Saturday, 30 June 2018

चुनाव अायोग को नींद कैसे अाती है


अभी-अभी अाए 14 चुनाव परिणामों ने ( 10 विधानसभा के अौर 4 लोकसभा के ) कितने चेहरों को नंगा कर दिया है अौर कितने पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी है ! भारतीय दलीय राजनीति की यह अांतरिक सुनामी है. 2018 में 2019 का ऐसा नक्शा बनेगा, इसकी उम्मीद न नरेंद्र मोदी मार्का भारतीय जनता पार्टी को थी, न अपनी जोड़-तोड़ का नक्शा बनाते विपक्ष को थी. अब चुनावी महाभारत में अामने-सामने खड़ी दोनों सेनाअों के महारथियों के पास खासा वक्त है कि वे अपनी लड़ाई अौर फौज का नया नक्शा बनाएं. लेकिन इन चुनावों का एक संकेत अौर भी है जिसे न समझ पाना या जिसकी उपेक्षा करना हमें बहुत भारी पड़ सकता है क्योंकि चुनावों में लड़ती तो पार्टियां हैं लेकिन कसौटी पर हमेशा चुनाव अायोग होता है.  

महाभारत के महारथी कर्ण के रथ का चक्का उनके अभिशाप की कीच में ऐसा फंसा था कि उनकी जान ले कर ही बीता. हमारे चुनावी महाभारत के ‘कर्ण’ हमारे चुनाव अायोग की विश्वसनीयता का चक्का, उसकी अपनी कमजोरियों की कीच में ऐसा फंसता जा रहा है कि कहीं उसे ले न डूबे ! हमारा चुनाव अायोग हमारे लोकतंत्र की मशीन का एक पुर्जा मात्र नहीं है, वह हमारे संसदीय लोकतंत्र का ऐसा प्रहरी है जिसकी स्वतंत्र हैसियत है. यह हम तब तक अच्छी तरह जान व समझ नहीं पाये थे जब तक हमें मुख्य चुनाव अायुक्त के रूप में टी.एन. शेषन नहीं मिले थे. भले उनकी खोपड़ी कुछ उल्टी थी लेकिन चुनाव अायोग को सीधा खड़ा करने का काम उन्होंने जिस तरह किया उस तरह पहले किसी ने नहीं किया था. शेषन साहब ने हमारे चुनाव अायोग को खड़ा होने लायक पांव भी दिया अौर उसकी रीढ़ भी सीधी की. लेकिन सवाल है कि उनके बाद क्या हुअा ? उनके बाद भी चुनाव अायोग तो है, मुख्य चुनाव अायुक्त भी हैं अौर दूसरे अायुक्तों की भीड़ भी बढ़ी है लेकिन लगता है कि अायोग का शेषन शेष नहीं बचा है. 

अभी-अभी एक खबर अा कर बीत गई अौर बहुत हद तक अचर्चित ही रह गई लेकिन जिसे पहले पृष्ठ पर, पहली सुर्खी मिलनी चाहिए थी. खबर यह थी कि हमारे चुनाव अायोग के सभी उपलब्ध पूर्व मुख्य चुनाव अायुक्तों की एक सम्मिलित बैठक हुई- मतलब की सारे ‘कर्ण’ मिल बैठे. ऐसा संभवत: पहली बार ही हुअा. 9 पूर्व मुख्य अायुक्तों ने, वर्तमान मुख्य चुनाव अायुक्त अोमप्रकाश रावल तथा उनके दोनों सहयोगियों के साथ चर्चा की. अायोग के सबसे वरिष्ठ सदस्य  सुनील अरोरा भी इसमें शामिल थे जो चाहेंगे तो 18 दिसंबर 2018 को भारत के मुख्य चुनाव अायुक्त बन जाएंगे जिनकी देखरेख में 2019 का अाम चुनाव होगा. 

इस विमर्श की जितनी खबरें अब तक बाहर अाईं हैं उनसे पता चलता है कि सारे ‘कर्णों’ ने जिन दो बातों की बावत अपनी चिंता व्यक्त की, वे थे वर्तमान चुनाव अायोग की अनुभवहीनता अौर इसकी निष्पक्षता पर गहरी शंका ! भारत के भावी मुख्य चुनाव अायुक्त सुनील अरोरा इसी वर्ष नई पोस्टिंग पर चुनाव अायोग में अाए अाइएएस अधिकारी हैं. वे जब 2019 का अाम चुनाव करवाएंगे तब उनके पास मात्र 10 विधानसभाअों के चुनाव करवाने का अनुभव होगा. उस रोज के विमर्श में मौजूद सारे मुख्यायुक्तों ने एक स्वर से कहा कि इतना-सा अनुभव नाकाफी है राष्ट्रीय चुनाव संपन्न करवाने के लिये. दूसरी चिंता चुनाव अायोग की निष्पक्षता पर पैदा हुई राष्ट्रीय शंका के बारे में थी.  इन दोनों चिंताअों के बारे में देश क्या कहता व करता है, 2019 के चुनाव की कुंडली उसी से लिखी जाएगी. यह खतरे की घंटी है. 

चुनाव की ताकत यह है कि उसके गर्भ से हमारे संसदीय लोकतंत्र के खिलाड़ी पैदा होते है. चुनाव अायोग इसमें मिडवाइफ या नर्स या दाई का काम करता है.  मिडवाइफ या नर्स या दाई कच्ची हो तो जच्चा अौर बच्चा दोनों की जान खतरे में पड़ जाती है. यह काम नीमहकीमों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. तब सवाल उठता है कि हमारे चुनाव अायुक्तों को किस अाधार पर चुना जाता है ? नौकरशाही के बड़े पुर्जे इस मशीन में लगा देने से बात नहीं बनती है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जिनकी अास्था हो अौर जिनमें अावश्यक तटस्थता भी हो वैसे परखे लोगों की जरूरत अायोग में होती है. इसकी कोई सुनिश्चित व्यवस्था बननी चाहिए. 

यह तो व्यक्तियों की बात हुई. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू व्यवस्था का है. चुनाव अायोग के पास संवैधानिक ताकत चाहे जितनी भी हो, उसकी असली ताकत उसकी विश्वसनीयता है. हमारे संविधान निर्माताअों ने अनपढ़, गरीब, अशिक्षित अौर अौरत-मर्द का फर्क किए बिना सबके हाथ में एक, अौर केवल एक वोट दे कर ईश्वरीय विधान के बराबर का काम किया. चुनाव अायोग की जिम्मेवारी है कि वह इस विधान की अात्मा को हर हाल में बचाए. जाति-धर्म-पैसा-डंडा सबका जोर लगा कर इसकी अात्मा का हनन होता रहा है अौर कानून के रास्ते इसका मुकाबला करने की कोशिशें भी चलती रही हैं. पहले से स्थिति में सुधार भी हुअा है. लेकिन हमने पाया कि कागज का वोट लूटना भी अासान था, उसकी गिनती में गड़बड़ी भी अासान थी, उसमें होने वाली कागज की भयंकर खपत पर्यावरण का संकट गहरा भी करती थी. इन सारे सवालों का जवाब बन कर इवीएम मशीनें सामने अाईं. इन मशीनों को खरीदने में बहुत सारा पैसा लगा, शेषन साहब ने मतदाता पहचान पत्र बनवाने में बेहिसाब पैसा फूंका लेकिन चुनावी प्रक्रिया में भरोसा बनाने अौर बढ़ाने का सवाल इतना बुनियादी था कि हमने यह सारा बोझा उठाया. मशीनें तटस्थ होती हैं, यह भोली मान्यता ‘शाइनिंग इंडिया’ की विफलता के बाद, सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण अाडवानी ने तोड़ी. उसके बाद से लगातार ऐसा होता रहा कि इवीएम मशीनों की तटस्थता शक के दायरे में अाती गई है. मशीन तटस्थ हो सकती है लेकिन उसके पीछे बैठा अादमी नहीं, यही शंका थी जिसे चुनाव अायोग को निर्मूल करना था. वह इसमें विफल होता रहा. उसने खुद ही ऐसा माहौल बना दिया मानो मशीनों की निष्पक्षता पर सवाल उठाना अायोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना है. इसने मामला अौर बिगाड़ दिया. 

