Friday, 2 February 2018

'पद्मावत' की पाठशाला

बाढ़ का पानी उतरता है तो बाढ़ के साथ बहती एक-एक चीज थमती हुई अपनी -अपनी जगह लग जाती है, कुछ ऐसा ही उन सबके साथ हो रहा है जो संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ से जुड़े थे - यहां तक कि ‘पद्मावती’ का ‘ई’ भी अपनी जगह जा लगा है अौर बचा रह गया है केवल ‘पद्मावत’ ! भारतीय सिनेमा, भारतीय सेंसर बोर्ड, भारतीय प्रशासन अौर राज्य व केंद्र की सरकारों ने मिल कर शायद ही कभी देश के चेहरे पर इस कदर धूल मली होगी ! लेकिन जब अापको अपने चेहरे की नहीं, मुखौटों की फिक्र होती है तब चेहरों पर ऐसे ही कालिख पुत जाती है. 

संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ कमाई अच्छी कर रही है. विरोध से ही तो फिल्म का इतना प्रचार हुअा कि भंसाली को दूसरा कोई ‘ प्रमोशन’ करना नहीं पड़ा. इसके लिए करणी सेना को भंसाली धन्यवाद तो दे ही सकते हैं. मुफ्त प्रचार के बाद कमाई भी खूब अच्छी हो रही है. भंसाली की वे सारी फिल्में सफल बनीं हैं अौर चली हैं जिनके पीछे कोई नजरिया नहीं था. बस कहानी थी, अच्छी किस्सागोई थी अौर उसकी भव्यतर प्रस्तुति थी. भंसाली माल पहचानते भी हैं अौर बेचना भी जानते हैं. लेकिन अाप उनकी फिल्मों में वैसा कुछ खोजने लगेंगे जो उनका हेतु ही नहीं है तो गलती अापकी है, भंसाली की नहीं.  ‘पद्मावती’ तो खुद ही जायसी की कल्पना के पंखों पर सवार हो कर हम तक पहुंची है. अब उसमें किंवदंतियों, किस्सों व सिनेमाई अाजादी की छौंक डाल कर भंसाली ने जो परोसा है, हमें उसी दायरे में फिल्म देखनी भी चाहिए अौर अपनी राय भी बनानी चाहिए. 

हमने, जिन्होंने ‘पद्मावती’ का हिंसक विरोध करने वाली ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ की मनमानी का विरोध किया था, उसे गलती से भी फिल्म का या फिल्म में कही बातों का समर्थन नहीं माना जाना चाहिए. हम तो हर भंसाली के उस अधिकार का समर्थन कर रहे थे ( अौर अभी भी करते हैं ! ) कि जिसे कुछ लिखना, बनाना, गाना, नाचना, रंगना या बोलना है. उस पर सरकार की रोक नहीं होनी चाहिए. उसे कोई व्यक्ति, पार्टी या गुट अातंकित करे, इसे देखना व रोकना सरकार की जिम्मेवारी है; बल्कि जो ऐसा न करे, वह सरकार ही नहीं है !  किसी भी भंसाली का यह अधिकार दरअसल व्यक्ति का नहीं, लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है; कहूं कि अगर यह अधिकार अक्षुण्ण नहीं है तो हम लोकतंत्र की लाश के रखवाले भर हैं, क्योंकि लोकतंत्र की तो हत्या तभी कर दी हमने जब किसी को उसकी अभिव्यक्ति से रोकने या मारने का काम किया. 

अौर यही है जिसकी बात मैं ‘पद्मावत’ के संदर्भ में करना चाहता हूं. इसलिए कहता हूं कि जब राजस्थान में चल रही शूटिंग में घुस कर ‘करणी सेना’ ने भंसाली पर पहला हमला किया था तब से अाज तक संजय लीला भंसाली का एक भी बयान कोई मुझे दिखलाए कि जहां वे हिम्मत के साथ इन लोगों का विरोध करते हों. वे तो पहली वारदात के बाद से ही घिघियाती अावाज में सबको यही भरोसा दिलाते अा रहे हैं कि हमने कुछ भी ऐसा नहीं बनाया है कि जिससे राजपूती अान-बान-शान ( हिंदुत्व ब्रिगेड !) में खम पड़ता हो. वे कहते ही रहे - करणी सेना मेरी फिल्म का सेंसर बोर्ड बन जाए ! इसे कहते हैं : कायरों के कृत्य का कायराना समर्थन !  ‘हम कलाकार हैं, हमें राजनीति से क्या लेना ?’ जैसे वाक्यों से खुद को हर जिम्मेवारी से अलग कर लेना कला के व्यापारियों की ढाल है. राजनीतिक पोशाक पहन कर अलोकतांत्रिक-असामाजिक कृत्यों को अंजाम देने वाले एकाधिक संगठन देश में हैं जो भंसाली जैसों की खुराक से ही जिंदा रहते हैं. लेकिन इस बार यह भी हुअा कि करणी सेना के साथ हिंदुत्ववाली राज्य सरकारें भी तलवार ले कर उतर पड़ीं. पंजाब की कांग्रेसी सरकार भी बहती गंगा में डुबकी लगाने लगी अौर हमने क्षोभ से देखा कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व पीठ फेर कर खड़ा हो गया ! सत्ता के हमाम में सभी एक-से ही नंगे मिलते हैं. 

लेकिन अाप देखिए कि समय भी कैसे पाठ पढ़ाता ! करणी सेना की लाइन से जिस किसी ने भी थोड़ी भी अलग बात की, उसे ही धमकी मिली. दीिपका की नाक-कान काटने या भंसाली की जान लेने की ललकार तो पहले ही हो चुकी थी. कायरता इतनी कि अाप यह भी नहीं कह सके कि दीपिका या भंसाली का जो भी करना है, मैं करूंगा ! करणी सेना के बहादुरों ने दूसरों को उकसाया कि तुम यह कर दो अौर इतने पैसे ले जाअो ! राजपूति स्वाभिमान या जातीय गरूर भी बाजार में ठेके पर उठाया गया.यह सब खुले अाम किया जा रहा था लेकिन हत्या की धमकी अौर उकसावे के अारोप में किसी राज्य ने किसी की गिरफ्तारी नहीं की बल्कि राज्यों ने करणी सेना में दाखिला ले लिया. 

फिर एक अौर मजेदार मोड़ अाया ! खबर अाई कि जयपुर लिट फेस्टिवल में इस बार प्रसून जोशी हिस्सा नहीं लेंगे. यह क्या हुअा ? साहित्य के नाम पर सजे बाजार में, बिकाऊ माल न पहुंचे तो बाजार कैसे चले ! लेकिन प्रसून जोशी ने बड़ी शालीनता से कहा कि वे नहीं चाहते हैं कि लिट फेस्टिवल की गरिमा कम हो, अशांति हो, साथी साहित्यकारों को अौर साहित्यप्रेमियों को तकलीफ हो, इसलिए वे जयपुर नहीं जाएंगे. प्रसून जोशी वहां ऐसा क्या करने वाले थे कि समारोह की गरिमा कम हो जाती, साहित्यकारों व साहित्यरसिकों को तकलीफ हो जाती ? ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ के नये सहसवारों में शान से शामिल प्रसून जोशी को इनाम में जिस सेंसर बोर्ड की अध्यक्षता मिली है, वही उनके गले की फांस बन गई. ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ जो हासिल करना चाह रहा था वह तो सेंसर बोर्ड का अधिकार ही था न ! फिर क्या पुलिस, क्या कानून, क्या संविधान अौर क्या संविधानसम्मत संस्थाएं अौर क्या प्रसून जोशी, सब ठेंगे पर ! मुख्यमंत्रियों ने ऐलान करना शुरू कर दिया कि वे अपने राज्य में ‘पद्मावती’ के प्रदर्शन की इजाजत नहीं देंगे मानो सारा सूबा उनका गुसलखाना हो कि वे जैसे चाहेंगे, वैसे बरतेंगे. केंद्र तो किसी गिनती में नहीं था क्योंकि ऐसी मनमानी की शुरुअात ही तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी  जब अामिर खान की फिल्म पर इसलिए बंदिश लगा दी थी उन्होंने कि अामिर खान ने गुजरात दंगों की निंदा की थी अौर नर्मदा अांदोलन का समर्थन किया था. तब केंद्र में वह मनमोहनी सरकार थी जिसे अपने सरकार होने का अहसास ही नहीं था. उस सरकार ने एक बार भी कमर सीधी की होती तो गुजरात की मनमानी के वक्त ही ऐसा इलाज निकल अाता कि किसी ‘पद्मावती’ की ऐसी हालत नहीं होती. लेकिन सत्ता कई स्तरों पर, कई तरह की कायरता फैलाती है. सत्ता की कायरता उन सबकी कायरता को चालना देती है जो भीड़ की अाड़ ले कर बहादुरी का स्वांग करते हैं.

ऐसे कई बहादुर तब सामने अाए जब कलबुर्गी, पनसारे अादि की हत्या के संदर्भ में सरकार व साहित्यिक संस्थानों का वज्र गूंगापन कई लेखकों-पत्रकारों-स्वतंत्रचेता नागरिकों को साल गया था अौर उनने सरकारी सम्मान वापस कर, सरकार की इस संवेदनहीनता से खुद को अलग करना शुरू कर दिया था. सरकार ने इसे अपनी सत्ता को चुनौती माना अौर देश को बताना चाहा कि साहित्यकार वे ही नहीं है जो सम्मान वापस कर रहे हैं, वे भी हैं जो इसका विरोध कर रहे हैं. अौर सड़क पर जो ‘साहित्यसेवी’ दिखाई दिए उनमें प्रसून जोशी भी थे, अनुपम खेर भी; या कहूं कि अनुपम खेरों, प्रसून जोशियों का जमावड़ा ही था जो चीख-चीख कर कह रहा था कि नरेंद्र भाई के शासन में कहीं असहिष्णुता है ही नहीं ! इन महान साहित्यकारों ने घोषणा कर दी कि असहिष्णुता शब्द वैध है ही नहीं ! फिर बाढ़ उतरी अौर हमने देखा कि ये सारे बहादुर इस या उस सरकारी कुर्सी पर जा बैठे ! इनकी कुर्सियों के पीछे असहिष्णुता में गौरी लंकेश ही नहीं मारी गईँ, कितने ही अनजान-असहाय लोग जहां-तहां घेर कर भीड़ द्वारा मारे गये. अाज भी वह असहिष्णुता जारी है अौर लोग मारे जा रहे हैं. 


प्रसून जोशी को अाज उसी अवैध असहिष्णुता का सामना करना पड़ रहा है अौर अगर वे जयपुर लिट फेस्टिवल में जाने का साहस जुटा पाते तो इसी के शिकार हो सकते थे. असहिष्णुता अमानवीयता का दूसरा नाम है. प्रसून जोशियों, अनुपम खेरों को शायद यह अहसास हो कि जब भीड़ की असहिष्णुता हमला करती है तब व्यक्ति कितना अकेला अौर असहाय हो जाता है - फिर उसका नाम फेलू खान हो कि प्रसून जोशी ! ( 02.02.2018)         

Sunday, 28 January 2018

गांधी का हिमालय

      
     कभी गहरी पीड़ा अौर तीखे मन से जयप्रकाश नारायण ने कहा था : दिल्ली एक नहीं कई अर्थों में बापू की समाधि-स्थली है !’ देखें कि यह समाधि कहां है अौर कैसे बनी है ? … एक तो यही कि गांधी की हत्या इसी दिल्ली में हुई थी. लेकिन कहानी उससे पहले से शुरू होती है. 

