Monday, 23 June 2025

3 दिन का युद्ध : न 3 के, न 13 के !

       वह कहावत है न : हाथ के तोते उड़ जाना, वह ऐसे ही वक्त के लिए बनी है. उन सभी जंगबाजों के हाथ के तोते उड़ गए हैं जो पिछले 3 दिनों से प्रधानमंत्री को ललकार रहे थे कि बस, अब रुकना नहीं है, इस्लामाबाद व लाहौर जेब में ले कर ही लौटना है- “ बस, देखिएगा मोदीजी, अब पीओके जैसा कोई क्षेत्र नक्शे पर बचना नहीं चाहिए.” लेकिन ऐसे सारे शोर धरे रह गए और 3 दिनों में पाकिस्तान के साथ हमारा अब तक का सबसे छोटा युद्ध समाप्त हो गया. 

कोई भी युद्ध समाप्त हो और शांति किसी भी रास्ते लौटे तो मेरे जैसा आदमी उसका हर हाल में स्वागत ही करेगा. शांति शर्त नहीं, जीवन है. लेकिन नहीं, यहां मुझे यह भी कह देना चाहिए कि ऑपरेशन सिंदूर ( इस नाम से मुझे वितृष्णा होती है लेकिन यही नाम चलाया गया है !) जिस रास्ते विराम तक आया है, उससे मुझे आशंका हो रही है कि यह शांति किसी बाज के चंगुल में दबी हुई है. होंगे अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप किसी के परम मित्र लेकिन शांति के लिए उनकी मध्यस्थता युद्ध से कम खतरनाक नहीं है. यदि प्रधानमंत्री का यह कहना सच है कि यह शांति अमरीका की मध्यस्थता से नहीं, भयाक्रांत पाकिस्तान व विजयश्री को वरण करने वाले हिंदुस्तान की समझदारी से आई है, तो ट्रंप महाशय के इस काइयांपन को कठोरता से बरजना नहीं चाहिए क्या कि उन्होंने सबसे पहले, किसी से भी पहले ट्विट कर मध्यस्थता का दावा भी कर दिया, समझदारी दिखाने के लिए दोनों ‘बच्चों’ की पीठ भी थपथपा दी, दोनों को साथ बिठा कर ‘सॉरी’ कहने के लिए ‘तटस्थ स्थान’ भी बता दिया और इस विवाद से बाहर आने में मार्गदर्शक बनने की पेशकश भी कर दी ? इतना ही नहीं, यह भी कह दिया कि मेरे कहने से ‘आत्मसमर्पण’ नहीं करोगे तो मैं धंधा-पानी बंद कर दूंगा. यह सब किसी के हवाले से नहीं, सीधे ट्रंप महाशय के श्रीमुख से हमने भी सुना, मोदीजी ने भी सुना और सारी दुनिया ने सुना. उनके इस काइंयापने को बरजना तो दूर, न भारत ने, न पाकिस्तान ने मित्र ट्रंप से ऐसा कुछ भी कहा; बल्कि पाकिस्तान ने तो उनका सार्वजनिक तौर पर आभार भी माना. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस दौर में अमरीका व ट्रंप का यह रवैया अत्यंत खतरनाक है. इसकी गहरी और गहन छानबीन होनी चाहिए. लेकिन अभी हम ख़ुद को तो देखें, फिर ट्रंप महाशय की बात करते हैं.  

  पहलगांव में पाकिस्तान ने जो अमानवीय कारनामा किया, उसके बाद किसी भी सरकार के लिए चुप बैठना संभव नहीं था. आजादी के बाद से अब तक पाकिस्तान से हमारी जितनी भी जंग हुई है, उसके पीछे कहानी यही रही है कि पाकिस्तान ने हमारे सामने दूसरा कोई रास्ता छोड़ा ही नहीं ! लेकिन एक फर्क भी है जिसे भी समझना जरूरी है. कारगिल और पहलगांव, दोनों के साथ एक बात समान है कि इन दोनों युद्ध के पीछे सरकार की अक्षम्य विफलता को छिपाने और ख़ुद को महिमामंडित करने की कोशिश हुई है. आप हिसाब लगाएं तो इन दोनों मौकों पर देश की कमान भारतीय जनता पार्टी के हाथ में थी. कारगिल में पाकिस्तान भीतर घुस आया, पहाड़ियों में उसने अपनी मजबूत जगह बना ली, हथियार, गोला-बारूद जमा कर लिया और अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार सोती रही. बाद में सैंकड़ों जवानों के रक्त से अपनी यह नंग छुपाई गई. ऐसा ही पहलगांव में हुआ. हमारी गुप्तचर एजेंसी और हमारी सुरक्षा-व्यवस्था कहां सो रही थी कि पाकिस्तान से आतंकवादी निकले और पहलगांव के उस इलाके में पहुंच गए जहां सैंकड़ों सैलानी जमा थे ? जिस कश्मीर का चप्पा-चप्पा आपकी मुट्ठी में है और जहां कोई कश्मीरी पलक भी झपकाता है, तो आपको पता चल जाता है, ऐसा दावा गृहमंत्री करते नहीं अघाते हैं, वहां ऐसी असावधानी ? और शर्मनाक यह कि उसके बारे में कोई सफ़ाई आज तक नहीं दी गई, कोई माफी नहीं मांगी गई. सिर्फ एक ही आवाज सुनाई देती है कि ‘ट्रेड’और ‘टॉक’ एक साथ नहीं चल सकते; कि ख़ून और पानी एक साथ नहीं बह सकते ! यह किसी तुक्काड़ की कविताई न हो तो मैं पूछना चाहता हूं कि ‘सरकार’ व ‘बेकार’ एक साथ चल सकते हैं क्या ? इतिहास बताता है कि मात्र संसदीय बहुमत के बल पर देश नहीं चलता है. पूछना हो तो इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों से पूछिए, और पूछिए अटलबिहारी वाजपेयी से. फिर आप इस गफ़लत में क्यों जी रहे हैं कि संसदीय बहुमत है, तो आप देश को मनमाना हांक लेंगे ?  

  कोई बताए कि 3 दिनों के इस युद्ध से हासिल क्या हुआ ? खोखली राजनीतिक शेखी  व चुनावी फसल काटने की तैयारी आदि की बातें तो अहले-सियासत जाने, हम तो देख रहे हैं कि 3 दिनों की इस ड्रोनबाजी से हमारे हाथ कुछ भी नहीं आया. न हम पाकिस्तान को इतना कमजोर कर सके कि वह आगे कोई दूसरा पहलगांव करने की हिम्मत न करे, न हम अंतरराष्ट्रीय शक्तियों को अपने पीछे इस तरह खड़ा कर सके कि कोई पाकिस्तान, कि कोई चीन उसकी तपिश महसूस कर सके. सीखना ही हो तो यूक्रेन से सीखें हम कि जिसके पीछे सारा यूरोप खड़ा ही नहीं है, उसकी सक्रिय मदद भी कर रहा है. वहां भी सबसे कमजोर कड़ी ‘मित्र ट्रंप’ ही हैं. दौड़-दौड़ कर विदेश जाने वाला, जबरन गले पड़ने वाला हमारा कूटनीतिक बौनापन ऐसा रहा है कि आज हमें व पाकिस्तान दोनों को एक ही पलड़े में रख कर, ट्रंप ने अपनी झोली में डाल लिया है. अमरीका भी जानता है कि पाकिस्तान के पीछे चीन खड़ा है, और वह यह भी जानता है कि आज पुतिन का रूस, चीन के ख़िलाफ़ दूर तक नहीं जा सकता है. अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में हमारे इस तरह अलग-थलग पड़ जाने से देश बड़ी अटपटी हालत में आ गया है. 

3 दिनों की इस ड्रोनबाजी ने हमें एकदम बेपर्दा कर दिया है. हमें यह सच्चाई पहली बार समझ में आई है कि हथियारों का जितना भी जखीरा हम जमा कर लें, उसका हम मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकते. इसलिए युद्ध में किसी को निर्णायक रूप से परास्त कर देना आज आसान नहीं है. हमारी फौज बली है, यह दावा हम करते रहें लेकिन यह सच्चाई भी समझते रहें कि कोई भी फौज उतनी ही बली होती है जितना बली होता है उसके पीछे खड़ा समाज ! हमने अपने समाज का क्या हाल बना रखा है ? 

