Thursday, 23 November 2023

हम एक साथ बहुत कुछ हारे

 सभी दुखी हैं कि हम क्रिकेट का विश्वकप हार गए; मैं दुखी हूं कि हम क्रिकेट ही हार गए. मैच हारना और खेल हारना दो एकदम अलग-अलग बातें हैं. हार वक्ती होती है, पराजय का मतलब मन हारना होता है. हम मन से हारे हैं. 

अगर ऐसा न होता तो कोई कारण न था कि एक लाख से ज्यादा दर्शकों से भरा स्टेडियम इस कदर गूंगा बन जाता. जिन्होंने अपने नाम से इस स्टेडियम का नामकरण करवाया है वे लगातार बेमतलब दहाड़ने के लिए विख्यात हैं. लेकिन इस विश्वकप में हमने उन्हें एकदम गूंगा पाया. वैसे फाइनल का खेल तो अच्छा ही हो रहा था. उतार-चढ़ाव से गुजर रहा था. खेल तो ऐसा ही होता है. लेकिन फेंफड़े के जोर से विश्वगुरू बनने वालों की भीड़ को यह बताया नहीं गया था कि उसे जो तैयार पटकथा दी गई है, उससे अलग कुछ घटने लगे तो उसे क्या करना है. उसे जो नारे सिखाए गए थे, जो जयकारा रटाया गया था, वह सब यह मान कर कि हमारी जीत तो पक्की है. खेल से साथ खेल करने वालों का ऐसा ही हाल होता है. 

कोई बताएगा तो नहीं अन्यथा यह पूछा जाना चाहिए और इसका जवाब किसी को देना ही चाहिए कि मैदान के अलावा भारतीय टीम के कपड़ों का रंग किसने बदला व क्यों; और यह भी कि ऐसा करने वालों में कौन-कौन शरीक थे ? खिलाड़ियों को भगवा पहनाने की यह सोच उसी मानसिकता में से पैदा हुई है जो खेल की जीत को प्रधानमंत्री की और हार को खिलाड़ियों की जाति-धर्म का परिणाम बताती है. 

खिलाड़ी यदि भाड़े के टट्टू नहीं हैं तो उन्हें भी यह बताना चाहिए, कोच राहुल द्रविड़ को बताना चाहिए कि क्या उन्होंने क्रिकेट के इस भगवाकरण को खुशी-खुशी स्वीकार किया था ?  यदि असहमति उठी तो वह कहां दर्ज की गई ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड की किस बैठक में तय किया गया था कि विश्वकप का पहला व अंतिम मैच अहमदाबाद में होगा ? विश्वकप की नियंत्रक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्थान से इस बारे में कोई विमर्श हुआ ? अहमदाबाद को क्रिकेट का मक्का बनने का यह सरकारी प्रयास अत्यंत गर्हित है, क्योंकि इसके पीछे क्रिकेटप्रेमी नहीं, सत्ता है. दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम बनाने से क्रिकेट-संस्कृति पैदा नहीं होती है. मायावती सरकारी पैसे से अपनी मूर्तियां लगवाएं, हाथी गढ़वाएं या मोदी अपने नाम का स्टेडियम बनवाएं, सरकारी पैसों से जगह-जगह शेर का दहाड़ता हुआ चेहरा लगवाएं, जनता के पैसों से जी-20 का अशोभनीय आत्म-प्रचार करवाएं तो यह सब शर्मनाक अहंकार के प्रदर्शन से अधिक कुछ नहीं है. यह लोकतंत्र से बलात्कार है.        

भारत में किया गया यह पूरा आयोजन विश्वकप के दूसरे आयोजनों से बहुत अलग था क्योंकि इसमें खेल को राजनीति का हथियार बनाने की कोशिश की गई थी. यह क्रिकेट का विश्वकप कम, सत्ता का चुनाव-कप बन गया था और इसलिए पराजय से इसे उसी तरह सांप सूंघ गया जैसा चुनावी हार में होता है. सारे मैच कब, कहां और कैसे आयोजित किए जाएंगे, किन्हें माननीय अतिथि की तरह बुलाया जाएगा व किन्हें पूछा भी नहीं जाएगा, कैमरे को कब, क्या दिखाना है और क्या बिल्कुल नहीं दिखाना है, यह भी सत्ताधीश ही तै कर रहे थे. वीसा देने में ऐसी राजनीतिक मनमानी चली कि खेलने वाले देशों के दर्शक, विशेषज्ञ, पत्रकार आदि यहां आ ही नहीं सके. एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन पार्टी का आयोजन बना दिया गया. सब तरफ हम-ही-हम थे : जुटाई हुई भीड़ ! इसलिए खेलबाजी कम, भीड़बाजी ज्यादा थी. मुहम्मद सामी और  मुहम्मद सिराज के खेल ने सबकी बोलती बंद कर दी थी अन्यथा उन्हें निशाने पर रखने की कोशिशें कम नहीं हुई थीं. भीड़ ऐसी ही होती है. वह देखने नहीं, दिखाने आती है. ऐसी भीड़ न खेल समझती है, न खिलाड़ी !

प्रधानमंत्री जिस तरह अहमदाबाद का फाइनल देखने अवतरित हुए, वह हमारी हार की सारी कलई खोल गया. यदि भारत की मजबूत स्थिति होती तो वे एकदम शुरू में ही स्टेडियम में आ बैठते. कैमरा भी जानता कि उसे कब, कैसे व कितनी देर तक वहीं टिके रहना है जहां वे बैठे हैं. लेकिन यहां तो कैमरे ने जैसे आंखें ही बंद कर लीं. बहुत पहले अहमदाबाद पहुंच चुके प्रधानमंत्री को बता दिया गया था कि हमारी सारी योजना के बाद भी खेल में हमारी हालत बिगड़ी हुई है, सो प्रधानमंत्री तुरंत नहीं, घंटों बाद स्टेडियम पहुंचे. कब पहुंचे, कैमरे ने बताया भी नहीं. स्टेडियम में पहुंचाई गई भक्त-मंडली भी एकदम खामोश हो गई. आस्ट्रेलियाई कप्तान ने मैच से पहले ही कह दिया था कि भारतीय टीम के लिए चीखती भीड़ को खामोश कर देने जैसा आनंद हमारे लिए दूसरा नहीं होगा ! सो, वह सन्नाटा ही हमारी पराजित मानसिकता का गवाह बन कर स्टेडियम में गूंजता रहा. फिर लोगों के खिसकना भी शुरू कर दिया. किसी को यह आंकड़ा भी बताना चाहिए कि जब भारत हारा तब स्टेडियम में कितने लोग मौजूद थे ? जो तब थे वे ही क्रिकेट के लिए थे, बाकी जुटाए गए सब तो खिसक चुके थे. 

विजेता टीम को विश्वकप सौंपने प्रधानमंत्री जब आस्ट्रेलियाई उप-प्रधानमंत्री के साथ मंच पर पहुंचे तब तो इतनी हास्यास्पद स्थिति बनी कि खुदा खैर करे ! प्रधानमंत्री खेल-भावना का निर्वाह करने की शालीनता भी नहीं निभा सके, उनके ध्यान में यह भी नहीं रहा कि उनके साथ आस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री भी हैं जो विजेता-भाव से भरे हैं. अपना फूला मुंह लिए उन्होंने किसी तरह आस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस को कप थमाया और उल्टे पांव मंच से उतर चले. उन्होंने न जीत की बधाई में आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों से एक शब्द ही कहा, न उल्लास से उन्हें सराहा, न अपने समवर्ती उप-प्रधानमंत्री की गरिमा का ख्याल रखा. जब मन पराजित होता है तब वह इतना ही बेजायका हो जाता है. उनकी दूर जाती पीठ को देख कर कमिंस ने चेहरे पर वही भाव नाच उठा जो पस्त-पराजित को देख कर विजेता के चेहरे पर आता है. कहते हैं कि वहां से प्रधानमंत्री भारतीय ड्रेसिंगरूम गए व खिलाड़ियों से कहा कि वे जीत-हार भूल कर, अपने उम्दा खेल को याद करें, हम आपके साथ हैं. लेकिन यह सब खोखली, राजनीतिक चाल भर रह गयी क्योंकि इससे ठीक पहले आपने जो किया, वही आपकी चुगली खा रहा था. वैसे एक जवाब क्रिकेट बोर्ड को देना चाहिए कि प्रधानमंत्री भारतीय ड्रेसिंगरूम में कैसे प्रवेश पा गए ? नियम कहता है कि वहां खिलाड़ियों के अलावा किसी का भी प्रवेश नहीं होना चाहिए. नियम में प्रधानमंत्री अपवाद हैं, ऐसा नहीं लिखा है. कितना स्वाभाविक होता कि हमारी टीम स्वंय मैदान में आ कर प्रधानमंत्री से मिलती ! यह प्रधानमंत्री के लिए शानदार होता और  खिलाड़ियों के लिए पराजित मानसिकता से बाहर आने का मौका बन जाता. 