यही दिल्ली थी कि जहां प्रार्थना करते गांधी पर, 20 जनवरी 1948 को बम फेंका गया था. वह बम उनका काम तमाम नहीं कर सका. उसका निशाना चूक गया. उनकी हत्या की  यह पांचवीं कोशिश थी. गांधी इनसे अनजान नहीं थे. उन्हें पता था कि उनकी हत्या की कोशिशें चल रही हैं, कि उनके प्रति कई स्तरों पर गुस्सा-क्षोभ-शिकायत का भाव घनीभूत होता जा रहा है. लेकिन वह दौर था कि जब इतिहास की अांधी इतनी तेज चल रही थी कि हमारी नवजात अाजादी उसमें सूखे पत्तों-सी उड़ जाएगी, ऐसा खतरा सामने था. इसकी फिक्र में जवाहरलाल, सरदार अौर पूरी सरकार ही रतजगा कर रही थी. गांधी भी अपना सारा बल लगा कर इतिहास की दिशा मोड़ने में लगे थे अौर यहां भी वे सेनापति की अपनी चिर-परिचित भूमिका थे. 
    
  ऐसे में ही अाई थी 29 जनवरी 1948 ! नई दिल्ली का बिरला भवन ! … सब तरफ लोग-ही-लोग थे … थके-पिटे-लुटे अौर निराश्रित !! … इतने लोग यहां क्यों हैं ? क्या पाने अाए हैं ? क्या मिल रहा है यहां ?… ऐसे सवाल यहां बेमानी हैं. कोई किसी से ऐसा कोई सवाल पूछ नहीं रहा है ! बस, सभी इतना जानते हैं कि यहां कोई है जो खुद से ज्यादा उनकी फिक्र करता है ! … अाजाद भारत की पहली सरकार के सारे सरदार भी यहां इनकी ही तरह बैठे-भटकते-बातें करते मिल जाते हैं. वे यहां क्यों हैं ? उन्हें यहां से क्या मिलता है ? वे भी ऐसा सवाल नहीं करते हैं. वे भी यहां इसी भाव से अाते हैं कि यहां कोई है जिसे उनसे ज्यादा उनकी फिक्र है. ईमान की शांति से पूरा परिसर भरा है… 

अौर जो यहां है वह ? …  80 साल का बूढ़ा … जिसका क्लांत शरीर अभी उपवास के उस धक्के से संभला भी नहीं है जो लगातार 6 दिनों तक चल कर, अभी-अभी 18 जनवरी को समाप्त हुअा है… 20 जनवरी को उस पर बम फेंका जा चुका है… तन की फिक्र फिर भी हो रही है लेकिन ज्यादा गहरा घाव तो मन पर लगा है. वह तार-तार हो चुका है…अपना तार-तार मन लिए वह अपने राम की प्रार्थना-सभा में बैठा, वह सब कुछ जोड़ना-बुनना-सीना चाहता है जो टूट गया है, उधड़ गया है, फट गया है. यह प्रार्थना-सभा उसके जीवन की अंतिम प्रार्थना अौर अंतिम सभा बनने जा रही है, यह कौन जानता था ? 

अौर फिर उसकी थकी लेकिन मजबूत; क्षीण लेकिन स्थिर अावाज उभरी : “ कहने के लिए चीजें तो काफी पड़ी हैं, मगर अाज के लिए 6 चुनी हैं. 15 मिनट में जितना कह सकूंगा, कहूंगा. देखता हूं, मुझे अाने में थोड़ी देर हो गई है, वह नहीं होनी चाहिए थी… एक अादमी थे. मैं नहीं जानता कि वे शरणार्थी थे या अन्य कोई, अौर न मैंने उनसे पूछा ही. उन्होंने कहा : ‘ तुमने बहुत खराबी कर दी है. क्या अौर करते ही जाअोगे? इससे बेहतर है कि जाअो. बड़े महात्मा हो तो क्या हुअा ! हमारा काम तो बिगड़ता ही है. तुम हमें छोड़ दो, हमें भूल जाअो, भागो !’ मैंने पूछा : ‘ कहां जाऊं?’ तो उन्होंने कहा;’ हिमालय जाअो !’ … मैंने हंसते हुए कहा:’ क्या मैं अापके कहने से चला जाऊं ? किसकी बात सुनूं ? कोई कहता है, यहीं रहो, तो कोई कहता है, जाअो ! कोई डांटता है, गाली देता है, तो कोई तारीफ करता है. तब मैं क्या करूं ? इसलिए ईश्वर जो हुक्म करता है, वही मैं करता हूं. अाप कह सकते हैं कि हम ईश्वर को नहीं मानते, तो कम-से-कम इतना तो करें कि मुझे अपने दिल के अनुसार करने दें… दुखियों का वली परमेश्वर है लेकिन दुखी खुद परमात्मा तो नहीं है… किसी के कहने से मैं खिदमतगार नहीं बना हूं. ईश्वर की इच्छा से मैं जो बना हूं, बना हूं. उसे जो करना है, करेगा… मैं समझता हूं कि मैं ईश्वर की बात मानता हूं. मैं हिमालय क्यों नहीं जाता ? वहां रहना तो मुझे पसंद पड़ेगा. ऐसी बात नहीं कि वहां मुझे खाना-पीना, अोढ़ना नहीं मिलेगा. वहां जा कर शांति मिलेगी. लेकिन मैं अशांति में से शांति चाहता हूं. नहीं तो उसी अशांति में मर जाना चाहता हूं. मेरा हिमालय यहीं है.” 

अगले दिन हमने उनकी हत्या कर दी ! हमने अपने गांधी से छुटकारा पा लिया. उसके बाद शुरू हुई अाजाद भारत की एक ऐसी यात्रा जिसमें कदम-कदम पर उनकी हत्या की जाती रही. यह उन लोगों ने किया जो गांधी के दाएं-बाएं हुअा करते थे. कम नहीं था उनका मान-स्नेह गांधी के प्रति अौर न कम था उनका राष्ट्र-प्रेम ! लेकिन गांधी का रास्ता इतना नया था कि उसे समझने अौर उस पर चलने की समझ अौर साहस कम पड़ती गई अौर फिर एकदम चूक ही गई! इसलिए केंद्रित पंचवर्षीय योजनाअों का सिलसिला शुरू हुअा. गांधी ग्रामाधारित विकेंद्रित योजना, स्थानीय साधन व देशी मेधा से क्रियान्वयन की वकालत करते हुए गये. सरकार ने उसकी तरफ पीठ कर दी. गांधी ने कहा था कि सरकार क्या करती है, इससे ज्यादा जरूरी है यह देखना कि वह कैसे रहती है अौर कैसे काम करती है. इसलिए गांधी ने कहा कि वाइसरॉय भवन को सार्वजनिक अस्पताल में बदल दो अौर देश के राष्ट्रपति को मय उसकी सरकार के छोटे घरों में रहने भेजो. सारा मंत्रिमंडल एक साथ होस्टलनुमा व्यवस्था में रहे ताकि सरकारी खर्च कम हो अौर मंत्रियों की अापसी मुलाकात रोज-रोज होती रहे, वे अापस में सलाह-मश्विरा करते रह सकें. लेकिन सरकार ने किया यह कि वाइसरॉय भवन का नाम बदल कर राष्ट्रपति भवन रख दिया अौर प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्री बड़े-बड़े बंगलों में रहने चले गये. सरकार ने कहा : देश की छवि का सवाल है ! उस दिन से सरकारी खर्च जो बेलगाम हुअा सो अाज तक बेलगाम दौड़ा ही जा रहा है. विनोबा ने गांधी की याद दिलाई कि उद्धार में उधार रखने की बात न करे सरकार,  लेकिन सरकार ने ‘चाहिएवाद’ का रास्ता पकड़ा. जिसे करना था वह चाहने लगा, जिसे चाहना था वह गूंगा हो गया. एक-दूसरे पर जवाबदेही फेंकने का फुटबॉल ऐसा शुरू हुअा कि असली खेल धरा ही रह गया. सामाजिक समता अौर अार्थिक समानता की गांधी की कसौटी थी- समाज का अंतिम अादमी ! उन्होंने सिखाया था; जो अंतिम है वही हमारी प्राथमिकताअों में प्रथम होगा. हमने रास्ता उल्टा पकड़ा : संपन्नता ऊपर बढ़ेगी तो नीचे तक रिसती-रिसती पहुंचेगी. बस, ऊपर संपन्नता का अथाह सागर लहराने लगा अौर व्यवस्था ने नीचे रिसने के सारे रास्ते बंद कर दिए. गांधी का अंतिम अादमी न तो योजना के केंद्र में रहा अौर न योजना का कसौटी बन सका. गरीबी की रेखाएं भी अमीर लोग ही तै करने लगे. गांधी ने कहा कि शिक्षा सबके लिए हो, समान हो अौर उत्पादक हो. सरकार ने तै किया कि सभी अपनी अार्थिक हैसियत के मुताबिक शिक्षा खरीद सकते हैं अौर सबसे अच्छी शिक्षा वह जो सामाजिक जरूरतों से सबसे कटी रहे. भारतीय समाज का सबसे बड़ा अौर सबसे समर्थ वर्ग उसी दिन से दूसरों के कंधों पर बैठ कर, पूर्ण गैर-जिम्मेवारी से जीने का अादी बन गया. हमारी शिक्षा करोड़ों-करोड़ युवाअों को न वैभव दे पा रही है, न भैरव ! दुनिया का सबसे युवा देश ही दुनिया का सबसे बूढ़ा देश भी बन गया है. 

गांधी के विद्रूप का यह सिलसिला अंतहीन चला. वह सब कुछ अाधुनिक अौर वैज्ञानिक हो गया जो गांधी से दूर व गांधी के विरुद्ध जाता था. 2 अक्तूबर अौर 30 जनवरी से अागे या अधिक का गांधी किसी को नहीं चाहिए था. यह मोहावस्था जब तक टूटी, बहुत पानी बह चुका था. वृद्ध-बीमार जवाहरलाल ने अपने अंतिम दिनों में लोकसभा में कबूल किया कि हमने सबसे बड़ी भूल तभी की जब गांधी का रास्ता छोड़ा… अौर अाज ? अाज तो हमने गांधी की अांख छोड़ दी है अौर उनका चश्मा भर कागज पर रख लिया है. गंदे मन से लगाया स्वच्छता का नारा सफाई नहीं, गंदगी फैला रहा है. अब नारा ‘मेक इंडिया’ का नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ का है; अब बात ‘स्टैंडअप इंडिया’ की नहीं, ‘स्टार्टअप इंडिया’ की होती है. अब अादमी को नहीं, ‘एप’ को तैयार करने में सारी प्रतिभा लगी है. ‘नया गांव’ बनाने की बात अब कोई नहीं करता, सारी ताकतें मिल कर गांवों को खोखला बनाने में लगी हैं, क्योंकि बनाना तो ‘स्मार्ट सिटी’ है. देशी व छोटी पूंजी अब पिछड़ी बात बन गई है, विदेशी व बड़ी पूंजी की खोज में देश भटक रहा है. खेती की कमर टूटी जा रही है, उद्योगों का उत्पादन गिर रहा है, छोटे अौर मझोले कारोबारी मैदान से निकाले जा रहे हैं अौर तमाम अार्थिक अवसर, संसाधन मुट्ठी भर लोगों को पहुंचाए जा रहे हैं.  देश की 73% पूंजी मात्र 1% लोगों के हाथों में सिमट अाई है. सामाजिक समरसता नहीं, सामाजिक वर्चस्व अाज की भाषा है. अब चौक-चौराहों पर कम, राजनीतिक हलकों में ज्यादा असभ्यता-अश्वलीलता-अशालीनता की जाती है. लोकतंत्र के चारो खंभों का हाल यह है कि वे एक-दूसरे को संभालने की जगह, एक-दूसरे से टकराते-टूटते नजर अाते हैं. सारा देश जैसे सन्निपात में पड़ा है. 