कई जगहों पर, कई चुनाव परिणाम ऐसे अाये जिनने भी शक गहरा कर दिया. कोई भी बटन दबाएं हम, वोट किसी एक खास पार्टी के पक्ष में दर्ज होता है, ऐसे अनेक उदाहरण मिले. यह तकनीकी गड़बड़ी से ही होता हो तो भी यह भरोसे को जड़ से हिला देता है. अभी कैराना-पालघर अादि के उप-चुनावों में दोनों ही मशीनों का जैसा कबाड़ा हुअा, उसका जवाब अगर चुनाव अायोग यह देता है कि कितनी फीसदी मशीनें गड़बड़ हुईं तो यह बचकाना जवाब है. जिन चुनावों का इतना राजनीतिक महत्व था कि प्रधानमंत्री से लेकर कई भावी प्रधानमंत्री उसमें पिले पड़े थे, उसकी मशीनों में ऐसी गड़बड़ी हो तो श्रीमान, इसे अापकी बर्खास्तगी का अाधार बनाया जा सकता है. 

चुनाव अायोग यह भूल गया कि राजनीतिक दल भले अपना फायदा या नुकसान देख कर इवीएम का समर्थन या विरोध करते हैं, अाम मतदाता तो अापकी प्रक्रिया अौर अापके परिणाम में भरोसा खोजता है. इवीएम मशीनें वह भरोसा खो रही हैं. उसमें अब अापने एक वह वीवीपीएटी मशीन भी जोड़ दी है जो कागज की रसीद भी निकालती है. मतलब अापने यह तो कबूल कर ही लिया कि इवीएम मशीनें गड़बड़ी या विफलता से परे नहीं हैं. इसे विश्वास की एक अौर बैसाखी देना जरूरी है. तो हुअा ऐसा कि इन मशीनों के कारण चुनाव खर्च तो बेहिसाब बढ़ ही गया है, कागज की बर्बादी रुकने का संतोष भी जाता रहा. चुनाव कितने चरणों में कराए जा रहे हैं, अब कोई इसकी चर्चा नहीं करता है लेकिन उससे खर्चा बहुत बढ़ता है अौर विश्वसनीयता नहीं बढ़ती है, इसकी चर्चा तो होनी ही चाहिए. दुनिया के अधिकांश मुल्क ऐसी मशीनों से चुनाव नहीं कराते, तो क्यों, इसका अध्ययन भी देश के सामने रखा जाना चाहिए. यह सब इसलिए कि चुनाव अायोग के पास जो एकमात्र पूंजी है - मतदाता का विश्वास - वह दांव पर लगा है; अौर यह भरोसा टूटा तो चुनाव अायोग किसी भुतहा महल में बदल जाएगा. 


मैं उनमें नहीं हूं कि जो कहते हैं कि हमें पुराने मतपत्रों वाले चुनाव अौर गिनाव पर लौट जाना चाहिए. लेकिन मैं उनमें हूं जो मानते हैं कि इवीएम की इस प्रणाली की बार-बार जांच-परख होनी चाहिए; मतदाताअों की शंकाअों के समाधान का हर संभव रास्ता पारदर्शी तरीके से अपनाया जाना चाहिए. अौर एक सच, जो चुनाव अायोग को हमेशा याद भी रखना चाहिए अौर दोहराते भी रहना चाहिए वह यह कि उसकी विश्वसनीयता इवीएम मशीनों से नहीं बनती है. वह तो बनती है चुनाव में उतरने वाले हर दल व हर अादमी के प्रति उसकी एक सी तटस्थता से ! इसलिए चुनाव अायोग बने तो कबीर बने, न कि ए.के. जोति; अौर सारे देश से कबीर की तरह कहे भी अौर देश देख भी : ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर ! ( 02. 06.2018) 

घर खाली करो



सभी कह रहे हैं कि देश की हवा बदलती-सी लगती है। जरा देखें हम कि कौन-कौन सी हवा, कहां-कहां बदल रही है। 
उत्तरप्रदेश में घर खाली करने की हवा बहती लग रही है।  जिनको लगता था कि जब तक ऊपर वाला ही न बुला ले तब तक वे अपने घर से नहीं जाएंगे, न्यायालय ने उन सबको घर खाली करने का निर्देश दिया है। अौर अाप देखिए कि घर भी वह कि जो कभी घर था ही नहीं, संविधान से मिला डेरा था; मुंबइया जिसे खोली कहता है! खोली ११ महीनों के लिए मिलती है, यह घर बहुत हुअा तो पांच सालों के लिये मिलता है। लेकिन भाईलोगों ने कभी नहीं माना कि संविधान कभी अपने पर भी लागू करने के लिए होता है। तो इन सबने दिल्ली से ले कर इंफाल तक अौर तिरुअनंतपुरम् से ले कर कश्मीर तक एक ही हवा बहाई कि न कुर्सी छोड़ेंगे, न घर; न भत्ता छोड़ेंगे, न पेंशन; अौर जब चाहेंगे खुद ही अपनी वेतनवृद्धि कर लेंगे। अाखिर तो संसद अौर विधानसभा सार्वभौम है, कौन हमें रोक लेगा !! लेकिन संविधान ने ऐसी अपरिवर्तनीय स्थिति किसी को नहीं दी है। वह तो हमेशा नये को अौर नयों को अाजमाने का दस्तावेज है। 

कहां लिखा है संविधान में कि एक बार सांसद या विधायक बनने की तिकड़म सफल हो गई तो बस पेंशन-भत्ता-जमीन अौर हवा का टिकट अौर लेटरहेड पर ‘पूर्व सांसद या विधायक’ लिखने की अाजादी मिल जाती है? कहां कहता है संविधान की जनता के पैसों से सांसद-विधायक निधि बनाअो अौर फिर सड़क बनाअो कि नाला कि मेनहोल का ढक्कन, सब पर अपने नाम का एक भद्दा-सा बोर्ड टांग दो कि फलां ने फलां निधि से यह बनवाया है। बिड़ला मंदिर देखा है न ! उसकी हर दीवार या ईंट पर लिखा मिलता है कि फलां सेठजी ने अपनी फलां धर्मपत्नी की याद में इतने रुपयों का दान दे कर इसे बनवाया है। भगवान के मंदिर को ऐसा बाजार बना दिया हमने अौर लोकतंत्र के मंदिर को सांसदों-विधायकों के मॉल में बदल दिया । यहां सबकी दूकानें हैं अौर जिससे जहां भी संभव हुअा है, उसने वहां अपना नाम लिखवा लिया। कोई पूछे की बंधु, न पैसा अापका, न कुर्सी अापकी, न यह जगह अापकी तो फिर यहां नाम अापका कैसे ? किसी ने कभी यह सोचा क्या कि अपने लेटरहेड पर जब अाप ‘पूर्व’ लिखते  हैं तब अाप संसार को क्या बतला रहे होते हैं ? ‘पूर्व या भूतपूर्व’ लिखने का मतलब यह है कि अाप दुनिया को बतला रहे हैं कि मैं हारा हुअा, पराजित, रिजेक्टेड माल हूं। इसमें क्या गौरव ? लेकिन पराजित सांसदों के लेटरहेड की तो छोड़िए, घर की नामपट्टी पर भी लिखा देखा है मैंने - भूतपूर्व सांसद ! राजनीति में इन पूर्वों की दलाली चलती है। न्यायालय की नजर इनकी तरफ गई अौर उसने सब पूर्वों को छोड़ कर, पूर्व मुख्यमंत्रियों से बात शुरू की : घर खाली करो! िजस अधिकार के कारण घर मिला था वह अधिकार ही जब जनता ने छीन लिया तो अाप घर कैसे रख सकते हैं ? सवाल छोटा-सा पूछा अौर लखनऊ में कितनी ही जानें सांसत में पड़ी हैं। यादव खानदान, मायावती, भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह सबके धरों पर ग्रहण लग गये हैं ! अौर अाप राजनीतिक नैतिकता का स्तर देखिए कि मायावती ने अपने घर को रातोरात कांशीराम स्मारक में बदल दिया तो पिता मुलायम सिंह अौर पुत्र अखिलेश सिंह ने अपनी हैसियत अौर अपनी सुरक्षा के अनुकूल व्यवस्था करने के लिए अदालत से मात्र दो साल की मोहलत मांगी है। कोई पूछे कि जब से अाप पद से हटे तब से अाज तक का समय अापको दी गई मोहलत ही तो थी, तब क्या जवाब होगा इनका? न्यायालय को कहना चाहिए कि अाप अगर अब भी उसी घर में रहना चाहते हैं तो राज्य सरकार से अनुमति प्राप्त कर लें अौर बाजार भाव से उसका किराया, सभी किस्म के कर अादि भरें अौर किरायेदार की तरह रहें। मायावतीजी को किसने बताया कि सार्वजनिक भवनों को अाप जब चाहें तब निजी स्मारकों में बदल सकती हैं ? स्मारक कांशीरामजी का हो कि महात्मा गांधी का, सबकी एक कानूनसम्मत व्यवस्था बनी हुई है जिसका पालन जरूरी है। अब तक उसका पालन नहीं हो रहा था तो इसका मतलब यह नहीं कि अागे भी न हो। अब मायावतीजी चाहें तो वे भी राज्य सरकार से अनुमति ले कर एक वैध किरायेदार की तरह उस घर में रहें अौर जब तक यह घर उनके पास किराये से है, वे उस पर कांशीराम स्मृति संस्थान का बोर्ड भी लगाये रख सकती हैं। 