यह सब तो पराजित मन की बात हुई लेकिन हम खेल में भी हारे. टीम राहुल द्रविड़ ने पूरे अभियान में एक अजीब रवैया अपनाया जैसे जीत मुट्ठी में बंद कोई जुगनू है कि जो मुट्ठी खोलते ही उड़ जाएगा. यही राहुल द्रविड़ थे जिन्होंने कोच बनने के बाद से भारतीय टीम का सही स्वरूप सुनिश्चित करने के लिए कितने ही खिलाड़ियों को आजमाया, उनका बैटिंग-क्रम बदला, कितनी रणनीतियां बनाई-बदलीं, खिलाड़ियों की निश्चित भूमिकाएं तय कीं और उन पर जोर डाला कि वे वैसी ही भूमिका में खेलें. ऐसा सब बार-बार करने के बाद वे 15 खिलाड़ी छांटे गए जिनसे हर मैच की जरूरत के हिसाब से भारतीय टीम बनानी थी. लेकिन आस्ट्रेलिया के साथ हमारा पहला मैच जैसे ही संकट में पड़ा, और हम किसी तरह जीत सके, टीम राहुल को जैसे लकवा मार गया. उसने मैचों के हिसाब से कोई प्रयोग किया ही नहीं. जो टीम बन गई वही अंत तक बनी रही. वो तो हार्दिक पंड्या घायल हो गए तो मुहम्मद समी को टीम में जगह मिली. टीम जिस तरह लगातार जीतती गई, उसने सुरक्षित रहने का मानस बना दिया. आपने ‘टीम में कोई परिवर्तन नहीं’ का सूत्र भले बना लिया, स्थान, मैच, विपक्ष, खेल की मांग तो परिवर्तित होती रही. आपने कुछ भी बदलाव नहीं किया. अगर नाव को नदी के वेग से ही बहना था तो नाविक की जरूरत क्या थी ? 

अश्विन को पहले मैच में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मौका मिला और हमेशा की तरह उन्होंने बेहतरीन गेंदबाजी की. अश्विन अपनी शैली के विश्व के नायाब स्पिनर हैं. उनकी हर गेंद विकेट लेने ही लपकती है. इसलिए आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने उनके सामने हर अनुशासन का पालन किया. अश्विन के हाथ उस मैच में 1 विकेट लगा. इसके साथ ही अश्विन का खेल पूरा मान लिया गया जबकि हम देख रहे थे कि कुलदीप व जाडेजा दोनों उतना प्रभाव पैदा नहीं कर पा रहे हैं और विपक्ष धीरे-धीरे उन्हें पढ़ता भी जा रहा है. इससे बचने के लिए भी जरूरी था कि अश्विन-कुलदीप-जडेजा की तिकड़ी को खूब फेंटा जाता. फाइनल में आस्ट्रेलिया आया तो जरूरी था कि अश्विन को सिराज या जडेजा की जगह लाया जाता. अश्विन का बल्ला भी मजबूत है, तो यह प्रयोग किया ही जाना था. लेकिन टीम राहुल को अजीब-सी जड़ता ने जकड़ लिया. ऐसा ही सूर्यकुमार यादव के साथ हुआ. एक तरफ वे लगातार विफल हो रहे थे, तो दूसरी तरफ  उन्हें खेलने का मौका भी कम मिल रहा था. फाइनल में, जब हम कमजोर हालत में पहुंच चुके थे और जरूरत थी कि आस्ट्रेलिया का तिलस्म छिन्न-भिन्न किया जाए, सूर्यकुमार को बल्लेबाजी में ऊपर ला कर देखना ही चाहिए था. वे चल जाते तो आस्ट्रेलिया की पकड़ टूट जाती, नहीं चलते तो भी कुछ जाता नहीं हमारा. उन्हें जाडेजा के बाद बैटिंग के लिए भेजना कैसी रणनीति थी ? जाडेजा पहले आ कर कई बेशकीमती गेंदें खा कर लौट गए तथा सूर्यकुमार भी कुछ कर तो नहीं सके.   

ओपनिंग में आक्रामकता की रोहित-रणनीति बहुत मोहक थी लेकिन हर गेंद पर छक्का ! फाइनल में टॉस हारने के बाद भारत की रणनीति तो यही होनी चाहिए थी कि सावधानी से खेलते हुए ज्यादा-से-ज्यादा रन जमा करें हम ताकि उसके बोझ तले आस्ट्रेलियाई उसी तरह टूट जाएं जैसे न्यूजीलैंड टूटा था ! हमें पता था कि विश्वकप में भारतीय पारी की रीढ़ रोहित के बल्ले से बनी है. रोहित अपनी लय में खेल भी रहे थे, फिर उस अंधाधुंधी का मतलब क्या था जबकि उस ओवर में 10 से अधिक रन बन ही चुके थे. हम यह भी देख रहे थे कि आस्ट्रेलियाई भूखे चीते की तरह फील्डिंग कर रहे थे, तो विशेष सावधानी की जरूरत थी. रोहित के खेल में वह सावधानी नहीं दीखी. गिल जैसे शॉट पर आउट हुए वह टेस्ट स्तर का कोई बल्लेबाज फाइनल में मारेगा क्या ? खेल तो खेल है लेकिन उसके पीछे एक योजना होती है जो खेल का चेहरा बदल देती है. फाइनल में वह योजना सिरे से गायब थी. 

तो हम चौतरफा हारे ! हमें अब चौतरफा वापसी करनी होगी. पहले क्रिकेट लौटेगा, फिर सफलता भी लौटेगी. ( 23.11.2023)

Saturday, 18 November 2023

नीतीश कुमार का अपराध : नीतीश कुमार की माफी

 यह अपने-आप में अनोखा था. कभी देखा नहीं था कि कोई मुख्यमंत्री सदन में और सदन के बाहर भी अपनी कही किसी बात के लिए बार-बार इस तरह माफी मांग रहा हो कि उसे अपनी कही बात की सच में ग्लानि हो. जुमलेबाजी पर टिकी आज की राजनीतिक संस्कृति में, जुमलेवाली माफी और सच्ची माफी में जो फर्क होता है, वह पहचानने का विवेक अभी जिंदा है. इसलिए कह सकता हूं कि नीतीश कुमार को माफी मिल ही जानी चाहिए. जुमले उछालना, झूठ बोलना, गलत बोलना और अनगढ़ ढंग से बोलना, दो सर्वथा भिन्न बातें हैं. 

बोलने का सच यह है कि जब कभी हम बोलते हैं तो अपनी तरह से ही बोलते हैं लेकिन बोलते हमेशा दूसरे के लिए हैं. यदि सुनने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दूसरा कोई न हो, तो हम बोलें ही नहीं. बोलना बड़ी जिम्मेवारी है. बार-बार दोहराई लेकिन फिर भी ताजा-के-ताजा वह बात सौ टंच खरी है कि वाण से छूटा तीर व जुबान से निकली बात वापस नहीं आती है. इसलिए तो वाक्-संयम को गीता ने स्थितप्रज्ञ्य के लक्षणों में एक माना है.  राजनीति में स्थितप्रज्ञ्यता की न जगह मानी जाती है, न गुंजाइश !

नीतीश कुमार को उस रोज अपनी तरह से वह बात कहनी थी जो उन्होंने पहले कभी कही ही नहीं थी; उन्हें अपनी सरकार की सफलता के झंडे भी लहराने थे जैसे हर राजनीतिज्ञ लहराता है; उन्हें विपक्ष पर गहरा कटाक्ष कर उसे व्यर्थ के बकवासी भी साबित करना था. इस नट-लीला में वे फंस गए. तनी हुई रस्सी पर संतुलन साधता नट संतुलन खो कर गिरता भी तो है न ! गिरना खेल के गलत होने का प्रमाण नहीं है; खिलाड़ी के चूकने का प्रमाण है. 

बोलना तीन तरह का होता है : गलत बोलना,  असभ्यता से बोलना तथा सर्वथा झूठ बोलना ! लोकतंत्र के संदर्भ में एक तीसरा प्रकार भी है : असंवैधानिक बोलना ! नीतीश कुमार ने उस रोज जो कहा व जिस तरह कहा वह दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है. भाषा की यह दिक्कत जगजाहिर है. वह यदि लोक-व्यवहार से गढ़ते-गढ़ते तराश न दी गई हो तो भोंढी लगती है और अपना अर्थ संप्रेषित करने में विफल होती है. कितनी तो आलोचना गांधीजी की हुई, होती रहती है कि उन्होंने संसदीय लोकतंत्र को ‘बांझ व वेश्या’ कह कर स्त्री-जाति को हीन बताया. गांधीजी की तरफ से ऐसे ‘अभद्र’ शब्द आएं, कई लोगों को तो यही नहीं पचा. किसी को इसमें गांधीजी की पुरुष मानसिकता के दर्शन हुए. गांधीजी ने कहा : मैं जो कहना चाहता हूं उसके लिए इससे अधिक मौजूं शब्द मिला नहीं मुझे ! मिल जाएगा तो बदल दूंगा ! यहां मेरी तरफ से नीतीश कुमार व गांधीजी की तुलना या साम्यता का मतलब न निकालें पाठक बल्कि भाषा की मर्यादा का एक उदाहरण मात्र समझें. 

