Friday, 31 March 2023

1930 और 2023

    लड़ाई मैदान में थी- एकदम आमने-सामने की ! युद्ध के इस मैदान से महात्मा गांधी ने देश से अौर वाइसराय से दो अलग-अलग बातें कहीं थी : देश से कहा कि अब साबरमती आश्रम लौटूंगा तभी जब आजादी मेरे हाथ में होगी- कुत्ते की मौत भले मरूं लेकिन आजादी बिना आश्रम नहीं आऊंगा; दूसरी तरफ वाइसराय को खुली चुनौती दी कि आपको अपना नमक कानून रद्द करना ही पड़ेगा! आग दोनों तरफ लगी थी, और ऐसे में किसी अमरीकी अखबार वाले ने ( आज के ‘मीडिया वाले’ जरा ध्यान दें !) ने पूछा, “ इस लड़ाई में आप दुनिया से क्या कहना चाहते हैं ?” तुरंत कागज एक की पर्ची पर गांधी ने लिखा : “आई वांट वर्ल्ड सिंपैथी इन दिस बैटल ऑफ राइट एगेंस्ट माइट : मैं सत्ता की अंधाधुंधी बनाम जनता के अधिकार की इस लड़ाई में विश्व की सहानुभूति चाहता हूं !”

पत्रकार भारत का कोई ‘राहुल गांधी’ नहीं था, सीधा अमरीका का था; लड़ाई चुनावी नहीं थी, साम्राज्यवाद के अस्तित्व की थी; लेकिन दिल्ली में बैठे वाइसराय ने या लंदन में बैठे उनके किसी आका ने नहीं कहा कि गांधी भारत के आंतरिक मामले में विदेशी हस्तक्षेप को बुलावा दे रहे हैं. 

ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ कि गांधी ने भारत की आजाद की लड़ाई में दुनिया ने विभिन्न नागरिकों को उनकी भूमिका निभाने का आमंत्रण दिया. उन्होंने सारे ब्रितानी नागरिकों को, सारे अमरीकियों को खुला पत्र लिखा कि वे भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष को ठीक से समझें तथा अपनी सरकारों पर दवाब डालें कि वह इस लड़ाई में हमारा समर्थन करे, क्योंकि सत्य व अहिंसा के रास्ते लड़ी जा रही इस लड़ाई से विश्व का व्यापक हित जुड़ा है. कभी कहीं से ऐसी चूं भी नहीं उठी कि गांधी को माफी मांगनी चाहिए कि उन्होंने विदेशी ताकतों को हमारे आंतरिक मामले में हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित किया.

ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी व उसकी सरकार को यह इतिहास मालूम नहीं है लेकिन उसे यह भी तो मालूम है कि इस इतिहास को बनाने में उसका कोई हाथ नहीं है. इसलिए प्रधानमंत्री से नीचे तक का कोई भी इस इतिहास का जिक्र नहीं करता है. वे लगातार वही राग अलापते हैं जो बार-बार हमें बताता है कि जिन्हें वह राग ही नहीं मालूम है, उन्हें गान कैसे समझ में आएगा ! 

राहुल गांधी ने लंदन में जो कुछ कहा, उसमें उनके माफी मांगने जैसा कुछ है ही नहीं; बल्कि वे माफी मांगेंगे तो बड़े कमजोर व खोखले राजनेता साबित होंगे; क्योंकि भारत के लोकतंत्र के जिस वैश्विक आयाम की बात उन्होंने वहां उठाई, उसने मेरे जैसे लोकतंत्र के सिपाहियों को मुदित किया कि राहुल हमारे लोकतंत्र के इस आयाम को समझते भी हैं, तथा उसे इस तरह अभिव्यक्त भी कर सकते हैं. यह छुद्र दलीय राजनीति का मामला नहीं है इसलिए पार्टीबाज इसे न समझेंगे, न समझना चाहेंगे. यह मामला सीधा लोकतंत्र की अस्मिता का है. भारतीय लोकतंत्र का यही वह आयाम है जिसे बांग्लादेश संघर्ष के वक्त जयप्रकाश नारायण ने सारी दुनिया से कहा था : लोकतंत्र किसी देश का आंतरिक मामला नहीं हो सकता है. उसका दमन सारे संसार की चिंता का विषय होना चाहिए. 1975 में, चंडीगढ़ की अपनी राजनीतिक नजरबंदी के दौरान जयप्रकाश ने इंदिरा गांधी को पत्र लिख कर यही समझाना चाहा था. इंदिराजी ने उसे तब नहीं समझा था, राहुल गांधी को जरूरत लगती है कि लोकतंत्र का दम भरने वाले दुनिया के देश उसे अब समझें. लंदन में उनकी बात का यही संदेश था.  

भारत ने जब से संसदीय लोकतंत्र अपनाया है, उसके बाद से कोई 75 साल बीत रहे हैं कि वह इस रास्ते से विचलित नहीं हुआ है. उसके साथ या उससे आगे-पीछे स्वतंत्र हुए अधिकांश देशों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ कर कोई दूसरा रास्ता पकड़ लिया है. विचलन हमारे यहां भी हुआ है, लेकिन गाड़ी लौट कर पटरी पर आती रही है. आज हमारे लोकतंत्र का अंतरराष्ट्रीय आयाम यह है कि यहां यदि यह कमजोर पड़ता है या इसका संसदीय स्वरूप बदल कर कुछ दूसरा रूप लेता है तो संसार भर में लोकतंत्र की दिशा में हो रही यात्रा ठिठक जाएगी या दूसरी पटरी पर चली जाएगी. संसदीय लोकतंत्र के हमारे प्रयोग के अब अंतरराष्ट्रीय आयाम उभरने लगे हैं. हमारा यह प्रयोग लोकतंत्र की तरफ नये देशों को खींचने का कारण बन रहा है. सत्ता के अतिरेक व सत्ताधीशों की सत्तालोलुपता के खिलाफ सभी तरह के जनांदोलनों के प्रतीक गांधी बन जाते हैं, यह अकारण नहीं है. हमने अपने लोकतंत्र की स्थापना व उसके संचालन में जहां गांधी की बेहद उपेक्षा की है वहीं हम भी व दुनिया भी यह समझ पा रही है कि गांधी लोकतंत्र की पहचान हैं. 

हम देख रहे हैं कि दुनिया भर में दक्षिणपंथ की लहर-सी उठी हुई है. वामपंथ या उस जैसा तेवर रखने वाली सत्ताएं, संसदीय लोकतंत्र को तोड़-मरोड़ कर सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने में लगी सरकारें बिखर जा रही हैं अौर सत्ता पर सांप्रदायिक, धुर जाहिल-पुराणपंथी तत्व काबिज हो रहे हैं. ऐसे में हमारा संसदीय लोकतंत्र किसी प्रकाश-स्तंभ की तरह है. वही आशा है कि यह लहर लौटेगी तो संसदीय लोकतंत्र के किनारों पर ठौर पाएगी. 

लंदन में राहुल ने इसे हमारे लोकतंत्र का अंतरराष्ट्रीय संदर्भ बताते हुए पश्चिमी लोकतांत्रिक शक्तियों को आगाह किया कि अपना संसदीय लोकतंत्र बचने का हम जो प्रयास कर रहे हैं, उसे आप सही संदर्भ में समझें और उसके हित में खड़े हों. आज सब बाजार के आगे सर कटा-झुका रहे हैं. सबसे तेज अर्थ-व्यवस्था या ५ खरब की अर्थ-व्यवस्था जैसी बातों में किसी प्रकार का राष्ट्रीय गौरव दिखाने वाले लोग यह छिपा जाते हैं कि ऐसा कुछ पाने के लिए संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा व प्रकृति के विनाश की लक्ष्मण-रेखा पार करनी होगी. इसकी इजाजत हम किसी को कैसे दे सकते हैं कि वह लोकतंत्र के मृत चेहरे को इतना सजा दे कि वह जीवित होने का भ्रम पैदा करने लगे ? हम मानवीय चेहरे वाला वह लोकतंत्र बनाना चाहते हैं जो अपने हर घटक को जीने का समान अवसर व सम्मान दे कर ही स्वंय की सार्थकता मानता है. यहां गति दम तोड़ने वाली नहीं, समरसता बनाने वाली होगी - प्रकृति व जीवन के बीच समरसता !  