लेकिन एक सवाल ऐसा भी है कि जिसका जवाब अदालत को भी देना बाकी है। यह गाज केवल उत्तरप्रदेश के ही पूर्वों पर क्यों गिरी है ? सारे देश का एक ही अालम है। भले अदालत के सामने यह याचिका उत्तरप्रदेश के मामले से अाई हो, सर्वोच्च न्यायालय किसी राज्यविशेष तक  सीमित क्यों रहे ? उसे सारे देश के लिए एक ही संहिता घोषित करनी चाहिए। ऐसी अभागी स्थिति बनी है देश के लोकतंत्र की कि यहां राजभवन से ले कर सड़क की सफाई तक में अदालत को दखलंदाजी करनी पड़ रही है। हमारे सारे ही राजनीतिक दल लोकतंत्र के संदर्भ में सिरे से अप्रासांगिक हो चुके हैं। उनका लोकतंत्र येनकेणप्रकारेण सत्ता पाने अौर फिर उस सत्ता पर अपना काबू बनाये रखने की तिकड़म करने से अधिक अौर अलग कुछ नहीं रह गया है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका लोकतंत्र के संरक्षक की बन जाती है अौर यह भूमिका उसे संविधान ने ही सौंपी है। इसलिए उत्तरप्रदेश का ‘घर खाली करो’ अभियान सारे देश पर लागू होना चाहिए अौर कहीं, किसी भूतपूर्व को घर या कार्यालय या भवन या स्मृति संस्थान पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है, यह बात हमेशा-हमेशा के लिए स्थापित की जानी चाहिए अौर उसे लागू भी कराया जाना चाहिए। ( 31.05.2018) 

नौ दिन चले अढ़ाई कोस



मुझे अाज लालकृष्ण अाडवाणी अौर मुरलीमनोहर जोशी एक साथ याद अा रहे हैं. मैंने इन दोनों की राजनीति को कभी, किसी सकारात्मक कारण से याद नहीं किया है लेकिन दोनों ने एक-एक बार राजनीति से बाहर जा कर ऐसा कमाल किया है कि कोई भी वाह कह उठे. 

पहली बात १९७७ की है. इंदिरा गांधी का अापातकाल खत्म हुअा था अौर दिल्ली में जनता राज अाया था. सभी, सब तरफ उन सबकी बातें करते थे जो उस अंधेरे दौर में, अंधेरे की पक्षधरता करते रहे थे. ऐसी ही काली भूमिका भारतीय प्रेस की भी थी जो अब ‘मीडिया’ कहलाता है. लालकृष्ण अाडवाणी ने, जो जनता पार्टी की सरकार में प्रेस मंत्री बने थे, प्रेस की तब की दयनीय, कायर भूमिका के बारे में एक गजब की बात कही-“ उनसे कहा तो गया था कि झुको लेकिन वे घुटनों के बल रेंगने लगे !” उस दौर में प्रेस की भूमिका के बारे में इससे अच्छा अौर मौजूं कुछ कहा ही नहीं जा सकता था. अाज के अाईने में फिर से मीडिया वैसा ही कायर अौर भयभीत दिखाई दे रहा है. लेकिन बात मुझे मुरलीमनोहर जोशी की करनी है.

नरेंद्र मोदी की सरकार के ४ साल पूरे होने पर, जैसी की रवायत बनी हुई है, सब तरफ ४ सालों का अाकलन करवाया जा रहा है. अाकलन करने अौर करवाने का जो फर्क है, वह यहां भी देखा जा सकता है. तो कभी इलाहाबाद में प्रोफेसर रह चुके भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता ( अौर संभवत: इस सरकार के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य ) मुरलीमनोहर जोशी जी से पूछा किसी ने कि अगर अाप परीक्षक हों तो इस सरकार को कितने नंबर देंगे ? जोशीजी ने जवाब में सीधा छक्का ही जड़ दिया ! वे बोले : अरे, परीक्षा की कॉपी में कुछ लिखा हो तब तो नंबर देने की बात अाती है ! कोरी कॉपी हो तो कोई कितने नंबर दे अौर कितने काटे ? सच, नरेंद्र मोदी सरकार के ४ सालों की इससे बेहतर समीक्षा हो ही नहीं सकती है. मैं मानता हूं कि इन दो अाकलनों के लिए, इन दोनों नेताअों को पद्मश्री से भारत-रत्न के बीच जो भी उपलब्ध हो, वह दिया जाना चाहिए. 

४ सालों में जिस सरकार ने परीक्षा की अपनी कॉपी का हर पन्ना भर रखा हो अौर फिर भी वह कोरा ही दिखाई दे, तो अाप उस सरकार की अनदेखी नहीं कर सकते. मुझे लगता है कि जैसे यह सच है कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए गुजरात से दिल्ली की तरफ जैसी दौड़ लगाई वैसी दौड़ अाज तक दूसरे किसी ने कभी नहीं लगाई, उसी तरह यह भी सच है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से अाज तक नरेंद्र मोदी कभी चैन से बैठे नहीं. उनकी दौड़ लगातार जारी है. बस, दिक्कत यह है कि वे दौड़ नहीं रहे हैं, कदमताल कर रहे हैं. कदमताल में अाप अपनी ही जगह पर खड़े रह कर इस तरह पांव चलाते हैं कि दूर से वह दौड़ने का भ्रम पैदा करता है. इसलिए भारतीय जनता पार्टी के कैडर को लगता है कि उनका प्रधानमंत्री दौड़ रहा है. कदमताल करने से जो शोर बनता है अौर जो धूल उड़ती है उसे विकास मान कर, मोदीजी के सारे मंत्रीगण देश को यह समझाने व भरमाने में लगे रहते हैं कि देखो, विकास अा गया है; कि देखो, विकास हो रहा है; कि पहचानो विकास बड़ा हो रहा है! लेकिन कदमताल का सच यह है कि इसमें अापको चलना नहीं, अपनी जगह पर खड़े बस पांव उठाना-गिराना होता है. अाप चले नहीं कि कदमताल टूटा. यही हो रहा है. देश पिछले ४ सालों से एक ही जगह पर, रोज-रोज का यह अनवरत कदमताल देख रहा है. 

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले ४ सालों में दो ऐसे कीर्तिमान बनाए हैं कि जिसका मुकाबला कोई कर ही नहीं सकता है. पहले दिन से अाज तक इतनी सारी योजनाएं-परियोजनाएं घोषित हुई हैं, इतने सारे ‘ऐप’ बने अौर लांच हुए हैं कि जिनकी गिनती करने के लिए एक नये मंत्रालय की जरूरत होगी. उनका दूसरा कीर्तिमान लगातार विदेश जाने या विदेशी मेहमानों का अपने यहां स्वागत करने का है. पहली को कहा गया गवर्नेंस या विकास; दूसरी को कहा गया विदेश-नीति या भारत को विश्वगुरु बनाना. अगर धुअांधार भाषणों से गरीबों का पेट भर सकता तो सच, देश में कोई भूखा नहीं रह जाता; अगर योजनाअों-परियोजनाअों, ‘ऐप’ अादि से गरीबों की किस्मत बदली जा सकती तो इंदिरा गांधी का गरीबी हटाअो का नारा सिद्ध हो गया होता. अगर नोटबंदी से कालाबाजारी अौर जीएसटी से व्यापार में चोरी रोकी जा सकती तो देश साफ व स्वस्थ हो चुका होता. विदेश जाने अौर विदेशियों को यहां बुलाने, गले लगने-लगाने, झूला झूलने या झुलाने से देश की विदेश-नीति बन सकती अौर मजबूत हो सकती तो दुनिया में हमारी तूती बोलती होती. महात्मा गांधी की दिखावटी प्रशंसा करने अौर नेहरू-परिवार को चीख-चीख कर कोसने से देश की किसी बीमारी का हल निकल सकता तो हम कहते कि चलो, इससे तो निजात मिली. लेकिन सच तो  यह है कि इस तरह न देश बनते हैं अौर न चलते हैं. इसलिए न देश बन रहा है अौर न चल रहा है. 


