Sunday, 25 August 2024

लड़की किसे चाहिए ?

             पूरा कोलकाता पहले गुस्से से लाल हुआ, फिर जल-भुन कर राख हुआ ! अस्पताल में ही नहीं, वह राख कोलकाता शहर में भी सब दूर फैली. जुलूस-धरना-प्रदर्शन चला तो लगातार चलता ही रहा. उसे भाजपा समेत विपक्षी दलों ने उकसाया-भड़काया जरूर लेकिन वह जल्दी ही कोलकाता के भद्रजनों के आक्रोश में बदल गया. ऐसा जब भी होता है, बंगाल से ज्यादा खतरनाक भद्रजन आपको खोजे नहीं मिलेंगे. ममता बनर्जी यह अच्छी तरह जानती हैं क्योंकि इसी भद्रजन के आक्रोश ने, उन्हें मार्क्सवादी साम्यवादियों का पुराना गढ़ तोड़ने में ऐसी मदद की थी कि वे तब से अब तक लगातार सत्ता में बनी हुई हैं. लेकिन सत्ता ऐसा नशा है एक जो जानते हुए भी आपको सच्चाई से अनजान बना देता है. ममता भी जल्दी ही बंगाल के भद्रजनों की इस ताकत से अनजान बनती गईं. 

   किसी भी अन्य मुख्यमंत्री की तरह सत्ता के तेवर तथा सत्ता की हनक से उन्होंने बलात्कार व घिनौनी क्रूरता के साथ लड़की रेजिंडेंट डॉक्टर की हत्या के मामले को निबटाना चाहा. लेकिन उस मृत डॉक्टर की अतृप्त आत्मा जैसे उत्प्रेरक बन कर काम करने लगी. जैसे हर प्रदर्शन-जुलूस-नारे-पोस्टर के आगे-आगे वह डॉक्टर खुद चल रही थी. ऐसी अमानवीय वारदातों को दबाने-छिपाने-खारिज करने की हर कोशिश को विफल होना ही था. वह हुई  और कोलकाता का आर.जी.कर अस्पतालममता की राजनीतिक साख व संवेदनशील छवि के लिए वाटर-लू साबित हुआ. अब ममता भी हैंउनकी सत्ता भी है लेकिन सब कुछ कंकाल मात्र है. 

   यह आग कोलकाता से निकल कर देश भर में फैल गई. मामला डॉक्टरों का था जो वैसे भी कई कारणों से सारे देश में हैरान-परेशान हैं. सो देश भर की सूखी लकड़ियों में आग पकड़ गई. आंच सुप्रीमकोर्ट तक पहुंच गई. नागरिक अधिकारोंसंवैधानिक व्यवस्थाप्रेस की आजादीअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ले कर सत्ता के मर्यादाविहीन आचरण तक के सभी मामलों में देश में जैसी आग लगी हुई हैउसकी कोई लपट जिस तक नहीं पहुंचती हैउस अदालत को यह लपट अपने-आप कैसे दिखाई दे गईकहना कठिन है. मणिपुर की लड़कियों को जो नसीब नहीं हुआकोलकाता की उस डॉक्टरनी को वह नसीब हुआ- भले आन व जान देने के बाद!  सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फ़ानन में अपनी अदालत बिठा दी और कड़े शब्दों में अपनी व्यवस्था भी दे दीएक निगरानी समिति भी बना दी जिसकी निगरानी वह स्वयं करेगी. मैं हैरान हूं कि हमारी न्यायपालिकाजो इसकी निगरानी भी नहीं कर पाती है कि उसके फैसलों का सरकारें कहां-कब व कितना पालन करती हैंवह डॉक्टरों पर हिंसा की जांच भी करेगी व उसकी निगरानी भी रखेगीयह कैसे होगा ! लेकिन अदालत कब सवाल सुनती है ! अगर वह सुनती तो उसे सुनायी दिया होता कि सत्ता की शह से जब समाज में व्यापक कानूनहीनता का माहौल बनाया जाता हैतब राजनीतिक ही नहींसामाजिक-नैतिक-आर्थिक एनार्की का बोलबाला बनता है. कानूनविहीनता का आलम देश में बने तो यह सीधा न्यायपालिका का मामला हैक्योंकि संविधान के जरिये देश ने यही जिम्मेवारी तो उसे सौंपी है. न्यायपालिका के होने का यहीऔर एकमात्र यही औचित्य है. 2014 से अब तक अदालतों को यह दिखाई नहीं दिया तो अंधेरा और किसे कहते हैं बताते हैं कि कोलकाता के अस्पताल में जब वह अनाचार हुआ तो वहां भी अंधेरा था.   

   कोलकाता की घटना के बाद यौनाचार व यौनिक हिंसा की कितनी ही वारदातों की खबरें देश भर से आने लगीं. लगा जैसे कोई बांध टूटा है ! पता नहींऐसा कहना भी कितना सही है. जब घर-घर में ऐसी वारदातें हो रही होंजब सब तरफ हिंसक उन्माद खड़ा किया जा रहा हो तब कोई कैसे कहे कि यह जो सामने हैयह पूरी तस्वीर है !  

   यह सब हुआहोना चाहिए था. आगे भी होता रहेगा. प्रधानमंत्री यूक्रेन की आग बुझा कर लौटेंगे तो चुनावी आग में इस मामले को होम करधू-धू जलाएंगे. लेकिन जो नहीं पूछा गया और जिसका जवाब नहीं मिला वह यह सवाल है कि लड़की किसे चाहिए आर.जी.कर अस्पताल में जो अनाचार व अत्याचार हुआवह डॉक्टर पर नहीं हुआलड़की पर हुआ. वह लड़की डॉक्टर थी और वह जगह अस्पताल थीयह संयोग है. महाराष्ट्र में जो हुआ वह स्कूल थाऔर जिनके साथ हुआ वे छोटी बच्चियां थीं. तो जो यौन हिंसा हो रही हैउसके केंद्र में लड़की है जिसका स्थानजिसकी उम्रजिसका पेशा आदि अर्थहीन है. तो सवाल वहीं खड़ा है कि लड़की किसे चाहिए जवाब यह है कि हर किसी को लड़की चाहिए : व्यक्तित्वविहीन लड़की ! शरीर चाहिए. वह स्त्री-पुरुष के बीच जो नैसर्गिक आकर्षण हैउस रास्ते मिले कि प्यार नाम की जो सबसे अनजानी-अदृश्य भावना हैउस रास्ते मिले या डरा-धमका करछीन-झपट करमार-पीट कर मिले. वह मिल जाएयह हवस हैमिल जाने के बाद हमारे मन में उसकी प्रतिष्ठा नहीं मिलती है. इसलिए घरजो लड़की के बिना न बनता हैन चलता हैलड़की के लिए सबसे भयानक जगह बन जाता है जहां उसकी हस्ती की मजार मिलती है. हर घर में लड़की होती है लेकिन मिलती किसी घर में नहीं है. इसकी अपवाद लड़कियां भी होंगी लेकिन वे नियम को साबित ही करती हैं.   

   इसलिए समस्या को इस छोर से देखने व समझने की जरूरत है. अंधी-कुसंस्कृति की नई-नई पराकाष्ठा छूती राजनीति व जाति-धर्म-पौरुष जैसे शक्ति-संतुलन का मामला यदि न होतो भी स्त्री के साथ अमानवीय व्यवहार होता है. ऐसी हर अमानवीय घटना हमें बेहद उद्वेलित कर जाती है. दिल्ली के निर्भया-कांड के बाद से हम देख रहे हैं कि ऐसा उद्वेलन बढ़ता जा रहा है. यह शुभ है. लेकिन यह भीड़ का नहींमन का उद्वेलन भी बने तो बात बने. स्त्री-पुरुष के बीच का नैसर्गिक आकर्षण और उसमें से पैदा होने वाला प्यार का गहरा व मजबूत भाव हमारे अस्तित्व का आधार है. वह बहुत पवित्र हैबहुत कोमल हैबहुत सर्जक है. लेकिन इसके उन्माद में बदल जाने का खतरा हमेशा बना रहता है. यह नदी की बाढ़ की तरह है. नदी भी चाहिएउसमें बहता-छलकता पानी भी चाहिएबारिश भी चाहिएवह धुआंधार भी चाहिए लेकिन बाढ़ नहीं चाहिए. तो बांध मजबूत चाहिए. कई सारे बांध प्रकृति ने बना रखे हैं. दूसरे कई सारे सांस्कृतिक बांध समाज को विकसित करने पड़ते हैं. समाज जीवंत होप्रबुद्ध हो व गतिशील साझेदारी से अनुप्राणित हो तो वह अपने बांध बनाता रहता है. 

