Wednesday, 6 July 2022

जो तोड़ने से भी न टूटे वह गांधी है

बिहार का चंपारण एक नहीं, कई अर्थों में महात्मा गांधी की जन्मभूमि है. यहीं से भारतीय सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, 1917 में वे प्रवेश करते हैं अौर फिर अनवरत कोई 31 सालों तक के अनवरत संघर्ष की वह जीवन-गाथा लिखते हैं जिसे हिंदुत्व की धारा में कु-दीक्षित नाथूराम गोडसे की तीन गोलियां ही रोक सकीं. उसी चंपारण के मोतिहारी के चर्खा पार्क में खड़ी गांधी की मूर्ति अाज खंड-खंड कर दी गई है. फिर यहीं से थोड़ी दूर, तुरकौलिया में गांधी-प्रतिमा को शराब की थैलियों की माला पहना कर, विकृत कर छोड़ दिया गया है. अाज ऐसा मोतिहारी में हुआ है, कल कहीं अौर होगा- पहले कहीं अौर हो भी चुका है. ऐसी घटनाअों से नाराज या व्यथित होने की जरूरत नहीं है. फिक्र करनी है तो हम सबको अपनी फिक्र करनी है जो लगातार गहरी फिक्र का बायस बनती जा रही है.


गांधी की प्रतिमाअों के खिलाफ एक लहर तब भी आई थी जब नक्सली उन्माद जोरों पर था. गांधी की मूर्तियों पर हमले हो रहे थे- वे तोड़ी जा रही थीं, विकृत की जा रही थीं, अपशब्द अादि लिख कर उन्हें मलिन करने की कोशिश की जा रही थी. तब यहां-वहां चेयरमैन माअो के समर्थन में नारे भी लिखे व लगाए जा रहे थे. मूर्तियों से लड़ने के इसी उन्मादी दौर में बिहार के जमशेदपुर में जब गांधी की एक मूर्ति का विभंजन हुआ था तब जयप्रकाश नारायण ने अपनी गांधी-बिरादरी को संबोधित करते हुए लिखा था कि गांधी से इन लोगों को इतना खतरा महसूस होता है कि वे इनकी मूर्तियां तोड़ने में लगे हैं, इसे मैं आशा की नजरों से देखता हूं. यह हम गांधीजनों को सीधी चुनौती है जो अपनी-अपनी सुरक्षित दुनिया बना कर जीने लगे हैं. चुनौती नहीं तो गांधी नहीं, ऐसा भाव तब जयप्रकाश ने जगाया था जो शनै-शनै उस लहर में बदला जिसे इतिहास में जयप्रकाश अांदोलन या संपूर्ण क्रांति आंदोलन कहा जाता है. 


आज गांधी के खिलाफ एक दूसरा ध्रुव उभरा है जो हिंदुत्व के नाम से काम करता है. यहां-वहां से अपनी बची-खुची ताकत से नक्सली हमलों व हत्याअों की खबरें अाती रहती हैं लेकिन यह साफ है कि राज्य की हिंसा अब भारी पड़ रही है. हिंसा का यह दुष्चक्र नया नहीं है बल्कि यही इसका शास्र है कि बड़ी हिंसा छोटी हिंसा को खा जाती है अौर छोटी हिंसा बड़ी बनने की तिकड़म में लगातार हमले करती रहती है. इन दो हिंसाअों के बीच समाज पिसता रहता है. 


हिंदुत्व का यह नया ध्रुव सत्ता की ताकत पा कर ज्यादा हमलावर व ध्वंसकारी हो गया है. पहले उसने गोली मारी थी लेकिन गांधी मरे नहीं. अब वे उनकी उन सारी स्मृतियों को पोंछ डालना चाहते हैं जो उनकी क्षुद्रता व विफलता की गवाही देता है. इसलिए तब गांधी के खिलाफ वामपंथियों ने चेयरमैन माअो का प्रतीक खड़ा किया था, हिंदुत्व वाले नाथूराम गोडसे का प्रतीक खड़ा करने में जुटे हैं. 


