Saturday, 19 February 2022

घर वापस जाइए !

गुरु परब या प्रकाश पर्व पर केंद्र सरकार को इतना अंधरा क्यों दिखाई दिया कि उसने अपना रास्ता ही बदल लिया ? ऐसा क्या हुआ कि मुट्ठी भर गुंडे, आतंकवादी, खालिस्तानी, देशद्रोही किसानों के सामने, 2014 में देश को आजाद कराने वाली अजेय सरकार व दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल ने घुटने टेक दिए ? ऐसा क्या हुआ कि किसानों को इन स्वर्णिम कानूनों का असली स्वरूप समझाने की 11 दौर की खोखली बातचीत में सरकार जो सत्य खुद नहीं समझ पा रही थी, वह अचानक उसकी समझ में आ गया ? क्यों ऐसा हुआ कि साल पूरा होते-न-होते किसानों का आंदोलन बिखर जाएगा जैसी बात का प्रचार करने वाली सरकार का संकल्प, साल पूरा होने से पहले ही दम तोड़ गया ? और एक सवाल यह भी कि  इतिहास बदल देने वाली हर महत्वपूर्ण घोषणा आधी रात को करने वाली सरकार ने यह घोषणा सुबह में क्यों की ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार खुद ही देख व समझ रही है कि रात के अंधेरे में की उसकी सारी घोषणाएं रात के अंधेरे में ही बिला कर रह गई हैं ? 

किसानों का यह पूरा मामला, 2014 से उठ रहे हर मामले की तरह ही, प्रधानमंत्री की सीधी देख-रेख में, उनकी रणनीति से चलाया व बढ़ाया जा रहा था. इसलिए कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने बड़ी चतुराई से, पतली गली से निकलने की कोशिश में यह कहा कि यह वक्त किसी को दोष देने का नहीं है बल्कि आंदोलनकारी किसान भाइयों के घर लौट जाने का है. दुष्यंत  कुमार के शब्द उधार लूं तो कहूंगा : चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिए ! श्रीमान, यह कैसा तर्क है ? जब सरकार खुले आम माफी मांग रही हो तो इससे ज्यादा मौजूं वक्त दूसरा क्या हो सकता है कि देश देखे-समझे कि कृषि कानूनों के संदर्भ में दोष किसका है; क्षद्म कहां है; अहंकार का जहर कहां-कहां नसों में उतर रहा है और कौन है कि जो अप्रतिम कहलाते हुए भी लगातार मिट्टी का माधो साबित हो रहा है ? सवाल 3 कृषि कानूनों का ही नहीं है. कृषि कानून जिस श्रृंखला में आते हैं उसकी प्रारंभिक कड़ियां नोटबंदी, जीएसटी, भूमि अधिग्रहण कानून, श्रम कानून, नागरिकता कानून, बैंकिग प्रणाली का बंटाधार, कोरोना का लॉकडाउन, अमरीकी नागरिकों से ट्रंप की भोंडी पैरवी, कश्मीर का विभाजन, चीन से लगातार पिटती हमारी राजनयिक चालें, देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं के क्षुद्र राजनीतिकरण से भी जुड़ती हैं. ये सारे कानून, ऐसी सारी पहलें एक ही अक्ल से पैदा हुई थीं और एक ही प्रक्रिया से देश पर थोपी गई थीं. इसलिए इनकी समीक्षा करने का यह सही वक्त है जब समय ने अपना आईना सामने कर दिया है.

जिन कृषि कानूनों के बारे में धमकी देते हुए कहा जाता रहा कि किसान और कुछ भी मांग लें लेकिन इन कानूनों की वापसी का सपना भी न देखें, वे ही कानून रद्दी की टोकरी में डाल दिए जाएं तो कोई पूछे भी नहीं कि या इलाही ये मांजरा क्या है ? अगर चुप ही रहना था तो फिर प्रधानमंत्री ने कैसे कहा कि दिये के प्रकाश की तरह साफ था कि इन कानूनों से किसानों का भला होने वाला है लेकिन कुछ जड़बुद्धि किसानों को यह समझ में ही नहीं आया. तो दोष निकालने का काम तो आपने शुरू कर दिया न !  फिर यह तो पूछा ही जाएगा कि ‘इन कुछ किसानों’ के अलावा आपके सारे किसान कहां हैं अब ?  फिर आपने यह भी कहा कि हम एक कमिटी बनाएंगे जिसमें फलां-फलां तरह के लोग रहेंगे जो किसानों के सारे सवालों की समीक्षा करेंगे और अपनी सिफारिश देंगे. तो प्रकारांतर से आपने यह कबूल किया न कि आपकी पिछली प्रक्रिया दोषपूर्ण थी ! उसमें किसी स्तर पर भी विचार-विमर्श की बात की ही नहीं गई थी. न संसद में, न सलेक्ट कमिटी में, न सर्वदलीय बैठक में कहीं भी कृषि कानूनों पर विमर्श के लिए सरकार तैयार नहीं थी. कोरोना के लिए थाली बजाओ की तर्ज पर किसानों से कहा गया कि ताली बजाओ ! किसानों ने ताली नहीं बजाई बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम लिया. 

लोकतांत्रिक विमर्श का कोई भी सार्वजनिक मंच अस्तित्व में न रहने दिया जाए तो क्या आप एकतरफा भाषणों व सिर्फ अपने मन की बात से लोकतंत्र का ढांचा टिकाए रख सकते हैं ? यही क्षद्म था जिसका आज पर्दाफाश हुआ है.  सरकार भी समझे और किसान भी और विपक्ष भी कि बुनियादी सवाल लोकतंत्र को एक व्यक्ति की अक्ल व अहंकार का बंदी बनाने का है - फिर वह पार्टी हो कि परिवार कि आंदोलन कि संगठन! 

अंधभक्ति का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह धंधा ही अंधों का है. अंधों का अंधकार घना ही नहीं होता है, अभेद्य भी होता है. ऐसा ही इस सरकार के साथ हो रहा है - अहंकार में फूली सरकार, चापलूसी में लगी  नौकरशाही और अंधभक्तों की जय जयकार ! इस तिकड़ी ने देखा ही नहीं कि 700 किसानों के बलिदान के बाद भी आंदोलन का दायरा बढ़ता जा रहा है, संकल्प मजबूत होता जा रहा है और वह कई ऐसे सवालों को समेटने भी लगा है जिसे सामाजिक जीवन के विमर्श से बाहर ही कर दिया गया था. 

किसानों ने एमएसपी की आड़ में चलाए जा रहे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अन्न व्यापार को और उसके साथ खड़ी सरकार को पहचानना शुरू कर दिया. उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बंदियों का सवाल भी उठाया, जीप से किसानों को कुचलने की रणनीति बनाने वाले गृह राज्यमंत्री की औकात भी बताई. दिल्ली की सीमा पर किसानों को रोकने के लिए जिस तरह कीलें गाड़ी गईं, दीवारें खड़ी की गईं, सड़कें जाम की गईं, पुलिस से किसानों की पिटाई करवाई गई, वह सब किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को शर्मसार करने के लिए काफी था. लेकिन शर्म तो छोड़िए, कभी एक मानवीय बोल भी प्रधानमंत्री के मुंह से नहीं फूटा. किसानों ने यह सारा कुछ जिस संयम व स्वाभिमान से झेला उस कारण इसका कुछ ऐसा स्वरूप बनता गया कि किसानों के नेतृत्व में चलने वाला एक जन आंदोलन उभरने लगा. यह बात किसानों की समझ में आने लगी कि तीनों कानूनों की वापसी, एमएसपी की गारंटी आदि आंदोलन की मांगें भले हैं लेकिन असली बात तो यह है कि कारपोरेटी अर्थ-व्यवस्था का शिकंजा जब तक टूटता नहीं है, किसानों के गले का फंदा खुलता नहीं है. सरकार ने इसे पहचाना होता और अंधभक्तों ने उसे यह देखने दिया होता तो सरकार अपना रुख बदल सकती थी. लेकिन भद्दी, स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल संसद में और संसद के बाहर शीर्ष से नीचे तक के महानुभावों ने जिस तरह किया, उसने हमारा सार्वजनिक विमर्श रसातल में पहुंचा दिया. 

