फौज
के त्यागी की गिरफ्तारी
०
कुमार प्रशांत
मुझे
लग रहा है कि वायुसेवा के पूर्व प्रमुख एस.पी. त्यागी को जिस बात श्रेय दिया जाना
चाहिए, वह नहीं दिया जा रहा है अौर इसलिए मैंने उनके लिए यह लिखने की
जरूरत महसूस की. अाप इस खबर को पढ़ें अौर फिर मुझे बताएं कि अापको कैसा लगता है : “
वायुसेना
के पूर्व प्रमुख एस.पी.त्यागी को ३० दिसंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया
गया !” अगर इस मामले से कोई पूर्व परिचित न हो तो वह दोबारा- तिबारा
इस सुर्खी को पढ़ेगा क्योंकि यह सुर्खी मात्र नहीं है, यह अपने भीतर बहुत
बड़ी दुनिया दबाए बैठी है.
वायुसेना
के पूर्व प्रमुख एस.पी.त्यागी हमारे बड़े संजीदा सेनाधिकारियों में गिने जाते थे -
ईमानदार, साधुवत् ! जिन सेनाधिकारियों के कार्यकाल में कुछ खास युद्धादि
न हुए हों, वे सामान्य तौर पर अचर्चित ही रह जाते हैं. एस.पी.त्यागी वैसे
ही थे : काम-से-काम, बाकी हरिनाम ! अपनी उम्र घटाने-बढ़ाने
जैसे चक्करों में भी वे कभी नहीं पड़े अौर इसलिए राजनीतिक चक्करों में कभी नहीं
पड़े, मंत्री
वगैरह बनने की लालसा भी नहीं पाली. बस, देश-सेवा अौर देश-रक्षा ही उनका
फौज-व्रत रहा. फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का घोटाला-काल सामने अाया
अौर हमने जाना कि अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों की खरीद का भी एक बड़ा घोटाला है.
अौर फिर यह बात भी सामने अाई कि इस घोटाले के घोटालेबाजों में वायुसेना के बड़े
अधिकारी भी शामिल है. बड़े अधिकारियों की दुम पकड़ने के लिए खोज अागे चली तो
त्यागी एस.पी.त्यागी का नाम सामने अाया !
सभी
हैरान, त्यागी एस.पी.त्यागी भी हैरान ! उन्हें भी इस खबर पर विश्वास
नहीं हो रहा था. जांच शुरू हुई अौर त्यागी एस.पी.त्यागी ने उसमें पूरा सहयोग भी
दिया. लेकिन वह कहते हैं न कि जंगल में कहीं दलदल में जा गिरे तो निकलने की
हड़बड़ी में जितने हाथ-पांव चलाअोगे, उतने ही गहरे धंसते जाअोगे. त्यागी
एस.पी. त्यागी के साथ भी वैसा ही हुअा ! वे जांच में सहयोग देते हुए जितना कहते थे,
उससे
ज्यादा छिपाते थे अौर एक-दूसरे को काटने वाली बातें कह कर अपनी निर्लिप्तता का
दावा करते थे. इस तरह वे दलदल में धंसने लगे. फिर तो उनका परिवार भी उसी दलदल में
कहीं धंसा मिला. अाखिरकार उन्हें भी अौर परिवार के सदस्यों को भी गिरफ्तार करना
पड़ा. पहले रिमांड पर रहे अौर अब जेल भेजे गए.
अब
बाकी कहानी जब लिखी जाएगी तब हम सब देखेंगे लेकिन अभी तो यह देखिए कि मामला फौज का
है जिसे अाज की सरकार देशभक्ति की अाखिरी मंजिल बताते नहीं थकती ! फौज को कुछ मत
कहो… फौज
की तरफ कभी मत देखो… फौज की किसी बात के बारे में कुछ बात न
पूछो; तुमने
ऐसा कुछ किया तो तुरंत तुम्हारी देशभक्ति संदिग्ध मान ली जाएगी … सवाल मत खड़े करो अौर
शक मत करो ! … अाज की सरकार हो कि दूसरी कोई सरकार,
ऐसा
कह कर अौर ऐसा तेवर दिखा कर दरअसल वह खुद को बचाना चाहती है. सरकारें जानती हैं कि
लोगों की ज्यादा पूछ-ताछ उसके लिए भी कभी भी खतरा बन सकती है. इसलिए
वह लोगों को जानने-पूछने-देखने से रोकती है.
