Monday, 10 June 2024

भारत भाग्य विधाता !

2024 ने देश को बहुत कुछ दिया है - इसने हमें एक ऐसा चुनाव दिखलाया है जैसा पतनशील चुनाव व चुनाव आयोग हमने पहले देखा नहीं था. इसने हमें एक ऐसा चुनाव परिणाम दिखलाया जैसा हमने पहले कभी देखा नहीं था. हमने पार्टियों की हार देखी थी, हमने पार्टियों की जीत देखी थी; हमने 1977 में वोट की ताकत से एक किस्म की तानाशाही को पराजित होते देखा था. लेकिन हमने ऐसा परिणाम पहली बार ही देखा जिसमें जीतने वाला हार गया, हारने वाला जीत गया ! और अब इस चुनाव परिणाम से हमें एक ऐसी सरकार मिली है जो पूर्ण बहुमत की सरकार से, बला के अल्पमत की सरकार में बदल गई है. 

 

इस सरकार के शिखर पर बैठा आदमी वही है लेकिन उसके पास अब न ‘संख्या का बुलडोजर’ है, न ‘सर्वस्वीकृति वाला इकबाल’ है. वह कवच-कुंडल विहीन ऐसी ‘ईश्वरीय रचना’ है, जिसका देवता झोला उठा कर निकल गया है. मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह इस अल्पमत की सरकार को अल्पसंख्यकों, अल्प-अवसर प्राप्त वर्गों, अल्प-प्रतिष्ठा व अल्प-सुरक्षा प्राप्त महिलाओं, अल्प-सामर्थ्यवान बच्चों का सहारा बनने की समझ व दृष्टि दे. ईश्वर से मैं ऐसी प्रार्थना इसलिए करता हूं कि गांधी ने, ‘गांधी’ फिल्म बनने से बहुत-बहुत पहले कहा था कि लोकतंत्र में जब भी, जो भी सरकार रहे, वह चाहे जितने वक्त रहे, सरकार बन कर रहे. गांधी के शब्दों में: “ इस कुर्सी पर मजबूती से बैठो लेकिन इसे हल्के-से पकड़ो !” ( 1947 में, आजादी के बाद बने मंत्रियों से उन्होंने अंग्रेजी में कहा था : ‘ सिट अॉन इट टाइटली बट होल्ड इट लाइटली ! ) - जिम्मेवारी के भरपूर अहसास के साथ, इस कुर्सी पर आत्मविश्वास से बैठो लेकिन इससे चिपको मत ! 

गांधी ने जो कहा था, होने लगा इसका उल्टा; और होते-होते ऐसा हो गया कि आज सारा गोदी मीडिया, जिसकी ‘गोदी’ भी अब किसी हद तक छिन गई है, एक ही राग अलाप रहा है कि नेहरू के बाद मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं कि जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं ! कैसी तुलना है !! नेहरू अपनी क्षमता व समझ भर लोकतांत्रिक संस्थाओं व परंपराओं का सर्जन, संरक्षण व संवर्धन करते हुए, तीनों बार पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने थे. मोदीजी के बारे में ऐसी बात कोई अंधभक्त या निरा अनपढ़ ही कह सकता है. 

चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान करने का धंधा - एक्जिट पोल - अब प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए. यह न कला है, न विज्ञान ! यह बाजार का नया धंधा है जिसे प्रतिष्ठित कर, भरपूर कमाई करने में कितने ही ‘किशोर’ लगे हैं. यह राजनीति का धंधा करने वालों की असीमित भूख को हथियार बना कर, लोकतंत्र से बलात्कार करने वाली नई बाजारू ताकत है. ऐसे धंधेबाजों को जिस तरह आज मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही है, उसी तरह उन राजनीतिक पंडितों-विश्लेषकों को भी कल मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी जो आज सीटों की संख्या गिन रहे हैं और येनकेन प्रकारेण उसे बढ़ाने-घटाने की दुरभिसंधि में लगे हैं. 

लोकतंत्र सत्ता का खेल नहीं है जैसा कि उसे बना दिया गया है; चुनाव मृत आंकड़ों का जोड़तोड़ नहीं है जैसी बाजीगरी करने में हम अक्सर लगे रहते हैं. हर चुनाव समाज की जमीन में नये बीज बोने और उनके अंकुरण की साधना है. यह गतिशील मनोविज्ञान का शास्त्र है जिसे हम अपनी आधी-अधूरी, छल-क्षद्म से भरी मानसिकता से आंकने-ढकने का खेल खेलते हैं. मतदाता ने एक संवैधानिक संरचना ( चुनाव आयोग) की निष्पक्ष देख-रेख में अपना मत दे दिया जो आज के चलन के मुताबिक मशीनों में बंद हो गया. वे मशीनें खुलेंगी और मतदाता का फैसला सामने आ जाएगा. इतनी सीधी, सरल-सी बात को इन तथाकथित ‘विशेषज्ञों’ ने इतना जटिल बना दिया है कि वह धोखाधड़ी की श्रेणी में आ गया है. यह बंद होना चाहिए. 

किसी ने बहुत खूब कहा कि 4 जून 2024 को जो चुनाव परिणाम आया, उसने लोकतंत्र की हवा में अॉक्सीजन की मात्रा थोड़ी बढ़ा दी है. हवा में अॉक्सीजन पर्याप्त हो तो जीवित संरचनाएं सांस खींच पाती हैं. ऐसा ही लोकतंत्र के साथ भी है. संसद जब संविधान के दायरे में रहती है और संवैधानिक संरचनाएं जब स्वतंत्रतापूर्वक अपनी-अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन करती हैं, तब लोकतंत्र सांस ले पाता है. जब ऐसा नहीं होता है तब अस्पताल चाहे जितना आधुनिक और ‘फाइवस्टार’ चमक-दमक वाला हो, कोविड के दौर में ऑक्सीजन बिना वहां जैसा हमारा हाल हुआ था वैसा ही हाल लोकतंत्र का होता है. 

मैं कहूंगा कि 4 जून 2024 को आया चुनाव परिणाम भारतीय संसदीय लोकतंत्र को संजीवनी बूटी दे गया है. हनुमानजी की लाई संजीवनी बूटी अमृत नहीं थी कि जीवित हो उठे लक्ष्मण को अब कोई मार ही नहीं सकता है. संजीवनी बूटी यानी मृत होते पौधे को पानी पिलाना और यह पहचानना कि इसे जीवित, पल्लवित व पुष्पित रखना हो तो लगातार पानी खोजने व पिलाने की जरूरत होगी. यह अहसास ही लोकतंत्र की संजीवनी है. इसलिए मत गिनिए कि इंडिया गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं और वह सत्ता से कितनी दूर रह गई. मत गिनिए कि मोदी-गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं. इसमें भी समय मत खराब कीजिए कि वे अपनी अमर्यादित सत्ताभूख को तृप्त करने के लिए आगे क्या-क्या शैतानी चालें चलने जा रहे हैं. यह देखिए और यह समझिए कि इस चुनाव में मतदाताओं ने सत्ता व तिकड़म की शक्ति से बनाया गया वह माहौल तोड़ दिया जिसे पिछले 10 सालों से रचा जा रहा था कि एक आदमी ही राष्ट्र है; एक आदमी की कुंठाएं ही राष्ट्रनीति हैं और उसका अहंकार ही लोकतंत्र है. 

यह मतदाता कौन है ?

यह मतदाता वह है जिसकी हम सबसे कम कद्र करते हैं. वह बिखरा हुआ, असंगठित है, इसलिए हम उसको कभी अपनी गिनती में नहीं लेते हैं. वह गरीब-अशिक्षित और अंगूठाछाप है, इसलिए हम अपने आभिजात्य ज्ञान में उसे गलती से भी जगह नहीं देते हैं. लेकिन वह आंखें खोल कर अपने चारो ओर की दुनिया को देखता रहता है; वह कम बोलता है लेकिन खूब जज्ब करता है; वह शैतानी ताकतों को पहचानता है; वह भटकता भी है, छला भी जाता है लेकिन फिर-फिर लौट कर राह पर आ जाता है. वह गांधी का वह अंतिम आदमी है जिसका ताबीज बना कर, उन्होंने तीन गोली खाने से पहले हमें सौंप दिया था. 

मैं गांधी-से शब्द कहां से लाऊं ! इसलिए अपने शब्दों में गांधी का भाव पकड़ने की कोशिश करता हूं : ‘ जब कभी ऐसे संशय में घिरने लगो कि तुम जो करने जा रहे हो वह सही या गलत; याकि तुम्हारा अहंकार इतना प्रबल होने लगे कि सही-गलत का भेद करना कठिन होने लगे तब सही फैसले तक पहुंचने के लिए तुम्हें एक ताबीज देता हूं.  जिसे तुमने खुद देखा हो, ऐसे सबसे निरीह-निराधार-कातर आदमी का चेहरा अपने ध्यान में लाना और खुद से पूछना कि तुम जो करने जा रहे हो, तुम जो सोच रहे हो क्या वह इस आदमी की किस्मत बदल सकेगा ? क्या इससे यह आदमी अपने भावी को बदलने में ज्यादा समर्थ होगा ? यदि जवाब हां हो तो आगे जाना; संशय में रह जाओ तो वह काम छोड़ देना !’ यही सबसे निरीह-निराधार आदमी भारत माता है, यही भारत भाग्यविधाता है. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से इसकी साधना शुरू की तो 30 जनवरी 1948 तक करते ही रहे.  

