Tuesday, 16 October 2018

संविधान में गांधी की अात्मा




वह अाजादी का उष:काल था. किसी ने महात्मा गांधी से पूछा : बापू, अब तो अंग्रेज चले गये ! अब अपना देश है, अपना शासन है अौर अपने लोग हैं. अापने लोगों को जिन हथियारों से लड़ना सिखलाया है- हड़ताल, प्रदर्शन, धरना, जुलूस, जेल - क्या यही हथियार अागे भी काम अाएंगे ? अाजाद भारत में अापकी लड़ाई के हथियार क्या होंगे ? 

बापू हंसे, “ हथियार ही बदलते हैं,  लड़ाई कहां रुकती है ! मैं अब अागे की लड़ाई एक नये हथियार से लडूंगा - जनमत का हथियार - वीपन अॉफ पब्लिक अोपीनियन !    वे जनमत को लड़ाई के अमोघ हथियार के रूप में देखते थे. अाज उस जनमत को एक भोथरे अौर बिकाऊ माल की तरह देखा जा रहा है अौर यह भी कहा जा रहा है कि जनमत जैसी कोई चीज होती नहीं है; होती है भीड़ जिसे चाहे जैसे, जो अपने बस में कर ले ! कभी गरीबी हटाअो तो कभी विकास लाअो अौरसब मिल के, छक कर माल खाअो ! लेकिन जो अादमी को भीड़ समझते हैं वे लोकतंत्र को समझते हैं ? 
एक घुटा हुअा माहौल सब अोर है. चार साल पहले देश कई स्तरों पर हिचकोले खा रहा था अौर लगता था कि जिन्हें देश का जहाज संभालना है वे देश तो दूर, खुद को ही संभाल नहीं पा रहे हैं. यदि महावत हाथी पर अंकुश न रख सके तो हाथी सामने जो कुछ अाता है उसे भी ध्वस्त कर देता है अौर पीठ पर जो बैठा है उसे भी जमीन पर पटक देता है. हमने यह होते देखा. यह भी देखा कि नया महावत, नई धज के साथ हाथी पर सवार हुअा. लेकिन इतना ही हुअा कि वह सवार हुअा, फिर कुछ नहीं हुअा. बातें हुईं, लच्छेदार जुमले हुए, इतनी घोषणाएं हुईं कि हम गिनना भी भूल गए कि किसने, कब,कहां, क्या कहा. एक कहावत है कि जंगल में जब एक गीदड़ बोलता है तो सभी  हुअां-हुअां करने लगते हैं. फिर अाप किसे गिनेंगे अौर किसकी सुनेंगे ?  

अौर इसके बाद से हम देख रहे हैं गणतंत्र का महाभंजक स्वरूप ! तंत्र किसी अंधे हाथी की तरह उत्पात मचा रहा है अौर गण किसी महावत की भूमिका में तो दूर, किसी हरकारे की भूमिका में भी नहीं है.यह हमारे लोकतंत्र के लिए अपशकुन की घड़ी है. लोक की स्वतंत्रता अौर किसी एक गुट या जमात की निरंकुशता में फर्क होता है. लोकतंत्र में तंत्र की प्राथमिक जिम्मेवारी है, बल्कि उसके होने की कसौटी भी है कि यह है कि वह निरंकुशता को कैसे काबू में रखता है. कानून का राज कहते ही उसे हैं जिसमें कानून हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं होती है.