गांधी होते तो आज डेढ़ सौ साल से ज्यादा उम्र के होते. इतने साल आदमी कहां जीता है ! लेकिन गांधी जी रहे हैं तभी तो हम उनसे सहमत-असहमत ही नहीं होते रहते हैं, उनकी मूर्तियों पर हमला कर अपना क्रोध या अपनी असहमति व्यक्त करते हैं. गांधी न कभी सत्ताधीश रहे, न व्यापार-धंधे की दुनिया से अौर उसके शोषण-अन्याय से उनका नाता रहा, न उन्होंने कभी किसी को दबाने-सताने की वकालत की, न गुलामों का व्यापार किया, न धर्म-रंग-जाति-लिंग भेद जैसी किसी सोच का समर्थन किया. वे अपनी कथनी अौर करनी में हमेशा इन सबका निषेध ही करते रहे. वे कहते व करते इतना ही रहे कि हमारे निषेध का रास्ता हिंसक नहीं होना चाहिए. उनका तर्क सीधा था अौर आज भी उतना ही सीधा है कि जितने तरह के शोषण, भेद-भाव, गैर-बराबरी, ज्यादती चलती है, चलती अाई है अौर आगे भी चल सकती है, उन सबकी जड़ हिंसा में है. 


हिंसा का मतलब ही है कि आप मनुष्य से बड़ी किसी शक्ति को, मनुष्य का दमन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं फिर चाहे वह शक्ति हथियार की हो कि धन-दौलत या सत्ता की या संख्या या उन्माद की. गांधी ऐसे किसी हथियार का इस्तेमाल मनुष्य के खिलाफ करने को तैयार नहीं होते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि इससे मनुष्य व मनुष्यता का पतन होता है अौर जिसके खिलाफ हम होते हैं, वह बना ही नहीं रहता है बल्कि पहले से ज्यादा क्रूर व घातक हो जाता है. हिंसा हमारे निष्फल क्रोध की निशानी बन कर रह जाती है. 


अहिंसक रास्ते से मनुष्य व मनुष्यों का समाज अपनी कमियों-बुराइयों से कैसे लड़ सकता है, अौर अपनी सत्ता बना सकता है, इसका कोई इतिहास नहीं है. जो अौर जितना है वह गांधी का ही बनाया है. तो गांधी एक संभावना का नाम है. कुछ लोग हैं ऐसे जो गांधी के बाद भी इस संभावना को जांचने अौर सिद्ध करने में लगे हैं. उनकी अपनी मर्यादाएं व कमजोरियां भी हैं जैसी हर मानवीय प्रयास की होती हैं. लेकिन ऐसे गांधी का अौर ऐसी कोशिशों का विरोध क्यों है ? गांधी के प्रति धुर वामपंथियों का अौर धुर दक्षिणपंथियों का द्वेष क्यों है ? यह द्वेष आज का नहीं, जन्मजात है. गांधी को अपने जीवन के प्रारंभ से तीन गोलियों से छलनी होने तक इनका घात-प्रतिघात झेलना पड़ा. ऐसा क्यों ? इसका कारण समझना किसी जटिल वैज्ञानिक समीकरण को समझने जैसा नहीं है हालांकि विज्ञान ही बताता है कि एक बार ठीक से कुछ भी जान-समझ लें हम तो जटिल या सरल जैसा कुछ नहीं होता है. जो जटिल है वह ज्ञात व अज्ञात के बीच की खाई है. 


गांधी इस अर्थ में बेहद खतरनाक हैं कि कैसी भी गैर-बराबरी, किसी भी स्तर पर भेद-भाव, किसी भी तर्क से शोषण-दमन को स्वीकारने को वे तैयार नहीं है- इस हद तक कि वे इनमें से किसी की मुखालफत करते हुए जान देने को तैयार रहते हैं. दूसरी तरफ यही गांधी हैं कि जो किसी भी तरह बदला लेने या प्रतिहिंसा को कबूल करने को तैयार नहीं हैं. मानव-जाति ने प्रतिद्वंद्वी से निबटने के जो दो रास्ते जाने,माने अौर लगातार अपनाए भी, वे इन्हीं दो बलों पर आधारित हैं. कहूं तो हमारी सभ्यता का सारा इतिहास शोषण-दमन तथा बदला व प्रतिहिंसा का दस्तावेज है. कोई तीसरी ताकत भी हो सकती है जो इस दुष्चक्र से मनुष्यता को त्राण दिला सकती है, इसका अविचल दावा अौर उस दिशा में लगातार साहसी प्रयास हमें गांधी में ही मिलता है.


