Showing posts with label gandhi. Show all posts
Showing posts with label gandhi. Show all posts

Friday, 29 January 2021

रिपोर्ताज आंखों देखा गणतंत्र दिवस : 2021

          आजादी के बाद का यह पहला गणतंत्र दिवस था कि जब राजधानी दिल्ली में दो परेड हुई - सदा की तरह एक सरकारी छतरी के नीचे; दूसरी ट्रैक्टरों की छतरी के नीचे. 72वें गणतंत्र दिवस के आते-आते देश इस तरह बंटा हुआ मिलेगा, किसने सोचा था ? यह आज किसानों और गैर-किसानों में, पक्ष और विपक्ष में, लोक और तंत्र में ही बंटा हुआ नहीं है. यह तन और मन से इतनी जगहों पर, इतनी तरह से बंटा हुआ है कि आप उसका आकलन करते हुए घबराने लगें. तिरंगा भी एक नहीं रहा है अन्यथा किसी को लाल किले पर कोई दूसरा झंडा ले कर चढ़ने की जरूरत ही क्यों होती !

         आइटीओ चौराहे पर भावावेश में कांपते उत्तरप्रदेश के किसान सतनाम सिंह ने यही कहने की कोशिश की : “ आप बताओ, गणतंत्र कहते हैं तो गण यहां है कहां ? आप हमें अपनी राजधानी में आने से रोकने वाले कौन हैं ? हमने ही आपको बनाया है और कल हम ही किसी दूसरे को बना देंगे, तो आप नहीं रहोगे लेकिन हम तो रहेंगे. आप हमारा ही अस्तित्व नकार रहे हो?… इतना उत्पात होता ही क्यों अगर आप हमें बेरोक-टोक आने देते. हम बेरोक-टोक आ पाते तो खुद ही परेशान हो जाते कि यहां आ कर करना क्या ? क्या कर लेते यहां आ कर हम ? लेकिन आपने रोक कर, हमारे ट्रैक्टर तोड़ कर, हमारी गाड़ियों के शीशे चूर कर, हम पर लाठियां बरसा कर हमें वह सारा काम दे दिया जिसे अब आप प्रचारित कर रहे हो !” सतनाम सिंह बड़ी भावुकता से बोले : “ इन्होंने उत्तरप्रदेश में हिंदू और सिखों के बीच दरार डालने की कोई कोशिश बाकी नहीं रखी. हिंदुओं के मन में यह विष डालने की कोशिश हुई कि हम सिख लोग किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तान बनाएंगे. हम तो हिंदू भाइयों को लख-लख धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने इस विष का पान नहीं किया, उगल दिया. इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह है आज कि यह हिंदू-सिख-मुसलमान-पारसी-दलित सबको जोड़ कर एक मंच पर ले आया है. भाई साहब, मैं कहता हूं कि हमारा मक्का-मदीना, काबा-कैलाश, खालिस्तान सब यही हिंदुस्तान है. हम दूसरा न कुछ चाहते हैं, न मांगते हैं.” 

         किसान संगठनों ने समांतर ट्रैक्टर रैली की घोषणा की, बड़ी सावधानी से उसकी तैयारी भी की थी लेकिन उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि कितने किसान, कितने ट्रैक्टरों के साथ आ जाएंगे. अंदाजा सरकार को भी नहीं था कि इस किसान आंदोलन की जड़ें कितनी गहराई तक जा चुकी हैं. इसलिए गणतंत्र दिवस की सुबह जब दोनों आंखें मलते उठे तो सूरज सर पर चढ़ चुका था. दिल्ली-गाजीपुर सीमा पर लगा किसान मोर्चा दिल्ली पुलिस से हुई संधि तोड़ कर निकल चुका था - उसने निर्धारित समय और निर्धारित रास्ते का पालन नहीं किया.  वह सीधा दिल्ली की तरफ मुड़ गया. एक टोली मुड़ी तो बाकी ने भी वही किया. इसे ही भीड़ कहते हैं. 

         ट्रैक्टरों का काफिला कैसा होता है, यह न किसानों को मालूम था, न पुलिस को. किसानों ने बहुत देखा था तो दो-चार-दस ट्रैक्टरों को खेतों में जाते देखा था; पुलिस ने तो महानुभावों के कारों की रैली भर देखी थी या फिर अपने साहबों के वाहनों की रैली. इसलिए जब किसानों की ट्रैक्टर रैली दिल्ली की सीमा में घुसी तो हैरानी व अविश्वास से अधिक या अलग कोई भाव पुलिस अधिकारियों के चेहरों पर नहीं था. 

         ट्रैक्टर क्या कहिए, मिनी टैंक बने सारे ट्रैक्टर फिर रहे थे. रास्ते में लगे लोहे की कई स्तरों वाली बैरिकेडें इस तरह ढह रही थीं कि मानो ताश के पत्तों की हों. पुलिस द्वारा लगाए अवरोधों की ऐसी अवमानना किसी मीडिया वाले को बेहद खली और उसने एक संदर्भहीन लेकिन तीखी टिप्पणी की. मुझे तो राजधानी की एेसी घेराबंदी हमेशा ही बहुत खलती रही है, अश्लील लगती रही है. और सत्ता की ताकत से की गई ऐसी हर घेराबंदी खुलेआम चुनौती उछालती है कि कोई इसे तोड़े. इस बार किसानों ने उसे तोड़ ही नहीं दिया, पुलिस-प्रशासन का यह भ्रम भी तोड़ दिया कि यह कोई अनुल्लंघनीय अवरोध है. लोहे के अवरोध हों कि कानून के, तभी तक मजबूत होते हैं और उतने ही मजबूत होते हैं जिस हद तक लोग उसे मानते हैं. एक बार इंकार कर दिया तो लोग एवरेस्ट भी सर कर जाते हैं. शासक-प्रशासन इन गणतंत्र दिवस का यह संदेश याद रखें तो गण का भी और तंत्र का भी भला होगा. 