गांधी अपना हिमालय छोड़ कर न तब गए थे अौर न अब गये हैं. वे साधनारत हैं क्योंकि देश को लौटना तो हिमालय की तरफ ही है.  ( 28.01.2018) 

Tuesday, 23 January 2018

दावोस का सच



ऐसा कभी-कभार ही होता है कि सच खुद सामने अा कर झूठ का पर्दाफाश कर देता है ! ऐसा ही हुअा था जब तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक अोबामा अपने पद से विदा हो रहे थे. उन्होंने जाते-जाते कहा कि हमारी दुनिया का सच यह है कि संसार की कुल संपत्ति का 50% केवल 60 लोगों की मुट्ठी में है. दुनिया की सबसे अधिक संपत्ति, सारी दुनिया से समेट कर जिस एक देश ने अपनी मुट्ठी में कर रखी है, उसी के राष्ट्रपति ने जाते-जाते बता दिया कि संसाधनों अौर लोगों के बीच का सच्चा समीकरण क्या है; अौर प्रकारांतर से यह भी कबूल कर लिया कि यह सच इतना टेढ़ा कि इसे सीधा करना दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति के भी बस का नहीं है. 

अब जब धन्नासेठ दुनिया के सारे धन्नासेठ सत्ताधीश दावोस में जमा हैं अौर हमारे प्रधानमंत्री उन्हें भारत के विकास की सच्ची कहानी सुना रहे हैं, एक भयानक सच किसी दूसरे रास्ते हमारे अौर दुनिया के सामने अा गया है. ‘सबका साथ, सबका विकास’- यह जो माहौल देश भर में बनाया जाता रहा है, अौर जिसे साकार करने के लिए अनगिनत उपक्रम जोर-जोर से घोषित होते रहे हैं, हमारे हाथ उनका लब्बोलुअाब यह अाया है कि हमारे देश की 73% संपदा देश के केवल 1% लोगों के हाथों में सिमट गई है. इन 1% लोगों की संपत्ति पिछले एक साल में 21 लाख करोड़ बढ़ी है. ये अांकड़े अौर यह तस्वीर हमने नहीं बनाई है. यह किसी रेटिंग एजेंसी का वह अांकड़ा भी नहीं है जो किसी दवाब-प्रभाव से बढ़ाया या घटाया जा सकता है. वैसे तो सत्ताधीशों के हाथों में अांकड़े हमेशा ही खिलौनों-से रहे हैं, अौर हम यह खेल अौर खिलौना काफी समय से देख रहे हैं. लेकिन हमारे देश का यह अांकड़ा दावोस में ही जारी किया गया है अौर यह अध्ययन एक गैर-सरकारी संस्थान ने किया है. 

पिछले ही साल की बात है जब अॉक्सफेम ने यह अध्ययन जारी किया था कि भारत के 1% फीसदी लोगों की संपत्ति में 58% का इजाफा हुअा है. अौर अगर हम भूलें नहीं तो दावोस में ही पिछली बार कहा गया था कि विश्व शांति को सबसे बड़ा खतरा अगर किसी से है तो वह बढ़ती हुई विषमता से है. कहने का मतलब यह था कि कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को पाटने की बात तो अब राष्ट्राध्यक्षों के एजेंडे में ही नहीं है लेकिन यह खाई चौड़ी न हो यह सावधानी रखना धन्नासेठों व सत्ताधीशों के लिए जरूरी है क्योंकि यह अाग बहुत कुछ लील जाएगी. वर्ल्ड बैंक ने कभी कहा था कि उसका अार्थिक अध्ययन बताता है 2030 तक दुनिया से गरीबी खत्म हो जाएगी. अब वर्ल्ड बैंक खुद ही खत्म हो रहा है लेकिन 2030 तक दुनिया से गरीबी दूर हो जाएगी, ऐसा सपना अब मुंगेरीलाल भी नहीं देखते. 

अब फिर दावोस है. पिछली बार यहां चीन के राष्ट्रपति झी जिनपिंग का जलवा था. वे चीन का वह चमकीला चेहरा दुनिया को बेच रहे थे जिसे चीन के ही अधिकांश लोग नहीं जानते-पहचानते हैं. लेकिन चीन के राष्ट्रपति के पीछे एक अाभामंडल था कि वे दुनिया के सबसे बड़े िनर्यातक देश के प्रमुख थे. इस बार यही काम हमारे प्रधानमंत्री कर रहे हैं. उनके साथ हमारे देश के कारपोरेटों की बड़ी मंडली गई है, सरकारी अांकड़ों के विशेषज्ञ भी अपना ‘पहाड़’ ले कर वहां गये हैं. सब मिल कर वहां भारत को चमकाएंगे. यह चमक सच्ची होती तो किस भारतीय को खुशी व गर्व न होता लेकिन जो है नहीं, वह जब चमकाया जाता है तब धुंअा ज्यादा उठता है अौर अंधेरा फैलता है. हमारे प्रधानमंत्री के साथ ही यह सच्चाई भी वहां गई है कि उनके साथ दावोस पहुंचे इन्हीं कारपोरेटों की अाय में, 2017 में 20.9 लाख करोड़ रुपयों की बढ़ोत्तरी हुई है. इसका दूसरा मानी यह है कि 2017-18 का भारत सरकार का कुल बजट जितना था उस बराबर की कमाई इन कारपोरेटों ने 2017 में की है. अाज की तारीख में भारत में 101 अरबपति हैं जिनमें से 17 अरबपति 2017 में ही पैदा हुए हैं. अर्थशास्त्रियों की जमात में एक  सम्मानित नाम है टॉमस पिकेटी का. उनका अध्ययन बताता है कि भारत की सबसे गरीब जमात के सबसे पीछे के 50% लोगों की अाय में पिछले वर्ष में 0% की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में अरबपतियों की संख्या 13% बढ़ी है. 

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रपट हमारी कुछ दूसरी तस्वीरें ले कर अाया है. हम दुनिया की विकास सूचकांक में 62 वें स्थान पर हैं मतलब चीन( 26) अौर पाकिस्तान (47) से पीछे. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम दुनिया भर के देशों का ऐसा अध्ययन करते हुए यह देखता है कि वहां की सामान्य जनता के रहन-सहन का स्तर क्या है, पौष्टिक खाद्य की उपलब्धता कैसी है, पर्यावरण के संरक्षण की स्थिति क्या है अौर देश पर वह विदेशी कर्ज कितना है जिसका भावी पीढ़ियों पर बोझ पड़ेगा. यह अध्ययन बताता है कि अार्थिक रूप से कौन देश कितना सशक्त है इसका जवाब यह नहीं है कि हमने जनधन योजना में कितने बैंक खाते खोले बल्कि यह है कि उन खातों में अाज क्या जमा है अौर जो जमा है वह कहां से अाया है. पैसा कहां अौर कैसे पैदा हो रहा है अौर वह किन रास्तों से चल कर लोगों की जेबों तक पहुंच रहा है, यह रास्ता जाने बिना न विकास के अांकड़ों का कोई अर्थ होता है, न कमाई के अांकड़ों का. 

इसलिए दावोस में हमारा चेहरा चाहे जितना चमकाया जाए, उस चेहरे के पीछे की यह सच्चाई छिपाई नहीं जा सकेगी कि हमारी जेब लगातार खाली होती जा रही है, सरकारी खर्चे पर कोई प्रभावी रोक संभव नहीं हो पा रही है, बैंकिंग व्यवस्था की अराजकता संभाली नहीं जा पा रही है, रोजगारविहीन विकास की घुटन फैल रही है, खेती-किसानी की कमर टूट चुकी है, अौद्योगिक उत्पादन भी गिर रहा है अौर खपत भी. नोटबंदी ने हमारे अर्थतंत्र के मध्यम घटक का दम तोड़ दिया तो जीएसटी से उसे बेहाल कर दिया है.  किसी भी अर्थ-व्यवस्था की मध्यम कड़ी ही उसे संभालकर रखती है अौर ऊपर-नीचे के थपेड़ों से बचाती है. यह मध्यम कड़ी अाज जैसी बेहाल कभी नहीं थी. जीएसटी में जितनी बार, जितने बदलाव किए जा रहे हैं वे दूसरा कुछ बताते हों या न बताते हों, यह तो बता ही रहे हैं कि इसे लागू करने से पहले जितना अध्ययन व जितनी व्यवस्था जरूरी थी, वह नहीं की गई. अधपका फल या अधपकी फसल किसी के काम नहीं अाती है; खेत को जरूरत कमजोर कर जाती है. 

यह सब लिखते-जानते किसी तरह खुशी नहीं है मुझे. बहुत तकलीफ है, क्योंकि मामला इस प्रधानमंत्री या उस प्रधानमंत्री का नहीं है. इस या उस सरकार की भी बात नहीं है. बात देश की है जो किसी भी सरकार के बाद भी रहेगा, किसी भी प्रधानमंत्री के बाद भी चलेगा. वह कमजोर हो, घायल हो, खोखला हो तो तकलीफ कितनी दारूण होती है, यह मैं भी जानता हूं अौर अाप भी. ( 22.01.2018)  

महात्मा गांधी के साथ इतिहास की गलियों से वर्तमान तक का सफर




1948 की 12 जनवरी थी ! अभी-अभी अाजाद हुए देश की राजधानी दिल्ली का बिरला भवन… दमघोंट चुप्पी सब अोर जमी हुई थी - थरथराती हुई ! हर सुबह की तरह अाज भी 3.30 बजे सभी प्रार्थना के लिए जमा थे लेकिन कहीं कुछ था कि जो बर्फ की तरह जमा धरा था. बापू थे अौर प्रार्थना में डूबे थे… लेकिन जैसे वे वहां नहीं थे… अाज उनका मौन दिवस था … लेकिन यह दूसरे मौन दिवसों से कुछ अलग था, क्योंकि बापू कहीं भीतर ही गुम थे. प्रार्थना खत्म हुई, उन्होंने इधर-उधर देखा कि जैसे कुछ खोज रहे हों… मनु करीब अाईं अौर उनके सहारे वे उठे… उलझते-से पांवों से अपने कमरे की अोर चले… मनु ने उढ़ा कर सुला दिया अौर खुद भी सोने चली गईं… बापू सोये नहीं, उठ बैठे अौर कुछ लिखने लगे… 