 हमारा समाज कैसे ऐसी भीड़ में बदल दिया गया है कि जिसके पास युद्धोन्माद की मूढ़ नारेबाजी के अलावा कहने को कुछ बचा ही नहीं है ! हमारा मीडिया इन 3 दिनों में अपने पन्नों व पर्दों पर जैसा ‘फेक’ युद्ध लड़ने में जुटा हुआ था, उससे तो वीडियो गेम खेलने वाला कोई बच्चा भी शर्मा जाए ! पहलगांव में असावधानी की हर सीमा पार करने वाली सरकार, देश के भीतर खबरों के बारे में इतनी सावधान थी कि सबको वही कहना व लिखना था जो सरकार कहे. इस सरकार ने ऐसा माहौल बना रखा है कि जैसे आज राष्ट्रीय सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा स्वतंत्र सोच व समाचार से है. हमारा तथाकथित ‘विशेषज्ञ बौद्धिक’ कितना विपन्न है, यह भी इन 3 दिनों में पता चला. यूट्यूब जैसे माध्यम, जो देश के विमर्श को एक दूसरा आयाम दे रहे थे, उन सबको चुन-चुन कर बंद कर दिया गया. एक माहौल ऐसा बनाया गया कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ी हो तब आप लोकतांत्रिक अधिकारों की बात कैसे कर सकते हैं ? आपके ऐसे रवैये से दो बातें पता चलीं : पाकिस्तान जैसा खोखला हो चुका देश भी मात्र 3 दिनों में हम जैसे सर्वसाधनसंपन्न देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है; और यह भी कि लोकतांत्रिक अधिकारों से देश मजबूत नहीं बल्कि कमजोर होता है. अगर सर्वोच्च न्यायपालिका को अपने नमक का कर्ज उतारना हो तो उसे इस अवधारणा का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए.         

सारे चैनल कह रहे थे, सारे अखबार भयानक उबाऊ एकरसता से लिख रहे थे, प्रधानमंत्री भी बोल रहे थे और उसकी प्रतिध्वनि सारे मंत्रियों के भीतर से भी उठ रही थी कि हमने जवाब दे दिया- 26 निरपराध भारतीयों की हत्या का जवाब हमने दे दिया ! कैसे जवाब दिया ? 26 लाशों के बदले 100 लाशें गिरा कर ? यह किसी शांतिवादी या गांधी या बुद्ध वाले का तर्क नहीं है, सामान्य समझ की बात है कि बदला भले लिया हमने लेकिन जवाब तो कुछ भी नहीं बना. दोनों सरकारें नहीं बता रही हैं कि फौजी व नागरिक मिला कर कुल कितने लोग मारे गए ? लेकिन आपकी ही दी खबरें, आपके  ही दिखाए मंजर बताते हैं कि हमारी अचूक गोलाबारी तथा पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई में कई जानें गई हैं, काफी बर्बादी हुई है. सत्ता व संपन्नता के शिखर पर बैठे लोग एक ही बात बार-बार दोहराते हैं कि हमारे जांबाज जवानों ने… हमारी फौज की वीरता ने… वे हैं तो हम रात में चैन की नींद सो पाते हैं आदि-आदि. लेकिन जांबाज जवानों से अपनी जगह बदले की तैयारी कितनों की है, कोई बताता नहीं है. ट्विटर-फ़ेसबुक आदि ने बहादुरी की टके भर क़ीमत नहीं रहने दी है. जो यहां हो रहा है, वही पाकिस्तान में भी हो रहा है. पराजित आदमी की तरह ही पराजित मुल्क भी ज्यादा प्रगल्भ होता है, तो पाकिस्तान की यह मनोभूमिका हम समझते हैं. लेकिन अपनी मनोभूमिका पाकिस्तान जैसी क्यों होती जा रही है ? तो कहना होगा कि दोनों ने अपना-अपना जवाब दे दिया है, और खाली हो गए हैं. युद्ध के दरवाजे भी फ़िलहाल बंद हो गए हैं तो बात खत्म हो गई. अब कोई कहे कि किसने किसको जवाब दे दिया ? अपनी परंपरा व पौराणिकता की शेखी बघारने वालों को याद रखना चाहिए कि महाभारत के युद्ध के अंत में आ कर धर्मराज युधिष्ठिर का रथ भी धरा से आ लगा था और वे भी अपनी खाली हथेली देख कर यही पूछ रहे थे कि हाथ क्या आया ? 

मौत जिंदगी का जवाब नहीं है, वह तो जिंदगी का अंत है. जिंदगी है तो सवाल हैं; और सवाल हैं तो उनका जवाब भी होगा जिन्हें हमें खोजना है. आज हम नहीं खोज सके, तो कोई बात नहीं. खोजते रहेंगे तो जवाब मिलेगा. हमारे बस में इतना ही है कि हम खोजने में ईमानदार हों. बुद्ध अनगिनत सालों पहले यही तो कह गए : तुम जैसा सोचते हो, वैसे ही बन जाते हो. इसलिए युद्ध भी लड़ें तो मानवीयता भूल कर नहीं, ज्वर भी चढ़े तो युद्धोन्माद का नहीं, क्योंकि हमें किसी भी सूरत में न अमानवीय बनना है, न बनाना है. हमें वैसा देश नहीं बनाना है, हमें वैसा नागरिक नहीं बनना है जो नेवी के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की पत्नी हिमांशी के चरित्र पर इसलिए कीचड़ उछालता है कि उसने पहलगांव में आतंकवादियों द्वारा अपने पति की हत्या के बाद भी देश को देशी आतंकवादियों के हाथ सौंपने से मना कर दिया; मध्यप्रदेश के भाजपा मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में जो अपमानजनक बातें कहीं वह ज़ुबान की फिसलन भर नहीं, उस खास मानसिकता का परिचायक है जिसके प्रधान व्याख्याता कपड़ों से अपने नागरिकों की पहचान की बात करते हैं; यही लोग हैं जो हमारे आला विदेश सचिव विक्रम मिसरी पर इसलिए लांक्षन लगाते हैं कि उन्होंने युद्धविराम की खबर देते हुए शालीनता नहीं छोड़ी. उन्माद का राक्षस हमेशा इसी तरह भूखा होता है- “ उसे पानी नहीं भाता / सियासत ख़ून पीती है.” 

( 14 मई 2025)   

Monday, 28 April 2025

वक्फ एक नकली मुद्दा है

       वक्फ विवाद को अपनी मर्जी से हल करने के लिए बनाई गई संसदीय समिति की लंबी बैठकों में जो बात न कही जा सकी, न सुनी जा सकी, सुप्रीम कोर्ट ने वह सारा सुना भी, सरकार से टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछे भी और फिर कहा कि इन सबका सरकारी जवाब आ जाए फिर हम अपनी बात कहेंगे. उसने सरकार को ‘स्टैच्यू’ कर दिया है. सरकार अपने जवाबी हलफनामे में बहुत कर के भी इतना ही कह पा रही है कि ‘वक्फ एमेंडमेंट एक्ट 2025’ मजबूत संवैधानिक आधार पर खड़ा है. वह मजबूत संवैधानिक आधार क्या है, यह बात उसके जवाब में कहीं आई नहीं है. 

अदालत के रुख से कुपित सरकार के इशारे पर भारतीय जनता पार्टी के दो सांसदों ने हमारे चीफ जस्टिस संजीव खन्ना साहब को इसके पीछे का ‘शैतानी दिमाग’ तथा गृहयुद्ध भड़काने वाला बता दिया. बात जो कहनी थी, कह दी गई; बात जहां पहुंचनी थी, पहुंचा दी गई फिर पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि हम इन सांसदों से नहीं, उनकी बातों से ख़ुद को अलग करते हैं. यह कुछ वैसा ही हुआ जैसे यह होता रहा है कि चोरी का माल घर में रख लिया और चोर को पिछले दरवाजे से भगा दिया. 

  कहना कठिन है कि अपने अंतिम फैसले में अदालत क्या रुख लेती है. अभी तक का अनुभव यही रहा है कि हमारी सर्वोच्च अदालत कहती कुछ है और लिखती कुछ है. हम अब तक यह भी नहीं समझ सके हैं कि चीफ जस्टिस यदि देश के भीतर चल रहे तमाम गृहयुद्धों के ‘मास्टरमाइंड’ हैं, तो वे अपने पद पर बने कैसे हैं; और यदि ऐसा नहीं है तो सरकारी सांसद पर अदालत की अवमानना की कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है ? अरुंधती राय व निशिकांत दुबे में अदालत इतना फर्क कैसे कर सकती है ? यह मुकदमा किस अदालत में पेश किया जाए ?  

अखबारों की मानें तो प्रधानमंत्री ने वक्फ बिल पारित होने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि इस कानून के द्वारा उन्होंने कांग्रेस की चाल को नाकाम कर दिया है. क्या कांग्रेस की चालों को नाकाम करने के लिए कानून बनते या बदलते हैं ? क्या सिर्फ इस कारण से एक गैर-कानूनी कानून देश का कानून बन गया ? हमारा संविधान किसी भी सरकार को इसकी इजाजत नहीं देता है कि उसका कोई भी कानून या कदम ऐसा हो कि जो इस देश के नागरिकों के बीच भेद करता हो. 