नीतीश कुमार को साबित यह करना था कि उनकी सरकार के प्रयासों से जनसंख्या नियंत्रण का प्रयास सफल हुआ है. वे आंकड़ों से उसका प्रमाण भी देते रहे. विपक्ष उनका दावा मानने को तैयार नहीं था. इसलिए उन्हें विपक्ष को धूल-धूल कर देना था, उसे उसकी सही जगह दिखला देनी थी तो उनकी आक्रामकता बढ़ने लगी. वे बताने लगे कि जनसंख्या नियंत्रण में दिक्कत क्या-क्या आती है. पति या पुरुष कामुक हुआ जाता है और स्त्री उसके सामने बेबस हो जाती है. यह सब बताने में समर्थ भाषा हमने विकसित ही नहीं की है, क्योंकि यह सब ‘गुप्त ज्ञान’ के भीतर आता है. हमारे समाज में यौन-शिक्षा का जैसा हाल है वह नीतीश कुमार की देन नहीं है बल्कि हम सबकी तरह नीतीश कुमार भी उसके शिकार हैं. हमारे यहां यौनिक संदर्भ की भाषा विकसित ही नहीं हुई है क्योंकि उसे हमने हमेशा अत्यंत निजी, किसी हद तक गुप्त विषय ( गुप्त रोग ! ) माना है. इसमें अंग्रेजी का हमारा अत्यंत सीमित  (व विकृत !) ज्ञान हमारा सहारा बनता है. अंग्रेजी का हमारा अज्ञान हमें वैसा कुछ कह कर निकल जाने की सुविधा देता है जिसे हम ठीक से समझते भी नहीं है. ‘चुम्मा’ कहो तो अशिष्ट लगता है, ‘चुंबन’ कहो तो कालिदासीय क्लिष्टता लगती है, तो हम ‘किस’ कहकर निकल जाते हैं जिसमें न मिठास मिलती है, न अपना कोई संदर्भ मिलता है लेकिन अंग्रेजी में है तो भद्र ही होगा, ऐसा जमाना मानता है, तो हम भी मानते हैं.  

नीतीश कुमार को कहना यह था कि लड़की पढ़ी-लिखी, जानकार होगी, जैसाकि हमारी सरकार उसे बनाने में लगी है, तो वह अपने पति की कामुकता को नियंत्रित कर सकेगी, उसे गर्भ न रहने के प्रति सचेत कर सकेगी. इसे आप भदेशपन से कहेंगे तो नीतीश कुमार का हाल होगा आपका, अंग्रेजी में ‘विद्ड्रॉल’ कहेंगे तो भद्रता मान कर आपको बरी कर दिया जाएगा. जब नीतीश कुमार आक्रामक हास्य की मुद्रा में यह सब कह रहे थे तो वे समझ रहे थे कि वे कुछ अटपटा कह रहे हैं लेकिन यही तो राजनीति है; और राजनीति ऐसी सावधानी कब रखती है ! वह तो हमेशा कह देने की बाद की प्रतिक्रिया से, अपने कहे की सार्थकता या निरर्थकता आंकती है और अपना अगला कदम चुनती है.  यही नीतीश कुमार ने भी किया. 

उनकी खुली सार्वजनिक माफी ही यह बताती है कि जो कुछ कहा उन्होंने वह इरादतन महिलाओं का अपमान करने, यौनिकता को राजनीतिक हथियार बनाने या अपनी यौन कुंठा को तुष्ट करने का जायका लेने जैसा नहीं था. वे इस नाहक के विवाद और अपनी रौ में बह जाने के परिणाम से त्रस्त व्यक्ति की ईमानदार माफी थी. स्त्री-वर्ग के रूप में बिहार की महिलाओं को नीतीश कुमार ने सशक्त ही किया है, उनमें उत्साह भरा है, उनकी उमंगों को अपनी व्यवस्था का आधार भी दिया है. मुझे अंदाजा नहीं है कि उनके मंत्रिपरिषद में यौन अपराधियों को कितनी जगह मिली हुई है याकि ऐसे अपराधियों के प्रति उनका रवैया कैसा है.  यदि यह आंकना हो तो प्रधानमंत्री समेत केंद्रीय मंत्रिमंडल का चेहरा अच्छा नजर नहीं आएगा. लेकिन इस आधार पर नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग याकि दूसरे किसी को सरकार की बागडोर सौंप देने की मांग अतिवादी मांग है. मांगने करने वालों को यह समझना चाहिए कि  यह अपराध से कहीं बड़ी सजा देने की अविवेकी भूल होगी. व्यापक सार्वजनिक भर्त्सना के रूप में उन्हें अनगढ़ अभिव्यक्ति की वह सजा मिल चुकी है जो किसी राजनेता के लिए सबसे बड़ी सजा होती है. अब आगे की नितीश कुमार जानें. लेकिन कुछ तो हम भी जानें. हम सब बड़ी सावधान सावधानी बरतें कि किसी भी हाल में, कैसी भी परिस्थिति में हमारी सार्वजनिक अभिव्यक्ति यौनिक गालियों या प्रतीकों का सहारा न ले. ऐसी हर अभिव्यक्ति औरत का अपमान करती है; ऐसी हर अभिव्यक्ति यह भूल जाती है कि यौनिकता स्त्री-पुरुष दोनों की साझा विरासत है. हम जब ऐसे अपशब्दों में बात करते हैं तो खुद को भी, अपनी महिला को भी और सारी महिला साथियों को भी क्षुद्रतर साबित करते हैं. नीतीश-प्रसंग यदि हमें इतना सचेत कर दे तो हमें उन्हें माफ तो कर ही देना चाहिए.  ( 17.11.2023) 

Wednesday, 15 November 2023

कबीर दास की उल्टी वाणी

 चुनावी बुखार ऐसा ही होता है ! आप हमेशा ही सन्निपात में होते हैं. फिर आपको अहसास ही नहीं होता है कि आप जो कह रहे हैं वह कहने लायक है या नहीं; और यह भी कि आप जिनका गर्व से, अपनी उपलब्धि बना कर बखान कर रहे हैं, वह गर्व करने जैसी उपलब्धि है भी या नहीं ! चुनावी बुखार ऐसा ही होता है जिसका मरीज, बकौल विनोबा भावे, तीन ही बात बकता है : आत्मस्तुति, परनिंदा, मिथ्या-भाषण ! इन दिनों इनकी पराकाष्ठा हुई जा रही है. और आजकल के चलन के मुताबिक प्रधानमंत्री ही इन सबके सिरमौर हैं. 

अयोध्या में, सरयू नदी के तट पर एक ही दिन, एक ही वक्त में 22 लाख दीपों को प्रज्ज्वलित किया गया ! क्यों ? यह थी हिंदुओं की ताकत की घोषणा व वोटों को कमल का रास्ता दिखाने की प्रधानमंत्री की योजना ! इसके तुरंत बाद हमने देखा कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड के किसी अधिकारी से यह प्रमाण-पत्र ले रहे हैं कि यह एक साथ सबसे अधिक दीप जलाने का विश्व कीर्तिमान हुआ ! यह सब सन्निपात का जीता-जागता उदाहरण है. 

22 लाख दीपों से पता क्या-क्या चला ? पहली बात तो यही पता चली कि ये 22 लाख दीप सरकारी थे. इनमें सरकारी तेल इनमें भरा गया था और जिनकी भी ड्यूटी लगाई गई होगी, उन सबने इसे जलाया था. इन दीपों के पीछे अयोध्या के लोग नहीं थे. अगर लोगों की स्वस्फूर्त भागीदारी से ये दीप जुड़े व जले होते तो मुख्यमंत्री-राज्यपाल इसका प्रमाण-पत्र लेने क्यों अवतरित होते ? तो मिथ्याचार का पहला बैलून तो यही फूटा ! गिनीज वाले ऐसे व्यापारी हैं जो लोगों की सनक व बहक का व्यापार करते हैं. सरकार का मुखिया जब उनसे प्रमाणपत्र लेने की कतार में खड़ा हो जाता है तब समझ में आता है कि सरकार कैसी है, उसकी प्राथमिकताएं कैसी हैं. मुख्यमंत्री की समझ का यह दूसरा बैलून फूटा ! गिनीज वालों को बुलडोजर से सबसे ज्यादा घर गिराने वाली सरकारों की प्रतियोगिता करवानी चाहिए. इस श्रेणी में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जरूर आला साबित होंगे. जब तक आपका घर बुलडोजर के सामने न हो तब तक इस अपराध की नृसंशता आपकी समझ में नहीं आएगी.  

जो अंधभक्ति का रोगी न हो व जिसकी दिमागी हालत ठीक हो वह तुरंत पूछेगा कि 22 लाख दीपों में कितना तेल जला होगा ? उनसे कितना प्रदूषण फैला होगा ? 22 लाख दीपों का कितना कचरा सड़कों पर जमा हुआ होगा ? उन्हें अयोध्या में कहां दफनाया जाएगा ? आज सारी दुनिया जिन संकटों से घिरती जा रही है, ये 22 लाख दीप उन्हें और भी गहरा करेंगे. ये रोशनी वाली दीपों की दीपावली नहीं, मूढ़ता का अंधेरा फैलाने वाली सरकारी योजना थी. पराली जलाने वाले किसानों पर दिल्ली के प्रदूषण का ठीकरा फोड़ने वालों को यह समझना चाहिए कि 22 लाख दीपों ने उससे कई गुना ज्यादा जहर पर्यावरण में फैलाया है.  

हमें इन 22 लाख दीपों के बगल में मुंबई का यह चेहरा रख कर समझना चाहिए कि वहां कैसी आपात स्थिति में विशेष मार्शलों की नियुक्ति करनी पड़ रही है ये मार्शल मुंबई की सड़कों पर उतर कर रात-दिन इसकी निगरानी करेंगे कि कौन-कहां सड़कों पर गंदा बिखेर रहा है, कौन-कहां कूड़ा जला रहा है, और कौन-कहां सड़कों पर गंदगी फेंक रहा है. इन मार्शलों को यह अधिकार दिया गया है कि वे कानूनी निर्देशों का उल्लंघन करने वालों को वहीं-के-वहीं दंडित कर सकेंगे. मुंबई कूड़े के एक बड़े ढेर में बदलती जा रही है जिसे हिंदुत्ववादी मनमानी ने और भी बदसूरत बना दिया है. देश की राजनीतिक राजधानी भी और औद्योगिक राजधानी भी ‘डेथ बाई ब्रेथ’ - सांस में छिपी मौत - जैसे संकट से गुजर रही है. एक स्थान पर, एक साथ जले 22 लाख दीपों ने मौत का सघन आयोजन ही किया है, भक्ति का विवेक नहीं जगाया है. 