प्रधानमंत्री को यह दांव  बहुत मंहगा पड़ सकता है क्योंकि उनकी इस घोषणा ने पूरे आंदोलन को चुनाव के मैदान में ला खड़ा किया है. अब फैसला यह नहीं होना है कि कौन-सी पार्टी जीतती है, फैसला यह होना है कि आंदोलन जीतता है कि हारता है. यह देश के किसानों की आन का सवाल बन गया है. चुनावी जीत का रसायन अब तक जिस तरह बनाया जाता रहा है, वह शायद इस बार काम न आए. 1977 में कांग्रेस के साथ ऐसा ही हुआ था, 2022 में भी ऐसा हो सकता है.  किसानों ने और विपक्ष ने यदि इस नजाकत को समझा और अपना खेल बदला तो लोकतंत्र को यह आंदोलन बहुत बड़ी देन दे जाएगा. प्रधानमंत्री ने किसानों से कहा है कि घर वापस जाइए. संभव है कि किसान प्रधानमंत्री से भी ऐसा ही कहें. 

( 19.11.2021)            

गीत गाने वाले एक सिपाही का अवसान

 सिपाही का अवसान शोक की नहीं, संकल्प की घड़ी होती है. सलेम नानजुंदैया सुब्बाराव या मात्र सुब्बारावजी या देश भर के अनेकों के लिए सिर्फ भाईजी का अवसान एक ऐसे ही सिपाही का अवसान है जिससे हमारे मन भले शोक से भरे हों, कामना है कि हमारे सबके दिल संकल्पपूरित हों. वे चुकी हुई मन:स्थिति में, निराश और लाचार मन से नहीं गए, काम करते, गाते-बजाते थक कर अनंत विश्राम में लीन हो गए. यह वह सत्य है जिसका सामान हर प्राणी को करना ही पड़ता है और आपकी उम्र जब 93 साल छू रही हो तब तो कोई भी क्षण इस सत्य का सामना करने का क्षण बन सकता है. 27 अक्तूबर 2021 की सुबह 6 बजे का समय सुब्बारावजी के लिए ऐसा ही क्षण साबित हुआ. दिल का एक दौरा पड़ा और दिल ने सांस लेना छोड़ दिया. गांधी की कहनी के एक और लेखक ने कलम धर  दी. 

सुब्बारावजी आजादी के सिपाही थे लेकिन वे उन सिपाहियों में नहीं थे जिनकी लड़ाई 15 अगस्त 1947 को पूरी हो गई. वे आजादी के उन सिपाहियों में थे कि जिनके लिए आजादी का मतलब लगातार बदलता हा और उसका फलक लगातार विस्तीर्ण होता गया. कभी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति की लड़ाई थी तो कभी अंग्रेजियत की मानसिक गुलामी से मुक्ति की. फिर नया मानवीय व न्यायपूर्ण समाज बनाने की रचनात्मक लड़ाई विनोबा-जयप्रकाश ने छेड़ी तो वहां भी अपना हाफपैंट मजबूती से डाटे सुब्बाराव हाजिर मिले. 

यह कहानी 13 साल की उम्र में शुरू हुई थी जब 1942 में गांधीजी ने अंग्रेजी हुकूमत को ‘ भारत छोड़ो !’ का आदेश दिया था. किसी गुलाम देश की आजादी की लड़ाई का नायक, गुलामकर्ता देश को ऐसा सख्त आदेश दे सकता है, यही बात कितनों को झकझोर गई और कितने सब कुछ भूल कर इस लड़ाई में कूद पड़े. कर्नाटक के बंगलारू के एक स्कूल में पढ़ रहे 13 साल की भींगती मसों वाले सुब्बाराव को दूसरा कुछ नहीं सूझा तो उसने अपने स्कूल व नगर की दीवारों पर बड़े-बड़े हरफों में लिखना शुरू कर दिया : क्विट इंडिया ! नारा एक ही था तो सजा भी एक ही थी -जेल ! 13 साल के सुब्बाराव जेल भेजे गए. बाद में सरकार ने उम्र देख कर उन्हें रिहा कर दिया लेकिन हालात देख कर सुब्बाराव ने इस काम से रिहाई नहीं ली- कभी नहीं ! आजादी की आवाज लगाता वह किशोर जो जेल गया तो फिर जैसे लौटा ही नहीं; आवाज लगाता-लगाता अब जा कर महामौन में समा गया ! 

आजादी की लड़ाई लड़ने का तब एक ही मतलब हुआ करता था - कांग्रेस में शामिल हो जाना ! कांग्रेसिया है तो आजादी का सिपाही है- खादी की गांधी-टोपी और खादी का बाना तो समझो, बगावत का पुतला तैयार हो गया ! ऐसा ही सुब्बाराव के साथ भी हुआ. कांग्रेस से वे कांग्रेस सेवा दल में पहुंचे और तब के सेवा दल के संचालक हार्डिकर साहब की आंखें उन पर टिकीं. हार्डिकर साहब ने सुब्बाराव को एक साल कांग्रेस सेवा दल को देने के लिए मना लिया. युवकों में काम करने का अजब ही इल्म था सुब्बाराव के पास; और उसके अपने ही हथियार थे उनके पास. भजन व भक्ति-संगीत तो वे स्कूल के जमाने से गाते थे, अब समाज परिवर्तन के गाने गाने लगे. आवाज उठी तो युवाओं में उसकी प्रतिध्वनि उठी. कर्नाटकी सुब्बाराव ने दूसरी बात यह पहचानी कि देश के युवाओं तक पहुंचना हो तो देश भर की भाषाएं जानना जरूरी है. इतनी सारी भाषाओं पर ऐसा एकाधिकार इधर तो कम ही मिलता है. ऐसे में कब कांग्रेस का, सेवादल का चोला उतर गया और सुब्बाराव खालिस सर्वोदय कार्यकर्ता बन गए, किसी ने पहचाना ही नहीं.  

1969 का वर्ष गांधी-शताब्दी का वर्ष था. सुब्बाराव की कल्पना थी कि गांधी-विचार और गांधी का इतिहास देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जाए. सवाल कैसे का था तो जवाब सुब्बाराव के पास तैयार था: सरकार छोटी-बड़ी दोनों लाइनों पर दो रेलगाड़ियां हमें दे तो मैं गांधी-दर्शन ट्रेन का आयोजन करना चाहता हूं. यह अनोखी ही कल्पना थी. पूरे साल भर ऐसी दो रेलगाड़ियां सुब्बाराव के निर्देश में भारत भर में घूमती रहीं, यथासंभव छोटे-छोटे स्टेशनों पर पहुंचती-रुकती रहीं और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी, नागरिक, स्त्री-पुरुष इन गाड़ियों के डिब्बों में घूम-घूम कर गांधी को देखते-समझते रहे. यह एक महाभियान ही था. इसमें से एक दूसरी बात भी पैदा हुई : देश भर के युवाओं से सीधा व जीवंत संपर्क ! रचनात्मक कार्यकर्ता बनाने का कठिन सपना गांधीजी का था, सुब्बाराव ने रचनात्मक मानस के युवाओं को जोड़ने का काम किया. 

मध्यप्रदेश के चंबल के इलाकों में घूमते हुए सुब्बाराव के मन में युवाओं की रचनात्मक वृत्ति को उभार देने की एक दूसरी पहल आकार लेने लगी और उसमें से लंबी अवधि के, बड़ी संख्या वाले श्रम-शिविरों का सिलसिला शुरू हुआ. सैकड़ों-हजारों की संख्या में देश भर से युवाओं को संयोजित कर शिविरों में लाना और श्रम के गीत गाते हुए खेत-बांध-सड़क-छोटे घर, बंजर को आबाद करना और भाषा के धागों से युवाओं की भिन्नता को बांधना उनका जीवन-व्रत बन गया! यह सिलसिला कुछ ऐसा चला कि देश-विदेश सभी जगहों पर उनके मुरीद बनते चले गए. वे चलते-फिरते प्रशिक्षण शिविर बन गए. ऐसे अनगिनत युवा शिविर चलाए सुब्बाराव ने. देश के कई अशांत क्षेत्रों को ध्यान में रख कर, वे चुनौतीपूर्ण स्थिति में शिविरों का आयोजन करने लगे.  