आज यदि देश का कुछ उधार है सरकारों पर तो एक ऐसी तरमीम उधार है जो किसी भी स्तर पर, किसी भी तरह का कानूनी भेद-भाव यदि कहीं बचा हो तो उसे भी समाप्त करे. वक्फ भेद-भाव का ऐसा कोई मुद्दा है ही नहीं. बिलाशक वक्फ की आड़ में बहुत कुछ नाजायज व मनमाना होता रहा है. उसे रोका जाए व किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत उसे नियंत्रित किया जाए, इसकी जरूरत थी भी, और है भी. लेकिन ऐसा कुछ करने से पहले यह भी तो देखा जाए कि क्या हर धर्म के अपने-अपने वक्फ नहीं हैं ? आप उन सबका क्या करने वाले हैं ? हर धर्मसत्ता ने अपने वक्त की अनुकूल राजसत्ता से सांठ-गांठ करके अपने लिए विशेष सुविधाएं हासिल की हैं. जमीनें हैं, दान-चढ़ावा पर एकाधिकार है, ट्रस्ट आदि की सुविधाजनक व्यवस्थाएं हैं, धार्मिक शिक्षा के नाम पर अपने धर्म के प्रचार की सहूलियतें हैं, विभिन्न पर्दों की आड़ में धर्म-परिवर्तन का चलन है, रवायतों के नाम पर ऐसी सामाजिक प्रथाओं को जारी रखने की चालाकी है जो लिंगभेद पर आधारित हैं आदि-आदि. सारे धर्म-संगठन निरपवाद रूप से एक-दूसरे के प्रति नफरत फैलाते हैं. ये सब लोकतंत्र का विकास ही रुद्ध नहीं कर रहीं बल्कि उसे विकृत भी बनाती जा रही हैं.  

जब हमने संविधान बनाया था तब हमारा लोकतंत्र बहुत कच्चा था. बड़े अभागे दौर से गुजरते हुए हम अपनी आजादी तक पहुंचे थे. नेतृत्व नया भी था व बंटा हुआ भी था. एक गांधी थे कि जिनमें इतना आत्मबल था कि वे कैसी भी बाजी पलट सकते थे लेकिन आजादी पाते ही हमने सबसे पहले उनसे ही आजादी पा ली. वे क्या गए कि हमने अपना कंपास ही खो दिया. 

अंग्रेजों ने देश को खोखला कर छोड़ा था तो विभाजन ने प्रशासन को छिन्न-भिन्न कर डाला था. उस वक्त एक ही प्राथमिकता थी : देश की एकता व संप्रभुता को अक्षुण्ण रखा जाए ! जरूरत थी कि देश के हर नागरिक व समुदाय को स्वांत्वना दी जाए, सबमें भरोसा पैदा हो, नयी लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति किसी समुदाय के मन में नाहक शंका न बने. बहुत कुछ था जो तब दांव पर लगा था, इसलिए बहुत कुछ था कि जिनकी अनदेखी जरूरी थी. हमारे तब के प्रौढ़ नेतृत्व ने बहुत सारी बातें कबूल कर लीं और कदम-दर-कदम देश को उस अभागे दौरे से निकाल लाए. वह सब पीछे छोड़ कर हम अब दूर निकल आए हैं. 

हम दूर निकल आए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम मनमाना कर सकते हैं. इसका मतलब इतना ही है कि अब हम संवैधानिक समता व एकता को मजबूत करने की दिशा में कुछ नये कदम उठा सकते हैं. इसके लिए हमारे पास एक नायाब औजार भी है जिसे संविधान कहते हैं. संविधान हमें यह नहीं बताता है कि हमें नया क्या करना है; वह बताता है कि हमें जो भी करना है, वह कैसे करना है. हमें संगठित धर्मों के एकाधिकार को ढीला करना है; हमें धर्म व परंपरा के नाम पर जारी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना है; हमें राज्य का धर्मनिरपेक्ष चरित्र मजबूत भी करना है व उजागर भी करना है; हमें आर्थिक विपन्नता, अमानवीय विषमता तथा अकल्पनीय शोषण को रोकना है. हमें राज्य को उसकी संवैधानिक मर्यादा बतानी भी है. 

इतना कुछ है जो अब हम कर सकते हैं, हमें करना चाहिए. लेकिन यहां भी दो सवाल हैं जिनका सामना हमें करना है. पहला यह कि जो यह करना चाहते हैं, क्या उनकी मंशा साफ है ? मंशा का सवाल हमारी बनाई या कही बातों पर निर्भर नहीं करता है बल्कि समय उसकी गवाही देता है. हमारा इतिहास व हमारा वर्तमान बताता है कि जो धर्म, संस्कृति व परंपरा के आधार पर भारतीय समाज में भेद-भाव करते रहे हैं, उन्होंने उसका एक सिद्धांत गढ़ रखा है. वे  घृणा, कठमुल्लापन, अवैज्ञानिक अवधारणाओं को हथियार की तरह बरतते हैं. ऐसे सारे लोग इस नई शुरुआत के पात्र नहीं हैं. जिनके वर्तमान पर देश को भरोसा नहीं है, उनके हाथ में कोई अपना भविष्य कैसे सौंप सकता है ? इसलिए हमें वह पात्रता अर्जित करनी होगी जो सत्ता की कुर्सी अर्जित करने से नहीं मिलती है. दूसरा सवाल यह है कि क्या आप भारतीय समाज से वैसे परिवर्तनों के लिए सहमति प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें आप ख़ुद पर लागू नहीं करते हैं ? 

वक्फ की मर्यादा तय करनी ही चाहिए लेकिन उसी के साथ, उसी सांस में यह भी करना चाहिए कि हिंदू धर्म संस्थानों की, चर्चों व गुरुद्वारों की, आतशबहेरामों की मर्यादा भी तय हो. आज के हिंदुस्तान में कोई भी मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-गिरिजा-आतशबहेराम यह कैसे घोषणा कर सकता है कि उसके यहां दूसरे धर्मों का प्रवेश वर्जित है ? 75 से अधिक सालों से साथ रहने वाले हम लोग क्या सहजीवन का इतना शील भी नहीं सीख पाए हैं ? अगर संविधान व सहजीवन की इतनी लंबी संगत में हम यह पूरी तरह नहीं सीख पाए हैं तो अब संवैधानिक पहल व सरकारी निर्देश की मदद लेनी पड़ेगी. आज के हिंदुस्तान में कोई भी धर्म संस्थान, शिक्षा संस्थान ऐसा नहीं हो सकता है जो अपने लोगों को भारतीय समाज की विविधता का, भारतीय सामाजिक बुनावट का, हमारे पर्व-त्योहारों का, हमारी संवैधानिक व्यवस्थाओं का, हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना न सिखाए. मदरसों का लोकतांत्रिक मिजाज बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है सरस्वती शिशु मंदिर सरीखे संस्थानों का लोकतांत्रिक मिजाज बनाना. यह किसी के खिलाफ नहीं, सबके हित में संविधानसम्मत पहल होगी. सांप्रदायिक राजनीति से यह काम करेंगे तो आप समाज को ज्यादा प्रतिगामी, कठमुल्ला तथा हिंसक बना देंगे. तो रास्ता गांधी का ही पकड़ना होगा कि संवेदना के साथ व्यापक सामाजिक संवाद, लोक-शिक्षण व लोक-संगठन का अभियान चलाना होगा. किसी धर्म, किसी वर्ग, किसी दल को निशाने पर लेंगे तो आप अपने समाज की संरचना पर घात करेंगे. चुनावी गणित से यह काम करेंगे तो कुर्सी भले वक्ती तौर पर आपके हाथ आ जाए, देश अंतिम तौर पर आपके हाथ से निकल जाएगा. 

वक्फ के मामले पर विचार करते वक्त सर्वोच्च न्यायालय ख़ुद भी संविधान की कसौटी पर है. हमारा संवैधानिक इतिहास बताता है कि सर्वोच्च न्यायालय हमेशा इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा है. आप संविधान की शाश्वत मालिक जनता से पूछेंगे तो अपार बहुमत से आपको यही जवाब मिलेगा कि आपातकाल का संदर्भ तो है ही, सर्वोच्च न्यायालय उससे पहले भी और उसके बाद भी संविधान को समझने व उसकी रक्षा करने में बारहा विफल होता आया है. कारण यह है कि उसने संविधान से इतर कारणों को अपने निर्णय का आधार बनाया है. हमारे एक न्यायाधीश महाशय ने तो यह भी कहा है कि वे भगवान से पूछ कर फैसला करते थे !  जिसका भगवान ही संविधान है, उसे किसी दूसरे भगवान के पास जाने की जरूरत ही कैसे पड़ी ? जब न्यायाधीश भगवान से फैसला पूछने लगते हैं तब राजनीति कपड़ों से अपने नागरिक पहचानने लगती है. इसलिए न्यायपालिका से जुड़े हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि संविधान के बाहर जो है, वह न तो उसका क्षेत्र है, न उसकी संवैधानिक भूमिका है. 

राहुल गांधी इतिहास कैसे पढ़ें व उससे क्या निष्कर्ष निकालें, यह तय करना अदालत की संवैधानिक भूमिका है ही नहीं. अदालत को इतना ही देखने व जांचने का अधिकार है कि राहुल गांधी को अपनी तरह से इतिहास पढ़ने व अपना नजरिया बनाने का अधिकार है या नहीं; और यह भी कि ऐसा करते हुए राहुल गांधी किसी का अपमान या किसी को अपशब्द तो नहीं कह रहे ? ऐसा हो तो अदालत को राहुल गांधी को पकड़ना चाहिए लेकिन अदालत को यह अधिकार कहां से मिला कि वह राहुल गांधी को धमकाए कि वह सावरकर को खारिज नहीं करें अन्यथा हम उन्हें अदालत में खींचेंगे ?