गांधी से वामपंथियों का विरोध या द्वेष इधर कुछ कम हुआ है. राजनीतिक सत्ता की छीनाझपटी में लगी दलित पार्टियों का गांधी के खिलाफ विषवमन कुछ धीमा पड़ा है तो सोच-समझ रखने वाले दलितों के बीच से सहानुभूति व समन्वय की कुछ अावाजें उठने लगी हैं. लेकिन इन सबके पीछे राजनीतिक परिस्थितिजन्य मजबूरी कितनी है अौर समझ में बदलाव  कितना है, यह देखना अभी बाकी है. हम देख ही रहे हैं कि गांधी के अपमान व उनकी मूर्तियों के विभंजन पर इनकी तरफ से कोई खास प्रतिवाद नहीं होता है. 


प्रतिवाद में जो आवाजें उठती हैं उनमें हायतौबा ज्यादा होता है. यह भी सच है कि ऐसी घटनाअों के पीछे दिशाहीन सामाजिक उपद्रवी, शराबी-अपराधी किस्म के लोग भी होते हैं लेकिन यह भी सच है कि यह गांधी से विरोध-भाव रखने वाली राजनीतिक-सामाजिक शक्तियों का कारनामा भी है. यथास्थिति बनाए रखने वाली दक्षिणपंथी तथा हिंसा-द्वेष की लहर बहा कर उनकी जगह लेने में लगी वामपंथी ताकतों का यह वही खेल है जो गांधी को अपने हर कदम के इंकार में खड़ा पाता है. गांधी का यह इंकार इतना सशक्त, तार्किक व सीधा है कि 70 से अधिक सालों से लगातार अनुपस्थित होने पर भी वे गांधी की कोई सार्थक काट खोज नहीं पाए हैं सिवा छूंछा क्रोध प्रदर्शित करने के. यह असत का सत पर प्रहार है. 

गांधीवालों में इससे क्रोध या ग्लानि का भाव पैदा नहीं होना चाहिए. मूर्तियों का यह प्रतीक-संसार सारी दुनिया में अत्यंत बेजान, अर्थहीन व नाहक उकसाने वाला हो गया है. हमारा हाल तो ऐसा है कि बुद्ध जैसे मूर्तिपूजा के निषेधक की मूर्तियों से हमने जग पाट दिया है. तो गांधी पर हम गांधी वाले रहम खाएं अौर मन-मंदिर में भले उन्हें बसाएं, उनकी मूर्तियां न बनाएं. हम दृश्य-जगत में उनके मूल्यों की स्थापना का ठोस काम करें. गांधी सामयिक हैं, यह बात नारों-गीतों-मूर्तियों-समारोहों-उत्सवों से नहीं, समस्याअों के निराकरण से साबित करनी होगी. जो गांधी को चाहते व मानते हैं उनके लिए गांधी एक ही रास्ता बना व बता कर गए हैं : अपने भरसक ईंमानदारी व तत्परता से गांधी-मूल्यों की सिद्धि का काम करें ! इससे उनकी जो प्रतिमा बनेगी, वह तोड़े से भी नहीं टूटेगी. हम जयप्रकाश की वह चेतावनी याद रखें : “ गांधी की पूजा एक ऐसा खतरनाक काम है जिसमें विफलता ही मिलने वाली है.” इसलिए गांधी की हर विखंडित प्रतिमा दरअसल हमें विखंडित करती है अौर हमें चुनौती देती है. (20.02.2022)  

Saturday, 19 February 2022

लता मंगेशकर - भारत की आत्मा की आवाज

    नये साल ने आने की बड़ी कीमत ली है - लता मंगेशकर को ही मांग लिया है. हम खाली भी हो गए हैं, हतप्रभ भी और किसी हद तक अवाक भी ! वे 92 साल की थीं और पिछले कुछ वर्षों से नहीं-सी थीं. 