   परिवार में स्त्री का बराबर का सम्मान व स्थानपरिवार के पुरुष को सांस्कृतिक अनुशासन के पालन की सावधान हिदायतसमाज में यौनिक विचलन की कड़ी वर्जनाकानून का स्पष्ट निर्देश व उसकी कठोर पालना से ऐसा बांध बनता है जिसे तोड़ने आसान नहीं होगा. प्यार की ताकत समर्पण में ही नहींउसके अपमान की वर्जना में भी प्रकट होनी चाहिए. नहीं देखता-पढ़ता या सुनता हूं कि किसी प्रेमिका ने अपने प्रेमी कोकिसी पत्नी ने अपने पति कोकिसी मां ने अपने बेटे कोकिसी बहन ने अपने भाई को यानी किसी स्त्री ने अपने दायरे में आने वाले किसी भी पुरुष-संबंध को रिश्ते सेपरिवार से बाहर कर दिया हो क्योंकि उससे यौनिक अपराध हुआ है. बलात्कारी को यदि यह अहसास होउसके आसपास ऐसे उदाहरण हों कि यौनिक हिंसा के साथ ही वह समाज व परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए वंचित हो जाएगातो यह एक मजबूत बांध बना सकता है. मनुष्य सामाजिक प्राणी है. वह समाज को तब तक ही ठेंगे पर रखता है जब तक उसे विश्वास होता है कि वह समाज को हांक ले जाएगा. ऐसा इसलिए होता है कि आज अधिकांशत: समाज जीवंतसंवेदनशील मनुष्यों की जमात नहींभीड़ भर है. भीड़ में से मनुष्य को निकाल लाना बड़ी दुर्धर्ष मनुष्यता का काम है. लेकिन बांध बनाना कब आसान रहा है ! 

   यह हमारी खुद से लड़ाई है. लड़का डराएगा नहींलड़की लुभाएगी नहींतभी दोनों एक-दूसरे के प्रति सहज-स्वस्थ-सुंदर रिश़्ता बना व निभा पाएंगे. फिर बच जाएंगी दुर्घटनाएं जिन्हें संभालने-सुधारने-स्वस्थ बनाने का काम घर-समाज-कानून मिल कर करेंगे. अगर ऐसा कुछ बोध समाज को हुआ तो कोलकाता के उस अस्पताल की वह डॉक्टर सच में हम सबकी डॉक्टर बन जाएगी. ( 26.08.2024) 

                                                                                                                                     

Saturday, 10 August 2024

राहुल गांधी की जाति क्या है

   तो भरी संसद में, लोकसभा के अध्यक्ष की उपस्थिति में सत्ता पक्ष के एक सांसद ने दूसरे को भद्दी ( सामान्य सामाजिक सभ्यता के नाते भी और संविधान के नाते भी भद्दी ! ) गाली दी. फिर क्या हुआ ? अध्यक्ष ने इसे सामान्य मामले की तरह लिया और कहा कि वे गाली को फिर से सुनेंगे और फिर जो जरूरी होगा, वह करेंगे. सत्ता पक्ष के दूसरे सांसदों ने क्या किया ? कई खिलखिला कर बेशर्मी से हंसे; कई प्रतिशोध की जहरीली मुद्रा में उछल पड़े कि चलो, किसी ने तो इस आदमी का उस तरह अपमान किया जिस तरह हम भी करना चाहते तो थे लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी ! कुछ थे शायद जो असमंजस में चुप रहे लेकिन उनके चेहरे पर भाव ऐसा था मानो बात तो गलत है लेकिन अपनी पार्टी की तरफ से कही गई है, तो क्या बोलें और कैसे बोलें ! 

   आप समझ ही गए होंगे कि प्रसंग उस दिन का है जिस दिन भारतीय जनता पार्टी के सुप्रसिद्ध विवेकहीन सांसद अनुराग ठाकुर नेकांग्रेस के सांसद व प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी के लिए कहा कि “ जिसकी जाति का पता नहींवह जाति गणना की मांग कर रहा है !” वे समझ रहे थे कि वे जो बोलने जा रहे हैं उसकी चोट भी लगेगी और उसकी गूंज भी उठेगी. इसलिएगला साफ़ करअध्यक्ष का ध्यान खींचते उन्होंने पूरी तैयारी सेसमां बांध कर यह गाली दी.

    राहुल गांधी की दिक्कत यह है कि महाभारत में जैसे अर्जुन को मछली की आंख मात्र दिखाई दी थीदूसरा कुछ नहींवैसे ही उन्हें जातीय गणना का सवाल दिखाई देता हैउससे आगे-पीछे कुछ नहीं. यह उपमा उनकी ही दी हुई है. भारतीय जनता पार्टी का हाल भी ऐसा ही है. उसे इस मांग को एकदम सिरे से खारिज करने के आगे या पीछे दूसरा कुछ दीखता नहीं है. ( उसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जरूर दीखते हैं लेकिन वे जानते हैं कि नीतीश कुमार की आवाज जब तक गुम हैतब तक वे उन्हें देख कर भीअनदेखा कर ही सकते हैं ! )  

   हम कहते हैं : राहुल गांधी-अनुराग ठाकुर में दोनों सही या दोनों गलत हो सकते हैंया कोई एक गलत व दूसरा सही हो सकता है. लेकिन दोनों को अपनी-अपनी सही या गलत राय रखने का और उसे जाहिर करने का भी पूरा अधिकार है. यह अधिकार हम सबको जन्मसिद्ध मिला है जैसा कि बालगंगाधर तिलक ने स्वराज्य के लिए कहा था. लेकिन बालगंगाधर तिलक को तब जो अधिकार नहीं मिला था लेकिन हमें मिला हैवह यह है कि हमें अपनी राय रखने व उसे जाहिर करने का जन्मजात अधिकार तो है हीसंवैधानिक अधिकार भी है. तो हमारे तरकस में तिलक महाराज से एक वाण अधिक है. राहुल गांधी जातीय गणना की मांग करें और अनुराग ठाकुर उसका विरोध करेंइसमें आपत्ति जैसी कोई बात नहीं है. इन दो के बीच लोकसभा अध्यक्ष की कोई भूमिका है ही नहीं. लेकिन अनुराग ठाकुर अपनी राय भी न कहेंजातीय गणना के सवाल पर अपनी पार्टी का रुख भी स्पष्ट न करें लेकिन राहुल गांधी को भद्दी गाली देंतो फिर लोकसभा के अध्यक्ष की भी सीधी भूमिका बन जाती हैअनुराग ठाकुर सीधे कठघरे में खड़े हो जाते हैं. इसलिए जो सवाल अखिलेश यादव ने पर्याप्त गंभीरता व जरूरी तेवर के साथ लोकसभा में पूछावही सवाल देश का हर साबित दिमाग आदमी अनुराग ठाकुर सेलोकसभा अध्यक्ष सेभारतीय जनता पार्टी से तथा ईश्वरीय प्रधानमंत्री’ नरेंद्र मोदी से पूछ रहा है कि भाईआप किसी से उसकी जाति कैसे पूछ सकते हैं यह हमारे तरकश का वह तीर है जो संविधान ने हमको दिया है. आप किस को जातिसूचक गाली नहीं दे सकतेआप संस्थानों में जातीय भेद-भाव नहीं कर सकतेआप जातीय टिप्पणियां कर किसी का अपमान नहीं कर सकते. मुख्तसर में यह कि आप किसी से उसकी जाति नहीं पूछ सकते. 

   जब अनुराग ठाकुर की बीमारगंदी मानसिकता पकड़ी गई और उनके शातिर दिमाग ने हिसाब लगा लिया कि जातीय श्रेष्ठता का उनका तीर जहां पहुंचना थापहुंच गयातब उन्होंने उसी कायरता का परिचय दिया जैसी कायरता जातीय श्रेष्ठता का छूंछा भाव ओढ़ने वालों की पहचान है. जिससे कायरता भी शर्मिंदा होने लगे ऐसी कायरता से वे कहने लगे कि मैंने नाम तो नहीं लियामैंने कोई गाली तो नहीं दीमैंने जाति तो नहीं पूछी. किया उन्होंने यह सब लेकिन इसे कबूल करने का साहस उनमें नहीं था. होता भी कहां सेक्योंकि साहस नैतिक धरोहर हैकुर्सी-पार्टी-मंत्रीपद की इजारेदारी नहीं. 