देश में अापसी टकराहट अौर कर्कशता बढ़ती जा रही है; लोकतंत्र को संभालने वाली संस्थाएं खुद को ही संभाल नहीं पा रही हैं; प्रधानमंत्री को छोड़ कर, मंत्रिमंडल का स्वास्थ्य चिंताजनक हद तक खराब है; मंत्रिमंडल में योग्यता, प्रतिभा अौर कुशलता की सिरे से कमी है जिसकी पूर्ति राजनीतिक चापलूसी से की जा रही है. विदेश नीति जैसी कोई चीज बनी भी नहीं है, बची भी नहीं है. रूस, चीन अौर अमरीका का त्रिभुज हमें किसी संतुलनकारी शक्ति की तरह नहीं, प्यादे की तरह देखता व बरतता है. ४ साल का यह हाल है, तो प्रोफेसर जोशी कहें भी तो क्या कहें ? ( 26.05.2018) 

न्यायपालिका पर उधार हैं तीन बड़े काम



मुझे इस बात की रत्ती भर भी खुशी नहीं है कि कर्नाटक में कांग्रेस समर्थित कुमारस्वामी की सरकार बन गई; मुझे इस बात का रत्ती भर अफसोस नहीं है कि भाजपा की तिकड़म विफल हुई अौर कर्नाटक में येदियुरप्पा दो दिन भी नहीं टिक सके. मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि कर्नाटक की इस गलीज से हमारा लोकतंत्र कुछ साफ व शक्तिशाली बन कर निकला है.  मुझे इस बात का बेहद संतोष है कि हमारी न्यायपालिका ने एक बार फिर यह साबित किया है कि अगर वह संविधान की किताब अौर उसकी अात्मा के प्रति वैसी ही ईमानदार रही, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताअों ने की है, तो भारतीय लोकतंत्र को घुटने टेकने पर मजबूर करना किसी के लिए भी टेढ़ी खीर है. मैं, भारत के अाम मतदाता का सच्चा प्रतिनिधि, जब इतने सारे मनोभावों से गुजर रहा हूं जो लगता है कि परस्पर विरोधी हैं, तो अाम लोग कितने हैरान व परेशान होंगे ! 
  हमें यह समझना चाहिए कि अाज दिल्ली में अौर देश में जो कुछ चल रहा है, वह भारतीय दलीय राजनीति का 70 सालों में बना असली चेहरा है. यह चेहरा पहले से ही इतना ही दागदार था. भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार का योगदान इतना ही है कि उसने सत्ता अौर लोलुपता के बीच जो एक पर्दा हुअा करता था, उसे उतार फेंका है. उसने इस नंग को ही राजनीति करार दिया है. वह कहती है कि जो कुछ है वह राज-नीति है जिसमें राज ही एकमात्र सच है, नीति गंदे कपड़ों की वह गठरी है जिसे जल्दी-से-जल्दी कहीं गहरे दफना देने की जरूरत है. कर्नाटक में वह यही करने में लगी थी लेकिन विफल हुई. फिर सफल कौन हुअा ? जिनकी सरकार बन रही है क्या वे सफल हुए ? अगर सरकार बना ले जाना सफलता है तब तो नरेंद्र मोदी मार्का राजनीति को सबसे सफल मानना होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी को उन्होंने जैसी चुनावी सफलता दिलाई है, वैसी सफलता का तो सपना भी उस पार्टी ने नहीं देखा होगा कभी. सरकार बनाना लोकतंत्र का एक जरूरी पक्ष है लेकिन कैसे बनाना, क्यों बनाना अौर कैसे चलाना भी उतना ही प्रमुख पक्ष है. इस कसौटी पर देखें तो कर्नाटक में सभी राजनैतिक दल मिल कर लोकतंत्र को हराने में लगे थे जिसे वक्ती तौर पर न्यायपालिका ने रोक दिया है. 

मुझे इंतजार इसका नहीं है कि कुमारस्वामी किसे ले कर सरकार बनाते हैं बल्कि मुझे इंतजार अदालत की उस सुनवाई का जिसे वह 15 दिनों बाद करने वाली है जिसमें इस पूरे प्रकरण की गहरी छानबीन की बात उसने कही है. मुझे इंतजार इस बात का है कि कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला को राष्ट्रपति किस दिन हटाते हैं. हर राज्यपाल राज्य के संवैधानिक शील की पहरेदारी करने वाला, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त पहरेदार है. वजूभाई वाला ने केंद्र के प्रति अपनी अंधी वफादारी का चाहे जितना सबूत दिया हो, संवैधानिक शील को अौर उस बहाने राष्ट्रपति की गरिमा को उन्होंने तार-तार कर दिया है. उनकी यह अशोभनीय विफलता यदि उनकी बर्खास्तगी तक नहीं पहुंचती है तो यह शर्म राष्ट्रपति के खाते में भी लिखी जाएगी. 
कर्नाटक से एक बात शुरू हुई है तो न्यायपालिका को उसे उसके तार्किक परिणाम तक पहुंचाना चाहिए. राष्ट्रपति हो कि राज्यपाल, इनके निर्णय हमेशा ही संवैधानिक दायरे में होने ही नहीं चाहिए बल्कि सूरदास को भी दिखाई दे जाएं, इस तरह होने चाहिए. दिल्ली की सरकारें राज्यपाल या राष्ट्रपति के रूप में जिस तरह अपने एजेंट नियुक्त करने की कोशिश करती हैं, वह संविधान को विफल करने की चालाकी है. किसी भी जीवंत व स्वस्थ संविधान की एक पहचान यह है कि वह जरूरत अाने पर बोलता है अन्यथा चुप रहता जाता है. हमारे लोकतंत्र ने ऐसा ही संविधान न्यायपालिका को सौंपा है. इस तरह न्यायपालिका की कसौटी यह बन गई है कि वह संविधान की चुप्पी को पढ़ने का विवेक रखती है या नहीं. विवेक का मतलब है वह तीसरी अांख जिससे संविधान की चुप्पी को पढ़ा व समझा जा सके. सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने जाते-जाते इसी चुप्पी को पढ़ने की कला को जजों का संवैधानिक अवदान कहा था.  संविधान को जहां विवेक का साथ मिलता है, वह अत्यंय मारक दस्तावेज बन जाता है. 


इसलिए 70 सालों से तीन बड़े काम न्यायपालिका पर उधार हैं : उसे राष्ट्रपति अौर  राज्यपाल के चयन के तथा राज्यसभा में सरकारी मनोनयन के संवैधानिक अाधार सुनिश्चित करने चाहिए. अभी हमारा लोकतंत्र जहां पहुंचा है उसमें राष्ट्रपति, राज्यपाल व राज्यसभा की व्यवस्था खत्म करना जल्दीबाजी होगी या वैसा ही अर्थहीन कदम होगा जैसा योजना अायोग को भंग कर नीति अायोग बनाना ! ये तीनों ही संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं तो उनका अाधार भी संवैधानिक ही होना चाहिए अौर इसलिए यह काम न्यायपालिका के दायरे में उधार पड़ा है. अाज तो इन तीनों जगहों पर चयन ऐसे होते हैं मानो कोई अपने हैट में से खरगोश निकाल कर दिखा दे. राज्यसभा किसी को उपकृत करने की जगह नहीं है. यह लोकसभा पर एक किस्म का नैतिक व बौद्धिक अंकुश रखने की व्यवस्था है.  हमें किसी सचिन या किसी रेखा की वहां जरूरत है ही नहीं लेकिन हमें वहां विभिन्न क्षेत्रों के बहुत सारे जावेद अख्तरों की जरूरत है. न्यायपालिका जरूरी समझे तो अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता में एक संविधान पीठ बना दे जिसे अगले 6 माह में इसकी रूपरेखा बना कर पेश करनी हो. क्यों न पक्ष-विपक्ष-न्यायालय-सार्वजनिक जीवन के चुने प्रतिनिधियों की एक स्वतंत्र समिति बने जिसे अधिकार हो कि वह इन जगहों के लिए उपयुक्त नामों की सूची तैयार करती रहे. इस सूची में से सरकारें अपना चयन करें अौर इन पदों को भरे ? इन पदों की अय्याशी कम की जाए, इनका संवैधानिक दायित्व तय किया जाए अौर इनकी अविध एक बार से अधिक की न हो. ये संविधान का पालन करने के लिए हों, न कि केंद्र सरकार के नापाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए.  70 सालों बाद किसी भी महल की गहरी सफाई जरूरी होती है. हमारा तो लोकतंत्र का मंदिर है. इसे हम गंदा कैसे छोड़ सकते हैं ! ( 21.05.2018) 