राहुल ने जो कहा उसके दो ही जवाब हो सकते हैं : भारत सरकार लोकतांत्रिक मानदंडों को झुका कर, खुद को उनके बराबर बताने का क्षद्म बंद करे. वह अपना लोकतांत्रिक व्यवहार व प्रदर्शन इतना ऊंचा उठाए कि उसका अपना लोकतांत्रिक चारित्र्य उधर कर सामने आए. राहुल को तीसरा कोई जवाब दिया नहीं जा सकता है. 

1930 और 2023 के बीच इतनी बड़ी खाई नहीं बनाएं हम. ( 25.03.23)        

मेरी आवाज सुनो !

 सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ गया कि अब चुनाव आयोग का चयन तीन सदस्यों की एक समिति करेगी, न कि प्रधानमंत्री के इशारे पर नौकरशाही के चापलूसों का पत्ता फेंटकर इसका चयन किया जाएगा. यह फैसला तब तक लागू रहेगा जब तक संसद इसके लिए कोई नया कानून बना कर देश के सामने नहीं रखती है. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि न्यायपालिका ने विधायिका को उसकी भूमिका भी और उसकी मर्यादा भी इस तरह आदेश दे कर समझाई है. 

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद से सत्तापक्ष में एकदम सन्नाटा है. विपक्ष ने भी थोड़ी-बहुत प्रतिक्रिया से ज्यादा कुछ नहीं कहा है. ऐसा सन्नाटा क्यों है भाई ? इसलिए है कि सभी जान रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों के पर कतर रहा है.  जिस हम्माम में सब नंगे हों उसमें तौलिये की बात करना सबकी नंग खोल देता है. 

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सत्तापक्ष की नीयत पर कठोर टिप्पणी करता है. यह टिप्पणी इतनी कठोर व मर्म पर चोट करने वाली है कि यदि हमारी व्यवस्था में थोड़ी भी लोकतांत्रिक आत्मा बची होती तो चुनाव आयोग के वर्तमान अध्यक्ष का इस्तीफा कब का हो गया होता. सरकार का यदि कोई लोकतांत्रिक चरित्र होता तो उसने इस फैसले के तुरंत बाद वर्तमान चुनाव आयोग को भंग कर दिया होता तथा प्रधानमंत्री-नेता विपक्ष-प्रधान न्यायाधीश की समिति ने रातोरात बैठ कर नया चुनाव आयोग गठित कर दिया होता. ऐसा हुआ होता तो सत्ता पक्ष को अपनी विकृत लोकतांत्रिक छवि सुधारने का तथा चुनाव आयोग को अपनी हास्यास्पद स्थिति से बचने का मौका मिल जाता.  लेकिन जो लोकतांत्रिक आत्मा कहीं बची नहीं है, उसकी कोई लहर उठे भी तो कैसे ? हमारी संसद में भी इतनी नैतिक शक्ति बची नहीं है कि वह खुद को सुधार सके, बे-पटरी हुई अपनी गाड़ी को पटरी पर लौटा सके. 

लोकतंत्र का पेंच यह है कि वहां संसद बनती भले है बहुमत के बल पर, चलती है परस्पर विश्वास व सहयोग के बल पर. ऐसा नहीं होता तो भारतीय संसद के इतिहास में अब तक सबसे बड़े बहुमत से जो दो सरकारें बनी हैं - इंदिरा गांधी व राजीव गांधी की- वे ताश के पत्तों-सी बिखर नहीं जातीं. इसलिए लोकतांत्रिक नैतिकता का तकाजा है कि संवैधानिक संस्थाएं एक-दूसरे की सुनें, एक-दूसरे का सम्मान करें. 

जिस संसदीय लोकतंत्र की रजत जयंती मानने की हम तैयारी कर रहे हैं, वह इतने वर्षों में हमें यह भी नहीं सिखा सकी है कि हमारी सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं संविधान के गर्भ से ही पैदा हुई हैं. इसलिए इनमें कोई संप्रभु नहीं है. संप्रभु है इस देश की जनता जिसने अपना संविधान बना कर, अपने ऊपर लागू किया है. तो वह संविधान सबका पिता है. पिता के संरक्षण का दायित्व सबका है लेकिन न्यायपालिका उसकी खास प्रहरी है. 

संविधान ने जितनी संस्थाएं बनाई हैं उनमें से किसी को उसने संप्रभु नहीं बनाया है बल्कि इन सबका परस्परावलंबन निर्धारित किया है. सबकी दुम एक-दूसरे से बांध दी है. विधायिका कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था है; न्यायपालिका उन कानूनों की वैधता जांचने वाली सर्वोच्च संस्था है; न्यायपालिका का कोई भी निर्णय संसद पलट सकती है लेकिन संसद कोई भी ऐसा निर्णय नहीं ले सकती है जिससे हमारे संविधान का बुनियादी ढांचा प्रभावित होता हो; और यह फैसला सिर्फ, और सिर्फ न्यायपालिका कर सकती है कि कब, कहां और किसने यह लक्ष्मण-रेखा पार की है.                                

कार्यपालिका विधायिका के निर्देश पर काम करती है लेकिन वह पे-प्रमोशन-पेंशन के पीछे भागती चापलूसों की जमात नहीं है. असंवैधानिक निर्देश मानने के लिए वह लाचार नहीं है. उसमें अनैतिक व असंवैधानिक निर्देश मानने से इंकार करने का नैतिक बल होना चाहिए. वह न्यायपालिका की मदद लेने को भी स्वतंत्र है. 

लोकतंत्र के विकास-क्रम में एक चौथा खंभा भी विकसित हुआ है जिसे आज मीडिया कहते हैं. स्वतंत्रता, साहस व विवेक के तीन खंभों पर यह मीडिया टिका हुआ है जो स्वायत्त व स्वतंत्र तो है लेकिन अपने लिखे-बोले-दिखाए हर शब्द के लिए वह समाज, न्यायपालिका व संसद के प्रति जवाबदेह भी है. इन चारों के बीच यह गजब की स्वायत्ता व गजब का परस्परावलंबन है जो संविधान ने रचा है. इसके आलोक में सारी संवैधानिक संस्थाओं को अपना आकलन करना चाहिए.    

इस आलोक में हमें अपनी न्यायपालिका को देखना चाहिए तथा न्यायपालिका को इस आईने में अपनी सूरत देखनी चाहिए. हम जब इस आलोक में अपनी न्यायपालिका को देखते हैं तो हमें अफसोस होता है; न्यायपालिका जब इस आईने में खुद को देखेगी तो डर जाएगी. मनुष्य बहुत सारी कमजोरियों का पुतला है- इस हद तक कि यह कहावत ही बन गई है कि गलती करना मनुष्य होने की पहचान है - टू इर इज ह्यूमन ! यह जानने व मानने के बाद हमने ही कुछ ऐसी संस्थाएं बनाईं, कुछ ऐसे पद बनाए जिनकी नैतिक जिम्मेवारी है कि वे सामान्य मनुष्यों की सामान्य कमजोरियों से ऊपर उठ कर सोचें व व्यवहार करें. जेबकतरा लोभ व बेईमानी की मानवीय कमजोरी का एक उदाहरण है. वह भीड़ का फायदा उठा कर जेब काटता है. उससे नागरिक व पुलिस निबटते ही रहते हैं. लेकिन पुलिस ही जेबकतरा बन जाए तो हम क्या करेंगे ? इसलिए जरूरी है कि पुलिस का ऐसा प्रशिक्षण किया जाए, उसमें ऐसा दायित्व-बोध भरा जाए कि वह सामान्य मानवीय कमजोरियों से ऊपर उठ कर काम करे. जब पुलिस ऐसी कल्पना पर खरी नहीं उतरती है तो हम उसके  प्रशिक्षण की नई योजना पर काम करते हैं. सारे पुलिस आयोग इसी कोशिश में बने हैं. 