   अनुराग ठाकुर ने पूरी तैयारी सेसोच-विचार कर राहुल गांधी को गाली दी क्योंकि राहुल गांधी की बात कातर्क का उनके पास कोई जवाब नहीं था. जब आपकी बौद्धिक औकात होती नहीं है तब आप गालियों का सहारा लेते हैं. बेचारे अनुराग ठाकुर पर दया ही की जा सकती है ! वे अपने सर के नाप से बड़ा जूता पहन कर चलते हैं और बार-बार उस जूते की मार खा कर चारो खाने चित्त गिरते हैं. जब वे किसी आमसभा में,  सार्वजनिक रूप से चिल्ला-चिल्ला कर सामूहिक गालियां दे करगोली मारने का नारा लगवा रहे थेतब भी उनका पतन देख कर उबकाई आती थीसदन में भी उस रोज़ वे ऐसी ही पतनावस्था में थे. “ जिसकी जात का पता नहीं” कहने के पीछे वही गंदी मानसिकता थी जिस गंदी मानसिकता से कोई कहता है, “ तेरे बाप का ठिकाना नहीं…!” यह गंदी गाली किसी औरत को छिनाल या रखैल या कुलटा कहनेकिसी पुरुष को चरित्रहीन या स्त्रीबाज कहनेकिसी बच्चे को एक बाप का नहीं या अवैध कहने जैसी गंदी बात है. यह सांस्कृतिक हीनता है जो श्रेष्टता बन कर चीखती है और अंतत: आपको ही नंगा  कर जाती है. 

   राहुल गांधी के पिता राजीव गांधीराजीव गांधी के पिता फीरोज गांधीराहुल गांधी की मां इंदिरा गांधीराहुल गांधी के नाना जवाहरलाल नेहरूउनके पिता मोतीलाल नेहरू और उनकी मां स्वरूप रानी देवीजवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू व जवाहरलाल नेहरू की बहनें आदि सब-की-सब हमारे स्वतंत्रता संग्राम की मान्य हस्तियां हैं. इन सबने अपनी तरह से वह इतिहास बनाया है जिसके एक छोटे कोने में भी उन सबकी उपस्थिति नहीं मिलती है जो आज सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हैं. हम नेहरू खानदान के हर सदस्य से असहमत हो सकते हैं लेकिन उन्हें जाति या धर्म की गाली देने जैसी हीनतर मानसिकता का प्रदर्शन नहीं कर सकते. जातिवादियों को पता होना चाहिए कि संविधान ने उनसे यह हक़ छीन लिया है. 

   राहुल गांधी ने ठीक ही कहा कि उन्हें न अनुराग ठाकुर की माफी चाहिएन उन्होंने इसकी मांग ही की है. उन्होंने यह भी कहा कि वे जो लड़ाई लड़ रहे हैंजाति का सवाल उठा रहे हैंउसके जवाब में गालियां मिलनी ही हैं. हम को भी मालूम हैराहुल गांधी को भी मालूम है कि भारतीय समाज में सदियों से जातीय-न्याय की मांग करने वालों को कम-से-कम जो मिला हैवह गाली ही है. लेकिन अब अब हमारे और उनके बीच एक संविधान भी है जो इसे वर्जित करता है. लोकसभा में संविधान द्वारा वर्जित काम अनुराग ठाकुर ने किया हैतो उनकी संवैधानिक सदस्यता कैसे बरकरार रह सकती है अध्यक्ष ने इसे तब अनसुना कर दिया. सुना कि बाद में इस टिप्पणी को काररवाई से बाहर निकाल दिया. 

   अध्यक्ष ने जिस गुगली से अनुराग ठाकुर को बोल्ड होने से बचायाउसी गुगली से ईश्वरीय प्रधानमंत्री’ क्लीनबोल्ड हो सकते हैं. अध्यक्ष ने जिस टिप्पणी को काररवाई से बाहर निकाल दियाउसे ही अपनी जोरदार अनुशंसा के साथ प्रधानमंत्री ने सारे देश को भेज दिया. यह भी तो संविधान का उल्लंघन है ! संविधान बदलने की घोषित मंशा से चुनाव लड़ कर परास्त हुए ईश्वरीय प्रधानमंत्री” को संसद में संविधान को धूल करने का विशेषाधिकार तो प्राप्त है नहीं. तो अब लोकसभा के बिरले अध्यक्ष बिरला क्या करेंगे वे विपक्ष को सदन से निलंबित करने तथा विपक्ष को आंखें दिखाने के अलावा कुछ करने की हैसियत रखते हैं क्या और फिर यह सवाल भी बन ही जाता है कि अनुराग ठाकुर ने जो किया व कहा उसकी योजना प्रधानमंत्री की स्वीकृति व सहमति से पहले ही बन गई थी तभी तो प्रधानमंत्री नेजो तब लोकसभा में अनुपस्थित थेअनुराग ठाकुर भाषण के तुरंत  बाद उस पूरे भाषण को रि-ट्विट’ किया !     

   अनुराग ठाकुर की बात इतनी मासूम नहीं थी. जाति-व्यवस्था से बीमार इस समाज में जाति को आदमी होने की हमारी हैसियत से जोड़ दिया गया है. कहते ही हैं न कि जो जाती नहीं है वह जाति है. अनुराग ठाकुर उसी बीमार-समाज के प्रतिनिधि हैं. संघवादी सोच ही इस बीमारी से ग्रसित है. इसलिए राहुल गांधी की जाति क्या हैइसका जवाब वही है जो राहुल गांधी ने उस दिन लोकसभा में दिया : उन्होंने पलट कर अनुराग ठाकुर से उनकी जाति नहीं पूछी. ( 04.08.2024)  

Tuesday, 16 July 2024

गोली की बोली

 अमरीका में फिर बंदूक गरजी ! जो भी सुनेगापलट कर पूछेगा कि कबक्योंकि वहां अकारणअसमय व सबसे अप्रत्याशित जगहों पर गोली बरसा कर दो-पांच-दस लोगों-बच्चों-महिलाओं को मार गिराना आम खबर की तरह होता है. यह अमरीकी समाज है जहां पागलपन सामान्य-सा बन गया है. लेकिन इस बार जो हुआ उसके निशाने पर पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे. छटांक भर की दूरी से मौत उन्हें छू कर निकल गई - उनका कान मौत के रास्ते में आ गया तो वह बेचारा थोड़ा घायल हो गया. घटना को देखने व जाननेवाले और गोली खाने से बच जाने वाले ट्रंप बता रहे हैं कि यह ईश्वर ही था कि जो उन्हें बचा ले गया. कैसा विद्रूप है कि जब हमारी जान बच जाती है तब हमें ईश्वर की साक्षात उपस्थिति महसूस होती हैजब हम दूसरों की जान लेते हैं तब कहां का ईश्वर और कहां की उसकी साक्षात उपस्थिति !  दुख में सुमरन सब करैं/ सुख में करे ना कोई / जो सुख में सुमरन करैं/ तो दुख काहे को होई ! इसलिए ट्रंप पर चली गोली के समर्थन या विरोध का सवाल नहीं है. सवाल गोली की इस बोली को समझने व समझाने का है.  

अपने-अपने देश में गोली की बोली से बात करने में जो सभी सत्ताधीश हैंवे सभी अमरीका में गोली की बोली की इस घटना से सदमे में हैं — कम-से-कम ऐसा दिखा तो रहे ही हैं !! हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी को सदमा लगा है कि मेरे मित्र ट्रंप’ के साथ ऐसा हादसा हुआ ! मोदीजीअगर ट्रंप आपके मित्र नहीं होते तो फिर भी सदमा होता इतना होता कि आप बयान दे कर अपना सदमा जगजाहिर करते सोचिएगा ! आपने कहा कि राजनीति में हिंसा की कोई जगह नहीं है. अगर यह सच है तो हिंसाघृणाद्वेषझूठहिंसक भाषा व हिंसक मुद्रा की छौंक से चलने वाली आपकी अब तक की राजनीति क्या है हिंसा के पनपने व फूटने की जमीन जितनी तरह से तैयार हो सकती हैउतनी तरह से पिछले 10 सालों में आपकी तरफ से तैयार की गई है. 

दुनिया के दूसरे कुछ हुक्मरानों ने भी गोली की बोली पर ऐतराज उठाया है. इनमें इसराइल के बेंजामिन नेतन्याहू भी हैं और फ्रांस के मैक्रां भी. ये भी और दूसरे सारे भी कह रहे हैं कि हमारे सभ्य समाज में ऐसी हिंसा की कोई जगह नहीं है. किसी ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में हिंसा नहीं चल सकती. ये सच में ऐसा मानते हैंइसलिए कह रहे हैंया कह रहे हैं कि हम सच में ऐसा मान लें कि ये सच में ऐसा मानते हैं मामला बहुत जटिल हैक्योंकि झूठ को सच बनाना और फिर उसे सच मानना बहुत-बहुत बड़ा झूठ है. 