   वे थीं क्या ? फिल्मों की पार्श्वगायिका ! फिर इतना शोक क्यों है कि कोई भी सहज नहीं रह  पा रहा है ? इतना शोर क्यों ह? इतना गहन क्या घटा है कि हम भी और पाकिस्तान भीऔर बांग्लादेश भी, और जहां-जहां कानसेन हैं वहां-वहां अफसोस का सन्नाटा पसरा है ?  यह रहस्य कभी सुलझेगा नहीं, क्योंकि कला ऐसे ही सार्वजनिक रहस्य का नाम है. न पिकासो केगुएर्निका का रहस्य हम सुलझा सकेंगे, न विंसी की मोनालीसा का, न नंदलाल बोस के गांधी का, न लता मंगेशकर का.  

   लता के बारे में हम जो कुछ भी कह-लिख रहे हैं, वह पर्याप्त नहीं हो रहा है. लगता है कि कुछ ऐसा था जो हम कह-लिख-समझ कर भी न लिख पा रहे हैं, न कह पा रहे हैं और न समझ पारहे हैं. ‘दिनकर’ ने गांधी पर लिखी अपनी कविता में लिखा है : कितना कुछ कहूं/ मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है. ऐसा ही आज लता के लिए भी सच में महसूस हो रहा है. 

   13 साल की उम्र से जिस लड़की ने हमारे मन को छूना शुरू किया था, उसने कब हमारा मन गढ़ना शुरू कर दिया, पता ही नहीं चला. सितार के हर तार को झंकृत करने से रविशंकर जैसीलहर पैदा करते थे लताजी ने वैसे ही हमारे मन-प्राणों के हर तार को झंकृत कर हमें संपूर्ण किया. हमारे राग-विराग, हर्ष-शोक, चंचलता-गांभीर्य, भक्ति-समर्पण, ईर्ष्या-द्वेष सबको आवाज सेजैसा आकार दिया उन्होंने वैसा कोई दूसरा नहीं कर सका. इसमें जादू उनकी गायकी भर का नहीं था बल्कि उस पूरे वक्त का भी था जहां से उनके बनने का भी और आजाद भारत को बनाने कासफर भी शुरू हुआ था. वे स्वतंत्र देश की पहली स्वतंत्र आवाज थीं. 

   हमने जैसी रक्तरंजित आजादी पाई, वह तो अकल्पनीय थी. हमें खून में लिथड़ा, टूटा हुआ देश मिला. देश मिला लेकिन गांधी नहीं मिले. देश मिला लेकिन सहगल, नूरजहां जैसे कितनों कासाथ छूटा. आसमान से जैसे धरती पर गिरे हम; कि आसमान ही धरती पर गिरा ! बिखर जाने, घुटनों के बल बैठ जाने का खतरा सामने था. लेकिन जवाहरलाल ने अपने राजनीतिक साथियोंको, देश की हर प्रतिभा को समेट कर, उस तमाम तिमिर को काटते हुए भारत को गढ़ने की जो उमंग जगाई, भारतीय मन को झकझोर कर नया बनाने की जैसी हवा बहाई, आज उसको आंकनाहमारे लिए कठिन है, क्योंकि इतिहास हम पढ़ तो सकते हैं, उसमें लौट नहीं सकते. वास्तविकता की कठोर जमीन पर पांव धर कर आसमान को छूने व उसे भारत की धरती पर उतारने का वह दौरथा और तभी लता ने अपनी आवाज खोली थी. कला स्वतंत्र तो होती है लेकिन देश-काल की गूंज उसे भी गढ़ती व संवारती है. इसलिए तो कहते हैं कि कला की अपनी आंख भी होती है, कान भी और हृदय भी. लता की आवाज ने इन तीनों को एक कर दिया.  