ऐसा ही विधायिका के साथ भी है, न्यायपालिका के साथ भी है और कार्यपालिका के साथ भी है. इनकी निरंतर पहरेदारी होनी चाहिए - आंतरिक भी और वाह्य भी ! हमारी न्यायपालिका खुद की पहरेदारी कैसे करती है ? उसने चुनाव आयोग के गठन के बारे में जो फैसला आज दिया है क्या वह बीमारी उसे आज दिखाई दी है? यह तो पहले दिन से ही हमें दिखाई दे रहा था कि चुनाव यदि संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा अवलंबन है तो उसकी निगरानी करने वाली संस्था को मजबूत, आत्मनिर्भर तथा सत्तानिरपेक्ष बनाना जरूरी है. जो हमें दिखाई दे रहा था वह न्यायपालिका को क्यों नहीं दिखाई दिया ? उसका यह अपराध बहुत संगीन हो जाता है क्योंकि संविधान ने उसे यही जिम्मेवारी दी है कि वह संवैधानिक संस्थाओं की ऐसी हर कमजोरी पर नजर रखे, उसे जांचे-परखे और उसे ठीक करने की ठोस पहल करे. अपने वक्त में शेषन साहब ने यह दिखलाया भी था कि चुनाव आयोग यदि साहसपूर्ण स्वतंत्रता से काम करता है तो संसदीय लोकतंत्र को संभालने में कितनी मदद मिलती है. न्यायपालिका ने वह संकेत क्यों नहीं समझा ? उसने उस दिशा में क्यों काम नहीं किया ? बीमारी इतनी बिगड़ जाए कि मरीज मरणासन्न हो जाए, यह डॉक्टर की विफलता है. मरणासन्न मरीज को बचा कर वाहवाही लूटने से यह बात छिपाई नहीं जा सकती है कि आप अपनी प्राथमिक जिम्मेवारी में विफल हुए हैं. ऐसा ही न्यापालिका के साथ भी हो रहा है. 

हमारी न्यायपालिका सामान्य मानवीय कमजोरियों की गिरफ्त में इस कदर है कि वह सामान्यत: मनुष्य जितना संयम, समझदारी व साहस दिखा पाता है, उतना भी नहीं दिखा पाती है. वह सत्ता से डरती है, वह सत्ता की कृपाकांक्षी होती है, वह केरियररिस्ट है, वह पार्टीबाजी की घटिया मानसिकता की शिकार है. वह मुकदमा जीतने के लिए शील व विवेक की कीमत नहीं करती है. संक्षेप में कहूं तो वह मानवीय कमजोरियों से ऊपर उठने का कोई तरीका विकसित नहीं कर सकी है. 

राहुल गांधी लंदन में क्या कहते हैं इस पर चिल्ल-पों करने वाले इस पर क्यों चुप्पी साध लेते हैं कि हमारा लोकतंत्र क्या कहता है ? वह संवैधानिक ऑक्सीजन की मांग कर रहा है.  वह कह रहा है कि मेरी आवाज सुनो! ( 18.03.2023)

Saturday, 18 February 2023

यात्राओं से आगे की यात्रा

 बात राहुल गांधी से शुरू करूं या या इतिहास से ? इतिहास से ही करता हूं क्योंकि जो इतिहास का संदर्भ नहीं समझते हैं, वे बहुत जल्दी इतिहास बन जाते हैं. इसलिए राहुल गांधी की पदयात्रा को देखने से पहले भारतीय संस्कृति की तरफ देखते हैं जिसकी अपनी एक यात्रा निरंतर चलती रहती है.  हम यह ध्यान रखें कि जब हम यात्रा की बात करते हैं तो वह सफर से अलग मतलब रखती है.  

  ईश्वर से दिए पांवों से अलग, चलने के दूसरे साधन जब तक मनुष्य ने खोजे नहीं थे, तब तक पांवों उसका सबसे बड़ा व भरोसे का साथी था. प्राचीन ऋषियों-मुनियों-साधकों आदि का इतिहास हम न भी खंगालें तो भी यह देखना कितना लोमहर्षक है भारत को चार खूटों में बांधने की शंकराचार्य की यात्रा हो कि धर्मप्रवर्तन की गौतम बुद्ध की यात्रा या तीर्थंकर महावीर का परिभ्रमण हो, भारत ने पदयात्राओं से ही खुद को आकार लेते, संस्कारवान होते पाया है. नवीन सत्य के उद्घाटन के लिए हो या सत्य से वृहद् समाज को जोड़ने के लिए हो या अपनी संस्कृति का उद्बोध जगाने के लिए हो, पदयात्राएं इस देश की संस्कृति का अधिष्ठान रही हैं. ऐसा संसार में दूसरी जगहों पर नहीं मिलता है या बहुत ही कम मिलता है.  

महात्मा गांधी के रूप में हमें एक ऐसा संस्कृति-पुरुष मिला जिसने प्राचीनतम व नवीनतम का सेतुबंध किया और ताउम्र हमारे मन-प्राणों को झकझोर कर आधुनिक बनाने का उद्यम किया. उस गांधी को हम सुदूर दक्षिण अफ्रीका में मिल मजदूरों को ले कर वह कूच करते पाते हैं जिसे रोकने-समझने में जनरल स्मट्स की गोरी सरकार बला की भोंदू नजर आई. गांधी के संदर्भ में हम बार-बार ऐसा होते पाते हैं. फिर हम 1930 में महात्मा गांधी को नमक सत्याग्रह के वक्त एक लंबी पदयात्रा करते पाते हैं जब वे साबरमती आश्रम से निकल कर, 388 किलोमीटर दूर दांडी के समुद्र तट तक जाते हैं. इस छोटी-सी पदयात्रा ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जैसी धार व उत्कटता दी, उसका दूसरा कोई सानी नहीं है. 

इसके बाद क्षितिज पर उभरते हैं आचार्य विनोबा भावे ! उन्होंने जिस तरह भूदान की पदयात्रा की, वह ‘न भूतो न भविष्यति’ की श्रेणी का उपक्रम था. वह ज्ञात इतिहास में ऐसी एकमात्र पदयात्रा है  जिसका एक ही उद्देश्य था : अहिंसक क्रांति के लिए देश का मन तैयार करना ! क्रांति के मूल्यों को ले कर समाज से वैसी टक्कर लेने वाला दूसरा कोई अब तक सामने नहीं आया है. विनोबा के शब्दों में कहू तो यह विचार-क्रांति का तूफ़ान था. 

 इसके बाद भी यात्राओं या पदयात्राओं के दूसरे कुछ उदाहरण भी मिलते हैं जैसे बाबा आमटे की भारत जोड़ो यात्रा जिसने आजादी के बाद युवाओं को उनकी सामाजिक जिम्मेवारियों का व्यापक अहसास कराया. एक लंबी यात्रा जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे राजनेता चंद्रशेखर ने भी की जिसमें वे अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते रहे. बाद में वे अल्पकाल के लिए देश के प्रधानमंत्री भी बने. पद के लिए पदयात्रा जैसे कुछ छिटपुट उदाहरण और भी मिलेंगे लेकिन जाने-अनजाने में राहुल गांधी ने इन सबसे अलग एक नया परिदृश्य रचा. 

वे ऐसे वक्त, एक ऐसी पदयात्रा पर निकले जिसकी देश की हवा में कहीं भनक भी नहीं थी.  राहुल गांधी और कांग्रेस की उनकी टीम ने भी पदयात्रा की तैयारी वगैरह की जितनी भी बारीक योजना बनाई हो तथा अनुशासन आदि तैयार किया हो, यह तो नहीं सोचा था कि यह लोगों में ऐसी हलचल पैदा करेगा. किसी को भी यह अंदेशा नहीं था - राहुल गांधी को भी नहीं - कि यह पदयात्रा कांग्रेस को व देश को इस तरह आलोड़ित कर देगी. 

इस पदयात्रा का सत्ता में वापसी जैसा कोई उद्देश्य होगा, यह मानना संभव नहीं है. आज कांग्रेस जिस तरह टूट व चुक चुकी है उसके बाद यह सोचना कि एक पदयात्रा से वह इस कदर उठ खड़ी होगी कि सीधा दिल्ली में गद्दीनशीं हो जाएगी, खतरनाक बचकानापन है. राहुल गांधी में ऐसा बचकानापन नहीं है. इसलिए पूरी यात्रा में कहीं भी, कभी भी राहुल गांधी ने कांग्रेस की वापसी या अपनी सत्ता की बात नहीं की. उन्होंने जो बात सबसे ज्यादा की और इस यात्रा का जो परिणाम सबसे दृश्य है आज,वह यह है कि देश का सामान्य विमर्श कुछ बदला हुआ लगता है. जो बात कहीं से भूली जा रही थी, वह जैसे याद आने लगी है. हिंदुत्व की जैसी विषैली व्याख्या और उसका जैसा वीभत्स चेहरा पिछले वर्षौं में सामने आया है, उससे सारे देश में एक सन्नाटा छा गया था. जो बोलना था वह एक ही व्यक्ति को बोलना था, जो करना था वह उन्मत्त भीड़ को करना था. बाक़ी किसी के पास कुछ कहने व करने जैसा बचा नहीं था. जनता को जब आप भीड़ में बदल देते हैं तो वह लोक की भूमिका से विमुख हो जाती है. यह डर का सन्नाटा भी था और विमूढ़ता का सन्नाटा भी था. 