हिंसा घटना नहीं है. हिंसा मनोवृत्ति है. जब आप हिंसा को एक परिणामकारी रास्ता मानते हैं तब किसी गांधी की हत्या की लंबी साजिश रचते हैं और प्रार्थना के लिए जाते 80 साल के वृद्ध कोप्रार्थना-स्थल पर पहुंचने से पहले ही भगवान के पास पहुंचा देते हैं. हाथ भी नहीं कांपता है आपकाऔर इतने लंबे वर्षों में कभी प्रायश्चित का भाव भी नहीं उभरा आपमें ! हम कायर इतने होते हैं कि उस हत्या के 76 साल बाद भीएक दशक से ज्यादा समय से सत्ता की चादर अोढ़े रखने के बाद भीकायरता की धुंध इतनी घनी है कि हर संभव मौकों पर वे सब गांधी की विरुदावलि गाते हैं लेकिन यह कह नहीं पाते हैं कि यह हत्या हमने की है ! जो हिंसक होते हैं वे कायर ही होते हैंयाकि ऐसे कहें कि जो कायर होते हैंवे ही हिंसक भी होते हैं. 

मैं मणिपुर की हिंसा की बात न भी करूं तो भी यह तो कहना ही होगा न कि  मोदीजी की भारत सरकार न यूक्रेन की हिंसा के बारे में कभी कुछ बोलीन गजा की हिंसा के बारे में बोली. मित्रों की हिंसा हिंसा नहीं होती हैमित्रों पर हिंसा ही हिंसा होती हैनैतिकता की ऐसी परिभाषा कितनी हिंसक हैइसका हिसाब कोई गांधी ही लगा सकते हैं. भारत की यह चुप्पी और अब यह मुखरता राष्ट्रीय शर्म का सबब है. बेंजामिन नेतन्याहू को भी ट्रंप पर चली गोली से एतराज हैजब कि गजा में दनादन चलती अपनी अमानवीय गोलियों पर उन्हें कभी एतराज नहीं हुआ. फ्रांस में पिछले दिनों हुए विरोध प्रदर्शन को गोली की बोली से ही मैक्रां ने चुप कराया था. और जिस अमरीका में यह गोली चलीउस अमरीका में राष्ट्रपति बाइडन ने उन बच्चों के साथ क्या किया था जो फलस्तीनियों के लिए न्याय की आवाज लगाते हुए वहां के अधिकांश विश्वविद्यालयों में जमा हुए थे 

डोनाल्ड ट्रंप खुद हिंसा भड़काने व नागरिकों को भीड़ में बदल करहिंसा के लिए उकसाने के सबसे बड़े अपराधी हैं. अमरीकी अखबार उनके बारे में लिखते रहे हैं कि वे बला के झूठेसड़कछाप आदमी हैं जो संयोगवश राष्ट्रपति बन गया था. उन पर अमरीकी अदालतों में मुकदमे भी चल रहे हैं जिसे पूर्व राष्ट्रपति को मिले विशेषाधिकार की आड़ में ट्रंप धता बताने में लगे हैं. पिछली बार राष्ट्रपति का चुनाव हारने के बाद भी वे जिस तरह गद्दी छोड़ने को तैयार नहीं हुए उसनेऔर जिस तरह उन्होंने अपने समर्थकों को कैपिटल हिल्स में घुस जाने तथा हिंसालूटपाट मचाने के लिए ललकारा तथा उस सारे हंगामे को चालना दी उसनेअमरीकी लोकतंत्र का चेहरा खासा धुंधला कर दिया है. ट्रंप जब तक राष्ट्रपति रहेव्हाइट हाऊस से सफेद चमड़ी का अहंकारसत्ता की बदबू तथा दौलतमंदों का कुसंस्कार ही अमरीका की पहचान बना रहा. चुनाव जीतना व देश के सर्वोच्च पदों पर जा कर बैठ जाना जैसे भारत में किसी नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है - बल्कि उल्टा ही है ! - वैसे ही अमरीका में भी है. मैं तो कहूंगा कि भारत और अमरीका नहींसारी दुनिया के लिए यही सच है. 

आज अधिकांश अमरीकी नहीं चाहते हैंन बाइडन की पार्टी ही चाहती है कि बाइडन फिर से राष्ट्रपति बनने की कोशिश करें. उनकी दूसरी योग्यताओं की बात न भी करें हम तो भी यह तो सभी जान व देख रहे हैं कि बाइडन शारीरिक रूप से राष्ट्रपति बनने लायक नहीं हैं. लेकिन बाइडन खुद को खुद ही सर्टिफिकेट देते जाते हैं कि मैं हर तरह से राष्ट्रपति बनने लायक हूं : “ या तो मैं या भगवान ही इस बारे कोई दूसरा फैसला कर सकते हैं !” इसे लोकतांत्रिक हिंसा कहते हैं भाई ! 

असहिष्णुताघृणाअंधी स्पर्धाझूठहिंसा आदि कुछ अलग-अलग वृत्तियां नहीं हैं. ये सब एक-दूसरे की संतानें हैं. समाज में आप जैसी वृत्तियों को चालना देते हैं वैसी ही लहरें उसमें उठती हैं. अमरीका में चुनावी बुखार चढ़ता जा रहा है जिसे उन्माद में बदलने की कोशिश में डोनाल्ड ट्रंप लगे हैं. वे जानते हैं कि अमरीकी समाज के दूसरे कई घटकों के खिलाफ उन्माद व असहिष्णुता फैला कर ही वे व्हाइट हाउस में दोबारा प्रवेश पा सकते हैं. वे अपने मित्र से सीखते हों शायद कि यदि यही सब कर के तीसरी बार सत्ता पाई जा सकती हैतो दूसरी बार क्यों नहीं 

सत्ता सबसे बड़ा सच हैतो हिंसा सबसे बड़ा हथियार है. इसलिए सारे सत्तावान इस सबसे बड़े हथियार पर अपना एकाधिकार चाहते हैं. ( 16.07.2024)  

Friday, 5 July 2024

यह जो हमारी संसद है !

 हमारी नई लोकसभा अभी बनी ही है लेकिन चल नहीं पा रही है. चल पाएगी, इसमें शक है. चल कर भी क्या कर पाएगी, कह नहीं सकते. कहावत बहुत पुरानी है जो हर अनुभव के साथ नई होती रहती है कि  पूत के पांव पालने में ही दीख जाते हैं. जो पांव दीख रहा है, वह शुभ नहीं है. यदि मैं भूलता नहीं हूं तो कवि विजयदेव नारायण साही ने इस कहावत में एक दूसरी मार्मिक पंक्ति जोड़ दी थी :  पूत के पांव पालने में मत देखो/ वह पिता के फटे जूते पहनने आया है. इस लोकसभा के बारे में यही पंक्ति बार-बार मन में गूंज रही है. 

   जिस पार्टी नेजिन पार्टियों के साथ जोड़ बिठा कर सरकार बनाई हैउन सबको मालूम है कि यह वक्ती व्यवस्था है. कौनपहलेकिसे और कब लंगड़ी मारता हैइसी पर इस लोकसभा का भविष्य टिका हैऔर यह तो सारे संविधानतज्ञ जानते हैं कि लोकसभा के भविष्य पर ही सांसद नाम के निरीह प्राणियों का भविष्य टिका होता है. निरीह इसलिए कह रहा हूं कि पिछले कम-से-कम 10 सालों से हमारे सांसदों का एक ही काम रहा हैजिसे वे बड़ी शिद्दत से निभाते हैं : सरकार ही दी हुई सामने की मेज बजाना या भगवान की दी हुई हथेलियों से तालियां बजाना. प्रधानमंत्री जबजहां कहेंवे अपना काम ईमानदारी से करते हैं. विपक्ष भी ऐसा ही करता है. फर्क है तो बस इतना कि उसके पास कोई प्रधानमंत्री नहीं होता है. इस बार उसके पास एक छाया प्रधानमंत्री’ जरूर है जिसकी छाया कब तककहां तक रहती हैदेखना बाकी है. हम दुआ करते हैं कि अंग्रेजी के शैडो प्राइमिनिस्टर’ का मक्खीमार अनुवाद भले उसे छाया प्रधानमंत्री’ कहेनेता प्रतिपक्ष कभी इस प्रधानमंत्री की छाया न बनें. न उनकी छाया में रहेंन उनको छाया दें. 

   लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव हुआ ही नहींसंख्या बल से उसे लोकसभा पर थोप दिया गया. विपक्ष ने अपनी तरफ से भी एक उम्मीदवार का नाम आगे बढ़ाया जरूर था जिसे ऐन वक्त पर पीछे  खींच लिया गया. जब ऐसा ही करना था तब उसकी घोषणा करने की जरूरत ही क्या थी कांग्रेस ने बाद में तर्क दिया कि हम सहयोग व सद्भावना का माहौल बनाना चाहते थेइसलिए चुनाव टाल गए. भाईजो आपके बीच कहीं है ही नहींवह आप बनाना ही क्यों चाहते थेऔर जो है ही नहींवही बनाना था तो अपना उम्मीदवार आगे ही क्यों करना था प्रतिबद्धताविहीन ऐसे निर्णय दूसरों को मजबूत बनाते हैं और आपकी किरकिरी करवाते हैं. 