चंबल डाकुओं का अड्डा माना जाता था. एक-से-एक नामी डाकू-गैंग वहां से लूट-मार का अपना अभियान चलाते थे और फिर इन बेहड़ों में आ कर छिप जाते थे. सरकार करोड़ों रुपये खर्च करने और खासा बड़ा  पुलिस-बल लगाने के बाद भी कुछ खास परिणामकारी कर नहीं पाती थी.    फिर कुछ कहीं से कोई लहर उठी और डाकुओं की एक टोली ने संत विनोबा भावे के सम्मुख अपनी बंदूकें रख कर कहा : हम अपने किए का प्रायश्चित करते हैं और नागरिक जीवन में लौटना चाहते हैं ! यह डाकुओं का ऐसा समर्पण था जिसने देश-दुनिया के समाजशास्त्रियों को कुछ नया देखने-समझने पर मजबूर कर दिया. विनोबा का रोपा आत्मग्लानि का यह पौधा विकसित हो कर पहुंचा जयप्रकाश नारायण के पास और फिर तो कुछ ऐसा हुआ कि 4 सौ से ज्यादा डाकुओं ने जयप्रकाशजी के चरणों में अपनी बंदूकें डाल कर, डाकू-जीवन से मुंह मोड़ लिया. इनमें ऐसे डाकू भी थे जिन पर सरकार ने लाखों रुपयों के इनाम घोषित कर रखे थे. इस सार्वजनिक दस्यु-समर्पण से अपराध-शास्त्र का एक नया पन्ना ही लिखा गया. जयप्रकाशजी ने कहा : ये डाकू नहीं, हमारी अन्यायपूर्ण समाज-व्यवस्था से बगावत करने वाले लेकिन भटक गए लोग हैं जिन्हें गले लगाएंगे हम तो ये रास्ते पर लौट सकेंगे. बागी-समर्पण के इस अद्भुत काम में सुब्बाराव की अहम भूमिका रही. चंबल के क्षेत्र में ही, जौरा में सुब्बाराव का अपना आश्रम था जो इस दस्यु-समर्पण का एक केंद्र था. 

सुब्बाराव ने बहुत कुछ किया लेकिन अपनी धज कभी नहीं बदली ! हाफपैंट और शर्ट पहने, हंसमुख सुब्बाराव बहुत सर्दी होती तो पूरे बांह की गर्म शर्ट में मिलते थे. अपने विश्वासों में अटल लेकिन अपने व्यवहार में विनीत व सरल सुब्बाराव गांधी-विद्यालय के अप्रतिम छात्र थे. वे आज नहीं हैं क्योंकि कल उन्होंने विदा मांग ली. लेकिन उनका विद्यालय आज भी खुला है और नये सुब्बारावों को बुला रहा है. ( 27.10.2021)

एयर इंडिया में इंडिया कहां है

         बात कुछ ऐसी बनी है कि हमारे पास एक भरा-पूरा उड्डयन मंत्रालय है, एक वजनदार नागरिक उड्डयन कैबिनेट मंत्री है लेकिन हमारे पास कोई उड़ता हुआ जहाज नहीं है. कहूं तो ऐसे भी कह सकता हूं कि विस्तीर्ण आसमान तो है हमारे पास लेकिन उसमें उड़ती कोई चिड़िया नहीं है. टाटा ने 68 सालों बाद, 18,000 करोड़ रुपयों में दुनिया का सबसे महंगा ‘रिटर्न टिकट’ खरीद कर अपने अपमान का बदला ले लिया है. उसने आसमान भी ले लिया है और सारे पंछी भी ले लिए हैं. विनिवेश का हर सौदा इस बात की खुली घोषणा है कि सरकार विफल हुई और उसका मंत्रालय निकम्मा साबित हुआ है. एक प्रश्न जो कोई पूछ नहीं रहा है वह यह है कि क्या विफल सरकार व निकम्मे मंत्रालय का विनिवेश कर के भी देख न लिया जाए ? शायद डगमगाते अर्थतंत्र को पटरी पर लाने का यह एक रास्ता हो ! 

टाटा से जब भारत सरकार ने एयर इंडिया छीना था तब 1952 में जेआरडी ने तब के संचारमंत्री जगजीवन राम से पूछा था : “ आप लोग जिस तरह अपने दूसरे विभागों को चलाते हैं, क्या आप समझते हैं कि हवाई सेवा चलाना भी उतना ही आसान है ? अब आपको खुद ही आंटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा !” जगजीवन राम ने थूक गटकते हुए जवाब दिया था: “ भले अब यह सरकारी विभाग बन जाएगा लेकिन इसे चलाने में आपको हमारी मदद तो करनी ही होगी.” आज चेहरे बदल गए हैं लेकिन सवाल और जवाब नहीं बदले हैं. 

सवाल यह है कि खासी अच्छी कमाई करती और खासा अच्छा रुतबा रखने वाली एयर इंडिया सरकारी हाथों में आते ही ऐसी बुरी दशा को कैसे पहुंच गई कि उसे खरीदने वाले का अहसान मानना पड़ रहा है हमें ? और यह बात भी गहराई से समझने की है कि 1953 में एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण करने के बाद से आज तक भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं वे सब-की-सब एकाधिक बार एयर इंडिया की मालिक रह चुकी हैं लेकिन हवाई जहाज चलाना किसी को नहीं आया. यह भर सच होता तो भी हम सरकारों की अयोग्यता का रोना रो लेते लेकिन सच कुछ और ही है, और बेहद कड़वा है. सच यह है कि एयर इंडिया के हर मालिक ने निजी विमान कंपनियों के हित में काम किया और सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को डुबाने में लोक-लाज का कोई ख्याल नहीं किया. इसकी भी एक खुली जांच होनी चाहिए कि नागरिक उड्डयन मंत्री व मंत्रालय के वरिष्ठतम अधिकारी इसकी मलाई कैसे खाते रहे और कैसे ऐसी नीतियां बनाते रहे कि एयर इंडिया हवा से उतर कर, जमीन में धंसती रही. किसी निजी कंपनी में ऐसा हुआ होता तो अब तक कितने सर जमींदोज हो गए होते और कितने जेल की सलाखों के पीछे होते. लेकिन यहां आलम यह रचा जा रहा है कि यह इस सरकार की कितनी बड़ी सफलता है कि उसने एक डूबी हुई, दम तोड़ चुकी कंपनी एयर इंडिया को टाटा के मत्थे मढ़ दिया और देश को मालामाल कर दिया ! यह झूठ की पराकाष्ठा है. 

थोड़ी कहानी तो आंकड़े ही कह डालते हैं. 2009-10 से अब तक सरकार ने एयर इंडिया की फटी झोली में, हमारी जेब से निकाल कर 54,584 करोड़ रुपये नकद और 55,692 करोड़ रुपये बाजार से उठाए गए कर्जों के एवज में जमानतस्वरूप डाले हैं. सरकार बता रही है कि एयर इंडिया में प्रति दिन का घाटा 20 करोड़ रुपयों का था. इसलिए इस बोझ को कंधे से उतारना जरूरी था. अगर यह सच है तो हम मान रहे हैं कि सबका साथ-सबका विश्वास ले कर, सबके प्रयास से देश का विकास करने की कोशिश में लगी इस सरकार ने टाटा कंपनी को मामू बनाया. अगर यह सच है तो इससे दो बातें स्वत: सिद्ध होती हैं: पहली यह कि सरकार ‘सबका विकास’ के दायरे में टाटा कंपनी को शरीक नहीं करती है ( तभी तो उसे मामू बनाया न !) और दूसरी बात यह कि टाटा इतनी लल्लू कंपनी है कि उसने यह भंगार खरीद लिया. क्या ये दोनों बातें सरकार का काइयां चेहरा नहीं दिखाती है ? 

आंकड़े ही इस कहानी का दूसरा पक्ष हमारे सामने रखते हैं. टाटा ने 18,000 हजार करोड़ रुपयों में एयर इंडिया खरीदा है जिसमें से देश को मात्र 2,700 करोड़ रुपये नकद मिलेंगे. बाकी 15,300 करोड़ रुपये उस 60,000 करोड़ रुपयों के कर्ज में से बाद कर दिए जाएंगे जो 31 अगस्त 2021 की तारीख में एयर इंडिया पर थे. तो देश को इस विनिवेश से मिला क्या ? मात्र 2,700 करोड़ रुपये !! इसके एवज में टाटा को मिला क्या ? घरेलू हवाई अड्डों पर 1,800 अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के उतरने व ठहरने की सुविधा, विदेश में 900 तथा देश में 4,400 सुरक्षित हवाई स्थानों की सुविधा, 30 लाख से अधिक निश्चित यात्री, 141 विमानों का जत्था, 13,500 प्रशिक्षित व अनुभवी कर्मचारी तथा घरेलू आसमान में 13.2% की हिस्सेदारी. मानिए कि एक बनी-बनाई, जांची-परखी हवाई कंपनी भारत सरकार ने टाटा को उपहार में दे दी है. अब इस कंपनी को चाहिए तो बस एक कुशल, ईमानदार प्रबंध तथा व्यापार-बुद्धि जो दोनों टाटा के पास है. इसलिए तो सौदा पूरा होने के बाद रतन टाटा ने इतने विश्वास से कहा : “ हम एयर इंडिया की खोई प्रतिष्ठा फिर से लौटा लाएंगे !” हम सब एयर इंडिया को और रतन टाटा को इसकी शुभकामना दें. 