नये तंत्र ने देश को अनुशासित करने की अपनी यह जिम्मेवारी छोड़ नहीं दी है, समझ-बूझ कर इसे कहीं गहरे दफना दिया है. अब तंत्र कानून को या संविधान को या इन सबसे ऊपर के मनुष्यता के विधान को नहीं देखता, वह देखता है कि जिसे अनुशासित करने की जरूरत है उसका धर्म क्या है, उसकी जाति क्या है अौर यह भी कि उसका दल क्या है ? बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि इस अपराधी की संभावना क्या है - क्या यह भविष्य में किसी भी तरह अपने खेमे में अा सकता है ? अगर यह सब संभावना है तो राज्य अपनी नजर भी बदल लेता है अौर अपनी दिशा भी. इतिहास फिर कुछ उन्हीं गलियों से, कुछ उसी तरह गुजर रहा है जिनसे तब गुजरा था जब गुलामी का अंधेरा घना था. वक्त की उस संकरी गली के अंधेरे में मुहम्मद अली जिन्ना ने ऐसा ही अंधा उत्पात मचा रखा था अौर राज्य - ब्रितानी साम्राज्य - लकड़ी की तलवारें भांजता हुए, उनका मुकाबला करने का स्वांग कर रहा था. लहूलुहान देश अंग्रेजों की मिली-भगत से निष्प्राण हुअा जा रहा था अौर अाजादी की पार्टी कांग्रेस उस धुंध में खोती जा रही थी. एक अकेले गांधी थे जो अपने मन-प्राणों का पूरा बल जोड़ कर इस दुरभिसंधि के खिलाफ तब तक अावाज उठाते रहे जब तक तीन गोलियों से बींध नहीं दिए गए. 

यह वह इतिहास है जो हम पढ़ते रहे हैं लेकिन जो इतिहास हम गढ़ रहे हैं वह क्या इससे अलग है ? क्या वह हमें किसी दूसरी दिशा में ले जा सकेगा ? अौर फिर यह हिसाब भी हमें लगाना चाहिए कि कोई ७० साल पहले हमने जो गणतंत्र बनाया अौर उसके साथ जो सपने देखे, वे कहां तक पूरे हुए अौर कितनों तक पहुंचे ? सवाल अांकड़ों का नहीं है अौर न इस या उस सरकार को जिम्मेवार ठहराने या बचाने का है. सवाल यह कि हमारा गणतंत्र ७० साल जवान हुअा है या ७० साल बूढ़ा ? जवानी अौर बुढ़ापे में उम्र का फर्क नहीं होता है, उम्मीदों अौर अात्मविश्वास का फर्क होता है ! तो हम यह सवाल अपने गणतंत्र की गीता संविधान से ही पूछते हैं कि भैया, कैसे हो तुम ? हमने तुम्हारे हवाले जिस गणतंत्र को किया था, वह अाज कितना स्वस्थ है अौर कितनी संभावनाअों से भरा है ? 

इसका एक जवाब- अौर कहूं तो दो टूक जवाब - बाबा साहब अांबेडकर ने संविधान सभा की काररवाई को समेटते हुए दिया था : हमने एक संविधान तो बना दिया है अौर अपनी तरफ से अच्छा ही संविधान बनाया है लेकिन अाप सब यह याद रखें कि कोई भी संविधान उतना ही अच्छा या उतना ही बुरा होता है जितना उसे चलाने वाले लोग होते हैं ! …. 

तो हमारे संविधान का पहला ही वाक्य कहता है कि, “ हम भारत के नागरिक अपने लिए यह संविधान बना कर, इसे अपने ऊपर लागू करते हैं …” ! अाज यह ‘भारत का नागरिक’ कहां है ? संविधान लिखता है कि भारत का राज्य धर्म, जाति, लिंग, भाषा अादि के अाधार पर अपने नागरिकों में भेदभाव नहीं करेगा. संविधान का यह पन्ना बंद कर जब हम देश की तरफ देखते हैं तो पाते हैं कि संविधान चलाने वालों ने धीरे-धीरे ऐसी हालत बना दी है कि साबूत, निखालिस नागरिक तो देश में कहीं है ही नहीं, जो हैं वे बहुसंख्यक हैं या अल्पसंख्यक हैं; अौर बहुसंख्या का अाधार क्या है तो धर्म है अौर जाति है. हमारे लोकतंत्र का यही ध्रुव सत्य है ! संविधान सामने धरा हुअा है, संसद सारा कुछ देख रही है, न्यायपालिका चहुंअोर से अाती अावाजें सुन रही है अौर देश को सांप्रदायिकता अौर जातीयता का अखाड़ा बनाने वाली ताकतें सब कुछ तार-तार किए दे रही हैं. 