जो लिखा उसका अनुवाद सुशीला नैयर करती थीं. वे अनुवाद बोलती जाती थीं अौर मनु लिखती जाती थीँ. हर सोमवार को यह अनुवाद-बैठक होती थी. उस रोज भी हुई अौर सुशीलाजी ने पढ़ना शुरू किया कि अचानक वे चीख पड़ीं : “ अरे, मनु, देख यह क्या… वे जो पढ़ रही थीं अौर जो कह रही थीं उस पर उनका ही भरोसा नहीं बैठ रहा था… “ अरे… मनु…  देख… बापू तो कल से अनशन पर जा रहे हैं !!” … अौर मनु कुछ समझतीं कि सुशीलाजी बेतहाशा भागीं बापू के पास ! … बापू मौन थे. कुछ भी सुनना-कहना नहीं था उन्हें ! इशारे से इतना ही कहा कि बात तो मौन खत्म होने पर ही होगी, अभी तो जो लिखा है उसका अनुवाद करो ! … यह कैसे संभव है !! … उपवास फिर ? …  अभी ही तो बमुश्किल छह माह पहले कलकत्ता का वह भयंकर उपवास हुअा था … मौत एकदम सामने अा बैठी थी … पागल कलकत्ता … खून सवार था जिसके सर पर उसके सामने प्रार्थनारत उपवास पर बैठी बापू की वह दुबली-पतली काया … सारी शैतानी के केंद्र में थे सुहरावर्दी जो अाज खुद का सामना भी नहीं कर पा रहे थे…हैदरी मैंशन का वह दृश्य भला कौन भूल सकता था … जैसे तेज अांधी में कोई दीया जल रहा हो … हवा का हर झोंका जिसकी लौ को खात्मे तक खींच ले जाता था अौर बुझते-बुझते फिर-फिर लौ संभल कर स्थिर हो जाती थी… कलकत्ता में बापू के प्रार्थनामय उपवास से क्या होगा न कोई जानता था, न मानता था … लेकिन हर कोई भीतर-भीतर यह जान रहा था कि इस अादमी के अलावा दूसरा कोई नहीं है कहीं कि जो सब कुछ लील जाने वाली इस अाग को लील सकता है … इस अाग को लगाने-उकसाने वाले सुहरावर्दी को कहां पता था कि यह अादमी अपनी जान उनके हाथ में छोड़ कर इस कदर निर्विकार प्रार्थनारत हो जाएगा… सुहरावर्दी इस उपवास का मुकाबला नहीं कर सके अौर हालात पर काबू करने में उन्होंने खुद को झोंक दिया … फिर वह सब हुअा कि जिसे वाइसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी ‘वनमैन अार्मी’ का चमत्कार कहा … बापू को अस्तित्व की अाखिरी लकीर तक पहुंचा कर वह उपवास पूरा हुअा था… बापू की बात छोड़ें हम, बापू के लोग भी अभी उस उपवास से संभले नहीं थे… कि अनुवाद से निकल अाया यह नया उपवास !! … हालत कलकत्ता से भी बुरी है अौर यहां कोई सुहरावर्दी भी नहीं है. सुशीला,मनु सभी पागल हुए जा रहे थे लेकिन वे दोनों जान रही थीं कि अनुवाद पूरा करना उनकी पहली प्राथमिकता है… वह पूरा नहीं हुअा या अधूरा छोड़ा गया तो उपवास की परीक्षा अौर दारुण हो जाएगी… इसलिए घनश्यामदास बिरला तक बात पहुंचा कर दोनों अनुवाद पूरा करने बैठ गईं…

बात जंगल में अाग की तरह फैल गई. सरदार, जवाहर, राजेन बाबू, मौलाना, देवदास सभी… एक-पर-एक पहुंचने लगे …सब एक-दूसरे से अांखें चुरा रहे थे… किसी के पास कहने को कुछ नहीं था … ढले चेहरे, झुके कंधे अौर खोई निगाहें … सब कितनी ही रातों से सोये नहीं थे… सड़कों पर भागते, दंगाइयों से लड़ते, अधिकारियों को कसते अौर भीड़ को समझाते वक्त किधर से अा कर किधर जा रहा था, किसी को पता नहीं था… लेकिन यह सबको पता था कि यह बूढ़ा अादमी नहीं रहा तो किसी के बस का कुछ भी नहीं रह जाएगा… 

अाशंका सबको थी क्योंकि इस बार कलकत्ते से जब बापू लौटे तबसे ही जैसे कुछ था जो उन्हें मथ रहा था. वे बहुत चुप हो गये थे, ज्यादा सुनने में लगे रहते थे. हर खबर, हर अादमी, हर घटना जैसे उन्हें कुचल कर निकल जाती थी… वे अाए थे तब दिल्ली में रुकने की बात ही नहीं थी. उन्हें पश्चिमी पंजाब जाना था. कलकत्ते में अग्नि-स्नान कर के, अब वे पंजाब के दावानल में उतरना चाहते थे. दिल्ली तो रास्ते का पड़ाव भर था… लेकिन … दिल्ली स्टेशन उतरते ही वे उस बारूदी गंध को भांप गये जो सब तरफ फैली थी. उन्हें लेने स्टेशन पर सभी अाए थे लेकिन जैसे हर कोई उनसे नजरें चुरा रहा था. दिल्ली में किसी श्मशान की शांति पसरी हुई थी. 

मौन पूरा हुअा. बापू को ही कहना था, बापू ने ही कहा: “ पंजाब जाने के लिए अाया था यहां लेकिन देखा कि दिल्ली तो वो दिल्ली बची नहीं है. हमेशा ही हंसी-मजाक करने वाले सरदार के चेहरे पर हंसी की एक रेखा  नहीं थी. मैंने समझ लिया कि यह मेरा पहला मोर्चा है. सिपाही तो वही है न जो सामने अाए मोर्चे पर डट जाए न कि अागे के किसी मोर्चे के लिए इस खतरे से मुंह फेर ले. मैंने भी अपना धर्म समझ लिया. दिल्ली हाथ से निकली तो हिंदुस्तान निकला समझिए ! … यह खतरा मोल नहीं लिया जा सकता है. मैंने देखा कि हिंदू, मुसलमान, सिख एक-दूसरे के लिए पराये हो चुके हैं. कल की दोस्ती का अाज कहीं पता नहीं है. ऐसे में कोई सांस भी कैसे ले सकता है ! जो मिला उसी ने बताया कि दिल्ली में मुसलमानों का रह पाना अब संभव नहीं है. मुसलमान भाइयों के चेहरे पर एक ही सवाल मैं पढ़ पा रहा था : “ हम क्या करें ? “ मेरे पास कोई जवाब नहीं था. ऐसा बेजुबान तो मैं कभी भी नहीं हुअा था. ऐसी लाचारी के साथ जीना तो मैं कभी कबूल न करूं. लेकिन करूं क्या !! ऐसे में कोई सत्याग्रही कैसे अपनी भूमिका तै करे अौर उस निभाये ? यही सवाल मुझे मथे जा रहा था. फिर जैसे भीतर ही कहीं बिजली कौंधी… रोशनी में मुझे अपना कर्तव्य साफ दिखाई दे गया! जब दूसरे की जान की कोई कीमत नहीं की जा रही हो तब अपनी सबसे कीमती चीज को, अपनी जान को अपनी राजी-खुशी से दांव पर लगा देने का रास्ता ही तो बचता है न ! इस प्रार्थना के साथ मैं उपवास के रास्ते अा लगा हूं कि मुझमें अगर पवित्रता है तो यह अाग बुझेगी ही ! मेरे उपवास का कोई अरसा नहीं है, कोई शर्त भी नहीं है. मेरी प्रार्थना से जब यह अावाज अाएगी कि सभी कौमों के दिल मिल गये हैं अौर वे किसी बाहरी दवाब के कारण नहीं बल्कि अपना धर्म समझ कर रास्ता बदल रहे हैं, मेरा उपवास छूट जाएगा…”, वे थोड़ा रुके जैसे अपने ही भीतर कुछ टटोल रहे हों. अाज उनके शब्द मुंह से नहीं, अात्मा की अतल गहराइयों से निकल रहे थे, “ अाज एशिया के अौर दुनिया के ह्रदय से भारत की शान मिट रही है. इसका सम्मान कम होता जा रहा है. अगर इस उपवास के कारण हमारी अांखें खुलें तो वह शान वापस लौट अाएगी. मैं अापसे हिम्मत के साथ कहता हूं कि अगर भारत की अात्मा खो गई तो अाज के झंझावात में घिरी दुखी अौर भूखी दुनिया की अाशा की अंतिम किरण का भी लोप हो जाएगा… मेरे कोई मित्र या दुश्मन - अगर ऐसा कोई अपने को मानता हो, तो - मुझ पर गुस्सा न करें. कई लोग हैं कि जो उपवास के मेरे तरीके को ठीक नहीं मानते हैं. मेरी प्रार्थना है कि वे मुझे बर्दाश्त करें अौर जैसी अाजादी वे खुद के लिए चाहते हैं वैसी ही अाजादी मुझे भी दें. एक ईश्वर ही है कि जिसकी सलाह से मैं चलता हूं. मुझे दूसरी कोई सलाह चाहिए नहीं. अगर यह उपवास मेरी भूल है, ऐसा जिस किसी भी क्षण मुझे लगेगा, मैं सबके सामने अपनी भूल कबूल कर उपवास छोड़ दूंगा. लेकिन इसकी संभावना कम है. अगर मेरी अंतररात्मा की अावाज स्पष्ट है,जो है ऐसा मेरा दावा है, तो उस अावाज को रद्द कैसे किया जा सकता है ! इसलिए अाप सबसे मेरी प्रार्थना है कि मेरे साथ दलील न करें, मेरे फैसले को उलटने की कोशिश न करें. जिस निर्णय को बदला नहीं जा सकता, उसमें अाप मेरा साथ  दें… शुद्ध उपवास भी शुद्ध धर्म-पालन की तरह है. उसका बदला अपने-अाप मिल जाता है. मैं कोई परिणाम लाने के लिए उपवास नहीं करता. मैं उपवास करता हूं क्यों कि तब वही मुझे करना चाहिए... अगर मुझे मरना है तो शांति से मरने दें. मुझे शांति तो मिलने ही वाली है, यह मैं जानता हूं. हिंदुस्तान का, हिंदू धर्म का, सिख धर्म का अौर इस्लाम के नाश का बेबस दर्शक बने रहने के बनिस्बत मृत्यु मेरे लिए सुंदर रिहाई होगी… जो लोग दूसरे विचार रखते हैं, वे मेरा जितना भी कड़ा विरोध करेंगे, मैं उनकी उतनी ही इज्जत करूंगा. मेरा उपवास लोगों की अात्मा को जाग्रत करने के लिए है, उसे मारने डालने के लिए नहीं. जरा सोचिए तो सही कि अाज हमारे प्यारे हिंदुस्तान में कितनी गंदगी पैदा हो गई है ! इसलिए अापको तो खुश होना चाहिए कि हिंदुस्तान का एक नम्र सेवक, जिसमें इतनी ताकत है, अौर शायद इतनी पवित्रता भी है कि वह इस गंदगी को मिटा सके, वह कदम उठा रहा है. अगर इस सेवक में ताकत अौर पवित्रता नहीं है, तब तो यह पृथ्वी पर बोझ रूप है. जितनी जल्दी यह उठ जाए अौर हिंदुस्तान को इस बोझ से मुक्त करे, उतना ही उसके लिए अौर सबके लिए अच्छा है. मेरे उपवास की खबर सुन कर सब दौड़ते हुए यहां, मेरे पास न अाएं. अाप जहां हैं वहां का वातावरण सुधारने का प्रयत्न करें, तो यही काफी है… उपवास के दरम्यान मैं नमक, सोडा अौर खट्टे नींबू के साथ या इनके बिना पानी पीने की छूट रखूंगा.”

बात पूरी हो गई ! 

