Tuesday, 5 March 2024

भारत-रत्नों की भरमार

 कहावत पुरानी है कि भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है !  तो समझिए कि वैसे ही काल से देश गुजर रहा है. कहा जा रहा है कि यहां हर कुछ, हर ओर से छप्पड़ फाड़ कर बरस रहा है ! हम भी देख रहे हैं कि छप्पर हो कि न हो, बारिश खूब हो रही है. जुमलों की बारिश, आंकड़ों की बारिश, घोषणाओं की बारिश ! आत्म-प्रशंसा की बारिश तो बहाल किए दे रही है. बेचारे कबीर ने ऐसा ही कुछ देखा होगा तो यह उलटबांसी लिखी होगा : बरसे कंबल, भींगे पानी ! 

 तो इस बारिश में अब तक पांच ‘रत्न’ भी बरस चुके हैं. तब से रोज सुबह अखबार इसलिए ही खोलता हूं कि देखूं कि आज कौन-सा ‘रत्न’ बरसा ? आज ही नहीं, मैं पहले से भी हैरान रहता था कि यदि हमारे देश में इतने रत्न हैं तो हम इतने दरिद्र व फूहड़ क्यों हैं ? इस वर्ष के रत्नों को छोड़ दें तो 48 रत्नों की खोज हमने पहले ही कर ली थी. अब ( याकि अब तक !) हो गए हैं 53 यानी अर्द्ध-शतक पूरा हो चुका है. लेकिन बल्लेबाज क्रीज पर है और चुनाव-टाइम पूरा होने से पहले कई ओवर बाकी भी हैं, तो मतलब कि हे गुणग्राहको, अपनी पोथी बंद मत करना अन्यथा नये ‘रत्नों’ से वंचित रह जाओगे.  

महात्मा गांधी ने 150 साल पहले जब ‘हिंद-स्वराज्य’ नाम की किताब लिखी थी तब ‘भारत-रत्न’ का जन्म भी नहीं हुआ था. उस किताब में बड़ी टेढ़ी-मेढ़ी बातें उन्होंने लिखीं. वह तो उनका भाग्य ही मानता हूं कि जैसे उस समय ‘भारत-रत्न’ का जन्म नहीं हुआ था वैसे ही उस समय ‘यूएपीए’ का जन्म भी नहीं हुआ था, नहीं तो महाशय धरे भी जाते और धकियाए भी जाते ! ‘हिंद-स्वराज्य’ में महात्माजी ने संसदीय लोकतंत्र की कटु समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री नाम के अनोखे प्राणी की आंतरिक विपन्नता पर ऊंगली उठा दी और लिख दिया कि वह अपनी सत्ता का सौदा कई तरह से, कई स्तरों पर करता है जिनमें एक तरीका सम्मान बांटने का भी है. गुलाम खरीदने की प्रथा बंद हो गई तो बड़े लोगों को गुलाम बनाने के नये रास्ते खोजने पड़े. महात्माजी ने यह भी लिख दिया कि प्रधानमंत्री नाम का यह प्राणी देशभक्त होता है, उन्हें इस पर भी शक है. जो बेचारा सारा देश अपनी तर्जनी पर उठाए फिरता है ( माफ कीजिए, देश नहीं, अब वह संसार उठाए फिरता है ! ) उसके बारे में ऐसी शंका !! मुझे पक्का विश्वास है कि महात्माजी को यह सब लिखने-कहने की छूट कांग्रेस व जवाहरलाल नेहरू ने दे रखी थी वरना रत्नों की ऐसी बेइज्जती सनातनी देश भला बर्दाश्त करता क्या ! यह अकारण नहीं है कि यह सरकार कांग्रेस-मुक्त देश बनाने में जुटी है और  सफलता के करीब है. कांग्रेस-मुक्त हो गया देश तो महात्माजी तो साथ ही निबट जाएंगे. इसलिए ‘वे’ उनके बारे में कम ही बोलते हैं. बुद्धिमान को इशारा काफी होता है तो कई हैं ‘उनके’ लोग जो उनका इशारा समझ चुके हैं और अपना काम बखूबी कर रहे हैं.

आपको यह भी देखना चाहिए कि रत्नों की इस खोज में सरकार ने पार्टी का भेद भी नहीं किया है. सबको एक नजर से, एक ही तराजू पर तोला गया है. टके सेर भाजी, टके सेर खाजा! मैं यह भी देख रहा हूं कि जिन्हें काल के कूड़ेघर में फेंक दिया गया था, उन्हें भी जब वहां से निकाल कर झाड़ा-पोंछा गया तो इस मीडिया नाम के जमूरे को उनमें नई ही रोशनी व चमक दिखाई देने लगी. अब कोई पिछले सालों की सारी खाक छान कर मुझे बताए कि कर्पूरी ठाकुर की किस विशेषता का जिक्र किसने, कब किया और इस मीडिया ने कब उनकी चमक कबूल की ? अब तो कई दावेदार पैदा हो गए हैं कि जो कह रहे हैं कि कर्पूरी ठाकुर जैसे रत्न को ‘भारत-रत्न’ न मिलने के कारण वे सालों से सोये नहीं हैं. अब जा कर उन्हें नींद आएगी ! मुझे भी अच्छा लगता है जब कोई चैन की नींद सोता है. लेकिन कर्पूरी ठाकुर का क्या ? जैसे-जैसे लोग उनकी जैसी-जैसी प्रशंसा कर रहे हैं उससे उनकी नींद हराम हो गई हो तो हैरानी नहीं. अंग्रेजी अखबारों ने उनकी प्रशंसा में अब क्या-क्या नहीं लिखा जबकि उनके रत्न बनने से पहले इन अखबारों ने कभी उनकी सुध भी नहीं ली और कभी ली भी तो उनको बेसुध करने के लिए ही ली. 

सुध लेने की बात निकली ही है तो मैं सोच रहा हूं कि 2014 में ग्रह-परिवर्तन के बाद से किसने लालकृष्ण आडवाणी की सुध ली. वे भारतीय जनता पार्टी के सौरमंडल के किस कोने में रहे अबतक, इसका पता उनमें से किसे है जो आज उनकी अक्षय-कीर्ति के गान गा रहे हैं ? वे गा भी रहे हैं और कनखी से देख भी रहे हैं कि यह गान कहीं मर्यादा के बाहर तो नहीं जा रहा है ? जिस इशारे से लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत-रत्न’ बनाया गया है, सबको पता है कि उस इशारे के इशारे से आगे नहीं निकलना है. 

भारतीय राजनीति के शिखरपुरुषों में शायद ही कोई दूसरा होगा जिसे लालकृष्ण आडवाणी जैसी हतइज्जती झेलनी पड़ी होगी. असामान्य बेशर्मी से उन्हें सरेआम अपमानित करने का कोई अवसर चूका नहीं गया. आज वे और उनका परिवार कृतकृत्य हो कर उस अपमान का सौदा ‘भारत-रत्न’ से करने में जुटा है. यह ज्यादा दुखद इसलिए है कि आडवाणी-परिवार व जयंत सिंह परिवार के संस्कारों में अब कोई फर्क बचा ही नहीं है.   

कर्पूरी ठाकुर हों कि लालकृष्ण आडवाणी कि चौधरी चरण सिंह कि नरसिम्हा राव कि स्वामीनाथन, कौन कहेगा कि ये सब विशिष्ट जन नहीं हैं ? लेकिन कोई नहीं कहेगा कि इनमें विशिष्टता थी तो क्या थी ? हमारी परंपरा में मृतकों के लिए सच बोलने का चलन नहीं है. यह भी सही है कि याद ही रखना हो तो शुभ को याद रखना चाहिए. फिर भी एक सवाल तो बचा रह जाता है कि कैसे फैसला करेंगे कि कौन किस श्रेणी का हकदार है ? 

सरकार के पास नागरिक सम्मान की चार श्रेणियां है न ! क्या ये श्रेणियां व्यक्ति का कद नापने के इरादे से बनाई गई हैं ? नहीं, ‘पद्मश्री’ से ‘पद्मविभूषण’ तक की सारी श्रेणियों को आंकने का आधार इतना ही हो सकता है कि किसने, किस क्षेत्र में ऐसा काम किया कि जिसका उनके क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा ? एक बड़ा डॉक्टर या इंजीनियर या प्रोफेसर पूरे समाज पर नहीं, अपनी विशेषज्ञता के किसी पहलू पर ही असर डालता है, तो वह ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा सकता है. कोई इससे बड़े दायरे को प्रभावित करता है तो ‘पद्मभूषण’ और जो कई दायरों को प्रभावित करता है तो वह ‘पद्मविभूषण’ से नवाजा जा सकता है. अगर राज्य द्वारा सम्मान कोई राजनीतिक क्षुद्रता की चालबाजी नहीं है तो ऐसे तमाम सम्मान व्यक्ति के छोटे या बड़े होने का फैसला नहीं करते, भारतीय समाज पर उस व्यक्ति के असर का आकलन भर करते हैं. खिलाड़ी, अभिनेता, वैज्ञानिक जैसी हस्तियां अपने-अपने क्षेत्र में आला हो सकती हैं लेकिन संपूर्ण भारतीय समाज व उसकी मनीषा पर उनका ऐसा कोई असर नहीं हो सकता कि जो व्यापक रूप से हमारी सोच-समझ को प्रभावित करता हो. यह सब भूल कर जब राज्य किसी को इस्तेमाल करने की छुद्रता करता है तब सम्मान अपमान में बदल जाता है. गांधी जिस अर्थ में इन सम्मानों को सत्ता की चालबाजी कहते हैं, उसे गहराई से समझने की जरूरत है. 

हमने राजनीतिक चालबाजी के लिए इन नागरिक सम्मानों को व्यक्ति की हैसियत से जोड़ दिया है. जहां यह हैसियत से जुड़ जाता है, वहाँ ऐसे सारे सम्मान खरीदे व बेचे ही जाते हैं क्योंकि ऐसे सौदों की हैसियत खास लोगों की ही होती है. 