वक्फ का पिटारा खुला है तो यह सब उसके भीतर से निकल रहा है. सर्वोच्च न्यायालय को इन सबको समेट कर वह फैसला करना है जिसका इंतजार यह देश कर रहा है. ( 27.04.2025 )

Wednesday, 12 March 2025

इतिहास के औरंगजेब

इतिहास तीन ही काम करता है - दर्ज करता है, भूलता है और आगे चलता है ! जो लोग, समुदाय या देश ऐसा नहीं कर पाते हैं, वे खुद की तरह ही इतिहास को भी कूड़ाघर बना डालते हैं. हमारा देश आज ऐसा ही कूड़ाघर बनता जा रहा है. चरित्रत: इतिहास न सहृदय होता है, न क्रूर; न किसी के पक्ष में झुका होता है, न किसी की तरफ़ तना होता है. वह सिर्फ होता है ताकि हम उसके आईने में अपनी बीती सूरतें देख कर, अपनी आज की सूरत सजा व संवार सकें. हम यह कर्तव्य जितनी शिद्दत से निभा पाते हैं, इतिहास हमारे भविष्य को वैसा ही आकार देता है. मतलब, इतिहास भूत-वर्तमान-भविष्य के तिहरे धागे से हमें जोड़ने वाली वह जीवंत शक्ति है जिसे हम पहचानने में अक्सर चूक जाते हैं.

इतिहास की त्रासदी यह है कि यह बनता है कितनी ही जानी-अनजानी ताकतों के सम्मिलित प्रभाव व प्रवाह से लेकिन हमेशा लिखा जाता है किसी एक आदमी की समझ व आकलन से. यह अत्यंत खतरनाक बात है. इसलिए इतिहास कभी एक स्रोत से न तो पढ़ा जाना चाहिए, न समझा जाना चाहिए. इतिहास के हर अध्येता के लिए जरूरी है गंभीर तटस्थता, खोज करने की बालसुलभ व्यापक उत्सुकता तथा उद्देश्य के बारे में साफ समझ. यह न हो तो आप इतिहास के अध्येता या जानकार न हो कर इतिहास के विदूषक बन कर रह जाते हैं. हमारे यहां पिछले दसेक वर्षों में कुकुरमुत्तों की तरह इतिहासकारों की जो फसल पैदा हुई है, वह विदूषकों को भी शर्माने की कूवत रखती है. इनमें से कई नया इतिहास लिख रहे हैं तो कई ऐतिहासिक फिल्में बना रहे हैं. सच यह है कि ये दोनों अपना व्यवसाय कर रहे हैं. 

इतिहास के इस बाज़ार में सबसे ताजा व्यापारी बन कर उतरे हैं दिनेश विजयन ! उनकी फिल्म ‘छावा’ बक़ौल प्रधानमंत्री छा गई है. ‘छावा’ के निर्देशक हैं लक्ष्मण उत्तेकर. मराठी कथा-लेखक शिवाजी सावंत की इसी नाम की किताब, इस फिल्म का आधार है, ऐसा निर्देशक का दावा है. बताया जा रहा है कि ‘छावा’ ने भी वैसी ही कमाई की है जैसी तरह-तरह की फाइलों के नाम से बनी फिल्मों ने की है. अभी तक यह खबर कहीं देखी तो नहीं है कि प्रधानमंत्री अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ ‘छावा’ देखने बैठे. वैसे यह जरूरी है, क्योंकि प्रधानमंत्री ऐसी फिल्मों से ही अपना इतिहास जान पाते हैं. उन्होंने ही तो देश को बताया था कि जब तक रिचर्ड एटनबरो ने ‘गांधी’ फिल्म नहीं बनाई थी, तब तक दुनिया गांधी को जानती नहीं थी. यह सच है या नहीं, इसकी बहस हम करते रहें लेकिन प्रधानमंत्री के लिए यह बिल्कुल सच है, यह हमें मान लेना चाहिए. 

हम अब ‘छावा’ और औरंगजेब-विवाद की ओर आते हैं. 1526 में मुगल साम्राज्य बाबर के साथ शुरू होता है और अकबर, जहांगीर, शाहजहां से होता हुआ औरंगजेब के हाथ आता है. हम देखते हैं कि बाबर से शाहजहां तक मुगल साम्राज्य अपेक्षाकृत सहजता से पिता से पुत्र तक पहुंचता रहा है लेकिन शाहजहां के वक्त इसमें पहली बार बड़ा व्यवधान पड़ता है. जैसी राजतंत्र की रवायत थी, शाहजहां अपने बड़े बेटे दाराशिकोह को राजगद्दी सौंपना चाहते हैं. लेकिन दूसरे नंबर के बेटे औरंगजेब को यह गंवारा नहीं है. उसे लगता है कि वह गद्दी का असली व सबसे योग्य अधिकारी है. वह असहमत पिता से बगावत करता है, दाराशिकोह को युद्द के मैदान में परास्त करता है और फिेर उसकी हत्या कर, पिता शाहजहां को मृत्यु तक के लिए जेल में डाल कर गद्दी पर कब्जा करता है. ‘छावा’ जैसी फिल्म व दूसरे माध्यमों से, सरकारी समर्थन व प्रोत्साहन से यह प्रचारित करने की घुआंधार कोशिश की जा रही है कि औरंगजेब मदांध, क्रूर, धर्मांध तथा कई दूसरे कुटैवों का सिरमौर था. मेरे लिए यह समझना असंभव की हद तक कठिन है कि यदि औरंगजेब ऐसा था तो उससे कौन-सा ऐसा रहस्योद्घाटन होता है जिससे हमें आज अपना जीवन जीने या अपना देश चलाने में मदद मिलेगी ? मैं ऐसा कहता हूं तो सामने से तपाक से एक ‘ असली इतिहासकार’ बोल उठता है : “ तो आपको इतिहास की सच्चाई जानने-बताने में कोई दिलचस्पी नहीं है ? … अगर ऐसा है तो आपसे क्या बात की जाए… आप इतिहासकार ही नहीं हैं.”  

मैं पूरी विनम्रता व दृढ़ता से कहता हूं, कहना चाहता हूं कि मैं वैसा इतिहासकार नहीं हूं जिसकी रोजी-रोटी सत्ताधीशों की भृकुटि से मिलती या छिनती है. ऐसा इतिहास उन्हें ही मुबारक हो जिनका जीवन-व्यापार इसी से चलता है. मैं उस इतिहास को खोलता-पढ़ता-समझता व समझाता हूं जो बताता है कि मेरा देश व मेरी दुनिया की ऐसी शक्ल-ओ-सूरत बनाने वाले प्रवाह कौन-कौन-से रहे हैं, वे कब व कैसे बने और उनसे हम क्या सीखें कि आज से बेहतर देश व दुनिया बना सकें. समय की इस आंधी में सूखे पत्तों जैसे उड़ते-गिरते अनेक पात्र भी आते ही हैं. वे अपने वक्त के आका नहीं होते, अधिकांश: उसके शिकार होते हैं. इतिहास पर इससे ज्यादा उनका प्रभाव होता नहीं है. मैं जानना चाहता हूं, और अपने समाज को बताना चाहता हूं कि औरंगजेब से पहले जो मुगल राजा हुए वे सब भी उतनी ही मनमानी करने वाले दमनकारी थे. कोई भी सत्ता बगैर दमन व कठोरता के न चलती है, न टिकती है. 

मैं उसे बताना चाहता हूं कि बाबर से अकबर ( 1526-1605) के बीच के 79 वर्षों में यदि भारत में एक ऐसा बड़ा साम्राज्य खड़ा हुआ जैसा देश ने इससे पहले कभी देखा नहीं था, तो वह वैसे ही खड़ा तो नहीं हुआ होगा. साम-दाम-दंड-भेद सबका का पूरा इस्तेमाल हुआ होगा, हत्याएं करवाई गई होंगी, षडयंत्र रचे गए होंगे, विभीषणों को पाला-पोसा गया होगा. नवरत्न बना कर उनकी वफादारी सुनिश्चित की गई होगी. राज्य के हित व विस्तार के लिए रोटी-बेटी के संबंध बनाए गए होंगे. तब कोई भी साम्राज्य बनाने-टिकाने के लिए यह सब करना जरूरी होता था, सहज माना जाता था. आज अपनी सरकार बनाने-चलाने-टिकाने के लिए यही सारे मोहरे नहीं चले जाते हैं क्या ? फिर औरंगजेब का इतना जाप क्यों हो रहा है ? यह क्यों नहीं बताते हैं कि आरंगजेब से पहले क जहांगीर भी था जिसने सिख गुरु अर्जनदेव को मरवाया था. यह भी तो याद रखें हम कि अकबर ने अपने ही बेटे को काबू में करने के लिए हर हिंसक उपाय किए थे. उसने बेटे के समर्थक सरदारों को मरवाया नहीं था ? अनारकली की कहानी फिल्मी है कि सच्ची, इस पर थोड़ा विवाद है लेकिन इस पर भी कोई विवाद कर सकता है क्या कि राजमहल के भीतर ऐसी कितनी की लड़कियों की जिंदगी दफ्न होती रही है ताकि साम्राज्य निष्कलंक चलता रहे ? 