पहले राजनीतिक दल थे जो राजनीतिक लाभ के लिए कभी सांप्रदायिक या जातीय खेल खेलते थे लेकिन उन्हें भी इसमें शर्म अाती थी अौर देश के सार्वजनिक जीवन में इतना बल संचित था कि ऐसी प्रवृत्तियां दुत्कारी भी जाती थीं अौर हाशिए पर रहती थीं. वहां से चल कर हम अाज ऐसी स्थिति में पहुंचे हैं कि सांप्रदायिकता-जातीयता के अाधार पर दल बनाए गए हैं, जातीय अाधार पर बहुजन का निर्धारण होने लगा है अौर इतिहास को फिर से लिखने की घोषणाएं की जाने लगी हैं. किसी भी स्वतंत्र व स्वायत्त देश को इस बात का अधिकार है ही कि वह अपनी समीक्षा करे अौर अपना इतिहास खोजे ! लेकिन वह खुद ही इतिहास बनने की दिशा में दौड़ पड़े तो संविधान क्या कहेगा अौर क्या करेगा ? बाबा साहब होते तो जरूर कहते कि यह दस्तावेज तुम्हारे हाथ में सौंपते समय ही मैंने कहा था कि यह उतना ही अच्छा या बुरा साबित होगा जितने अच्छे या बुरे बनने की तुम्हारी तैयारी होगी ! अौर महात्मा गांधी ने तो संविधान बनाने की प्रक्रिया से ही खुद को अलग कर लिया था, क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि देश का मन जब तक नया नहीं बनेगा तब तक उसके हाथ में सौंपी हर किताब पुरानी पड़ जाएगी. अांबेडकर समेत देश के सारे बड़े राजनीतिक नेताअों ने मिल कर वह किताब तैयार की जिसकी स्थापनाअों के बारे में उनकी अपनी ही अास्था नहीं थी. दस्तावेज इसलिए ही तो खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि वे अपने निर्माताअों को ही अाईना दिखाने लगते हैं. 

हमारा संविधान कहता है कि यह बहुधर्मी, बहुभाषी, बहुजातीय अौर स्त्री-पुरुष के बीच करीब-करीब बराबर-बराबर बंटा हुअा समाज बहुसंख्यावाद के नारों से न चलाया जा सकता है, न संभाला जा सकता है. ऐसी हर कोशिश से यह टूट-बिखर जाएगा ! हमने इसे नहीं समझा अौर सांप्रदायिक ताकतों की रस्साकशी ऐसी मची कि देश टूट गया - सैकड़ों सालों की गुलामी में, अंग्रेज भी जो करने की हिम्मत न कर सके, हमने खुद ही वह कर लिया ! अौर अाप इतिहास को इतिहास की नजर से देखेंगे तो पाएंगे कि इस अात्मघाती खेल में वे सब भी शामिल थे जो संविधान बना रहे थे. हजारों साल के अथक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयास से भारतीय समाज की संरचना ऐसी हुई है कि इसे संभालो तो यह कालजयी बन जाएगी; तोड़ो तो रेशा-रेशा बिखर जाएगी. यह उस बुनी हुई चादर की तरह है कि जिसे फैला दो तो हर को पनाह देगी, एक धागा खींच दो तो सारी चादर उखड़ती चली जाएगी. इसलिए बहुसंख्यावाद चाहे जाति के नाम से हो कि धर्म के नाम से कि भाषा के नाम से याकि दूसरे किसी भी नाम से, वह भारतीय समाज को तोड़ेगा,कमजोर करेगा. बहुसंख्यावाद भारत की संकल्पना के मूल पर ही चोट करता है. यह अकारण नहीं था कि गांधी ने ताउम्र, बार-बार अपनी जान दे कर भी इन ताकतों का मुकाबला करने की कोशिश की - चाहे वह लंदन के गोलमेज सम्मेलन में हो कि पुणे के यरवदा जेल में कि दिल्ली में कि कोलकाता में कि नोअाखली में कि बिहार में ! अाज की तारीख में भी किसी को देखना हो कि हमें जाना किधर है, हमें पाना क्या है, हमें छोड़ना क्या है अौर हमें करना क्या है तो उसे हमारे संविधान का विधान देख लेना चाहिए ! संविधान की धाराएं हम चाहे जितनी बार बदलें, खतरा नहीं है लेकिन संविधान की अात्मा एक बार भी बदली तो यह देश हमारे हाथ से निकल जाएगा. 