‘भारत-रत्न’ का सीधा मतलब है कि आप ऐसे किसी व्यक्ति की बात कर रहे हैं जिसने भूत-भविष्य व वर्तमान तीनों स्तरों पर भारतीय मनीषा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. यह वक्ती उपलब्धि की बात नहीं है, जिस हद तक इस नश्वर संसार में किसी की अविनाशी कीर्ति हो सकती है, उसकी बात है. अगर इस कसौटी को मान लें हम तो हमारे 53 भारत-रत्नों में से 3 भी इस पर खरे नहीं उतरेंगे. कोई क्रिकेट खेलता हो कि कोई गाना गाता हो वह हमारे वक्त का प्रतिनिधि हो सकता है,  ‘भारत-रत्न’ नहीं हो सकता है. प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन जाना ‘भारत-रत्न’ का अधिकारी हो जाना हर्गिज नहीं हो सकता है. लेकिन यही तो हो रहा है.               

रत्नों का यह बंटवारा दरअसल किसी दूसरे को नहीं, दूसरे के बहाने खुद को महिमामंडित करने की चालाकी है. हमने अपने गणतंत्र को इसी नकल पर संयोजित किया तो राज्य-पुरस्कारों का चलन भी शुरू किया.   हम भीतर से जितने दरिद्र होते हैं, बाहरी अलंकरणों से उसे उतना ही छिपाने की कोशिश करते हैं. आज वही तमाशा चल रहा है. ‘भारत-रत्न’ इतना खोखला कभी नहीं हुआ था. ( 16.02.2024) 

                                                                                                                                      

Friday, 5 January 2024

यह जो आपकी किताब है …

             हमारे सुप्रीमकोर्ट में 7 सालों तक न्यायमूर्ति रह कर जस्टिस संजय किशन कौल 26 दिसंबर 2023 को न्यायालय से विदा हुए. जस्टिस कौल 2001 में दिल्ली हाईकोर्ट में जज बने थे तथा वहीं स्थानापन्न चीफ जस्टिस भी रहे. फिर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट तथा मद्रास हाईकोर्ट में चीफजस्टिस रहे. 2017 में वे सुप्रीमकोर्ट पहुंचे. वे वहां कॉलिजियम के सदस्य भी रहे तथा हमारे दौर के कई अत्यंत संवेदनशील मामलों के फैसलों में, जिनमें निजता का अधिकार, समान यौन विवाह, राफैल सौदा, धारा 370 आदि शामिल हैं, जस्टिस कौल की भागीदारी रही. ये सारे ही मामले ऐसे हैं कि जिनने सुप्रीम कोर्ट की गहरी परीक्षा ली है और देश को ऐसा लगा है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी परीक्षाओं में सफल नहीं रहा है. 

   इन मामलों में अदालती फैसले जिनके हित में गए उन्हें भारी राहत भी मिली और उन्होंने हमारी न्याय-व्यवस्था में गहरी आस्था भी प्रकट की. लेकिन सुप्रीमकोर्ट का अपना क्या हुआ ? जस्टिस कौल ने न्यायपालिका से मुक्ति के बाद एक अखबार को लंबा इंटरव्यू दिया है जिसके लिए हमें उनका आभारी होना चाहिए. उस इंटरव्यू से पता चलता है कि हमारी न्यायपालिका और हमारे न्यायाधीश किस बीमारी के शिकार हैं और क्यों उनकी भूमिका से देश को बार-बार निराश होना पड़ता है. 

    सुप्रीमकोर्ट जब दीवानी या फौजदारी मामलों में हाथ डालता है तब उसके फैसलों को जांचने की कसौटी भी और उनका परिणाम भी वक्ती होता है. जब वही सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक मामलों की जांच करता है तब उसके फैसलों को जांचने की एक ही, मात्र एक ही कसौटी होती है और वह कसौटी है भारतीय संविधान ! श्रीमान्, हम भारत के नागरिकों ने आपको यही एक किताब पहनने-ओढ़ने-बिछाने के लिए दी है. यह जो आपकी किताब है श्रीमान, उसे आपने कितनी शिद्दत से पढ़ा और कितनी गहराई से समझा है, इसे जांचने व समझने का भी हमारे पास एक ही हमारा जरिया है : आपके फैसले ! मैं यह भी कहना चाहता हूं कि आपके पास अपने फैसलों का संदर्भ खोजने व बनाने के लिए इस किताब से अलग दूसरी न कोई किताब है, न होनी चाहिए. यह किताब ही आपकी गीता, बाइबल या कुरान है. आपने इस किताब के अलावा क्या-क्या पढ़ा है, इसे जानने में देश को कोई खास दिलचस्पी नहीं है. जस्टिस कौल ने अपने इंटरव्यू में एक जज की हैसियत से संवैधानिक व्यवस्था के बारे में जिस तरह की बातें कही हैं, जिस तरह की मुश्किलों व युक्तियों का जिक्र किया है, उनसे न केवल निराश हूं मैं बल्कि गहरी शंका से भी घिरा हूं. क्या सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर समझ, सोच व चुनौतियों को पहचानने के संदर्भ में ऐसा धुंधलका छाया है ? 

   शताब्दियों तक राजनीतिक-मानसिक-सांस्कृतिक व बौद्धिक गुलामी में रहने वाला एक नवजात मुल्क जब ‘नियति से एक वादा करता हुआ’ अपनी आंखें खोलता है, तब हम उसके हाथ में एक किताब धर देते हैं - हमारा संविधान ! यह उन सपनों का संकलन है जो अपने लंबे स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न दौरों से गुजरते हुए हमारी चेतना ने देखा-समझा और अंतर्मन में बसा लिया. उन सपनों को किसी हद तक आकार व आत्मा महात्मा गांधी ने दी. हमारा यह संविधान जैसे लोकतंत्र की कल्पना करता है, उसके विकास की दिशा उसने राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में स्पष्ट दर्ज कर रखी है. सुप्रीमकोर्ट का यह सारा तामझाम और इसका पूरा बोझ देश ने इसलिए ही उठा रखा है कि यह किताब हमारे लोकतंत्र को जिस दिशा में ले जाना चाहती है, उस दिशा से कोई भटकाव या उसकी दिशा में ही कोई विपरीत परिवर्तन न कर सके, सकी स्स्क्फ़्त निगरानी हो. इसका सीधा मतलब है कि हमारे संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को एक सतत व अखंड विपक्ष में रहने की भूमिका सौंपी है. ऐसे सुप्रीमकोर्ट की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठे जस्टिस कौल ऐसी भ्रमित अवधारणा में जीते हैं कि ‘अदालत विपक्ष नहीं हो सकती है.’ अदालत कभी भी विपक्षी दल नहीं हो सकती है, यह बात तो संविधान का ककहरा जानने वाला भी समझता है लेकिन जस्टिस कौल जैसे लोग यह कैसे नहीं समझते हैं कि एक लिखित संविधान के शब्द-शब्द व शब्दों के पीछे बसने वाली उसकी आत्मा की पहरेदारी जिसे सौंपी गई है, जिसके प्रति वह सार्वजनिक तौर से वचनबद्ध हुआ है, वह सतत विपक्ष की भूमिका का स्वीकार है ? संविधान की दूसरी सारी व्यवस्थाएं अपनी भूमिका बदल सकती हैं, आज का विपक्ष कल सत्ता पक्ष बन सकता है लेकिन न्यायपालिका को हर हाल में, हर वक्त विपक्ष में ही रहना है.  जस्टिस कौल जैसे लोग यह तो कह सकते हैं कि ऐसी भूमिका का निर्वहन हमसे नहीं हो सकेगा. वे ईमानदारी व हिम्मत से यह कहेंगे तो संविधान उन्हें इस भार से मुक्त हो जाने की छूट भी देता है. लेकिन सालों-साल उस जगह बैठ कर, उस जगह की बुनियादी चुनौती से मुंह मोड़ना संवैधानिक अपराध है. 

   विधायिका में किसका कितना बड़ा बहुमत है, यह बात न्यायपालिका के लिए कैसे मतलब की हो सकती है ? वह अल्पमत की सरकार हो या दानवी बहुमत की, सुप्रीमकोर्ट के पास उसको तौलने का तराजू तो एक ही है : संविधान ! उस वक्त की सरकार का हर वह फैसला सुप्रीमकोर्ट को स्वीकार होगा जो संविधान के शब्द व उसकी आत्मा के अनुरूप है; जो फैसला ऐसा नहीं है वह कितने भी बहुमत से लिया गया हो, सुप्रीमकोर्ट की नजर में वह धूल बराबर भी नहीं होना चाहिए. सुप्रीमकोर्ट को इसके लिए न कोई लड़ाई लड़नी है, न कोई नारेबाजी करनी है, न किसी की पक्षधरता करनी है. उसे बस संवैधानिक भाषा में घोषणा करनी है. क्या कोई अंपायर इसलिए नो-बॉल कहने से हिचकेगा या डरेगा कि बॉलर बहुत ‘फास्ट’ है; याकि अंगुली उठाने से हिचकेगा कि बल्लेबाज कोई सचिन या डिवेलियर है ? उसकी संवैधानिक ऊंगली उठेगी ही फिर बल्लेबाज विकेट छोड़ता है या नहीं, यह देखना व्यवस्था के दूसरे घटकों का काम है. ‘ओवरपावरिंग मैजोरिटी’ अथवा ‘इनक्रीजनिंग पोलराइज्ड पोलिटिकल इन्वायरमेंट’ जैसे शब्दों से जस्टिस कौल क्या कहना चाहते हैं ? क्या वे यह कह रहे हैं कि ऐसे माहौल में सुप्रीमकोर्ट काम नहीं कर सकता है ? अगर ऐसा है तो फिर वह है ही क्यों ? सुप्रीमकोर्ट संतुलन साधने की राजनीति करने वाला संस्थान नहीं है. उसका काम तटस्थता से संविधान लागू करना है. 