कर्नाटक : कोई नहीं जीता



तो कर्नाटक मेें वह हो रहा है जो किसी ने नहीं चाहा था - न कर्नाटक के मतदाता ने, न भाजपा अौर कांग्रेस ने. वह भी नहीं हो पाया जो मोदी-शाह की अजेय जोड़ी ने दिल्ली में बैठ कर चाहा था; न वही हो पाया जिसकी कोशिश में राज्यपाल वजूभाई वाला ने अपना पूरा केरियर दांव पर लगा दिया; अौर न केजी बोपय्या ही एक दिन के लिए विधानसभा अध्यक्ष( प्रो-टर्म !) बन कर जो करने की सोच रहे थे वही कर सके. सब देखते रह गये अौर अब सब देखते रहेंगे…

अगर किसी ने कुछ चाहा अौर वही हुअा तो वह सर्वोच्च न्यायालय है. ऐसा लगता है कि अाधी रात में न्यायालय को न्याय अधिक साफ दिखाई देता है. 16-17 मई की अाधी रात को, जब सारा देश नींद में सो रहा था, भारतीय न्यायालय अपने कर्तव्यों के प्रति नियति से किया वादा पूरा करने, सजग पहरेदार की तरह जागा हुअा था. उसने किसी पर कोई टिप्पणी किए बिना सबको कठघरे में खड़ा कर दिया - राज्यपाल द्वारा दी गई पंद्रह दिन की मोहलत को काट कर, 24 घंटे की बना दी लेकिन राज्यपाल को शपथ दिलाने अौर येदियुरप्पा को शपथ लेने से नहीं रोका; उसने केजी बोपय्या को प्रो-टर्म अध्यक्ष बनाने पर अापत्ति नहीं की लेकिन उनके पर इस तरह कतर दिए कि वे न उड़ सकते थे, न उड़ा सकते थे. उसने कांग्रेस की कोई दलील कबूल नहीं की लेकिन न्याय की अपनी टेक कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ने दी. अौर यह भी कि उसने यह सब इतने दबंग तरीके से किया कि केंद्र सरकार या सर्वोच्च न्यायाधीश को जुबान खोलने का मौका भी नहीं मिला. अौर अब अाप देखिए कि देश में किसी को इसकी नहीं पड़ी है कि नया मुख्यमंत्री कौन बनता है. अाज कर्नाटक में सत्ता संदर्भहीन हो गई है. 

  सारे देश की नजर जिस चुनाव पर लगी थी, अौर देश के सारे राजनीतिक दलों ने जिसे जीतने में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी, उस चुनाव के नतीजों के प्रति ऐसी उदासीनता ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को िजस एक राजनीतिक कर्म का विशेषज्ञ माना जाता है उस चुनावी नौटंकी में, उनकी सारी छटाएं देख लेने के बाद भी लोग यह नहीं पूछ रहे हैं कि कर्नाटक में कौन जीता; पूछ यह रहे हैं अौर हतप्रभ से देख भी यही रहे हैं कि कौन, कितने गर्त में गिरता है अौर लोकतंत्र को गिराता है. कर्नाटक में पतन की प्रतियोगिता है. पतन का चरित्र ही यह है कि एक गिर कर जहां पहुंचता है, दूसरा उसकी अगली सीढ़ी तैयार करता है. मोदी-शाह की जोड़ी ने इस पतन के नये-नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं; अब दूसरे भी इसमें योगदान दे रहे हैं.  

वे सारी संवैधानिक संस्थाएं व व्यवस्थाएं एक-एक कर जमींदोज की जा रही हैं जिनकी रचना इसलिए की गई थी कि जब कभी, जब कहीं राजनीतिक चालबाजियां अौर सत्ता की अजगरी भूख लोकतंत्र का भक्षण करने लगे तो उसे रोकने व थामने वाली ताकतें संविधान के भीतर से निकल कर अाप ही सामने अा जाएं. कर्नाटक में ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व का पतन सारी संवैधानिक व्यवस्थाअों को दीमक की तरह चाट गया है. बाबासाहब अांबेडकर ने ऐसे ही नहीं कहा था कि अच्छा-से-अच्छा संविधान भी बुरे लोगों के हाथ में पड़ कर एकदम बुरा साबित होता है. हमारे सारे राजनीतिक दल मिल कर बाबा साहब को सही साबित करने में जैसी निष्ठा से लगे हैं, वह हैरान करने वाला है ! 

कर्नाटक में जो हुअा वह लोकतंत्र का खेल था. 114 सीटों तक पहुंचती भारतीय जनता पार्टी 104 पर ऐसी जा टिकी जैसे अंगद के पांव; अौर कांग्रेस व देवेगौड़ा की पार्टी ने बढ़ कर  सारी खाली जगहें हथिया लीं. दिन भर में बना सारा राजनीतिक समीकरण दोपहर बाद छिन्न-भिन्न हो गया. जो जश्न मना रहे थे उन्हें लकवा मार गया; जो लकवाग्रस्त थे वे दौड़ने लगे. अब पतन की दौड़ दो तरफ शुरू हुई - राजभवन की तरफ अौर फिसलने वाले विधायकों की तरफ. लोकतंत्र ने अपना खेल कर दिया; फिर शुरू हुअा लोकतंत्र से खिलवाड़. इसे राजभवन से एक झटके में रोका जा सकता था लेकिन तभी न जब वहां कोई राज्यपाल होता ! वहां तो राज्यपाल था ही नहीं. वहां बैठा था नाम-गुणविहीन केंद्र का एक अंधसेवक ! राजनीति में जोड़-तोड़ की एक जगह होती ही है लेकिन सारी राजनीति मात्र जोड़-तोड़ तो नहीं है. राजनीति अौर राजनीतिबाजी में फर्क होता है - गहरा फर्क ! जो यह फर्क या तो समझते नहीं हैं या मानते नहीं हैं, वे ही लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल देते हैं. अगर चुनाव धन अौर डंडे का खेल बना दिया जाए, राजभवन में खोज-खोज कर ऐसे लोग बिठाये जाएं जिनकी एकमात्र योग्यता यह हो कि उनका न सर है, व रीढ़, तो अाप लोकतंत्र का पतन रोक नहीं सकते हैं. राज्यपालों से यह पाप कांग्रेस ने खूब करवाया है, अब भाजपा की बारी है. 

फिसलने वाले िवधायकों का हाल यह था कि कांग्रेस व जनता दल(एस) फिसलने वालों की पहचान करने में नहीं, खरीददारों से उन्हें बचाने-छिपाने में जुट गये. किसी को इस पतन का दर्द नहीं था कि 10 करोड़ हो कि 100 करोड़, जो बिकने को तैयार है उसे देश में रखो कि विदेश में, वह बिका ही रहेगा. राजनीति जब बाजार बन जाती है तब वहां भी सब कुछ बिकाऊ होता है. अौर जो बिक सकता है वह जमीर क्या अौर देश क्या, कुछ भी बेंच सकता है. वह बेंच सकता है, अाप खरीद सकते हैं तो पाप न इधर ज्यादा हुअा, न उधर कम ! यह वह नैतिक फिसलपट्टी है जो सिर्फ नीचे की तरफ ही जाती है. 