सन्नाटा अौर गहरा हो गया ! अब कोई एकदम शांत व उत्फुल्ल था तो बापू ही थे.  अब उन्हें रास्ता मिल गया था - सत्याग्रही का अंतिम रास्ता ! दोपहर में वे स्वतंत्र भारत के पहले वाइसरॉय माउंटबेटन से मिलने गये. लौटे तो सारा कमरा खचाखच भर चुका था. “ अब यह क्या ?…” वे परेशानी से हंसे, अौर फिर बोले, “ कोई भी न घबराये ! सभी जहां-जहां हैं, वही रहें अौर अपना काम करें.” देवदास गांधी से बोले- “ पटना के मोर्चे पर ही रहना है !” जवाहरलाल भी हैं अौर सरदार भी हैं. देवदास इस उपवास से सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि यह बापू के अधैर्य का प्रतीक है. सरदार तो बहुत ही नाराज हैं… सरकार कानून-व्यवस्था बनाने में परेशान है अौर बापू ने बिना सलाह-मश्विरे के अनशन शुरू कर दिया ! यह क्या बात हुई ? … देवदास गांधी ने पूछा : यह अनशन मुसलमानों के लिए है अौर हिंदुअों के खिलाफ है ? जवाब अाया : हां, यहां यह मुसलमानों के लिए है अौर हिंदुअों के सम्मुख है. पाकिस्तान में यह हिंदुअों के लिए है अौर मुसलमानों के सम्मुख है. यह उपवास हर उस कमजोर अौर अल्पसंख्यक के लिए है जिसे कोई ताकतवाला, बड़ी संख्या वाला दबा या डरा रहा है. ऐसे मुल्क कैसे चल सकता है ? 

टुकड़ों में बापू ने जब भी कुछ कहा, उन्हें जोड़ दें तो बात कुछ इस तरह बनती है : मैं जब से यहां हूं, देख रहा हूं कि लोग मेरे मुंह पर एक बात कहते हैं अौर होती है दूसरी बात ! सरकार के दो बड़ों के बीच गंभीर मतभेदों का दंड अाम जनता को भुगतना पड़ रहा है. सरकार के भीतर गंदगी बढ़ती जा रही है… भगवान सभी को शुद्ध करें अौर सम्मति दें… दो शब्द अपने मुसलमान भाइयों से अदब के साथ कहना चाहता हूं. यह अनशन उनके नाम से शुरू हुअा है तो उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है. उन्हें कम-से-कम इतना तो निश्चय करना ही चाहिए कि हम हिंदू अौर सिखों के दोस्त बन कर रहेंगे. जो यूनियन में रहना चाहते हैं वे यूनियन के प्रति वफादार रहें. ये लोग कहते तो हैं कि हम वफादार रहेंगे पर अाचरणा वैसा नहीं करते. मैं तो कहूंगा कि कम बोलो पर कर के ज्यादा दिखाअो… मैं तो कहूंगा कि चाहे पाकिस्तान में सभी हिंदू-सिख काट डाले जाएं, तो भी यहां एक नन्हा-सा मुस्लिम बच्चा भी सुरक्षित रहना चाहिए. जो कमजोर हैं, निराधार हैं, उन्हें मारना बुजदिली है. पाकिस्तान में जितनी मार-काट मचे, दिल्ली अपने फर्ज से न चूके !सुहरावर्दी जैसे भी, जिन्हें गुंडों का सरदार कहा जाता है, जहां चाहें अाजादी से घूम-फिर सकें… अाज मैं हिम्मत के साथ कहता हूं कि पाकिस्तान एक ‘पाप’ ही है. मै पाकिस्तान के नेताअों के खेल या भाषण देखना नहीं चाहता. मैं तो मांगता हूं उनका सदाचरण, सत्कर्म ! अगर ऐसा होगा तो भारत के लोग अपने-अाप सुधर जाएंगे. अाज मुझे शर्म के साथ कहना पड़ता है कि हम लोग सचमुच पाकिस्तान की बुराइयों की नकल कर रहे हैं…

ऐसी पृष्ठभूमि में शुरू हुअा उपवास 18 जनवरी 1948 तक यानी 6 दिनों तक चलता रहा. हर दिन जैसे एक अाग में वे भी अौर उनके साथी भी उतरते थे अौर फिर उससे कहीं ज्यादा दहकती अाग में प्रवेश की तैयारी करते थे. करीब 80 साल के होने जा रहे बापू ने अाश्चर्यजनक मानसिक व शारीरिक उत्फुल्लता से ये 6 दिन निकाले. अावाज लगातार क्षीणतर होती गई अौर बोलना, चलना असंभव होता गया. लेकिन वे सबको संभालते-संवारते चलते गये. सभी बेसहारा थे - जो सांप्रदायिक अाग में जले वे भी अौर वे भी जो इस अाग से लोगों को बचाने में लगे थे, एकदम अकेले व बेसहारा थे…  अासारा बस यही था - 80 साल का बूढ़ा ! … वाइसरॉय अौर सारी भारत सरकार अौर सारा भारत सारे दिन-रात यहीं के चक्कर काटता मिलता था. बापू रोज सुबह 3.30 पर उठते अौर रात 9 बजे सोने जाते. …

 लेकिन उपवास कैसे छूटे ? बापू ने इसकी सात शर्तें सामने कर दीं : 1. महरौली में िस्थत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तयार की मजार महफूज रहेगी अौर मुसलमानों को वहां अाने-जाने में कोई खतरा नहीं होगा. अाने वाला उर्स का मेला पहले की तरह ही लगेगा अौर महरौली के हिंदू-सिख इसकी गारंटी दें कि वहां मुसलमानों को कोई खतरा नहीं होगा. 2. दिल्ली की 117 मस्जिदों पर हिंदू-सिख शरणार्थियों ने कब्जा कर लिया है या उन्हें मंदिर में बदल लिया है. वे सब मुसलमानों को वापस कर दी जाएं अौर वहां के हिंदू-सिख यह भरोसा दिलाएं कि सभी मस्जिदें पहले जैसी ही रहेंगी अौर मुसलमान वहां बेखटके अा-जा सकें. 3. करौलबाग, सब्जीमंडी अौर पहाड़गंज में मुसलमान अाजादी से अा-जा सकें अौर उन्हें कोई खतरा न हो। 4.जो मुसलमान डर से या परेशान हो कर पाकिस्तान चले गये हैं वे अगर वापस अा कर फिर से बसना चाहें तो हिंदू-सिख उसमें बाधा न बनें.5. रेलों में सफर करने वाले सुरक्षित सफर कर सकें. 6. मुसलमान दूकानदारों का बहिष्कार न किया जाए.  7. दिल्ली शहर के जिन इलाकों में मुसलमान रहते हैं उनमें हिंदुअों-सिखों के बसने का सवाल वहां के मुसलमानों की रजामंदी पर छोड़ दिया… बस, यही सात बातें, अौर कुछ नहीं !! … उनका एलान ही समझिए कि मेरी जान बचानी हो तो भारतीय समाज को सात कदमों का यह सफर पूरा करना होगा. 

किया, लोगों ने सात कदमों का यह सफर पूरा किया ! 18 जनवरी को भावावेश में कांपती अावाज में कांग्रेस के सभापति राजेंद्र प्रसाद ने बापू के कमरे में मौजूद दिल्ली के अाला प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कहा : सबने उन बातों की गारंटी दी है जिनका जिक्र अापने हमसे किया है. हालात की निगरानी के लिए कुछ समितियां भी हम बना रहे हैं… फिर तो सभी बोले - मौलाना अाजाद भी, हबीब-उल रहमान, गोस्वामी गणेश दत्त, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के हरिश्चंद्र, पाकिस्तान के हाईकमिश्नर जहीद हुसैन, सिखों के हरवसन सिंह, दिल्ली के उपायुक्त रंधावा, फिर सबकी तरफ से अंतिम बात राजेन बाबू बोले : अब अाप उपवास छोड़ें ! 

  अब जवाब बापू को देना था लेकिन अब अावाज इतनी भी नहीं रह गई थी कि सुनी जा सके ! उन्होंने अपनी बात लिखवाई जिसे प्यारेलालजी ने पढ़ कर सुनाया : “ यह मुझे अच्छा तो लगता है, मगर एक बात अगर अापके दिल में न हो तो यह सब निकम्मा समझिए ! इस मसविदे का अगर यह अर्थ है कि दिल्ली को अाप सुरक्षित रखेंगे अौर बाहर चाहे जितनी भी अाग जले, अापको परवाह न होगी, तो अाप बड़ी गलती करेंगे अौर मैं भी उपवास छोड़ कर मूर्ख बनूंगा. मैं देखता हूं कि ऐसा दगा अाज हिंदुस्तान में बहुत चलता है. हमें अाला दर्जे की बहादुरी दिखानी है. यह कहना कि हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुअों का है अौर पाकिस्तान सिर्फ मुसलमानों के लिए है, तो इससे बड़ी बेवकूफी क्या हो सकती है ! शरणार्थी समझें कि पाकिस्तान का उद्धार भी दिल्ली के ही मार्फत होगा… अाज हम सीखें कि कोई भी इंसान हो, कैसा भी हो, उसके साथ हमें दोस्ताना तौर पर काम करना है. हम किसी के साथ, किसी हालत में दुश्मनी नहीं करेंगे, दोस्ती ही करेंगे. शाहिद साहब अौर दूसरे चार करोड़ मुसलमान यूनियन में पड़े हैँ. वे सब-के-सब फरिश्ते तो हैं नहीं. हममें अच्छे लोग भी हैं अौर बुरे भी. मुसलमान बड़ी कौम है. यहीं नहीं, सारी दुनिया में मुसलमान पड़े हैं.  अगर हम ऐसी उम्मीद करें कि सारी दुनिया के साथ हम मित्र भाव से रहेंगे तो क्या वजह है कि हम यहां के मुसलमानों से दुश्मनी करें. मैं भविष्यवक्ता नहीं हूं फिर भी ईश्वर ने मुझको अक्ल दी है, दिल दिया है. उन दोनों को टटोलता हूं अौर अापको भविष्य सुनाता हूं कि अगर किसी-न-किसी कारण से हम एक-दूसरे से दोस्ती न कर सके, वह भी यहां के ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के अौर सारी दुनिया के मुसलमानों से हम दोस्ती न कर सके तो हम समझ लें - इसमें मुझे कोई शक नहीं है - कि हिंदुस्तान हमारा न रहेगा, पराया हो जाएगा. गुलाम हो जाएगा - पाकिस्तान गुलाम होगा, यूनियन भी गुलाम होगा अौर जो अाजादी हमने पाई है वह हम खो बैठेंगे… मैं फाका छोडूंगा. ईश्वर की जो मर्जी होगी, वही होगा. अाप सब साक्षी बनते हैं, तो बनें. 

