिर कुछ मिलना हुआ. इसलिए निजता का मेरा कोई दावा नहीं है. लेकिन 1974 से जो शुरू हुईवह सौहार्दपूर्ण पहचान बनी रही. मैंने उनसे भी कहा था और आज भी उसे दोहराता हूं कि रघु राय के कैमरे को 1974-77 के दौर में वह संस्कार मिला जिसने उन्हें फोटोग्राफर से कहीं आगे खड़ा कर दिया. अपना कैमरा ले कर जब रघु राय जयप्रकाश नारायण व उनके आंदोलन के क़रीब पहुंचे तब उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका कैमरा यहां से अपना चरित्र बदलने वाला है. मुझे पता नहीं है कि रघु राय 1974 से पहले जयप्रकाश से परिचित थे य़ा नहीं. कभी पूछा नहींकभी `ऐसी बात निकली नहीं. लेकिन सिताबदियारा की वह रात मुझे खूब याद है जब दिन भर की तूफानी सभाओं व सार्वजनिक जयकारों-हाहाकारों से निकल कर हम देर शाम जयप्रकाश के पैतृक गांव सिताबदियारा पहुंचे थे. 

   अपना वह गांव और अपना वह खपड़ैल मकान जयप्रकाश को बहुत प्यारा था. उसकी उष्मा में वे विभोर हो कर रहते थे - चाहे जितना रह सकें !  उस शाम बेहद थके होने के बाद भी वे वैसे ही मगन-मन थे. वहां जगह भी कम थीसुविधाएं तो और भी कमऔर उसमें औचक आ पहुंचे 10-15 शहरी मेहमान ! सबकी व्यवस्था थी. सबको उनकी जगह पहुंचा करखाना आदि करवा कर थोड़ी राहत मिली. जयप्रकाश भी थकान आदि से निबट कर थोड़े स्थिर हुए तो सब मेहमानों की व्यवस्था आदि की जानकारी ली. बिस्तरमच्छरदानीपीने का पानीबाथरूम सब पूछा : ‘ इनमें से कुछ होंगे जिन्हें सोने से पहले चाय-कॉपी की जरूरत होती होगी. वह सब पूछा न ?’ पूछा तो था लेकिन बहुत आग्रह से नहींइसलिए जवाब में थोड़ा संशय था...रात भी ज्यादा हो रही हैसोने वाले सो भी गए होंगे… व्यवस्थापकों का जवाब पूरा भी नहीं हुआ था कि जयप्रकाश बिस्तर से नीचे उतरे और बोले : ‘ चलेजरा देख लूं !’ 

   मेहमानों में संकोच भरी खलबली हुई. इतनी रात गएथके जयप्रकाश एक-एक के बिस्तरे तक पहुंचेबड़ी आत्मीयता से जो पूछना-बताना थावह सब किया- यहां सुविधाएं कम हैंपरेशानी होगी आपकोसुबह कितने बजे उठते हैंनहाने का गर्म पानी यहां मिल जाएगाचाय कितने बजे लेंगेचाय के साथ क्या लेंगे… मैं देख रहा था कि रघु राय सिकुड़ते जा रहे थे. जिसके पीछे कैमरा ले कर वे सुबह से भाग रहे थेवह अब उनके कैमरे की जद से बाहरउनके सामने खड़ा थाऔर उन्हें अपने कैमरे में बंद कर रहा था. 

   “ आपने रोका क्यों नहीं… दिन भर मैंने इस बूढ़े आदमी को जवानों को मात देने वाली एनर्जी से काम करते देखा है… अब हमारी बेहूदा-सी जरूरतों की चिंता में…” रघु राय को सूझ नहीं रहा था कि वे कैसेक्या कहें… शब्द बता नहीं पा रहे थे कि वे कैसा महसूस कर रहे थे… फिर हम देर रात तक सिताबदियारा के कच्चे रास्तों पर हल्के कदमों व दबी आवाज में बात करते घूमते रहे … वे एक इवेंट कवर करने आए थेऔर यहां मिला उन्हें एक ऐसा व्यक्ति जो इतिहास समेटता हुआइतिहास बदल रहा था… आप देखिए नन यह कैमरा मेरा बनाया हैन मेरे कैमरे के सामने जो घट रहा है वह मेरा रचा है… सब मुझे बना-बनाया मिला है. मैं कर तो इतना ही रहा हूं न कि शटर दबा रहा हूं… रघु राय कुछ और कहते कि मैंने टोका : शटर तो मैं भी दबा सकता हूं लेकिन उसमें से रघु राय का फोटो बनेगा नहींक्योंकि कहांकब व कैसे शटर दबाना है यह न मशीन को मालूम हैन मशीन के सामने घटती घटनाओं को… यह तो रघु राय को ही पता है… कला व कलाकार के बीच का यह रिश्ता ही अंतिम सत्य है… ऐसी कितनी ही बातें उस रात हुईं… जयप्रकाश कर क्या रहे हैंलोकतंत्र के विकास में इस आंदोलन का रोल क्या हैदमन के सामने बहादुरी से खड़े इन नौजवानों की प्रेरणा क्या है जैसी कितनी ही बातें हम कर गए… रघु राय तब अपने फोटो का नया एंगल खोज रहे थे. जिसे हम न्यूज-फोटोग्राफी कह कर निकल जाते हैं और जो न्यूज़ के साथ ही दम तोड़ जाती हैरघु राय उसके पार जाते थे क्योंकि वे क्षण को नहींवक्त को दर्ज करने वाले कैमराकार थे. 

   बिहार आंदोलन में गति व उमंग का विस्फोट हुआ था. रघु राय उसे पकड़ सके थेक्योंकि वे उसे समझ सके थे. उनका कैमरा साक्षी-भाव नहीं रखता थावह भागीदार बन सका था. बिहार आंदोलन के उनके फोटो का संकलन बिहार शोज़ द वे’ आप देखें तो समझ सकेंगे कि वे लिखे शब्दों व विवरणों को व्यर्थ-सा बना देते हैं,क्योंकि वे सारे फोटोग्राफ्स बोलते भी हैंभागते भी हैं. लेकिन आपको एकदम अलग रघु राय मिलते हैं जब आप मदर टेरेसा के पास उन्हें देखते हैं. उनका कैमरा वहां ध्यान करता मिलता है : नि:शब्द प्रार्थना ! रूपाकार नहींकरुणा ही आकार ले लेती है. संगीतकारों की उनकी श्रृंखला मुझे इसलिए बहुत प्रिय है कि कैमरे को उस तरह गाते कभी सुना नहीं था. इंदिरा गांधी का उनका अलबम एकदम अलग भाषा में बोलता है - सत्ता की धमक-चमक व आतंक का रस वहां हर ओर बिखरा मिलता है. 

   वह सारा कुछ जो काल की हथेली पर उन्होंने बिखरा रखा थाअब सिमट चुका है. उसमें कुछ नया जोड़ने वाली आंख नहीं रही. कैमरा भी हैविषय भी हैं लेकिन रघु राय नहीं हैं. 

वह वादा भी अब कभी पूरा नहीं होगा जो जयपुर में गांधी-वाटिका बनाते समय उन्होंने मुझसे किया था : कुमारआपकी गांधी-वाटिका के लिए मैंने कुछ अलग सोच रखा है… मैं वह आपको दूंगा…  

   वह वाटिका भी अब श्रीहीन हो चुकी है

( 28.04.2026)