         लेकिन दिल्ली के ह्रदय-स्थल आइटीओ पहुंचने के बाद राजपथ और लालकिला जाने की जैसी बेसुध होड़ किसानों और उनके ट्रैक्टरों ने मचाई, वह शर्मनाक ही नहीं था, बेहद खतरनाक भी था. कानून-व्यवस्था बनाए रखने का जिम्मा जिन पुलिस वालों पर था वे संख्या में भी और मनोबल में भी बेहद कमतर थे. नौकरी बजाने और आंदोलन का सिपाही होने का मनोबल कितना अलग-अलग होता है, यह साफ दिखाई दे रहा था. सही आंकड़ा तो पुलिस विभाग ही  दे सकता है लेकिन दिखाई दे रहा था कि 500-700 किसानों पर एक पुलिस का अौसत भी शायद नहीं था. संख्या का यह असंतुलन ही ऐसा था कि कैसी भी पुलिस काररवाई बेअसर होती. लेकिन यह भी कहना चाहिए कि पुलिस अधिकारियों ने यह संयम भरा, समझदारी का फैसला किया कि उन्मत्त किसानों को बहुत हद तक मनमानी करने दी. यह नहीं हुआ होता तो 26 जनवरी 2021 को राजधानी दिल्ली का आइटीओ चौक,ठीक गणतंत्र दिवस के दिन, 4 जून 1989 का बीजिंग का ताइमान चौक बन सकता था. हमें इसके लिए सरकार और प्रशासन की प्रशंसा करनी चाहिए. 

         लेकिन इस बात की प्रशंसा कदापि नहीं करनी चाहिए कि उसने ऐसे हालात पैदा होने दिए. किसानों का आंदोलन 2020के जून महीने से गहरी सांसें भरने लगा था जो पिछले कोई 60 दिनों से गरजने लगा था. दिल्ली प्रवेश के तमाम रास्तों पर किसान जमा ही नहीं थे, उन्होंने किसान-नगरी बसा रखी थी.  शहर की एक किलाबंदी सरकारी निर्देश से पुलिस ने कर रखी थी; दूसरी किसानों ने कर रखी थी. कोई राजधानी इस तरह अप्रभावी शासकों और बेसमझ प्रशासकों के भरोसे कैसे छोड़ी जा सकती है ? लेकिन दिल्ली छोड़ दी गई.  देश का सर्वोच्च न्यायालय इस बचकानी व गैर-जिम्मेवारी भरी टिप्पणी के साथ हाथ झाड़ गया कि यह पुलिस पर है वह इनसे कैसे निबटती है. उसे कहना तो यह चाहिए था कि शासन-प्रशासन का यह मामला शासन-प्रशासन निबटे लेकिन आपने कोई संवैधानिक मर्यादा तोड़ी तो हम बैठे हैं ! लेकिन वह आंख-कान-दिमाग व संविधान की किताब बंद कर जो बैठी तो बैठी ही रह गई. सरकारी अमला जितनी मूढ़ता, क्रूरता व काइयांपने से चल सकता था, चलता गया. किसानों के तेवर रोज-ब-रोज कड़े-से-कड़े होते जा रहे थे. निर्णय ले सकने की सरकारी अक्षमता वे समझ गये थे. 10 दौरों की बातचीत में उन्होंने देख लिया था कि सरकार के पास कोई सूझ नहीं है. वार्ता में बात इतनी ही चलती रही कि किसने, क्या खाया; किसने किसका खाया और अगली बैठक कब होगी. किसान पहले दिन से एक ही बात कह रहे थे और अंतिम दिन तक वही कहते रहे कि तीनों कृषि कानून वापस लीजिए और हमें घर जाने दीजिए. किसानों का यह रवैया सही था या गलत बात इसकी नहीं है, सरकार का कोई निश्चित रवैया था नहीं, बात इसकी है. ‘ कानून वापस नहीं होंगे’ कहने के पीछे कोई सरकार का कोई तर्क नहीं था. उसने फर्जी किसान संगठनों को आगे  किया गया, खुद को किसानों का असली हितचिंतक बताया गया और प्रधानमंत्री को अलादीन के चिराग का जिन बताया गया.  हर दिन सरकार यह कह कह निकल जाती रही कि अगली बात फलां याकि फलां तारीख को होगी. लेकिन बात क्या है कि जिसकी बात करनी है, यह बात किसी को मालूम नहीं थी. 

         किसानों को भी मालूम नहीं था कि 26 जनवरी को करना क्या है. जो दीख रहा था वह था किसानों का दिशाहीन जमावड़ा और उन पर बेतरह लाठियां बरसाती, अश्रुगैस के गोले दागती पुलिस ! किसानों ने भी जहां जो हाथ लगा उससे पुलिस पर हमला किया. लेकिन ऐसे वाकये उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. ये किसान कौन थे ? निश्चित ही ये किसान आंदोलन के प्रतिनिधि किसान नहीं थे. वैसा होता तो इनको पता होता कि दिल्ली पहुंच कर इन्हें करना क्या है. तोड़फोड़ की बात भी होती तो वह भी ज्यादा व्यवस्थित व योजनाबद्ध होती. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो किसानों के हाथ में हथियार सरकारी व्यवस्था ने ही मुहैया कराए. लोहे व स्टील के अनगिनत अवरोधों को तोड़-तोड़ कर युवा किसानों ने डंडे बना लिए थे. उन डंडों से कुछ मार-पीट की और कुछ पुलिस वाहनों के शीशे तोड़े. लेकिन कहीं आगजनी नहीं हुई, कहीं गाड़ियां नहीं फूंकी गईं, कहीं पुलिस पर योजनाबद्ध हमले नहीं हुए. जगह-जगह हमें बुजुर्ग, अनुभवी किसान ऐसे भी मिले जो लगातार अपने उन्मत्त युवाओं को रोक रहे थे, उनके हाथ से लोहे के डंडे छीन कर फेंक रहे थे. 