12.25 मिनट हुअा था जब काल जर्जरित काया को मौलाना अाजाद ने 12 अौंस ग्लूकोज मिला रस पिलाया… कल तक जो बिजली गुल थी, अाज, अभी सबके चेहरों पर दमक उठी… कितने सारे लोग रो रहे थे… जवाहरलाल रो रहे थे कि हंस रहे थे, कहना कठिन था. वे इस पूरी अवधि में मौन ही रहे थे- पीड़ा में अौर संभवत: इस ग्लानि में कि यह अाजाद भारत था, यह उनकी सरकार थी अौर छह माह के भीतर बापू को ऐसी पीड़ा से गुजरना पड़ा… वे इस प्रकरण की समाप्ति के बाद चले गये… वे कोई सौ बुर्काधारी मुसलमान महिलाएं वहां रह गईं कि जो अाज यह कहने अाई थीं कि अाप उपवास तोड़िए. बापू ने हाथ जोड़े अौर सारी ताकत समेट कर इतना कहा : मेरे सामने क्या बुरका ? …मैं तो अापका बाप-भाई हूं… ह्रदय का पर्दा ही काफी है !… बहनों ने तुरंत बुरका निकाल दिया… इंदिरा गांधी ने सिर्फ बापू से कहा : पंडितजी भी अापके साथ अनशन कर रहे हैं ! … जाते कदम रुके… एक कागज मंगवाया अौर अशक्त हाथों से लिखा : चिरंजीव जवाहरलाल, अनशन छोड़ो !… बहुत वर्ष जियो अौर हिंद के जवाहर बने रहो.
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यह सब क्या हुअा ? अाज यह हमारे इतिहास का हिस्सा है याकि यही हमारा वर्तमान है ? एक अादमी पागल हो तो हम उसे पागलखाने में डालते हैं, हजारों-लाखों-करोड़ों लोग पागल हो जाएं तब ? कहां रखेंगे अाप उनको ?…अौर अाप कौन, अाप भी तो पागलों की उसी दुनिया में हैं ? समाज को भीड़ बना कर, इंसानों को पागलों की जमात बना कर जब सत्ता अौर संपत्ति का शिकार किया जा रहा हो, तब एक अादमी के बस का बचता ही क्या है भले वह अादमी महात्मा गांधी ही हो ? … बच रहता है यही अात्मबलिदान !! … बापू का यह उपवास, जिसे हमने उनका अंतिम उपवास बना दिया कि जिसके बारह दिन बाद हमने उनका अंत ही कर दिया, सद्विवेक जगाने की अांतरिक पीड़ा से उपजा हाहाकार था ! हमारे भीतर जो खो गया है, सो गया है, उन्मादियों ने जिसे जहरीला बना दिया है, उस पर विवेक की बूंदें गिराने का यह उपक्रम था… अाज भी कुछ ऐसा ही दौर लौटता लगता है. क्या इसे ही इतिहास का दोहराना कहते हैं ? अगर यह इतिहास का यांत्रिक दोहराव मात्र है तब तो बहुत फिक्र नहीं क्योंकि तब तो बापू भी होंगे ही कहीं दोहराने के लिए … लेकिन नहीं, ऐसी कार्बन कॉपियां इतिहास में चलती ही नहीं हैं. हर दौर को अपना गांधी खुद ही पैदा करना पड़ता है. ( 21.01.2018)

Wednesday, 6 December 2017

कांग्रेस के लिए यह पुराना ही नया है


चाह तो सभी रहे थे - पार्टी भी अौर लोग भी कि कांग्रेस को अपना यह अाखिरी हथियार भी अाजमा ही लेना चाहिए ! तो उसने अाजमा लिया अौर राहुल गांधी कांग्रेस के नये अध्यक्ष बन गये ! कोई पूछे कि राहुल में नया क्या है, तो जवाब अासान नहीं है, क्योंकि वे पिछले वर्षों से देश की राजनीति में ताक-झांक भी करते रहे हैं, अौर सीधे उतर कर दो-दो हाथ भी करते रहे हैं. उन्हें अपने पिता की तरह पार्टी की गद्दी प्लेट पर रख कर नहीं मिली है, अौर न दादी की तरह विधि के विधान की तरह; अौर न परनाना की तरह ऐसे मिली कि जैसे वे इसके लिए ही पैदा हुए थे. राहुल बहुत कुछ अनीक्षापूर्वक मां की मदद में अाए, कई बार गिरते-लुढ़कते, ‘पप्पू’ कहलाते हुए पार्टी अौर राजनीति में अपनी जमीन तैयार की, अाधी-अधूरी ही सही, अपनी एक सोच भी देश के सामने रखी; फिर चुनावों की कमान संभाली अौर उसकी रणनीतियां तैयार कीं, हारे भी अौर पिटे भी; नरेंद्र मोदी मार्का लफ्फाजी अौर भाजपा मार्का अवसरवादिता के सामने कहीं से भी टिक न पाने के बावजूद वे टिके रहे, बहुत सतही तरीके से सही लेकिन देश के किसी भी दूसरे राजनीतिक नेता से अधिक वे किसानों अादि के सवालों ले कर संघर्ष करते हुए एक तरह की ताकत का प्रतीक बनते गये, अौर अब गुजरात के चुनाव परिणाम चाहे जो भी हों, राहुल देश की एक मान्य राजनीतिक अावाज बन चुके हैं. कांग्रेसी पहचानें कि यही राहुल गांधी का नयापन है. 

उन्होंने वर्षों तक कांग्रेस के एक सिपाही की तरह देश के कोने-कोने में चप्पलें घिसी हैं जबकि उन्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं थी.  वे जब भी चाहते, कांग्रेस अध्यक्ष बन जाते ! वंशवाद का अारोप अाज भी लग रहा है, तब भी लगता लेकिन ऐसे अारोपों की कांग्रेसियों को कब फिक्र रही है कि अब होती ! लेकिन राहुल गांधी ने इतना संयम तो रखा कि पार्टी अौर सरकार दोनों पर विराजमान हो सकने के तमाम अवसरों को छोड़ा अौर अपनी पहचान व ताकत खुद ही बनाई. उनकी मां ने भी ऐसा ही किया था. एक मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री बनने की जैसी छिछोरी जल्दीबाजी दिखाई अौर जैसी क्रूरता से उसे अंजाम दिया, अौर भारतीय राजनीति में चाटुकारिता का जैसा नया अध्याय जोड़ दिया, उसके सामने राहुल गांधी को रखें हम तो राहत-सी महसूस होती है. लेकिन किसने कहा कि भारतीय राजनीति के शीर्ष पर बैठने के लिए निजी ईमानदारी अौर एक किस्म का भोलापन काफी है ? ऐसे एक व्यक्ति के दिए जख्म अभी ताजा ही हैं.  

राहुल गांधी ने ऐसे वक्त में कांग्रेस की कमान संभाली है जब पार्टी रेगिस्तान में खड़ी है.  रेगिस्तान में इसलिए खड़ी नहीं है कि इसके पास बहुत थोड़ी सरकारें बची हैं अौर दिल्ली इसके हाथ से ऐसी निकली है कि वापस अाती दीखती नहीं है. यह रेगिस्तान में इसलिए खड़ी है इसके पास  संगठन जैसी कोई चीज बची नहीं है, इसके खाते में जिला स्तर के नेता भी नहीं रह गये हैं, जो कुछ हैं वे सब छत्रप हैं जिनकी हवाबाजी बहुत है लेकिन हवा पर असर या पकड़ नहीं है. इसका शीर्ष नेतृत्व उनका है जिनका राजनीतिक जीवन समाप्त हो चुका है. अब उनमें कुछ भी बनाने की भूख नहीं बची है, वे बस बने रहें तो बस है. राजनीति को जो सत्ता में अाने-जाने का खेल भर समझते हैं अौर एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक ही जिनकी सारी दौड़ रहती है, उनके लिए किसी रणनीति के तहत काम करना अौर पार्टी की जड़ें सींचना संभव नहीं है. 

राज्यों से कांग्रेस के हर जनाधार वाले नेता की जड़ काटना अौर मनमानी कलमें रोपना अौर इस तरह खुद को बड़ा अौर हरा रखना इंदिरा गांधी की राजनीतिक शैली थी. उन्होंने कांग्रेस की जड़ें खोद कर अपनी जड़ रोपी थी. यह राजमहल की वह राजनीति थी जिसे देखते हुए राजीव गांधी बड़े हुए थे अौर यह मान बैठे थे कि राजनीति का मतलब बस इतना ही होता है. वे कुछ ज्यादा समझते-झेलते इससे पहले ही उनका दुखद अंत हो गया. राजीव के बाद की कांग्रेस का कोई चरित्र नहीं रहा. वह इस या उस समीकरण से सत्ता में अाने वाली दरबारियों की वह पार्टी बन गई जिसे सोनिया गांधी ने संभाल रखा था. सोनियाजी के लिए इससे अधिक कुछ करना संभव भी नहीं था, अौर जो संभव था वह उन्होंने बखूबी किया. मनमोहन सिंह का दोनों कार्यकाल जितना उनका नहीं था उससे कहीं ज्यादा सोनिया गांधी का था. इसलिए जैसे दैत्याकार घोटाले उस दौर में हुए, उसकी जिम्मेवारी से वे बच नहीं सकती हैं. अौर राहुल भी बच नहीं सकते हैं क्योंकि वे मां के साथ तब भी कांग्रेस के संचालकों में एक थे, अौर मां-बेटे दोनों में से किसी ने भी इस बारे में मनमोहन सिंह से सफाई मांगी हो या मनमोहन सिंह की मदद की हो कि वे ऐसे घोटालेबाजों को मंत्रिमंडल से निकालें अौर जेल भेजें, ऐसा उदाहरण हो, तो हमें पता नहीं. 

इन सबसे राहुल गांधी की जो तस्वीर उभरती है वह बहुत अाशा तो नहीं जगाती है लेकिन एक बड़ी बात यह है कि राहुल गांधी यहीं अा कर खत्म नहीं हुए. कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता की भूमिका में पार्टी को लोगों से जोड़ने की कोशिश में वे बराबर हाथ-पांव मारते रहे. पार्टी के भीतर चुनाव अादि की प्रक्रिया में सुधार से ले कर नागरिक जीवन में पार्टी की भूमिका के बारे में उनकी कोशिशें दूसरों से अलग भी रहीं हैं अौर अागे की भी. फेंकू’ अौर ‘पप्पू’ में से गुजरात चुनाव के दौरान ‘पप्पू’ का अवसान हो गया है. अब एक सजग, गतिमान राहुल को हम देख पा रहे हैं. लेकिन कांग्रेस को संभालते हुए भारतीय राजनीति में अपनी निश्चित जगह बनाने की दिशा में अभी उन्हें बहुत चलना है. वे चल सकते हैं, ऐसा भरोसा अब बन रहा है. 

देश में भी अौर पार्टी में भी ऐसे लोग होंगे जो मान रहे होंगे कि राहुल की अध्यक्षता की सफलता की एक ही कसौटी होगी कि वे कांग्रेस को सत्ता में कैसे लाते हैं. मुझसे कोई पूछे तो मैं कहूंगा कि राहुल इस कसौटी को स्वीकार न करें, न जेहन में रखें. कांग्रेस को सत्ता में वापस लाना न कोई लक्ष्य होना चाहिए अौर न उसकी रणनीति बननी चाहिए. राहुल की पहली कसौटी यह होगी कि क्या वे देश में ऐसा भरोसा पैदा कर सकते हैं कि कांग्रेस सत्ता के लायक है ? कांग्रेस के क्षत्रपों को हिलाए बगैर यह संभव नहीं है. यह काम दृढ़ता के साथ लेकिन सावधानी से करना होगा क्योंकि योग्य लोगों की खोज का रास्ता कांग्रेस में अब तक बंद रहा है. कांग्रेस नये लोगों की स्वाभाविक पसंद बने, यहां तक पार्टी को खींच लाना राहुल की प्राथमिकता होनी चाहिए. यह कैसे भी अौर किसी भी कीमत पर सत्ता की राजनीतिक शैली से यह अलग काम है. राहुल चाहें तो इसे समझने के लिए कांग्रेस का इतिहास टटोल सकते हैं. क्या सत्ता अौर चुनाव के अलावा पार्टी की समाज में कोई भूमिका होती ही नहीं है ? पर्यावरण संरक्षण, पेड़ों को बचाने व नये पेड़ लगाने का अभियान, पानी बचाअो तथा तालाबों का जीर्णोद्धार करना, खेती-किसानी की मदद की टोलियां गठित करना अौर उनके लिए मंडियों का जाल बिछाना, जातीय दमन व शोषण के खिलाफ संगठित प्रयास करना, पुलिस की अक्षमता के खिलाफ अावाज उठाना, महिलाअों की सुरक्षा के सवालों पर हमेशा उनके साथ तत्पर रहना अादि-अादि कितने ही गैर-राजनीतिक काम हैं जिनसे राजनीति को नया चेहरा दिया जा सकता है. क्या राहुल कांग्रेस को इनकी तरफ मोड़ सकेंगे ? इसी दो-राहे पर देश की राजनीति खड़ी है. राहुल मुड़ते हैं या मोड़ते हैं, यही उनसे जुड़ी तमाम संभावनाअों की कसौटी है. ( 06.12.2017)             

Tuesday, 28 November 2017

184 किसान संगठन अौर एक किसान



राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर अाज किसानों की जो रैली दिन भर जमी रही अौर लगातार अपनी बात कहती रही, वह इस अर्थ में नई थी कि उसमें 184 किसानों संगठनों ने शिरकत की थी. यह नया था कि जैसी टूट राजनीति के मंच पर है, वैसी ही टूट किसानों के मंच पर भी है. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि हमारे सारे जन अांदोलन अापस में भी अौर एक-दूसरे के साथ भी इस कदर टूटे हुए हैं कि न अावाज एक हो पाती है, न निशाना ! टूट की यह त्रासदी  उन सबको भीतर-भीतर एक किए देती है जिनसे लड़ने का खम भरते हैं ये अांदोलन ! 