इसलिए हम सब यह गांठ बांध लें कि गणतंत्र में गण पहला तत्व है, तंत्र दोयम है ! अपनी अहर्निश सेवा-साधना से हम गण को जितना मजबूत बना सकेंगे, गणतंत्र भी उतना ही मजबूत अौर फलदायी बनेगा. यह गांधी-तत्त्व ही संविधान की अात्मा है. 

Thursday, 30 August 2018

क्या यह देश डरा कर रखा जा सकता है


२८ अगस्त की सुबह मुंबई, ठाणे, हैदराबाद, रांची, दिल्ली अौर फरीदाबाद में एक साथ दबिश पड़ी। लगा कि नीरव मोदी या माल्या की गर्दन पकड़ने की दबिश है। लेकिन ऐसा नहीं था। दबिश में ऐसे ५ लोगों को गिरफ्तार किया गया जिन्हें इस २६ जनवरी को देश का नागरिक सम्मान दिया जाता तो ज्यादा मुफीद होता। सर्वोच्च न्यायालय में इन गिरफ्तारियों के खिलाफ दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायाधीश की खंडपीठ ने कई ऐसी टिप्पणियां कीं कि जिसके बाद सरकार को इन गिरफ्तारियों को निरस्त कर देना चाहिए था अौर अदालत द्वारा मुकरर्र ६ सितंबर की सुनवाई में अपने सारे प्रमाणों के साथ अदालत को भी अौर देश को भी दो टूक जवाब देना चाहिए था। ऐसा होता तो सरकार का चेहरा साफ होता अौर उन सबको कठघरे में खड़ा होना पड़ता जो नागरिक अधिकार व पिछड़े वर्गों की अाड़ में हिंसा का घटाटोप रचने के अारोपी हैं। लेकिन सरकारें इतनी सयानी नहीं होती हैं, वे चाबुक को अक्ल की जगह इस्तेमाल करती हैं। इसलिए हमें भी अौर हम सबको भी ६ सितंबर का धैर्य से इंतजार करना चाहिए।
हम यह न भूलें कि २०१४ से भारतीय समाज का एक नया ही ध्रुवीकरण किया जा रहा है। यह वह ध्रुवीकरण नहीं है जो राजनीतिक सत्ता पाने के लिए किया जाता रहा है। हम न इसकी कोई मर्यादा बना सके अौर न इसकी कोई कानूनी काट खोज सके। सत्ता सदा ही स्वार्थी होती है लेकिन अपने वक्ती स्वार्थ से अागे जाने का खतरा वह नहीं लेती है। अाज खेल दूसरा खेला जा रहा है जिसमें सत्ता एक पक्ष के साथ जुड़ गई है। अब लोकतंत्र का चरित्र ही बदल देने की तैयारी चल रही है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह सख्त टिप्पणी की कि असहमति को कुचलने का सरकार का यह रवैया बड़े खतरे का संकेत देता है।उन्होंने प्रश्न खड़ा किया कि लोकतंत्र का प्रेशरकूकर फट पड़े, सरकार ऐसी योजना बना रही है ? गिरफ्तार पांचों व्यक्ति अाज के नहीं, वर्षों के अाजमाये हुए सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने हमेशा उन लोगों की अावाज उठायी है जिनकी अावाज उठाना हमेशा अपराध-सा मान लिया जाता है। अावाज लोकतंत्र का अविभाज्य अंग है। अगर वह अपराध है तो सारा लोकतंत्र धोखे की टट्टी में बदल जाएगा। इसलिए हम बहुत सहमत हों या न हों, असहमति की अावाज को कहीं भी दबाया जाए तो देश की सामूहिक चेतना को अावाज उठानी चाहिए। हमें अाभारी होना चाहिए कि 28 की सुबह की गिरफ्तारी के खिलाफ सारे देश में अावाज उठी अौर अदालत ने देश मेें सांस लेने का माहौल बनाया। 