राहुल गांधी अपनी भारत-यात्रा में जाने-अनजाने इसी भाग्यविधाता तक पहुंच गए थे. राहुल गांधी का जो नया अवतार हम देख रहे हैं, वह इसी भाग्यविधाता के स्पर्श से संभव हुआ है. न कांग्रेस यह गलतफहमी पाले कि अब उसकी वापसी हो रही है, न राहुल इस मुगालते में रहें कि उनकी झोली में अक्षय राजनीतिक पूंजी आ गई है. गांधी का यह अंतिम आदमी सिर्फ उन्हें ही ‘प्रथम’ मानता है, सिर्फ उनका ही यह भाग्यविधाता है जो लगातार उसके बीच रहते हैं, उसकी बातें सुनते हैं, उससे बातें करते हैं और उसकी लड़ाई लड़ते हैं. वह जातिवादी नहीं है, हालांकि वह अपनी जाति के प्रति सावधान है; वह सांप्रदायिक नहीं है हालांकि वह अपने धर्म के प्रति अत्यंत संवेदनशील है; वह प्रांतीय व भाषाई द्वेष से घिरा नहीं है हालांकि उसके भीतर यह बोध जीवित रहता है. मतलब यह कि वह जटिल संरचना है. लेकिन सही-गलत, शुभ-अशुभ, सच-झूठ के संदर्भ की उसकी समझ बहुत बारीक व पवित्र है. वह देर से समझता है लेकिन समझता जरूर है. इसलिए उसके साथ लगातार संबंध-संपर्क-सक्रियता रणनीति नहीं, जरूरी कर्तव्य है.  

इस भारत भाग्यविधाता के साथ जिसका जुड़ाव होगा, जुड़ाव बना रहेगा, उसकी संसदीय शक्ति भी बढ़ेगी और उसकी सामाजिक शक्ति भी बढ़ेगी. इन दोनों शक्तियों का कोई संयोजन हो तो भारत लोकतंत्र का एक नया नमूना पेश कर सकेगा - ‘विश्वगुरु !’ जयप्रकाश ने कहा था कि हमारे लोकतंत्र को जनांदोलनों की शक्ति से चलने वाली सरकार चाहिए. क्या इस चुनाव के संदर्भ में हम यह तत्व समझ सकेंगे और इसकी संभावना खोज सकेंगे ? जवाब राहुल गांधी दें कि कांग्रेस कि हम सामाजिक धारावाहिकता के प्रतिनिधि लेकिन जवाब दिए बिना चुनाव से हुए इस परिवर्तन को टिकाए रखना संभव नहीं होगा. ( 10.06.2024)

Monday, 20 May 2024

प्रबीर, आपका स्वागत है !

जब भारतीय लोकतंत्र अपने नये सारथी चुनने की कगार पर पहुंच रहा है, तब लगता है कि लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ- न्यायापालिका - आने वालों के लिए एक-एक कर हिदायतें जारी कर रहा है. मेरे जैसा कोई कहेगा कि “बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते” या यह भी कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की कीमत सतत जागरूकता से ही अदा की जा सकती है. जो जागरूक नहीं है वह आजाद भी नहीं रह सकता है. हमारी न्यायपालिका को इसका अब भी अहसास हो तो हम स्वस्थ लोकतंत्र की दिशा में चल सकते हैं. हमारी न्यायपालिका ही एकमात्र संवैधानिक व्यवस्था है जो व्यक्ति व संस्थानों को लोकतांत्रिक अनुशासन में बांध कर रखने का संवैधानिक अधिकार रखती है. इसलिए ही तो संविधान में इसे सत्ता की होड़ से अलग रखा गया है. यह अलग बात है कि इसके भीतर से भी गुलाम मानसिकता वाले पैदा होते हैं और पहले मौके पे सत्ता की तरफ दौड़ लगा लेते हैं. सत्ता चरित्रत: स्वतंत्रता विरोधी होती है. वह कायर व यथास्थितिवादी भी होती है. 

मैं इतना सब लिख पा रहा हूं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस बी.आर.गवई-संदीप मेहता की बेंच ने ‘न्यूजक्लिक’ के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ की कोई 300 दिन पहले यूएपीए में की गई गिरप्तारी को ‘अवैध’ घोषित कर दिया है और वे जेल से बाहर आ गए हैं. हम प्रबीर से क्या कह सकते हैं सिवा इसके कि आइए, प्रबीर, आपका स्वागत है ! हमें अफसोस है कि हम उस भारत में आपका स्वागत  नहीं कर पा रहे हैं जो आपके जेल जाने वाले दिन से बेहतर भारत है. लेकिन क्या कीजिएगा, जो भी है, जैसा भी है हमारा-आपका भारत है जिसे हमें लगातार ज्यादा लोकतांत्रिक व न्यायपूर्ण बनाते जाना है. 

हम प्रबीर से इतना ही कहेंगे लेकिन हमें न्यायपालिका से बहुत कुछ कहना है. हम उससे कहना चाहते हैं कि श्रीमान, हम हर तरफ से लोकतांत्रिक परंपरा व संवैधानिक व्यवस्था से दूर होते जा रहे हैं. जो भी सरकार में पहुंच जाता है वह समझता है कि वह यहां पहुंच कर हर मर्यादा व बंधन से ऊपर हो गया है जबकि हमारे संविधान ने राष्ट्रपति से ले कर नागरिक तक सबकी मर्यादा लिख कर सामने धर दी है. उसने उन बंधनों का भी स्पष्ट उल्लेख कर रखा है जिसका पालन सबको करना चाहिए. राष्ट्रपति वह नहीं है जो प्रधानमंत्री की कृपा के नीचे दबा हुआ, सहमति में गर्दन झुकाए पड़ा है. वह किस समुदाय का है, स्त्री है कि पुरुष संविधान इसका विचार नहीं करता है. वह कहता है कि राष्ट्रपति वह है जो विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका पर आखिरी अंकुश है. वह संविधान का आखिरी संरक्षक है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद हमारे पहले राष्ट्रपति ही नहीं थे, संविधान की इस परिकल्पना पर खरे उतरने का रास्ता बनाने व बताने वाले भी थे. उनका काम सबसे कठिन था क्योंकि सामने जो सरकार थी वह वर्षों लंबे आजादी के संघर्ष में उनके साथ काम करने वाले बला के समृद्ध जनों की सरकार थी. इतना ही नहीं, राजेंद्र बाबू के सामने यह नजीर भी नहीं थी कि एक राष्ट्रपति को अपनी संवैधानिक भूमिका कैसे निभानी चाहिए. उन्होंने जो किया वही नजीर बन गई. 

हम राजेंद्र बाबू के निजी व्यवहार व मान्यताओं से असहमत हो सकते हैं लेकिन इसमें शायद ही किसी की असहमति हो कि नवजात लोकतंत्र व रक्तस्नान से गुजरी आजादी के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने पर्याप्त संयम व दृढ़ता से काम किया. ऐसा हम अब तक के राष्ट्रपतियों में से इक्का-दुक्का के लिए ही कह सकते हैं. ऐसा ही हाल लोकसभा के अध्यक्ष की भूमिका का है. उसका पहला व अंतिम दायित्व सांसदों की प्रतिष्ठा व संरक्षण है. वह पार्टी का होता तो है लेकिन संविधान उससे पार्टी से ऊपर उठ कर काम करने की मांग करता है. मुझे यदि संविधान में कोई संशोधन करना हो तो उसमें एक संशोधन यह होगा कि लोकसभा का अध्यक्ष सार्वजनिक जीवन की कोई हस्ती होगा न कि बहुमत से जीती पार्टी का कोई ऐरा-गैरा ! आज लोकसभा व राज्यसभा का अध्यक्ष सबसे व्यक्तित्वहीन व्यक्ति को बनाते हैं जिसकी रीढ़ की हड्डी जन्मजात ही गायब हो. आज वह विपक्ष के सांसदों को बोलने का मौका व समय नहीं देता है; वह उनका माइक बंद करवा देता है, वह इस बात का गर्व करता है कि उसने कितने सांसदों को निलंबित किया; कितनों की सदस्यता छीन ली. कहीं किसी सांसद की गिरफ्तारी होती है तो आज लोकसभा में जूं तक नहीं रेंगती. किसी सांसद की गिरफ्तारी इसलिए बहुत बड़ी बात नहीं है कि उसे कोई विशेषाधिकार प्राप्त है बल्कि इसलिए है कि वह अपनी जनता का नुमाइंदा है. उसकी गिरफ्तारी, निलंबन, सदस्यता से वंचित करना उसके मतदाताओं का अपमान है. कोई लोकतंत्र यह कैसे सह सकता है ? सांसद की चूक भी तो भी वह संसद में विमर्श में सामने आनी चाहिए. लोकसभा का अध्यक्ष यदि अपने सदस्यों का संरक्षण भी नहीं कर सकता है तो वह उस कुर्सी का अधिकारी हो ही नहीं सकता है. 