         आइटीओ से लालकिला जाने वाली सड़क के किनारे थके-भरमाए किसानों ने अपने ट्रैक्टर खड़े कर रखे थे. संगरूर से आए किसानों के ऐसे ही एक ट्रैक्टर से मैंने पूछा : “ यह क्या हुआ ? ऐसा करने का कार्यक्रम तो नहीं था ?” एक बुजुर्ग किसान शांति से लेकिन तपाक से बोले : “ था जी, लालकिला पर झंडा लहराने का कार्यक्रम तो पक्का ही था.” मैंने कहा: “ अच्छा !… मुझे तो यह पता नहीं था. देश को तो यही मालूम था कि किसानों की ट्रैक्टर रैली दिल्ली शहर में प्रवेश नहीं करेगी, सरकारी आयोजन में बाधा नहीं डालेगी.  निश्चित अवधि में, निश्चित रास्तों से गुजरती हुई वह अपनी निश्चित जगहों पर लौट जाएगी. आपने वैसा नहीं कर के अपने आंदोलन के पांव पर ही कुल्हाड़ी मारी है.” जो माहौल था और किसानों के जैसे तेवर थे उसमें मेरी ऐसी टिप्पणी पर उन्हें हमलावर हो जाना चाहिए था लेकिन उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी, बोले कुछ नहीं लेकिन सहमति में लगातार सर हिलाया. 

         गाजीपुर के किसान जमघट का एक ग्रुप, जिसे सतनाम सिंह पन्नू का ग्रुप कहा जा रहा था, दीप सिद्दू तथा ऐसे ही दो-एक दूसरे ग्रुप अलग राग अलाप रहे थे. यहीं बड़ी चूक हुई. संयुक्त किसान मोर्चा ने कभी बयान जारी कर इन्हें स्वंय से अलग नहीं किया. वे किसान आंदोलन की इसी बड़ी छतरी में घुसे पनाह पाते रहे. ये भी इतने ईमानदार तो थे कि संयुक्त किसान मोर्चा से अपनी असहमति छिपाई नहीं. पुलिस से हुआ समझौता भी इन्हें कबूल नहीं था और आंदोलन को भी और पुलिस को भी इन्होंने बता दिया था कि वे किसी समझौते से बंधे नहीं हैं- “ हम 26 जनवरी को दिल्ली में प्रवेश करेंगे, लालकिला जाएंगे.” संयुक्त किसान मोर्चा को उनके इस रुख की जानकारी देश को देनी चाहिए थी, पुलिस को लिखित देनी चाहिए थी कि ये लोग हमारे प्रतिनिधि किसान नहीं हैं, आप इनसे निबटिए. ऐसा न करना आंदोलन की चूक थी. 

          सरकार-प्रशासन की चूक हुई कि उसने इनसे निबटने की कोई अलग योजना बनाई ही नहीं. इन सबको 25 जनवरी की रात को ही गिरफ्तार किया जा सकता था. 26 जनवरी की सुबह इनकी ऐसी नाकाबंदी की जा सकती थी कि ये वहां से निकल ही न सकें. प्रशासन ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. क्यों ? क्या कोई धागा था जो इन्हें और सरकार को जोड़ता था ? आंदोलकारी नेतृत्व के मन का चोर शायद यह था कि इनकी ताकत का कोई फायदा आंदोलन को मिल सके तो मिले. सरकारी मन का चोर शायद यह था कि इनकी लाठी से ही आंदोलन को पीटा जाए. इन दो कमजोरियों ने मिल कर वह किया जिसने देश शर्मसार हुआ. किसान नेता योगेंद्र यादव ने घटना के बाद कहा कि हम इनसे स्वंय को अलग करते हैं. यह कहना शोभनीय नहीं था. यह कह कर उन्होंने सयानेपन का परिचय दिया कि हम इसकी नैतिक जिम्मेवारी से बरी नहीं हो सकते. यह लोकतंत्र का बुनियादी पाठ है कि जो लोगों को सड़कों पर उतार लाता है उन्हें अनुशासित रखने की पूरी व एकमात्र जिम्मेवारी उसकी ही है. उसमें विफलता हुई, इसकी माफी देश से मांग लेना सत्याग्रह-धर्म है. 