हमें यह समझना ही चाहिए कि दीप जलाना, पटाखे फोड़ना, आरती करना, ढोल बजाना, अजान देना, सार्वजनिक तौर पर नमाज पढ़ना, नए साल का जश्न मनाना, विभिन्न झांकियां निकालना आदि सारे आयोजन जब तक सीमित संख्या में, निजी विश्वासों की अभिव्यक्ति के तौर पर मनाए जाते थे, समाज में घुल जाते थे. जैसे-जैसे इनकी संख्या विशालतर होती गई, इन्हें राजनीतिक हथियार की तरह आयोजित करवाया जाने लगा, निजी आस्था की जगह यह भीड़ के उन्माद में बदलने लगी वैसे-वैसे यह असामाजिक होती गई. जैसे प्रकृति को आप अवकाश देते हैं - याद कीजिए, करोना के दौरान की बंदी - तो वह प्रदूषण का इलाज अपने आप कर लेती है. जब आप उसे सांस खींचने का मौका भी नहीं देते हैं, तो उसका भी, और समाज का दम भी घुट जाता है. इसलिए इन सारे सवालों को धार्मिक संकीर्णता के चश्मे से नहीं, हमारी आधुनिक जीवन-शैली व धार्मिक संकीर्णता से पैदा संकट के रूप में देखना चाहिए और उसका हल खोजना चाहिए. दीप में उन्माद का तेल जलाने से, विवेक का दीपक नहीं जलता है. 

संकट यह है कि इसमें कोई किसी से बेहतर बनना नहीं चाहता है. सभी दूसरे से बढ़ कर पतनशील होने में लगे हैं. राममंदिर की पूरी ठेकेदारी भाजपा ने खुद के लिए घोषित कर रखी है तो कांग्रेस को बड़ी मुश्किल हो रही है. अगर राम पूरे-के-पूरे भाजपा के खेमे में चले गए तो वोट का क्या होगा, इसकी चिंता उसे खाए जा रही है. मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री का कांग्रेसी चेहरा चीखता है: याद करो कि रामलला का ताला किसने खुलवाया था ! बताओ , वहां पूजा-अर्चना की अनुमति किसने दिलवाई थी ? वह चीख-चीख कर बता रहा है उसने भी दूसरे कई मंदिर बनवाए हैं - भव्य व विराट मंदिरों के निर्माण का काम आज भी चल रहा है. तो, होड़ यह है कि हिंदू केवल आप नहीं, हम भी हैं. विदेशी हिंदुओं को नैतिक शक्ति देने इन दिनों अमरीका गए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रधान मोहन भागवत यह घोषणा काफी पहले कर चुके हैं कि भारत में रहने वाले सभी हिंदू हैं. सभी हिंदू हैं तो सभी से एक-सा व्यवहार क्यों नहीं हो रहा है भागवतजी ? 

एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री ने बड़े गर्व से घोषणा की कि देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की जिस सुविधा का अंत अभी होने जा रहा था, उसे मैं 5 साल के लिए आगे बढ़ाने की घोषणा करता हूं. ऐसी घोषणाएं तो राजा-महाराजा करते थे, लोकतंत्र में ऐसी घोषणा कोई प्रधानमंत्री तभी कर सकता है जब इसकी चर्चा व इसकी स्वीकृति मंत्रिपरिषद में हो चुकी हो. यदि संसद चल रही हो तो इसकी चर्चा संसद में होनी चाहिए. लेकिन यहां आलम तो यह है कि न मंत्रियों को न अपनी, न अपने मंत्रालयों की हैसियत से सरोकार है, न मंत्रिपरिषद का कोई वैधानिक मतलब रहने दिया गया है. सारी व्यवस्था हुआं-हुआं करने वाले सियारों के झुंड में बदल दी गई है. लेकिन सियार कितना भी हुआं-हुआं करें, प्रधानमंत्री की एक इस राज-घोषणा ने उनके 9 वर्षों को खोखला कर, सड़क पर खड़ा कर दिया है. 

पिछले 9 सालों से विकास के जो तमाम दावे चीख-चीख कर किए जा रहे हैं, आंकड़ों की बमबारी, सबसे तेज अर्थ-व्यवस्था का नारा, खरबों की अर्थ-व्यवस्था का आसमान छूने की घोषणा, सारी दुनिया को राह दिखाने का दम, संसार के हर कोने को छू आने की बाजीगरी, क्या वह इन 80 करोड़ भारतीयों को छोड़ कर किया जाने वाला कारनामा है ? 80 करोड़ लोग यदि इतने विपन्न हैं कि मुफ़्त सरकारी अनाज ही उनका पेट भर सकता है तो इससे दो बातें साबित होती हैं. भारतीय ऐसी निकम्मी कौम के लोग हैं जो अपना पेट भरने लायक मेहनत भी नहीं करते हैं; भारत सरकार इतनी निकम्मी है कि तमाम मनमानी व्यवस्था बनाने के बाद भी देश के 80 करोड़ लोग ऐसी विपन्नता के शिकार हैं कि सरकार खिलाएगी तो खाएंगे, नहीं तो भूखे सो जाएंगे. यह आँकड़ा भूखे 80 करोड़ लोगों का कम, 80 करोड़ का वोट पा कर बनी सरकार के चरित्र का ज्यादा परिचय देता है. यह आंकड़ा नित नई काट व चमक वाले कपड़ों में सजे-धजे प्रधानमंत्री की छवि का विद्रूप बनाता है. हम किसी का चूल्हा ठंडा नहीं रहने देंगे जैसी दावेदारी के पीछे न ईमानदारी है, न अपनी विफलता का अहसास !  

किसी भी सरकार या व्यवस्था की कसौटी यह है कि उसके लोग भूख, नंग, छत से वंचित तो नहीं हैं और जीने की न्यूनतम सुविधाओं से महरूम तो नहीं हैं ? आप इस संदर्भ में सवाल क्या पूछेंगे, यह सरकार खुद ही कह रही है कि 9 सालों से लगातार सत्ता में रहने तथा अमृतकाल की घोषणा करने के बाद भी 80 करोड़ लोग खाने को मोहताज हैं. यह उपलब्धि नहीं, शर्म का विषय है. कबीर को पता था कि ऐसे लोग आ सकते हैं. इसलिए उन्होंने कुछ उलटबासियां लिख छोड़ी हैं : बरसे कंबल, भींगे पानी ! सूरदास बना राष्ट्र कबीरदास को देखे-समझे कैसे ? 

चेहरा   बता   रहा   था   कि   मारा है भूख ने

हाकिम ने कह दिया कि कुछ खा के मर गया।

13 नवंबर 2023

Friday, 10 November 2023

कितनी खोखली आवाजें

  

कैसे शोरों से भर गया है भारत !  जैसे सारे देश में कोई हांका पड़ा है. हर तरफ से आवाजें-ही-आवाजें आ रही हैं. कोई यह नहीं देख या सोच रहा है कि कौन, किसे सुन रहा है. इन आवाजवालों को इसका होश भी नहीं है कि वे कह क्या रहे हैं. 

2014 में बनी भारत सरकार, 2018 में चुनावी बौंड की योजना ले कर आई थी. यह अंधेरे में काला कपड़ा पहन कर लूट करने की संवैधानिक योजना थी जिसे तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकृति से तैयार किया था. इसके गुण-दोष व इसी वैधानिकता पर विचार करने वाली य़ाचिका वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय की जेब में पड़ी थी. कैसा गजब है कि ऐसे संवैधानिक मामले, जिनका देश के वर्तमान व भावी से निर्णायक संबंध है, न्यायालय पहुँच तो जाते हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय प्राथमिकता के आधार पर उनकी सुनवाई नहीं करता है. कोई पूछे कि महाराष्ट्र विधान सभा का अध्यक्ष यदि अपने सदस्यों की वैधता का मामला राजनीतिक कारणों से वर्षों लटकाए रखता है तो चीफ जस्टिस उसे धमकाते हैं कि आप अनिश्चित काल तक उसे रोके नहीं रख सकते; और आप ऐसा करेंगे तो हम आदेश जारी करेंगे; फिर सर्वोच्च न्यायालय ऐसे महत्वपूर्ण मामले को कब तक लटकाए रख सकता है, इसकी जवाबदेही नहीं होनी चाहिए ? किसी भी राजनीतिक व संवैधानिक संरचना को यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतत: सब इसी संविधान की संतान हैं और यह संविधान भारत की जनता की संतान है. सर्वभौम सिर्फ जनता है जिसके प्रति संविधान की रोशनी में हर कोई जवाबदेह है.  

  फिर भारत की सर्वोच्च अदालत में खड़े हो कर भारत के एटर्नी जेनरल आर. वेंकटमणी यह लिखित बयान कैसे दे रहे हैं हैं कि भारत की जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि किस आदमी ने, किस पार्टी को कितना पैसा दिया है ? जो सरकार जनता के वोट से बनती और जनता के नोट से चलती है, उस सरकार का कानूनी नुमाइंदा जब यह कहता है कि जनता को यह जानने का अधिकार है ही नहीं कि उसके पैसे का कौन, कैसा इस्तेमाल कर रहा है तब वह कह यह रहा होता है कि जनता की कोई हैसियत ही नहीं है. इन वेंकटरमणी महाशय को भी महीन की तनख्वाह जनता ही देती है और अदालतों की यह सारी व्यवस्था भी जनता के पैसों पर ही टिकी हुई है. फिर अदालत में खड़े हो कर ऐसा कहना महान मूढ़ता का या फिर महान अहमन्यता का प्रमाण है. यह देश की जनता की सार्वभौमिकता पर हमला है. 