ऐसा ही न्यायपालिका के साथ भी है. मैं बराबर लिखता रहा हूं कि न्यायपालिका को संविधान ने इसी भूमिका में गढ़ा है कि वह विधायिका-कार्यपालिका-मीडिया के संदर्भ में सतत विपक्ष की भूमिका में रहे - विरोध के लिए नहीं, संविधान से बाहर जाने की हर कोशिश को अप्रभावी बनाने व संविधान के दायरे मे खींच लाने के लिए. उसे 24 घंटे सतर्क रहना चाहिए कि देश में कहीं भी, किसी की भी गिरफ्तारी विधायिका-कार्यपािलका द्वारा उसे दी गई सीधी चुनौती है. गिरफ्तारी किसी भी नागरिक से उसका बुनियादी संवैधानिक अधिकार छीनती है. इसलिए प्रबीर हों कि उमर खालिद कि दूसरे कई, हर गिरफ्तारी से न्यायपालिका को चौकन्ना हो जाना चाहिए कि उसके संवैधानिक अस्तित्व को चुनौती दी गई है. उसे बगैर किसी का इंतजार किए हर गिरफ्तारी की जांच करनी चाहिए और अपने नतीजे पर पहुंचना चाहिए तथा देश को तुरंत बताना चाहिए. 

कोई व्यक्ति, पत्रकार हो कि व्यापारी कि राजनीतिक या सामाजिक कार्यकर्ता, वह जितने दिन जेल में होता है उतने दिन उसके लिए संविधान व न्यायपालिका का अस्तित्व संशय में होता है. प्रबीर की गिरफ्तारी अवैध थी यह बात सर्वोच्च न्यायालय 300 दिनों के बाद बता रहा है तो यह कहना गलत तो नहीं होगा कि 300 दिनों तक प्रबीर के लिए संविधान स्थगित था तथा न्यायपालिका अस्तित्वहीन ? कौन सी न्यायपालिका, संविधान की किस धारा से निरपराध प्रबीर के 300 दिन लौटा सकती है ? इसलिए तो वह पुरानी कहावत हमेशा नई होती रहती है कि न्याय में देरी न्याय को धता बताना है. इसलिए न्यायपालिका को दूसरा सब कुछ छोड़ कर हर गिरफ्तारी का तुरंत संज्ञान लेना चाहिए. 

हम देख रहे हैं कि 7 दशकों के संसदीय लोकतंत्र में सरकारें कानून को मनमाने खेल का खिलौना बना रही हैं. प्रबीर पर आरोप है कि उन्होंने चीन से पैसा लिया है. लिया है कि नहीं, यह तो प्रबीर ही बताएंगे लेकिन मैं पूछना यह चाहता हूं कि क्या सरकारी खजाने में, पीएम रिलीफ फंड में, दूसरे संस्थानों में चीनी पैसा नहीं है ? चीन से तो हमारा खुला व्यापार-संबंध है. तो चीनी पैसा अपराध कैसे हो गया ? और चीनी क्यों, कोई भी मुद्रा अपराध कैसे हो सकती है यदि वह कानूनी रास्तों से देश में पहुंच रही है ? ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि प्रबीर चीन गए होंगे और टेंपो में भर-भर कर चीनी पैसा भारत ले आए होंगे ? अगर ‘न्यूजक्लिक’ के पास कोई चीनी डोनेशन कानूनसम्मत रास्तों से आया है, और विधिसम्मत तरीकों से ‘न्यूजक्लिक’ ने उसका इस्तेमाल किया है तो प्रबीर यूएपीए के अपराधी कैसे हो गये ? क्या अपराध की कसौटी यह है कि अपराधी सत्ताधारी का चापलूस है या नहीं ? अगर ऐसा है तो यह न्यायपालिका के मुंह पर तमाचा है. विधायिका व कार्यपालिका जब अपनी संवैधानिक अौकात भूल जाती है, और मीडिया चूहे से ज्यादा अपनी हैसियत नहीं मानती है तब नागरिक अनाथ हो जाता है. तानाशाही या फासिज्म ऐसी ही परिस्थिति बनाती है और ऐसी ही परिस्थिति में फूलती-फलती है. हमारा संविधान इस बारे में पर्याप्त सजग है. उसने न्यायपालिका को शक्ति दे रखी है कि वह तानाशाही या फासिज्म को फलने-फूलने से रोक सके. लेकिन शक्ति काफी नहीं होती है; शक्ति का अहसास व उसके इस्तेमाल की प्रेरणा जरूरी होती है. हनुमान को भी उनकी शक्ति का अहसास कराना पड़ा था न !

इसलिए गवई-मेहता बेंच ने न्यायपालिका की उस भूमिका को फिर से उजगर किया है जिसका सिरा पकड़ कर संजीव खन्ना-दीपांकर दत्ता खंडपीठ ने केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी. गवई-मेहता बेंच को प्रबीर की अवैध गिरफ्तारी के दायरे में उमर खालिद व अन्य सबको भी समेट लेना चाहिए था. ये अलग-अलग मामले नहीं हैं, विधायिका-कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका को दी जा रही चुनौती है. भारत सरकार के गृहमंत्रालय व दिल्ली पुलिस को तत्क्षण सर्वोच्च न्यायालय के कठघरे में खड़ा करना चाहिए और सारी गिरफ्तारियों का संवैधानिक अौचित्य जांचना चाहिए. 

4 जून को जो भी, जैसे भी सत्ता की तरफ बढ़े वह जान ले कि अब न्यायपालिका उसे संविधान व कानून से खेलने का कोई भी मौका नहीं देगी तो हम कहेंगे कि भाई प्रबीर, हम आपके 300 दिन तो लौटा नहीं सकते लेकिन दूसरे प्रबीरों के 300 दिन पर आंच नहीं आने देंगे. आखिर तो हमारा लोकतंत्र प्रौढ़ हो रहा है ! ( 16.05.2024)

                                                                                                                                     

दो चेहरों वाली अदालत

मैं परेशान हूं कि देश में एक न्यायपालिका है लेकिन उसके दो चेहरे हैं. किंवदंति है कि रावण के कई सर थे- दशानन;  लेकिन यह नहीं कहा जाता है कि वे सारे सर भिन्न-भिन्न बातें बोलते थे. सर भले कई हों, वे सब एक ही तरह से सोचते-करते हों तभी व्यवस्था की गाड़ी चल सकती है. ऐसा न हो तो कोई भी व्यवस्था नहीं चल सकती है - खास कर न्यायपालिका ! यहां दो तरह की मनोभूमिका बेहद चिंताजनक व खतरनाक होती है.   

    हमारी न्यायपालिका का एक चेहरा सर्वोच्च न्यायालय की उस खंडपीठ का है जिसने कुल जमा 50 से अधिक दिनों तक जेल में रहने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जेल से रिहा कर दिया - कुल जमा 22 दिनों के लिए. 2 जून 2024 को उन्हें वापस जेल लौट जाना होगा. सर्वोच्च न्यायालय की संजीव खन्ना-दीपांकर दत्ता खंडपीठ ने जो आदेश दिया है उसके मुताबिक केजरीवाल इस बीच मुख्यमंत्री की हैसियत से कोई भी काम नहीं कर सकेंगे, दफ्तर भी नहीं जा सकेंगे, फाइलें भी नहीं निबटा सकेंगे लेकिन वे अपनी पार्टी व अपने गठबंधन का देशव्यापी चुनाव प्रचार कर सकेंगे. सारे सरकारी प्रशासन ने व अब मोदी-तंत्र बन चुके ईडी, इंकमटैक्स जैसे संस्थानों ने हर तरह का तर्क आजमाया ताकि केजरीवाल को चुनाव खत्म होने तक जमानत न मिल सके लेकिन अदालत ने उनके सारे तर्कों को खारिज करते हुए केजरीवाल को सशर्त जमानत दे दी. कहा : “ अरविंद केजरीवाल के बारे में आरोपियों ने यह ठीक ही ध्यान दिलाया है कि अक्तूबर 2023 से गिरफ्तारी तक भेजी ईडी की 9 नोटिसों-समन की उन्होंने उपेक्षा की. उनके मामले में यह प्रतिकूल तथ्य है लेकिन इस मामले में दूसरे भी कई तथ्य ऐसे हैं कि जिन पर ध्यान देना जरूरी है. आरोपी दिल्ली का मुख्यमंत्री है, एक राष्ट्रीय पार्टी का नेता है. इसमें शक नहीं कि उस पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं लेकिन अभी तक वे सिद्ध नहीं हुए हैं. उनका पहले का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं है. वे समाज पर किसी तरह का खतरा नहीं हैं… यह कहने की जरूरत नहीं है कि लोकसभा का चुनाव लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है जो अगले पांच साल के लिए देश की सरकार का फैसला करेगा. इसलिए हम आरोपियों के इस तर्क को खारिज करते हैं कि केजरीवाल को अंतरिम जमानत देना सामान्य नागरिकों की तुलना में राजनेताओं का विशेष सुविधाप्राप्त वर्ग बनाना हो जाएगा.” इस तर्क के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने सत्तापक्ष की सारी कोशिशों को धता बताते हुए केजरीवाल को अंतरिम जमानत दे दी.

   जैसा कि अदालत ने कहा है कि अंतरिम जमानत का मतलब केजरीवाल को अपराधमुक्त घोषित करना नहीं है, ठीक उसी तरह मैं भी यह साफ कर दूं कि मेरे इस लेख का मतलब कोई ऐसा न निकाले कि मैं केजरीवाल की सरकारी व निजी नीतियों का समर्थन कर रहा हूं. मैं कहना यह चाह रहा हूं कि खन्ना-दत्ता पीठ ने जिस तरह इस मामले को सरकारी धौंस व कानून की मृत बारीकियों से बाहर निकल कर समझने व समझाने की कोशिश की, उससे सर्वोच्च न्यायालय का कद बड़ा हुआ है व लोकतंत्र के पांव मजबूत हुए हैं.  