   हमारे संविधान में एक ही संप्रभु है - भारत की जनता ! बाकी जितनी भी संवैधानिक संरचनाएं हैं उनकी उम्र संविधान में तय कर दी गई है और उनमें से कोई भी संप्रभु नहीं है- न न्यायपालिका, न विधायिका, न कार्यपालिका और न प्रेस ! संविधान ने इन सबको एक हद तक स्वायत्तता दी है लेकिन इन सबका परस्परावलंबन भी सुनिश्चित कर दिया है. सबकी चोटी एक-दूसरे से बंधी है. इतना ही नहीं, संवैधानिक व्यवस्था ऐसी बनी है कि एक अपने दायित्व के पालन में कमजोर पड़ता है तो दूसरा आगे बढ़ कर उसे संभालता भी है और पटरी पर लौटा भी लाता है. न्यायाधीशों की नियुक्ति में इंदिरा-कांग्रेस की मनमानी, प्रेस पर अंकुश लगाने की लगातार की कोशिशें, आपातकाल की घोषणा आदि संसद की विफलता के कुछ उदाहरण हैं, तो आपातकाल का संवैधानिक समर्थन करने में सुप्रीमकोर्ट का पतन भी हमने देखा है; उसी दौर में हमने यह भी देखा कि भारतीय प्रेस के मन में अपनी स्वतंत्रता का कोई मान नहीं है. काहिल, सामाजिक दायित्व के बोध से शून्य व बला की भ्रष्ट कार्यपालिका को एकाधिकारशाही की धुन पर नाचते भी हमने देखा. और फिर हमने इन सबको किसी हद तक पटरी पर लौटते भी देखा है जिसमें सबने एक-दूसरे की मदद की है.  

   जस्टिस कौल की सोच-समझ पर इन सारे अनुभवों की कोई छाप नहीं दिखाई देती है लेकिन वे यह कहते जरूर मिलते हैं कि ‘नेशनल ज्यूडिशियल एप्वाइंटमेंट कमीशन’ को खारिज कर सुप्रीम कोर्ट ने गलती की. वे कहते हैं कि भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश को निर्णायक वोट दे कर, हमें इस कमीशन को काम करने का मौका देना चाहिए था. संविधान की भावना है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में विधायिका का कोई हस्तक्षेप न हो. इसमें से कॉलिजियम पद्धति निकली. जस्टिस कौल की चिंता यह नहीं है कि जो कॉलिजियम व्यवस्था पूरी तरह सुप्रीमकोर्ट के हाथ में है, उसे सुधारने तथा पारदर्शी बनाने की दिशा में पर्याप्त काम क्यों नहीं किया गया जबकि वे तो स्वंय ही कॉलिजियम के सदस्य भी रहे हैं. तब उन्होंने इस व्यवस्था के साथ कैसा सलूक किया था ? अपने हाथ मजबूत कैसे बनें, इसकी जगह जस्टिस कौल की चिंता यह है कि सरकारों के साथ तालमेल कैसे बने! 

   अब चुनाव आयोग की जैसी संरचना संसद ने पारित की है, उस बारे में जस्टिस कौल क्या करेंगे ? अब तो चुनाव आयोग के चयन का काम, किसी सरकारी दफ़्तर में चपरासी नियुक्त करने जैसा बना दिया गया है. क्या ऐसा चुनाव आयोग संविधान की उस भावना का संरक्षण कर सकेगा जो कहती है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र व स्वायत्त होना चाहिए ? संसद का यह कानून यदि सुप्रीमकोर्ट पहुंचा तो वह इसकी समीक्षा किस आधार पर करेगा ? सरतोड़ बहुमत वाली सरकार का यह फैसला है, इस आधार पर या जिस संविधान के संरक्षण का दायित्व सुप्रीमकोर्ट के पास है, उसकी भावना के आधार पर ? हम जस्टिस कौल का जवाब जानना चाहते हैं. 

   सुप्रीमकोर्ट की सोच ऑपनिवेशिक हो और वह दायित्व लोकतंत्र के संचालन का उठाए, यह संभव है क्या ? जस्टिस कौल इसी जाल में उलझे हैं; और हम जानते हैं कि वे अकेले ऐसी उलझन में नहीं हैं. पूरी न्यायपालिका मानवीय कमजोरियों से ले कर बौद्धिक निष्क्रियता तक से घिरी हुई है. संविधान के प्रति वह निरपवाद रूप से प्रतिबद्ध नहीं रही है. उसकी कई परेशानियों में एक यह भी है कि संविधान नाम की यह किताब सिर्फ उसके पास नहीं है. भारत के हर नागरिक के पास वही किताब है जिसे पढ़ने व समझने की उसकी योग्यता लगातार विकसित हो रही है. इसलिए सुप्रीमकोर्ट हर वक्त जनता के कठघरे में खड़ा मिलता है. यह जो आपकी किताब है श्रीमान, वह सवा करोड़ से ज़्यादा भारतीय नागरिकों की थाती है. आप इसे देश के साथ मिल कर पढ़ेंगे तो ज़्यादा ठीक से समझेंगे. ( 31.12.2023)  

Sunday, 24 December 2023

क्या आप इस संसद को पहचानते हैं ?

 कांग्रेसमुक्त भारत बनाने की बदहवास होड़ को यही रास्ता पकड़ना था. देश भी तेजी से कांग्रेसमुक्त हो रहा है; संसद भी विपक्ष मुक्त हो गई है. संविधान में ऐसी मुक्ति की कोई कल्पना नहीं है. वहां तो संसदीय लोकतंत्र का आधार ही पक्ष-विपक्ष दोनों है. विपक्ष अपने कारणों से चुनाव न जीत सके तो वह जाने लेकिन जो और जितने जीत कर संसद में पहुंचे हैं, उन्हें पूरे अधिकार व सम्मान के साथ संसद में रखना सत्तापक्ष का लोकतांत्रिक दायित्व है. लोकसभा का अध्यक्ष इसी काम के लिए रखा जाता है कि वह संसदीय प्रणाली व सांसदों की गरिमा का रक्षक बन कर रहेगा. लेकिन हम यह नया भारत देख रहे हैं. इसमें भारत कहां है यह भी खोजना पड़ता है, इस नये भारत की संसद में विपक्ष कहां है, यह भी खोजना पड़ता है. एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में हम अपने अस्तित्व की ऐसी शानदार जगह पर आ पहुंचे हैं जहां से वह हर कुछ खोजना पड़ रहा है जिसकी दावेदारी तो बहुत हो रही है लेकिन दिखाई कुछ भी नहीं देता है. 

   ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि विपक्ष ने संसद चलने में इतनी बाधा पैदा की कि उन्हें दंडित करना पड़ा. 60 के दशक से पहले अध्यक्ष की अपील व झिड़की काफी होती थी  कि संसद के कामकाज में बाधा डालने वाला रास्ते पर आ जाता था. 60 के दशक में विपक्ष ने भी अपने अधिकारों की मांग शुरू की. उसका स्वर तीखा होता गया. 70 के दशक में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के मनमाने के सामने गूंगे रह कर विपक्ष को संसद से बाहर कर दिया था. लेकिन वह आपातकाल का संदर्भ था. 

   जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी, तब उसने संसद को अंटकाने को हथियार की तरह बरतना शुरू किया. संसद की ऐसी-तैसी करते हुए भाजपा के अरुण जेटली व सुषमा स्वराज्य ने ऐसे बर्ताव को विपक्ष का जायज हथियार बताया था. उस वक्त के अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने संसद को बंधक रखने जैसी प्रवृत्ति पर गहरा असंतोष व्यक्त किया था. लेकिन जब आप फिसलन पर पांव धरते हैं तब गिरावट आपके काबू में नहीं रहती है. 

   2014 के बाद से संसद का सामान्य शील भी खत्म हो गया और इस बार इसे विपक्ष ने नहीं, सत्तापक्ष ने खत्म किया. सबसे पहले तो प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी है कि हमारा विपक्ष देशद्रोही, राष्ट्रीय एकता का दुश्मन, भ्रष्टाचारी तथा विभाजनकारी ताकतों का सफरमैना है. विपक्ष के लिए जवाहरलाल से मनमोहन सिंह तक, किसी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं कहा था. अपार बहुमत से सरकार बनाए प्रधानमंत्री को विपक्ष को ऐसा कहने की जरूरत क्यों पड़ी ? इसलिए कि वे भयग्रस्त मानसिकता से घिरे थे; घिरे हैं. उन्हें पता है कि यह जो सत्ता हाथ आई है, उसके पीछे आत्मबल नहीं, तिकड़में हैं. तिकड़म का चरित्र ही यह है कि वह कब छल कर जाए, आपको पता भी नहीं चले. इसलिए रणनीति यह बनती है कि हर विपक्ष व हर असहमति को इतना गिरा दो, पतित कर दो कि उसके उठने की संभावना ही न बचे. विपक्ष, संवैधानिक संस्थाओं, स्वतंत्र जनमत, मीडिया, राज्य सरकारों आदि का ऐसा श्रीहीन अस्तित्व पहले कभी नहीं था. विपक्ष, जिसने 60-65 सालों तक देश चलाया है, अगर देशद्रोही, भारत का दुश्मन, विभाजनकारी ताकतों का सफरमैना तथा भ्रष्टाचारियों का सरदार होता, तो क्या आपको वैसा देश मिलता जैसा मिला ? आप चुनाव जीत सके, प्रधानमंत्री बन सके, यही इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष पर लगाए आपके आरोप बेबुनियाद हैं. विपक्ष दूध का धुला है, ऐसा कोई नहीं कहेगा लेकिन आपका दूध शुद्ध है, ऐसा भी तो कोई नहीं कहता है. 