इससे भी हैरानी की  बात यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत ऐसा सरकारी दंभ सुन भी लेती है और चुप भी रहती है. अदालतें वैसे तो लोगों को धमकाती ही रहती हैं, जज महाशयों को यह कहने की आदत है कि हम आपको बता देंगे कि हम कौन हैं लेकिन जब सामने सत्ता का प्रतिनिधि खड़ा हो तो अदालत भी ऊंचा सुनने लगती है और बोलते हुए हकलाने लगती है. 

राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन कहां से मिले, यह यक्ष प्रश्न है. यह आर्थिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार की गंगोत्री है. तब सवाल यह उठता है कि चुनावी बौंड योजना क्या चुनाव में धनपतियों के हस्तक्षेप पर रोक लगाती है ? इस हस्तक्षेप को काबू में करने की कोई कोशिश अब तक प्रभावी नहीं हुई है क्योंकि राजनीतिक दल ईमानदार नहीं हैं. जरूरत ऐसा रास्ता खोजने की थी; और है, कि जिससे इस गठबंधन शह दिया जा सके. तो सामने आई चुनावी बौंड योजना. यह वह अनैतिक योजना है जो बेईमानी को कानूनसम्मत बनाती है. दाता कौन है, यह पता नहीं है. आप पता करें, यह आपका अधिकार नहीं है. जिन्हें भीतरखाने पता है, वे इस खेल में शरीक हैं. इस तरह की गुमनामी किसी को धनबल से जनबल को परास्त करने का असंवैधानिक अधिकार देती है. इससे दाताओं को सत्ता का अभय मिलता है. इसलिए ही तो 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी को अकूत धन मिलता रहा है. बाकी पार्टियां सुदामा से ज्यादा हैसियत नहीं रखती है. यह भारतीय जनता पार्टी का कमाल नहीं, सत्ता का कमाल है. कल को दूसरी कोई पार्टी सत्ता में होगी तो यह सारा धन उसकी तरफ बहने लगेगा. ऐसी व्यवस्था न नैतिक है, न लोकतांत्रिक और न संविधानसम्मत. चुनावी बॉंड वैसी सरकारी पहल थी जिसे लोकतांत्रिक संविधान की रक्षा की संवैधानिक शपथ लेने वाली न्यायपालिका को आगे बढ़ कर निरस्त कर देना था. लेकिन ऐसा करना तो दूर,अदालत इसकी सुनवाई को ही तैयार नहीं हुई; और अब उसके सामने ही बगैर किसी रोक-टोक के सरकार कह रही है कि जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि सत्ता व धनपति मिल कर कैसा खेल रच रहे हैं. यूपीए कानून जिस तरह अदालत के संवैधानिक अधिकार की तौहीन करता है, चुनाव बौंड भी उसका वैसा ही माखौल उड़ाते हैं.     

मणिपुर का नाम आते ही सरकार को सांप सूंघ जाता है. कई शब्द प्रधानमंत्री के शब्द-ज्ञान के बाहर हैं. मणिपुर भी ऐसा ही एक शब्द है. गृह मंत्रालय ने अपने शब्दकोश से यह शब्द निकला ही दिया है. वहां हो क्या रहा है और हो क्यों रहा है जैसे सवाल आज कौन पूछे और किससे ? छापे वाला और फोटोवाला, दोनों मीडिया अब देश में कहीं बचा नहीं है. मीडिया के नाम पर सत्ता की जुगाली करते व्यापारिक संस्थान हैं जो कागज भी गंदा करते  हैं और देश का मन भी. आज गजापट्टी में भी हमारे यहां से ज्यादा सार्थक मीडिया सांस लेता है. 

जब मणिपुर के बारे में कुछ न बोलने का निर्देश है तब मणिपुर के बारे में बोल रहे हैं असम राइफल्स के डायरेक्टर जेनरल लेफ्टिनेंट जेनरल पी.सी. नायर ! कभी रवायत रही थी कि फौज-पुलिस राजनीतिक बयानबाजी नहीं करती थी; उन्हें इसकी अलिखित संवैधानिक-सी मुमानियत थी. लेकिन नया ढर्रा तो यह बना है कि फौज विदेशी मामलों पर नीतिगत बयान देती है; सरकार उससे ही अपने कारनामों पर पुताई करवाती है और हमें महावीर चक्र वाले चूहे दिखाई देने लगते हैं. आज पुलिस का अधिकारी मणिपुर के भूत-भविष्य व वर्तमान की तस्वीर खींचता है. जब लोकतंत्र में से ‘लोक’ खत्म हो जाता है तब ‘तंत्र’ अपनी ही प्रतिध्वनि से आसमान गुंजाता है. अपनी ही सुनता-सुनता है. 

नायर साहब कह रहे हैं कि मणिपुर धीमे-धीमे शांति की तरफ लौट रहा है. और वे बेहद चिंतित हैं कि मणिपुर में बड़े पैमाने पर जो हथियार लूटे गए हैं, वे कहीं गलत हाथों में न पड़ जाएं. राज्य सरकार कह रही है कि सरकारी हथियार गोदाम से जो हथियार लूटे गए हैं, उनका चौथाई भी लौटा नहीं है. नायर साहब कहते हैं कि यदि ये हथियार वापस नहीं लौटे तो इसका मतलब होगा कि ये गलत हाथों में चले गए हैं. उनमें से बहुत सारे आतिवादियों के हाथ में पहुंच गए होंगे. वे गहन विश्लेषण करते हैं और कहते हैं कि इन हथियारों की मदद से अतिवाद फिर सर उठा सकता है. उनसे पूछना यह चाहिए कि सरकारी गोदामों से यदि हथियार लूट लिए गए तो आपकी नौकरी अब तक सलामत कैसे है ? उनसे पूछना यह भी चाहिए कि यदि गोदामों से हथियार लूट लिए गए यह सच है, तो क्या इससे यह साबित नहीं होता है कि गोदाम की चाभियां गलत हाथों में थीं ? नायर साहब जैसे बड़ी कुर्सियों वाले अधिकारी होते ही इसलिए हैं कि वे सही व गलत का विवेक करें. आप रो रहे हैं कि हथियार कहीं अतिवादियों के हाथ न पहुंच जाएं ? मतलब क्या हथियार दो तरह के लोगों के हाथ में गए हैं : अतिवादी व शांतिवादी ? यहीं समस्या की जड़ है. 

जनजातियों के बीच टकराव का इतिहास बहुत पुराना है. हमारे समाज में जातीय संगठनों के आपसी संघर्ष इसका ही आधुनिक संस्करण हैं. मणिपुर में भी मैतेई व कुकी लोगों के बीच यह पहला संघर्ष नहीं है. फिर क्या हुआ कि इस बार संघर्ष का स्वरूप इतना भयंकर व इतना लंबा हो गया है ? फिर क्या हुआ कि मणिपुर में सत्ता पेट्रोल ले कर आग बुझाने पहुंच गई ? मणिपुर की दो जनजातियों के बीच का संघर्ष देशी-विदेशी हथियारों की जंग में बदल गया तो नायर साहब जैसों की जरूरत क्या है देश को ? फौज-पुलिस का काम किसी एक पार्टी की तरफ से खेलना नहीं होता है बल्कि लड़ाई को दबाना होता है. उस रास्ते में कोई भी आए उसे भी उतनी ही सख्ती से रास्ते से हटाना होता है. नायर साहब जैसे इस सच्चाई को छुपा जाते हैं कि हथियार लूटे ही नहीं गए हैं, बांटे भी गए हैं, पहुंचाए भी गए हैं. किसी को सत्ता का सहारा है, तो किसी को बाहरी ताकतों का उकसावा है. हिंदुस्तान उनके बीच पिस रहा है. ( 03.11.2023 )     

Monday, 23 October 2023

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

 साल भर से ज्यादा हुए. मन बेतरह घायल है.  कान युक्रेन की चीख से गूंजते रहते हैं. अपनी असहायता का तीखा बोध लगातार चुभता रहता है… यह शर्म भी कम नहीं चुभती है कि हमारा देश भी नागरिकों की इस जघन्य हत्या में भागीदार है, और युक्रेन व रूस में बहते खून में से तेल छान कर जमा करने में लगा है… यह सब था कि तभी 7 अक्तूबर 2023 आया. फलिस्तीनी हमास ने इसरायल पर ऐसा पाशविक हमला कर दिया कि जिसने शर्म से झुके माथे पर टनों बोझ लाद दिया. शर्म से झुका वह सर लगातार झुकता ही जा रहा है क्योंकि यह गुस्सा नहीं, आत्मग्लानि का बोझ है. असहमति, विवाद, गुस्सा, प्रतिद्वंद्विता, बदला, घृणा, कायरता व क्रूरता सबकी अपनी जगह है लेकिन इंसानियत की भी तो जगह है न ! सिकुड़ते-सिकुड़ते वह जगह अब सांस लेने लायक भी नहीं बची है. 