   लेकिन यही न्यायपालिका जब पुणे में विशेष सुनवाई के लिए बैठती है, तब उसकी चेतना व समझ को लकवा क्यों मार जाता है ? जिस दिन केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने का फैसला सामने आया, उसी 10 मई को 11 साल पुराने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड का फैसला भी सामने आया. यहां अदालत मामले की नजाकत को समझने में पूरी तरह विफल रही. समाज में फैली अंधश्रद्धा न्याय की किसी भी अवधारणा को सदियों से विफल करती हुई, अट्टहास करती आ रही है. हमारे सामाजिक जागरण व बौद्धिक सजगता का जैसा क्रूर मजाक अंधविश्वास फैलाने तथा उसकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करने वालों ने किया है, करते आ रहे हैं, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती है. यह इंसानी समझ को धता ही नहीं बताती है बल्कि इंसानी कमजोरियों को निशाने पर ले कर समाज का मनोबल तोड़ देती है. 

   डॉ. दाभोलकर व उनकी अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने इसके खिलाफ मोर्चा खोला था. बौद्धिक-सांस्कृतिक-शैक्षणिक से ले कर प्रत्यक्ष प्रतिरोध का हर मंच उन्होंने इस्तेमाल किया. ऐसे एक आदमी की हत्या सनातन संस्था नाम के एक प्रतिगामी गंठजोड़ ने दिन-दहाड़े कर दी, तो यह एक व्यक्ति की ही नहीं, उस सामूहिक प्रयास की हत्या थी जो समाज को अंधविश्वासों के प्रति जाग्रत कर रहा था. पुणे पुल पर, 20 अगस्त 2013 की सुबह उन्हें गोली मार दी गई. 11 साल से पुलिस व अदालत अपराधी को पकड़ने व सामने लाने में लगी थी लेकिन दोनों इस कदर विफल रहते हैं कि 11 साल बाद विशेष जज पी.पी. जाधव कहते हैं : “ हमारे पास शंका करने के पर्याप्त कारण थे लेकिन पुलिस इनके खिलाफ पर्याप्त सबूत जुटाने में विफल रही. इन सब पर शक के निश्चित व ठोस कारण थे लेकिन निश्चित सबूत के अभाव में हमें इन्हें छोड़ना पड़ा.” इसके बाद जज साहब ने वह सब भी कहा जिसे कहने का सारा अधिकार वे पहले ही गंवा चुके थे. उन्होंने कहा कि किसी भी इंसान की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण है. लेकिन आरोपियों ने, खासकर उनके वकील ने कुछ ऐसे तर्क पेश किए जिनसे इस हत्या को जायज साबित करने की कोशिश हुई. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. 

   अब न्यायपालिका को व समाज को सोचना यह चाहिए कि जिस “व्यक्ति या संस्थान पर शंका करने के पर्याप्त सबूत थे”, उसे 11 साल की कोशिश के बाद भी आप अपराधी सिद्ध नहीं कर पाए तो अदालत व पुलिस किस मर्ज की दवा हैं ? अदालत व जज साहबान का एक ही, जी हां,  एक ही काम है कि वे सच को खोज निकालें तथा अपराधी को बचने नहीं दें. आप देख भी रहे हैं, समझ भी रहे हैं, मान भी रहे हैं कि जो छूट रहे हैं वे हत्या जैसे जघन्य अपराध के अपराधी तो हैं लेकिन जांच एजेंसियां, पुलिस आदि सही तरीके से जांच नहीं कर रही हैं. तो फिर अदालत क्या करेगी ? मैं समझता हूं कि अदालत और जज साहबान की पेशेगत नैतिकता व संवैधानिक दायित्व कहता है कि उन्हें जांच एजेंसियों को कड़ा निर्देश देना चाहिए कि वे जांच में क्या-क्या ऐसा छोड़ रहे हैं जिससे मामला कमजोर पड़ रहा है, और उन्हें किस दिशा में जांच पूरी कर, नये साक्ष्य के साथ तुरंत अदालत के सामने उपस्थित होना चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक अदालत न किसी को मुक्त करेगी, न हल्की सजा देगी बल्कि मुकदमा लंबित रहेगा तथा पुलिस व सरकार पर अदालत का दवाब बना रहेगा. पुणे की इस अदालत ने किस आधार पर मुकदमा बंद कर दिया या अपराधियों के लिए ऊपर की अदालत तक जाने का रास्ता बना दिया ? ऊपरी अदालतों में तो मामलों की और भी धकमपेल है, तो मामला वहां भेज कर आप अपनी जिम्मेवारियों से कंधा झटकने भर का काम कर रहे हैं जो आपकी अयोग्यता सिद्ध  करता है. 

   न्यायपालिका याद करे, और हमेशा याद रखे कि स्वतंत्रता के बाद दो-दो बार ऐसा हुआ है कि अपनी तटस्थता व साहस खो देने के कारण न्यायपालिका ने सारे राष्ट्र को शर्मिंदा किया है. पहली थी महात्मा गांधी की हत्या. उस मुकदमे ने हमारी न्यायपालिका के चेहरे पर ऐसी कालिख मली है जो कभी छूटेगी नहीं. नाथूराम गोडसे से ले कर सावरकर तक सभी उस हत्या के प्रमाणसहित सीधे गुनहगार थे. पुलिस व जांच एजेंसियां राजनीतिक दवाब व भय से तथा अपनी पक्षधरता से उस तरह जांच नहीं कर रही थीं जिस तरह करने की जरूरत थी. तब जज साहब क्या कर रहे थे ? तब सरकार क्या कर रही थी ? क्या अदालत सावधान थी कि वह किसी भी स्तर पर अपराधी को बचने का मौका नहीं देगी ? क्या सरकार सावधान व प्रतिबद्ध थी कि वह अपनी मशीनरी को किसी भी स्तर पर कोताही बरतने नहीं देगी ? गांधी-हत्या पर लिखी गई प्राय: हर किताब में अदालत के व सरकार के रवैये पर गहरा क्षोभ दर्ज है तो इसी कारण से. गांधी से दाभोलकर तक की हत्या में हत्यारे इतनी लंबी दौड़ लगा चुके हैं लेकिन अदालत आज तक बैठी है कि न्याय के लिए जरूरी प्रमाण उसके पास चलकर आएंगे ? नहीं, प्रमाण निकलें व चलकर अदालत तक पहुंचे इसकी सावधान कोशिश अदालत को, जज साहबान को तथा सरकार को भी करनी होगी. औपनिवेशिक अदालत व लोकतांत्रिक अदालत में यदि इतना फर्क भी दिखाई न दे तो न्यायपालिका व विधायिका को किसी भी तरह की सामाजिक प्रतिष्ठा व स्वीकृति की बात भूल ही जानी चाहिए. न्याय तक पहुंचना मशीनी प्रक्रिया नहीं है. उसमें जज साहबान की बारीक कानूनी पकड़ तथा मानवीय व संवैधानिक प्रेरणा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता भी कसौटी पर होती है. 

   ऐसा ही तब भी हुआ जब लोकतंत्र की समझ व उसके प्रति प्रतिबद्धता की परख करने आपातकाल देश के सामने आया. जयप्रकाश नारायण ने मामला आसान बना दिया था :  यह लोक बनाम तंत्र की लड़ाई है. उन्होंने पक्ष-विपक्ष की राजनीति से एकदम अलग, एक नया ही विमर्श देश में खड़ा कर दिया था : लोक की व्यापक असहमति को कुचलने का अधिकार किसी भी तंत्र के पास नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा : लोकतंत्र किसी सरकार का मामला नहीं है. लेकिन उस नाजुक कालखंड में हमारी न्यायपालिका निरक्षर भट्टाचार्य साबित हुई. वह तो जिस संविधान की रक्षा की शपथ लेती है, उसकी ही भक्षक बन गई. उसने तो ‘कानूनी संप्रभु’ को ‘संवैधानिक संप्रभु’ का आका घोषित कर दिया. उस कलंक को धोने में न्यायपालिका को वैसी हिम्मत व दूरदृष्टि बार-बार दिखानी होगी जैसी केजरीवाल की अंतरिम जमानत के प्रश्न पर खन्ना-दत्ता की खंडपीठ ने दिखाई. उनके लिए आसान था कि वे केजरीवाल की रिहाई से मुंह फेर लेते क्योंकि सरकार, जांच एजेंसियां, गोदी मीडिया सभी तो समवेत सुर में मोदी-राग ही गा रहे थे. मनीष सिसोदिया से केजरीवाल तक ऐसा जाल बुना गया था कि दूसरा कुछ देखने-सुनने की अदालत को जरूरत भी नहीं थी. लेकिन संसदीय लोकतंत्र में चुनाव का संदर्भ, राजनीतिक दलों की भूमिका, केजरीवाल का एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का अध्यक्ष होना, चुनाव से ठीक पहले उनकी गिरफ्तारी और सत्ता-पक्ष द्वारा मामले का लंबा खींचने की रणनीति सबको खन्ना-दत्ता खंडपीठ ने आंका व अंतरिम जमानत का आदेश दे दिया. उन्होंने वे जरूरी प्रतिबंध भी लगा दिए जिससे केजरीवाल स्वंय को अपराधमुक्त मानने का भ्रम न पाल लें लेकिन यह भी घोषित कर दिया कि लोकतंत्र के खेल को खेल बनाने की भूल सत्तापक्ष भी न करे. यदि इस खंडपीठ ने केजरीवाल की जमानत को नजीर बनाते हुए, ऐसी ही शर्तों के साथ झारखंड में हेमंत सोरेन के लिए भी निर्देश जारी किया होता तो इससे न्यायपालिका का चेहरा और साफ हो जाता, लोकतंत्र की सूरत कुछ और चमक उठती. 