   आप यह जरूर कह सकते हैं कि आजादी के बाद से अब तक विपक्ष ने जैसी सरकार चलाई, जैसा समाज बनाया उससे भिन्न व बेहतर सरकार व समाज हम बनाएंगे. आपको यह कहने का अधिकार भी है व उसका आधार भी है, क्योंकि आपने सारे देश में एकदम भिन्न एक विमर्श खड़ा कर अपने लिए चुनावी सफलता अर्जित की है. लेकिन देश आजाद ही 2014 में हुआ, ऐसा विमर्श बनाना व सत्ता की शक्ति से उसे व्यापक प्रचार दिलाना दूसरा कुछ भी हो, स्वस्थ्य लोकतंत्र की जड़ में मट्ठा डालने से कम नहीं है. अब यह राजनीतिक शैली दूसरे भी सीख चुके हैं. वे भी इतनी ही कटुता से स्तरहीन विमर्श को बढ़ावा दे रहे हैं. लोकतंत्र में सार्वजनिक विमर्श का सुर व स्तर सत्तापक्ष निर्धारित करता है, विपक्ष उसका अनुशरण करता है. संसद जिस स्तर तक गिरती है, देश का सार्वजनिक विमर्श भी उतना ही गिरता है. 

   संसद के दोनों सदनों में अध्यक्ष का पहला व अंतिम दायित्व एक ही है : सदस्यों का विश्वास हासिल करना तथा सदस्यों का संवैधानिक संरक्षण करना है. प्रत्यक्ष या परोक्ष पक्षपात आपकी नैतिक पकड़ कमजोर करता जाता है. 2014 से यह लगातार जारी है. यह सच छिप नहीं सकता है कि विपक्ष संख्याबल में कमजोर है जिसे आप बराबरी का अधिकार व अवसर न दे कर लगातार कमजोर करते जा रहे हैं. आपके ऐसे रवैये से विपक्ष का जो हो सो हो, सदन लगातार खोखला होता जा रहा है. वहां व्यक्तिपूजा, नारेबाजी, जुमलेबाजी तथा तथ्यहीनता का गुबार गहराता जा रहा है. ऐसी संसद न तो सदन के भीतर और न बाहर लोकतंत्र को मजबूत व समृद्ध कर सकती है. संविधान इस बारे में गूंगा नहीं है भले हम उसकी तरफ से मुंह फेर कर, निरक्षर व सूरदास बन गए हैं. संविधान के सामने सर झुकाना व संविधान का गला काटना इतिहास में कई बार हुआ है. 

   18 दिसंबर 2023 एक ऐतिहासिक दिन बन गया है. इस दिन से एक सिलसिला शुरू हुआ है जो अब तक कोई 150 सांसदों को दोनों सदन से बाहर निकाल चुका है. ये सारे निलंबन अनुशासन के नाम पर किए गए हैं. अचानक इतने सारे अनुशासनहीन सांसद कहां से आ गए ?   पहले से सब ऐसे ही थे तो अब तक सदन चल कैसे रहा था ? पहले से नहीं थे तो इन्हें अनुशासनहीन बनाने की स्थिति किसने पैदा की ? हर निलंबित सदस्य दोनों अध्यक्षों की क्षमता पर भी और उनकी मंशा पर भी सवाल खड़े करता है. संसदीय लोकतंत्र के प्रति आपकी प्रतिबद्धता कैसी है, यह कैसे आंकेंगे हम ? आपके व्यवहार से ही न !  विपक्ष के इतने सारे सदस्यों को निलंबित कर देने के बाद संसद में लगातार संवेदनशील बिल पेश भी किए जाते रहे, पारित भी किए जाते रहे, तो यह मंजर ही घोषणा करता है कि संसदीय लोकतंत्र का कोई शील आपको छू तक नहीं गया है.               

   150 के करीब विपक्षी सांसदों को निलंबित करने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं था, सत्तापक्ष का ऐसा तर्क मान भी लें हम तो संसदीय लोकतंत्र की भावना के अनुरूप यह तो किया ही जा सकता था कि इतने निलंबन के बाद संसद की बैठक स्थगित कर दी जाती और विपक्ष के साथ नये सिरे से विमर्श किया जाता कि अब संसद का काम कैसे चलेगा ? संसदीय लोकतंत्र का एकमात्र संप्रभु मतदाता है, जिसने वह संविधान रचा है जिससे आप अस्तित्व में आए हैं. उसने जैसे आपको चुनकर संसद में भेजा है वैसे ही उसने विपक्ष को भी चुन कर संसद में भेजा है. दोनों की हैसियत व अधिकार बराबर हैं और दोनों के संरक्षण की संवैधानिक जिम्मेवारी अध्यक्षों की है. इसलिए अध्यक्षों को यह भूमिका लेनी चाहिए थी कि भले किसी भी कारणवश इनका निलंबन हुआ हो, इनको चुनने वाले मतदाता का अपमान हम नहीं कर सकते, सो संसद स्थगित की जाती है और हम सर जोड़ कर बैठते हैं कि इस उलझन का क्या रास्ता निकाला जाए. ऐसा होता तो अब्दुल हमीद अदम की तरह दोनों अध्यक्ष इस परिस्थिति को एक सुंदर मोड़ दे सकते थे कि "शायद मुझे निकाल के पछता रहे हों आप, महफिल में इस खयाल से फिर आ गया हूं मैं". इसकी जगह ऐसा रवैया अपना गया कि जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा. क्या अब संसद में कौन रहेगा, इसका फैसला मतदाता नहीं, संसद का बहुमत करेगा ? यह संविधान की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन है. यह तो नई ही स्थापना हो गई कि विपक्षविहीन संसद वैध भी है और हर तरह का निर्णय करने की अधिकारी भी है. फिर संसद की कैसी तस्वीर बनती है और संविधान का क्या मतलब रह जाता है ? इसका जवाब इस संसद के पास तो नहीं है. ( 22.12.2023)

नये साल की दहलीज पर

 365 दिनों के रिश्ते को एक झटके में तो आप विदा नहीं कह सकते हैं न ! भले ही 2023 का कैलेंडर चुक जाए, ये 365 दिन हमारे साथ रहेंगे.  और यह भी याद रखने जैसी बात है कि इन 365 दिनों ने कम-से-कम 365 ऐसे जख्म तो दिए ही हैं जो अगले 365 दिनों तक कसकते रहेंगे. अपनी कहूं तो यह दर्द और यह असहायता मुझे भीतर तक छलनी कर देती है कि हम हैं और मणिपुर भी है; कि हम हैं और कश्मीर भी है; कि हम हैं और उत्तरप्रदेश भी है; कि हम हैं और सार्वजनिक जीवन की तमाम मर्यादाओं को गिराती व संविधान को कुचलती सत्ता की राजनीति भी है. मेरा दम घुटता है कि हम सब हैं और यूक्रेन भी है; कि हम सब हैं और गजा भी है; अफगानिस्तान भी है व म्यांमार भी है; पास का पाकिस्तान भी है, सुदूर के वे सब नागरिक भी हैं जिनका अपना कोई देश नहीं है. जो कहीं, किसी देश के नागरिक नहीं माने जा रहे हैं लेकिन हैं वे हमारी-आपकी तरह ही नागरिक; हमारी-आपकी तरह इंसान ही. इंसान के माप की दुनिया भी तो नहीं बना पाए हैं हम ! 

   तमाम बड़ी-बड़ी संस्थाएं, आयोग, ट्रस्ट और योजनाएं बनी पड़ी हैं कि इंसान को सहारा दिया जाए लेकिन आज दुनिया में जितने बेसहारा लोग ( सिर्फ रोहंग्या नहीं ! ) सड़कों पर हैं,  उतने पहले कभी नहीं थे. आज अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ जितने ज्यादा लोग संघर्षरत हैं, उतने पहले कभी नहीं थे. आज असहमति के कारण जितने लोग अपने ही मुल्क की जेलों में बंद हैं, उतने पहले नहीं थे. सरकार बनाने वाली जनता व उनकी बनाई सरकार के बीच की खाई आज जितनी गहरी हुई है, होती जा रही है, उतनी पहले कभी नहीं थी. यह तस्वीर कहीं एक जगह की नहीं, सारे संसार की है. लोकतंत्र का ‘लोक’ अपने ‘तंत्र’ से परेशान है; ‘तंत्र’ अपने ‘लोक’ को मुट्ठी में करने की बदहवासी में दानवी होता जा रहा है. हम यह भी देख रहे हैं कि कल तक प्रगतिशील नारों की तरफ आकर्षित होने वाले लोग, बड़ी तेजी से प्रतिगामी नारों- आवाजों की तरफ भाग रहे हैं; और वहां से मोहभंग होने पर फिर वापस लौट रहे हैं. यह सच में वापसी होती तो भी आशा बंधती लेकिन यह निराशा की वापसी है. 

   हत्या से ठीक पहले वाली रात यानी अपनी जिंदगी की आखिरी रात को गांधी ने भविष्यवाणी-सी जो बात संसदीय लोकतंत्र के लिए लिखी थी, वह दस्तावेज हमारे बीच धरा हुआ है. कभी लगता है कि दुनिया उस तरफ ही भाग रही है. गांधी ने लिखा था : संसदीय लोकतंत्र के विकास-क्रम में ऐसी स्थिति आने ही वाली है जब लोक व तंत्र के बीच सीधा मुकाबला होगा. क्या हम उस दिशा में जा रहे हैं? लेकिन यह मुकाबला निराशा या भटकाव के रास्ते संभव नहीं है. 2023 निराशा व अनास्था का यह टोकरा 2024 के सर धर कर बीत जाएगा और छीजते-छीजते मानव रीत जाएगा.    