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हमारी गाढ़ी कमाई से बनाई गई वे राष्ट्रीय संपत्तियां हैं जिन्होंने लंबे औपनिवेशिक शोषण से बाहर निकले देश की आत्मनिर्भरता को मजबूत बनाया है. अंतरराष्ट्रीय मंदी के लंबे दौर से हम खुद को जिस हद तक बचा सके, उसके पीछे हमारी इन आत्मनिर्भर परियोजनाअों की, लघु उद्योगों के जाल की बड़ी भूमिका रही है. सार्वजनिक क्षेत्र की हमारी कंपनियां देश की उन जरूरतों को पूरा करती हैं जिनकी तरफ मात्र मुनाफा व सुरक्षा को देखने वाले निजी व्यापारी व कारपोरेट देखते भी नहीं हैं. 

सार्वजनिक क्षेत्र के पास दो सबसे बड़ी ताकत होती है : जनता से मिलने वाली बड़ी अकूत पूंजी और सत्ता से मिलने वाली सुविधाएं व संरक्षण. किसी भी व्यापारिक उपक्रम को सफल बनाने वाले ये दोनों तत्व, किसी कारपोरेट को नहीं मिलते हैं. उसे यह सब चोर दरवाजे से हासिल करना पड़ता है. फिर यह कैसे व क्यों होता जा रहा है कि विनिवेश के नाम पर हम सार्वजनिक क्षेत्रों को खोखला बनाते जा रहे हैं ? कारण दो हैं : सरकारों ने सार्वजनिक उपक्रमों को, लोक कल्याण की अपनी प्रतिबद्धता की नजर से नहीं देखा बल्कि इससे मनमाना कमाई का कारपोरेटी रास्ता बनाया है. उसने सार्वजनिक क्षेत्र  के नाम पर ऐसे उपक्रमों में हाथ डाला जो किसी भी तरह लोककल्याण के उपक्रम नहीं थे. दूसरी तरफ सरकारी होने के कारण उनके प्रति किसी की निजी प्रतिबद्धता नहीं रही. तो नजर भी गलत रही और प्रतिबद्धता भी खोखली रही. 

सार्वजनिक उपक्रमों की कठोर समीक्षा का सिलसिला न कभी बनाया गया, न चलाया गया. इसलिए ये उपक्रम निकम्मे मंत्रियों और चालाक नौकरशाहों का आरामगाह बन गए. अब विनिवेश के नाम पर वे ही लोग अपनी नंगी विफलता व बेईमानी को छुपाने में लगे हैं. 

अत्यंत केंद्रित औद्योगिक क्रांति के साथ ही एक नया चलन सामने आया : पूंजी व सत्ता का गठजोड़ ! यह गठजोड़ हमेशा सार्वजनिक हित के खिलाफ काम करता रहा है. यहीं से उपनिवेशों का क्रूर शोषणकारी चलन बना. अब उसने नया रूप धरा है और विनिवेश व विकास के नाम पर पूंजी व प्राकृतिक संसाधन को कारपोरेटों के हवाले कर रहा है. इसलिए हमें सावधानीपूर्वक यह देखना चाहिए कि सार्वजनिक पूंजी और प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण न हो. इसमें से शोषण व गुलामी के सिवा दूसरा कुछ हमारे हाथ आएगा नहीं. ( 12.10.2021)

कमला भसीन - आप कैसे चुप हो सकती हैं

 निरर्थक बातों का इतना शोर मचा है कि मन तरसने लगा है कि थोड़ी शांति तो हो कि विवेक की कुछ निर्मल बातें कही व सुनी जा सकें ! कहीं कहा भी मैंने कि एक चुप्पी ही इस शोर को कोई अर्थ दे सकती है. लेकिन यह आपसे नहीं कहा था कमलाजी ! हमने ऐसा तो कहा ही नहीं था कि आप चुप हो जाएं !! कुछ ही तो आवाजें थीं जो इस अर्थहीन शोर को पार कर, हमारे मनों तक पहुंचती थीं और भरोसा दिलाती थीं कि ऐसे पतनशील दौर को चुनौती देने के लिए कैसे और कब बोलना चाहिए. आप क्यों चुप हो गईं ? आप चुप कैसे हो सकती हैं कमलाजी ?

 

मेरा बहुत खास परिचय नहीं था उनसे और मिलना भी कम ही हुआ लेकिन कुछ था कि वे जब-तब मुझे याद करती थीं. हमारे संस्थान में आ कर कभी यह तो कभी वह संदर्भ पूछती-खोजती थीं. कोई तीन साल पहले की बात याद आती है. मैंने उनको गांधी शांति प्रतिष्ठान की वार्षिक व्याख्यानमाला में आने का आमंत्रण भेजा था. तुरंत ही फोन आया. उन्हें वक्ता का चयन पसंद नहीं आया था. मैं उनकी उलाहना सुन कर थोड़ा हतप्रभ रह गया, तो हंस कर बोलीं, “ नहीं, यह वक्ता गलत है, ऐसा नहीं कह रही हूं. कह यह रही हूं कि आप अपने यहां महिलाओं को व्याख्यान के लिए नहीं बुलाते हैं. गांधीजी ने ऐसा तो कभी कहा नहीं होगा!” मैंने न गांधीजी का बचाव किया, न अपना. कहा, “ आपकी यह शिकायत मैं आपको बुला कर ही दूर करूंगा.” 


  “ ठीक है लेकिन इससे थोड़ा घबराती हूं कि आपके यहां गांधीजी का नाम जुड़ा होता है. मैंने गांधीजी को बहुत पढ़ा नहीं है. थोड़ा देख-समझ लूंगी तो फिर बात करूंगी. आप अपना वादा याद रखना भाई !” 


मैंने याद रखा और अगले व्याख्यान के वक्त पूछा.  वे तब कहीं और वक्त दे चुकी थीं, “ लेकिन भाई मानती हूं आपको कि आप भूले नहीं !” मैंने वही कहा जो अभी कह रहा हूं : आपको भूलना संभव ही नहीं है. इसके बाद तो कोरोना ने सारा गणित ही उलट-पुलट दिया. और आप ? आप तो इतनी दूर चली गईं कि अब आपको कैसे बुलाऊं मैं कमलाजी ?  


कई लोग कहते थे, आज भी कह रहे हैं कि कमला भसीन नारीवादी थीं. मैंने एक बातचीत में जब कहा कि मुझे आपके नारीवादी होने से कोई एतराज नहीं है लेकिन मेरी दिक्कत यह है कि मैंने आपकी बातों में हमेशा मनुष्यता की गूंज ही सुनी है ! वे एकदम से खुश हो गईं. उनकी जैसी खुशी और उनका जैसा आल्हाद मैंने कम ही देखा है. खुशी उनकी आंखों से फूटती थी और आसपास सबको रौशन कर जाती थी. मैंने फिर कहा: जो स्त्री के स्वतंत्र व स्वाभिमानी अस्तित्व के हक में बोली न बोलता हो, उसे आज हम मानवीय कह ही कैसे सकते हैं ? आज मनुष्य होने का मतलब ही औरतों व दलितों व अल्पसंख्यकों के साथ खड़ा होना है! हम जिनके साथ खड़े होते हैं उनकी कमियों-कमजोरियों पर बात करने का सहज ही अधिकार पा जाते हैं. साथ का मतलब अंधी पक्षधरता नहीं, संवेदना के साथ जीना होता है. वे खुश हो कर बोलीं : भाई रे, तुम्हारे जैसा मैं बोल भले न सकूं लेकिन तुम्हारी बातों में मैं बोलती हूं, यह कह सकती हूं.