लेकिन बात इससे अागे जाती है। राज्यसत्ता को संविधानसम्मत हिंसा का लाइसेंस हमने ही दे रखा है। इस सांप के पास विष है, यह हम जानते हैं लेकिन हमें यह भी जानना चाहिए कि  संविधान ने इस विष का मुकाबला करने के दो हथियार भी हमें दिये हैं। पहला यह कि समाज अपने कार्यकलापों में हिंसा का सहारा न ले तो सरकारी हिंसा निरुपाय हो जाती है। यही वह रणनीति है जिसके सहारे महात्मा गांधी ने संसार के सबसे बड़े साम्राज्य को अप्रभावी बना दिया था। सामाजिक कार्यकर्ता यदि हिंसा की रणनीति नहीं बनाते हैं, सामाजिक हिंसा को उकसाते नहीं हैं तो वे राज्य की हिंसा को अप्रभावी ही नहीं बनाते हैं बल्कि राज्य को अनुशासित करने वाली दूसरी संवैधानिक ताकत न्यायपालिका को भी समर्थ बनाते हैं। हमें यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि किसी भी स्तर पर, कैसी भी हिंसा राज्य को वैसी गर्हित हिंसा करने का अवसर देती है जिसकी ताक में वह रहती है। अाप सामाजिक हिंसा की रणनीति बनाएंगे तो राज्य की सौ गुना बलशाली अमर्यादित हिंसा से नागरिकों को बचा नहीं सकेंगे। अभी निशाने पर अाए हमारे इन पांच सामाजिक कार्यकर्ताअों ने इस पहलू पर पर्याप्त सफाई नहीं रखी है अौर इनके समर्थन में सामने अाए हम लोगों ने भी इस कमजोरी को रेखांकित नहीं किया है। हमें अदालत का अाभारी होना चाहिए कि उसने हमें फिर यह मौका दिया है कि हम अपनी भूमिका साफ करें।

अाज केंद्र की अौर राज्य की सरकारों को भी कई जवाब देने हैं। इन गिरफ्तारियों से पहले सनातन संस्था का बड़ा मामला फूटा था अौर कई वे चेहरे सामने अाए थे जो हिंसा के षड्यंत्रकारी सिपाही रहे हैं। स्वामी असीमानंद का चेहरा भी उरभरा था। वह सारा मामला किसी की नींद हराम नहीं कर सका। अाज कहीं से यह बात चलाई गई है कि देश में यहां-वहां प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश हो रही है। जब प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री हुअा करते थे तब भी ऐसा ही अालम रचा जाता था। प्रधानमंत्री की रक्षा में कोई चूक न हो इससे कौन इंकार करेगा लेकिन देश के बौद्धिक जगत के कई लोगों की हत्या के प्रति सरकारें उदासीन रहें अौर कई मजबूत प्रमाणों के बावजूद कोई प्रभावी काररवाई न हो, इसे कौन स्वीकार करेगा ? सनातन संस्था को भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र सरकार की एजेंसी ने बेनकाब किया है। उसके पास से ऐसी सूची बरामद हुई है कि जिसमें जिनकी हत्या करनी है, उनके नाम दर्ज हैं। गौरी लंकेश की हत्या के मामले में अब तक जितनी गिरफ्तारियां हुई हैं वे बता रही हैं कि ऐसी सारी हत्याअों के पीछे एक ही संगठन, एक ही दिमाग, एक ही समर्थक ताकत अौर एक ही थैली का इस्तेमाल हुअा है। इसे अाप पर्दे में रखें अौर अावाज उठाने वालों को कुचल कर, देश को डरा कर मुट्ठी में रखने की रणनीति बनाएंगे तो देश भी हारेगा अौर अाप भी। ( 29.08.2018)        