         26 जनवरी को ही सारे अखबारों, चैनलों ने यह लिखना-कहना शुरी कर दिया कि आंदोलन भटक गया, कि उसका असली चेहरा सामने आ गया. यह 27 को भी जारी रहा. लेकिन कोई यह नहीं लिख रहा है, कोई यह कह नहीं कह रहा है कि संसार भर में क्रांतियां तो ऐसे ही होती हैं. खून नहीं तो क्रांति कैसी ? फ्रांस और रूस की क्रांति का इतना महिमामंडन होता है. उनमें क्या हुआ था ? यह तो गांधी ने आ कर हमें सिखाया कि क्रांति का दूसरा रास्ता भी है. इसलिए किसान आंदोलन का यह टी-20 वाला रूप हमें भाया नहीं है. लेकिन गांधी की कसौटी अगर आपको प्रिय है तो उसे किसानों पर ही क्यों, सरकार पर भी क्यों न लागू करते और प्रशासन पर भी ? किसानों ने आइीटीओ पर पुलिस पर छिटफुट हमला किया इसका इतना शोर है लेकिन पिछले महीनों में दिल्ली आते किसानों पर पुलिस का जो गैर-कानूनी, असंवैधानिक हमला होता रहा उस पर किसने, क्या लिखा-कहा ? सार्वजनिक संपत्ति का कुछ नुकसान 26 जनवरी को जरूर हुआ लेकिन प्रशासन ने सड़कें काट कर, पेड़ काट कर, लोहे और सीमेंट के अनगिनत अवरोध खड़े कर के, चाय-पानी की दूकानें बंद करवा कर, करोड़ों रुपयों का डीजल-पेट्रोल फूंक कर पुलिस व दंगानिरोधक दस्तों को लगा कर सार्वजनिक धन की जो होली पिछले महीनों में जलाई, क्या उस पर भी किसी ने लिखा-कहा कुछ ? जिस तरह ये तीनों कानून चोर दरवाजे से ला कर देश पर थोप दिए गए, क्या उसे भी हिसाब में नहीं लेना चाहिए ? क्या यह भी दर्ज नहीं किया जाना चाहिए कि किसानों ने पहले दिन से ही इन कानूनों से अपनी असहमति जाहिर कर दी थी और फिर कदम-दर-कदम वे विरोध तक पहुंचे थे ? सरकार ने हमेशा उन्हें तिनके से टालना और धोखा देना चाहा. सबसे पहले शरद पवार ने यह सारा संदर्भ समेटते हुए कहा कि यह सब जो हुआ है, उसकी जिम्मेवारी सरकार की है. 

         गांधी ने भी एकाधिक बार अंग्रेजों से कहा था कि जनता को हिंसा के लिए मजबूर करने के अपराधी हैं आप ! यही इस सरकार से भी कहना होगा. पिछले कई सालों से समाज को झूठ, गलतबयानी, क्षद्म की खुराक पर रखा गया है. उन्हें हर मौके पर, हर स्तर पर बांटने-तोड़ने-भटकाने का सिलसिला ही चला रखा गया है. यह जो हुआ है वह इसकी ही तार्किक परिणति है. आप संविधान को साक्षी रख कर गोपनीयता की शपथ लें और अर्नब गोस्वामी से सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामलों की जानकारी बांटें, तो देश का मन कैसा बना रहे हैं आप ? आप मनमानी करें क्यों आपके पास संसद में टुच्चा-सा बहुमत है; तो वह जनता, जो बहुमत की जनक है, वह मनमानी क्यों न करे ? देश-समाज का एक उदार, उद्दात्त व भरोसा कायम रखने वाला मन बनाना पड़ता है जो कुर्सी पर से उपदेश देने से नहीं बनता है. यह बहुत पित्तमार काम है. जनता भीड़ नहीं होती है लेकिन उसके भीड़ में बदल जाने का खतरा जरूर होता है. लोकतंत्र जनता को सजग नागरिक बनाने की कला है. वह कला भले आपको या उनको न आती हो लेकिन जनता को भीड़ में बदलना वह गर्हित खेल है जो समाज का पाशवीकरण करता है, लोकतंत्र को खोखला बनाता है. वह खेल पिछले सालों में बहुत योजनापूर्वक और क्रूरता से खेला गया है. ऐसे खेल में से तो ऐसा ही समाज और ऐसी ही सरकार बन सकती है. 

          पता नहीं कैसे-कैसे खेल खेल कर आप सत्ता की कुर्सी पा गए हैं. फिर आप लालकिला पहुंच जाएं तो वह गरिमापूर्ण है; पिट-पिटा कर किसान लालकिला पहुंचे तो वह गरिमा का हनन है, मीडिया का यह तर्क कैसा है भाई ? मुझे इस बात से कोई एतराज नहीं है कि कोई युवक झंडे के खंभे पर जा चढ़ा और उसने वहां किसानों का झंडा फहरा दिया. एतराज इस बात से है, और गहरा एतराज है कि उसने खालसा पंथ का झंडा भी लगा दिया. यह तो समाज को बांटने के सत्ता के उसी खेल को मजबूत बनाना हुआ न जो धर्म,संप्रदाय आदि को चाकू की तरह इस्तेमाल करती है. किसानों का झंडा देश की खेतिहर आत्मा का प्रतीक है. लालकिला के स्तंभ पर किसी वक्त के लिए उसकी जगह हो सकती है. लेकिन किसी धर्म या संप्रदाय का झंडा लालकिला पर नहीं लगाया जा सकता है. वह किसी नादान युवक की मासूम नादानी थी याकि किसी एजेंट की चाल यह तो पुलिस और किसान आंदोलन के बीच का मामला बन गया है. किसान आंदोलन को आरोप लगा कर छोड़ नहीं देना चाहिए बल्कि इसकी जांच कर, सप्रमाण देश को बताना चाहिए. लालकिला के शिखर पर फहराता तिरंगा किसी ने छुआ नहीं, यह भला हुआ. 