अभी यह सब याद कर रहा हूं तो इसलिए कि उनके न रहने की खबर से व्यथित मन कुछ कमजोर हुआ जा रहा है. आज के माहौल को उनके जाने ने और भी अकेला कर दिया है. वे बहुत जिंदादिल थीं इसलिए बहुत मजबूत थीं; वे बहुत मजबूत थीं इसलिए कटु नहीं थीं; वे कटु नहीं थीं इसलिए बहुत मानवीय थीं. पुरुष के आधिपत्य से और उसके अहंकार से वे बहुत बिदकती थीं. वे उसकी खिल्ली भी उड़ाती थीं उस तरह कि जिसे टोपी उछालना कहते हैं. वे उस हर बात, परंपरा, कहावत, कहानी, चुटकुले आदि की बखिया उधेड़ती थीं जो औरत को निशाने पर रखती हैं और खूब प्रचलित हैं. उनके लिखे गीत, कहानी व नारों तक में हम उनके इस तेवर को पहचान सकते हैं. वे लिखती ही नहीं थीं, मस्ती से गाती भी थीं. मुझे तो लगता है कि वैसा तेवर दूसरे किसी में देखा नहीं मैंने. 


वे जनमी पाकिस्तान में थीं. ऊंची पढ़ाई राजस्थान में हुई. फिर समाजशास्त्र पढ़ने जर्मनी गईं. लंबे वर्षों तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के साथ काम करती रहीं. इन सबने जिस कमला को गढ़ा, उसमें संकीर्णता व क्षुद्रता की जगह बची ही नहीं थी. सारी दुनिया को एक दुनिया मान कर सोचना-जीना किया उन्होंने. इसलिए दुनिया भर से उनके संपर्क थे, दुनिया भर में उनकी पहुंच थी. एशियाई महिलाओं के लिए वे जैसी प्रतिबद्धता से बात करती थीं, वह सुनने व समझने जैसा था. वे आत्मविश्वास से भरी थीं लेकिन इतनी सहजता से जीती थीं कि वह आत्मविश्वास आत्मप्रचार नहीं बनता था. वे जोर से बातों को काटती थीं लेकिन बात कहने वाले को बचा ले जाती थीं. वे आदमी से नहीं, उसकी सीमाओं से लड़ती थीं.     

      

उनके कैंसरग्रस्त होने की खबर मिली तो मैं कहीं बाहर था. वहीं से फोन किया. थोड़ी बुझी आवाज में बोलीं: भाई रे, यह कहां से आ पड़ा ! मैंने कहा : आया है तो जाएगा भी कमलाजी ! जिस तपाक से वे हमेशा जवाब देती थीं, उस रोज वैसा कोई जवाब नहीं आया उधर से ! 75 साल का सफर ऐसा होता ही है कि काया थकने लगती है; मन उखड़ने लगता है. 


कहीं पाकिस्तान से ‘आजादी’ वाला नारा ले कर वे आई थीं. फिर उसे ऐसा गुंजाया उन्होंने कि वह नारा नहीं, परचम बन गया. जब भी औरत की आजादी का वह नारा कहीं से उठेगा, उसके साथ ही उठेगी कमलाजी आपकी सूरत भी ! विदा !! ( 26.09.2021)

Sunday, 19 September 2021

एक कायर दुनिया का शर्मनाक चेहरा

ऐसी दुनिया कभी थी कि नहीं जहां न्याय हो, शांति हो और नागरिकों का सम्मान हो, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन जैसी दुनिया आज है, वैसी दुनिया कभी होनी नहीं चाहिए, यह तो निश्चित ही कहा जा सकता है, कहा जाना चाहिए. आज हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं कि जिसमें सत्ताओं ने आपस में दुरभिसंधि कर ली है कि उन्हें जनता की न सुननी है, न उसकी तरफ देखना है. जिसके कंधों पर उनकी सत्ता की कुर्सी टिकी है, उस पर किसी की आंख नहीं टिकी है. यह हमारे इतिहास का बेहद कायर और क्रूर दौर है. इतने सारे देशों में, इतने सारे लोग, इतनी सारी सड़कों पर कब उतरे हुए थे मुझे पता नहीं; लेकिन मुझे यह भी पता नहीं है कि कब इतने सारे लोगों की, इतनी सारी व्यथा और इतने सारे हाहाकार को, इतने सारे शासकों व इतनी सारी सरकारों ने अपने-अपने स्वार्थों के चश्मे से देख कर, उसकी अनदेखी, अनसुनी की थी.      


   लेकिन हमारे पास भी तो एक चश्मा होना चाहिए कि जो सत्ता को नहीं, समाज को देखता हो ! इतिहास में कभी भारत का हिस्सा रहे अफगानिस्तान को हमें किसी दूसरे चश्मे से नहीं, अफगानी नागरिकों के चश्मे से ही देखना चाहिए— उन नागरिकों के चश्मे से जिससे हमने कभी सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान की छवि देखी थी. हमें म्यांनमार की तरफ भी उसी चश्मे से देखना चाहिए जिस चश्मे से कभी नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उसे देखा था और जापान की मदद से, अंग्रेजों को हराते हुए भारत की सीमा तक आ पहुंचे थे. इसी चश्मे से उसे शतरचंद्र चटर्जी ने देखा था और संसार का साहित्य-संसार धनवान हुआ था. म्यांनमार तब भारत का आंगन हुआ करता था. आज वह अफगानिस्तान भी, और वह म्यांनमार भी घायल व ध्वस्त पड़ा है और सारी महाशक्तियां व उनके पुछल्ले अपने स्वार्थों का लबादा ओढ़े, लाभ-हानि का हिसाब लगाते हुए मुंह सीए पड़े हैं. नहीं, यह भी सही नहीं कह रहा हूं मैं. सारी दुनिया की सरकारें, अधिनायक तालिबानी बंदूक से दोस्ती कर अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं.  


   यह खेल नया नहीं है.  न्याय व समस्याअओं का मानवीय पहलू कभी भी महाशक्तियों की चिंता का विषय नहीं रहा है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद तथाकथित मित्रों राष्ट्रों ने पराजित राष्ट्रों के साथ जैसा क्रूर व चालाक व्यवहार किया था, वह भूला नहीं जा सकता है. अरबों के सीने पर इसराइल किसी नासूर-सा बसा दिया गया और कितने ही देशों का ऐसा विभाजन कर दिया गया कि वे इतिहास की धुंध में कहीं खो ही गए. महाशक्तियों ने संसार को अपने स्वार्थगाह में बदल लिया. अफगानिस्तान के बहादुर व शांतिप्रिय नागरिकों के साथ भी महाशक्तियों ने वैसा ही कायरतापूर्ण, बर्बर व्यवहार किया - सबसे पहले वैभव के भूखे  ब्रितानी साम्राज्यवाद ने, फिर साम्यवाद की खाल ओढ़ कर आए रूसी खेमे ने और फिर लोकतंत्र की नकाब पहने अमरीकी खेमे ने. यदि अंतरराष्ट्रीय शर्म जैसी कोई संकल्पना बची है तो आज का अफगानिस्तान दुनिया के हर लोकतांत्रिक नागरिक के लिए शर्म का विषय है. 


   रूसी चंगुल से निकाल कर अफगानिस्तान को अपनी मुट्ठी में करने की चालों-कुचालों के बीच अमरीका ने आतंकवादियों की वह फौज खड़ी की जिसे तालिबान या अलकायदा या अल-जवाहिरी या ऐसे ही कई नामों से हम जानते हैं. अमरीकी राष्ट्रपति बार-बार इसका हिसाब देते हैं कि अफगानिस्तान पर किस तरह अमरीका ने अरबों-अरब रुपये खर्च किए, हथियार दिए, अफगानियों को युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया. वे कहना यह चाहते हैं कि अफगानियों में अपनी आजादी बचाने का जज्बा ही नहीं है, तो अमरीका कब तक उनको अपनी पीठ पर ढोये ? तो कोई पूछे बाइडन साहब से कि अमरीका जब जनमा था तब अफगानिस्तान था या नहीं ? अगर अफगानी अमरीका के जन्म से पहले से धरती पर थे तो यही बताता है कि वे अपना देश बनाते भी थे और चलाते भी थे. अमरीकी अब तक यह नहीं समझ सके हैं कि उन्मादी नारों, भाड़े के हथियारों और उधारी की देशभक्ति से देश न बनते हैं, न चलते हैं. अगर यह सच नहीं है तो कोई यह तो बताए कि अमरीका को अफगानिस्तान छोड़ना ही क्यों पड़ा ? अमरीका कलिंग युद्ध के बाद का सम्राट अशोक तो है नहीं ! बहादुर अफगानियों को गुलाम बनाए रखने की तमाम चालों के विफल होने के बाद अमरीकी उसे खोखला व बेहाल छोड़ कर चले गए, क्योंकि उनके लिए वहां टिकना संभव नहीं रहा. आर्थिक संकट से उनकी अपनी कमर टूटी जा रही है, और अफगानिस्तान को दबोच कर रखने का कोई नैतिक आधार उनके पास न था, न है. 