लोकतंत्र में नैतिकता न हो ( संविधान न हो ! ) तो वह चोरों-बटमारों की िमलीभगत से अलग कुछ भी नहीं है. सौ साल से भी ज्यादा हुअा कि जब महात्मा गांधी ने ‘हिंद-स्वराज्य’ में लिखा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा अादमी देशभक्त होता है, यह कहते मेरी जीभ ऐंठती है.  उनका सीधा मतलब इसी नीतिविहीन राजनीति के शीर्षपुरुष से था. वे जान गये थे कि जो बाजार से खरीद कर लाया गया है, उस लोकतंत्र का शीर्षपुरुष सौदा करने में सबसे घाघ व्यक्ति ही हो सकता है. कहें कि राजनीति का शाइलॉक ! 

न्यायपालिका की भूमिका इसलिए अहम है कि लोकतंत्र ने उसे विवेक व संविधान के अलावा दूसरा कुछ दिया ही नहीं है. न्यायपालिका के संदर्भ में विवेक यानी वह तीसरी अांख जिससे संविधान की उस चुप्पी को भी पढ़ा व समझा जा सके जिसे दूसरे गूंगा या बहरा समझते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने जाते-जाते इसी चुप्पी को पढ़ने की कला को न्यायमूर्ति का अवदान कहा था. संविधान को जहां विवेक का साथ मिलता है, वह अत्यंय मारक दस्तावेज बन जाता है. कर्नाटक में हमने यही देखा. 

भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में भी लोकतंत्र से वही खिलवाड़ शुरू किया जो उसने गोवा में, मणिपुर में, मेघालय अादि में किया था. मोदी-शाह अब तक इस हेंकड़ी में रहे हैं कि वे जो चाहेंगे वह कर लेंगे अौर वही लोकतंत्र कहलाएगा. लेकिन जैसी कि कहावत है, अाप काठ की हाड़ी को दो बार चूल्हे पर नहीं चढ़ा सकते ! इसलिए पार्टियां कर्नाटक में जब खिलवाड़ कर रही थीं, लोकतंत्र अपना खेल समेट कर सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया. अब महत्वपूर्ण यह नहीं है कि किसने क्या किया, क्योंकि पतन की होड़ में कौन, कहां खड़ा था इसकी कहानी कहने से लोकतंत्र का खेल अागे नहीं बढ़ता है. खेल अागे तभी बढ़ेगा जब कोई यह कहेगा कि खेल पटरी से कब उतरा अौर किसने खेल का नियम तोड़ा. न्यायपालिका ने अपने अादेश में इसका सीधा संकेत दे दिया है कि 10 सप्ताह के बाद, मतलब कर्नाटक में लोकतंत्र से खिलवाड़ की धूल जब बैठ जाएगी अौर सारे जश्न पूरे हो चुके होंगे तब वह इस पूरे मामले की व्यापक पड़ताल करेगी अौर अपनी व्यवस्था सुनाएगी. यह वह तलवार है जिसे ले कर लोकतंत्र कर्नाटक से लौटा है. अब यह तलवार न्यायपालिका के ऊपर भी तनी रहेगी. अगर न्यायपालिका भी खेल में नहीं, खिलवाड़ में शामिल हो जाए तो ? धीरज रखिए, लोकतंत्र फिर कोई नया खेल शुरू करेगा. अगर कर्नाटक में जो किया गया वह संिवधानसम्मत था तो फिर गोवा, मणिपुर अादि-अादि के जवाब न्यायालय कैसे देगा ? हत्या कई माह या साल पहले हुई थी इसलिए अपराध प्रमाणित होने व अपराधी के सामने होने पर भी सजा कैसे दी सकती है, न्यायपालिका ऐसा तो नहीं कह सकेगी. तब वह क्या कहेगी ? वह जो भी कहेगी, उससे एक नया खेल शुरू होगा. हम इतने समर्थ खिलाड़ी न हों कि खेल में उतर कर उसे गति व दिशा दे सकें तो इतने धैर्यवान तो बनें कि खेल को ही अपना खेल बनाने दें. 


बस, इतना ही है कि खतरे की एक घंटी नजदीक अाती सुनाई दे रही है. लोकतंत्र अौर भीड़तंत्र के बीच संविधान नाम का जो अंपायर खड़ा होता है यदि वह अनुपस्थित हुअा तो सड़क संसद की जगह ले लेती है. यह भी लोकतंत्र का ही खेल है लेकिन बेहद खतरनाक खेल है. ( 19.05.2018) 

Monday, 21 May 2018

झूठ का सच


सेवाग्राम की बापू-कुटी के भीतर की एक दीवार पर, जिसके सम्मुख गांधीजी बैठा करते थे, कुछ सुवाक्य लिख कर टांगे हुए हैं. वे अाज के नहीं हैं, बापू के वक्त के हैं. उसमें एक वाक्य कहता है कि झूठ कई तरह से बोला जाता है - मौन रख कर भी अौर अांखों के इशारों से भी. वचन से बोले गये झूठ की अपेक्षा इन दो प्रकारों से बोला गया झूठ ज्यादा खतरनाक होता है. पता नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी यह सुवाक्य पढ़ा है या नहीं लेकिन अाज हर कोई उनका इस मानी में मुरीद है कि वे किसी भी तरह का असत्य सत्य की मुद्रा में बोल सकते हैं. यह महारत बहुत कम लोगों में होती है ( इसके लिए हमें भगवान को धन्यवाद देना चाहिए !)

चुनावी मौसम हो तब तो प्रधानमंत्री मोदी की यह कला बला की परवान चढ़ती है. वे इस सुवाक्य में पूरा यकीन करते हैं कि युद्ध व प्यार मेें सब कुछ जायज होता है; अौर कौन कहेगा कि चुनाव युद्ध का ही दूसरा नाम नहीं है ? फिर यह भी कि जैसे प्यार में कोई एक होता है कि जो अापके होने का कारण होता है, वैसे ही  युद्ध में कोई एक होता है जो अापके निशाने पर होता है. भारत के १५वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निशाने पर हैं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ! वे हर हथियार से, हर कहीं नेहरू पर प्रहार करते हैं। अर्द्धसत्य अौर असत्य उनका सबसे बड़ा हथियार होता है जिसे वे इतिहास के मैदान से चुन-चुन कर लाते हैं. लेकिन इतिहास ही उनका हर वार तुक्का साबित करता जाता है. प्रधानमंत्री इतिहास का यह गुण नहीं पहचानते हैं शायद कि वह न तो सदय होता है, न निर्दय; वह तटस्थ होता है. यही जवाहरलाल नेहरू की ताकत है, यही नरेंद्र मोदी की कमजोरी ! 

    प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने गुजराती कार्ड खेला था अौर सरदार पटेल व नेहरू की कुश्ती करवाई थी. वे ऐसा प्रचारित करने में जुटे रहे कि जैसे जवाहरलाल किसी तिकड़म से देश के पहले प्रधानमंत्री बन गये थे. तोड़-मरोड़ कर कही गई उनकी सारी बातें खोखली साबित हुईं क्योंकि वे यह सच कभी बोल ही नहीं पाये कि सही या गलत, देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल का चयन तो महात्मा गांधी ने किया था; अौर मुख्यमंत्री की या किसी दूसरी सत्ता की अाड़ में छिप कर नहीं, कांग्रेस कार्यसमिति के खुले मंच पर बैठ कर किया था, अौर यह जानते हुए किया था कि देश की अधिकांश प्रांतीय कांग्रेस समितियां सरदार पटेल के पक्ष में हैं. तो गुजराती मोदी को लड़ाई लड़नी हो तो गुजराती महात्मा गांधी से लड़नी चाहिए, जवाहरलाल नेहरू से नहीं. अौर गांधी ने ऐसा करके यह बतलाया कि लोकतंत्र केवल संख्यासुर का गणित नहीं होता है; गुणवत्ता की तुला पर भी उसे तोलना पड़ता है. यहां पिटे नरेंद्र मोदी ने फिर यह सच खोज निकाला कि सरदार की मृत्यु के शोक में शरीक होने की मनुष्यता भी नेहरू नहीं दिखा सके. एक गुजराती की ऐसी उपेक्षा ? लेकिन वे उस फोटो का जवाब नहीं दे सके जिसमें सरदार के पार्थिव शरीर के पास शोकग्रस्त जवाहरलाल को सबने देखा ! सरदार के निधन पर लोकसभा में उन्हें दी गई जवाहरलाल की श्रद्धांजली का हर एक शब्द इन दो महापुरुषों के रिश्तों की ऊंचाई व गहराई का दस्तावेज ही है. मतभेद, तो वे तो थे; लेकिन दोनों ने बापू की खींची उस लक्ष्मण-रेखा को कभी पार नहीं किया जिसे 30 जनवरी 1948 को गांधी ने तब खींची थी जब हमारी गोली खाने से ठीक पहले सरदार उनसे मिले थे. उन्होंने गांधी से कहा था कि अब वे जवाहरलाल की सरकार से त्यागपत्र देना चाहते हैं. गांधी ने देर होती अपनी प्रार्थना की तरफ बढ़ते हुए अंतिम वाक्य यही कहा था कि यह तो सरदार वाली बात नहीं हुई ! बस, उस दिन से अंतिम सांस तक सरदार सरदार ही बने रहे; सरदार यानी जो मोर्चे से पांव पीछे खींचता ही नहीं है. 