   वह खास तौर पर हिंदी फिल्मों की दुनिया का स्वर्णकाल था- 1940-60. यह आजाद भारत का भी स्वर्णकाल था. धर्म-जाति-प्रांत-भाषा जैसी सारी दीवारों को गिराता हुआ यह भारतसर उठा रहा था. जैसे प्रतिभा के सागर में सारी हस्तियां खुद को उड़ेल रही थीं. देश बन रहा था. वह दिलीप-राज-देव-मीना कुमारी-नर्गिस-मधुबाला-नूतन-वहीदा का काल था; वह लता-रफी-मुकेश-तलत-मन्नाडे-हेमंत कुमार से चलता हुआ किशोर कुमार का काल था; वह प्रदीप-साहिर-शैलेंद्र-शकील-कैफी का काल था; वह नौशाद-सचिनदेव बर्मन-मदन मोहन-शंकर-जयकिशन-रवि-खैय्याम का काल था; वह विमल राय-महबूब-के.आसिफ-राज कपूर का काल था. सभी आजाद देश में अपना आजाद मुकाम खोज रहे थे. इसलिए सब अपना सर्वोत्तम ले कर आ रहे थे. लता का जाना सर्वोत्तम की उस दीवानगी का जाना है; उसकी स्मृति का पुंछ जाना है.  

   साहिर की कलम से निकले फिल्मी मुहावरों से अनजान गीत की धुन बनाना, उसे किसी दिलीप या मीना कुमारी के लिए गाना जितनी बड़ी चुनौती थी, उतनी ही बड़ी चुनौती थी किसीनर्गिस या नूतन के लिए लता की आवाज को साकार करना. सभी जानते थे कि कहीं कम पड़े तो फजीहत होगी. लता की खास ताकत थी शास्त्रीय गायन, जिसकी जमीन मराठी कला-संसार कीमशहूर हस्ती उनके संगीतकार पिता दीनानाथ मंगेशकर ने ही तैयार कर दी थी भले वह तैयारी कभी पूर्णता तक नहीं पहुंच सकी. 13 साल की लड़की जब परिवार के लिए रोटी जुटाने उतरी तो वहसाधना अधूरी ही रह गई जैसे शताब्दियों पुरानी गुलामी की मानसिकता से छूटने की कोशिश करता हुआ नवजात देश भी अधूरा ही छूटता गया. लेकिन लता ने जो पूंजी थी उनके पास, उसे इतनामांजा कि वह अपनी जगह पर सौ टंच सोना बन गया. मैंने अमीर खान साहब के गायन में, उनके करीब बैठी लता को देखा है जो जैसे सब कुछ घोल कर पी रही हों. मैंने देखा है उनकी हथेली कोअपनी आंखों से लगा कर लंबे समय तक सांस भरती लता को. यह वह खाद-पानी था जिससे लता ने खुद को सींचा था. इस कदर सींचा था कि बड़े गुलाम अली खान साहब ने नेह बरसातेहुए कहा था : “ जबसे इन लड़की का यमन कान में पड़ा है, मैं अपना वाला यमन भूल गया हूं !… कमबख्त कभी बेसुरी ही नहीं होती !!”  फिल्मी बाजार में ऐसी साधना कम ही की जाती है.