   अमरीका किसी भी हाल में, अफगानिस्तान का कैसा भी हाल बना कर वहां से निकला तो यह सौदा भी सस्ता ही होता लेकिन अफगानी नागरिकों का दुर्भाग्य ऐसा है कि अब उनके ही लोग, वैसी ही हैवानियत के साथ, उन्हीं हथियारों के बल पर उसके सीने पर सवार हो गए हैं. तालिबान किसी जमात का नहीं, उस मानसिकता का नाम है जो मानती है कि आत्मसम्मान के साथ आजाद रहने के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन हिंसा के बल पर किया जा सकता है. इस अर्थ में देखें तो महाशक्तियों का चेहरा तालिबानियों से एकदम मिलता है. सारी दुनिया की सरकारें कह रही हैं कि अफगानिस्तान से हम अपने एक-एक नागरिक को सुरक्षित निकाल लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.  लेकिन कोई यह नहीं बोल रहा है कि अफगानिस्तान के नागरिकों का क्या ? उनकी सेवा व उनके विकास के नाम पर ये सभी वहां संसाधनों की लूट करने में लगे थे और आज सभी दुम दबा कर भागने में लगे हैं. हमें अफगानिस्तान से निकल भागने में लगे अफगानियों की तस्वीरें खूब दिखाई जाती हैं लेकिन अपनी कायरता की तस्वीर छुपा ली जाती है. लेकिन इतिहास गवाह है कि चाहे ब्रितानी हो कि रूसी कि अमरीकी कि हिंदुस्तानी, ऐसी ताकतें न कभी स्थायी रह सकी हैं, न रह सकेंगी.


   म्यांनमार में तो फौजी तानाशाही से लड़ कर जीते लोकतंत्र का शासन था न ! शू ची न महाशक्तियों की कठपुतली थीं, न आतंकवादियों की. उनकी अपनी कमजोरियां थीं जरूर लेकिन म्यांनमार की जनता ने, फौजी तिकड़मों के बावजूद, उन्हें अपार बहुमत से दो-दो बार चुना था. भरी दोपहरी में उनकी सरकार का गला घोंट कर फौज ने सत्ता हथिया ली. इसके बाद की कहानी जैसी अफगानिस्तान में है वैसी ही म्यांनमार में है. वहां तालिबान के खिलाफ, तो यहां फौजी गुंडागर्दी के खिलाफ आम लोग - महिलाएं-बच्चे-जवान- सड़कों पर उतर आए और अपना मुखर प्रतिरोध दर्ज कराया. दुनिया के हुक्मरान देखते रहे, संयुक्त राष्ट्रसंघ देखता रहा और वे सभी तिल-तिल कर मारे जाते रहे, मारे जा रहे हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ आज यथास्थिति का संरक्षण करते हुए अपना अस्तित्व बचाने में लगा एक सफेद हाथी भर रह गया है. उसका अब कोई सामयिक संदर्भ बचा नहीं है. आज विश्व रंगमंच पर कोई जयप्रकाश है नहीं कि जो अपनी आत्मा का पूरा बल लगा कर यह कहता फिरे कि लोकतंत्र किसी भी देश का आंतरिक मामला नहीं होता है.      


   म्यांनमार व अफगानिस्तान की इस करुण-गाथा में भारत की सरकारों की भूमिका किसी मजबूत व न्यायप्रिय पड़ोसी की नहीं रही है. राष्ट्रहित के नाम पर हम समय-समय पर म्यांनमार और अफगानिस्तान को लूटने वाली ताकतों का ही साथ देते रहे हैं. हम यह भूल ही गए हैं कि ऐसी कोई परिस्थिति हो नहीं सकती है जिसमें किसी दूसरे का अहित हमारा राष्ट्रहित हो.  


   शायद समय भी लगे और अनगिनत कुर्बानियां भी देनी पड़ें लेकिन अफगानिस्तान की बहादुर जनता जल्दी ही अपने लोगों के इस वहशीपन पर काबू करेगी, अपनी स्त्रियों की स्वतंत्रता व समानता तथा बच्चों की सुरक्षा की पक्की व स्थाई व्यवस्था बहाल करेगी. सू ची फौजी चंगुल से छूटें या नहीं, फौजी चंगुल टूटेगा जरूर ! हम खूब जानते हैं कि अपने पड़ोस में स्वतंत्र, समतापूर्ण और खुशहाल म्यांनमार व अफगानिस्तान हम देखेंगे जरूर लेकिन हम यह नहीं जानते कि इतिहास हमें किस निगाह से देखेगा.  

( 16.09.2021)

Saturday, 28 August 2021

क्या भूलूं, क्या याद करूं ?

    मुझे एकदम प्रारंभ में ही कह देना चाहिए कि मैंने इस आलेख का शीर्षक बच्चनजी से नहीं लिया है. मुझे तो याद भी नहीं है कि हरिवंश राय बच्चनजी ने अपनी आत्मकथा के पहले खंड के इस शीर्षक के साथ प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया था या नहीं लेकिन मैं जान-बूझकर यह प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहा हूं . मेरे सम्मुख प्रश्न यह है कि किसी भी मुल्क को अपना वर्तमान गढ़ने के लिए अतीत का क्या कुछ याद रखना चाहिए और क्या कुछ भूल जाना चाहिए, भूलते जाना चाहिए ? इतिहास के कूड़ाघर में वक्त ने जितना कुछ फेंक रखा है, वह सब-का-सब संजोने लायक नहीं होता है. जो जाति या मुल्क वह सारा कुछ संजोते हैं, वे इतिहास के सर्जक नहीं, इतिहास के कूड़ाघर बन कर रह जाते हैं. 

   यह इसलिए कहना पड़ रहा है कि स्वतंत्रता दिवस को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राष्ट्र ने तय किया है कि आगे से 14 जनवरी का दिन वह विभाजन विभीषिका स्मृति दिन के रूप में मनाएगा. सुन कर पहली बात तो यही उठी मन में कि किसी प्रधानमंत्री को यह अधिकार कैसे मिल गया कि वह राष्ट्र की तरफ से ऐसी घोषणा कर दे ? प्रधानमंत्री को राष्ट्र ने चुना नहीं है. राष्ट्र ने उन्हें बस एक सांसद चुना है; उन्हें प्रधानमंत्री तो उनकी पार्टी के सांसदों ने चुना है. जैसे राष्ट्र की तरफ से ऐसी घोषणा का अधिकार किसी सांसद का नहीं हो सकता है, वैसे ही प्रधानमंत्री का भी नहीं हो सकता है. यह अधिकार तो केवल, और केवल संसद का है कि वह ऐसे मामलों पर खुला विमर्श करे, देश में जनमत के दूसरे माध्यमों को भी उस पर सोचने-समझने का पूरा मौका दे और फिर आम भावना को ध्यान में रख कर फैसला करे. ऐसे निर्णयों की घोषणा भी संसद में ही होनी चाहिए भले बाद में प्रधानमंत्री लालकिले से उसका जिक्र करें. और यह भी समझने की जरूरत है कि संसद को भी दूसरी संवैधानिक व्यवस्थाअों से बंध कर ही चलना चाहिए. हमारा संविधान स्वयंभू जैसी हैसियत किसी को नहीं देता है. इसलिए भी 15 अगस्त की गई यह अटपटी घोषणा ज्यादा ही अटपटी लगी. 


   हर आदमी का और हर मुल्क का इतिहास स्याह व सफेद पन्नों के मेल से बना है. दोनों पन्ने सच हैं. फर्क है तो इतना ही कि स्याह पन्नों पर आप न कुछ पढ़ सकते हैं, न दूसरा नया कुछ लिख सकते जबकि सफेद पन्ने आपको पढ़ने और  लिखने का आमंत्रण देते हैं. स्याह पन्नों में छिपाने जैसा कुछ नहीं होता है, क्योंकि आखिर वह सच तो होता ही है. लेकिन उसमें भुलाने जैसा बहुत कुछ होता है, क्योंकि वह सारा अमंगल होता है. जो इतिहासकार हैं वे दोनों पन्नों को संजो कर रखते हैं, क्योंकि उनकी जिम्मेवारी होती है कि वे इतिहास के प्रति सच्चे रहें. सामान्य नागरिक इतिहासकार नहीं होता है. उसकी जिम्मेवारी होती है कि अपना देश ईमानदारी व प्रेम से गढ़े, आगे बढ़े; और इस पुरुषार्थ में इतिहास से जितनी मदद मिलती हो, उतनी मदद ले. 