   ओम बिरला को दोबारा लोकसभा का अध्यक्ष बनाने के पीछे प्रधानमंत्री का एक ही मकसद थाव है : विपक्ष को अंतिम हद तक अपमानित करना ! बिरला कभी इस पद के योग्य नहीं थेआज भी नहीं हैं. विद्वताकार्यकुशलताव्यवहार कुशलतावाकपटुता तथा सदन में गरिमामय माहौल बनाए रखने जैसे किसी भी गुण से उनका नाता नहीं रहा हैयह हमने पिछले पांच सालों में देखा है. पता नहीं विपक्ष ने उनका इतना स्वागत व गुणगान क्यों किया ! वह सब जो किया गया वह बहुत खोखला था और जो खोखला होता है वह जल्दी ही टूट व बिखर जाता है. वही अब हो रहा है. 

   बिरलाजी का यह गुण जरूर हम जानते हैं कि वे प्रधानमंत्री की धुन पर सतत नाचते रह सकते हैं. लेकिन यह गुण तो सारे सरकारी सांसदों में है. आप प्रसाद’ से त्रिवेदी’ तक किसी की भी परीक्षा ले कर देख सकते हैं. लेकिन ओम बिरला ने पिछली संसद में जिस तरह विपक्ष को तिरस्कृत व अपमानित किया थाउसे ही दोहराने के लिए इस बार भी उन्हें ही प्रधानमंत्री ने आगे किया है ताकि विपक्ष व देश समझे कि कहींकुछ भी बदला नहीं है. इसलिए नई लोकसभा के पहले ही दिन वे अपने पुराने अवतार में दिखाई दिए. जिस असभ्यता से उन्होंने दीपेंद्र हुड्डा को अपमानित कियाशशि थरूर के जय संविधान’ कहने से तिलमिलाएविपक्ष के सांसदों को कब उठना-कब बैठना सिखाने की फब्ती कसी वह सब यह समझने के लिए पर्याप्त है कि उन्हें क्या करने का निर्देश हुआ है. 

   राहुल गांधी ने जब यह कहा कि उनका माइक बंद क्यों किया गया हैतो अध्यक्ष का जवाब आया कि मैंने पहले भी यह व्यवस्था दी हैऔर आपको फिर से कहता हूं कि मेरे पास माइक का कोई बटन नहीं है. अध्यक्ष का बटन कहां हैयह तो सभी जानते हैं  लेकिन अभी जवाब तो यह आना था न कि माइक बंद कैसे हुआ और किसने किया ?  क्या अध्यक्ष की जानकारी व अनुमति के बगैर ही कोईकहीं से बैठ कर लोकसभा की काररवाई में दखल दे रहा है लोकसभा न हुईईवीएम मशीन हो गई ! अगर ऐसा है तो अध्यक्ष चाहिए ही क्यों जो अनदेखा- अनजाना आदमी बटन बंद कर सकता हैवही लोकसभा चला भी सकता है. इंडिया गठबंधन को तब तक न लोकसभा जाना चाहिएन राज्यसभा जब तक कि यह बता न दिया जाए कि माइक बंद किसने किया थाकिसकी अनुमति या निर्देश से किया था और यह भी व्यवस्था बना दी जाए कि सांसदों को बोलने से रोका तो जा सकता हैमाइक बंद नहीं किया जा सकता है. यह सांसदों का अपमान व तिरस्कार है जिसे किसी भी हाल में परंपरा में बदलने नहीं देना चाहिए. 

   परंपरा की बात है तो यह समझना जरूरी है कि विपक्ष के नेता की भी परंपराएं हैं.  इस अध्यक्ष को न वे परंपराएं पता हैंन विपक्ष के नेता का मतलब इसे मालूम है. जिस सांसदों का जन्म ही 10 साल पहले हुआ हैउनकी यह त्रासदी स्वाभाविक है. उनकी तो आंखें जब से खुली हैं तब से उन्होंने यही देखा-जाना है कि लोकसभा का मतलब एक ही आदमी होता है. भाईयह एकदम सच नहीं है. जैसे यह परंपरा है कि अध्यक्ष जब खड़ा हो जाए तो सभी सांसदों को बैठ जाना चाहिएप्रधानमंत्री जब बोल रहा हो तब सांसदों को शांति से उसे सुनना चाहिएवैसी ही परंपरा यह भी है कि विपक्ष का नेता जब बोल रहा हो तब उसे अध्यक्ष द्वारा बार-बार टोकनाबार-बार समय का भान करानाक्या बोलेंक्या न बोलें आदि का निर्देश देना गलत हैअशिष्टता हैलोकतांत्रिक परंपरा का उल्लंघन है. आखिर परंपराएं बनती कैसे हैं और उन्हें ताकत कहां से मिलती है परंपराएं कानूनी प्रावधानों से भी अधिक मान्य क्यों होती हैं सिर्फ इसलिए कि कोई भी उन्हें तोड़ता नहीं है. संविधान प्रदत्त शक्तिवान भी उनका शालीनता से पालन करउसे और अधिक मजबूत व काम्य बनाते हैं. राष्ट्रगान चल रहा हो तब राष्ट्रपति के सामने से धड़फड़ाते हुए निकल कर अपनी कुर्सी पकड़ने वाला लोकसभा अध्यक्ष हो कि राष्ट्रपति प्रवेश करें तब भी अपनी कुर्सी पर बैठा रहने वाला प्रधानमंत्री होये सब परंपराओं को ठेस पहुंचाती हैं. निश्चित अवधि में समय निकाल कर प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति से मिलना व उन्हें देश-दुनिया के बारे में सरकारी रवैये की जानकारी देना भी एक स्वस्थ परंपरा है जिसका पालन सिरे से बंद है. वैसे यह बात भी अपनी जगह है ही कि राष्ट्रपति जब व्यक्तित्वहीन कठपुतली की भूमिका से संतुष्ट कुर्सी पर बैठा हो तब ऐसी परंपरा कोई निभाए भी क्यों ?   

   यह लंगड़ी व पतनशील गठबंधनों की संसद है जो जब तक रहेगीराष्ट्र व लोकतंत्र को शर्मसार करती रहेगी. विपक्ष के नेता व संपूर्ण विपक्ष को लगातार यह दबाव बनाए रखना चाहिए कि यह संसद सुधरे या टूटे ! 

   अंधभक्त अपनी फिक्र आप करें लेकिन हम-आप तो सोचें कि ऐसा क्यों है कि सत्तापक्ष के सारे शब्द इतने खोखले लगते हैं शिक्षामंत्री ठीक ही तो कह रहे थे कि नीट’ के बारे में हम विपक्ष के सारे सवालों का जवाब देने को तैयार हैं. वे कह तो रहे थे लेकिन उनके हाव-भाव व तेवर यह कहते सुनाई यह दे रहे थे कि कर लो जो करना होहम कोई चर्चा नहीं करेंगे. ऐसा इसलिए था कि इसी मंत्री नेइसी नीट’ के बारे में लगातार यही कहा था कि न कोई लीक हुआ हैन कोई घोटाला हुआ हैसब विपक्ष का कराया हुआ है. न कोई घुसा थान कोई घुसा है”, वाला प्रधानमंत्री का बयान इसी तरह चीन में कुछ दूसरा ही सुनाई दियाऔर वे हमारी सीमा के भीतर ज्यादा खुल कर अपना काम करने लगे. यह वह संसद है जिसके शब्दों का कोई मोल ही नहीं रह गया है. शेरो-शायरी भी हो रही हैकहावतें भी दोहराई जा रही हैंप्रधानमंत्री बड़े-बड़े विचारकों-दार्शनिकों के उद्धरण भी ला-ला कर पढ़ते हैं लेकिन सब-के-सब इतने प्रभावहीन क्यों हो जाते हैं इसलिए कि उनके पीछे विश्वसनीयता का बल नहीं है. आस्थाहीन प्रवचन आत्माहीन कंकाल की तरह होता है. 