फौज
भी एक पेशा है जिसमें लोग नौकरी करने जाते हैं; फौज में नौकरी करना
एक परंपरा है जिसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी गर्व से पालन किया जाता है. भारत सरकार भी
फौजों में नौकरी के लिए लुभावने विज्ञापन निकालती है अौर कहती है कि यह पेशा बहुत
शानदार है ! हम सब भी फौज की बहुत इज्जत करते हैं, हम सब भी उससे बहुत
भावात्मक लगाव रखते है. ‘हकीकत’ अौर ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्में बनाते
भी हैं अौर उसे देख-देख कर अांसू भी बहाते हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि ये हमारे
देश के रक्षक हैं बल्कि इसलिए भी कि ये हमारे ही हैं - हमारे घर के ! यह सब होते
हुए भी, यह भी तो उतना ही सच है कि यह एक पेशा है जिसमें सभी किस्म के
लोग अाते हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमियों के लोग
अाते हैं, अलग-अलग मंशा से लोग अाते हैं. फौज की परंपरा, उसका प्रशिक्षण अौर
उसका सख्त अनुशासन घिस-घिर कर हर नौजवान को फौजी बना देता है लेकिन वह हर फौजी को
देशभक्त भी बना दे, यह वैसे ही संभव नहीं है कि जैसे हर
नागरिक को ईमानदार बना देना या हर राजनीतिज्ञ को नैतिक बना देना संभव नहीं है. हम
कैसे भूल सकते हैं कि सामान्य फौजी से ले कर फौज के कितने ही उच्चाधिकारियों तक को
देशद्रोह के मामलों में, जासूसी के अारोपों में पकड़ा गया है.
देश
की गुप्त जानकारियां ‘दुश्मनों’ को बेचते कितने ही
फौजी पकड़े गए हैं. यह भी गौर करने की बात है कि एेसी वारदातों में साधारण सिपाही
कम, अधिकारी
ज्यादा पकड़े गए हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हमारी फौज की नैतिक भित्ती खोखली है
लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि फौजी होने का मतलब तमाम इंसानी कमजोरियों-चूकों से
ऊपर उठ जाना होता है. इसलिए जैसी सबकी होती है वैसी ही फौजियों की भी लोकतांत्रिक
जांच-पड़ताल होती ही रहनी चाहिए. इसमें चूक होती है या इसकी अनदेखी होती है तो
राजनीतिक अौर नौकरशाह लोग तानाशाही की तरफ जाते हैं याकि घोटालों के दलदल में
डूबते जाते हैं; कॉरपोरेट जगत मुनाफाखोरी में अंधा हो कर
देश-समाज का सौदा करने लगता है अौर फौज देशरक्षा के अावरण में देशद्रोही करतबों
में लग जाती है. अाखिर हम ही तो हैं कि जो फौज में जा कर फौजी, राजनीति में जा कर
देश के सेवक अौर काम-धंधे में जा कर कॉरपोरेट बन जाते हैं. हम जब कहीं जाते हें तो
अपनी कमियों-कमजोरियों को ले कर ही जाते हैं. इसलिए फौज की भी; फौजियों की भी,
सरकारी
तंत्र की भी अौर इस पूरी श्रृंखला की भी लोकतांत्रिक
जांच-पड़ताल हमेशा चलती रहनी चाहिए अौर उसका दवाब सब पर होना ही चाहिए.
फौज
को लोक से या लोकतंत्र से बड़ा बना कर पेश के पीछे कहीं खुद को अोट में ले जाने की
कोशिश तो नहीं है ? यह भी अौर वह भी, दोनों ही लोकतंत्र को
समान रूप से कमजोर करते हैं. लोकतंत्र को कमजोर करने से बड़ा भी देशद्रोह भी कुछ
होता है क्या ? ( 20.12.2016)
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