         हमें यह भी याद रखना चाहिए कि गाजीपुर सीमा से चला किसानों का जत्था जिस तरह आदर्शों से भटका, दूसरे किसी स्थान से चला किसानों का जत्था भटका नहीं. सबने निर्धारित रास्ता ही पकड़ा और अपना निर्धारित कार्यक्रम पूरी शांति व अनुशासन से पूरा किया. देश भर में जगह-जगह किसानों ने ट्रैक्टर रैली की.कहीं से भी अशांति की एक खबर भी नहीं आई. सारे देश में इतना व्यापक जन-विरोध आयोजित हुआ और सब कुछ शांतिपूर्वक निबट गया, क्या किसान आंदलन को इसका श्रेय नहीं देंगे हम ?गाजीपुर की चूक शर्मनाक थी. उसकी माफी किसान आंदोलन को मांगनी चाहिए. माफी की भाषा और माफी की मुद्रा दोनों में ईमानदारी होनी चाहिए. हमें भी उसी तरह किसानों की पीठ ठोकनी चाहिए. जैसे पानी में उतर कर ही तैरना सीखा जाता है, वैसे ही उत्तेजना की घड़ी में ही शांति का पाठ पढ़ा जाता है. किसान भी वह पाठ पढ़ रहा है. हम भी पढे़ं. 

         अब सड़क खाली हो चुकी है. किसानों के कुछ ट्रैक्टर यहां-वहां छूटे पड़े हैं. सड़क पर लाठी व हथियारधारी पुलिस का कब्जा है. वह फ्लैगमार्च कर रही है. जीवन की नहीं, आतंक की हवा भरी जा रही है. गणतंत्र दिवस बीत चुका है.  ( 27.01.2021)

 

यह अमरीका : वह अमरीका

                    राजनीतिक रूप से अत्यंत अप्रभावी, सामाजिक रूप से बेहद विछिन्न और आर्थिक रूप से लड़खड़ाते अमरीका के 46 वें राष्ट्रपति बनने के बाद कैपिटल हिल की ऐतिहासिक सीढ़ियों पर खड़े हो कर जो बाइडेन ने जो कुछ कहा वह ऐतिहासिक महत्व का है. क्यों ? इसलिए कि अमरीका के इतिहास का ट्रंप-काल बीतने के बाद बाइडन को जो कुछ भी कहना था वह अपने अमरीका से ही कहना था, और ऐसे में वे जो भी कहते वह ऐतिहासिक ही हो सकता था. जब इतिहास अपने काले पन्ने पलटता है तब सामने खुला नया पन्ना अधिकांशत: उजला व चांदनी समान दिखाई देता है. इसलिए तब खूब तालियां बजीं जब बाइडेन के कहा कि यह अमरीका का दिन है, यह लोकतंत्र का दिन है. यह एकदम सामान्य-सा वाक्य था जो ऐतिहासिक लगने लगा क्योंकि पिछले पांच सालों से अमरीका ऐसे वाक्य सुनना और गुनना भूल ही गया था. यह वाक्य घायल अमरीकी मन पर मरहम की तरह लगा. उनके ही नहीं जिन्होंने बाइडेन को वोट दिया था बल्कि उनके लिए भी यह मरहम था जो पिछले पांच सालों से चुप थे याकि वह सब बोल रहे थे जो उन्हें बोलना नहीं था, जिसका मतलब भी वे नहीं जानते थे. जिन लोगों को उन्मत्त कर ट्रंप ने अमरीकी संसद में घुसा दिया था और जिन्हें लगा था कि एक दिन की इस बादशाहत का मजा लूट लें उन्हें भी नई हवा में सांस लेने का संतोष मिल रहा होगा. लोकतंत्र है ही ऐसी दोधारी तलवार जो कलुष को काटती है, शुभ को चालना देती है. यह अलग बात है कि तमाम दुनिया में लोकतंत्र की आत्मा पर सत्ता के भूख की ऐसी गर्द पड़ी है कि वह खुली सांस नहीं ले पा रहा है. तंत्र ने उसका गला दबोच रखा है.   

         हम पहले से जानते थे कि जो बाइडेन ‘अपने राष्ट्रपति’ बराक ओबाका की तरह मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता नहीं हैं, न वे उस दर्जे के बौद्धिक हैं. वे एक मेहनती राजनेता हैं जो कई कोशिशों के बाद अमरीकी राष्ट्रपति का मुकाम छू पाया है; वह भी शायद इसलिए कि अमरीका को ट्रंप से मुक्ति चाहिए थी. इतिहास ने इस भूमिका के लिए बाइडेन का कंधा चुना. ट्रंप का पूरा काल एक शैतान आत्मा का शापित काल रहा. उन्होंने एक प्रबुद्ध राष्ट्र के रूप में अमरीका की जैसी किरकिरी करवाई वैसा उदाहरण अमरीका के इतिहास में दूसरा नहीं है. तो दूसरा कोई राष्ट्रपति भी तो नहीं है जिस पर दो-दो बार माहाभियोग का मामला चलाया गया हो. ट्रंप बौद्धिक रूप से इतने सक्षम थे ही नहीं कि यह समझ सकें कि जैसे हर राष्ट्रपति का अधिकार होता है कि वह अपनी तरह से अपने देश की नीतियां बनाए वैसे ही उस पर यह स्वाभाविक व पदसिद्ध जिम्मेवारी भी होती है कि वे अपने देश की सांस्कृतिक विरासत व राजनीति शील का पालन करे, उसे समुन्नत करे. इन दोनों को समझने व उनका रक्षण करने में विफल कितने ही महानुभाव हमें इतिहास के कूड़ाघर में मिलते हैं. डंपिंग ग्राउंड केवल नगरपालिकाओं के पास नहीं होता है, इतिहास के पास भी होता है. 