Saturday, 25 August 2018

खुद को बनाते मिटाते रहे अटल बिहारी वाजपेयी


                  “ तीसरी बार है कि जब इसी काम से हम अापके पास अाए हैं… अौर अब नहीं अाएंगे…”, मैं शायद थोड़े तैश में था. प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने तुरंत हाथ पकड़ लिया अौर हंसते हुए बोले, “ अरे भाई, कहते हैं नमक से रिश्ते मजबूत होते हैं, अौर अाप तोड़ने की बात कर रहे हैं”, अौर फिर वह गूंजता हुअा ठहाका जो उनकी अपनी शैली थी. बात तब की है जब अायोडीन लॉबी के दवाब में सरकार ने साधारण नमक रखने-बेचने-खाने पर बंदिश लगा दिया था अौर लोगों को लाचार बना दिया था कि वे अायोडाइज्ड नमक ही खरीदें-खाएं. पक्ष-विपक्ष में ढेर सारी बातें थीं लेकिन हम कह रहे थे कि यह बंदिश गलत है. 
… लेकिन अभी तो सामने था अटलजी का ठहाका … बात हवा में उड़ा देने की यह कारीगरी जानता था मैं… लेिकन उस अात्मीय ठहाके से निकल कर अगले ही पल प्रधानमंत्री सामने अा गया. संबंधित मंत्रालय के सभी वजनी लोग मंत्री के साथ नमूदार हुए जो पहले से ही बगल के कमरे में बुला बिठाए गये थे. तो साथ फाइलें थीं, अोहदे के मुताबिक कतारें भी थीं, गला साफ करते हुए कुछ कहने का उपक्रम होता कि प्रधानमंत्री ने अांख के इशारों से कुछ भी कहने-पढ़ने-बताने नहीं दिया. सीधा बोले : हमें क्या अधिकार है कि हम लोगों का नमक छीन लें — उनकी अावाज अौर मुद्रा दोनों बता रहे थे कि वे सवाल नहीं खड़े कर रहे थे, निर्देश दे रहे थे — बाजार में सभी तरह का नमक उपलब्ध होना चाहिए. लोग अपनी पसंद का नमक खरीदें, खाएं इसमें रुकावट कैसी… डॉक्टर कहते हैं कि अायोडीन दवा है तो अच्छी बात है कि जिन्हें उस दवा की जरूरत होगी वे अायोडीन मिला नमक खरीद लेंगे… बंदिश की बात इसमें अाती कहां है… सरकार किसी अायोडीन लॉबी के दवाब में चलेगी क्या… ये बता रहे हैं कि टीवी पर अायोडीन नमक का ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि जिससे लोग डर जाएं… ये तो बहुत ही गलत बात है… वह विज्ञापन तुरंत बंद होना चाहिए… फिर दो-एक बातें उन्होंने हमारे बारे में अधिकारियों को बताईं … अौर बात बंद हो गई. चाय-केक-बिस्किट के साथ हमारी मुलाकात पूरी  हो गई… अटलजी अगली मुलाकात के लिए निकल गये … मैं थोड़ा असमंजस में था कि अाखिरी फैसला क्या हुअा … कि जाते हुए प्रधानमंत्री पलटे, अौर करीब अा कर बोले, “ अापके साथ लौटने का वाहन है या नहीं ?… मैंने हामी भरी तो अाश्वस्त स्वर में बोले, “ सरकार है भाई ! इसका काम ऐसे ही होता है. लेकिन रिश्ता नहीं टूटने दूंगा ..” अौर वे चले गये. 