ऐसा तब होता है जब समाज को कोई रास्ता नहीं मिलता है. तब डर कर चुप हो जाता है. रास्ता दिखाने वाला कोई सामने नहीं होता है, तो रास्ता भटक जाना स्वाभाविक होता है. बच्चा भी भटक जाता है जब घर उसे रास्ता नहीं दिखा पाता है. इसलिए बहुत जरूरी होता है कि देश का राजनीतिक तंत्र जैसे भी, जिधर भी चले, लोक के स्तर पर एक प्रगतिशील नेतृत्व सामाजिक पटल पर मजबूती से खड़ा भी रहे तथा जनता से सीधे संपर्क में भी रहे. ऐसा नहीं होता है तो लोकतंत्र सिकुड़ कर तंत्रलोक बन जाता है जिसमें सबसे वाचाल सियारों का हुआं-हुआं होता रहता है.  ऐसा ही हाल हमारा हो गया था. राहुल गांधी की पदयात्रा ने यह सन्नाटा तोड़ा है. एक भिन्न आवाज आज अपनी जगह बनाने लगी है. यह पूरी तरह सजग नहीं है, इसे खतरों का पूरा अहसास नहीं है. लेकिन जो संभावना टूटती-सी लग रही थी, जो लौ बुझती-सी लग रही थी, वह फिर सर उठा रही है. 

यह लोकतंत्र का लोक है जिसने इस यात्रा के दौरान अपनी आंखें खोली हैं या कहूं कि जिसने सारा परिदृश्य नई तरह से देखना-समझा शुरू किया है. लेकिन यह भी खूब ठीक से समझने की जरूरत है कि राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस को भी और  विपक्ष को भी अपने अस्तित्व की लड़ाई अलग से लड़नी होगी.  यह यात्रा भारतीय जनता पार्टी को भी यह संकेत दे रही है कि सत्ता का सुख चाहे जितना लुभावना हो, सत्ता में शक्ति जनता से आती है. सत्ता जनता से मिलती है तथा जनता की आराधना से ही वह टिकती है. यह बात न कांग्रेस भूले, न भारतीय जनता पार्टी, सारा विपक्ष ! मतलब यात्रा से आगे भी एक यात्रा है जिसे पूरी एकाग्रता से पूरी किए बिना किसी भी राजनीतिक दल का कल्याण संभव नहीं है. ( 10.02.2023)

छोटे देश का बड़ा आदमी

 कोई 50 लाख की आबादी वाला छोटा-सा देश न्यूजीलैंड आज कुछ बड़ा दिखाई दे रहा है, तो इसलिए कि किसी ने  उसे बड़ा होने का मतलब सिखलाया है. कितना बड़ा होने का ? … आदमकद ! वहां एक लड़की रहती है- जसिंडा केट लॉरेल आर्डर्न. कल तक वह न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री हुआ करती थी, आज नहीं है. 37 साल की उम्र में वह न्यूजीलैंड की और संसार की सबसे युवा प्रधानमंत्री बनी थीं और कोई साढ़े 5 साल तक प्रधानमंत्री बनी रहीं. फिर किसने उनको हराया ? किसने उन्हें हटाया ? संसद ने ? विपक्ष ने ? उसके अपने दल ने ? क्या उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा ? क्या अदालत ने उन्हें हटाया ? फौजी बगावत हुई ? आप ऐसे कितने ही सवाल पूछेंगे, लेकिन उन सबका जवाब होगा - नहीं ! 

जसिंडा अब प्रधानमंत्री नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने खुद ही प्रधानमंत्री नहीं रहने का फैसला किया. उन्होंने अपने देश को बताया : “ मैं एकदम खाली हो गई हूं. भीतर ऐसा कुछ बचा ही नहीं है कि जो मैं न्यूजीलैंड को दे सकूं. यदि मैं अब भी प्रधानमंत्री बनी रहती हूं तो यह न्यूजीलैंड की कुसेवा होगी. मैं यह पद छोड़ रही हूं… मैं आशा करती हूं कि मैं न्यूजीलैंड को बता सकी हूं कि आप मजबूत हो कर भी दयालु हो सकते हैं, सहानुभूतिपूर्ण रहते भी निर्णायक हो सकते हैं, आशावान रहते हुए, प्रतिकूलताओं से अविचलित रह सकते हैं. और यह भी कि आप अपनी तरह का नेतृत्व दे सकते हैं - ऐसा नेतृत्व कि जो जानता हो कि कब उसे पीछे हट जाना चाहिए.”

यह नई बात है. हम तो देश-दुनिया में ऐसे नेतृत्व की हुंकार सुनने के आदी हो गए हैं जो कहता है कि हम तो अगली सदी तक राज करेंगे; कई नेता तो ऐसे हैं जिन्होंने कहना-सुनना छोड़ कर ऐसी संवैधानिक व्यवस्थाएं बना ली हैं कि वे जब तक रहेंगे, कुर्सी पर ही रहेंगे. कई हैं कि जो हर उस सर  को कलम कर देने की सावधानी बरतते हैं जो कभी उनके कद का हो सकता है. जेसिंडा के लिए भी ऐसा करना मुश्किल नहीं था. उन्होंने वैसा कुछ नहीं किया बल्कि अपनी लेबर पार्टी से कह दिया कि अब अपना नया नेता चुनिए. पार्टी ने क्रिस हिपकिंस को अपना नया नेता चुना तो जरूर लेकिन चाहा कि जेसिंडा उनके लिए एजेंडा तय कर दें. जेसिंडा ने इससे भी इंकार कर दिया, “ उन्हें अपनी समझ और अपने अनुभव से चलना है. मैं उनके लिए रास्ता बंद कैसे कर सकती हूं .” 

जेसिंडा की यही खास बात है. 1917 में जब लेबर पार्टी ने उनको अपना नेता व देश का प्रधानमंत्री चुना, तब से ले कर आज तक, जब वे न अपनी पार्टी की नेता हैं, न प्रधानमंत्री, जेसिंडा हमेशा नई जमीन तोड़ती रही हैं. 1918 में वे संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा को संबोधित करने पहुंचीं थीं तब उनकी गोद में उनकी बेटी थी. गोद में बेटी को ले कर वैश्विक मंच पर कौन खड़ा होता है ? सभी हैरान थे ! ऐसा नहीं था कि जेसिंडा से पहले कोई महिला राष्ट्रप्रमुख संयुक्त राष्ट्रसंघ को संबोधित करने आई नहीं थी लेकिन मातृत्व को ऐसी सहजता से दुनिया के मंच पर किसी ने स्थापित नहीं किया था. वे न्यूजीलैंड का वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी संभालती हैं, इसकी ऐसी सहज घोषणा कर जेसिंडा ने संसार भर की महिलाओं को आत्मविश्वास दिया था. संयुक्त राष्ट्रसंघ को भी नई नजर से जेसिंडा को देखना पड़ा था. मानव-मन में नई सभ्यता ऐसे ही पांव धरती है.  

2019 में न्यूजीलैंड को जैसे किसी ने तलवार की धार पर चढ़ा दिया ! आतंकवाद ने वहां पहली गंभीर दस्तक दी. एक श्वेत आतंकवादी ने दो मस्जिदों में अंधाधुंध गोलियां चला कर 50 से अधिक मुसलमान नागरिकों की हत्या कर दी और गोरे न्यूजीलैंड को अपने साथ खड़ा होने के लिए ललकारा भी. हर मुल्क में ऐसे आतंकवादी हमलों का जवाब पुलिस-फौज ही देती है. जेसिंडा ने इसका राजनीतिक जवाब दिया. वे बुरका पहन कर मस्जिद में पहुंच गईं, मृतकों के आंसू पोंछे, उनके परिजनों की सरकारी व्यवस्था की, घायलों के इलाज का इंतजाम किया और यह स्पष्ट घोषणा की कि न्यूजीलैंड अपने सभी नागरिकों का है. आतंकवादियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा : “ तुमने हमें अपने साथ बुलाया है तो तुम सुन लो कि मैं तुम्हें और तुम्हारे आमंत्रण को अभी, यहीं से खारिज करती हूं.” इतना ही नहीं, सारे विपक्ष को साथ ले कर उन्होंने हथियारों की सार्वजनिक उपलब्धता के खिलाफ कानून भी पारित करवाया. न्यूजीलैंड आतंकवाद की कगार से उस दिन वापस लौटा तो अब तक वहीं खड़ा है. 