   एकाग्रता, पवित्रता, माधुर्य और सादगी के मेल से लता की वह हस्ती बनी थी जो कुछ भी नकली या घटिया नहीं गाती थी. इसलिए संगीतकार हों कि अभिनेत्रियां सब दांत भींच कर लताके साथ काम करते थे. उस आवाज व उसकी नजाकत से बराबरी करने की चुनौती आसान नहीं होती थी. और इन तीनों के मेल से छन कर जो हमारे पास पहुंचता था वह कभी अल्ला तेरोनाम, ईश्वर तेरो नाम बन जाता था, कभी दिल हूम हूम करे, घबराए, कभी फैली हुई हैं सपनों की बाहें, कभी प्यार किया तो डरना क्या, कभी आज फिर जीने की तमन्ना है बन जाता था. यह गानोंकी चुनी हुई सूची नहीं है क्योंकि वैसी कोशिश का अर्थ नहीं है. मानव-मन की कोई भी भावना, उमंग, विकलता और वेदना व आकांक्षा ऐसी नहीं है जिसे लता ने साकार न किया हो. आपअपने भीतर उन सबकी गूंज सुनेंगे जब लता को सुनेंगे. बलिदान की उन्मत्तता नहीं पवित्रता, पछतावा नहीं विकलता, और राष्ट्रभक्ति का उन्माद नहीं निखालिस राष्ट्रीयता का जैसा गान प्रदीपजीने ऐ मेरे वतन के लोगो में लिखा, लता ने उसे आंसुओं का हार पहना कर हमारे सामने धर दिया. वह पराजय का शोक नहीं, संकल्प व एकता का गान बन गया. लता की गायकी का यहजादू उनके उन गीतों से भी छलकता है जो फिल्मों से बाहर के हैं. 18 भाषाओं में गाए हजारों गानों का उनका संसार हमें वैसे ही ओतप्रोत करता जाता है जैसे घनघोर बारिश में आप खुद जाकर आसमान के नीचे खड़े हो जाएं. 

   वे नहीं हैं; और जैसा मैंने शुरू में लिखा, वे काफी वर्षों से नहीं थीं. लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि वे नहीं थीं, कभी ऐसा नहीं होगा कि वे नहीं होंगी ! वे भारत की आत्मा की आवाजथीं. भारत कभी गूंगा या बहरा नहीं होगा. ( 10.02.2022) 

 

दिया जलाओ !

   1943 का साल था और कुंदनलाल सहगल ने अपनी फिल्म ‘तानसेन’ में अपने मन-प्राणों का पूरा बल लगा कर गाया था : दिया जलाओ… जगमग जगमग दिया जलाओ ! अंधकार को तोलती और प्रकाश का आह्वान करती ऐसी हूक, ऐसी वेदना और ऐसी ललकार थी उनकी आवाज में कि हम विवश हो जाते थे कि मन के किसी कोने में, कहीं तो कोई दीप जले !! कला यही करती है. लेकिन राजनीति इसका उल्टा करती है.  नया साल आया नहीं कि राजनीति ने जलता दिया बुझा दिया. 

   अमर जवान ज्योति पिछले 70 से अधिक सालों तक उस इंडिया गेट पर जलती रही थी जिसे अब सेंट्रल विस्टा जैसा बेढब नाम दे कर धूल, धुआं और धंधे की गर्द में इस तरह ढक दिया गया है कि देश की राजधानी की उस पहचान का दम ही टूट गया है. वह पूरा परिसर आज शोक व सन्नाटे में डूबा है. कोई नई रचना पुराने इतिहास को इस तरह नेस्तनाबूद कर सकती है, इसकी कल्पना भी इस हादसे से पहले करना मुमकिन नहीं था. लेकिन उनके लिए यह मुमकिन है जो देश के इतिहास से नहीं, अपने इतिहास से निस्बत रखते हैं. 

   जो अमर जवान ज्योति रातोरात बुझा दी गई, वह तैयार भी रातोरात ही हुई थी- 1971 में भारत-पाक युद्ध की जीत के बाद ! लेकिन इसका इतिहास इससे भी पहले की कहानी बताता है. अंग्रेजों ने अपने सबसे बड़े व कमाऊ उपनिवेश की अपनी राजधानी को सत्ता व संपत्ति का भव्यतम प्रतीक बना कर खड़ा करने की सोची तो वास्तुकार एडविन लुटियंस को अपनी भव्यतम उड़ान को साकार करने का मौका मिला. उसने वह सब बनाया जो वह बनाना चाहता था. औपनिवेशिक शोषण में धन की कमी तो थी नहीं. हमारी सरकारी दिल्ली आज भी उनके स्थापत्य कला के तले दबी हुई है. 1914 से चलकर पहला विश्वयुद्ध 1919 में समाप्त हुआ तो अंग्रेज हुकूमत को अहसास हुआ कि साम्राज्य की नींव मजबूत रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रजा यह देखे कि साहब बहादुर उसका कितना ख्याल रखते हैं. इस तरह महायुद्ध में मारे गए देशी फौजियों का एक युद्ध स्मारक बनाने का ख्याल आया और लुटियंस साहब ने1919 से शुरू कर 1931 में वह स्मारक तैयार किया जिसे हम इंडिया गेट कहते हैं- एक ऐसा गेट कि जिसकी एक तरफ खड़े हो कर आप अपने सामने अंग्रेजी हुकूमत का दंभ-दर्प और वैभव एक साथ देख सकते हैं. गुलामों को यह याद दिलाना कि गुलामी भी कितनी भव्य व सुनहरी हो सकती है, इसका मकसद था. 