   यह सब कहते हुए मैं भूला नहीं हूं कि आपाधापी के इस दौर में भी हर कहीं कोई ‘आंग-सू’ भी है. मेरी आंखों में वे अनगिनत लोग भी हैं जो फलस्तीनियों के राक्षसी संहार का विरोध करने इंग्लैंड, अमरीका आदि मुल्कों में सड़कों पर निकले हैं. मैं यह भी देख पा रहा हूं कि फलस्तीनियों व हमास में फर्क करने का विवेक रखा जा रहा है. मैं भूला नहीं हूं कि श्रीलंका के भ्रष्ट व निकम्मे सत्ताधीशों को सिफर बना देने वाला श्रीलंका का वह नागरिक आंदोलन भी इन्हीं 365 दिनों की संतान है, भले वह आज बिखर गया है. इन 365 दिनों में भारत समेत संसार की तथाकथित महाशक्तियां अपने स्वार्थ का तराजू लिए जैसी निर्लज्ज सौदेबाजी में लगी रही हैं, उस बीच भी म्यांमार में नागरिक प्रतिरोध बार-बार अपनी ताकत समेट कर सर उठा रहा है. इन 365 दिनों की चारदीवारी के भीतर बहुत कुछ मानवीय भी घट व बन रहा है जिसे समर्थन व सहयोग की जरूरत है. 

   2023 के अंतिम दिनों में, 12-28 नवंबर के दौरान मौत की सुरंग में घुटते 41 लोग जिस तरह 400 घंटों की मेहनत के बाद, जीवन की डोर पकड़ कर हमारे बीच लौट आए, वह भूलने जैसा नहीं है. यह चमत्कार, किसी नेता या सरकार ने नहीं किया, आदमी के भीतर के आदमी ने किया. यह कहना भी बेजा बात है कि मशीनों ने नहीं, मनुष्य के हाथों ने ही अंतत: उन श्रमिकों को बचाया. सच का सच यह है कि मशीनों ने जहां तक काम कर दिया था यदि उतना न किया होता तो इन श्रमिकों का बचना कठिन था; उतना ही सच यह भी है कि जहां पहुंच कर मशीनें हार गई थीं वहां से आगे का काम हाथों ने न किया होता तो इन श्रमिकों का बचना असंभव था. मशीनों व इंसानों के बीच यही तालमेल व संतुलन चाहिए. जब गांधी कहते हैं कि आदमी को खारिज करने वाली मशीनें मुझे स्वीकार नहीं हैं लेकिन आदमी की मददगार मशीनें हमें चाहिए, तो वे वही कह रहे थे जो सिल्कयारा-बारकोट सुरंग में फंसे श्रमिकों को बचाने में साबित हुआ.

   उन सबको सलाम जो यह कठिन काम अंजाम दे सके लेकिन उन सवालों को उसी सुरंग में दफना नहीं  दिया जाना चाहिए जिनके कारण यह त्रासदी हुई. दुर्घटनाओं के पीछे असावधानियां होती हैं. निजी असावधानी की कीमत व्यक्ति भुगत लेता है लेकिन जिस असावधानी का सामाजिक परिणाम हो, वह न छोड़ी जानी चाहिए, न भुलाई जानी चाहिए. उसका खुलासा होना चाहिए तथा असावधानी की जिम्मेवारी तय होनी चाहिए. कोई बताए कि खोखले दावों व जुमलेबाजियों के प्रकल्प के अलावा हमारे सरकारी प्रकल्पों को पूरा होने में इतना विलंब क्यों चल रहा है ? सुरंगों की ऐसी खुदाई में श्रमिकों को असुरक्षित उतारने वाले ठेकेदार व अधिकारी कौन थे ? उनको क्या सजा मिल रही है ? ऐसी खुदाइयों के जो सुनिश्चित मानक बने हुए हैं, यहां उनका पालन क्यों नहीं किया गया ? इसके जिम्मेवार कौन थे व उनकी क्या सजा तय हुई ? न धरती मुर्दा है, न पहाड़ ! इनके साथ व्यवहार की तमीज न हो तो आपको इनसे दूर रहना चाहिए. पूरा हिमालय हमारी मूढ़ता व संवेदनशीलता का पहाड़ बन गया है. उत्तरकाशी का यह हादसा भी भुला दिया जाएगा क्योंकि विकास के जहरीले सांप ने हमें बेसुध कर रखा है. तो 2024 का एक संकल्प यह भी हो सकता है : सांप से बचो तो हिमालय बचेगा भी और हमें बचाएगा भी.                     

   मैं यह भी देख रहा हूं कि समाज का अर्द्ध-साक्षर लेकिन बेहद सुविधा प्राप्त वह वर्ग, जो ‘न हींग लगे व फिटकरी लेकिन रंग आए चोखा’ वाली शैली में जीवन जीने के आसान, कायर रास्तों की खोज में रहता है; जिसने आजादी की लड़ाई में बमुश्किल कोई भूमिका अदा की लेकिन जो आजादी का भोग सबसे ज्यादा भोगता रहा है; जिसने हमेशा एकाधिकारशाही का मुदित मन स्वागत किया है; जिसने पिछले वर्षों में हिंदुत्व की लहर पर चढ़ कर, अपनी खास हैसियत का लड्डू खाने का सपना देखा है, अब मोहभंग जैसी स्थिति में पहुंच रहा है. उसे लगने-लगा है कि उसके हाथ मनचाहा लग नहीं रहा है. आजादी के तुरंत बाद ही सत्ता व स्वार्थ की जैसी आपाधापी मची उससे हैरान गांधी ने कहा था: समाज भूखा है यह तो मैं जानता था लेकिन वह भूख ऐसी अजगरी है, इसका मुझे अनुमान नहीं था. सांप्रदायिकता-जातीयता-एकाधिकारशाही हमेशा ही वह दोधारी तलवार है जो इधर-उधर, दोनों तरफ बारीक काटती है. जब तक दूसरे कटते हैं, हम ताली बजाते हैं; जब हम कटते हैं तब ताली बजाने की हालत में भी नहीं बचते हैं. अब कहीं, कोई ताली नहीं बची है. सर धुनने की आवाजें आ रही हैं. यह सन्निपात की स्थिति है और  सामाजिक सन्निपात हिटलरी मानसिकता को बढ़ावा देता है. 

   नये साल की दहलीज पर खड़ा हमारा देश अपनी निराशा से निकले, सन्निपात की आवाजों को सुने-समझे तो नये साल में कोई नई संभावना पैदा हो सकती है. संभावना सिद्धि नहीं है. उसे सिद्धि तक पहुंचाने के लिए मानवीय पुरुषार्थ का कोई विकल्प नहीं है. हमें याद रखना चाहिए कि चेहरे बदलने से, ‘म्यूजिकल चेयर’ खेलने से विकल्प नहीं बनते हैं. उनके पीछे गहरी समझ व संकल्प की जरूरत होती है. नया साल हमारे नये पुरुषार्थ का साल बने इस कामना के साथ हम पुराने 365 दिनों को विदा दें तथा नये 365 दिनों का स्वागत करें. 

 

मुश्किल से जो लब तक आई है एक कहानी वह भी है

और जो अब तक नहीं  कही  है एक  कहानी वह  भी है.

( 19.12.23)

Wednesday, 6 December 2023

5 राज्यों का चुनाव परिणाम - जादूगर का हैट : जादूगर का खरगोश

       कभी जादूगर का खेल देखा है ? हर बार जब वह हमारी आंखों के सामने, हमारी ही असावधानी की आड़ में हमें छल जाता है, तो यह जानते हुए भी कि यह जो सामने हुआ वह हकीकत नहीं, बारीक धोखा है, हम स्तंभित हुए जाते हैं. जादूगर का हर नया जादू हमसे कहता है कि ज्यादा सावधान हो कर बैठो और पकड़ सको तो मेरी चाल पकड़ो ! राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जादूगर के बेटे हैं लेकिन जादू दिखा कोई दूसरा रहा है. 

5 राज्यों में हुआ चुनाव ऐसी जादूगरी का नमूना है. अब जब चुनावी धूल बैठ चुकी है, घायल अपने घावों की साज-संभाल में लगे हैं, विजेता अपनी जीती कुर्सियां झाड़-पोंछ रहे हैं, हम जादू के पीछे का हाल देखने-समझने की कोशिश करें. 

मोदी-शाह ने जिस नई चुनावी-शैली की नींव 2014 से डाली है उसकी विशेषता यह है कि न उसका आदि है, न अंत ! यह सतत चलती है. चुनाव की तारीख घोषित हुई तब चुनावी-मुद्रा में आना, चुनाव की तारीख तक चुनाव लड़ना और फिर जीत-हार के मुताबिक अपना-अपना काम करना - ऐसी आरामवाली राजनीति का अभ्यस्त रहा है यह देश, इसके राजनीतिक दल ! मोदी-शाह मार्का  राजनीति इसके ठीक विपरीत चलती है. वह तारीखें देख कर नहीं चलती, नयी तारीख़ें गढ़ती है. चुनावी सफलता की तराजू पर तौल कर वह अपना हर काम करती है. इनके लिए चुनाव वसंत नहीं है कि जिसका एक मौसम आता है; यह बारहमासी झड़ी है. उनके लिए विदेश-नीति भी चुनाव है, यूक्रेन-फलस्तीन-गजा-इसरायल भी और पाकिस्तान भी चुनाव हैं; जी-20 भी चुनाव है; खेल व खिलाड़ी भी चुनाव हैं; चंद्रयान भी चुनाव है; सरकारी तंत्र व धन भी चुनाव के लिए है. उनके लिए जनता भी एक नहीं है, कई है जिनका अलग-अलग चुनावी इस्तेमाल है. 