फिर सारी दुनिया कोरोना की सुनामी से घिरी. न्यूजीलैंड भी उसकी चपेट में आया. जेसिंडा के नेतृत्व की परीक्षा थी. जेसिंडा ने सरकार की पूरी ताकत और मातृत्व का पूरा खजाना ही खोल दिया. मानवीय स्पर्श के साथ आवश्यक सख्ती भी हुई. न नागरिकों को मौत के भरोसे छोड़ने जैसी अमानवीयता हुई वहां, न मौत के घबराए लोगों का बेजा इस्तेमाल किया गया. पश्चिमी दुनिया में यह लड़ाई सबने लड़ी लेकिन न्यूजीलैंड में मौत की दर सबसे कम रही. उसके चेहरे पर कोरोना के जहरीले पंजों के निशान भी सबसे कम दिखाई दिए. कहते हैं कि उन दिनों न्यूजीलैंड में करोना ज्यादा फैला था कि जेसिंडा, कहना कठिन था. नये प्रधानमंत्री क्रिस हैपकिंस उसी कोरोना-युद्ध की पैदावार हैं. इसी दौर में न्यूजीलैंड पर प्राकृतिक आपदा भी आई लेकिन जेसिंडा ने देश का हाथ कभी नहीं छोड़ा. 

ऐसा नहीं है कि जेसिंडा को हर मामले में सफलता ही मिली. कई विफलताएं भी उनके खाते में लिखी हुई हैं. न्यूजीलैंड संसार का सबसे महंगा मुल्क है. महंगाई सबको दबोचे हुई है. लोगों को घरों की बड़ी किल्लत है, और घर बनाने का सरकारी दावा पूरी तरह विफल रहा है. बच्चों की दुरावस्था न्यूजीलैंड की बहुत बड़ी व करुण समस्या है. सामाजिक-आर्थिक विषमता से वहां का समाज बुरी तरह जकड़ा है. ऊपर के 10%लोगों की मुट्ठी में देश के 50% से अधिक संसाधन हैं. राजनेता ऐसा मानते हैं कि सत्ता व सरकार के पास जादू की छड़ी है. इसलिए सभी सत्ता पाने को बेचैन रहते हैं. वे देश से वादा भी करते हैं कि सत्ता में आए तो जादू कर देंगे. लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें पता चलता है कि सत्ता के पास कितनी सीमित सत्ता है. अपने लिए सुविधाएं-संपत्ति जोड़ने की बात अलग है लेकिन समाज के लिए बहुत कुछ कर सकने की क्षमता व संभावना इस व्यवस्था में है नहीं. महात्मा गांधी ने इसे ही समझाते हुए स्वतंत्र भारत के शासकों से कहा था :  “ कुर्सी पर मजबूती से बैठो लेकिन कुर्सी को जकड़ कर मत रखो ( सिट ऑन इट टाइटली बट होल्ड इट लाइटली !” ). हमारे शासक करते इससे एकदम उल्टा हैं. जसिंडा ने ऐसा नहीं किया. जब तक कुर्सी पर रहीं, मजबूती से, मूल्यों को पकड़ कर रहीं; जब लगा कि अब कुछ नया करने जैसा अपने पास है नहीं तो कुर्सी खाली कर दी. 

इसलिए वे दूसरों से एकदम अलग नजर आ रही हैं. युवकों का नेतृत्व उम्र से ही नहीं, नजरिए से भी नया हो सकता है. शर्त है तो यही कि युवा कंधे पर बूढ़ा सर न हो ! जेसिंडा इसका उदाहरण हैं. ( 25.01.2023)

चुनाव जीतते दल : हारता लोकतंत्र

 लोकतांत्रिक प्रसव वेदना से गुजर रहे दिल्ली, हिमाचलप्रदेश व गुजरात के गर्भ से चुनाव-परिणाम का जन्म हो चुका है. अब सारे सर्जन, डॉक्टर, नीमहकीम अपने आरामगाहों में लौट चुके हैं. जिन चैनलों की नाल कब की कट चुकी है, वे सब चुनाव परिणामों के विश्लेषण के नाम पर आपसी छीछालेदर में लगे हैं. यह छपने या सुनने वाले मीडिया के सबसे बदरूप चेहरे को बर्दाश्त करने का, सबसे शर्मनाक दौर है.  

 हर चुनाव में कोई दल जीतता है, कोई हारता है. इस चुनाव में भी यही हुआ है. लेकिन पार्टियां ऐसे दिखा रही हैं कि हारा तो दूसरा है, हमारे हिस्से तो जीत-ही-जीत आई है ! आम आदमी पार्टी इसी का राग अलाप रही है कि इस चुनाव ने उसे राष्ट्रीय दल बना दिया है; कांग्रेस अपनी नहीं, दूसरों की हार का विश्लेषण करने में निपुणता दिखा रही है; भाजपा के प्रधान भोंपू ने इशारा कर दिया तो सारे भाजपाई एक ही झुनझुना बजा रहे हैं कि हमने सारे रिकार्ड तोड़ डाले ! सबकी एक बात सही है कि सभी अपना झूठ छिपा रहे हैं. 

चुनाव परिणाम का कोई नाता अगर उस लोकतंत्र से भी होता हो कि जिसके कारण चुनावी राजनीति व संसदीय लोकतंत्र का अस्तित्व बना हुआ है, तो हमें यह खूब समझना चाहिए कि दल जीत रहे हैं, ‘हम भारत के लोग’ और उनका लोकतंत्र लगातार हारता जा रहा है. संविधान अब एक पुराने जिल्द की रामायण भर बची है जिसका राम कूच कर गया है. कौन, क्या जीता इसकी इतनी वाचाल चर्चा की जा रही है ताकि किसी को याद करने की फुर्सत न रहे कि हम कहां, क्या हार रहे हैं.   हम चुनावों की संवैधानिक पवित्रता व उसका राजनीतिक अस्तित्व हार रहे हैं; हम चुनाव आयोग हार रहे हैं; हम चुनावों की आचार संहिता हार रहे हैं; हम बुनियादी लोकतांत्रिक नैतिकता हार रहे हैं. हम हर वह नैतिक प्रतिमान हार रहे हैं जिसके आधार पर हमारा संविधान बना है; हम हर वह लोकतांत्रिक मर्यादा हार रहे हैं जिसके बिना लोकतंत्र भीड़बाजी मात्र बन कर रह जाएगा. हर चुनाव में जातीयता जीत रही है, धार्मिक उन्माद जीत रहा है, धन-बल व सत्ता-बल जीत रहा है; झूठ व मक्कारी जीत रही है. यह तस्वीर को काली करने जैसी बात नहीं है; तस्वीर को ठीक से देखने-समझने की बात है. 

गुजरात हम सबके लिए गहरे सबब का विषय होना चाहिए. इसलिए नहीं कि वह एक ही पार्टी को लगातार से चुन रहा है बल्कि इसलिए कि वह गर्हित कारणों से लगातार अविवेकी फैसला कर रहा है और देश की तमाम लोकतांत्रिक ताकतें मिल कर भी उसे इस मूर्छा से बाहर नहीं ला पा रही हैं. गुजरात उस हाल में पहुंचा दिया गया है जिस हाल में, यूरोप में कभी जर्मनी पहुंचा दिया गया था. जब जहर नसों में उतार दिया जाता है तब ऐसी की अंधता जन्म लेती है. दुनिया ने भी और हमने भी ऐसी अंधता पहले भी देखी है बल्कि कहूं तो हमारी आजादी अंधता के ऐसे ही दौर में लिथड़ी हम तक पहुंची थी. गांधी ने ऐसे ही नहीं कहा था कि ऐसी आजादी में उनकी सांस घुटती है; और हम जानते हैं कि अंतत: उनकी सांस टूट ही गई. 