         बाइडेन ने दुनिया से कुछ भी नहीं कहा. यह उनके शपथ-ग्रहण भाषण का सबसे विवेकपूर्ण हिस्सा था. इसके लिए अमरीका को भारतीय मूल के विनय रेड्डी और उनकी टीम को धन्यवाद देना चाहिए जो ओबामा से बाइडेन-कमला हैरिस तक के भाषणों का खाका बनाते रहे हैं. शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद राष्ट्र को संबोधित करने की यह परंपरा अमरीका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंग्टन ने 30 अप्रैल 1789 को शुरू की थी और ‘स्वतंत्रता की पवित्र अग्नि’ की सौगंध खाकर ‘एक नई व आजादख्याल सरकार’ का वादा किया था. अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने राष्ट्रपतियों द्वारा दिया गया अब तक का सबसे छोटा भाषण दिया था - मात्र 135 शब्दों का. सबसे लंबा उद्घाटन भाषण राष्ट्रपति वीलियम हेनरी हैरिसन ने दिया था - 8455 शब्दों का दो घंटे चला भाषण. यह राजनीतिक परंपरा आज अमरीका की सांस्कृतिक परंपरा में बदल गई है. अमरीका आज भी याद करता है राष्ट्रपति केनेडी का वह भाषण जब उन्होंने अमरीका की आत्मा को छूते हुए कहा था : “ मेरे अमरीकन साथियो, यह मत पूछिए कि अमरीका आपके लिए क्या करेगा बल्कि यह बताइए कि आप अमरीका के लिए क्या करेंगे?” 1933 में भयंकर आर्थिक मंदी में डूबे अमरीका से राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने कहा था : “ आज हमें एक ही चीज से भयभीत रहना चाहिए और वह है भय !” 1861 में गृहयुद्ध से जर्जर अमरीका से कहा था राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने : “ मेरे असंतुष्ट देशवासियो, मेरी एक ही इल्तजा है आपसे कि दोस्त बनिए, दुश्मन नहीं !” 2009 में ओबामा ने अपने अमरीका से कहा था : “ यह नई जिम्मेवारियों को कबूल करने का दौर है - हमें अपने प्रति अपना कर्तव्य निभाना है, देश और दुनिया के प्रति अपना कर्तव्य निभाना है और यह सब नाक-भौं सिकोड़ते हुए नहीं बल्कि आल्हादित हो कर करना है.” यह सब दूसरा कुछ नहीं, राष्ट्र-मन को छूने और उसे उद्दात्त बनाने की कोशिश है. बाइडेन जब कहते हैं कि हम एक महान राष्ट्र हैं, हम अच्छे लोग हैं तब वे अमरीका के मन को ट्रंप के दौर की संकीर्णता से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं. जब उन्होंने कहा कि मैं सभी अमरीकियों का राष्ट्रपति हूं- सारे अमरीकियों का; हमें एक-दूसरे की इज्जत करनी होगी और यह सावधानी रखनी होगी कि सियासत ऐसी आग न बन जाए जो सबको जलाकर राख कर दे तो वे गहरे बंटे हुए अपने समाज के बीच पुल भी बना रहे थे और अमरीकियों को सत्ता व राजनीति की मर्यादा भी समझा रहे थे. उन्होंने अमरीकी सीमा के बाहर के लोगों से यानी दुनिया से सिर्फ इतना ही कहा कि हमें भविष्य की चुनौतियों से ही नहीं, आज की चुनौतियों से भी निबटना है. ट्रंप ने आज को ही तो इतना विद्रूप कर दिया है कि भविष्य की बातों का बहुत संदर्भ नहीं रह गया है. 

         बाइडेन के इस सामान्य भाषण में असामान्य था अनुभव की लकीरों से भरे उनके आयुवृद्ध चेहरे से झलकती ईमानदारी. वे जो कह रहे थे मन से कह रहे थे और अपने मन को अमरीका का मन बनाना चाहते थे. वहां शांति, धीरज व जिम्मेवारी के अहसास से भरा माहौल था. उन्होंने गलती से भी ट्रंप का नाम नहीं लिया जैसे उस पूरे दौर को पोंछ डालना चाहते हों. चुनावी उथलापन, खोखली बयानबाजी, अपनी पीठ ठोकने और अपना सीना दिखाने की कोई छिछोरी हरकत उन्होंने नहीं की. यह सब हमारे यहां से कितना अलग था ! गीत-संगीत व संस्कृति का मोहक मेल था लेकिन कहीं चापलूसी और क्षुद्रता का लेश भी नहीं था. यह एक अच्छी शुरुआत थी. लेकिन बाइडेन न भूल सकते हैं न अमरीका उन्हें भूलने देगा कि भाषण का मंच समेटा जा चुका है. अब वे हैं और कठोर सच्चाइयों के सामने खुला उनका सीना है. इनका मुकाबला वे कैसे करते हैं और अमरीका का मानवीय चेहरा दीपित करते हैं, यह हम भी और दुनिया भी देखना चाहती है. हम भी बाइडेन की आवाज में आवाज मिला कर कहते हैं : ईश्वर हमें राह दिखाए और हमारे लोगों को बचाए. ( 20.01.2021)

 

अदालत भाई, जरा समझाओ भाई !

               आंदोलनरत किसानों को जितना सरकार और सरकारी भोंपूओं ने नहीं फटकारा होगा , उसे भी बुरी फटकार देश की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को लगाई. उसे सुनते हुए सरकार को क्या लगा पता नहीं लेकिन हमें बारहा मुंह छिपाना पड़ा. सरकार को भी कोई ऐसा कहता है क्या ! केंद्र सरकार के दूसरे नंबर के सबसे बड़े कानूनी नुमाइंदे बेचारे तुषार मेहता के कान भी जब वैसी फटकार से बजने लगे तो वे फट पड़े : “ अदालत सरकार के प्रति बेहद कठोर शब्दों का प्रयोग कर रही है.” 