देश में अाज किसान दुखी है क्योंकि हर तरह से, हर तरफ से उसे दुखी करने की कोशिशें जारी हैं. हर किसी के पास किसानों के नाम पर बहाने के लिए एकड़ों अांसू हैं, पर कोई अपनी अांखों का कोर भी भिंगोना नहीं चाहता है. ऐसी त्रासदी के बीच असंगठित किसानों का एकजुट होना अौर राजधानी पहुंच कर दस्तक देना अाशा जगाए या न जगाए, ध्यान तो खींचता ही है. यह देखना भी हैरान कर रहा था कि रैली में चल-चल कर संसद मार्ग पर पहुंची महिलाअों की संख्या खासी थी अौर वे वहां किसान महिलाअों के रूप में अाई थीं. हम, जो किसानों का स्वतंत्र अस्तित्व कबूल करने को भी बमुश्किल तैयार होते हैं, महिला किसानों का यह स्वरूप, उनकी वैसी दृढ़ता, उनकी साहस भरी जागरूकता से हैरान-से थे. 

हमारे देश में महिलाअों व बच्चों को कोई असली नहीं मानता है. वे या तो छाया होती हैं या छलावा; असली नहीं होतीं ! बच्चे प्यारे होते हैं लेकिन उनका अस्तित्व नहीं होता ! लेकिन यहां मौजूद किसान महिलाएं ऐसी नहीं थीँ. वे थीं - अपनी वेदना अौर दर्द अौर दमन सबको संभालती, पीती हुई अपनी बातें कहे जा रही थीं. किसान महिलाअों की संसद वहीं संसद मार्ग पर बैठी थी अौर उस संसद की अध्यक्ष मेधा पाटकर बार-बार भर अाता अपना गला अौर बार-बार उमड़ अाती अपनी अांखें बचाती-छुपाती हमें अहसास कराना चाह रही थीं कि ये बहनें नहीं हैं, किसान महिलाएं हैं जो लड़ाई की सिपाही हैं. किसान मुक्ति संसद का यह स्वरूप अाकर्षक था लेकिन कहीं पीछे से नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत या नीतीश कुमार के संघ व शराब मुक्त भारत की पैरोडी भी याद अा रही थी. ऐसा इसलिए नहीं था कि किसानों के दर्द के बारे में याकि उनकी ईमानदारी के बारे में कहीं कोई शंका है लेकिन ऐसे अायोजन जो कहते कम हैं, सुनाते बहुत अधिक हैं, शंकित करते हैं.  

हमारा राजनीतिक प्रशिक्षण इस तरह हुअा है कि हम किसान को भी एक वर्ग मान कर, उसे उसके लाभ के सवाल पर संगठित कर लड़ाई में उतारना चाहते हैं. किसानों को लुभाने-भरमाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि वह स्वामीनाथन अायोग की सिफारिशों को लागू करेगी अौर फसल की लागत की दोगुनी कीमत देगी. यह सीधा सौदा था जिसकी व्यवहारिकता या शक्यता पर किसी ने विचार नहीं किया अौर भारतीय जनता पार्टी की झोली वोटों से भर गई. तब भी ये ही नेता थे अौर ये ही किसान संगठन थे. भारतीय जनता पार्टी ने अपनी जीत पक्की कर ली, सरकार बना ली अौर फिर यह सच्चाई बयान कर दी कि उसने चुनाव के वक्त जो कुछ कहा वह सब जुमलेबाजी थी अौर जुमलेबाजी व जुमलेबाजों का कोई धर्म या ईमान नहीं होता है. वह तब भी सच्चे थे, अाज भी सच्चे हैं. भारतीय जनता पार्टी से पिटने के बाद किसान नेताअों ने उन जुमलों को ही नारा बना लिया अौर कर्जमाफी, स्वामीनाथन् अायोग की सिफारिशें तथा लाभकारी मूल्य की मांग खड़ी कर किसानों को अपने झंडे के नीचे जमा करने लगे. एक तरह की राजनीतिक होड़ शुरू हुई जिसमें किसान कम, किसान नेता ज्यादा हावी हो गए. किसान नेता पार्टियों में टूटे हैं, वे वोटों का सौदा करते हैं, वे भी खुले या पोशीदा तौर पर नाम व नामा की होड़ में लगे हैं. राजस्थान के कोटा की एक सभा में पूछा एक किसान ने कि भाईजी, किस किसान की बात अाप करते हो ? किसान है कहां यहां ?  यहां मैं हूं जो भारतीय जनता पार्टी का किसान हूं; अाप कांग्रेस के किसान हैं अौर वह बहुजन समाज पार्टी का किसान है ! किसान कहीं हो याकि अाप खोज लो तो बात अागे चले ! वह किसान कहां है ? क्या इन १८४ संगठनों में है याकि इनके बाहर जो रह गये हैं उनमें है ? 

बात यह है कि अाज देश को अौर इसके लोकतंत्र को किसान अांदोलन की जरूरत नहीं है. उसे जरूरत है एक सर्वस्पर्शी जनांदोलन की जिसका नेतृत्व किसान करे. मैं क्यों कहता हूं कि किसान करे ? इसलिए कि लड़ाई क्या है अौर किसके बीच है ? यह लड़ाई सभ्यताअों के बीच है जिसे वर्गों या पेशों में इस कदर उलझा दिया गया है कि हम असली लड़ाई अौर असली सिपाही की पहचान भूल गए हैं. अगर लड़ाई अपने लिए सुविधा या अधिकार का एक छोटा टुकड़ा मांग लेने या छीन लेने की है तो यह वर्गीय लड़ाई या पेशों की लड़ाई ठीक ही है. तब किसान भी इतना ही मांगेंगे कि उन्हें कर्जों से माफी मिल जाए अौर लागत कीमत मिल जाए; बैंक या हवाई सेवाअों के अधिकारी भी अपना वेतन बढ़वाने की मांग ले कर हड़ताल पर उतरेंगे अौर अालू-प्याज के अाढ़ती कीमतों के छप्पर फाड़ कर निकल जाने का अौचित्य बता देंगे अौर फिर कीमत दो-एक रुपये उतर अाने को हम भी बड़ी राहत मान कर कबूल कर लेंगे. सांसद अौर विधायक अौर देश की सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे नौकरशाह सभी अपना-अपना वेतन बढ़ाते रहेंगे अौर हमें सबको स्वीकार कर चलना होगा. सारे राजनीतिक दलों की योजना में ऐसा देश सबसे मुफीद बैठता है, क्योंकि बिल्लियों की ऐसी ही लड़ाई में तो फैसले का तराजू बंदरों के हाथ में होता है अौर वे अपनी सुविधा देख कर उसे कभी इधर तो कभी उधर झुकाते रहते हैं. 

यह लड़ाई खेतिहर सभ्यता अौर अौद्योगिक सभ्यता के बीच है. हमारा देश खेतिहर सभ्यता का देश है. इसका अौद्योगिक विकास भी खेतिहर सभ्यता को केंद्र में रख कर ही किया जाता सकता है. खेतिहर सभ्यता मतलब मात्र किसान नहीं, पूरा खेतिहर समाज ! वे सारे लोग, वे सारी प्रणालियां, वे सारे पशु-पक्षी जो खेती से जुड़े हैं इस लड़ाई के केंद्र में है. परिवर्तन का यह अांदोलन खेतिहर परिवार के नेतृत्व चलेगा तभी परिणामकारी होगा. तब यह लड़ाई कर्जमाफी की नहीं होगी बल्कि खेती-किसानी कर्ज के बिना कैसे हो, इसकी खोज की होगी अौर ऐसी व्यवस्था बनाने की होगी कि जिसमें किसान को भाव मांगने की जरूरत नहीं होगी बल्कि उसे उसके जीवनयापन की सारी सुविधा अौर सारे अवसर समाज द्वारा सुनिश्चित होंगे. खेती-किसानी वह पेशा या नौकरी नहीं है कि जो हर साल हड़ताल करे अौर इस या उस पार्टी का दामन थामे ताकि उसे सुविधा का एक टुकड़ा मिले कि उसकी उपयोगिता का अाकलन करने के लिए अायोग बैठे अौर पे कमीशन की तरह किसान कमीशन भी बनाया जाए. यह हमारे अस्तित्व का अाधार है. हम अपनी तमाम भौतिक सुविधाअों के बावजूद खेती पर निर्भर रहते हैं. इसलिए ऐसा समाज बने कि जो खेती-किसानी को केंद्र में रखता हो अौर ऐसी खेती-किसानी हो जो संपूर्ण समाज को पालने-पोसने का कर्तव्य निभाती हो. किसान न तो ऐसी भूमिका ले पा रहे हैं, न ऐसी भूमिका के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा है. इसलिए सारे किसान अांदोलन एक सीमित दायरे में अपने लाभ-हानि की बात करते हैं अौर मजदूर यूनियनों का चरित्र अोढ़ लेते हैं. व्यवस्था इन्हें उसी तरह लील जाती है अौर लील जाएगी जिस तरह उसने सारा मजदूर अांदोलन लील लिया है. 

किसान अपनी जमीन से उखड़ा हुअा अौर अौद्योगिक इकाइयों की छाया में जीने वाला मजदूर नहीं है जैसाकि व्यवस्था उसे बनाना चाहती है. वह अपनी जमीन से जुड़ा अौर जमीन से जीवन रचने वाला स्थायी समाज है. वही खेतिहर सभ्यता का अाधार है. हम राजा को याचक बनाने की गलती कर रहे हैं जो विफल भी होगी अौर सत्वहीन भी बनाएगी. ( 20.11.2017)  

अापने ठीक कहा है उप-राष्ट्रपतिजी !


अभी जब कोई कुछ कह नहीं रहा बल्कि सभी चिल्ला रहे हैं हमारे उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कुछ कहा है ! उन्होंने जो कहा है, उसमें खास कुछ नहीं है लेकिन जैसे माहौल में जिस तरह उन्होंने यह  बात कही है उससे वह बात बहुत खास ही नहीं बन गई है वरन बहुत जरूरी भी बन गई है.