गुजरात में देश के गृहमंत्री कहते हैं कि 2002 में हमने यहां जो सबक सिखलाया, उसका परिणाम है कि यहां आज तक शांति बनी हुई है. वे देश को खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि सांप्रदायिक नरसंहार का रास्ता हम जानते हैं, यह भूलना मत ! यह शर्मनाक है, लोकतंत्र के खात्मे का एलान है, संविधान की आत्मा की हत्या है. वे सैकड़ों सभाओं-रैलियों व रोड-शो में यह सब कहते रहे लेकिन न चुनाव आयोग ने कुछ कहा, न न्यायालय ने ! संविधान ने अपने इतने हाथ-पांव इसलिए ही तो बनाए थे कि एक विकलांग होने लगे तो दूसरा उसकी जगह ले ले; एक गूंगा होने लगे तो दूसरा बोले ! यहां तो सभी विकलांग, गूंगे और बहरे बनते जा रहे हैं. 

गुजरात का सामूहिक नैतिक पतन हुआ है. यह सारे देश में हो रहा है. दिल्ली नगरपालिका के चुनाव में खेल का मैदान ही बदल दिया गया; गुजरात में चुनाव आयोग ने अपना अनुशासन ही ताक पर रख दिया. झूठ, मक्कारी, सरकारी संसाधनों व धन-बाहुबल से चुनाव जीतने का प्रपंच किसे नहीं दीखा ?लोकतंत्र और चुनाव-तंत्र में फर्क है. तभी तो संवैधानिक व्यवस्था ऐसी बनाई गई कि चुनाव को 5 साल में एक बार आना है, लोकतंत्र को रोज-रोज अपने चरित्र में उतारना है. मन लोकतांत्रिक बने तो व्यवहार अपने आप लोकतंत्र अपनाने लगता है. चुनाव लोकतंत्र की आत्मा नहीं, उसका एक अंशमात्र है. यहां तो चुनाव को ही लोकतंत्र बना दिया गया है जिसमें अपने प्रधान को आगे रख कर सारी पैदल सेना उतारी जाती है; और वह पुरानी मान्यता शब्दश: अमल में लाई जाती है कि प्यार व युद्ध में सब कुछ जायज है. यह लोकोक्ति ही लोकतांत्रिक नहीं है.

संसदीय लोकतंत्र एक चीज है, संवैधानिक लोकतंत्र एकदम भिन्न चीज है. एक ढांचा है, दूसरी आत्मा है. आत्मा मार कर, ढांचा जीत लिया है हमने; और मरे हुए लोकतंत्र को बड़े धूमधाम से ढो रहे हैं. तभी तो हर असहमति को डांट कर कहते हैं : ‘ वोट हमें मिला है !’ भीड़ की स्वीकृति लोकतंत्र की अंतिम कसौटी नहीं होती है. हम कैसे भूल सकते हैं कि हमारी गुलामी को भी भीड़ की स्वीकृति थी. आजादी की लड़ाई लड़ने वाले तब भी अल्पमत में थे. इसलिए लोकतंत्र की दिशा भीड़ को शिक्षित, जाग्रत जनमत में बदलने की होती है. हम सोचें कि हमारी आजादी की लड़ाई के गर्भ से अगर लोकतंत्र का जन्म नहीं हुआ होता तो चुनाव का यह सारा तामझाम भी नहीं होता न ? तो बुनियाद कहें कि अंतिम कसौटी कहें, लोकतंत्र ही है कि जिसका संरक्षण-संवर्धन करना है. वह बना रहा, स्वस्थ व गतिशील रहा तो बाकी सारा कुछ रास्ते पर आ जाएगा. 

इसलिए कह रहा हूं कि इन चुनावों में पार्टियां जीती हैं, हम ‘भारत के लोग’ व हमारा लोकतंत्र हारा है. यह हार हमें बहुत महंगी पड़ेगी. ( 11.12.2022) 

                                                                                                                                     

नदव लापिद की ‘कश्मीर फाइल्स’

 जिस तरह का सच यह है कि आईना झूठ नहीं बोलता, उसी तरह का सच यह भी है कि कैमरा झूठ नहीं बोलता. इसे हम इस तरह भी समझ सकते हैं कि सच प्राकृतिक है; झूठ गढ़ना पड़ता है- फिर वह झूठ सौंदर्य प्रसाधनों से बोला जाए या खुराफाती-स्वार्थी इंसानी दिमाग से ! गोवा में आयोजित भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आखिरी दिन, महोत्सव की जूरी के अध्यक्ष इस्राइली फिल्मकार नदव लापिद ने यही बात कही - न इससे कम कुछ, न इससे अधिक कुछ ! इसके बाद गर्हित राजनीति का जो वितंडा हमारे यहां फूट पड़ा, वह भी इसी सच को मजबूत करता है कि सच घटे या बढ़े तो सच ना रहे / झूठ की कोई इंतहा ही नहीं. 

   इतिहास बनाना इंसानी साहस की चरम उपलब्धि है; इतिहास को विकृत करना मानवीय विकृति का चरम है. हम दोनों ताकतों को एक साथ काम करते देखते हैं. इंसानी व सामाजिक जीवन में कला की एक अहम भूमिका यह भी है कि वह इन दोनों के फर्क को समझे व समझाए ! जो कला ऐसा नहीं कर पाती है वह कला नहीं, कूड़ा मात्र होती है. इसलिए कोई पिकासो ‘गुएर्निका’ रचता है, कोई चार्ली चैपलिन ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ बनाता है, कोई एटनबरो ‘गांधी’ ले कर सामने आता है. अनगिनत पेंटिंगों, फिल्मों के बीच ये अपना अलग व अमर स्थान क्यों बना लेती हैं? इसलिए कि युद्ध की कुसंस्कृति को, विकृत मन की बारीकियों को तथा इंसानी संभावनाओं की असीमता को समझने में ये फिल्में हमारी मदद करती हैं. तो कला की एक सीधी परिभाषा यह बनती है कि जो मन को उन्मुक्त न करे, उद्दात्त न बनाए वह कला नहीं है. 

   दूसरी तरफ वे ताकतें भी काम करती हैं जो कला का कूड़ा बनाती रहती हैं ताकि सत्य व असत्य के बीच का, शुभ व अशुभ के बीच का, उद्दात्तता व मलिनता के बीच का फर्क इस तरह उजागर न हो जाए कि  ये ताकतें बेपर्दा हो जाएं. विवेक की इसी नज़र से गोवा फिल्मोत्सव में बनी जूरी को 14 अंतरराष्ट्रीय फिल्मों को देखना-जांचना था. लापिद इसी जूरी के अध्यक्ष थे. जूरी में या उसके अध्यक्ष के रूप में उनका चयन सही था या गलत, इसका जवाब तो उन्हें देना चाहिए जिनका यह निर्णय था लेकिन 5 सदस्यों की जूरी अगर एक राय थी कि ‘कश्मीर फाइल्स’ किसी सम्मान की अधिकारी नहीं है, तो इस पर किसी भी स्तर पर, किसी भी तरह की आपत्ति उठना अनैतिक ही नहीं है, घटिया राजनीति है जिसका दौर अभी हमारे यहां चल रहा है. 

   लापिद ने जूरी के अध्यक्ष के रूप में महोत्सव के मंच से जब ‘कश्मीर फाइल्स’ को ‘अश्लील शोशेबाजी’ ( ‘वल्गर प्रोपगंडा’ का यह मेरा अनुवाद है) कहा तब वे कोई निजी टिप्पणी नहीं कर रहे थे, जूरी में बनी भावना को शब्द दे रहे थे. जूरी के बाकी तीनों विदेशी सदस्यों ने बयान दे कर लापिद का समर्थन किया है. भारतीय सदस्य सुदीप्तो सेन ने अब जो सफाई दी है वह बात को ज्यादा ही सही संदर्भ में रख देती है : “ यह सही बात है कि यह फिल्म हमने कला की कसौटी पर खारिज कर दी. लेकिन मेरी आपत्ति अध्यक्ष ने बयान पर है जो ‘कलात्मक’ नहीं था. ‘वल्गर’ व ‘प्रोपगंडा’ किसी भी तरह कलात्मक अभिव्यक्ति के शब्द नहीं हैं.”  मतलब साफ है कि ‘कश्मीर फाइल्स’ कहीं से भी कला से सरोकार नहीं रखती है, इस बारे में जूरी एकमत थी. ऐसा क्यों था, इसकी सबसे गैर-राजनीतिक सफाई जो कोई भी अध्यक्ष दे सकता था, लापिद ने दी. उन्हें यह बताना ही चाहिए था कि क्यों जूरी ने उन्हें सौंपी गई 14 फिल्मों में से मात्र 13 फिल्मों में से ही अपना चयन किया, और 14वीं फिल्म को फिल्म ही नहीं माना ? जूरी के अध्यक्ष लापिद का धर्म था कि वे यह बताते. जिन शब्दों में लापिद ने वह बताया, वह कहीं से भी राजनीतिक, गलत, अशोभनीय या कला की भूमिका को कलंकित करने वाला नहीं था. 