   यह इतिहास इंडिया गेट पर ठहरा, पथराया ही रहता लेकिन इंदिरा गांधी ने 1973 में बड़ी खूबसूरती व तत्परता से इसे मिटा दिया और स्वतंत्र भारत के इतिहास में समाहित कर लिया. इंडिया गेट अमर जवान ज्योति में बदल गया. यह जिस तरह बना व खिला उसमें यह युद्ध स्मारक नहीं, बलिदान स्मारक बन गया. अंग्रेजों ने इसकी ऊपरी दीवार पर महायुद्ध में मारे गए कोई 3 हजार भारतीय फौजियों के नाम खुदवाए थे जो बताते हैं कि धर्म-जाति-भाषा-का भेद किए बिना सबने बलिदान दिया था. अमर जवान ज्योति ने इसे भूत-वर्तमान व भविष्य तीनों को जोड़ दिया. कल्पना यह रही कि पहले के भी और भविष्य के भी युद्धों में बलिदान होने वालों का यह प्रतीक स्मारक होगा जिसकी ज्योति सदा जलती रहेगी. वहां का पूरा वातावरण युद्धोन्माद नहीं, वीरता के लिए श्रद्धा जगाता था. उल्टी राइफल पर टंगा फौजी टोप, सामने जलती अमर जवान ज्योति और चौबीस घंटे पहरे पर खड़ा मौन, पाषाणवत् फौजी जवान - सब मिलकर सारे बलिदानों का ऐसा मुखर व शालीन प्रतीक बनाते थे कि उसके चारो ओर उत्सव मनाता भारत भी उसकी गरिमा संभाल कर चलता था. एक झटके में यह सारा कुछ मेट दिया गया. अमर जवान की ज्योति ही बुझा दी गई.    

   सवाल कई हैं जिनका जवाब कई स्तरों पर ढूंढा जाना चाहिए. युद्ध स्मारकों से पश्र्चिमी दुनिया पटी है, क्योंकि उनका सारा संसार बना ही युद्धों से है. उनके यहां युद्ध धार्मिक वीरता के भी, प्रतिद्वंद्वी के विनाश के भी, हथियारों का धंधा कर कमाई करने की भी युक्ति रहे हैं. दोनों विश्वयुद्धों में की गई अपनी अकूत कमाई के बल पर ही अमरीका ऐश्वर्य के शिखर पर विराजता रहा है. भय दिखा कर और भय बढ़ा कर आमने-सामने की स्थिति पैदा करना और फिर दोनों पक्षों को हथियार बेंचना पश्चिम की हर महाशक्ति का सम्माननीय धंधा रहा है. आज पश्चिम में छाई मंदी के पीछे एक कारण यह भी है कि पिछले दिनों में युद्ध तो कई हुए हैं, होते रहे हैं लेकिन महायुद्ध नहीं हो सके हैं. महायुद्ध नहीं तो महा कमाई नहीं. इसलिए उनके यहां युद्ध स्मारकों का एक मतलब युद्धों को जीवित रखना भी है. 