                  अदालत तो वैसे ही फटी पड़ी थी, तुषार बाबू की बात से उसका पारा आसमान जा पहुंचा : “ जैसी सच्चाई सामने हमें दिखाई दे रही है उसमें सरकार के बारे में इससे मासूम कोई धारणा बनाई ही नहीं जा सकती है.” बेचारे तुषार बाबू ठगे से देखते-सुनते रह गये. जब दो नंबरी से बात नहीं बनी तो सबसे बड़े कानूनी नुमाइंदे के.के. वेणुगोपाल को सामने आना पड़ा : “ आप सरकार के बनाए किसी कानून पर रोक कैसे लगा सकते हैं ?… आपको धैर्य रखना होगा क्योंकि किसान संगठनों से सरकार की बातचीत जारी है.” इधर वेणुगोपाल की बात खत्म ही हुई थी कि अदालत वज्र की तरह बोली : “ हमें धैर्य धरने का उपदेश मत दीजिए ! आप कानून के अमल पर रोक नहीं लगाएंगे तो हम लगा देंगे…ॅ हमने तो पहले ही सरकार से कहा था कि विवादास्पद कानूनों के अमल पर रोक लगाएं तो किसानों से बातचीत की प्रक्रिया हम आरंभ करें. आपने कोई जवाब ही नहीं दिया… हम रक्तपात की संभावना से चिंतित हैं और हम नहीं चाहते हैं कि हमारे दामन पर भी किसी के खून के छींटे पड़ें !” इतना सब हुआ… और फिर अचानक क्या हुआ कि यह अदालती तेवर खोखली दीवार की तरह भहरा गया ?

अदालत ने अब उन तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगा दी जिनकी वापसी की मांग किसान कर रहे हैं. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई अदालत भाई कि इन कानूनों के अमल पर रोक की मांग किसकी थी ? किसानों ने तो कभी ऐसा कहा-चाहा नहीं. वे तो तीनों कानूनों की वापसी का ही मंत्र जपते आए थे, वही मंत्र जपते हुए जमे हुए हैं. उन्होंने सरकार से भी यही कहा : जब तक कानून वापस नहीं तब तक घर वापसी नहीं ! सरकार ने भी कभी कहा नहीं कि वह कानूनों के अमल पर रोक लगाने के अदालत के सुझाव पर विचार भी कर रही है. अदालत का वह अपना ही अरण्य-रोदन था जिसे उसने फैसले की शक्ल दे दी. अदालत ने ऐसा किस अधिकार के तहत किया ? क्या कल को कोई अदालत कानून बनाने का विधायिका का अधिकार भी अपने हाथ में ले लेगी ? अदालत को पूरा अधिकार है कि वह विधायिका द्वारा बनाए किसी भी कानून की संवैधानिक समीक्षा करे और यदि उसे लगे कि इस कानून को बनाने में सरकार ने संविधान की लक्ष्मण-रेखा लांघी है, तो वह उस कानून को निरस्त कर दे. यही तो करना था अदालत को. वह तीनों कानूनों की संवैधानिकता जांचती, सरकार को भी और किसानों को भी अपना पक्ष रखने को आमंत्रित करती, दूसरे जानकारों को भी सुनती और फिर अपना फैसला सुनाती. वह ऐसा करती तो वह सरकार को भी और किसानों को भी और देश को भी विश्वास में ले पाती. फिर उसका फैसला वैसा आधारहीन नहीं होता जैसा आज है. है कहीं कोई पेंच कि सरकार किसानों का वैसा कल्याण करने पर अड़ी हुई है जिसकी किसानों ने कभी मांग नहीं की; अदालत किसानों को वह देने पर आमादा है जिसकी चाहत किसानों ने नहीं की. ये दोनों ऐसी अहेतुक कृपा क्यों कर रहे हैं ? 

               अदालत ने सरकार को फटकारते हुए कहा था कि वह एक समिति बनाएगी जिसकी अध्यक्षता भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश करेंगे.  इसमें किसानों के प्रतिनिधि, सरकार के प्रतिनिधि और सार्वजनिक जीवन की कुछ ऐसी हस्तियां होंगी जो खेती-किसानी के मान्य जानकार होंगी. ऐसी समिति की मांग किसकी थी ? किसानों की नहीं थी, सरकार की भी नहीं थी. सरकार व किसानों की बीच जमी बर्फ को पिघलाने की यह अदालती युक्ति थी. यह काम कर सकती थी यदि यह सच में वैसी बनती जैसी कही गई थी. लेकिन अदालत ने जो समिति घोषित की उसमें कुछ भी सार नहीं है. ऐसी समिति उसने घोषित ही क्यों की जिसका अध्यक्ष भारत का कोई पूर्व मुख्य न्यायाधीश नहीं है, जिसमें न किसानों के प्रतिनिधि हैं, न सरकार के; सार्वजनिक जीवन का एक भी ऐसा नाम इस समिति में नहीं है  जिसे खेती-किसानी का मान्य जानकार माना जाता हो. मीलार्ड, अपने जो कहा था वह तो किया ही नहीं. यह सरकार भी ऐसा ही करती आई है. यह जो कहती है, वह करती नहीं है. आपको उसकी हवा कैसे लग गई ?  हम आपकी समिति के सदस्यों के बारे में कोई निजी टिप्पणी नहीं करेंगे सिवा इसके कि जो समिति आपने बनाई उससे ज्यादा खोखली और बेपेंदे की कोई समिति सोची भी नहीं जा सकती है. इसमें सारे वे ही लोग हैं जो बात का भात खाते रहे हैं और कागजी खेतों में फसलें उगाते व काटते रहे हैं. 