   हमारे यहां ही कला-साहित्य-पत्रकारिता का आसमान इन दिनों इतना कायर व कलुषित हो गया है कि वहां कला व सच की जगह बची नहीं है. जूरी के विदेशी सदस्यों ने अपने बयान में इसे पहचाना है : “ हम लापिद के बयान के साथ खड़े हैं और यह साफ करना चाहते हैं कि हम इस फिल्म की विषयवस्तु के बारे में अपना कोई राजनीतिक नजरिया बताना नहीं चाहते हैं. हम केवल कला के संदर्भ में ही बात कर रहे हैं और इसलिए महोत्सव के मंच का अपनी राजनीति के लिए व नविद पर निजी हमले के लिए जैसा इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे हम दुखी हैं. हम जूरी का ऐसा कोई इरादा नहीं था.” 

   जब नविद से पूछा गया कि जिस फिल्म को जूरी ने किसी सम्मान के लायक नहीं माना, उस फिल्म पर आपको कोई टिप्पणी करनी ही क्यों चाहिए थी, नविद ने बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी बात रखी. यह कहने की जरूरत नहीं है कि ईमानदारी से खूबसूरत कलात्मक अभिव्यक्ति दूसरी नहीं होती है. नविद ने कहा : “ हां, आप ठीक कहते हैं, जूरी सामान्यत: ऐसा नहीं करती है. उनसे अपेक्षा यह होती है कि वे फिल्में देखें, उनका जायका लें, उनकी विशेषताओं का आकलन करें तथा विजेताओं का चयन करें. लेकिन तब यह बुनियादी सावधानी रखनी चाहिए थी कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्में महोत्सव के प्रतियोगता खंड में रखी ही न जाएं. दर्जनों महोत्सवों में मैं जूरी का हिस्सा रहा हूं, बर्लिन में भी, केंस में भी, लोकार्नो और वेनिस में भी. इनमें से कहीं भी, कभी भी मैंने ‘द कश्मीर फाइल्स ’ जैसी फिल्म नहीं देखी. जब आप जूरी पर ऐसी फिल्म देखने का बोझ डालते हैं, तब आपको ऐसी अभिव्यक्ति के लिए तैयार भी रहना चाहिए.”

   सारा खेल तो यही था. यह सरकारी आदेश था या आयोजकों की स्वामी भक्ति का खुला प्रदर्शन था, यह तो वे ही जानें लेकिन चाल यह थी कि झांसे में एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सरकारी क्षद्म का यह चीथड़ा दिखा लिया जाए. जूरी मेजबानी के दवाब में आ कर अगर इसे सम्मानित कर दे, तो बटेर हाथ लगी; हाथ नहीं लगी तो दुनिया भर में हम अपना प्रचार दिखा गए, यह उपलब्धि तो हासिल होगी ही. नविद ने यह सारा खेल बिगाड़ दिया. इसलिए हमने देखा कि नविद को भारत स्थित इसराइल के राजदूत से गालियां दिलवाई गईं. जिन ‘अनुपम’ शब्दों में ‘ द कश्मीर फाइल्स’ गैंग ने नविद का शान-ए-मकदम किया, वह कला के चेहरे पर गर्हित राजनीति का कालिख मलना तो था ही, अंतरराष्ट्रीय कला बिरादरी में भारत को अपमानित करना भी था. ( 05.12.2022)

Monday, 14 November 2022

‘सेवा’ वाली ‘इला’

पढ़ कर यह जानना-समझना पूरी तरह संभव नहीं है कि गांधी की गढ़ी महिला कैसी होती थी !  क्योंकि गांधी तो अब हैं नहीं - पिछले 75 सालों से नहीं हैं - कि जो बनाते जाते और हम देखते जाते कि कैसी बनीं थीं मृदुला साराभाई या सरोजिनी नायडू या सुशीला नैयर या आभा या मनु या प्रभावती ? कैसे जानें हम कि ये सब कैसी बनी थीं; और फिर यह भी कि ये सब कैसे बनी थीं ? किताबों के अलावा हमारे पास कुछ दूसरा होता ही कैसे ? हम तो उनके बहुत बाद पैदा हुए हैं. गांधी भी तो हम किताबों में ही खोजते-पाते रह जाते यदि गांधी कुछ ऐसे लोगों को अपने नमूने की तरह हमारे बीच छोड़ न जाते कि जिनको देखो तो कुछ अंदाजा लगा सकोगे कि गांधी के गढ़े आदमी कैसे होते थे! और यह बारीक बात भी तो वे ही हमसे कह गए न कि अब ऐसा कोई एक व्यक्ति तो होगा नहीं कि जो मेरा पूरा प्रतिनिधित्व कर सके लेकिन कुछ लोग ऐसे होंगे कि जो मेरा कुछ अंशों में प्रतिनिधित्व कर सकेंगे. तो विनोबा, जयप्रकाश, काका साहब, दादा धर्माधिकारी, धीरेंद्र मजूमदार जैसे कुछ और जवाहरलाल, सरदार, लोहिया, राजेंद्र बाबू जैसे कुछ नमूने हमने देखे. जो किताबों में पाया हमने और जो इनमें देखा हमने उससे कुछ अंदाजा लगाया कि गांधी की चाक कैसे चलती थी व कैसा गढ़ती थी. 

  सेवा वाली इला भी ऐसा ही एक नमूना थीं. गांधी ने सीधे उन्हें नहीं गढ़ा था, गांधी ने उन्हें छुआ था वैसे ही जैसे महानात्माएं हमें दूर से छूती हैं और गहरे आलोकित करती हैं. जहां तक मैं जानता हूं, 7 सितंबर 1933 को जनमी और 2 नवंबर 2022 को जिस इला भट्ट का अवसान हुआ, उन्हें कभी गांधी का सीधा साथ नहीं मिला और न वे गांधी आंदोलन में शरीक ही रहीं. होना संभव भी नहीं था. वकील पिता तथा महिलाओं के सवालों पर सक्रिय मां की बेटी इला तब 15 साल की थीं और स्कूलों-कॉलेजों की सीढ़ियां चढ़ रही थीं जब गांधी मारे गए. इसलिए उनके जीवन में गांधी को किसी पिछले दरवाजे से ही दाखिल होना था. वे उसी तरह दाखिल हुए भी. उनके साथ मिल-बैठ कर, बातें करते हुए मुझे सहज महसूस होता था कि यह गांधी की आभा से दीपित आत्मा है. वे छोटी कद-काठी की थीं, धीमी,मधुर आवाज में बोलती थीं जिसमें तैश नहीं, तरलता होती थी लेकिन आस्था की उनकी शक्ति न दबती थी, न छिपती थी. बहस नहीं करती थीं बल्कि बहसें उन तक पहुंच कर विराम पा जाती थीं क्योंकि आत्मप्रत्यय से प्राप्त एक अधिकार उनकी बातों में होता था. वे तर्कवानों की बातों की काट नहीं पेश करती थीं. काटना या तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने जैसे हथियारों का वजन उठाना उनके व्यक्तित्व के साथ शोभता ही नहीं था लेकिन एक मजबूत इंकार की अभिव्यक्ति में वे चूकती भी नहीं थीं. सादगी की गरिमा अौर आत्मविश्वास का साहस उनमें कूट-कूट कर भरा था. 

  साबरमती आश्रम को ले कर विवाद खड़ा हुआ था. तब हुआ यूं था कि अचानक ही आज की सरकार ने 12 सौ करोड़ रुपयों की थैली साबरमती आश्रम में शांत-निर्द्वंद्व  सोये गांधी के सिरहाने रख दी थी और शोर मचा दिया कि यहां से उठिए श्रीमान मोहनदास करमचंद गांधीजी कि हम इस आश्रम को ‘वर्ल्ड क्लास’ बना कर ही दम लेंगे ! शोर उठा; शोर का आयोजन करवाया गया. ऐसी विषाक्त हवा बनी कि जो आश्रम के ट्रस्टी थे वे गांधी के ‘ट्रस्ट’ की कीमत पर, सरकार का ‘ट्रस्ट’ खरीदने को तैयार हो गए. गांधी का ‘ट्रस्टी’ होना एक नैतिक दायित्व को वहन करने के साहस का नाम है, यह वे भूल ही गए. वे किसी व्यावसायिक कंपनी की मुनीमगिरी में लग गए. जब गांधी की नैतिकता का जुआ ढोने का साहस व कूवत न बची हो तो गांधी को प्रणाम कर, स्वंय को पीछे कर लेने का विवेक कहां से बचेगा ! 