 

   सारी दुनिया में प्रकृति फुफकार रही है. बाढ़, आग, भूकंप से ले कर तरह-तरह के भूचालों से दुनिया घिरती जा रही है. ऐसा लगता है कि प्रकृति अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का एक-एक कर जवाब दे रही है. वह अब रोके नहीं रुकेगी. बची-खुची कमी नेता बन बैठे लोग पूरी किए दे रहे हैं.  सारी दुनिया में नागरिक पिस रहा है. सारी दुनिया में सत्ता आदमखोर बनी हुई है. यह हमारी सभ्यता की सबसे अंधी व अंधेरी गुफा है. इसे हम कैसे और कब पार कर  सकेंगे ? जवाब देने के लिए भी सर उठता नहीं है.  

 

   फिलिस्तीन-इसरायल समस्या का इतिहास बहुत लंबा व पुराना है - उतना ही पुराना जितना मानव जाति की मूढ़ता का इतिहास है.  यहां उसे दोहराने का अवकाश नहीं है. आंकड़ों और तारीखों का अब कोई संदर्भ भी नहीं रह गया है. कोरोना के आंकड़ों की तरह ही ये आंकड़े भी सच को बताते कम, छिपाते अधिक हैं. हमास ने जिस तरह इसरायल पर हमला किया वह उसकी मूढ़ता, ह्रदयहीनता व अदूरदर्शिता का प्रमाण है. हमास के शीर्ष राजनीतिक नेता खालिद मशाल ने कहा कि हम ऐसी चोट मारना चाहते थे कि इसरायल बिलबिला कर रह जाए; और वही हुआ. लेकिन ख़ालिद को अब यह नहीं दीख रहा है क्या कि दोनों तरफ के सामान्य निर्दोष नागरिक बिलबिला रहे हैं ? आज उनके साथ कोई नहीं है सिवा विनाश व मौत के ! एक बात यह भी कही जा रही है कि इसरायल व अरब देशों में जैसी आर्थिक नजदीकियां बढ़ रही थीं, उसे तोड़ने के लिए फलीस्तीन ने हमास द्वारा यह आत्मघाती कदम उठाया. अब अरबों के लिए इसरायल की तरफ हाथ बढ़ाना संभव नहीं रह जाएगा. यह सच हो तो यह कूटनीति भी कितनी अमानवीय है ! 

 

भारत के प्रधानमंत्री ने तुरंत बयान दे डाला कि भारत इसरायल के साथ खड़ा है. ऐसा कहने का अधिकार उन्हें कैसे मिला ? वे जिस संसद की कृपा से प्रधानमंत्री हैं क्या उस संसद में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित हुआ ? क्या इस बारे में संसद में कोई विमर्श हुआ ? क्या कुर्सी पर बैठा एक आदमी देश होता है ? आजादी से पहले से इस विवाद के संदर्भ में भारत की भूमिका स्पष्ट रही है. महात्मा गांधी ने स्वंय इस मामले में हमारी विदेश-नीति की बुनियाद बना दी थी. उसे बदलने का अधिकार केवल भारत की जनता का है. किसी भी सरकार को अधिकार नहीं है कि वह अपने खोखले बहुमत के घमंड में राष्ट्रीय नीतियों से खिलवाड़ करे. प्रधानमंत्री ने जो कह दिया, अब जा कर विदेश मंत्रालय ने दबी-ढकी जुबान में उस पर लिपापोती कर रहा है. उसने बयान दिया है कि भारत हमास की हिंसा का निषेध करता है लेकिन फलिस्तीनों की आजादी पर किसी भी तरह के हमले को समर्थन नहीं देता है. प्रधानमंत्री और उनके विदेश-मंत्रालय के बीच की ऐसी खाई कैसे बनी ? इसलिए बनी कि प्रधानमंत्री सोचते कम और बोलते अधिक हैं; किसी कि सुनते नहीं हैं, बस अपनी सुनाते हैं - मन की बात ! 

इधर देखिए कि सारा अमरीकी खेमा, पश्चिम के आका मुल्क इसरायल के समर्थन में खड़े हो गए हैं जैसे हमें पता ही नहीं है कि यही वह खेमा है जिसने फलीस्तीन के सीने पर खंजर की नोक से इसरायल लिखा था. महात्मा गांधी ने तब भी कहा था कि हमें एक-एक यहूदी अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा है लेकिन पश्चिमी शैतानी का सहारा ले कर वे फलिस्तीनी घर में घुस जाएं, इसका हम समर्थन नहीं कर सकते. 1938 में उन्होंने एक विस्तृत आलेख में भारत का रुख साफ कर दिया था : “ “ मेरी सारी सहानुभूति यहूदियों के साथ है. मैं दक्षिण अफ्रीका के दिनों से उनको करीब से जानता हूं. उनमें से कुछ के साथ मेरी ताउम्र की दोस्ती है और उनके ही माध्यम से मैंने उनकी साथ हुई ज्यादतियों की बावत जाना है. ये लोग ईसाइयत के अछूत बना दिए गये हैं. अगर तुलना ही करनी हो तो मैं कहूंगा कि यहूदियों के साथ ईसाइयों ने जैसा व्यवहार किया है वह हिंदुओं ने अछूतों के साथ जैसा व्यवहार किया है, उसके करीब पहुंचता है. दोनों के साथ हुए अमानवीय व्यवहारों के संदर्भ में धार्मिक आधारों की बात की जाती है. निजी मित्रता के अलावा भी यहूदियों से मेरी सहानुभूति के व्यापक आधार हैं. लेकिन उनसे मेरी गहरी मित्रता भी मुझे न्याय का पक्ष देखने से रोक नहीं सकती है, और इसलिए यहूदियों की ‘अपना राष्ट्रीय घर’ की मांग मुझे जंचती नहीं है. इसके लिए बाइबल का आधार ढूंढा जा रहा है और फिर उसके आधार पर फलीस्तीन लौटने की बात उठाई जा रही है. लेकिन जैसे संसार में सभी लोग करते हैं वैसा ही यहूदी भी क्यों नहीं कर सकते कि वे जहां जनमे हैं और जहां से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं, उसे ही अपना घर मानें ? 

 “ फलीस्तीन उसी तरह अरबों का है जिस तरह इंग्लैंड अंग्रेजों का है याकि फ्रांस फ्रांसीसियों का है. यह गलत भी होगा और अमानवीय भी कि यहूदियों को अरबों पर जबरन थोप दिया जाए. आज फलीस्तीन में जो हो रहा है उसका कई नैतिक आधार नहीं है. पिछले महायुद्ध के अलावा उसका कोई औचित्य नहीं है. गर्वीले अरबों को सिर्फ इसलिए दबा दिया जाए ताकि पूरा या अधूरा फलीस्तीन यहूदियों को दिया जा सके, तो यह एकदम अमानवीय कदम होगा. 

 “ उचित तो यह होगा कि यहूदी जहां भी जनमे हैं और कमा-खा रहे हैं वहां उनके साथ बराबरी का सम्मानपूर्ण व्यवहार हो. जैसे फ्रांस में जनमे ईसाई को हम फ्रांसीसी मानते हैं वैसे ही फ्रांस में जनमे यहूदी को भी फ्रांसीसी माना जाए; और अगर यहूदियों को फलीस्तीन ही चाहिए तो क्या उन्हें यह अच्छा लगेगा कि उन्हें दुनिया की उन सभी जगहों से जबरन हटाया जाए जहां वे आज हैं ? याकि वे अपने मनमौज के लिए अपना दो घर चाहते हैं ? ‘अपने लिए एक राष्ट्रीय घर’ के उनके इस शोर को बड़ी आसानी से यह रंग दिया जा सकता है कि इसी कारण उन्हें जर्मनी से निकाला जा रहा था.” 

   आजादी के बाद से कमोबेश हमारी विदेश-नीति की यही दिशा रही है. प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिकता से दूषित नजर से इसे देखा और कच्ची गोली खेल दी जिसे विदेश मंत्रालय संभालने की कोशिश कर रहा है.  

 अमरीकी व पश्चिमी खेमे की कुल कोशिश यही है कि युद्ध भी हमारी ही मुट्ठी में रहे, विराम भी हमारी ही मुट्ठी में रहे! हमने देखा है कि दोनों ही कमाई के अंतहीन अवसर देते हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे इसरायल के विफल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने मौके का फायदा उठा कर इसरायल के राजनीतिक नेतृत्व को अपने साथ ले लिया है. यह घटिया अवसरवादिता है. जब पूरा इसराइल उनके ख़िलाफ़ खड़ा था और वे न्यायपालिका को अपनी मुट्ठी में करने का भद्दा खेल खेल रहे थे, तब उनके हाथ ऐसे अवसर आ गया जिसने उन्हें नई बेईमानी का मौक़ा दे दिया है. यह पूरी कहानी बेईमानी से ही शुरू हुई थी और बेईमानी से ही आज तक जारी है. यह नया भारत है जो इस बेईमानी में साझेदारी कर रहा है. 

रास्ता क्या है? यह इतना आसान है कि बहुत कठिन लगता है. 5 मई 1947 को ‘रायटर’ के दिल्ली स्थित संवाददाता डून कैंपबेल ने गांधी का ध्यान फिर से इस तरफ खींचा : “ फिलीस्तीनी समस्या का आप क्या उपाय देखते हैं ?”