मार्च 2018 में प्रधानमंत्री ने जनता का एक नया वर्ग पैदा किया था : विकास के लिए प्रतिबद्ध जिले ! 112 जिलों की सूची बनी. ये जिले ऐसे थे जिनके विकास की तरफ कभी विशेष ध्यान नहीं दिया गया था. जो बड़े राजनीतिक पहलवान हैं वे अपने व अपने आसपास के चुनाव क्षेत्रों के लिए सारे संसाधन बटोरने में मग्न रहते हैं. नये चुनाव क्षेत्रों का सर्जन किसी के ध्यान में भी नहीं आता है. मोदीजी ने अपनी रणनीति में इसे शामिल किया और 112 जिलों की सूची बना दी.  किसी ने नहीं समझा कि यह चुनाव की नई कांस्टीट्यूएंसी तैयार करने की योजना है. इन जिलों में से 26 जिले ऐसे थे जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान तथा तेलंगाना के 81 चुनाव-क्षेत्रों में फैले थे. ये सभी अधिकांशत: आदिवासी व अन्य पिछड़े समुदायों के इलाके थे. पहली बार इन इलाक़ों को लगा कि कोई है जो इनका अस्तित्व मानता ही नहीं है बल्कि उन्हें आगे भी लाना चाहता है. यहां विकास की क्या कोशिशें हुईं उनकी समीक्षा का यह मौका नहीं है. मौका है यह समझने का कि इन 81 चुनाव क्षेत्रों में भाजपा ने इस बार कांग्रेस को कड़ी मार लगाई. 2018 में जहां इन क्षेत्रों में भाजपा ने बमुश्किल 23 सीटें जीतीं थीं, 2023 में उसने यहां 52 सीटें जीती हैं - पिछले के मुकाबले दोगुने से ज्यादा. यह अपने लिए नये चुनावी आधार गढ़ने की योजना का एक हिस्सा था. स्मार्ट सिटी योजना, अलग-अलग समूहों को नकद सहायता की लगातार घोषणा आदि सब चुनाव के नये कारक हैं जिनके जनक मोदीजी हैं.  

इस बार 5 राज्यों के चुनाव को 2024 के बड़े चुनाव का पूर्वाभ्यास करार दिया गया था. कांग्रेस ने हिसाब यह लगाया कि कहां-कहां ‘लंबी सत्ता का जहर’ भाजपा को मार सकता है, कहां-कहां हमारी सरकार का ‘अच्छा काम’ हमें फायदा दे सकता है. कांग्रेस की नजर इस पर भी थी कि चुनाव का परिणाम ऐसा ही होना चाहिए कि ‘इंडिया’ में डंडा हमारे हाथ में रहे. यह गणित बुरा भी था, अपर्याप्त भी. जब एक जादूगर अपने हैट से नये-नये खरगोश निकाल कर दिखा रहा हो तब मजमा उस नट को कैसे देखता रह सकता है जिसे तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधने का एक ही खेल आता है ? और वह भी ऐसा कि संतुलन बार-बार डगमगाता भी रहता है !

कांग्रेस राष्ट्रीय दल है तो सही लेकिन उसके पास राष्ट्रीय सत्ता नहीं है; जो सत्ता है उसे भी वह संभाल नहीं पा रही है. उसके पास राष्ट्रीय पहचान व कद का एक ही नेता है जिसका नाम है राहुल गांधी ! राहुल गांधी की जानी-अनजानी बहुत सारी विशेषताएं होंगी लेकिन देश जो देख पा रहा है वह यह है कि वे अब तक राजनीतिक भाषा का ककहरा भी नहीं सीख पाए हैं; उनके पास वह राजनीतिक नजर भी नहीं है जो चुनावी विमर्श के मुद्दे खोज लाती है. कांग्रेस में दूसरा कोई पंचायत स्तर का नेता भी नहीं है. कांग्रेस के पास उसका कोई शाह, कोई योगी, कोई शिवराज, कोई हेमंता नहीं है; वह किसी को बनने भी नहीं देती है. 

दूसरी तरफ भाजपा है. उसके पास भी एक ही ‘राहुल’ है : नरेंद्र मोदी ! उनके पास हर मौसम की भाषा है, गिद्ध-सी वह राजनीतिक नजर है जो हर मुद्दे को अपने हित में इस्तेमाल करने की चातुरी रखती है. उनका कद इतना बड़ा ‘बनाया’ गया है कि उसे कोई छू नहीं सकता है. फिर नीचे कई नेता है जिनका अपना आभा मंडल है. इन सबके साथ है एक परिपूर्ण प्रचार-तंत्र, एक परिपूर्ण धन-तंत्र तथा एक परिपूर्ण मीडिया-तंत्र है. कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता कांग्रेसियों की नजर में भी पर्याप्त नहीं है; भाजपा का नेता भाजपाइयों की नजर में राजनीतिक नेता ही नहीं, अवतार भी है. दोनों का मुकाबला बहुत बेमेल हो जाता है.

‘इंडिया’ के घटक जानते हैं कि कांग्रेस के कारण ही वे ‘इंडिया’ हैं लेकिन वे जो जानते हैं, वह मानते नहीं हैं. इसलिए कोई बंगाल को तो कोई उत्तरप्रदेश को तो कोई तमिलनाड को तो कोई ‘बिहार’ को ‘इंडिया’ मान कर चलता है. इस तरह सब बिखरी मानसिकता से एक होने की कोशिश करते हैं. यह असंभव की हद तक कठिन काम है. 2014 से ले कर अबतक भाजपा की रणनीति यह रही है कि वह अपना राजनीतिक आधार बनाने व बढ़ाने के लिए वक्ती नफा-नुकसान का हिसाब नहीं करती है. कांग्रेस छोड़ने वाले मौसमी राजनीतिज्ञों को उसने अपने लोगों के ऊपर तरजीह दी और उनके बल पर अपनी सामाजिक स्वीकृति स्थापित की. उसका गठबंधन सबसे बड़ा बना लेकिन उसने यह भी सावधानी रखी कि कोई इतना बड़ा न हो जाए कि उसके सर पर हाथ रखने लगे. ‘इंडिया’ गठबंधन में ऐसी सावधान उदारता के दर्शन भी नहीं होते हैं. 

राजनीति संभव संभावनाओं का खेल है. 2023 फिर से बताता है कि संभव संभावनाओं में असंभव संभावना छिपी होती है. भाजपा वैसी संभावनाओं को पकड़ने की हर संभव कोशिश कर, असंभव को साधती आ रही है. दूसरे संभव को असंभव बनाने के खेल से बाहर ही नहीं आ पाते. क्या 2024 इसी कहानी को दोहराएगा? देखना है कि कौन नये खरगोश बना व दिखा पाता है.  

( 06.12.2023)   

Thursday, 23 November 2023

हम एक साथ बहुत कुछ हारे

 सभी दुखी हैं कि हम क्रिकेट का विश्वकप हार गए; मैं दुखी हूं कि हम क्रिकेट ही हार गए. मैच हारना और खेल हारना दो एकदम अलग-अलग बातें हैं. हार वक्ती होती है, पराजय का मतलब मन हारना होता है. हम मन से हारे हैं. 

अगर ऐसा न होता तो कोई कारण न था कि एक लाख से ज्यादा दर्शकों से भरा स्टेडियम इस कदर गूंगा बन जाता. जिन्होंने अपने नाम से इस स्टेडियम का नामकरण करवाया है वे लगातार बेमतलब दहाड़ने के लिए विख्यात हैं. लेकिन इस विश्वकप में हमने उन्हें एकदम गूंगा पाया. वैसे फाइनल का खेल तो अच्छा ही हो रहा था. उतार-चढ़ाव से गुजर रहा था. खेल तो ऐसा ही होता है. लेकिन फेंफड़े के जोर से विश्वगुरू बनने वालों की भीड़ को यह बताया नहीं गया था कि उसे जो तैयार पटकथा दी गई है, उससे अलग कुछ घटने लगे तो उसे क्या करना है. उसे जो नारे सिखाए गए थे, जो जयकारा रटाया गया था, वह सब यह मान कर कि हमारी जीत तो पक्की है. खेल से साथ खेल करने वालों का ऐसा ही हाल होता है. 

कोई बताएगा तो नहीं अन्यथा यह पूछा जाना चाहिए और इसका जवाब किसी को देना ही चाहिए कि मैदान के अलावा भारतीय टीम के कपड़ों का रंग किसने बदला व क्यों; और यह भी कि ऐसा करने वालों में कौन-कौन शरीक थे ? खिलाड़ियों को भगवा पहनाने की यह सोच उसी मानसिकता में से पैदा हुई है जो खेल की जीत को प्रधानमंत्री की और हार को खिलाड़ियों की जाति-धर्म का परिणाम बताती है. 

खिलाड़ी यदि भाड़े के टट्टू नहीं हैं तो उन्हें भी यह बताना चाहिए, कोच राहुल द्रविड़ को बताना चाहिए कि क्या उन्होंने क्रिकेट के इस भगवाकरण को खुशी-खुशी स्वीकार किया था ?  यदि असहमति उठी तो वह कहां दर्ज की गई ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड की किस बैठक में तय किया गया था कि विश्वकप का पहला व अंतिम मैच अहमदाबाद में होगा ? विश्वकप की नियंत्रक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्थान से इस बारे में कोई विमर्श हुआ ? अहमदाबाद को क्रिकेट का मक्का बनने का यह सरकारी प्रयास अत्यंत गर्हित है, क्योंकि इसके पीछे क्रिकेटप्रेमी नहीं, सत्ता है. दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम बनाने से क्रिकेट-संस्कृति पैदा नहीं होती है. मायावती सरकारी पैसे से अपनी मूर्तियां लगवाएं, हाथी गढ़वाएं या मोदी अपने नाम का स्टेडियम बनवाएं, सरकारी पैसों से जगह-जगह शेर का दहाड़ता हुआ चेहरा लगवाएं, जनता के पैसों से जी-20 का अशोभनीय आत्म-प्रचार करवाएं तो यह सब शर्मनाक अहंकार के प्रदर्शन से अधिक कुछ नहीं है. यह लोकतंत्र से बलात्कार है.        