किसी फिल्म या किसी रचना या किसी वक्तव्य को ले कर यदि देश में ऐसी अफरा-तफरी मच जाए कि देश मछलीबाजार बन जाए अौर व्यवस्था बनाने की जिनकी जिम्मेवारी हो वे व्यवस्था का माखौल उड़ाने में लग जाएं तो मानना चाहिए कि देश गंभीर रूप से बीमार है. मतलब देश को गहन इलाज की तत्काल जरूरत है. जब अादमी कैंसर से पीड़ित हो तब डॉक्टर यह नहीं देखता है कि उसकी सूरत कैसी है कि वह कितनी सीढ़ियां तेजी से चढ़ लेता है कि वह कितनी दंडबैठकी लगाता है कि वह कितना खाता है. डॉक्टर जानता है कि मामला वहां है जहां कहते हैं कि बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी ! इसलिए वह दूसरा कुछ भी न देखते-सोचते, इलाज में जुट जाता है. ऐसा ही देश व समाज के साथ भी होता है. अाप दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थ-व्यवस्था हैं कि अाप अपने पड़ोसियों पर भारी पड़ते हैं कि दुनिया सारी अापकी ही सुनती है जैसी बातें भूल कर इस बीमार देश-समाज के इलाज की बात सोचें हम, उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा है. एक साहित्यिक मेले में बोलते हुए उन्होंने कहा कि यदि देश के लोग एक-दूसरे को हिंसक धमकियां दे रहे हों, शारीरिक क्षति पहुंचाने की चुनौती उछाल कर करोड़ों रुपये इनाम देने की बात कह रहे हों तो किसी लोकतंत्रिक देश में यह स्वीकार्य नहीं हो सकता है. अापको दूसरे से शिकायत हो सकती है, अाप किसी से असहमत हो सकते हैं तो अापको जिम्मेदार अधिकारी के पास जा कर अपनी शिकायत या असहमति दर्ज करानी चाहिए अौर समुचित काररवाई का इंतजार करना चाहिए. लेकिन अाप शारीरिक दंड देने या हिंसक धमकियां उछालने की बात नहीं कर सकते हैं. 

उप-राष्ट्रपति जिस मामले का सीधा संदर्भ ले रहे थे वह फिल्म ‘पद्मावती’ से जुड़ा है. इतिहास में रानी पद्मावती भले दो पंक्तियों से ज्यादा की जगह न घेरती हों लेकिन इतिहास के पन्नों से निकल कर अाज के वर्तमान में उन्होंने कोई डेढ़ अरब के इस देश को हतप्रभ कर रखा है. इतिहास कहानी भी है, सच्चाई भी; इतिहास रास्ता भी है अौर रास्ते का पत्थर भी; वह अांख भी है अौर अंधता भी; वह कान भी है अौर वज्र बहरापन भी ! मतलब इतिहास तो अपनी जगह है अौर रहेगा भी, देखना तो यही है कि अाप उससे बरतते कैसे हैं ! अाप उसे विकृत कर सकते हैं, तोड़-मरोड़ सकते हैं अौर उसका बेजा इस्तेमाल भी कर सकते हैं लेकिन अाप उसे बदल नहीं सकते अौर न उसे रास्ते से हटा सकते हैं. वह मील का पत्थर भी है अौर अापके साथ निरंतर सफर पर भी है. इसलिए अाज का हिंदुस्तान देख कर मुझे अंदाजा होता है कि इतिहास के अंधों का देश कैसा होता होगा !  

इतिहास बताता है कि 1303 ई. में दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316)  ने लंबी लड़ाई अौर नाकाबंदी के बाद चित्तौड़गढ़ को जीता था. इस घटना के 237 साल बाद, 1540  ई. में सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अवधी में ‘पद्मावत’ लिखा जो चित्तौड़ फतह की पूरी कहानी का काव्यांतर है. उसी कहानी से रानी पद्मावती का जन्म होता है अौर इतिहास कहानी का रूप लेता है. फिर इसी को अाधार बना कर दूसरों ने भी पद्मिनी या पद्मावती पर कुछ-कुछ लिखा है अौर हम देखते हैं कि हर की पद्मिनी भिन्न-भिन्न है. अगर कोई एक बात समान है इन सबमें तो वह यह कि पद्मिनी बेहद खूबसूरत है. उसकी यही खूबसूरती किंवदंती बन कर सैकड़ों साल का सफर तै करती रही है अौर अाज भी करती है अौर संजयलीला भंसाली जैसे लोग अपनी कल्पना का घोड़ा दौड़ाते हैं. 

एक कथा ऐसी भी है कि मेवाड़ के राजा ने जिस एक व्यक्ति को किसी अपराध में राज से निकाल दिया था उसी ने खिलजी के दरबारियों में अपनी जगह बनाई अौर बदला निकालने के लिए उसने ही खिलजी के कानों में पद्मिनी के सौंदर्य की कथा ऐसी भरी कि खिलजी उसे देखने अौर पाने को बेचैन हो उठा. उसने धोखे से चित्तौगढ़ के राजा रतन सिंह को बंदी बना लिया अौर फिर उनकी जान का सौदा पद्मिनी से किया. राजपूती अान-बान-शान खौल उठा अौर राजपूतों ने अपने राजा को छुड़ाने की लड़ाई उनके किले में घुस कर छेड़ दी. खिलजी की फौज बहुत सधी अौर युद्धकुशल थी. राजपूतों को जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा अौर अंतत: पराजय भी कबूल करनी पड़े. विजयी खिलजी जब किले में दाखिल हुअा तो उसने पाया कि रानी पद्मावती ने दूसरी महिलाअों के साथ जौहर कर लिया था. कथा यहीं पूरी हो जाती है. 

इतिहास में अाप खोजेंगे तो महारानी पद्मिनी का कोई ठोस जिक्र नहीं मिलता है. मतलब यह कहना इतिहाससंगत होगा कि पद्मिनी इतिहास नहीं, इतिहास की कहानी है. फिल्मी पर्दे पर पद्मिनी की कहानी को पकड़ने की कोशिश पहले भी कई बार हुई है जिसमें ‘चित्तौड़ की रानी’ नाम की तमिल फिल्म खूब पसंद की गई थी जिसमें वैजयंतीमाला पद्मिनी बनी थीं. श्याम बेनेगल ने जब अपना अपूर्व टीवी धारावाहिक ‘भारत : एक खोज’ बनाया तो उसका पूरा एक एपिसोड खिलजी-चित्तौड़ युद्द पर था जिसमें पद्मिनी का प्रसंग भी अाता है. हाल के वर्षों में पद्मिनी पर एक पूरा टीवी धारावाहिक भी बना है. मतलब यह कि पद्मिनी को लेकर इतिहास जितना ही चुप है, कलाकार-फिल्मकार उतने ही मुखर रहे हैं. हर फिल्मकार ने अपनी तरह की पद्मिनी बनाई है लेकिन सभी ने उसके सौंदर्य अौर उसकी नृत्य-प्रवीणता को केंद्र में रखा ही है. 
  
संजयलीला भंसाली न तो इतिहासकार हैं अौर न उनकी फिल्मों का कोई एेतिहासक संदर्भ है. वे हमारे वक्त के, सेल्यूलाइड के सिद्ध किस्सागो हैं. वे कभी इतिहास के पन्ने पलटते भी हैं तो सिर्फ इस खोज में कि कहां, क्या ऐसी कथा छुपी-दबी है कि जो बड़े पर्दे पर पंख फैला सकती है. वे बड़े दिल से कैमरे से कथा रचते हैं अौर पूरी तन्मयता के साथ उसे पर्दे पर उतारते हैं. वे कुछ कहने वाले फिल्मकार नहीं हैं कि अापको उनकी फिल्म का जवाब देना पड़े. उनकी फिल्म ‘रामलीला’ को ले कर शोर मचाने वालों ने यह समझा या नहीं पता नहीं लेकिन हमें समझना ही चाहिए कि ‘रामलीला’ का शोर उन्होंने इतना भर कर के शांत कर दिया कि नाम बदल दिया - गोलियों की रासलीला - राम  लीला ! न कहानी बदली, न कोई दृश्य काटा, बस नाम को थोड़ा बदल दिया. फिल्म बहुत अच्छी बनी थी, खूब कमाई की उसने ! ऐसा ही उन्होंने ‘बाजीराव मस्तानी’ के साथ भी किया अौर एक अच्छी फिल्म देखने का संतोष हमें मिला. एतराज उठाने वाले उनकी ‘देवदास’ पर भी एतराज उठाते रहे लेकिन शरत बाबू की कथा से अौर पहले से इसी कृति पर बनी फिल्मों से अलग ले जाकर उन्होंने अपनी ‘देवदास’ रची अौर अपनी तरह से सफल भी हुए. संजयलीला भंसाली बोलते कम हैं; जो कुछ भी बोलते हैं अपनी फिल्मों से ही बोलते हैं.  

लेकिन अब सभी बोल रहे हैं - वे सब जिन्होंने इतिहास नहीं पढ़ा है, जिन्होंने फिल्म नहीं देखी है. वे बोल रहे हैं इतना ही नहीं है, वे दूसरे किसी को बोलने देना नहीं चाहते हैं. वे किसी का सर,किसी की नाक, किसी का जौहर करने को दूसरों को ललकार रहे हैं. कायर इतने हैं ये सभी कि जातीय गौरव का यह काम खुद करने को अागे नहीं अा रहे, किराये पर यह काम करवाना चाहते हैं. उप-राष्ट्रपति ने इन्हीं लोगों को सावधान किया है कि लोकतंत्र में इसकी इजाजत नहीं है. लेकिन उप-राष्ट्रपति जो नहीं कह सके वह भी इसी के साथ कहने जैसी बात है कि हिंसा को उकसाने अौर उन्माद खड़ा करने की ऐसी कोशिेश यदि लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है तो वैसी सरकारें कैसे स्वीकार्य हो सकती हैं जो इनकी पीठ थपथपा रही हैं ? सही-गलत फिल्मों का निर्धारण करने के लिए सेंसर बोर्ड नाम की एक संस्था बनी हुई है जिसकी अनुमति के बिना कोई भी फिल्म दर्शकों तक पहुंच नहीं सकती है. उसने अब तक ‘पद्मावती’ को प्रदर्शन की स्वीकृति नहीं दी है. उसकी स्वीकृति हो तब भी जिन्हें एतराज होगा वे अदालत जा सकते हैं. 

‘पद्मावती’ यदि इतिहास नहीं है तो उसकी परिकल्पना में इतिहास से छेड़छाड़ जैसी बात ही बेबुनियाद है. दूसरी बात रह जाती है जनमानस में बैठी छवि की, तो उसकी फिक्र भी की जानी चाहिए. लेकिन संजयलीला ने ऐसा कोई काम किया है कि नहीं, यह भी तो फिल्म देख कर ही तै होगा न !  फिर जिन मुख्यमंत्रियों ने बिना किसी अाधार के फिल्म का प्रदर्शन अपने राज्य में न होने देने की घोषणा की है, उनका क्या ? क्या हर राज्य का मुख्यमंत्री अब अपने राज्य का सेंसर बोर्ड अधिकारी भी बन गया है ? क्या ये सब अब मुख्यमंत्री नहीं, रियासतों के महाराजा बन गए हैं जो अपने फरमान अलग जारी करेंगे ? क्या लोकतंत्र में यह स्वीकार्य है ? संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. अगर भीड़ उसका हनन करती है तो उप-राष्ट्रपति उसे खारिज करते हैं. अगर सरकारें करती हैं तो क्या उसका निषेध नहीं करना चाहिए तथा इस असंवैधानिक कृत्य के लिए इन सबको बर्खास्त नहीं कर देना चाहिए ? 

सारा देश भीड़ में बदल दिया जाए अौर फिर चतुर व अवांछित लोग अपनी दूकानें खोल लें, यह लोकतांत्रिक राजनीति का दर्शन नहीं है. संजयलीला भंसाली की ‘पद्मावती’ ने एक जौहर सजा दिया है जिसमें सरकारी व भीड़वादी सारे अलोकतांत्रिक रवैयों अौर मिजाजों का दहन कर देना चाहिए. उप-राष्ट्रपति की चेतावनी तभी सार्थक होगी. ( 28.11.2017)