गांधी : “ यह ऐसी समस्या बन गया है कि जिसका करीब-करीब कोई हल नहीं है. अगर मैं यहूदी होता तो मैं उनसे कहता : ‘ऐसी मूर्खता मत करना कि इसके लिए तुम आतंकी रास्ता अख्तियार कर लो. ऐसा कर के तुम अपने ही मामले को बिगाड़ लोगे जो वैसे न्याय का एक मामला भर है… अगर यह मात्र राजनीतिक खींचतान है तब तो मैं कहूंगा कि यह सब व्यर्थ हो रहा है. आखिर यहूदियों को फिलीस्तीन के पीछे इस तरह क्यों पड़ जाना चाहिए ? यह महान जाति है. इसके पास महान विरासतें हैं. मैं दक्षिण अफ्रीका में बरसों इनके साथ रहा हूं. अगर इसके पीछे उनकी कोई धार्मिक प्यास है तब तो निश्चित ही इस मामले में आतंक की कोई जगह नहीं होनी चाहिए… यहूदियों को आगे बढ़ कर अरबों से दोस्ती करनी चाहिए और ब्रिटिश हो कि अमरीकी हो, किसी की भी सहायता के बिना, यहोवा के उत्तराधिकारियों को उनसे मिली सीख और उनकी ही विरासत संभालनी चाहिए.”  

लेकिन किसी को, किसी की विरासत तो संभालनी नहीं है . सबको संभालनी है गद्दी ! गांधी सत्ता की यह भूख पहचान रहे थे और इसलिए कैंपबेल से कहते-कहते कह गए : “ यह एक ऐसी समस्या बन गया है कि जिसका करीब-करीब कोई हल नहीं है.” गांधी ने जो आशंका प्रकट की थी, उसके करीब 76 साल पूरे होने को हैं लेकिन युद्ध व विराम के बीच पिसते फलस्तीनी-इस्रायली किसी हल के करीब नहीं पहुंचे हैं. विश्व की महाशक्तियां व दोनों पक्षों के सत्ताधीश पीछे हट जाएं तो येरूशलम की संतानें अपना रास्ता खुद खोज लेंगी. लेकिन सत्य, प्रेम, करुणा के ऐसे रास्ते पर उन्हें कौन चलने देगा ? ( 15.10.2023)

मिलान कुंडेरा : किसी का चुपचाप बोलना

 मिलान कुंडेरा नहीं रहे ! मैंने तुरंत देखा कि वे कहां थे जब उनकी मृत्यु हुई ? इसलिए नहीं कि मुझे यह पता नहीं था कि वे पिछले कई वर्षों से फ्रांस की राजधानी पेरिस में रह रहे थे बल्कि इसलिए कि वे जहां रह रहे होते थे, वहां होते नहीं थे. मुझे इसी मिलान कुंडेरा का अपार आकर्षण रहा है. वह साहित्यकार भी क्या साहित्य रचेगा जो धरती पर कहीं भी अपना संसार नहीं रच सके. 

   आप सोच कर देखिए कि मैं एक ऐसे लेखक की बात कर रहा हूं जिसे मैं जानता तो नहीं ही हूं, उसकी भाषा भी नहीं जानता. उसका देश भी मैंने कभी देखा नहीं. यह कहना भी जरूरी है कि उनकी हर रचना मैंने पढ़ी हो, ऐसा भी नहीं है. उनका अधिकांश साहित्य चेक भाषा में है; जब चेक में लिखना उन्होंने घोषणापूर्वक छोड़ दिया, तब के बाद से उनके साहित्य की भाषा फ्रेंच हो गई. मुझे इन दोनों में से एक भाषा भी नहीं आती है. हममें से अधिकांश लोग मिलान कुंडेरा को अंग्रेजी माध्यम से जानते हैं - अंग्रेजी, जिस भाषा में उन्होंने कभी लिखा नहीं. तो फिर आप ही बताइए, ऐसे लेखक को मुझ जैसा कोई जानेगा भी तो कैसे व कितना ! लेकिन मैं आपसे कह सकता हूं कि मैं मिलान कुंडेरा को लगातार अपने आसपास पाता रहा हूं - एक दोस्त लेखक की तरह नहीं, एक सहयात्री की तरह! 

   यह भी कहना जरूरी है कि यदि निर्मल वर्मा न होते तो मेरे पास मिलान कुंडेरा भी नहीं होते. निर्मल वर्मा ने ही मिलान कुंडेरा से, उनके लेखन से मेरा परिचय करवाया था. वह दुबचैक का चेकोस्लोवाकिया था जिसे रूसी टैंकों ने घेर कर मार डाला था - बहुत कुछ उसी तरह जिस तरह आज वे ही रूसी टैंक यूक्रेन को घेर कर मारते जा रहे हैं. तब भी ऐसा ही था, आज भी ऐसा ही है कि सारी दुनिया तमाशाबीन बनी हुई थी. निर्मल वर्मा तब चेकोस्लोवाकिया में थे और चुप नहीं थे; यहां भारत में जयप्रकाश नारायण थे और चुप नहीं थे. जब भारत में कोई सोवियत खेमे के खिलाफ बोलने की हिमाकत नहीं करता था, जयप्रकाश चेक लोगों की स्वतंत्रता के पक्ष में खुल कर सामने आए थे, एक दवाब खड़ा करने की कोशिश भी की थी.  मानवीय गरिमा के हनन पर जो साहित्य चुप रहे तो वह साहित्य नहीं है;  जो गांधीवाला चुप रहे, वह गांधीवाला नहीं है, मेरी यह समझ उसी दौर में बनी. उसी दौर में मिलान कुंडेरा का साहित्य भी बना. विचार न हो तो आदमी होना शक्य नहीं है; प्रतिबद्धता न हो तो कलम उठाने से अर्थहीन काम दूसरा नहीं है. प्रतिबद्धता और ढोलबाजी में जो फर्क है, उसका  विवेक खोये नहीं, यह जरूरी है. मुझे कुंडेरा इसलिए ही पसंद थे, अपने-से लगते थे. वे बला की प्रतिबद्धता से लिखते रहे लेकिन उनके समस्त लेखन में कोई ढोलबाजी नहीं थी. 

   वे साम्यवादी देश चेकोस्लोवाकिया में पैदा हुए थे. तब का साम्यवाद वह नहीं था जो आज का है - पूंजीवादी घोड़े की दुम पकड़ कर, साम्यवादी नारेबाजी करने वाला विदूषक ! वह दुबचैक का दौर था जब वे अपने चेकोस्लोवाकिया में, रूस की तनी भृकुटि के बावजूद साम्यवाद का ‘मानवीय चेहरा’ बनाने में लगे थे. युवा कुंडेरा उन दुबचैक के साथ खड़े हुए. इसके बाद का पूरा इतिहास रूसी साम्यवादी शासन के पतन का इतिहास है जिसमें कितनी ही मूर्तियां टूटीं, कितनी आस्थाएं बिखरीं तथा कितने ही लोग मिटा दिए गए. दुबचैक खुद ही किसी गतालखाने में डाल दिए गए. कुंडेरा ने स्वप्नों के बिखरने के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की. फिर वही हुआ जो सबसे सहज था : जिस साम्यवादी पार्टी के वे सदस्य ही नहीं थे बल्कि जिसकी पैरवी करने में वे कुछ भी उठा नहीं रखते थे, उसी पार्टी ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया. जितनी आजादी हम दें, उसमें खुश रह कर दिखा वाले साम्यवाद के साथ कुंदेरा का बनना नहीं था; नहीं बना. 

   पार्टी छोड़ी फिर देश छोड़ा ! रूसी सोल्जेनित्सीन को भी सोवियत संघ छोड़ना पड़ा था और वे जा बसे थे अमरीका में. उनसे देश तो छूटा लेकिन वे कभी देश छोड़ नहीं सके. कुंडेरा ने अपना प्यारा देश छोड़ा, तो ऐसे छोड़ा कि छोड़ ही दिया. पेरिस में आ बसे तो वहीं के हो कर रह गए. भाषा भी छोड़ दी. फ्रेंच में लिखने लगे. लेखक किसी देश का नहीं,  मूल्यों का होता है. अगर मूल्यों की पहचान साफ है और उनके प्रति प्रतिबद्धता पूरी है तो कहीं भी रहो, लिखोगे वही जो लिखना है; और जो लिखना जरूरी है. कुंडेरा ऐसी मान्यता को जीते थे. इसलिए फ्रांस में रहते हुए उन्होंने आजादी,अभिव्यक्ति और अस्मिता तीनों पर लगातार काम किया. 

   आप कुंडेरा को बोलते कम ही सुनते थे क्योंकि वे मानते थे कि लेखक को नहीं, उसकी रचना को बोलना चाहिए. 1968 में उनकी पहली किताब आई ‘ जोक्स’ यानी हंसी-मजाक लेकिन सत्ता समझ गई कि यह  हंसी-मजाक नहीं है, तेजाब है. हंसी-मजाक का आलम यह है मिलान कुंडेरा के यहां कि किताबों के नाम भी उसी की बात करते हैं - लाफेबल लव्स, द बुक ऑफ लाफ्टर; लेकिन आप हंसी-मजाक में इसे उठा लेंगे तो फंस जाएंगे. उनकी आखिरी किताब आई ‘द अनबेयरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ - अस्तित्व ऐसा कि हवा में तिरता पंख हो; प्रतिबद्धता ऐसी ही कि जैसे पहाड़ उठा रखा हो, इसका द्वंद्व है यह उपन्यास. साम्यवादी दर्शन व संचालन में दमन व हिंसा का अतिरेक ही कुंडेरा को परेशान नहीं करता है, वे उसकी व्यर्थता को पहचानते भी हैं और हमें दिखाते भी हैं. हैरान भी होते हैं कि ऐसी व्यर्थ हिंसा से हासिल क्या होता है ! गांधीजी ने भी हिंसा की क्रूरता से अधिक, उसकी निरर्थकता को बार-बार उभारा है. कुंडेरा भी उसे पहचानते हैं. यह उपन्यास लिखने के बाद कुंडेरा ने लिखना करीब-करीब बंद ही कर दिया. फिर आई ‘ ए किडनैप्ड वेस्ट : द ट्रेजडी ऑफ़ सेंट्रल यूरोप.’ इसके साथ कुंडेरा का जीवन भी समाप्त हुआ. 