औरंगजेब ने ज्यादा क्रूरता व संकीर्णता से अपना राज चलाया, क्योंकि उसे राज आसानी से मिला नहीं था. शाहजहां से उसके सर पर साम्राज्य का मुकुट नहीं धरा था, उसने कितने ही सर काट कर, पिता को कारावास में धकेल कर मुकुट छीन लिया था. जो छीन कर मिलता है, वह ज्यादा असुरक्षित होता है. उस पर ज्यादा गिद्ध-दृष्टि लगी होती है. इसलिए औरंगजेब को हर वक्त चौकन्ना रहना पड़ता है, और कहीं से छाया भी उठे तो उसका सर कलम करने की तैयारी रखनी पड़ती है.  वह छाया हिंदू की है कि मुसलमान की कि किसी दूसरे मतवाद वाले की, यह देखने का अवकाश भी उसके पास नहीं है. लेकिन दूसरे सम्राटों की तरह औरंगजेब को पता है सबको साथ भी रखना जरूरी है. इसलिए उसने भी मंदिरों को दान दिया है, विद्वानों का सम्मान किया है, हिंदू शासकों से समझौते किए हैं. उसके दरबार में बड़ी संख्या में हिंदू अधिकारी व सिपहसालार हैं. सवाई राजा जयसिंह को भूल जाएं आप तो इतिहास का क्या होगा भाई ! और यही जयसिंह हैं जो संभाजी को शरण भी देते हैं. संभाजी को धोखे से कैदी बनवाने वाले कौन हिंदू सिपहसालार थे, यह भी याद कीजिए. संभाजी की हत्या के बाद संभाजी का अबोध बेटा साहूजी महाराज किसके यहां पला? औरंगजेब के यहां ! इस तरह उसकी परवरिश हुई कि औरंगजेब की मृ्त्यु के बाद वह नंगे पांव उनकी कब्र पर जाता रहा. यह सब भी तो इतिहास ही है न! इसे हम नहीं पढ़ें क्या ? फिर इतिहास पढ़ें ही क्यों ?  

औरंगजेब में जिनकी इतनी दिलचस्पी है, वे अशोक का अध्ययन क्यों नहीं करते ? वह तो ‘चंडाशोक’ कहलाता था. कहते हैं कि कलिंग-युद्ध से पहले तक उसे अपनी तलवार सूखी देखना बहुत नागवार होता था. वह अपने अनगिनत भाइयों को मरवा कर राजा बना था. राजशाही के इतिहास में भाई सबसे बड़ा खतरा होता था. वह हर तरह से बराबरी की हैसियत रखता था, राज्य में उसके अपने लोग हुआ करते थे. वह हमेशा राज्य के उत्तराधिकारी के सर पर तलवार की तरह लटकता होता था. इसलिए अधिकांश सम्राटों ने अपने भाइयों को साफ़ कर, अपना रास्ता साफ़ किया है. और आज ? प्रधानमंत्रियों ने प्रधानमंत्री पद हथियाने के लिए अपनी पार्टी के भीतर कितना ग़दर मचाया है, इसका देश-दुनिया का इतिहास भी पढ़िए, फिर क्रूरता आदि का फैसला कीजिए. 

इतिहास ही हमें बताता है कि क्रूरता व वीरता के बीच रत्ती-मासे का फर्क होता है. यह भी होता है कि एक के लिए जो क्रूरता है, दूसरे के लिए वही वीरता है. इसलिए इतिहास तटस्थता की मांग भी करता है और विवेक की भी. उसकी नक़ल करना, उसके प्रेत से लड़ना, तब का बदला आज चुकाना जहरीली अभद्रता है, अश्लीलता है, सांप्रदायिकता है. यह आदमी को वहशी बनाती है, समाज को तोड़ती है, राष्ट्रों को धूल में मिला देती है. हम अपना 1947 याद रखें जब हमने अपना ही मुल्क धूल-धूल कर लिया था. उस इतिहास के खलनायकों को खोजिए व पढ़िए ! 

इतिहास सावधान करता है:  देखो, मुझे समझे बग़ैर पढ़ते-लिखते-आंकते हो, प्रचारित व प्रसारित करते हो तो तुम भी औरंगजेब हो, क्योंकि हम सबके भीतर औरंगजेब नाम का एक सांप पलता है. उसे दूध पिलाना अपने अंतर्मन को जहर से भरना है. इसलिए मैंने जो दर्ज किया है, उसे जरूरी हो तो पढ़ो; पढ़ो तो गहराई से समझो; और समझो तो यह समझो कि आज इससे आगे चलने में क्या मदद मिलती है. आज के भारत राष्ट्र को समेट-संभाल कर आगे ले चलने में ‘छावा’ मदद नहीं करती है, क्योंकि यह इतिहास का व्यापार करती है, इतिहास समझाती नहीं है. ( 11.03.2025)

Saturday, 1 March 2025

बन गया विश्वगुरू क्लब !

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कोई इस तरह आ खड़ा होगा, न हमने सोचा था, न इन दोनों ने. लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल जं-मीशेल फ्रेडरिक मैक्रों ने ऐसा ही किया. इसलिए मैं चाहता हूं कि भारत की तरफ से उन्हें महावीर चक्र प्रदान किया जाना चाहिए. मैं नहीं कह रहा हूं “ भारत सरकार की तरफ़ से”, क्योंकि मैं जानता हूं कि भारत सरकार में ऐसी कूवत नहीं है. देश व सरकार में फर्क होता है; है.

राष्ट्रपति बनते ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जैसी बेसिर-पैर की आंधी बहा रहे हैं डोनल्ड ट्रंप, उसकी हवा जिस तरह मैक्रों ने निकाली है वैसी न किसी ने अब तक निकाली है, न ट्रंप ने कभी ऐसा सोचा ही होगा. उस दिन व्हाइट हाउस में, दोनों राष्ट्रपति साथ बैठ कर प्रेस को संबोधित कर रहे थे और ट्रंप बगैर हिचक के वह सब अनाप-शनाप कहे जा रहे थे जैसा उनके अलावा दूसरा कोई बोल नहीं सकता है. वे कह रहे थे कि यूक्रेन की जैसी सहायता अमरीका ने की है, वैसी यूरोप ने नहीं की. यूरोप ने तो इधर-उधर कुछ दिया भर ! वे अपनी सनक में और कुछ बोलते कि उनकी बगल में बैठे मैक्रों ने उनके कंधे पर हाथ रख कर उन्हें रोका: ‘ आपके पास गलत जानकारी है. मैं सही जानकारी देता हूं. अमरीका ने यूक्रेन को जो भी सहायता दी है वह सब शर्तों से बंधी, सौदे व कर्जे के रूप में है. यूरोप ने पिछले दो वर्षों में  यूक्रेन की हर संभव मदद बेशर्त की है, और आज भी हम यूक्रेन के प्रति प्रतिबद्ध हैं !’ सारी दुनिया ने यह सुना, सारी दुनिया ने यह देखा. हतप्रभ ट्रंप बगलें झांकने लगे. 

ट्रंप ने जब कहा कि युद्ध के खर्च की भरपाई यूक्रेन को करनी होगी, तो मैक्रों ने फिर दखल दी और कहा: ‘ हमलावर तो रूस है. भरपाई उसे करनी होगी.’ यूक्रेन का क्या होगा, ट्रंप उसे कहां तक निचोड़ेंगे, यह सब वक्त ही बताएगा लेकिन मैक्रों ने व्हाइट हाउस में, ट्रंप के बगल में बैठ कर उनकी पोल जिस तरह खोली, उसके लिए उन्हें महावीर चक्र मिलना ही चाहिए. 

अमरीका इन दिनों सब दूर छाया हुआ है. यही तो ट्रंप का वादा भी था. कोई जादूगर जैसे हैट से खरगोश निकाल देता है; और यह जानते हुए भी कि यह खरगोश हैट से नहीं, हैट के पीछे छिपे हाथ की सफ़ाई से निकला है, हम हैरान रह जाते हैं; ठीक वैसे ही ट्रंप के खरगोश लगातार बाहर आ रहे हैं और उनकी सच्चाई जानते हुए भी कभी हम, तो कभी वो हैरान रह जाते हैं. मुझे पता नहीं है कि ट्रंप साहब ने यह कला ‘अपने दोस्त’ से सीखी है या दोस्त ने उनसे लेकिन जुगलबंदी ऐसी गजब की है कि दोनों गुरूभाई मालूम देते हैं. विश्वगुरू ने विश्वदादा को सिखलाया है कि विश्वदादा ने विश्वगुरू को, यह पहेली है जिसे वक्त ही सुलझाएगा.