   राहुल गांधी चाहें न चाहेंवे कसौटी पर हैं. कभी रहा होगा लेकिन आज नेता विपक्ष शोभा का पद नहीं है. आज यह पद विकल्प खड़ा करने की चुनौती का पद है. विपक्ष को वक्त की सीधी चुनौती यह है कि क्या पंडित जवाहरलाल के दौर वाली संसद वापस लाने की कूवत उसमें है नेहरू वाली संसद इसलिए कह रहा हूं कि हमने वहीं से अपना सफर शुरू किया था और लगातार फिसलते हुए यहां आ पहुंचे हैं. तो कैसे कहूं कि उस दौर से भी बेहतर संसद बनानी चाहिए ! पहले  वहां तक तो पहुंचोजहां से गिरे थेफिर उससे ऊपर उठने की बात करेंगे.  

   राहुल गांधी व इंडिया गठबंधन ने संविधान की किताब दिखा-दिखा कर प्रधानमंत्री को जिस तरह चुनाव में पीटाउसकी काट उन्होंने यह निकाली कि लोकसभा अध्यक्ष को मोहरा बना कर आपातकाल की निंदा का प्रस्ताव पारित करवाया. यह उस घटिया विज्ञापन की तरह था कि “ उसकी कमीज मुझसे सफेद कैसे ?” लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि कांग्रेस को इससे बौखलाने की क्या जरूरत थी कोई 50 साल पहले हुई चूकजिसे इंदिरा गांधी नेकांग्रेस अध्यक्ष ने कई बार सार्वजनिक रूप स्वीकार किया हैउसे ले कर कांग्रेस अब क्यों बिलबिलाती है वह इतिहास की बात हो गई. उसके बाद से कांग्रेस ने संविधान से वैसा कोई खेल खेलने की कोशिश तो की नहीं है. यह भी याद रखना चाहिए कि जनता पार्टी की अल्पजीवी सरकार ने 1977 में ऐसी संवैधानिक व्यवस्था खड़ी भी कर दी है कि किसी सरकार के लिए आपातकाल लगाना असंभव-सा है. फिर आपातकाल का जिक्र आने पर इतना मुंह छिपाने की जरूरत नहीं है. एक गलती हुई जिससे हम दूर निकल आए हैंकांग्रेस यह क्यों नहीं कहती है 

   इतिहास का जवाब देना हो तो संघ परिवार को देना है कि जिस संविधान में इसकी कभी आस्था नहीं रहीजिस तिरंगे को इसने कभी स्वीकार नहीं कियाजिस राष्ट्रगान को इसने कभी माना नहींजिस राष्ट्रपिता को इसने कभी मान नहीं दियाजिस भारतीय समाज की संरचना को यह हमेशा तोड़ने में लगी रहीउसी की आड़ में यह सत्ता में आ कर बैठी हैतो इसमें कैसी नैतिकता व ईमानदारी है कांग्रेस की तरह यह सरकार नहीं कह सकती है कि 50 साल पहले हमारे तब के नेतृत्व से एक चूक हुई थी. यह तो आज भी उसी सावरकरी एजेंडा को मानती हैऔर उसी को लागू करने का मौका ढूंढ़ती रहती है. इस कठघरे में विपक्ष सरकार को खड़ा कर सकेगा तभी अपनी भूमिका निभा सकेगा.  (01.07.2024)

Saturday, 29 June 2024

यह चुप्पी टूटनी चाहिए

जिसे जनता ने बहुमत नहीं दियाउसने अपनी सरकार बना लीजिसे देश ने स्वीकार नहीं किया वह देश को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति दिलाने के बहाने इटली घूम आया ताकि दुनिया को बता सके कि मैं वहीं हूंजहां था. रात-दिन वही पिछला माहौल बनाने में सारी सरकारी मशीनरी झोंकी जा रही जो माहौल अब कहीं बचा नहीं है. देश ने जिस गोदी मीडिया’ को गोद से उतार दिया हैवह अपने लिए फेयर एंड लवली’ खोजतानई जोड़-तोड़ में लग गया है. कितना शर्मनाक है यह देखना कि कल तक यानी 3 जून की रात तक हर संभव हथियार से स्वतंत्र मीडिया की हत्या करने में जो जुटे थेप्रधानमंत्री की खैरख्वाही में लोटपोट हुए जा रहे थेवे ही मीडिया-व्यापारी 4 जून की शाम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की नींव बताते हुए पता नहीं किसेक्यों संबोधित कर रहे हैं. अवसरवादिता आप गिरगिट से सीखेंगे कि गिरगिट आपसेयह  समझना कठिन है. 

जिन्हें याद होगा उन्हें याद होगा कि ऐसा ही लिजलिजा माहौल 1977 के आम चुनाव के बाद भी बना था. कायर व स्वार्थी लोग तब भी बहादुरी का तमगा धारण कर सबसे पहले सड़क पर उतरे थे. जिन्हें लोगों ने इस तरह खारिज कर दिया था जिस तरह देश के लोकतांत्रिक इतिहास में कभीकिसी को खारिज नहीं किया था फिर भी लगातार यह तिकड़म की जा रही थी कि इस अस्वीकृति को कैसे स्वीकृति का जामा पहनाया जाए. जो तब कांग्रेस ने और इंदिरा गांधी ने किया थावही सब आज भारतीय जनता पार्टी व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं. तब इमर्जेंसी घोषित की गई थीआज अघोषित इमर्जेंसी से देश जूझ रहा है. इतिहास बताता है कि जो कायर थेवे कायर ही रहेंगे.

ऐसे माहौल में आज देश में कोई जयप्रकाश नहीं हैं. वह नैतिक अंकुश नहीं है जो पक्ष-विपक्ष दोनों को उनकी मर्यादा बताए भी और उसे लागू करने के हालात पैदा भी करे. 1977 में इंदिरा गांधी को हटा कर जयप्रकाश ने जिस सरकार को दिल्ली सौंपी थीउस सरकार को पहले दिन ही यह भी बता दिया था कि सिर्फ 1 साल का समय है आपके पास : “ इस 1 साल में मैं कुछ बोलूंगा नहींआप अपना काम करिएलेकिन आप मेरी गहरी निगरानी में हैंयह कभी भूलिएगा नहीं. एक साल बाद मैं आपका मूल्यांकन भी करूंगा और आगे का रास्ता भी बताऊंगा.” 

जिन्हें पता था वे समझ रहे थे कि यही वह भूमिका थी जिसकी जमीन बनाने में30 जनवरी 1948 को गोली खाने से पहले तक गांधी लगे थे. इतिहास इस तरह भी खुद को दोहराता है. हिंदुत्ववादियों ने गांधी को वह करने का मौका नहीं दियाजयप्रकाश किसी हद तक वह काम कर पाए. 

 1977 की पराजय के बाद जयप्रकाश बिना बुलाए इंदिरा गांधी के घर पहुंचे थे और उन्हें प्यार से समझाया था कि हार-जीत लोकतंत्र के खेल का हिस्सा है. लेकिन लोगों की सच्ची सेवा कर तुम अपना पुराना मुकाम फिर से हासिल कर सकती हो. वैसा ही हुआ. दूसरी तरफ जनता पार्टी के एक साल के कामकाज काएक शब्द में जयप्रकाश का मूल्यांकन था : निराशाजनक ! उन्होंने जनता पार्टी के तब के अध्यक्ष चंद्रशेखर व तब के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को एक खुला पत्र लिखा जिसका लब्बोलुआब यह था कि देश में उभरा आशा का ज्वारआप सबके करतबों से निराशा के भाटे में बदलने लगा है. उन्होंने मोरारजी देसाई को यह भी लिखा था कि उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली कर देनी चाहिए ताकि कोई दूसरा उपयुक्त व्यक्ति सामने लाया जा सके. जयप्रकाश इससे आगे बात  नहीं ले जा सके. मौत की लक्ष्मण-रेखा कौन पार कर सका है !

1977 का अनुभव बताता है और आज 2024 का माहौल भी यही बता रहा है कि जो भी सरकारजैसे भी बनी हैउस पर पहले दिन से ही नजर रखने तथा उसके बेजा इरादों पर अंकुश लगाने की जरूरत है. यह अंकुश सदन के भीतर भी लगे तथा सदन के बाहर भी तभी इस अंधी गली को पार करना संभव होगा.

दिल्ली के बला के असम्मानित लेफ्टिनेंट गवर्नर वी.के.सक्सेना की अनुमति से अरुंधति राय एवं कश्मीरी प्रो. डॉ. शेख शौकत हुसैन पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. इन दोनों पर आरोप है कि 2010 में इन दोनों ने कश्मीर से सवाल पर एक उत्तेजक भाषण दिया था. 2010 के उत्तेजक भाषण से यह सरकार आज तक इतनी उत्तेजित है तो यह जरूरी है कि उसे जितनी तरह से व जितनी ऊंची आवाज में संभव होयह बताया जाए कि यह अब चलेगा नहीं. उसे समझना ही होगा कि वक्त उसके हाथ से निकल गया है. लोकतंत्र का खेल लोकतंत्र की मर्यादा से ही खेला जाएगा. 