भारत में किया गया यह पूरा आयोजन विश्वकप के दूसरे आयोजनों से बहुत अलग था क्योंकि इसमें खेल को राजनीति का हथियार बनाने की कोशिश की गई थी. यह क्रिकेट का विश्वकप कम, सत्ता का चुनाव-कप बन गया था और इसलिए पराजय से इसे उसी तरह सांप सूंघ गया जैसा चुनावी हार में होता है. सारे मैच कब, कहां और कैसे आयोजित किए जाएंगे, किन्हें माननीय अतिथि की तरह बुलाया जाएगा व किन्हें पूछा भी नहीं जाएगा, कैमरे को कब, क्या दिखाना है और क्या बिल्कुल नहीं दिखाना है, यह भी सत्ताधीश ही तै कर रहे थे. वीसा देने में ऐसी राजनीतिक मनमानी चली कि खेलने वाले देशों के दर्शक, विशेषज्ञ, पत्रकार आदि यहां आ ही नहीं सके. एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन पार्टी का आयोजन बना दिया गया. सब तरफ हम-ही-हम थे : जुटाई हुई भीड़ ! इसलिए खेलबाजी कम, भीड़बाजी ज्यादा थी. मुहम्मद सामी और  मुहम्मद सिराज के खेल ने सबकी बोलती बंद कर दी थी अन्यथा उन्हें निशाने पर रखने की कोशिशें कम नहीं हुई थीं. भीड़ ऐसी ही होती है. वह देखने नहीं, दिखाने आती है. ऐसी भीड़ न खेल समझती है, न खिलाड़ी !

प्रधानमंत्री जिस तरह अहमदाबाद का फाइनल देखने अवतरित हुए, वह हमारी हार की सारी कलई खोल गया. यदि भारत की मजबूत स्थिति होती तो वे एकदम शुरू में ही स्टेडियम में आ बैठते. कैमरा भी जानता कि उसे कब, कैसे व कितनी देर तक वहीं टिके रहना है जहां वे बैठे हैं. लेकिन यहां तो कैमरे ने जैसे आंखें ही बंद कर लीं. बहुत पहले अहमदाबाद पहुंच चुके प्रधानमंत्री को बता दिया गया था कि हमारी सारी योजना के बाद भी खेल में हमारी हालत बिगड़ी हुई है, सो प्रधानमंत्री तुरंत नहीं, घंटों बाद स्टेडियम पहुंचे. कब पहुंचे, कैमरे ने बताया भी नहीं. स्टेडियम में पहुंचाई गई भक्त-मंडली भी एकदम खामोश हो गई. आस्ट्रेलियाई कप्तान ने मैच से पहले ही कह दिया था कि भारतीय टीम के लिए चीखती भीड़ को खामोश कर देने जैसा आनंद हमारे लिए दूसरा नहीं होगा ! सो, वह सन्नाटा ही हमारी पराजित मानसिकता का गवाह बन कर स्टेडियम में गूंजता रहा. फिर लोगों के खिसकना भी शुरू कर दिया. किसी को यह आंकड़ा भी बताना चाहिए कि जब भारत हारा तब स्टेडियम में कितने लोग मौजूद थे ? जो तब थे वे ही क्रिकेट के लिए थे, बाकी जुटाए गए सब तो खिसक चुके थे. 

विजेता टीम को विश्वकप सौंपने प्रधानमंत्री जब आस्ट्रेलियाई उप-प्रधानमंत्री के साथ मंच पर पहुंचे तब तो इतनी हास्यास्पद स्थिति बनी कि खुदा खैर करे ! प्रधानमंत्री खेल-भावना का निर्वाह करने की शालीनता भी नहीं निभा सके, उनके ध्यान में यह भी नहीं रहा कि उनके साथ आस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री भी हैं जो विजेता-भाव से भरे हैं. अपना फूला मुंह लिए उन्होंने किसी तरह आस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस को कप थमाया और उल्टे पांव मंच से उतर चले. उन्होंने न जीत की बधाई में आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों से एक शब्द ही कहा, न उल्लास से उन्हें सराहा, न अपने समवर्ती उप-प्रधानमंत्री की गरिमा का ख्याल रखा. जब मन पराजित होता है तब वह इतना ही बेजायका हो जाता है. उनकी दूर जाती पीठ को देख कर कमिंस ने चेहरे पर वही भाव नाच उठा जो पस्त-पराजित को देख कर विजेता के चेहरे पर आता है. कहते हैं कि वहां से प्रधानमंत्री भारतीय ड्रेसिंगरूम गए व खिलाड़ियों से कहा कि वे जीत-हार भूल कर, अपने उम्दा खेल को याद करें, हम आपके साथ हैं. लेकिन यह सब खोखली, राजनीतिक चाल भर रह गयी क्योंकि इससे ठीक पहले आपने जो किया, वही आपकी चुगली खा रहा था. वैसे एक जवाब क्रिकेट बोर्ड को देना चाहिए कि प्रधानमंत्री भारतीय ड्रेसिंगरूम में कैसे प्रवेश पा गए ? नियम कहता है कि वहां खिलाड़ियों के अलावा किसी का भी प्रवेश नहीं होना चाहिए. नियम में प्रधानमंत्री अपवाद हैं, ऐसा नहीं लिखा है. कितना स्वाभाविक होता कि हमारी टीम स्वंय मैदान में आ कर प्रधानमंत्री से मिलती ! यह प्रधानमंत्री के लिए शानदार होता और  खिलाड़ियों के लिए पराजित मानसिकता से बाहर आने का मौका बन जाता. 

यह सब तो पराजित मन की बात हुई लेकिन हम खेल में भी हारे. टीम राहुल द्रविड़ ने पूरे अभियान में एक अजीब रवैया अपनाया जैसे जीत मुट्ठी में बंद कोई जुगनू है कि जो मुट्ठी खोलते ही उड़ जाएगा. यही राहुल द्रविड़ थे जिन्होंने कोच बनने के बाद से भारतीय टीम का सही स्वरूप सुनिश्चित करने के लिए कितने ही खिलाड़ियों को आजमाया, उनका बैटिंग-क्रम बदला, कितनी रणनीतियां बनाई-बदलीं, खिलाड़ियों की निश्चित भूमिकाएं तय कीं और उन पर जोर डाला कि वे वैसी ही भूमिका में खेलें. ऐसा सब बार-बार करने के बाद वे 15 खिलाड़ी छांटे गए जिनसे हर मैच की जरूरत के हिसाब से भारतीय टीम बनानी थी. लेकिन आस्ट्रेलिया के साथ हमारा पहला मैच जैसे ही संकट में पड़ा, और हम किसी तरह जीत सके, टीम राहुल को जैसे लकवा मार गया. उसने मैचों के हिसाब से कोई प्रयोग किया ही नहीं. जो टीम बन गई वही अंत तक बनी रही. वो तो हार्दिक पंड्या घायल हो गए तो मुहम्मद समी को टीम में जगह मिली. टीम जिस तरह लगातार जीतती गई, उसने सुरक्षित रहने का मानस बना दिया. आपने ‘टीम में कोई परिवर्तन नहीं’ का सूत्र भले बना लिया, स्थान, मैच, विपक्ष, खेल की मांग तो परिवर्तित होती रही. आपने कुछ भी बदलाव नहीं किया. अगर नाव को नदी के वेग से ही बहना था तो नाविक की जरूरत क्या थी ? 

अश्विन को पहले मैच में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मौका मिला और हमेशा की तरह उन्होंने बेहतरीन गेंदबाजी की. अश्विन अपनी शैली के विश्व के नायाब स्पिनर हैं. उनकी हर गेंद विकेट लेने ही लपकती है. इसलिए आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने उनके सामने हर अनुशासन का पालन किया. अश्विन के हाथ उस मैच में 1 विकेट लगा. इसके साथ ही अश्विन का खेल पूरा मान लिया गया जबकि हम देख रहे थे कि कुलदीप व जाडेजा दोनों उतना प्रभाव पैदा नहीं कर पा रहे हैं और विपक्ष धीरे-धीरे उन्हें पढ़ता भी जा रहा है. इससे बचने के लिए भी जरूरी था कि अश्विन-कुलदीप-जडेजा की तिकड़ी को खूब फेंटा जाता. फाइनल में आस्ट्रेलिया आया तो जरूरी था कि अश्विन को सिराज या जडेजा की जगह लाया जाता. अश्विन का बल्ला भी मजबूत है, तो यह प्रयोग किया ही जाना था. लेकिन टीम राहुल को अजीब-सी जड़ता ने जकड़ लिया. ऐसा ही सूर्यकुमार यादव के साथ हुआ. एक तरफ वे लगातार विफल हो रहे थे, तो दूसरी तरफ  उन्हें खेलने का मौका भी कम मिल रहा था. फाइनल में, जब हम कमजोर हालत में पहुंच चुके थे और जरूरत थी कि आस्ट्रेलिया का तिलस्म छिन्न-भिन्न किया जाए, सूर्यकुमार को बल्लेबाजी में ऊपर ला कर देखना ही चाहिए था. वे चल जाते तो आस्ट्रेलिया की पकड़ टूट जाती, नहीं चलते तो भी कुछ जाता नहीं हमारा. उन्हें जाडेजा के बाद बैटिंग के लिए भेजना कैसी रणनीति थी ? जाडेजा पहले आ कर कई बेशकीमती गेंदें खा कर लौट गए तथा सूर्यकुमार भी कुछ कर तो नहीं सके.   

ओपनिंग में आक्रामकता की रोहित-रणनीति बहुत मोहक थी लेकिन हर गेंद पर छक्का ! फाइनल में टॉस हारने के बाद भारत की रणनीति तो यही होनी चाहिए थी कि सावधानी से खेलते हुए ज्यादा-से-ज्यादा रन जमा करें हम ताकि उसके बोझ तले आस्ट्रेलियाई उसी तरह टूट जाएं जैसे न्यूजीलैंड टूटा था ! हमें पता था कि विश्वकप में भारतीय पारी की रीढ़ रोहित के बल्ले से बनी है. रोहित अपनी लय में खेल भी रहे थे, फिर उस अंधाधुंधी का मतलब क्या था जबकि उस ओवर में 10 से अधिक रन बन ही चुके थे. हम यह भी देख रहे थे कि आस्ट्रेलियाई भूखे चीते की तरह फील्डिंग कर रहे थे, तो विशेष सावधानी की जरूरत थी. रोहित के खेल में वह सावधानी नहीं दीखी. गिल जैसे शॉट पर आउट हुए वह टेस्ट स्तर का कोई बल्लेबाज फाइनल में मारेगा क्या ? खेल तो खेल है लेकिन उसके पीछे एक योजना होती है जो खेल का चेहरा बदल देती है. फाइनल में वह योजना सिरे से गायब थी. 