साधारण नमक पर लगी बंदिश सरकार ने उठा ली, सभी तरह का नमक बाजार में वापस अा गया… अाज बुझे मन से मैं महसूस कर रहा हूं कि अटलजी अब वापस नहीं अाने वाले हैं… जगजीत सिंह की रेशमी अावाज की सलवटों में लिपटी वह गजल याद अा रही है : जा कर जहां से कोई वापस नहीं है अाता / वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है…
मेरा-उनका परिचय ही तब हुअा जब ७० के दशक की शुरुअात में देश की स्थिति से चिंतित जयप्रकाश ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अपनी अाशंकाएं साझा कीं अौर इंदिरा जी ने उनसे सहमति जताते हुए कहा था कि विपक्ष सहकार करे तो मैं कई बातों में अापकी तरह ही सोचती हूं, अौर वैसा ही करना भी चाहती हूं. जयप्रकाश ने कहा कि यदि तुम ईमानदारी से बरतोगी तो मैं विपक्ष से सहकार का वातावरण बनाने की पहल कर सकता हूं. इंदिराजी ने उत्साहित हो कर अपनी सम्मति दी थी अौर जयप्रकाश ने उनके एवज में विपक्ष से चर्चा शुरू की थी. तब जनसंघ एक ताकत था अौर वाजपेयी उसकी अावाज थे. सो पहला अामंत्रण उनको ही मिला. राजधानी के गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने छोटे-से कमरे में अटलजी से बात की जयप्रकाश ने. शांति से जयप्रकाश की बातें सुनते रहे अटलजी अौर फिर बोले : इंदिराजी की बात होती तो मैं इतनी सहजता से तो नहीं लेता लेकिन जयप्रकाशजी, यह बात अापकी तरफ से अा रही है तो मैं अभी ही कहता हूं कि जनसंघ का अापको पूरा साथ व समर्थन मिलेगा. पार्टी अौर सत्ता की राजनीति से देश कहीं बड़ा है अौर अाप ऐसे गाढ़े वक्त में मुझे कमजोर नहीं पाएंगे. अौर तब से १९७७ के तूफानी दिनों तक मैंने देखा कि जयप्रकाश के साथ खड़े होने में अटलजी कभी कमजोर या कम नहीं पड़े. जयप्रकाश अांदोलन का चक्र ऐसा चला कि सभी पार्टियों में  धर्मसंकट खड़ा होता रहा- भारतीय जनसंघ में भी ! जयप्रकाश की कसौटी बड़ी कठिन पड़ती रही, कई ऐसे मामले भी अाए जब अटलजी ने बच निकलने की कोशिश की क्योंिक उन्हें पार्टी भी अौर साथी भी साथ रखने थे. लेकिन अटलजी ने जयप्रकाश का भरोसा खोया नहीं. यह संतुलन उनकी रणनीित का नहीं, उनके व्यक्तित्व के गठन का हिस्सा था. 

विपक्ष की राजनीति को अटलजी ने धार भी दी अौर संस्कार भी दिए. इसलिए वे जब तक सक्रिय रहे, लोकतांत्रिक विपक्ष की प्रतिनिधि अावाज बने रहे हालांकि वाम दलों के साथ-साथ दूसरे भी थे जो उन्हें इस भूमिका में देखना नहीं चाहते थे. जनसंघ अौर संघ परिवार में भी ऐसे लोग थे जो अटलजी से दूरी बना कर रखते थे लेकिन उन जैसा संतुलन दूसरे किसी के पास था ही नहीं. एक किस्म की चातुरी भी थी उनमें जो बहुत बारीक काटती थी. उन्हें मुखौटा कहने वाला बयान वैसे ही नहीं अाया था. वाचालता, प्रगल्भता अौर विनोद के सहारे वे खुद को राजनीतिक मुसीबतों से बचा ले जाते थे. लेकिन राजनीति केवल चातुरी तो है नहीं. इसलिए अाजादी के अांदोलन में अपनी अौर संघ परिवार की भूमिका को ले कर वे बार-बार कमजोर पड़ते थे. गांधी की उनकी समझ किसी अौसत राजनीतिज्ञ से अधिक परिष्कृत नहीं थी. बाबरी मस्जिद ध्वंस के पूरे प्रकरण में वे बेहद कमजोर साबित हुए थे अौर गुजरात दंगे की जिम्मेवारी के वहन में वे ‘नरसिंह राव’ की प्रतिमूर्ति बन कर रह गये थे. वे धारा के साथ बहते तो थे, कोई नई धारा बहाने की कूवत उनमें नहीं थी.  
      