ट्रंप साहब ने अचानक यह शिगूफा उड़ाया कि उनसे पहले जो वहां राष्ट्रपति थे, उन बाइडन साहब ने कोशिश की थी कि भारत नरेंद्र मोदी को नहीं, किसी दूसरे को प्रधानमंत्री चुने. भारतीय राजनीति में विदेशी हाथ !! एकदम सनसनीखेज खबर एकदम शीर्ष से आई, तो भक्तों को उसे हाथोहाथ लेना ही था. ट्रंप साहब ने यह कहा ही नहीं, इसका ठोस प्रमाण भी दिया कि यूएसएड नामक संस्थान ने 21 मीलियन डॉलर की रकम भारत में झोंकी थी ताकि चुनाव में अधिकाधिक मतदाता मतदान केंद्रों तक लाए जा सकें. अमरीकी राज्य मियामी की एक सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा :“ आख़िर हमें क्या पड़ी है कि हम भारत में मतदाताआों की संख्या बढ़ाने के लिए 21 मीलियन डॉलर खर्च करें ? बाप रे, 21 मीलियन डॉलर !! मेरा अनुमान है कि वे कोई ऐसा झोल करने में लगे थे कि भारत में कोई दूसरा आदमी चुना जाए.” 

आप ध्यान दें कि विश्वगुरू व विश्वदादा जब भी ऐसी कोई युग परिवर्तनकारी घोषणा करते हैं तब मंच सार्वजनिक सभा का होता है, और मुद्रा उस अनाड़ी शिकारी की होती है जो यहां-वहां, इधर-उधर, दाएं-बाएं तीर चलाता जाता है कि कोई तो, कहीं तो निशाने पर लगेगा ! ट्रंप साहब के इस वक्तव्य में कितने तीर, कितनी दिशाआों में फेंके जरा इसका अंदाजा कीजिए : बात इस तरह कही गई कि ऐसा लगा कि उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडन साहब ने यूसएसएड नाम का कोई निजी संस्थान बना रखा था ( पीएम केयर फंड !) जिससे पैसे फेंक कर वे दुनिया की राजनीति को मुट्ठी में करना चाहते थे. तो पहला निशाना यह कि जो बाइडन अपने देश को, अपने कानूनी प्रावधानों को धोखा देने वाले घटिया आदमी थे; दूसरा यह कि वे इन पैसों के बल पर दूसरे देशों के चुनावों में टांग अड़ाते थे; तीसरा यह कि वे भारत में नरेंद्र मोदी की जगह कोई दूसरा आदमी आगे लाना चाहते थे - “ लेकिन देखो भाइयो, मैंने बाइडन का वह सारा खेल मटियामेट कर दिया ! नरेंद्र मोदी, समझ लो, मैंने, डोनल्ड ट्रंप ने तुमको ऐसे षड्यंत्र का जाल काट कर, फिर से गद्दी पर बिठाया है ! 

यह सफेद झूठ है. वह आदमी यह कह रहा है जिसे मालूम है कि यूएसएड संस्थान बाइडन के राष्ट्रपति बनने से बहुत पहले से बना व चल रहा वह संस्थान है जो दुनिया भर में, दुनिया भर के दान-धंधे करता है. 1961 में राष्ट्रपति केनेडी ने फॉरेन असिस्टेंस एक्ट पारित किया था जिसमें से यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट ( यूएसएड) बना. ट्रंप को भी और हमें भी मालूम है कि अमरीका की सरकारें, और दुनिया की सरकारें ऐसे सारे धर्मादा कार्य अपने संकीर्ण राजनीतिक ध्येय हासिल करने के लिए करती हैं. उसमें ‘धर्म’ कम-से-कम, ‘मर्म’अधिक-से-अधिक होता है. ट्रंप साहब को ज़रूर बताया गया होगा कि 1954 में भारत के साथ अमरीका का पीएल 480 का समझौता हुआ था जिसे ‘फूड फॉर पीस’ कहा गया था. इस समझौते के तहत भूख की बंदूक में अनाज की गोली भरी गई थी. लंबे समय तक वह गोली खाते-खाते हम यह समझ सके थे कि कैसे अनाज के माध्यम से अमरीका ने हमारी स्वायत्तता पर हाथ डाला है. तब प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने ‘भूखे रहेंगे पर पीएल480 का अनाज नहीं खाएंगे’ जैसा राष्ट्र-संकल्प घोषित किया था. 

1950 में इसी अमरीका की पहल पर एक सांस्कृतिक मंच बना था जिसका नाम था कांग्रेस फॉर कल्चरल फ़्रीडम. यह मंच बना और देखते-देखते दुनिया के कोई 40 देशों में काम भी करने लगा. सांस्कृतिक स्वतंत्रता के संवाहक व संरक्षक का मुखौटा लगाए इस मंच से, उस दौर की, दुनिया की तमाम विशिष्ठ हस्तियां जुड़ गई थीं. हमारे जयप्रकाश नारायण इसकी भारतीय शाखा ने मानद अध्यक्ष थे. फिर पर्दाफाश हुआ कि यह साम्यवादी प्रभाव को काटने के लिए, अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए के धनतंत्र से संचालित वह उपक्रम है जो अमरीकी हितों के संरक्षण के लिए काम करता है. यह पर्दाफाश हुआ तो जयप्रकाश समेत सारे नामी-गरामी लोगों ने इस संस्थान से इस्तीफा दे दिया. तो बात फिर खुली कि अमरीका अपने धनबल से अपना राजनीतिक हित छीनने-खरीदने का काम करता आया है. लेकिन यहां जिस 21 मीलियन डॉलर की बात ट्रंप ने की और भक्तों ने जिसे कांग्रेस से जोड़ दिया दरअसल वह रकम बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया को लोकप्रिय बनाने के लिए भेजी गई थी. भारत का या कांग्रेस का उससे कोई नाता नहीं था. यह बात ट्रंप को भी पता थी लेकिन ऐसे जुमले भारत में ही नहीं, अमरीका में भी राजनीतिक काम करने के काम आते हैं. इसलिए ट्रंप ने झूठ की गोली दाग दी. भूख, बीमारी, अशांति, युद्ध, प्राकृतिक आपदा, विशेष अध्ययन व शोध जैसे शीर्षकों की आड़ में अधिकांशत: ऐसे अधार्मिक धार्मिक कार्य किए जाते हैं. इसलिए ट्रंप जो कह रहे हैं, वह उन जैसे दादा देशों की पोल खोलता है, शिकार देशों की नहीं. 

लेकिन यहां कमाल यह है कि यह बात वह आदमी कह रहा है जो खुद पिछले राष्ट्रपति चुनाव में अपना पलड़ा भारी करने के लिए नरेंद्र मोदी को मोहरा बना कर अमरीका ले गया था. अमरीका में बसे सुविधापरस्त व सांप्रदायिक भारतीयों को सम्मोहित कर, उनका वोट हासिल करने का यह शर्मनाक आयोजन था. मोदी भी वहां सहर्ष गए तथा भारतीय प्रधानमंत्री ने अमरीकी चुनाव में खुलेआम दखलंदाजी की. इससे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने ऐसा करने की कल्पना भी नहीं की थी. उस अमरीकी चुनाव में मोदी व ट्रंप दोनों हारे. इस हार से ही ट्रंप समझ गए मोदी-ढोल की पोल ! इसलिए इस बार उन्होंने चुनाव में न मोदी को बुलाया, न शपथ ग्रहण में पूछा, न किसी तरह अमरीका पहुंचे मोदी का किसी अलग उत्साह से स्वागत ही किया. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सब कुछ ऐसा ही वक्ती होता है. 

अब ट्रंप रूस को साथ ले कर चीन को अमरीकी हितों के अनुकूल बनाने का समीकरण साधने में लगे हैं. आंतरिक मामलों के लिए उन्होंने बेलगाम मस्क को लगाम थमा दी है. अब भारत को भी अमरीका की अनदेखी न करते हुए, अपने नये समीकरण बनाने हैं जो ट्रंप-पक्षधरता की अपनी छवि के कारण भारत के लिए आसान नहीं होगा. मतलब, विश्वगुरू और विश्वदादा के आपसी रिश्ते में कोई विषम कोण बन सकता है. हम उस विषम कोण के लाचार शिकार बनेंगे. ( 28.02.2025)

Wednesday, 19 February 2025

हादसा नहीं, हत्या !

 नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उस दिन टिकट नहीं गिने गए, लाशें गिनी गईं. मानो तो रेलवे स्टेशन पर एक नया कुंभ हुआ. कुंभ की तरह यहां भी सरकार ने सबसे पहले लाशें समेटीं, हादसे के सारे चिन्ह मिटाए, मृतकों की एक संख्या ऐसे घोषित कर दी मानो वहां नोट गिनने जैसी कोई मशीन लगी थी जिसने मृतकों की पक्की संख्या तक्षण बता दी ! इधर संख्या बता दी उधर मौत की कीमत बता दी आौर फिर अगला कार्यक्रम शुरू ! ऐसा ही तो कुंभ में हुआ था. लाशें समेट कर कुंभ फिर चल निकला था. कितनों ने डुबकी लगाई- राष्ट्रपति ने भी, उप-राष्ट्रपति ने भी, प्रधानमंत्री ने भी, पक्ष-विपक्ष के आला लोगों ने भी, समाजसेवियों ने भी, खिलाड़ियों व अभिनेताआों ने भी आौर पता नहीं किन-किन ने; लेकिन कहीं न पढ़ा न सुना कि किसी ने कहा हो कि कुंभ में डुबकी लगा कर मैंने मृतकों की मुक्ति की याचना की आौर अपनी आपराधिक चूक की माफी मांगी ! 

दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी ऐसा ही हुआ. लाशें समेट कर, मृतकों की एक संख्या घोषित कर, भगदड़ को हादसे का ज़िम्मेदार बता कर रेलवे ने जल्दी से प्लेटफॉर्म खोल दिए, टिकटों की बिक्री शुरू कर दी है. जो कुछ हुआ उसे उसी तरह मिटा दिया गया जिस तरह बच्चे स्लेट पर अपना लिखा मिटा देते हैं.  बेचारे करते भी क्या ! क्या कुछ लोगों के मर जाने से रेलवे बंद कर देते ? कुंभ रोक देते ? इहलोक से परलोक का महात्म कहीं अधिक होता है. व्यवस्था की अपनी एक मशीन है भाई, आप उसे मानवीय बनाने की कोशिश न करें. आखिर उसने मृतकों की कीमत तो चुका दी है न ! आप देख ही तो रहे हैं कि सारी दुनिया को ज्ञान बांटने की मुहिम से थके-हारे प्रधानमंत्री ने अभी दिल्ली पहुंच कर सांस भी नहीं ली थी कि उन्हें मृतकों से प्रति गहरी संवेदना का संदेश जारी करने की मशक्कत करनी पड़ी.  जब उनका संदेश आ गया तो फिर रेलमंत्री ने भी अपना संवेदना संदेश जारी किया. ऊपर से हरी झंडी मिली तो एक-एक कर मंत्रियों,मुख्यमंत्रियों सबकी संवेदना का तंत्र झंकृत हो रहा है, आौर हम लगातार होते हादसों में मारे गए अपने लोगों की लाशें समेटते-समेटते, अगले हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं. यह नया हिंदुस्तान है !

 न,न, आप उबल मत पड़िए, न बांहें चढ़ा कर हमसे पूछिए कि क्या इससे पहले की सरकारों के दौर में हादसे नहीं होते थे ? हम मानते हैं कि हादसे पहले भी होते थे लेकिन हादसों का राज्य प्रायोजित आयोजन नहीं होता था. 

दिल्ली में जो हादसा हुआ क्या वह लोगों की असावधानीवश हुआ ? नहीं, लोगों ने कोई असावधानी नहीं की थी. अगर की थी तो इतनी ही कि सरकारी प्रचार में बह कर वे सब कुंभ जाने को व्यग्र हो उठे थे. ऐसी व्यग्रता अज्ञान, कुशिक्षा आौर अंधविश्वास में से पैदा होती है जिसकी आंधी उठाने में सत्ता एक दशक से पूरा जोर लगा रही है. हाल ऐसा है कि हवाई जहाजों में धनवान आौर सत्ताधीश उमड़े हुए हैं. धनसंपन्न मध्यम वर्ग भी उचक-उचक कर इसी जमात में शामिल होने का सुख ले रहा है. हवाई कंपनियां मनमाना दाम वसूल कर, इन्हें कुंभ पहुंचा रही हैं. रेलवे ने विशेष गाड़ियां चला रखी हैं जो लाद-लाद कर लोगों को कुंभ पहुंचा रही हैं.  बसें, टैक्सियां सब इसी काम में जोत दी गई हैं. ऐसा कभी देखा था कि लोगों के धार्मिक विश्वास को सत्ता के हवन कुंड में इस तरह होम किया जा रहा हो ? 

दिल्ली रेलवे स्टेशन के अधिकारियों से ले कर कुलियों तक को पता था कि भीड़ बेतहाशा बढ़ती चली जा रही है. प्लेटफॉर्म पर खड़े होने की जगह नहीं बची थी.  न टिकटों की बिक्री रोकी गई, न लोगों को प्लेटफॉर्मों पर पहुंचने से रोका गया. वहां कुंभ जाने वाली कई गाड़ियों का जमावड़ा था. इसलिए अफरा-तफरी चरम पर थी. कोई बताए कि यह योजना किसने बनाई थी? सामने ऐसी भीड़ को देखने के बाद भी अधिकारियों ने प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा कर दी.  इससे बड़ी जाहिली की कल्पना नहीं की जा सकती है ! सामान्य अवसरों पर भी जब रेलवे अचानक प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा करती है तब भी हम देखते हैं कि कैसी अफरा-तफरी मच जाती है. उस दिन जैसी भीड़ थी उसमें अचानक प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा आपराधिक कृत्य था.  अंतिम समय में प्लेटफॉर्म बदलने की यह वृत्ति बढ़ती जा रही है जो रेलवे अधिकारियों के खराब आयोजन, अकुशलता तथा संवेदनहीनता का प्रमाण है. रेल अधिकारी कौन हैं ? सरकारी रवैये की प्रतिछाया !  किसी तरह नये प्लेटफॉर्म पर पहुंच कर, गाड़ी में अपनी जगह लेने की बदहवास होड़ में वह सब हुआ जिसका स्यांपा अब किया जा रहा है. आौर हद तो यह कि हादसे की जांच के लिए रेलवे के ही अधिकारियों की समिति बना दी गई ! अपने अपराध की जांच भी अपराधी स्वयं करें तथा अपनी सजा भी ख़ुद ही तय करें, यह तो ऐसी कीमिया न है जिससे महात्मा गांधी भी हतप्रभ रह जाएंगे.  

लेकिन यहां एक दूसरा सवाल भी है. लोगों को भीड़ बनाने की इस वृत्ति के पीछे कौन है ? हमारे लोग अधिकांशत: अशिक्षित, कुशिक्षित तथा अंधविश्वासी हैं. इस सरकार ने अपना सारा छल-दल-बल लगाकर, सारे देश में इसका जश्न मनाने का अभियान चला रखा है. यह कुंभ उसी अभियान का हिस्सा है. हमारी परंपरा में जिस कुंभ की महिमा ऐसी रही है कि उसकी सबसे बड़ी अध्यात्मिक शक्ति उसकी स्वस्फूर्ति में रही है न कि राज्य की धोखाधड़ी में. अनगिनत सालों से न कोई किसी को बुला या फुसला कर कुंभ में लाता था, न अकूत धन उड़ेल कर उनकी डुबकी की व्यवस्था होती थी. यह अप्रायोजित आयोजन मन:पूर्वक होता था. लोग अपनी-अपनी श्रद्धा, सुविधा व हैसियत के मुताबिक कुंभ या ऐसे आयोजनों में जाते थे. अब ऐसी हर सांस्कृतिक परंपरा का राजनीति इस्तेमाल किया जा रहा है. अंदरखाने की एक आवाज़ यह भी कहती है कि यह मोदी व योगी के बीच की वर्चस्व की लड़ाई का मुद्दा बन गया जिसमें योगी ने ख़ुद के लिए वैसी राजनीतिक कमाई कर ली जैसी प्रधानमंत्री नहीं कर सके. लेकिन यह तो भाजपा का आंतरिक मामला है. 

सरकार कुंभ का आयोजन क्यों करे भला ? भारतीय संविधान के मुताबिक़ चलने वाली  किसी सरकार का यह काम हो सकता है क्या ? क्यों यह बात उछाली गई कि जो कुंभ नहीं जाएगा, उसकी देशभक्ति संदेह के घेरे में होगी ? किस परंपरा के मुताबिक इसे महाकुंभ कहा गया ? ऐसा कोई शब्द कुंभ की परंपरा में तो है नहीं !  खबर यह भी है कि राज्यों को कोटा दिया गया कि कितने भक्त उसे कुंभ में भेजने हैं. धार्मिक उन्माद खड़ा कर जब आप करोड़ों की भीड़ जुटाते हैं तब आप दूसरा कुछ नहीं करते, हादसों का आयोजन करते हैं.  अगर आपका दावा सही मान लें हम कि 50 करोड़ लोगों ने कुंभ में डुबकी लगाई तो कोई हमें बताए कि इतनी बड़ी उन्मादी भीड़ को कौन-सी व्यवस्था संभाल सकती है ? भीड़ की एक परिभाषा यह भी तो है न कि उसके पास सर होता है, समझ नहीं ! सत्ता के लिए यह सर ही अंतिम कसौटी है, समझ से उसका वास्ता रहा ही कब  है ? इसलिए आदमी नहीं, उसे हर सर एक वोट दिखाई देता है जिसे उन्मादित कर अपने खाते तक पहुंचाना उसका चरम धार्मिक कर्तव्य होता है. 