   न्यायपालिका सतत संविधान की कसौटी पर होती है और लोक हमेशा ही संविधान का संरक्षण चाहता है, यह लोकतांत्रिक दायित्व संविधान ने न्यायपालिका की गांठ में बांध दिया है. यह गांठ कमजोर होगी या भुला दी जाएगी तो न्यायपालिका जितने भी चेहरे लगा ले, वह स्याह ही होता जाएगा.( 14.05.2024)       

Saturday, 4 May 2024

मिस मेयो : मिस्टर मेयो

     इतिहास भी कमाल के गोते लगाता है ! भला सोचिए, 2024 में वह 1927 की कहानी दोहरा रहा है. तब यानी 1927 में एक थीं कैथरीन मेयो और एक थे महात्मा गांधी. महात्मा गांधी कौन थे यह तो अधिकांशत: हम सब जानते ही हैं ( मैं व्हाट्एप यूनिवर्सिटी के महान इतिहासकारों को भी इसमें शामिल कर रहा हूं ! ), लेकिन कैथरीन मेयो कौन थीं यह जानने की जरूरत अधिकांश पाठकों को पड़ेगी. तो बताता हूं कि वे एक अमरीकी, श्वेत चमड़ी की श्रेष्ठता के भाव से भरी, नकचढ़ी पत्रकार सरीखी कुछ थीं जिन्हें कुछ लोग तब उसी तरह इतिहासकार भी कहते थे जिस तरह अब कुछ लोग गृहमंत्री अमित शाह को दार्शनिक कहते हैं. 20 के दशक में मिस मायो भारत आई थीं. गांधीजी से भी मिली थीं, दूसरी हस्तियों से भी मिली थीं, रवींद्रनाथ ठाकुर से भी मिली थीं. गांधीजी के निर्देश में चल रहे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से असहमत, असंतुष्ट, नाराज मेयो मैडम ने एक किताब लिखी : ‘ मदर इंडिया !’ ना, ना, आप ऐसा मत मान बैठिएगा कि महबूब खान की प्रसिद्ध फिल्म ‘मदर इंडिया’ मेयो मैम की इस किताब से प्रेरित थी. मेयो मैम ‘मदर इंडिया’ में अपना अलग ही राग गाती हैं.   

   यह किताब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों, उसकी दिशा, उसकी उपलब्धियों आदि की धज्जियां उड़ाती हुई यह साबित करती है कि यह भारतीय समाज कुरीतियों-अन्याय-अत्याचार तथा शोषण की गंदी व्यवस्था पर टिका एक ऐसा गर्हित समाज है जिसे गुलाम बना कर अंग्रेजों ने ( कहें : श्वेत चमड़ी वालों ने ! ) कुछ सभ्य,कुछ मानवीय बनाया है. मेयो मैम की किताब तब कई लोगों को नागवार गुजरी थी लेकिन वह किताब जल्दी ही ‘गुजर भी जाती’ यदि गांधीजी ने उसे पढ़ा न होता. बहुत कहने पर गांधीजी ने न केवल ‘मदर इंडिया’ पढ़ी बल्कि चौतरफा आग्रह के कारण, ‘ बहुत व्यस्तता’ में से समय निकाल कर उस पर एक टिप्पणी भी लिखी जो 15 सितंबर 1927 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित हुई.  महात्मा गांधी ने अपनी टिप्पणी का शीर्षक दिया : ‘ ड्रेन इंस्पेक्टर रिपोर्ट’ : नाली सफाई के जमादार की रिपोर्ट ! गरज यह कि जिसका धंधा ही गंदगी को उकेर-उकेर कर देखना है, वह गंदगी के अलावा देखेगा भी तो क्या और वर्णन भी करेगा तो गंदगी की ही करेगा. महात्मा गांधी की अपनी शैली में यह खासी कड़ी टिप्पणी थी. गांधीजी ने लिखा कि यह “ बड़ी चालाकी से लिखी सशक्त किताब है… जो किसी हद तक सत्य का बखान, असत्य के प्रचार के लिए करती है.” 

   अब न कैथरीन मेयो हैं, न गांधीजी हैं लेकिन गंदगी फैलाने का धंधा जोरों पर है. गंदगी को सहेजने तथा ‘ बड़ी चालाकी से सत्य का बखान इस तरह करना कि असत्य का प्रचार हो’ वाली संस्कृति जीवित भी है, जारी भी है. सो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कला में महारत हासिल कर ली है. वे अब इस कला के ‘उस्ताद जमादार’ बन गए हैं. हम देखें तो प्रधानमंत्री मोदी का कुल इतिहास 2014 से शुरू होता है और कुर्सी तक पहुंच कर चुक जाता है. वे सत्ता की जिन दो कुर्सियों पर बैठे हैं - मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री - यदि वे कुर्सियां हटा दी जाएं तो उनके पास कुछ भी बचता नहीं है. कुर्सी के बिना वे उसी तरह अर्थहीन हो जाते हैं जैसे नालियों के बिना सफाई जमादार ! 

   मोदी चुनाव के सन्निपात में इधर जब-जब मुंह खोल रहे हैं, इतिहास का मुंह खुला रह जाता है. वैसे भी प्रधानमंत्री झूठ व सच में फर्क करने जैसी नैतिकता में कभी पड़ते नहीं हैं. सत्ता की कुर्सी पर बैठ कर किसी झूठ को जोर-जोर से सौ बार बोलो तो वह लोगों के बीच किसी हद तक सच की तरह स्थापित हो जाता है, इसे मान कर अहर्निश कार्यरत रहते हैं प्रधानमंत्री. उन्होंने कहा कि कांग्रेस का चुनाव घोषणापत्र उन्हें मुस्लिम लीग के घोषणापत्र जैसा लगता है. कोई प्रमाण ? कोई साम्यता ? नहीं, यह सब बताना प्रधानमंत्री का काम थोड़े ही है ! उन्हें पता है कि उनकी बात को ‘गोदी मीडिया’ देश भर में पहुंचा देगा और जहां-जहां उनका कहा ‘मुस्लिम’ शब्द पहुंचेगा,सांप्रदायिकता के अनुकूल वातावरण बन ही जाएगा. उन्हें इस वातावरण से मतलब है क्योंकि इससे वोट की फसल अच्छी बनती व कटती है. 

    उन्होंने कहा कि कांग्रेस लोगों से घर छीन लेगी, भैंस छीन लेगी, धन छीन लेगी, मंगलसूत्र छीन लेगी और यह सारा मुसलमानों को दे देगी. कोई प्रमाण ? कोई संदर्भ ? नहीं, यह सब बताना प्रधानमंत्री का काम थोड़े ही है ! उन्होंने बस कह दिया, अब ‘ गोदी मीडिया’ अपना काम करेगा और वातावरण जहरीला बनता जाएगा. समाज जितना जहरीला बनता जाएगा, वोट की फसल उतनी जल्दी पकेगी. पकी फसल काटनेवाले योगियों की कमी थोड़े ही है प्रधानमंत्री के पास ! 

   उन्होंने कह दिया कि ‘ पाकिस्तान युवराज को प्रधानमंत्री बनाने को बेकरार  है’, तो कह दिया. गोदी मीडिया के पंखों पर सवार हो कर बात सब दूर फैल गई. इसमें ‘पाकिस्तान’ और ‘युवराज’ दो ही शब्द हैं जिसका जहरीला असर प्रधानमंत्री को पैदा करना है. उन्हें लगता है कि देश आज भी इतना जाहिल है कि उनका मनचाहा हो जाएगा. सच क्या है ? सच इतना ही है कि पाकिस्तान के एक सांसद को मोदी से कहीं भला लगता है कि राहुल गांधी भारत के प्रधानमंत्री हों. किसी एक व्यक्ति को पूरे देश का प्रतिनिधि बता कर कुछ भी बयान दे देना, गांधी के शब्दों में ‘ड्रेन इंस्पेक्टर रिपोर्ट’ है.  

   पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संदर्भ दे कर प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस कहती है कि देश के धन पर पहला हक मुसलमानों का है. कोई प्रमाण ? कोई संदर्भ ? तुरंत ही गंदी नाली में उतरे प्रधानमंत्री के सिपाही और  खोज लाए एक वीडियो. वीडियो चलाया गया तो उसमें मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक उनका होना चाहिए जो कमजोर हैं, अल्पसंख्यक हैं. हमारे देश में मुसलमान भी अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं, तो उनका नाम भी लिया मनमोहन सिंह ने. यह कोई छुपी बात तो है नहीं कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में जिस कांग्रेस का जन्म हुआ वह अंतिम आदमी की बात करती थी तथा यह भी मानती थी कि वह अंतिम आदमी हमारे विकास की कसौटी भी है और कारण भी. धर्म के आधार पर इनमें फर्क करना कांग्रेस की नीति में नहीं है. व्यवहार में राजनीति बहुत कुछ ऐसा कराती है जैसा इन दिनों मोदी-कुनबा कर रहा है, तो जितनी छूट इन्हें है उतनी छूट मनमोहन सिंह को क्यों नहीं दी जानी चाहिए ? कांग्रेस और मनमोहन सिंह सांप्रदायिकता का फायदा उठाते होंगे भले लेकिन सांप्रदायिकता उनकी राजनीति का आधार कभी नहीं रही है. हिंदू महासभा से ले कर भारतीय जनता पार्टी तक अपने हर अवतार में नरेंद्र मोदियों ने सांप्रदायिकता को ही अपनी राजनीति का आधार बनाया है. इन दोनों में बहुत बड़ा गुणात्मक फर्क है. 

   मोदी के छुटभैय्यों में से एक राजनाथ सिंह जब नाली में उतरे तो यह गंदगी समेट लाए कि महात्मा गांधी कांग्रेस को समाप्त करना चाहते थे लेकिन नेहरू एंड कंपनी ने यह होने नहीं दिया. यही महाशय थे जिन्होंने नाली छान कर यह गंदगी समेटी थी कि सावरकर ने महात्मा गांधी के कहने से अंग्रेजों को माफीनामा लिखा था. वह झूठ आज तक उनका मुंह काला करता है, तो यह नया सत्य इन्हें कहां ला पटकेगा ! महात्मा गांधी की जिस दिन संघ-परिवार ने हत्या की, उससे पहले की रात गांधीजी ने अपनी जिंदगी का आखिरी दस्तावेज लिखा था. उसे पढ़ने व समझने की कसरत भले न करें राजनाथ सिंह लेकिन इतना तो जानें कि उस दस्तावेज में गांधीजी ने लिखा था कि आजादी मिलने के साथ ही कांग्रेस पार्टी का काम पूरा हो गया. अब इसे विसर्जित कर देना चाहिए. कांग्रेस पार्टी के जो लोग सत्ता की राजनीति में काम करना चाहते हैं उन्हें अपनी नई पार्टी बनानी चाहिए. लेकिन ईमानदारी से इतिहास का ककहरा भी जिसने पढ़ा होगा उसे इसी के साथ एक दूसरा दस्तावेज भी मिलेगा जिसमें आजादी के बाद गांधी जवाहरलाल से पूछते हैं कि तुम अब कांग्रेस की क्या भूमिका देखते हो; और जवाहरलाल कहते हैं कि उन्हें अब कांग्रेस की कोई खास भूमिका दिखाई नहीं देती है, तो गांधी कहते हैं कि नहीं, कांग्रेस कभी खत्म नहीं होगी, उसे कभी खत्म नहीं होना चाहिए क्योंकि वह जिन मूल्यों के लिए काम करती रही है, वे मूल्य अक्षुण्ण हैं. राजनीति के जोकरों के लिए यह बारीकी समझ पाना संभव नहीं है कि गांधीजी कांग्रेस संगठन व कांग्रेस मूल्य में फर्क करते हुए जवाहरलाल को सावधान करते हैं. इसलिए कांग्रेस जिन मूल्यों के लिए बनी व लड़ी थी, उन मूल्यों को खत्म करने में लगी संघी धारा को कोई नैतिक हक नहीं है कि वह महात्मा गांधी की उन बातों का संबंध आज से जोड़े. और इतिहास के पन्ने ही पलटने हों तो राजनाथ सिंहों को वे सारे पन्ने भी देखने चाहिए जिनमें गांधीजी ने हिंदू महासभा-राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे सांप्रदायिकता में तैरने वाले संगठनों के लिए कठोरतम वर्जनाएं की हैं. 

   सच और झूठ में क्या फर्क है ? बकौल कृष्णबिहारी ‘नूर’ : 

   सच बढ़े या घटे तो सच ना रहे / झूठ की कोई इंतहा ही नहीं. जैसे यह शेर भारतीय जनता पार्टी के लिए ही लिखा गया है. ( 03.05.2024)   

Wednesday, 24 April 2024

क्या लोकतंत्र की यह गुजारिश कोई सुन रहा है !

बेचारा सर्वोच्च न्यायालय ! अब उसके या उसके उच्च न्यायालय के जज रहे 21 महानुभावों ने उसे सावधान किया है ( धमकी दी है ! )  कि उसे दवाब में डाल कर मनचाहा फैसला पाने वाला एक गिरोह काम कर रहा है जिससे उसे बचना भी चाहिए व सतर्क भी रहना चाहिए. सार यह है कि कानूनी पेशे की रोटी खाने वाले ये 21 जज सर्वोच्च न्यायालय को बता रहे हैं कि आप इतने भोले हो कि कोई भी आपको लल्लू बना लेता है. वे यह भी कहते हैं कि मी लॉर्ड, आप घबराएं नहीं, हम हर क्षण आपकी मदद के लिए तैयार हैं. जब भी आप ऐसे दवाब में टूटने लगें, बस हमें पुकार लें. इससे पहले 2 सौ से ज्यादा ऐसे ही पेशेवर न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय को ऐसी ही चेतावनी दी थी. 

मैं जल्दी से खोजने लगा कि इन स्वनामधन्य महानुभावों के नाम क्या हैं, तो मुझे खुद पर ही शर्म आई कि ऐसे ‘दिग्गजों’ में से मैं किसी को भी खास नहीं जानता हूं. ये महानुभाव जिन अदालतों से जुड़े रहे, उनके पन्नों में इनमें से किसी के नाम से, एक भी ऐसा मामला दर्ज नहीं मिलता है जिसने संवैधानिकता को मजबूत बनाने जैसा कोई काम किया हो. काले कोट का पेशा तो पेशा है जो ऐसे सभी महानुभाव करते हैं लेकिन काले कोट की आभा जगाने का माद्दा अलग चीज है. वह कभी-कभी ही, किसी-किसी में मिलता है. 

इन महानुभावों का इतना सारा किया जैसे काफी नहीं था कि प्रधानमंत्री ने भी सर्वोच्च न्यायालय को भरी क्लास में ( भरे-पूरे देश में ! ) मुर्गा बना दिया. बकौल प्रधानमंत्री इस देश में काला धन बनाने वाले गिरोह में अब सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल हो गया है और ‘चुनावी बौंड’ को असंवैधानिक ठहराने के लिए देश को और सर्वोच्च न्यायालय को पछताना होगा. वे कहते हैं कि चुनावी बौंड की कल्पना उनके मन में तब कौंधी थी जब वे ‘बुधत्व’ को उपलब्ध हुए थे. चुनावी बौंड उनके मन के उसी ‘पवित्र क्षण’ की संतान है. गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए जब ऐसे ही किसी ‘पवित्र क्षण’ में उन्होंने फैसला कर लिया था कि उन्हें येनकेनप्रकारेण देश का प्रधानमंत्री बनना ही है, तबसे ले कर ‘अबकी बार 400 पार’ के नवीनतम ‘पवित्र लक्ष्य’ का इतिहास पलटें हम तो पता चलता है कि देश को पछताने के एक नहीं, अनेक मोदी-कारण हैं. लेकिन अभी मैं सिर्फ चुनावी बौंड के ‘पवित्र फैसले’ की ही बात करूंगा. 

प्रधानमंत्री ने कहा है कि काले धन की गिरफ्त से चुनावी प्रक्रिया को मुक्त करने के ‘पवित्र उद्देश्य’ से चुनावी बौंड की योजना लाई गई थी. मैं जानना चाहता हूं कि नोटबंदी की तरह यह भी ‘मायावी साधक मोदी’ की निजी उपलब्धि थी या इस बारे में जानकारों से मश्विरा भी हुआ था ? स्वर्गीय अरुण जेटली के अलावा कोई ऐसा एक नाम प्रधानमंत्री ले सकते हैं जिसकी नश्वर काया अब तक हमारे बीच मौजूद है ? तब के रिजर्व बैंक के गवर्नर, बैंकिग की दुनिया के दूसरे बड़े नाम, कोई अर्थशास्त्री, चुनाव आयोग के अधिकारी कौन थे कि जिनके साथ इस ‘पवित्र’ योजना की चर्चा-समीक्षा की गई थी ? क्या संसद में कभी इस पर विमर्श हुआ ?  अगर यह पवित्र मन की परिकल्पना थी तो इसमें गुप्तता के इतने प्रावधान क्यों थे ? दाता व आदाता का नाम किसी को पता नहीं चलना चाहिए, इसकी इतनी सावधानी क्यों थी ? इस पर उस तरह नंबर क्यों डाला गया था कि जो जासूसी निगाहों से ही पढ़ा जा सकता था ?  गुप्त नंबर की यह तरकीब भी आपकी योजना में तो थी नहीं, बैंकों के गंभीर एतराज के बाद, लाचारी में आपके ‘पवित्र मन’ ने इसे छिपा कर डालना कबूल किया था ! बताएं प्रधानमंत्री कि इतनी तिकड़मों के पीछे कौन-सा पवित्र मन काम कर रहा था ?  जो गुप्त होता है, वह पवित्र नहीं होता है.