   देश का विभाजन हमारे इतिहास का वह स्याह पन्ना है जिस पर हमारी सामूहिक विफलता की कहानी लिखी है. केवल विफलता की नहीं, हमारी पशुता की, दरिंदगी की और मनुष्य के रूप में हमारे अकल्पनीय पतन की. हमारी आजादी के नेतृत्व का कोई भी घटक नहीं है कि जिसके दामन पर इस विभाजन का दाग नहीं है - महात्मा गांधी भी नहीं. दूसरी तरफ वे अनगिनत स्याह सूरतें भी हैं जो हमारी सामूहिक विफलता और पतन का कारण रही हैं. प्रधानमंत्री ने जिसे विभाजन की विभीषिका कहा है, वह प्रकृतिरचित नहीं, मानवरचित थी. कवि ‘अज्ञेय’ ने तो सांप से पूछा है : “सांप/ तुम सभ्य तो हुए नहीं/ नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया/  एक बात पूछूं/ उत्तर दोगे/ फिर कैसे सीखा डंसना/ विष कहां पाया ?” विभाजन के पन्ने पलटें हम तो ‘अज्ञेय’ का यही सवाल हमें इंसानों से पूछना पड़ेगा. और ऐसा भी नहीं है कि इंसानों का ऐसा पतन हमारे इतिहास में ही हुआ है. सारी दुनिया के इतिहासों में ऐसी पतन-गाथा दर्ज है. बहुत गिर-गिर कर उठे हैं हम इंसान और तब यहां तक पहुंचे हैं. पतनशीलता आज भी कई लोगों की जेहनियत में घुल गई है, कई लोगों की जीवन-शैली बन गई है. 

 

   तो क्या भूलें, क्या याद करें ? विभाजन क्यों हुआ, यह भूलने जैसा नहीं है. उससे हम सीखेंगे कि आदमी कहां और क्यों इस तरह कमजोर पड़ जाता है कि इतिहास की प्रतिगामी शक्तियां उसे अशक्त  कर, अपना मनमाना करवा लेती हैं? गांधी जैसा दुर्धर्ष व्यक्ति भी पूरी कोशिश कर जिसे रोक नहीं पाया, भारतीय समाज की और मानव-मन की वह कौन-सी कमजोरी थी, इसे गहराई से समझना है और उससे सावधान रहना है. गांधी की विफलता इसी मानी में इतनी उदीप्त और उज्ज्वल है कि वह हमें पतन की तरफ नहीं ले जाती है.  आसमान छूने की कोशिश में विफल होने में और नर्ककुंड रचने में सफल होने में जो फर्क है, वही फर्क है गांधी की विफलता और सांप्रदायिक ताकतों की सफलता में. हिंदू-मुसलमान दोनों के कायर सांप्रदायिक तत्व इसलिए इतिहास के कठघरे में हमेशा मुजरिम की तरह खड़े रहेंगे कि वे गांधी की कोशिशों को विफल करने की अंधी कोशिश करते रहे और अंतत: देश ही नहीं तोड़ बैठे बल्कि सर्वभक्षी घृणा का ऐसा समंदर रच दिया उन्होंने कि आज भी वह ठाठें मारता है. इसलिए यह जरूरी है कि गांधी की कोशिशों को हम हमेशा याद करें, करते रहें क्योंकि आगे का रास्ता वहीं से खुलता है. 


   हम क्या भूलें ? उस दरिंदगी को भूलें जिसे विभीषिका कहा जा रहा है. वह विभीषिका नहीं थी, क्योंकि वह आसमानी नहीं, इंसानी थी. उसे इतिहास के किसी अंधेरे कोने में दफ्न हो जाने देना चाहिए क्योंकि वह हमें गिराता है, घृणा के जाल में फंसाता है, जोड़ता नहीं, तोड़ता है. दोनों तरफ की सांप्रदायिक मानसिकता के लोग चाहते हैं कि वह याद बनी रहे, बढ़ती रहे, फैलती और घुमड़ती रहे ताकि जो जहर गांधी ने पी लिया था, वह फिर से फूटे और भारत की धरती को अभिशप्त करे; इस महाद्वीप के लोगों को आदमकद नहीं, वामन  बना कर रखे. उनके लिए ऐसा करना जरूरी है क्योंकि वे इसी का रसपान कर जीवित रह सकते हैं. लेकिन कोई मुल्क सभ्यता, संस्कृति और उद्दात्त मानवता की तरफ तभी चल पाता है जब वह अपना कलुष मिटाने व भूलने को तैयार होता है. सभ्यता व संस्कृति की यात्रा एक उर्ध्वगामी यात्रा होती है. वह नीचे नहीं उतरती है, हमें पंजों पर खड़े होकर उसे छूना व पाना होता है. जो ऐसा नहीं कर पाते हैं वे सारे समाज को खींच कर रसातल में ले आते हैं, फिर उनका नाम जिन्ना हो कि सावरकर कि उनके वारिस. इसलिए हम उन सांप्रदायिक ताकतों को याद रखें कि जिनके कारण देश टूटा, अनगिनत जानें गईं, अपरिमित बर्बादी हुई और पीढ़ियों तक रिसने वाला घाव, वैसा घाव जैसा महाभारत युद्ध में अंत में अश्त्थामा को मिला था, इस महाद्वीप के मन-प्राणों पर लगा. जिस मानसिकता के कारण वह घाव लगा, हम उसे न भूलें लेकिन जितनी जल्दी हो सके, उस घाव को भूल जाएं. 


   याद रखना ही नहीं, भूल जाना भी ईश्वर प्रदत्त आशीर्वाद है. इसलिए 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने की उल्लास भरी मानसिकता बनाने के लिए जरूरी लगता हो तो हम 14 अगस्त को प्रायश्चित व संकल्प  दिवस के रूप में मनाएं. प्रायश्चित इसका कि हम इतने कमजोर पड़े कि अपना यह सामूहिक पतन रोक नहीं सके; और संकल्प यह कि आगे कभी अपने मन व समाज में ऐसी कमजोरी को जगह बनाने नहीं देंगे हम. महा संबुद्ध बुद्ध को साक्षी मान कर हम 14 अगस्त को गाएं : ले जा असत्य से सत्य के प्रति/ ले जा तम से ज्योति के प्रति/ मृत्यु से ले जा अमृत के प्रति. विश्वगुरु बनना जुमला नहीं, आस्था हो तो इस देश का मन नया और उद्दात्त बनाना होगा. 


( 26.08.2021)     

Wednesday, 11 August 2021

देशद्रोहियों का देश

 पेगासस जासूसी के मामले में कौन किस तरफ खड़ा है, यह पता कब चलेगा यह तो पता नहीं लेकिन इससे यह तो पता चला ही है कि देश के हर कोने में देशद्रोही जड़ जमाए बैठे हैं. अगर सरकार नहीं तो कोई है जो विदेशी ताकतों की मदद से देशी देशद्रोहियों का काम तमाम करने में लगा है. लेकिन सरकार की जानकारी के बिना यदि कोई ऐसा कर पा रहा है तो खतरा यह है कि वह देश का काम ही तमाम कर देगा. 

दो सौ से ज्यादा सालों तक हमारे ऊपर बलपूर्वक शासन करनेवाले अंग्रेज खोज कर भी जितने देशद्रोही नहीं खोज पाए थे, हमने महज सात सालों में उससे ज्यादा देशद्रोही पैदा कर दिए. अब तो शंका यह होने लगी है कि इस देश में देशभक्त ज्यादा हैं या देशद्रोही ? कहीं यह देश देशद्रोहियों का देश तो नहीं बन गया है ? फिर मन में यह बात उठती है कि जिस सरकार से समाज तौबा कर लेता है, उसे वह बदल डालता है, तो जिस समाज से सरकार तौबा कर ले उसे क्या करना चाहिए ? सीधा जवाब तो यही सूझता है कि उस सरकार को भी अपना समाज बदल लेना चाहिए. जैसे जनता नई सरकार चुनती है, सरकार को भी नई जनता चुन लेनी चाहिए.