   कुंडेरा बार-बार लिखते रहे कि हम कितनी बड़ी संभावनाओं तक पहुंच सकते थे लेकिन हम कितनी बुरी तरह चूकते रहे हैं. साम्यवाद को वे इसी नजरिये से विश्लेषित करते हैं. हम भारत में पहचानें तो पाएंगे कि सांप्रदायिकता का जो तूफान आज खड़ा किया गया है और जो जहर इसकी नसों में उतारा जा रहा है, वह कितना अर्थहीन है. हम जैसे खुद अपना ही कार्टून बना रहे हैं. दूसरों के लिए हम जो कब्र खोद रहे हैं, उसमें दफन हम ही होंगे. यह आत्महत्या नहीं, आत्म विद्रूपण है जिसमें से ग्लानि से सिवा दूसरा कुछ हाथ नहीं आएगा. मानव मात्र को यही ग्लानि मिली है हर उस सत्ता व सत्ताधीश से जो हिंसा व घृणा को उकसाता है. कुंडेरा बार-बार यही समझाते हैं. 94 वर्ष की उम्र में अब वे थक कर सो गए हैं. उन्होंने खुद को कभी विस्थापित या शरणार्थीं नहीं माना. हमेशा लेखक की भूमिका में रहे और कहते रहे कि हम कभी जान ही नहीं सकते हैं कि हम क्या चाहते हैं; क्योंकि हमारे हाथ तो यही एक जिंदगी है जिसकी पहले वाली जिंदगी से तुलना करने का कोई उपाय हमारे पास नहीं है; न भावी जिंदगी संवारने की कोई नई तस्वीर हमारे पास है. 

   हां, मिलान कुंडेरा, हम नई-पुरानी तो नहीं जानते लेकिन सपनों की वह तस्वीर हमारे पास है जो आपने उकेरी है. आपका आभार कि आप हमें उस दहलीज तक ले गए. ( 14.07.2023)

राजदंड वाला लोकतंत्र

 सब कुछ नया हो गया ! संसद भवन भी नया हो गया; लोकतंत्र भी नया हो गया; समय के ललाट पर अमिट हस्ताक्षर कर प्रधानमंत्री ने संकल्प भी नया लिख दिया ! यह भी एकदम नया हुआ कि संसद भवन का उद्घाटन समारोह हुआ लेकिन न राष्ट्रपति थीं, न उप-राष्ट्रपति थे. दोनों दिल्ली में ही थे लेकिन उनके संदेश भर पढ़े गए, उन्हें मौजूद रहने से मनाही कर दी गई. 20 से ज्यादा विपक्षी दल नहीं थे, यह बात आपके लोकतंत्र में कोई मानी नहीं रखती है. संविधान में यह बात ही गलत दर्ज हो गई है कि संसद में पक्ष और विपक्ष का होना ही जरूरी नहीं है बल्कि वही लोकतंत्र है जिसमें दोनों की साझेदारी हो.  

 लोकसभा का अध्यक्ष उसका प्रथम पुरुष होता है, ऐसी कोई नई मान्यता बनाई जा रही है, तो वैसा भी कुछ बना नहीं; अध्यक्ष थे जरूर लेकिन थे वे प्रधानमंत्री के व्यक्तित्वविहीन पिछलग्गू ! इसकी पूरी सावधान योजना बनाई गई थी कि एक ही आदमी सुनाई दे, एक ही आदमी दिखाई दे, एक ही आदमी साकार हो ! लोकतंत्र एक ही आदमी का होता है, यह भी नया हुआ. 

इतना नया-नया एक साथ इस तरह हुआ कि पुराना कुछ याद ही नहीं रहा. जैसे किसे याद रहा कि कहीं, इतिहास के किसी गतालखाने से कोई ‘सेंगोल’ लाया गया और हमने प्रधानमंत्री को उसके सामने साष्टांग भू-लुंठित देखा मानो वह लोकतंत्र की कोई आदिशक्ति का साकार स्वरूप हो जिसकी साष्टांग अभ्यर्थना करना धार्मिक दायित्व हो. क्या आपको याद है कि ऐसा पहली बार नहीं देखा हमने? अगर मैं भूलता नहीं हूं तो हमने संसद के प्रवेश-द्वार पर प्रधानमंत्री को साष्टांग भू-लुंठित देखा है; हमने संविधान की किताब के सामने उन्हें नतमस्तक देखा है; हमने उन्हें मठों-मंदिरों-पंडों-पुजारियों के सामने नतमस्तक देखा है, हमने उन्हें दलितों के पांव धोते देखा है, हमने उन्हें सार्वजनिक सभाओं में मंचों के हर कोने पर जा-जाकर जनता जनार्दन को इस तरह नतमस्तक प्रणाम करते देखा है कि वह उपहास का प्रसंग बन गया. एकदम नया यह सब पुराने कई वर्षों से हम देखते आ रहे हैं. प्रधानमंत्री जब भी, जहां कहीं होते हैं कुछ-न-कुछ नया होता ही है जो बेहद पुराना होता है. वैसे यह ठीक भी है कि वे देश को नया बना रहे हैं तो उनका अपना नया बने रहना भी तो जरूरी है न ! बस, ध्यान इतना ही रखना है कि यह सारा नया कोई दूसरा नहीं, प्रधानमंत्री ही करें ! 

हमारे लोकतंत्र में ‘सेंगोल’ का प्रवेश एकदम नया है. प्रधानमंत्री ने उसे खोजा, धूल झाड़ी, उसे चमकाया, हथेलियों में उठाया, फूलों से सजाया, उसके सामने साष्टांग दंडवत हुए, फिर उसे ले कर पैदल चले, अध्यक्ष के आसान के पास एक खास जगह गढ़ी उन्होंने, उसका एक खास स्टैंड बनाया जिस पर उसे पूजा-पाठ के साथ स्थापित किया. फिर देश को यह भी सिखलाया कि यह भारतीय संस्कृति का प्रतीक है. यह राजदंड है. अध्यक्ष के आसान के पास है तो इसलिए कि सदस्य ( वे सदस्य जो विपक्ष के होते हैं !) सदन की मर्यादा का पालन नहीं करते तो अध्यक्ष उसे तत्काल ‘सेंगोल’ से बरज सकें. नहीं, नहीं, हमने गलती लिखा. अध्यक्ष नहीं, बरजेंगे तो प्रधानमंत्री ही; अध्यक्ष उनसे निवेदन करेंगे कि ‘सेंगोल’ का वक्त आ गया है श्रीमान, आइए और इन महाशय को दंडित कीजिए ! राजदंड दंडित करने के लिए ही होता है. 

बेकार ही बहुत सारा इतिहास खंगाला गृहमंत्री शाह ने. यह ‘सेंगोल’ कहां से आया, किसने इसे कब किसे दिया, आपका यह सारा शोध कबूल है शाह साहब लेकिन समझने की बात तो इतनी ही है कि लोकतंत्र से इस ‘सेंगोल’ का कोई नाता बनता है क्या ? नहीं, इसका नाता राजतंत्र से है. देखिए, आपने ‘सेंगोल’ की बात की तो न चाहते हुए भी आपको जवाहरलाल नेहरू को उस इतिहास में जगह देनी पड़ी जिस इतिहास को बदलने-भुलाने में आप और इतिहास के आपके इतने सारे दिग्गज लगे हुए हैं. जवाहरलाल नेहरू को समझना उन सबको भारी पड़ता है जिनको लोकतंत्र का ककहरा न भाता है, न समझता है. लेकिन नेहरू को जब यह ‘सेंगोल’ मिला तो उन्होंने इसे इसकी सही जगह पहुंचा दिया. किसी संग्रहालय में रखवा दिया. राजदंड लोकतंत्र का प्रतीक नहीं बन सकता है, इतना विवेक था उन्हें. लोकतंत्र का एक मतलब, जरूरी मतलब यह भी है कि आपको अपनी समझ, अपने संस्कार, अपनी परंपराएं, अपनी पोथियां, अपनी मान्यताएं सब शनै-शनै बदलनी पड़ती हैं. कपड़ा बदलने के बारे में तो कबीर साहब कब के कह गए हैं कि मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा; लेकिन यहां तो लोकतंत्र कपड़े से आगे, मन व मान्यताओं के बदलाव की मांग करता है. लोकतंत्र से जिसका मेल नहीं बैठता है, वह सारा कुछ किसी संग्रहालय में जगह पाता है. लोकतंत्र के आंगन में तो वही प्रतिष्ठित होता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों को संवारता-पुष्पित-पल्लवित करता है. 

इसलिए ‘सेंगोल’ की जगह संसद में नहीं है. जैसे ईंट-सीमेंट की बनी इमारत लोकतंत्र की संसद नहीं होती है वैसे ही राजतंत्र के किसी प्रतीक की जगह भी संसद में नहीं होती है. संसद में आप करते क्या हैं, कैसे करते हैं और जो करते हैं वह संविधानसम्मत है या नहीं, यही कसौटी है कि वह लोकतंत्र की संसद है या नहीं. हमारी संसद में लोकतंत्र की जगह पहले ही कम थी, आपने उसे और भी संकरे रास्ते पर ला खड़ा किया है. लेकिन आप भी क्या करें, आपके लोकतंत्र में जगह ही एक आदमी की है, इसलिए आपकी परिकल्पना भी उतनी ही संकरी है. ( 31.05.2023)