मैं अपनी कहूं तो मैं अरुंधति राय के अंग्रेजी लेखन व उनकी भाषा का कायल हूं लेकिन उनकी बातों व स्थापनाअों से मुझे हमेशा ही परेशानी होती है. उनमें कच्चापन भी हैअधकचरापन भी और गैर-जिम्मेवारी भी. लेकिन अरुंधति को किसी मुकदमे में फंसाने का मैं सख्त विरोध करता हूं. उन्हें पूरा हक है कि वे अपनी राय बनाएंउसे जाहिर करें तथा उसे देश में प्रचारित भी करें. ऐसा करते हुए उन पर भी यह संवैधानिक बंदिश है कि वे देश की एकता-अखंडता को कमजोर न करें. अगर सरकार को ऐसा लगता है कि अरुंधति ने यह मर्यादा तोड़ी है तो उसके पास भी अदालत का रास्ता खुला है. वह चोर दरवाजे से अरुंधति पर वार करेयह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. पिछले 10 सालों में पनपाई गई यह राजनीतिक संस्कृति न सभ्य हैन लोकतांत्रिक. 

हमें अदालत से बार-बार पूछना चाहिए कि वह संविधान का संरक्षण करने का काम कैसे कर रही है जबकि यूएपीए जैसा कानून संसद ने बना दिया और उसे अदालती समीक्षा के दायरे से बाहर भी कर दिया संविधान कहता है कि देश में संसद ही एकमात्र संवैधानिक संरचना है जिसे कानून बनाने का अधिकार है. वही संविधानउतने ही स्पष्ट शब्दों में यह भी कहता है कि संसद द्वारा बनाए हर कानून की वैधता जांचने का अधिकार जिस एकमात्र संवैधानिक संरचना को है वह है न्यायपालिका. न संसद को अधिकार है कि वह न्यायपालिका का अधिकार छीनेन न्यायपालिका को अधिकार है कि वह संसद के अधिकार पर बंदिश लगाए. फिर न्यायालय देश को बताए कि यूएपीए जैसा कानून उसने कैसे संवैधानिक मान लिया है कितने ही आला लोग इस कानून के तहत सालों से जेलों में बंद हैं. उन्हें दोषमुक्त करना तो दूरउन्हें अदालतें जमानत देने से भी इंकार कर रही हैं. जमानत अदालती कृपा नहीं हैहर नागरिक का अधिकार है बशर्ते कि जमानत के कारण किसी के जीवन पर या राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरा न हो. अदालत हमें बताए कि विभिन्न विश्वासों के कारण जिन लोगों को जेलों में बंद रखा गया है उनमें से कौन है जो जेल से बाहर आने पर किसी की हत्या कर देगा या राष्ट्र के खिलाफ षड्यंत्र रचेगा या तो अदालत इस बारे में देश को विश्वास में ले या फिर संविधान के संरक्षण की जिम्मेवारी से अपना हाथ खींच ले. हम इस सफेद हाथी का बोझ क्यों ढोएं यदि यह न चल पाता हैन बोल पाता है ?

यूसुफ पठान क्रिकेट के बहुत आला खिलाड़ी नहीं रहे हैं. अब तो उनका वह खेल भी समाप्त हो चुका है. पता नहींममता बनर्जी ने क्यों यूसुफ पठान को राजनीति में उतारा और यूसुफ पठान ने क्यों राजनीति में उतरना कबूल किया ! राजनीति का यह खेल न तो बहुत सम्मानजनक हैन बहुत अहम. लेकिन बहुत सारे लोग यह खेल खूब खेल रहे हैं तो ममता बनर्जी व यूसुफ पठान को भी यह खेलने का अधिकार तो है ही. तो यूसुफ पठान ने वह खेल खेला और चुनाव जीत कर अब वे सांसद भी बन गए हैं. वडोदरा में रहने वाले इस मुस्लिम-परिवार काबंगाल से भाजपा को हरा कर संसद में पहुंचना संघ परिवार को रास नहीं आया. उनका छूंछा क्रोध फूटा यूसुफ पठान और वडोदरा के उनके घर पर. गुजरात संघ परिवार की घोषित प्रयोगशाला है. वहां से यूसुफ पठान जैसा विभीषण पैदा हो तो संघ-परिवारी उन्माद में आ गए और उनके घर पर पत्थरबाजी हुईयूसुफ पठान को धमकाते हुएउन्हें उनकी औकात बताई गई. यह तो उनका काम हुआ लेकिन इस मामले में राजनीतिक दलों तथा समाज के सभी तबकों में जैसी चुप्पी छाई रही हैवह शर्मनाक भी है और खतरनाक भी ! कोई यह बताना चाह रहा है कि चुनाव का नतीजा भले जैसा भी रहा होहमारी हैसियत में कोई फर्क नहीं आया है. मुसलमान आज भी हमारे निशाने पर हैं. तो यह चुपचाप पी जाने वाला मामला नहीं है. इंडिया गठबंधन को और भारतीय समाज को हर स्तर पर इसकी भर्त्सना करनी चाहिए तथा यूसुफ पठान किस राजनीतिक दल से जुड़े हैंइसका ख्याल किए बगैर उनके साथ खड़ा होना चाहिए. 

चुप्पी लोकतंत्र को कायर व गूंगा बनाती है. यह चुप्पी हर वक्त और हर मामले में टूटनी चाहिएतोड़ी जानी चाहिए. ( 27.06.2024)

Monday, 10 June 2024

भारत भाग्य विधाता !

2024 ने देश को बहुत कुछ दिया है - इसने हमें एक ऐसा चुनाव दिखलाया है जैसा पतनशील चुनाव व चुनाव आयोग हमने पहले देखा नहीं था. इसने हमें एक ऐसा चुनाव परिणाम दिखलाया जैसा हमने पहले कभी देखा नहीं था. हमने पार्टियों की हार देखी थीहमने पार्टियों की जीत देखी थीहमने 1977 में वोट की ताकत से एक किस्म की तानाशाही को पराजित होते देखा था. लेकिन हमने ऐसा परिणाम पहली बार ही देखा जिसमें जीतने वाला हार गयाहारने वाला जीत गया ! और अब इस चुनाव परिणाम से हमें एक ऐसी सरकार मिली है जो पूर्ण बहुमत की सरकार सेबला के अल्पमत की सरकार में बदल गई है. 

 

इस सरकार के शिखर पर बैठा आदमी वही है लेकिन उसके पास अब न संख्या का बुलडोजर’ हैन सर्वस्वीकृति वाला इकबाल’ है. वह कवच-कुंडल विहीन ऐसी ईश्वरीय रचना’ हैजिसका देवता झोला उठा कर निकल गया है. मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह इस अल्पमत की सरकार को अल्पसंख्यकोंअल्प-अवसर प्राप्त वर्गोंअल्प-प्रतिष्ठा व अल्प-सुरक्षा प्राप्त महिलाओंअल्प-सामर्थ्यवान बच्चों का सहारा बनने की समझ व दृष्टि दे. ईश्वर से मैं ऐसी प्रार्थना इसलिए करता हूं कि गांधी ने, ‘गांधी’ फिल्म बनने से बहुत-बहुत पहले कहा था कि लोकतंत्र में जब भीजो भी सरकार रहेवह चाहे जितने वक्त रहेसरकार बन कर रहे. गांधी के शब्दों में: “ इस कुर्सी पर मजबूती से बैठो लेकिन इसे हल्के-से पकड़ो !” ( 1947 मेंआजादी के बाद बने मंत्रियों से उन्होंने अंग्रेजी में कहा था : ‘ सिट अॉन इट टाइटली बट होल्ड इट लाइटली ! ) - जिम्मेवारी के भरपूर अहसास के साथइस कुर्सी पर आत्मविश्वास से बैठो लेकिन इससे चिपको मत ! 

गांधी ने जो कहा थाहोने लगा इसका उल्टाऔर होते-होते ऐसा हो गया कि आज सारा गोदी मीडियाजिसकी गोदी’ भी अब किसी हद तक छिन गई हैएक ही राग अलाप रहा है कि नेहरू के बाद मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं कि जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं ! कैसी तुलना है !! नेहरू अपनी क्षमता व समझ भर लोकतांत्रिक संस्थाओं व परंपराओं का सर्जनसंरक्षण व संवर्धन करते हुएतीनों बार पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बने थे. मोदीजी के बारे में ऐसी बात कोई अंधभक्त या निरा अनपढ़ ही कह सकता है. 