          साहब, आपने अपनी चूक ( या चाल ? ) छिपाने के लिए यह सफाई दी कि यह समिति आपने अपनी मदद के लिए बनाई है. यह आजादी तो आपको है ही कि आप अपने सलाहकार खुद चुनें ( वैसे कहते हैं कि किसी भी आदमी की असली पहचान इससे होती है कि उसकी मित्र-मंडली किन लोगों की है ! इसी तरह किसी की असली पहचान इससे भी होती है कि वह किनकी सलाह से चलता है.)  आपने अपनी मदद के लिए जिन लोगों को चुना है उनसे जरूर रात-दिन मदद लीजिए लेकिन आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं कि आपके मददगारों की मदद के लिए किसान भी आगे आएं, समाज भी और मीडिया भी आगे आए ? किसान आंदोलन की ताकत, इस आंदोलन का विस्तार, इसका शांतिपूर्ण, कानूनसम्मत चरित्र और इसकी एकसूत्री मांग, सरकार का मनमाना रवैया - इन सबका जिस अदालत को थोड़ा भी इल्म होगा क्या वह ऐसा समाधान पेश कर सकता है जिसके पास न आंख है,न कान और न चलने को पांव ?

         अदालत भाई, आपने ही कहा है न कि किसानों के आंदोलन में महात्मा गांधी के सत्याग्रह की झलक मिलती है. हम जानना चाहते हैं कि आपने रवैये में गांधी की कोई झलक क्यों नहीं मिल रही है ? गांधी का यदि कोई सकारात्मक मतलब है तो अदालत उससे इतनी दूर क्यों नजर आता है ? अदालत में एटर्नी जेनरल ने जब यह गंदी, बेबुनियाद बात कही कि इस आंदोलन में खालिस्तानी प्रवेश कर गए हैं, तब आपको गांधीजी की याद में इतना तो कहना ही था कि हमारी अदालत में ऐसे घटिया आरोपों के लिए जगह नहीं है. वेणुगोपालजी को याद होना चाहिए कि वे जिस सरकार की नुमाइंदगी करते हैं उस सरकार में भ्रष्ट भी हैं, अपराधी भी. उनमें बहुमत सांप्रदायिक लोगों का है. दल-बदलू भी और निकम्मे, अयोग्य लोग भी हैं इसमें. हमने तो नहीं कहा या किसानों ने भी नहीं कहा कि वेणुगोपालजी भी ऐसे ही हैं. यह घटिया खेल राजनीति वालों को ही खेलने दीजिए वेणुगोपालजी. आप अपनी नौकरी भर काम कीजिए तो इज्जत तो बची रहेगी.  किसानों को आतंकवादी, देशद्रोही, खालिस्तानी आदि-आदि कहने में अब तो कम-से-कम शर्म आनी चाहिए क्योंकि यह किसान आंदोलन शांति,सहयोग, संयम, गरिमा और भाईचारे की चलती-फिरती पाठशाला तो बन ही गया है. 

         हरियाणा सरकार केंद्र की तिकड़मों से भले कुछ दिन और खिंच जाए लेकिन वह खोखली हो चुकी है. देश के खट्टर साहबों को भी और इनकी रहनुमा केंद्र सरकार को भी अदालत यह नसीहत देती तो भला होता कि किसानों को उकसाने की या उन्हें सत्ता की ऐंठ  की चुनौती न दें. करनाल में जो हुआ वह इसका ही परिणाम था. किसान गांधी के सत्याग्रह के तपे-तपाए सिपाही तो हैं नहीं. आप उन्हें नाहक उकसाएंगे तो अराजक स्थिति बनेगी. गांधी ने यह बात गोरे अंग्रेजों से कही थी, आज उनका जूता पहन कर चलने वालों से अदालत को यह कहना चाहिए था. लेकिन वह चूक गई. न्याय के बारे में कहते हैं न कि वह समय पर न मिले तो अन्याय में बदल जाता है. अब अदालत को हम यह याद दिला ही दें कि किसान उसका भरोसा इसलिए नहीं कर पा रहे हैं कि उनके सामने ( और हमारे सामने भी !) सांप्रदायिक दंगों और हत्यायों के सामने मूक बनी अदालत है; उनके सामने कश्मीर के सवाल पर गूंगी बनी अदालत है; उसके सामने वह अदालत भी है जो बाबरी मस्जिद ध्वंस और राम मंदिर निर्माण के सवाल पर अंधी-गूंगी-बहरी तीनों नजर आई.  किसान भी देख तो रहे हैं कि औने-पौने आरोपों पर कितने ही लोग असंवैधानिक कानून के बल पर लंबे समय से जेलों में बंद हैं और अदालत पीठ फेरे खड़ी है. भरोसा व विश्वसनीयता बाजार में बिकती नहीं है, न कारपोरेटों की मदद से उसे जेब में रखा जा सकता है. रात-दिन की कसौटी पर रह कर इसे कमाना पड़ता है. हमारी न्यायपालिका ऐसा नहीं कर सकी है . इसलिए किसान उसके पास नहीं जाना चाहता है. वह सरकार के पास जाता रहा है क्योंकि उसने ही इस सरकार को बनाया है और जब तक लोकतंत्र है वही हर सरकार को बनाएगा-झुकाएगा-बदलेगा. अदालत के साथ जनता का ऐसा रिश्ता नहीं होता है. इसलिए अदालत को ज्यादा सीधा व सरल रास्ता पकड़ना चाहिए जो दिल को छूता हो और दिमाग में समता हो.

         अदालत भाई, जरा समझाओ भाई कि आपका दिल-दिमाग से उतना याराना क्यों नहीं है जितना इन खेती-किसानी वालों का है ? ( 14.01.2021)