जवाहरलाल पर उन्होंने परिवारवाद का अारोप लगाया लेकिन इस सच को वे कहां छुपा कर रखते कि जवाहरलाल के बाद उनकी बेटी नहीं, लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री चुने गये थे; अौर ताशकंद में अगर शास्त्रीजी की अचानक मौत नहीं हुई होती ( इसके पीछे नेहरूजी का हाथ था, ऐसा अारोप अभी तक तो नहीं है न ! ) तो इंदिरा गांधी के लिए प्रधानमंत्री बनना कभी शक्य नहीं होता. अौर शास्त्रीजी की मृत्यु के बाद, मोरारजी देसाई को पीछे कर इंदिराजी को प्रधानमंत्री बनाया किसी जवाहरलाल ने नहीं बल्कि कामराज नडार की कमाल की खोपड़ी ने ! इतिहास की तटस्थ गवाही यहां भी पढ़ी जा सकती है. 

अभी-अभी कर्नाटक के चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी को फिर जरूरत पड़ी कि प्रांतीयता की संकीर्णता को उभार कर जितना बटोर सकें, वोट बटोरें; तो उन्होंने एक सार्वजनिक सभा में असत्य की झड़ी लगा दी. उन्होंने कहा कि कर्नाटक के दो लालों को नेहरूजी ने अाजीवन अपमानित किया. कौन थे ये दो लाल ? जेनरल थिमैया अौर जेनरल करियप्पा. अाजादी के बाद की भारतीय सेना का इतिहास जब भी अौर जो भी लिखेगा, इन दो नामों को छोड़ नहीं सकता है. प्रधानमंत्री ने कहा कि १९४८ में पाकिस्तान से युद्ध में, कश्मीर को बचाने का अभूतपूर्व कार्य करने वाले भारतीय सेना के चीफ जनरल थिमैया को नेहरू अौर उनके रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने इतना जलील किया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया. यह मोदीमार्का इतिहास यदि बच्चे पढ़ने लगें तो उन्हें यह कैसे पता चलेगा कि १९४८ में हमारी सेना के चीफ थिमैया थे ही नहीं, एक अंग्रेज जेनरल रॉय बुखर थे? तब कृष्ण मेनन नहीं, सरदार बलदेव सिंह देश के रक्षामंत्री थे. थिमैया साहब १९५७ में सेना प्रमुख बने अौर १९६१ में, अपना कार्यकाल पूरा कर विदा हुए. जेनरल थिमैया से नेहरू की अच्छी बनती थी अौर वे नेहरू ही थे जिन्होंने अवकाशप्राप्ति के बाद थिमैया साहब को विशेष भारतीय कार्यदल का प्रमुख बना कर कोरिया भेजा था. थिमैया सेना के उन चुनिंदा लोगों में थे जिन्हें नेहरू सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया था. फिर प्रधानमंत्री ने जेनरल करियप्पा का प्रसंग उठाया अौर चीखती हुई अावाज में कहा कि १९६२ में चीन से युद्ध में सेना प्रमुख पराक्रमी जेनरल करियप्पा के साथ नेहरू ने कैसा दुर्व्यवहार किया ! अब कोई उन्हें इतिहास की वह किताब दिखाए कि जो नागपुर से प्रकाशित नहीं हुई हो, कि १९६२ में भारत-चीन युद्ध से ९ साल पहले ही जेनरल करियप्पा रिटायर हो चुके थे. करियप्पा साहब स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेना प्रमुख थे अौर उन्हें यह पद नेहरू सरकार ने दिया था. प्रधानमंत्री नेहरू के साथ करियप्पा साहब के मतभेद थे अौर यह सारे देश को पता था लेकिन उनके साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई थी. १९८६ में वह राजीव गांधी की सरकार थी जिसने करियप्पा साहब को देश का पहला फील्डमार्शल बना कर सम्मानित किया था. 

असत्य दो तरह का होता है - सफेद अौर काला ! समाज में दोनों के विशेषज्ञ हैं अौर वे अपनी कला का प्रदर्शन करते ही रहते हैं. लेकिन एक असत्य अौर भी होता है - विषैला असत्य ! यह समाज की जड़ में मट्ठा डालता है. चुनाव कोई भी जीते, ऐसे असत्य से समाज हारता ही है. हम इसी मुहाने पर खड़े हैं. ( 12.05.2018) 


कर्नाटक : कोई नहीं जीता


तो कर्नाटक मेें वह हो रहा है जो किसी ने नहीं चाहा था - न कर्नाटक के मतदाता ने, न भाजपा अौर कांग्रेस ने. वह भी नहीं हो पाया जो मोदी-शाह की अजेय जोड़ी ने दिल्ली में बैठ कर चाहा था; न वही हो पाया जिसकी कोशिश में राज्यपाल वजूभाई वाला ने अपना पूरा केरियर दांव पर लगा दिया; अौर न केजी बोपय्या ही एक दिन के लिए विधानसभा अध्यक्ष( प्रो-टर्म !) बन कर जो करने की सोच रहे थे वही कर सके. सब देखते रह गये अौर अब सब देखते रहेंगे…

अगर किसी ने कुछ चाहा अौर वही हुअा तो वह सर्वोच्च न्यायालय है. ऐसा लगता है कि अाधी रात में न्यायालय को न्याय अधिक साफ दिखाई देता है. 16-17 मई की अाधी रात को, जब सारा देश नींद में सो रहा था, भारतीय न्यायालय अपने कर्तव्यों के प्रति नियति से किया वादा पूरा करने, सजग पहरेदार की तरह जागा हुअा था. उसने किसी पर कोई टिप्पणी किए बिना सबको कठघरे में खड़ा कर दिया - राज्यपाल द्वारा दी गई पंद्रह दिन की मोहलत को काट कर, 24 घंटे की बना दी लेकिन राज्यपाल को शपथ दिलाने अौर येदियुरप्पा को शपथ लेने से नहीं रोका; उसने केजी बोपय्या को प्रो-टर्म अध्यक्ष बनाने पर अापत्ति नहीं की लेकिन उनके पर इस तरह कतर दिए कि वे न उड़ सकते थे, न उड़ा सकते थे. उसने कांग्रेस की कोई दलील कबूल नहीं की लेकिन न्याय की अपनी टेक कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ने दी. अौर यह भी कि उसने यह सब इतने दबंग तरीके से किया कि केंद्र सरकार या सर्वोच्च न्यायाधीश को जुबान खोलने का मौका भी नहीं मिला. अौर अब अाप देखिए कि देश में किसी को इसकी नहीं पड़ी है कि नया मुख्यमंत्री कौन बनता है. अाज कर्नाटक में सत्ता संदर्भहीन हो गई है. 