देशद्रोह का यही सवाल हमारे सर्वोच्च न्यायालय को भी परेशान कर रहा है. संविधान में हमने माना है कि संप्रभु जनता है, सरकार नहीं. सरकार जनता द्वारा बनाई वह संरचना है जो बहुत हुआ तो पांच साल के लिए है. हमने उसका संवैधानिक दायित्व यह तै किया है कि वह अपना काम इस तरह करे कि संप्रभु जनता का इकबाल बना भी रहे व बढ़ता भी रहे. फिर हमने न्यायपालिका की कल्पना की. वह इसलिए कि जब भी और जहां भी सरकार खुद को संप्रभु मानने लगे, वहां न्यायपालिका अंपायर बन कर खड़ी हो. उसे जिम्मेवारी यह दी है हमने कि वह देखे कि इन दोनों के बीच लोकतंत्र का हर खेल खेल के नियम से हो. खेल के नियम क्या हैं ? तो उसकी एक किताब बना कर हमने इसे थमा दी : संविधान ! उसे संविधान के पन्ने पलटने थे और इस या उस पक्ष में सीटी बजानी थी. इस भूमिका में वह विफल हुई है. उसके सामने खेल के नियम तोड़े ही नहीं जाते रहे बल्कि कई मौकों पर नियम बदल ही दिेए गए, और ऐसे बदले गए कि खेल ही बदलता गया. बनाना था लोकतंत्र, बन गया तंत्रलोक ! 

हमारे मुख्य न्यायपालक एन.वी. रमण ने अभी-अभी यह सवाल खड़ा किया है कि भारतीय दंडसंहिता की धारा 124ए का आजादी के 70 सालों के बाद भी बने रहने का औचित्य क्या है ? 1870 में यह धारा भारतीय दंडसंहिता में उस औपनिेवेशिक ताकत ने दाखिल की थी जो न भारतीय थी, न लोकतांत्रिक. भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षा को कुचलने के एकमात्र उद्देश्य से बनाई गई यह धारा उन सबको देशद्रोही करार देती रही, जेलों में, कालापानी में बंद करती रही जिनसे हमने लोकतंत्र व देशभक्ति का ककहरा सीखा है. लेकिन यह सब तब हुआ जब न हमारे पास आजादी थी, न लोकतंत्र, न संविधान. जब हमारे पास यह सब हो गया तब भी न्यायपालकों ने अंपायर की भूमिका नहीं निभाई बल्कि सत्ता की टीम की तरफ से खेलने लगे. धारा 124ए का चरित्र ही राक्षसी नहीं है बल्कि इसका अधिकार-क्षेत्र भी इतना दानवी है कि इसकी आड़ में पुलिस का अदना अधिकारी भी मनमानी करता रहे. इसलिए गोरे साहबों की खैरख्वाही में भूरे व काले साहबों ने आजादी के सिपाहियों के साथ कैसी-कैसी मनमानी की इसकी कहानी शर्म से आज भी हमारा सर झुका देती है. 

  1962 में 124 ए की वैधानिकता का सवाल अदालत के सामने आया था. तब अदालत ने न इसकी पृष्ठभूमि देखी, न लोकतांत्रिक वैधानिकता की कसौटी पर इसे कसा बल्कि जजों की बेंच ने फैसला यह दिया कि यह धारा सिर्फ उस व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल की जाएगी जो सामाजिक असंतोष भड़काने का अपराधी होगा. जजों को जमीनी हकीकत का कितना कम पता होता है ! ‘सामाजिक असंतोष भड़काना’ ऐसा मुहावरा है जिसकी आड़ में किसी को फंसाना या फंसवाना एकदम सरल है. कोई कुटिल व्यक्ति चाहे तो जस्टिस रमण को भी असंतोष भड़काने वाला साबित कर दे सकता है.  


आपातकाल का पूरा काल न्यायपालिका के लिए कालिमामय है. 1976 के हैबियस कॉरपस मामले में जिस तरह अदालत ने पलक झपकाए बिना यह फैसला दिया कि राज्य नागरिकों के जीने के अधिकार पर भी हाथ डाल सकता है, वह तो संविधान का अपमान ही नहीं था, वैधानिक कायरता का चरम था. नागरिक अधिकारों का गला घोंटने वाला एनएसए जैसा भयंकर कानून 1977 में मिली दूसरी आजादी के तुरंत बाद ही, 1980 में पारित हुआ. 1994 में सत्ता एक कदम और आगे बढ़ी और हमारी झोली में टाडा आया. 1996 में उसने एक कदम और आगे बढ़ाया और आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट बना. 2004 में फिर एक कदम आगे : पोटा ! इसने वह रास्ता साफ किया जिस पर चल कर ऊपा या यूएपीए नागरिकों की गर्दन तक पहुंचा. ये सारे कानून सत्ता के कायर चरित्र व न्यायपालिका के शुतुरमुर्ग बन जाने की शर्मनाक कहानी कहते हैं.  

                 

गांधीजी ने न्यायपालिका के चरित्र को रेखांकित करते हुए कहा था कि जब भी राज्य के अनाचार से सीधे मुकाबले की घड़ी आएगी, न्यायपालिका यथास्थिति की ताकतों के साथ खड़ी मिलेगी. तब हमने अपने भोलेपन में समझा था कि गांधीजी विदेशी न्यायपालिका के बारे में कह रहे हैं जबकि वे देशी-विदेशी नहीं, सत्ता व सत्ता की कृपादृष्टि की याचक सभी संरचनाओं के बारे में कह रहे थे. राष्ट्रद्रोह और राज्यद्रोह में गहरा और बुनियादी फर्क है. महात्मा गांधी ने खुली घोषणा कर रखी थी कि वे राज के कट्टर दुश्मन हैं क्योंकि वे राष्ट्र को दम तोड़ती कायर भीड़ में बदलते नहीं देख सकते.


सत्ता को सबसे अधिक डर असहमति से लगता है क्योंकि वह सत्ता को मनमाना करने का लाइसेंस समझती है. इसलिए असहमति उसके लिए बगावत की पहली घोषणा बन जाती है. विडंबना देखिए कि लोकतंत्र असहमति के ऑक्सीजन पर ही जिंदा रहता है, सत्ता के लिए असहमति कार्बन गैस बन जाती है. दुखद यह है कि ये सारे कानून न्यायपालिका की सहमति से ही बने व टिके हैं.


124 ए से हाथ धो लेने की चीफ जस्टिस रमण की बात के जवाब में एटॉर्नी जेनरल के.के. वेणुगोपाल अदालत में ठीक वही कह रहे हैं जो सत्ता व न्यायपालिका ने अब तक नागरिक अधिकारों के पांव काटने वाले हर कानून को जन्म देते वक्त कहा है : सावधानी से इस्तेमाल करें ! यह कुछ वैसा ही जैसे बच्चे के हाथ में खुला चाकू दे दें हम लेकिन उस पर एक पर्ची लगा दें: सावधानी से चलाएं ! अबोध बच्चा उससे अपनी गर्दन काट ले सकता है; काइयां सत्ता उससे अपनी छोड़, हमेशा ही असहमत नागरिक की गर्दन काटती है. यह इतिहाससिद्ध भौगोलिक सच्चाई है. फिर न्यायपालिका इतनी अबोध कैसे हो सकती है कि सत्ता के हाथ में बड़े-से-बड़ा चाकू थमाने की स्वीकृति देती जाए ? 


जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ कहते हैं कि जब भी, जहां भी बहुमतवादी मानसिकता सर उठाती नजर आए, तभी और वहीं उससे रू-ब-रू होना चाहिए, “ ऐसा न करना हमारे पुरुखों ने भारत को जिस संवैधानिक गणतंत्र के रूप में स्वीकार किया था, उस पवित्र अवधारणा से छल होगा.” जिसके हाथ में संविधानप्रदत्त शक्ति है, उस न्यायपालिका के लिए चुनावी बहुमत और संवैधानिक बहुमत का फर्क करना और उसे अदालती फैसले में दर्ज करना आसान है क्योंकि संविधान की संप्रभु जनता ऐसे हर प्रयास में उसके साथ व उसके पीछे खड़ी रहेगी. हम सब जानते हैं कि खड़ा तो अपने पांव पर ही होना होता है, फिर परछाईं भी आपको सहारा देने आ जाती है. ( 20.07.2021)