तो हम चौतरफा हारे ! हमें अब चौतरफा वापसी करनी होगी. पहले क्रिकेट लौटेगा, फिर सफलता भी लौटेगी. ( 23.11.2023)

Saturday, 18 November 2023

नीतीश कुमार का अपराध : नीतीश कुमार की माफी

 यह अपने-आप में अनोखा था. कभी देखा नहीं था कि कोई मुख्यमंत्री सदन में और सदन के बाहर भी अपनी कही किसी बात के लिए बार-बार इस तरह माफी मांग रहा हो कि उसे अपनी कही बात की सच में ग्लानि हो. जुमलेबाजी पर टिकी आज की राजनीतिक संस्कृति में, जुमलेवाली माफी और सच्ची माफी में जो फर्क होता है, वह पहचानने का विवेक अभी जिंदा है. इसलिए कह सकता हूं कि नीतीश कुमार को माफी मिल ही जानी चाहिए. जुमले उछालना, झूठ बोलना, गलत बोलना और अनगढ़ ढंग से बोलना, दो सर्वथा भिन्न बातें हैं. 

बोलने का सच यह है कि जब कभी हम बोलते हैं तो अपनी तरह से ही बोलते हैं लेकिन बोलते हमेशा दूसरे के लिए हैं. यदि सुनने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दूसरा कोई न हो, तो हम बोलें ही नहीं. बोलना बड़ी जिम्मेवारी है. बार-बार दोहराई लेकिन फिर भी ताजा-के-ताजा वह बात सौ टंच खरी है कि वाण से छूटा तीर व जुबान से निकली बात वापस नहीं आती है. इसलिए तो वाक्-संयम को गीता ने स्थितप्रज्ञ्य के लक्षणों में एक माना है.  राजनीति में स्थितप्रज्ञ्यता की न जगह मानी जाती है, न गुंजाइश !

नीतीश कुमार को उस रोज अपनी तरह से वह बात कहनी थी जो उन्होंने पहले कभी कही ही नहीं थी; उन्हें अपनी सरकार की सफलता के झंडे भी लहराने थे जैसे हर राजनीतिज्ञ लहराता है; उन्हें विपक्ष पर गहरा कटाक्ष कर उसे व्यर्थ के बकवासी भी साबित करना था. इस नट-लीला में वे फंस गए. तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधता नट संतुलन खो कर गिरता भी तो है न ! गिरना खेल के गलत होने का प्रमाण नहीं है; खिलाड़ी के चूकने का प्रमाण है. 

बोलना तीन तरह का होता है : गलत बोलना,  असभ्यता से बोलना तथा सर्वथा झूठ बोलना ! लोकतंत्र के संदर्भ में एक तीसरा प्रकार भी है : असंवैधानिक बोलना ! नीतीश कुमार ने उस रोज जो कहा व जिस तरह कहा वह दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है. भाषा की यह दिक्कत जगजाहिर है. वह यदि लोक-व्यवहार से गढ़ते-गढ़ते तराश न दी गई हो तो भोंढी लगती है और अपना अर्थ संप्रेषित करने में विफल होती है. कितनी तो आलोचना गांधीजी की हुई, होती रहती है कि उन्होंने संसदीय लोकतंत्र को ‘बांझ व वेश्या’ कह कर स्त्री-जाति को हीन बताया. गांधीजी की तरफ से ऐसे ‘अभद्र’ शब्द आएं, कई लोगों को तो यही नहीं पचा. किसी को इसमें गांधीजी की पुरुष मानसिकता के दर्शन हुए. गांधीजी ने कहा : मैं जो कहना चाहता हूं उसके लिए इससे अधिक मौजूं शब्द मिला नहीं मुझे ! मिल जाएगा तो बदल दूंगा ! यहां मेरी तरफ से नीतीश कुमार व गांधीजी की तुलना या साम्यता का मतलब न निकालें पाठक बल्कि भाषा की मर्यादा का एक उदाहरण मात्र समझें. 

नीतीश कुमार को साबित यह करना था कि उनकी सरकार के प्रयासों से जनसंख्या नियंत्रण का प्रयास सफल हुआ है. वे आंकड़ों से उसका प्रमाण भी देते रहे. विपक्ष उनका दावा मानने को तैयार नहीं था. इसलिए उन्हें विपक्ष को धूल-धूल कर देना था, उसे उसकी सही जगह दिखला देनी थी तो उनकी आक्रामकता बढ़ने लगी. वे बताने लगे कि जनसंख्या नियंत्रण में दिक्कत क्या-क्या आती है. पति या पुरुष कामुक हुआ जाता है और स्त्री उसके सामने बेबस हो जाती है. यह सब बताने में समर्थ भाषा हमने विकसित ही नहीं की है, क्योंकि यह सब ‘गुप्त ज्ञान’ के भीतर आता है. हमारे समाज में यौन-शिक्षा का जैसा हाल है वह नीतीश कुमार की देन नहीं है बल्कि हम सबकी तरह नीतीश कुमार भी उसके शिकार हैं. हमारे यहां यौनिक संदर्भ की भाषा विकसित ही नहीं हुई है क्योंकि उसे हमने हमेशा अत्यंत निजी, किसी हद तक गुप्त विषय ( गुप्त रोग ! ) माना है. इसमें अंग्रेजी का हमारा अत्यंत सीमित  (व विकृत !) ज्ञान हमारा सहारा बनता है. अंग्रेजी का हमारा अज्ञान हमें वैसा कुछ कह कर निकल जाने की सुविधा देता है जिसे हम ठीक से समझते भी नहीं है. ‘चुम्मा’ कहो तो अशिष्ट लगता है, ‘चुंबन’ कहो तो कालिदासीय क्लिष्टता लगती है, तो हम ‘किस’ कहकर निकल जाते हैं जिसमें न मिठास मिलती है, न अपना कोई संदर्भ मिलता है लेकिन अंग्रेजी में है तो भद्र ही होगा, ऐसा जमाना मानता है, तो हम भी मानते हैं.  

नीतीश कुमार को कहना यह था कि लड़की पढ़ी-लिखी, जानकार होगी, जैसाकि हमारी सरकार उसे बनाने में लगी है, तो वह अपने पति की कामुकता को नियंत्रित कर सकेगी, उसे गर्भ न रहने के प्रति सचेत कर सकेगी. इसे आप भदेशपन से कहेंगे तो नीतीश कुमार का हाल होगा आपका, अंग्रेजी में ‘विद्ड्रॉल’ कहेंगे तो भद्रता मान कर आपको बरी कर दिया जाएगा. जब नीतीश कुमार आक्रामक हास्य की मुद्रा में यह सब कह रहे थे तो वे समझ रहे थे कि वे कुछ अटपटा कह रहे हैं लेकिन यही तो राजनीति है; और राजनीति ऐसी सावधानी कब रखती है ! वह तो हमेशा कह देने की बाद की प्रतिक्रिया से, अपने कहे की सार्थकता या निरर्थकता आंकती है और अपना अगला कदम चुनती है.  यही नीतीश कुमार ने भी किया. 

उनकी खुली सार्वजनिक माफी ही यह बताती है कि जो कुछ कहा उन्होंने वह इरादतन महिलाओं का अपमान करने, यौनिकता को राजनीतिक हथियार बनाने या अपनी यौन कुंठा को तुष्ट करने का जायका लेने जैसा नहीं था. वे इस नाहक के विवाद और अपनी रौ में बह जाने के परिणाम से त्रस्त व्यक्ति की ईमानदार माफी थी. स्त्री-वर्ग के रूप में बिहार की महिलाओं को नीतीश कुमार ने सशक्त ही किया है, उनमें उत्साह भरा है, उनकी उमंगों को अपनी व्यवस्था का आधार भी दिया है. मुझे अंदाजा नहीं है कि उनके मंत्रिपरिषद में यौन अपराधियों को कितनी जगह मिली हुई है याकि ऐसे अपराधियों के प्रति उनका रवैया कैसा है.  यदि यह आंकना हो तो प्रधानमंत्री समेत केंद्रीय मंत्रिमंडल का चेहरा अच्छा नजर नहीं आएगा. लेकिन इस आधार पर नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग याकि दूसरे किसी को सरकार की बागडोर सौंप देने की मांग अतिवादी मांग है. मांगने करने वालों को यह समझना चाहिए कि  यह अपराध से कहीं बड़ी सजा देने की अविवेकी भूल होगी. व्यापक सार्वजनिक भर्त्सना के रूप में उन्हें अनगढ़ अभिव्यक्ति की वह सजा मिल चुकी है जो किसी राजनेता के लिए सबसे बड़ी सजा होती है. अब आगे की नितीश कुमार जानें. लेकिन कुछ तो हम भी जानें. हम सब बड़ी सावधान सावधानी बरतें कि किसी भी हाल में, कैसी भी परिस्थिति में हमारी सार्वजनिक अभिव्यक्ति यौनिक गालियों या प्रतीकों का सहारा न ले. ऐसी हर अभिव्यक्ति औरत का अपमान करती है; ऐसी हर अभिव्यक्ति यह भूल जाती है कि यौनिकता स्त्री-पुरुष दोनों की साझा विरासत है. हम जब ऐसे अपशब्दों में बात करते हैं तो खुद को भी, अपनी महिला को भी और सारी महिला साथियों को भी क्षुद्रतर साबित करते हैं. नीतीश-प्रसंग यदि हमें इतना सचेत कर दे तो हमें उन्हें माफ तो कर ही देना चाहिए.  ( 17.11.2023)