चुनाव नतीजों का पूर्वानुमान करने का धंधा - एक्जिट पोल - अब प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए. यह न कला हैन विज्ञान ! यह बाजार का नया धंधा है जिसे प्रतिष्ठित करभरपूर कमाई करने में कितने ही किशोर’ लगे हैं. यह राजनीति का धंधा करने वालों की असीमित भूख को हथियार बना करलोकतंत्र से बलात्कार करने वाली नई बाजारू ताकत है. ऐसे धंधेबाजों को जिस तरह आज मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही हैउसी तरह उन राजनीतिक पंडितों-विश्लेषकों को भी कल मुंह छुपाने की जगह नहीं मिलेगी जो आज सीटों की संख्या गिन रहे हैं और येनकेन प्रकारेण उसे बढ़ाने-घटाने की दुरभिसंधि में लगे हैं. 

लोकतंत्र सत्ता का खेल नहीं है जैसा कि उसे बना दिया गया हैचुनाव मृत आंकड़ों का जोड़तोड़ नहीं है जैसी बाजीगरी करने में हम अक्सर लगे रहते हैं. हर चुनाव समाज की जमीन में नये बीज बोने और उनके अंकुरण की साधना है. यह गतिशील मनोविज्ञान का शास्त्र है जिसे हम अपनी आधी-अधूरीछल-क्षद्म से भरी मानसिकता से आंकने-ढकने का खेल खेलते हैं. मतदाता ने एक संवैधानिक संरचना ( चुनाव आयोग) की निष्पक्ष देख-रेख में अपना मत दे दिया जो आज के चलन के मुताबिक मशीनों में बंद हो गया. वे मशीनें खुलेंगी और मतदाता का फैसला सामने आ जाएगा. इतनी सीधीसरल-सी बात को इन तथाकथित विशेषज्ञों’ ने इतना जटिल बना दिया है कि वह धोखाधड़ी की श्रेणी में आ गया है. यह बंद होना चाहिए. 

किसी ने बहुत खूब कहा कि 4 जून 2024 को जो चुनाव परिणाम आयाउसने लोकतंत्र की हवा में अॉक्सीजन की मात्रा थोड़ी बढ़ा दी है. हवा में अॉक्सीजन पर्याप्त हो तो जीवित संरचनाएं सांस खींच पाती हैं. ऐसा ही लोकतंत्र के साथ भी है. संसद जब संविधान के दायरे में रहती है और संवैधानिक संरचनाएं जब स्वतंत्रतापूर्वक अपनी-अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन करती हैंतब लोकतंत्र सांस ले पाता है. जब ऐसा नहीं होता है तब अस्पताल चाहे जितना आधुनिक और फाइवस्टार’ चमक-दमक वाला होकोविड के दौर में ऑक्सीजन बिना वहां जैसा हमारा हाल हुआ था वैसा ही हाल लोकतंत्र का होता है. 

मैं कहूंगा कि 4 जून 2024 को आया चुनाव परिणाम भारतीय संसदीय लोकतंत्र को संजीवनी बूटी दे गया है. हनुमानजी की लाई संजीवनी बूटी अमृत नहीं थी कि जीवित हो उठे लक्ष्मण को अब कोई मार ही नहीं सकता है. संजीवनी बूटी यानी मृत होते पौधे को पानी पिलाना और यह पहचानना कि इसे जीवितपल्लवित व पुष्पित रखना हो तो लगातार पानी खोजने व पिलाने की जरूरत होगी. यह अहसास ही लोकतंत्र की संजीवनी है. इसलिए मत गिनिए कि इंडिया गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं और वह सत्ता से कितनी दूर रह गई. मत गिनिए कि मोदी-गठबंधन को कितनी सीटें मिलीं. इसमें भी समय मत खराब कीजिए कि वे अपनी अमर्यादित सत्ताभूख को तृप्त करने के लिए आगे क्या-क्या शैतानी चालें चलने जा रहे हैं. यह देखिए और यह समझिए कि इस चुनाव में मतदाताओं ने सत्ता व तिकड़म की शक्ति से बनाया गया वह माहौल तोड़ दिया जिसे पिछले 10 सालों से रचा जा रहा था कि एक आदमी ही राष्ट्र हैएक आदमी की कुंठाएं ही राष्ट्रनीति हैं और उसका अहंकार ही लोकतंत्र है. 

यह मतदाता कौन है ?

यह मतदाता वह है जिसकी हम सबसे कम कद्र करते हैं. वह बिखरा हुआअसंगठित हैइसलिए हम उसको कभी अपनी गिनती में नहीं लेते हैं. वह गरीब-अशिक्षित और अंगूठाछाप हैइसलिए हम अपने आभिजात्य ज्ञान में उसे गलती से भी जगह नहीं देते हैं. लेकिन वह आंखें खोल कर अपने चारो ओर की दुनिया को देखता रहता हैवह कम बोलता है लेकिन खूब जज्ब करता हैवह शैतानी ताकतों को पहचानता हैवह भटकता भी हैछला भी जाता है लेकिन फिर-फिर लौट कर राह पर आ जाता है. वह गांधी का वह अंतिम आदमी है जिसका ताबीज बना करउन्होंने तीन गोली खाने से पहले हमें सौंप दिया था. 

मैं गांधी-से शब्द कहां से लाऊं ! इसलिए अपने शब्दों में गांधी का भाव पकड़ने की कोशिश करता हूं : ‘ जब कभी ऐसे संशय में घिरने लगो कि तुम जो करने जा रहे हो वह सही या गलतयाकि तुम्हारा अहंकार इतना प्रबल होने लगे कि सही-गलत का भेद करना कठिन होने लगे तब सही फैसले तक पहुंचने के लिए तुम्हें एक ताबीज देता हूं.  जिसे तुमने खुद देखा होऐसे सबसे निरीह-निराधार-कातर आदमी का चेहरा अपने ध्यान में लाना और खुद से पूछना कि तुम जो करने जा रहे होतुम जो सोच रहे हो क्या वह इस आदमी की किस्मत बदल सकेगा क्या इससे यह आदमी अपने भावी को बदलने में ज्यादा समर्थ होगा यदि जवाब हां हो तो आगे जानासंशय में रह जाओ तो वह काम छोड़ देना !’ यही सबसे निरीह-निराधार आदमी भारत माता हैयही भारत भाग्यविधाता है. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से इसकी साधना शुरू की तो 30 जनवरी 1948 तक करते ही रहे.  

राहुल गांधी अपनी भारत-यात्रा में जाने-अनजाने इसी भाग्यविधाता तक पहुंच गए थे. राहुल गांधी का जो नया अवतार हम देख रहे हैंवह इसी भाग्यविधाता के स्पर्श से संभव हुआ है. न कांग्रेस यह गलतफहमी पाले कि अब उसकी वापसी हो रही हैन राहुल इस मुगालते में रहें कि उनकी झोली में अक्षय राजनीतिक पूंजी आ गई है. गांधी का यह अंतिम आदमी सिर्फ उन्हें ही प्रथम’ मानता हैसिर्फ उनका ही यह भाग्यविधाता है जो लगातार उसके बीच रहते हैंउसकी बातें सुनते हैंउससे बातें करते हैं और उसकी लड़ाई लड़ते हैं. वह जातिवादी नहीं हैहालांकि वह अपनी जाति के प्रति सावधान हैवह सांप्रदायिक नहीं है हालांकि वह अपने धर्म के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैवह प्रांतीय व भाषाई द्वेष से घिरा नहीं है हालांकि उसके भीतर यह बोध जीवित रहता है. मतलब यह कि वह जटिल संरचना है. लेकिन सही-गलतशुभ-अशुभसच-झूठ के संदर्भ की उसकी समझ बहुत बारीक व पवित्र है. वह देर से समझता है लेकिन समझता जरूर है. इसलिए उसके साथ लगातार संबंध-संपर्क-सक्रियता रणनीति नहींजरूरी कर्तव्य है.  

इस भारत भाग्यविधाता के साथ जिसका जुड़ाव होगाजुड़ाव बना रहेगाउसकी संसदीय शक्ति भी बढ़ेगी और उसकी सामाजिक शक्ति भी बढ़ेगी. इन दोनों शक्तियों का कोई संयोजन हो तो भारत लोकतंत्र का एक नया नमूना पेश कर सकेगा - विश्वगुरु !’ जयप्रकाश ने कहा था कि हमारे लोकतंत्र को जनांदोलनों की शक्ति से चलने वाली सरकार चाहिए. क्या इस चुनाव के संदर्भ में हम यह तत्व समझ सकेंगे और इसकी संभावना खोज सकेंगे जवाब राहुल गांधी दें कि कांग्रेस कि हम सामाजिक धारावाहिकता के प्रतिनिधि लेकिन जवाब दिए बिना चुनाव से हुए इस परिवर्तन को टिकाए रखना संभव नहीं होगा. ( 10.06.2024)