पराजय में शालीनता अौर विजय में संयम - नेहरू-युग का यह दाय उन्होंने संभाल रखा था. उनकी १३ दिन अौर १३ महीनों की सरकारें गिरीं फिर भी हमने बिखरते-बिफरते वाजपेयीजी को नहीं देखा. फिर उन्होंने ५ साल लंबी सरकार चलाई जिसमें कुछ खास हुअा, ऐसा तो नहीं कहूंगा लेकिन भारतीय लोकतंत्र को अौर भारतीय समाज के संतुलन को चोट पहुंचाने वाली बात नहीं हुई. देश ठीक ही चला जिसे ‘शाइनिंग इंडिया’ का भोंडा नाम दे कर भाई लोगों ने अटलजी की लुटिया डुबो दी. बड़ी संभावना वाले उस चुनाव में पराजित हो कर वे प्रधानमंत्री पद से क्या हटे राजनीति से भी अलग होते गये, अौर धीरे-धीरे शरीर ने खुद को समेट लिया. पूरा अस्तित्व सन्नाटे में डूबता गया अौर फिर सन्नाटे का हिस्सा बन गया. ऐसा दूसरे किसी प्रधानमंत्री के साथ नहीं हुअा. होता भी कैसे, अटलजी जैसा दूसरा कोई प्रधानमंत्री भी कहां हुअा ! वे हमारे दौर के अाखिरी ही प्रधानमंत्री थे कि जो कई मामलों में अपनी कुर्सी से बड़े थे. वे राजनीति में थे, बड़ी लंबी पारी रही उनकी. राजनीति के दांव-पेंच भी खूब समझते थे, जरूरत पर उनका बखूबी इस्तेमाल भी करते थे लेकिन इसकी सावधान कोशिश भी करते थे कि सारा खेल दांव-पेंचों का बन कर ही न रह जाए. 

अब अापको दूसरा अटलबिहारी वाजपेयी नहीं मिल सकेगा. वह होगा ही नहीं क्योंकि जिस नेहरू-युग की वे पैदाइश थे, वह युग भी वापस नहीं अाने वाला है. गांधी ने अपने दौर में लड़ाई के सिपाही बनाए क्योंकि वे अाजादी की जंग के सेनापति थे; नेहरू ने अपने दौर में संसदीय राजनीति के कलाकार गढ़े क्योंकि वे लंबी गुलामी से छूटे देश में संसदीय लोकतंत्र की कलम रोप रहे थे. इसका अाकलन अभी उस तरह हुअा नहीं है कि जिस तरह होने की बड़ी जरूरत है कि नेहरू-युग ने, पार्टियों की चारदीवारी से निकल कर, लोकतंत्र की परंपराअों, व्यवस्थाअों, संस्थाअों अौर सांसदों को कैसे उभारा अौर संसदीय लोकतंत्र को समृद्ध किया. कांग्रेस के ही नहीं, वाजपेयी समेत विपक्ष के भी कई सांसद थे कि जिन्हें जवाहरलाल का साथ मिला. कौन किस पार्टी में है यह बात तब इतनी बड़ी नहीं बनाई जाती थी कि सब पर कालिख पोत दी जाए ! अटलबिहारी वाजपेयी की चमक जवाहरलाल से छिपी नहीं रही. विपक्ष में बैठे तरुण वाजपेयी बड़े तीखे तीर चलाया करते थे लेकिन जवाहरलाल ने किसी विदेशी मेहमान के पास ले जा कर उनका परिचय करवाया था कि यह नौजवान हमारी संसद का सितारा बनेगा.
     
देख रहा हूं कि अाज उनकी पार्टी उन्हें अपना शिल्पकार घोषित कर रही है जब कि सच्चाई यह है कि अाज की राजसत्ता के अधिकांश लोगों को अटलजी की स्वीकृति नहीं मिलती. वे राजधर्म की परंपरा में मानते थे, ये सारे सत्ताधर्म के फुटकर खिलाड़ी हैं. कल जो तिरंगा लालकिले पर लहराया गया था, अाज वही तिरंगा हर तरफ झुका हुअा है. यह शोक भी है अौर अस्वीकार भी है. गुजरात से भारतीय जनता पार्टी की जो राजनीति शुरू हुई, अटलजी उसे स्वीकार नहीं करते थे, यह सब जानते हैं. वे उसे खारिज नहीं कर सके, यह उनकी कमजोरी भी छिपी नहीं है. इसलिए ही उन्होंने किसी तरह का संवाद बंद कर दिया था. अब पटाक्षेप भी कर दिया. दर्द सहने की भी तो कोई सीमा होती है न ! ( 17.08.2018)