मोदी-मार्का भ्रष्टाचार वह है जिसमें शब्दों के अर्थ ही बदल दिए जाते हैं. मोदी-सदाचार की नई परिभाषा है : सरकार जो भी करे ( नहीं, मोदी-सरकार जो भी करे ! ) वह सदाचार, जो देश करे या कहे वह कदाचार ! किसी जड़बुद्धि को भी हंसी आ जाए ऐसी बातें प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कु-योजनाओं के बचाव में कहते आ रहे हैं. नोटबंदी के लिए कहा : इतने दिनों में काला धन खत्म करने के अलावा फलां-फलां बात नहीं हुई तो मुझे फांसी पर चढ़ा देना ! नोटबंदी से वह सब तो कुछ होना नहीं था जिसका दावा किया गया था लेकिन फांसी की अवधि आते-न-आते सारी घोषणाएं ही बदल दी गईं. सियारमार्का मीडिया के धंधेबाज मालिक और दोनों हाथों धन समेटने में लगे कारपोरेट नई घोषणाओं को ले उड़े. ऐसा ही जीएसटी के साथ हुआ. इस शेखचिल्ली योजना की मूर्खताएं आज तक सुधारी जा रही हैं. कपड़े बदलने, ढोल-नगाड़े बजाने व गले पड़ने को विदेश-नीति समझने वाली मसखरी का दौर समाप्त हुआ तो आज यह हाल है कि हमारी विदेश-नीति में न कोई नीति बची है, न आत्मसम्मान ! नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, अफगानिस्तान, चीन से ले कर फिजी तक में हमारी किरकिरी होती है और हम कभी अमरीकी, कभी रूसी तो कभी यूरोपी हित का समर्थन कर अपने दिन निकाल रहे हैं. यूक्रेन, फलस्तीन के मामलों में हम उस मूर्ख बच्चे से नजर आते हैं जो अपना रिपोर्ट कार्ड लहराता घर लाता है बगैर यह जाने कि उसे कितने विषयों में सिफर मिला है. विदेश-नीति के निर्धारण में गलतियां पहले भी होती रही हैं लेकिन गलतियों को मास्टर-स्ट्रोक बताने की मूढ़ता इसी सरकार की देन है. 

चुनावी बौंड के मामले में अदालती चांटा खाने के बाद, अमित शाह मार्का छुटभैय्यों से अनाप-शनाप बयान दिलवाने के बाद अब अपने प्रायोजित इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने मुंह खोला है. वे जब भी किसी मुद्दे पर मुंह खोलते हैं, देश का मुंह खुला रह जाता है. उन्होंने कहा : अगर बौंड की मेरी योजना न होती तो यह पता ही नहीं चलता कि पैसा किधर से आया और किधर गया : मनीट्रेल ! प्रधानमंत्रीजी, पूछने वाला तो यह पूछेगा कि महाशय, यदि आप ही न होते तो यह बौंड ही कहां होता ! पैसा कहां से आया और कहां गया, इतना ही नहीं, इस आने-जाने के पीछे सरकार ने कब,कहां व कैसे दलाली खाई, यह भी देश को पता चला तो इसलिए नहीं कि आपका बौंड था बल्कि इसलिए कि सर्वोच्च न्यायालय इस बौंड के पर्दाफाश के पीछे ही पड़ गया था. चुनावी बौंड का रहस्य किसी स्तर पर न खुले इसके लिए जितनी तिकड़म संभव थी, सरकार ने वह सब की. भाड़े के सारे वकील साहबानों व भ्रष्ट व कायर स्टेट बैंक की नौकरशाही तक को सरकार ने मैदान में उतार दिया लेकिन न्यायालय ने कुछ भी देखने-सुनने से मना कर इस बौंड योजना को बैंड ही कर दिया तो रास्ता ही नहीं बचा कि कहां सर छिपाएं, कहां पांव ! 

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि चुनावी बौंड की योजना के कारण चुनावी प्रक्रिया से काले धन की समाप्ति हुई. उनके अपने अर्थशास्त्रियों में से कोई एक मुझे समझा दे कि कोई धन काला होता है क्या ? धन तो सारे सफेद ही होते हैं, इरादे काले-सफेद जरूर होते हैं. जब आप काले इरादे से धन छिपाते हैं तो वह काला हो जाता है, जब सरकार आपके काले इरादे वाले धन को पकड़ लेती है तथा कानूनी दंड वगैरह लगा कर उसे व्यवस्था में समाहित कर लेती है तो वही धन सफेद हो जाता है. जब सरकार अदालत में कहती है कि राजनीतिक दलों को चंदा कहां से व कितना मिला यह जानने का जनता को कोई अधिकार ही नहीं है तब वह काले इरादे से चल रही होती है. जब अमित शाह कहते हैं कि चुनावी बौंड योजना से हमें कितनी रकम मिली व विपक्ष को कितनी यह मत देखिए बल्कि देखिए यह कि हमारे कितने व विपक्ष के कितने सांसद हैं, तब वे काले इरादे से बात कर रहे थे मानो डकैतों का कोई गिरोह है जो लूट में से बंटवारे पर लड़ रहा हो. लूट ही बुरी है, यह कोई नहीं कर रहा है. अब तक विपक्ष ने भी देश से कहां माफी मांगी है कि इस लूट का छोटा-बड़ा हिस्सा ले कर हमने भी पाप ही किया !             

सर्वोच्च न्यायालय ने इस संवैधानिक मुकदमे की जैसी उपेक्षा की और इसे कोई 10 साल तक लटाकाए रखा, वह ऐसा संवैधानिक अपराध है कि जिसकी सुनवाई के लिए भी कोई अदालत होनी चाहिए थी. संविधान निर्माताओं ने कल्पना ही नहीं की कि कभी ऐसा भी होगा कि मुकदमों की भीड़ में कोई सर्वोच्च न्यायालय यह विवेक भूल जाएगा कि वह क्यों बना है, और देश क्यों उसका बोझ ढोता है. सर्वोच्च न्यायालय की प्राथमिक भूमिका संविधान के संरक्षण की है; उसका पहला व अंतिम काम विधायिका को संविधान की मर्यादा में बांध कर रखना है. यह दायित्व ऐसा है कि जिसे संविधान की दूसरी कोई संरचना निभा नहीं सकती है. इसलिए सर्वोच्च न्यायाधीश को रोस्टर में यह विवेक करना ही चाहिए कि उसके पास मामलों का जो अंबार पड़ा है उसमें विधायिका की संवैधानिकता की जांच करने का कौन-कौन-सा मामला है. वे सारे मामले उसकी प्राथमिकता में पहले नंबर पर होने चाहिए. उसे भीड़ में एक बना देने से देश की संवैधानिक व्यवस्था भाड़ में जा रही है, यह उसे क्यों दिखाई नहीं दे रहा ? उसने भी काला चश्मा तो नहीं पहन रखा है !  

संवैधानिक संरचनाएं जब अपना काम मुस्तैदी से व संवैधानिक तटस्थता से करती रहती हैं तब इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है कि सरकार किसकी है और उसका एजेंडा क्या है. यदि कैग, ईडी, इंकमटैक्स, सीबीआई, चुनाव आयोग, प्रेस काउंसिल, महिला, अल्पसंख्यक व बाल आयोग, निचले स्तर से ऊपर तक की न्यायपालिका अपना-अपना काम करती तो किसी सरकार की हिम्मत नहीं होती कि वह लोकतंत्र का गला दबोच कर, अपनी मनमानी करे. लेकिन इन सबने एक नहीं, अनेक अवसरों पर संविधान को विफल कर, अपनी संवैधानिक भूमिका से धोखा किया है. अदालत ने कभी सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता’ कहा था. कहा तो था लेकिन उसने ऐसा किया कुछ भी नहीं कि जिससे पिंजड़ा टूटे, तोता बाहर आ कर बाज बन जाए. वह और ऐसी तमाम संवैधानिक संरचनाएं अपनी वर्तमान की हैसियत के लिए सरकार से उपकृत और भावी के लिए सरकार पर आश्रित रहती हैं. यह कायर गुलामी लोकतंत्र के लिए घातक है.    

 चुनावी बौंड के खुलासे से एक बार वह सड़ांध खुले में आ गई है जो इस सरकार ने पिछले 10 सालों में रचा है. अगर यहीं से भारत में संवैधानिकता की शुरुआत होनी हो तो वही सही लेकिन इस लोकतंत्र की इतनी गुजारिश ज़रूर है कि चंद्रचूड़ हों कि सूर्यचूड़, सभी सुनें कि अब पीछे न लौटें. ( 23.04.2024)

Wednesday, 10 April 2024

आज की चुनौती : कल का दायित्व

 घटनाएं इस तेजी से घट रह हैं मानो किसी ने उन्हें चर्खी पर चढ़ा दिया है; और यह खेल हम सबने बचपन में खेला ही है कि सतरंगी चर्खी को जब हम  तेजी से घुमाते हैं तो सारे रंग एकरूप हो जाते हैं और दिखाई देता है सिर्फ सफेद रंग का नाचता गोलाकार ! हमें आज तेजी से बदलती घटनाएं भी ऐसी ही दिखाई दे रही हैं. इस तीखी व तेज चक्करघिन्नी में सारे रंग एकरूप हो गए हैं - सिर्फ एक फर्क के साथ कि अब हमारे सामने जो चर्खी घूम रही है वह सफेद नहीं, काली है. यह बता रही है कि देश की तमाम राजनीतिक-सामाजिक-वैधानिक-पेशेवर ताकतों ने मिल कर इस देश को, इसकी व्यवस्था को और इसके संविधान को किस कदर छलने का जाल बुन रखा है.    