कोई हिसाब लगा कर बताए कि कुंभ आने में, कुंभ से जाने में आौर कुंभ-स्थल पर अब तक कितने हादसे हुए हैं आौर कितनी जानें गई हैं ? ऐसा हिसाब लगाएंगे आप तो हमेशा आपको दो आंकड़े  मिलेंगे : सरकारी व सामाजिक ! दोनों के बीच इतनी गहरी विषमता होगी कि आप हैरान रह जाएंगे. जब कभी ऐसा हो तो मान लेना चाहिए कि लाशों के आंकड़े नहीं, मनोवृत्ति को आंकना जरूरी है. वह अगर हम पहचान सके तो आगे लाशें गिनने की नौबत नहीं आएगी. ( 19.02.2025)  

Friday, 22 November 2024

खाली संविधान !

         तो राहुल गांधी के सबसे धारदार हथियार की धार भोथरी करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक ऐसा झूठ बोला कि जिस बराबरी का झूठ खोजना उनके संसार में भी मुश्किल है. झूठ की शिफत यही है कि उसे हर बार पिछले से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बोलना चाहिए अन्यथा उसकी तासीर बेअसर हो जाएगी. प्रधानमंत्री इस कला के माहिर उस्ताद हैं. वे झूठ भी बोलते हैं - याकि झूठ ही बोलते हैं ! - और सार्वजनिक विमर्श का स्तर इतना गिराते जाते हैं कि शालीनता, विवेक, ज्ञान आदि के खड़े होने की जगह ही न बचे. जवाब में फिर दूसरी तरफ से भी उसी स्तर की बातें आती हैं.   

लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी अपने भाषणों में भारतीय संविधान की लाल रंग की एक आवृत्ति दिखाते घूमते रहे. उनका कहना है कि भारतीय संविधान में वह सब कुछ है जो आंबेडकरजी, गांधीजी, फुलेजी आदि के दर्शन में है. वे समझाते हैं कि जनता के अधिकार, जनता की शिक्षा, जनता का आरक्षण, जनता का रोजगार, जनता की आजादी आदि सभी इसी संविधान से निकलती है और प्रधानमंत्री इसी संविधान को समाप्त करना चाहते हैं. बक़ौल राहुल गांधी प्रधानमंत्री व भारतीय जनता पार्टी ऐसा इसलिए चाहती है कि उसे समता व बराबरी का समाज नहीं चाहिए. वे इससे जुड़ी तमाम दूसरी बातें भी कहते हैं. राहुल गांधी जो कर रहे हैं, वह सब सही है, ऐसा तो कैसे कहें हम लेकिन हम यह कहना जरूर चाहते हैं कि राहुल जो कह रहे हैं, उस पर गहराई से विचार होना चाहिए. 

लेकिन किसी विचार की बात तो दूर, प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी को ऐसा जवाब दिया कि जिसका सर है, न पांव ! प्रधानमंत्री दहाड़ कर बोले, बार-बार बोले और हर बार नई मुद्रा में बोले कि राहुल गांधी संविधान की जो किताब दिखाते हैं उसके भीतर कुछ लिखा ही नहीं है. वह खाली है. राहुल गांधी ने अपनी अगली सभा में फिर किताब दिखाई लेकिन इस बार उसे खोल कर भी दिखाया. उसमें बाजाप्ता लिखा हुआ था. वह खाली नहीं थी. अभी तक किसी ने उस किताब की ऐसी कोई प्रति सार्वजनिक भी नहीं की है जो ऊपर से लाल हो लेकिन भीतर से खाली हो. 

हमारा संविधान प्रधानमंत्री ने पढ़ा हो कि नहीं, देखा तो जरूर होगा. उसके सामने दंडवत होते वक्त भी उन्हें अनुमान तो हुआ ही होगा कि वह एक खासा भारी-भरकम ग्रंथ है. उतना बड़ा ग्रंथ उस गुटके में समा ही नहीं सकता है. तो संविधान का सार बताने वाला वह प्रतीक संस्करण है. कांग्रेस ने तुरंत ही वह फोटो भी छाप दिया जिसमें प्रधानमंत्री स्वंय ही तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को वही लाल संस्करण भेंट कर रहे हैं. तो क्या प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को कोरा गुटका दे कर झांसा दिया था. अगर नहीं, तो राहुल गांधी ऐसा झूठा काम क्यों करेंगे जो तभी-के-तभी, वहीं-के-वहीं पकड़ा जा सके ! पप्पू कैसा भी पप्पू हो, ऐसा फेंकू तो नहीं हो सकता ! 

अब अपना अमृत-प्रवचन दे कर प्रधानमंत्री देश से बाहर चले गए. भारतीय जनता पार्टी उनके इस झूठ को सन्नाटे में डुबो कर ही झेल सकती है. वह झेल रही है. लेकिन इससे भारतीय जनता पार्टी को हासिल क्या हुआ ? राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में अब अपनी ऐसी जगह तो बना ही ली है कि उन्हें प्रधानमंत्री वापस पप्पू साबित नहीं कर सकते. सहमति-असहमति, योग्यता-अयोग्यता सब अपनी जगह है लेकिन कांग्रेस को भी राहुल को उसी तरह ढोना है जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी को ढोना है. यह दोनों पार्टियों का अंदरूनी मामला है. लेकिन किसी को यह हक कैसे मिल सकता है कि वह मतदाता को ऐसा मूर्ख माने और चुनाव-प्रचार को इतनी फूहड़ता से ले !    

चुनाव प्रचार को झूठ का बवंडर और अर्थहीन जुमलों का ऐसा जंगल बना दिया गया है कि वहां लोकशिक्षण की जगह ही बाकी नहीं रही है.  चुनाव प्रचार मतदाता को जागरूक करने का नहीं, उसके ही पैसे से उसे मूर्ख बनाने का सबसे बड़ा संवैधानिक आयोजन बन गया है. सारी संवैधानिक संस्थाएं इस शर्मनाक प्रहसन की मूक दर्शक भर हैं. देश के सार्वजनिक व वैधानिक जगत का ऐसा पतन संविधान निर्माताओं की कल्पना में नहीं रहा होगा. 1977 के अत्यंत नाजुक लोकसभा चुनाव के वक्त भी कम नहीं थे ऐसे ज्ञानी-धुरंधर जो जयप्रकाश नारायण को समझाते रहे थे कि साधारण लोग कहां समझेंगे आपकी यह लोकतंत्र व तानाशाही की बात ! “ दो में से एक चुनना है : लोकतंत्र या तानाशाही !” का सीधा नारा दे कर, वे यह कहते हुए आगे निकल गए कि आप लोग अपनी समझ की फिक्र कीजिए, जनता की नहीं! साधारण मतदाता ने वह चुनौती समझी और लोकतंत्र उभर आया.     

संविधान की किताब दिखा कर चुनाव की तासीर बदलने की राहुल की कोशिश आज भी जारी है. कांग्रेस संगठन में कोई राजनीतिक समझ होती तो वह इसी का बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकती थी. जब सामने वैचारिक शून्यता का घटाटोप रचा जा रहा हो, तब आपकी सामान्य वैचारिक बातें भी जड़ जमा लेती हैं. लेकिन कांग्रेस में ऐसी समझ होती तो उसका ऐसा हाल होता ही क्यों! कोई चिढ़ कर जवाब देता है कि जहां राहुल गांधी की अपनी सरकारें हैं, वहां भी तो वह सब नहीं हो रहा है जो राहुल गांधी कह रहे हैं. बात गलत नहीं है लेकिन यह राहुल गांधी की बात का जवाब नहीं है. जिस तरह मतदाताओं को नंगों-कंगलों-भीखमंगों की भीड़ समझ कर रुपये बांटने की नई शैली चली है, जिसमें कांग्रेस-भाजपा में एक-दूसरे को मात देने की होड़ चल रही है, वह भी इस बात का जवाब नहीं है कि संविधान में कैसा भारत बनाने का सपना दर्ज है, और वैसा भारत बनाने का क्या रास्ता संविधान बताता है. सबसे बड़ा क्षद्म यह है कि अब सभी संविधान की शपथ लेते हैं, उसे पढ़ता कोई नहीं है. अभी-अभी सेवानिवृत हुए हमारे सर्वोच्च न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ साहब ने तो बाकायदा घोषणा ही कर दी कि संविधान पढ़ना ईश्वर का काम है, न्यायपालिका का काम ईश्वर से पूछ लेना भर है. 

देश इतना खोखला बना दिया गया है, मतदाता इतनी बार, इतनी तरह से छला गया है कि आज सारा कुछ संविधान में सिमट आया है. प्रधानमंत्री भले खिल्ली उड़ाएं कि राहुल गांधी खाली संविधान दिखा रहे हैं, देश को आज जरूरत खाली संविधान की ही है. खाली संविधान की कसौटी पर विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका को कसने की ताकत देश एक बार पा ले तो गाड़ी पटरी पर लौट सकती है. मीडिया संस्थानों का विष-दंत भी संविधान ही तोड़ सकता है. मतदाता को यह ताकत व यह दृष्टि खाली संविधान से ही मिल सकती है. हम सब अपनी-अपनी जगह पर इसके औजार बनें तो 1977 का चमत्कार फिर दोहराया जा सकता है. ( 20.11.2024)