  “ गांधी जैसे थे और जैसे हैं वैसे ही वर्ल्ड क्लास हैं; कि हम सरकार के साथ मिल कर उन्हें वर्ल्ड क्लास बनाने का आयोजन करेंगे ?” मेरे सवाल पर वे कहीं गहरे में विचलित हुईं. वे ही साबरमती आश्रम ट्रस्ट की अध्यक्ष थीं. वैधानिक दायित्व भी उनका ही था और नैतिक दायित्व भी ! “ लेकिन मैं क्या करूं?”उनकी आवाज की व्यग्रता मैं सुन भी रहा था, समझ भी रहा था, “  उम्र इतनी हो गई है, शक्ति बची नहीं है, ट्रस्टी-मंडल में मैं एकदम अकेली पड़ जाती हूं. मुझे ये लोग सारी बातें बताते भी भी नहीं हैं,” आवाज में दर्द भी था, लाचारी भी, “ आपके साथ दौड़ना चाहिए मुझे लेकिन मैं चल भी नहीं पा रही हूं.” मैंने कहा: “ आप अकेली नहीं हैं. ट्रस्टी मंडल से आप हट जाएंगी तो वे सब अकेले पड़ जाएंगे जो आज अपनी संख्या का बल गिन रहे हैं. यह पूरी मंडली आपकी नैतिक पूंजी से ताकत पाती है. आप एक बार देश व गुजरात को बता दें कि इन लोगों से असहमत हो कर मैं इनसे अलग हो रही हूं तो फिर रास्ता इन्हें खोजना होगा, आपको नहीं.” मैं क्या कह रहा था और किससे कह रहा था, मैं जानता था. वे मेरे कहे का सारा दर्द झेल रही थीं, “ आप जो कह रहे हैं वह तो रास्ता है लेकिन मैं यहां से हटूंगी तो इनका रास्ता और  आसान हो जाएगा. मैं वहां रह कर प्रतिरोध करूंगी लेकिन मेरा अपना तरीका होगा. मैं सबको साथ ले कर चलूंगी फिर जिसे अलग होना हो, हो.” उन्होंने वैसा कुछ किया भी और प्रतिरोध के साथ सामने आईं भी. मेरे एक निजी पत्र के जवाब में उन्होंने इतना ही कहा कि आप मुझसे निराश नहीं होंगे. 

  गांधी के संघर्ष से उनका नाता कभी रहा नहीं तो स्वभाव में भी वह नहीं रहा. समाज-सरकार सबसे तालमेल बिठा कर वे सारा जीवन काम करती आईं तो इस सांध्यबेला में रास्ता बदलना बहुत असहज था. कानून की पढ़ाई, शिक्षा-संस्थानों में नौकरी, सरकारी नौकरी आदि रास्तों को पार करती 1972 में उन्होंने उस ‘सेवा’ की स्थापना की जो कालांतर में असंगठित कामगार महिलाओं का देश का - संसार का भी संभवत: - सबसे बड़ा संगठन बन गया. महिलाओं को नेतृत्व में लाने का ऐसा व्यापक प्रयास दूसरा हुआ हो तो मुझे ध्यान नहीं आता है. इसके पीछे भी कहीं गांधी खड़े थे. बिहार के चंपारण का किसान आंदोलन खड़ा कर गांधी वहां से सीधे पहुंचे अहमदाबाद जहां एक मजदूर आंदोलन की खिंचड़ी पक रही थी. साराभाई-परिवार के कपड़ा मिलों का साम्राज्य तब बहुत बड़ा था. यहां के मजदूरों के संघर्ष की कमान गांधी ने संभाली. वह पूरी कहानी छोड़ कर इतना ही कि उस संघर्ष के गर्भ से पैदा हुआ मजूर-महाजन संगठन मजदूर आंदोलनों के इतिहास में गांधी की अपनी देन है. इला की ‘सेवा’ के पीछे मजूर-महाजन संगठन से मिला अनुभव था. 

  ‘सेवा’ का काम जितनी गति से बढ़ा और जैसा वृहदाकार उसका बना, वह इला की संगठन-सूझ, संवेदना, दृढ़ता व काम करने की जबर्दस्त लगन का स्मारक ही बन गया. सफलता भी मिली, अनगिनत सम्मान भी मिले तो मुश्किलें भी आईं, चुनौतियां भी खड़ी हुईं. 1986 में सरकार ने ‘पद्म-भूषण’ से सम्मानित कर इला के जीवन पर अपनी मुहर तो लगा दी लेकिन उनके काम को आसान नहीं बना सकी. उनका सारा काम व्यवस्था से बारीक तालमेल बिठा कर तथा बाजवक्त उसे चुनौती दे कर ही संभव हुआ था. इसमें कमलादेवी चट्टोपाध्याय के साथ से मिली दृष्टि, अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन तथा बुच साहब से मिला सहयोग अहम था. इसरायल जाने व तेल अबीब के एफ्रो-एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ लेबर एंड कोऑपरेटिव्स में पढ़ाई करने का अवसर इला को वह बना गया जो हमने उनके बाकी के सारे जीवन में आकार लेते देखा. यह कहानी परिपूर्ण नहीं होगी यदि हम रमेश भट्ट का जिक्र न करें जिनसे 1956 में उनका विवाह हुआ. रमेश भाई इला की ‘सेवा’ में ऐसे रमे कि अंतिम सांस तक उबरे नहीं. 

  इला बेन दुनिया में हर कहीं गईं, दुनिया की नामचीन हस्तियों के साथ मिल कर बहुत सारे मंचों का निर्माण भी किया, काम भी किया लेकिन खादी की साड़ी में लिपटी उतनी ही सहज-सरल बनी रहीं. 18 जुलाई 2007 को नेल्सन मंडेला, डिसमांड टूटू आदि ने मिल कर एक अनोखी ही पहल की और वरिष्ठ जनों का एक ऐसा ग्रुप बनाया - इ एल्डर्स- जिसका खाका नेल्सन मंडेला के शब्दों में इस प्रकार उभरा : “ हमारी यह टोली स्वतंत्रता व साहस के साथ बोलेगी; चाहे सामने आ कर हो या नेपथ्य से, जब जैसा जरूरी  होगा, काम करेगी. हम मिल कर जहां भय है वहां साहस को सहारा देंगे; जहां मतभेद हैं वहां सहमति की तलाश करेंगे तथा जहां निराशा है वहां आशा का संचार करेंगे.” इस स्वप्नदर्शी पहल में उन्होंने इला को साथ जोड़ा. इला ऐसी जुड़ीं इससे कि सारी दुनिया में कहां-कहां नहीं टोली ले कर पहुंचीं. 2010 में अपने वरिष्ठों को ले कर वे गाजा पहुंची थीं और तब उन्होंने अपनी टोली की तरफ से लिखा था : “ जुल्म के खिलाफ अहिंसक संघर्ष में हिंसक युद्ध से अधिक जान झोंकनी पड़ती है और वे कायर होते हैं जो हथियारों का सहारा लेते हैं.”

  स्वास्थ्य व उम्र ने उन्हें बांधा तो जरूर था लेकिन वे अंत-अंत तक अपनी ही इस कसौटी पर खुद को आजमाती रहीं. गुरु गांधी ने ही सिखलाया था कि जहां असहमति व विरोध से बात न बने अौर सीधी लड़ाई की क्षमता न हो वहां असहकार का अहिंसक हथियार इस्तेमाल करना. इसलिए जब साबरमती आश्रम तथा गुजरात विद्यापीठ के सभी जनों ने उनका हाथ छोड़ दिया और वे एकाकी पड़ गईं तो उन्होंने इस हथियार का सहारा लिया और जीवन से त्यागपत्र देने से पहले अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया. किसी को लगा होगा कि वे गईं लेकिन दरअसल तो हम सब गए ! 

  अब हमारे खाली हाथों में उनके दोनों त्यागपत्र हैं; और उससे भी खाली व सूनी आंखों से हम गहराते अंधकार को देख रहे हैं. ( 04.11.2022)