हमारे सामने दो तरह के लोग खड़े हैं : एक वे कि सत्ता जिनका आखिरी सत्य है. वे सब प्रधानमंत्री की रहबरी में सत्ता की अपनी भूख शांत करने के लिए सारे धतकर्म करते जा रहे हैं. यह चिंता का विषय तो है लेकिन किसी दूसरे धरातल पर. मेरी पहली व सबसे बड़ी चिंता यह है कि राजनीतिक सत्ता जिनका अंतिम लक्ष्य नहीं है, वे क्या कर रहे हैं; क्या कह रहे हैं ? क्या खोज रहे हैं वे और क्या पा रहे हैं वे? इनमें अधिकांश वे कायर लोग हैं जो जिंदगी भर सुविधा व संपन्नता के रास्ते तलाशते रहते हैं और किसी हद तक उसे पा भी लेते हैं. पा लेने के बाद वे ताउम्र सावधान रहते हैं कि कहीं से कुछ ऐसा न हो कि यह छिन जाए. इनमें न बौद्धिक ईमानदारी है, न रत्ती भर साहस ! ये सब खुद को बुद्धिजीवी कहते हैं - शुद्ध शाब्दिक अर्थ में ! इनकी सारी चातुरी, सारा ज्ञान, सारी व्यवहार कुशलता आदि का कुल निचोड़ यह है कि जीने के सुविधाजनक रास्ते तलाशने में बुद्धि का इस्तेमाल कैसे किया जाए. कभी किसी से गांधी से पूछा था : आपको सबसे अधिक उद्विग्नता किस बात की होती है ? उन्होंने जो कहा, उसका मतलब था: मैं इस ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ की बढ़ती जमात से सबसे अधिक उद्विग्न हूं ! 

नोटबंदी जैसा मूढ़ फैसला और फिर ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए बार-बार बोला जाने वाला झूठ; जीएसटी की घोषणा के लिए संसद में आधी रात को आयोजित प्रधानमंत्री का खोखला आयोजन व उस अपरिपक्व योजना से हो रहे नुकसान को छिपाने की हास्यास्पद कोशिशें; प्रधानमंत्री का लगातार झूठ-अर्धसत्य-विज्ञान व इतिहास का उपहास करने वाली उक्तियां, भारतीय समाज को खंड-खंड करने वाली जहरीली काईयां वाकवृत्ति, संविधान व न्यायपालिका की हिकारत भरी उपेक्षा, लोकतांत्रिक परंपराओं की धज्जियां उड़ाना, विपक्ष के लिए समाज में घृणा फैलाना, लोकतांत्रिक समाज को पुलिसिया राज में बदलना, नौकरशाही को चापलूसों की जमात में बदलना, फौज को राजनीतिक कुचालों में घसीट कर जोकरों की जमात भर बना देना, ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का नया तानाबाना तैयार करना जैसे कितने ही थपेड़े देश ने झेले हैं, झेल रहा है. लेकिन इन तथाकथित बुद्धिजीवियों में से एक की भी मुखर व अडिग मुखालफत सामने आई हो तो मालूम नहीं है. इनमें से अधिकांश ढोलबाजों की जमात में नाचते मिलते हैं. 

कांग्रेस का चुनाव घोषणापत्र जारी हुआ. उससे हमारी लाख असहमति हो सकती है लेकिन प्रधानमंत्री का यह कहना कि उन्हें यह मुस्लिम लीग का घोषणापत्र लगता है, क्या राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा नहीं है ? उनका बयान बताता है कि उन्हें न तो इतिहास की धेले भर की जानकारी है, न वे उस दौर की राजनीति की कोई समझ रखते हैं. लेकिन मुझे गहरी वेदना तब हुई जब मैंने देखा कि दूसरे दिन सारे अखबारों ने प्रधानमंत्री के इस मूढ़ व जहरीले बयान को ज्यों-का-त्यों परोस दिया ! मीडिया की स्वतंत्र आत्मा होती तो वह लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी होती. वह ऐसे बयान या तो प्रसारित नहीं करती या फिर इसे खारिज करते हुए प्रसारित करती. लेकिन ‘गोदी मीडिया’ हर समय लोकतंत्र की लाश पर ही खड़ी हो सकती है.  जो गोदी में हैं वे गुलाम ही रहेंगे.

आजादी की अनोखी, लंबी लड़ाई के बाद मिले लोकतंत्र की इतनी कम कीमत लगाते हैं हम ? लोकतंत्र के बिखर जाने के कारण हमारे पड़ोसियों का हाल देखने के बाद भी यदि हम इसकी तरफ से इतने उदासीन हैं तो हमें किसी भी गुलामी से परहेज कैसे होगा ? चौतरफा विकास के तथ्य व सत्यहीन आंकड़ों का जो घटाटोप रचा गया है वह यदि सच हो तो भी हमें यह कहना चाहिए कि नागरिक स्वातंत्र्य, मीडिया की आजादी, व्यक्तित्वहीन न्यायपालिका, अन्यायपूर्ण श्रम-कानूनों की कीमत पर हमें कोई भी, कैसा भी विकास नहीं चाहिए. पिंजड़ा सोने का हो तो भी खुली हवा से उसका सौदा नहीं हो सकता है, यह बात कितनी भी पुरानी हो, अंतरात्मा पर स्वर्णाच्छरों में दर्ज रहनी चाहिए. लेकिन प्रेस-मीडिया के लोगों को अपनी कलम के बारे में उतना भी सम्मान नहीं है जितना किसी भिखारी को अपने भीख के कटोरे के बारे में होता है. कुर्सी को अंतिम सत्य मानने वाले राजनीति के धंधेबाजों का रोज-रोज अपनी पार्टी छोड़ बीजेपी में जाने का क्रम मुझे शर्मसार करता है लेकिन मीडिया का रोज-रोज ईमान बदलना अकुलाहट से भर देता है. आजाद भारत के कोई 75 सालों में जिस जमात ने 6 इंच की कलम उठाना व संभालना नहीं सीखा, क्या उसे कभी लोकतंत्र का चौथा खंभा माना जा सकता है ? देश में मीडिया जैसी कोई संकल्पना आज बची ही नहीं है. धंधा है जो धंधे की तरह चलता है. इस रोने का कोई औचित्य नहीं है कि हम पर मालिकों का दवाब है और नौकरी छोड़ने की हमारी स्थिति नहीं है. आप बताए, क्या कभी 10 पत्रकारों ने भी मिल कर यह बयान निकाला है कि हम दवाब में काम करने को तैयार नहीं हैं और ऐसे दवाब में काम करने से अच्छा होगा कि हम सब त्यागपत्र दे दें. ऐसी कोई नैतिक आवाज कहीं से उठे तो !  

धंधेबाजों का पूरा कुनबा चुनावी बौंड के घोटाले को सार्वजनिक होने से रोकने में किस तरह लगा था, यह सारे देश ने देखा. सरकारी तंत्र इसमें क्यों लगा था, यह बात तो समझी जा सकती है लेकिन सत्ता के इशारे पर नाचते देश-दुनिया के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक की भूमिका को किस तरह समझेंगे आप ? उसका तो धेले भर का स्वार्थ नहीं था कि यह जानकारी देश के सामने न आए. लेकिन उसने अपनी पूरी साख दांव पर लगा दी. हर अदालती डंडे के सामने उसकी हालत गली के उस कुत्ते-सी हो रही थी जो दुम दबा कर कायं-कायं कर रहा हो. उसने कभी कोई नैतिक भूमिका लेने की कोशिश ही नहीं की. अब स्टेट बैंक एक खोखला साइनबोर्ड भर रह गया जिसे किसी भी गैरतमंद सरकार को बंद कर देना चाहिए. नई संहिता के साथ उसकी नई संरचना लाजिमी है. 

हमने यह भी देखा कि वकालत का धंधा करने वाले वे सारे नामी-गरामी लोग, जिन्होंने अपनी ऐसी छवि गढ़वाई है कि वे हैं तो संविधान है, न्याय है, कैसे-कैसे तर्कों के साथ सामने आ रहे थे ! वे सब सर्वोच्च अदालत को समझा व धमका रहे थे कि चुनावी बौंड की कोई भी जानकारी सार्वजनिक हो गई तो न्यायपालिका सदा-सर्वदा के लिए कलंकित हो जाएगी तथा देश तो गड्ढे में गया ही समझिए! इन सबके पीछे करोड़ों की वह फीस बोल रही थी जो इनकी छवि का आधार है. इनकी कोई नैतिक रीढ़ बनी व बची नहीं है.

यह असली खतरा है. सरकारें आएंगी, जाएंगी. जब भी, जो भी सरकार आएगी उसे भी अपने ऐसे ही रीढ़विहीन लोगों की जरूरत होगी. ऐसे ही बुद्धिजीवी, पत्रकार, मीडिया संस्थान उसे भी तो चाहिए होंगे ! इसलिए लोकतंत्र के पैरोकारों की जमात खड़ी करना प्राथमिक शर्त है. हमें आज का दायित्व पूरा करना है और कल का दायित्व निभाने की ताकत संयोजित करनी है. दोनों काम साथ-साथ करने हैं. ( 10.04.2024 )