  सारे देश की नजर जिस चुनाव पर लगी थी, अौर देश के सारे राजनीतिक दलों ने जिसे जीतने में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी, उस चुनाव के नतीजों के प्रति ऐसी उदासीनता ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को िजस एक राजनीतिक कर्म का विशेषज्ञ माना जाता है उस चुनावी नौटंकी में, उनकी सारी छटाएं देख लेने के बाद भी लोग यह नहीं पूछ रहे हैं कि कर्नाटक में कौन जीता; पूछ यह रहे हैं अौर हतप्रभ से देख भी यही रहे हैं कि कौन, कितने गर्त में गिरता है अौर लोकतंत्र को गिराता है. कर्नाटक में पतन की प्रतियोगिता है. पतन का चरित्र ही यह है कि एक गिर कर जहां पहुंचता है, दूसरा उसकी अगली सीढ़ी तैयार करता है. मोदी-शाह की जोड़ी ने इस पतन के नये-नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं; अब दूसरे भी इसमें योगदान दे रहे हैं.  
वे सारी संवैधानिक संस्थाएं व व्यवस्थाएं एक-एक कर जमींदोज की जा रही हैं जिनकी रचना इसलिए की गई थी कि जब कभी, जब कहीं राजनीतिक चालबाजियां अौर सत्ता की अजगरी भूख लोकतंत्र का भक्षण करने लगे तो उसे रोकने व थामने वाली ताकतें संविधान के भीतर से निकल कर अाप ही सामने अा जाएं. कर्नाटक में ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व का पतन सारी संवैधानिक व्यवस्थाअों को दीमक की तरह चाट गया है. बाबासाहब अांबेडकर ने ऐसे ही नहीं कहा था कि अच्छा-से-अच्छा संविधान भी बुरे लोगों के हाथ में पड़ कर एकदम बुरा साबित होता है. हमारे सारे राजनीतिक दल मिल कर बाबा साहब को सही साबित करने में जैसी निष्ठा से लगे हैं, वह हैरान करने वाला है ! 

कर्नाटक में जो हुअा वह लोकतंत्र का खेल था. 114 सीटों तक पहुंचती भारतीय जनता पार्टी 104 पर ऐसी जा टिकी जैसे अंगद के पांव; अौर कांग्रेस व देवेगौड़ा की पार्टी ने बढ़ कर  सारी खाली जगहें हथिया लीं. दिन भर में बना सारा राजनीतिक समीकरण दोपहर बाद छिन्न-भिन्न हो गया. जो जश्न मना रहे थे उन्हें लकवा मार गया; जो लकवाग्रस्त थे वे दौड़ने लगे. अब पतन की दौड़ दो तरफ शुरू हुई - राजभवन की तरफ अौर फिसलने वाले विधायकों की तरफ. लोकतंत्र ने अपना खेल कर दिया; फिर शुरू हुअा लोकतंत्र से खिलवाड़. इसे राजभवन से एक झटके में रोका जा सकता था लेकिन तभी न जब वहां कोई राज्यपाल होता ! वहां तो राज्यपाल था ही नहीं. वहां बैठा था नाम-गुणविहीन केंद्र का एक अंधसेवक ! राजनीति में जोड़-तोड़ की एक जगह होती ही है लेकिन सारी राजनीति मात्र जोड़-तोड़ तो नहीं है. राजनीति अौर राजनीतिबाजी में फर्क होता है - गहरा फर्क ! जो यह फर्क या तो समझते नहीं हैं या मानते नहीं हैं, वे ही लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल देते हैं. अगर चुनाव धन अौर डंडे का खेल बना दिया जाए, राजभवन में खोज-खोज कर ऐसे लोग बिठाये जाएं जिनकी एकमात्र योग्यता यह हो कि उनका न सर है, व रीढ़, तो अाप लोकतंत्र का पतन रोक नहीं सकते हैं. राज्यपालों से यह पाप कांग्रेस ने खूब करवाया है, अब भाजपा की बारी है.
फिसलने वाले विधायकों का हाल यह था कि कांग्रेस व जनता दल(एस) फिसलने वालों की पहचान करने में नहीं, खरीददारों से उन्हें बचाने-छिपाने में जुट गये. किसी को इस पतन का दर्द नहीं था कि 10 करोड़ हो कि 100 करोड़, जो बिकने को तैयार है उसे देश में रखो कि विदेश में, वह बिका ही रहेगा. राजनीति जब बाजार बन जाती है तब वहां भी सब कुछ बिकाऊ होता है. अौर जो बिक सकता है वह जमीर क्या अौर देश क्या, कुछ भी बेंच सकता है. वह बेंच सकता है, अाप खरीद सकते हैं तो पाप न इधर ज्यादा हुअा, न उधर कम ! यह वह नैतिक फिसलपट्टी है जो सिर्फ नीचे की तरफ ही जाती है. 

लोकतंत्र में नैतिकता न हो ( संविधान न हो ! ) तो वह चोरों-बटमारों की मिलीभगत से अलग कुछ भी नहीं है. सौ साल से भी ज्यादा हुअा कि जब महात्मा गांधी ने ‘हिंद-स्वराज्य’ में लिखा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा अादमी देशभक्त होता है, यह कहते मेरी जीभ ऐंठती है.  उनका सीधा मतलब इसी नीतिविहीन राजनीति के शीर्षपुरुष से था. वे जान गये थे कि जो बाजार से खरीद कर लाया गया है, उस लोकतंत्र का शीर्षपुरुष सौदा करने में सबसे घाघ व्यक्ति ही हो सकता है. कहें कि राजनीति का शाइलॉक ! 

न्यायपालिका की भूमिका इसलिए अहम है कि लोकतंत्र ने उसे विवेक व संविधान के अलावा दूसरा कुछ दिया ही नहीं है. न्यायपालिका के संदर्भ में विवेक यानी वह तीसरी अांख जिससे संविधान की उस चुप्पी को भी पढ़ा व समझा जा सके जिसे दूसरे गूंगा या बहरा समझते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने जाते-जाते इसी चुप्पी को पढ़ने की कला को न्यायमूर्ति का अवदान कहा था. संविधान को जहां विवेक का साथ मिलता है, वह अत्यंय मारक दस्तावेज बन जाता है. कर्नाटक में हमने यही देखा. 

भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में भी लोकतंत्र से वही खिलवाड़ शुरू किया जो उसने गोवा में, मणिपुर में, मेघालय अादि में किया था. मोदी-शाह अब तक इस हेंकड़ी में रहे हैं कि वे जो चाहेंगे वह कर लेंगे अौर वही लोकतंत्र कहलाएगा. लेकिन जैसी कि कहावत है, अाप काठ की हाड़ी को दो बार चूल्हे पर नहीं चढ़ा सकते ! इसलिए पार्टियां कर्नाटक में जब खिलवाड़ कर रही थीं, लोकतंत्र अपना खेल समेट कर सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया. अब महत्वपूर्ण यह नहीं है कि किसने क्या किया, क्योंकि पतन की होड़ में कौन, कहां खड़ा था इसकी कहानी कहने से लोकतंत्र का खेल अागे नहीं बढ़ता है. खेल अागे तभी बढ़ेगा जब कोई यह कहेगा कि खेल पटरी से कब उतरा अौर किसने खेल का नियम तोड़ा. न्यायपालिका ने अपने अादेश में इसका सीधा संकेत दे दिया है कि 10 सप्ताह के बाद, मतलब कर्नाटक में लोकतंत्र से खिलवाड़ की धूल जब बैठ जाएगी अौर सारे जश्न पूरे हो चुके होंगे तब वह इस पूरे मामले की व्यापक पड़ताल करेगी अौर अपनी व्यवस्था सुनाएगी. 

यह वह तलवार है जिसे ले कर लोकतंत्र कर्नाटक से लौटा है. अब यह तलवार न्यायपालिका के ऊपर भी तनी रहेगी. अगर न्यायपालिका भी खेल में नहीं, खिलवाड़ में शामिल हो जाए तो ? धीरज रखिए, लोकतंत्र फिर कोई नया खेल शुरू करेगा. अगर कर्नाटक में जो किया गया वह संिवधानसम्मत था तो फिर गोवा, मणिपुर अादि-अादि के जवाब न्यायालय कैसे देगा ? हत्या कई माह या साल पहले हुई थी इसलिए अपराध प्रमाणित होने व अपराधी के सामने होने पर भी सजा कैसे दी सकती है, न्यायपालिका ऐसा तो नहीं कह सकेगी. तब वह क्या कहेगी ? वह जो भी कहेगी, उससे एक नया खेल शुरू होगा. हम इतने समर्थ खिलाड़ी न हों कि खेल में उतर कर उसे गति व दिशा दे सकें तो इतने धैर्यवान बनें कि खेल को ही अपना खेल बनाने दें. 


बस, इतना ही है कि खतरे की एक घंटी नजदीक अाती सुनाई दे रही है. लोकतंत्र अौर भीड़तंत्र के बीच संविधान नाम का जो अंपायर खड़ा होता है यदि वह अनुपस्थित हुअा तो सड़क संसद की जगह ले लेती है. यह भी लोकतंत्र का ही खेल है लेकिन बेहद खतरनाक खेल है. ( 19.05.2018)