   हमारे यहां भी युद्ध हुए हैं लेकिन वे कमाई के साधन नहीं रहे हैं. हमारी वृत्ति कभी साम्राज्यवादी या औपनिवेशिक नहीं रही. हमारे युद्धों का उद्देश्य भी कुछ बड़ा और कुछ श्रेष्ठ रहा है - महाभारत भी न्याय के लिए हुआ तो अनेक युद्ध आती औपनिवेशिक गुलामी को रोकने के लिए हुए. इसलिए भारतीय परंपरा में युद्ध स्मारकों की नहीं, बलिदान या शहादत के प्रतीक स्मारकों की स्वाभाविक जगह बनती है. और यह भी कि प्रतीक परिपूर्णता दर्शाते हैं, संख्या नहीं. साम्राज्य के सारे प्रतीकों को आत्मसात करती हुई अमर जवान ज्योति उन सबका परिपूर्ण प्रतिनिधित्व करती थी जो सार्वभौम, स्वतंत्र देश का गौरव संजोते हैं तथा एक उद्दात मन तैयार करते हैं. बाहर जलती ज्योति जब भीतर उजाला करती हो तभी उसकी सार्थकता है. अमर जवान ज्योति एक ऐसा ही प्रतीक बन कर भारतीय मन में अवस्थित हो चुका था. जरूरत नहीं थी उसे बुझाने की. जरूरत थी ही तो नवनिर्मित युद्ध स्मारक में एक ज्योति और जलाई जा सकती थी. अंधकार जितना घना और अभेद्य होता है, समाज को उतने ही उजाले की जरूरत होती है. यह किसने कहा कि एक बुझा कर ही दूसरा जलाया जा सकता है ? लेकिन जब प्रतीकों, महापुरुषों और  इतिहासों को हड़पने की पागल दौड़ चल रही हो और कोई, किसी की शह पा कर कह रहा हो कि आजादी 1947 में नहीं, 2014 में मिली, तब तो दीप बुझेंगे ही, हर इतिहास हमसे ही शुरू होता है, यह निर्धारित किया ही जाएगा. यह अंधकार बाहरी ज्योति जलाने से दूर नहीं होगा. 

   क्या किसी को याद है कि राजधानी में ही एक ज्योति और भी जल रही है ? बापू की समाधि राजघाट पर जलती ज्योति क्या यह कह बुझाई जाएगी कि स्वतंत्रता के शहीदों का एक नया स्मारक हम बना रहे हैं जहां सबके नाम से एक ही ज्योति जलाई जाएगी ? तो बापू की हत्या तो स्वतंत्रता के बाद हुई थी. तो उस ज्योति का क्या करेंगे आप ? अब देखिए, अब छत्तीसगढ़ में अमर जवान ज्योति बनाई गई. आगे हो सकता है कि राज्यों में वैकल्पिक ज्योति जलाई जाए. जब आम सहमति बनाने की आप कोई कोशिश नहीं करते हैं तो आम प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है. ऐसी ज्योतियां और अंधकार फैलाएंगी. ( 05.01.2022)

विदेश-नीति की कारीगरी

बीमार का हाल कैसा है, यह नब्ज बता देती है; किसी देश का हाल कैसा है, यह उसकी विदेश-नीति बता देती है. ऐसा इसलिए है कि विदेश-नीति दरअसल में किसी भी देश की आंतरिक स्थिति का आईना होती है. इसे हम अपने देश के संदर्भ में अच्छी तरह समझ सकते हैं. 

   हमारी आंतरिक सच्चाई यह है कि हम एक चुनाव से दूसरा चुनाव जीतने की चालों-कुचालों से अलग हम न कुछ कर, कह और सोच रहे हैं. गले लगने-लगाने, झूला झुलाने और गंगा आरती दिखाने को विदेश-नीति समझने का भ्रम जब से टूटा है, एक ऐसी दिशाहीनता ने हमें जकड़ लिया है जैसी दिशाहीनता पहले कभी न थी.   

   करीब-करीब सारी दुनिया में ऐसा ही आलम है. गुलिवर को तो पता नहीं कहां लिलिपुट और लिलिपुटियन मिले थे, हमें हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैसे ही बौनों का दौर दिखाई देता है. ऐसा इसलिए है कि नई नीतियां, नये सपने, नई उमंग तभी बनती-उभरती है जब कोई वैकल्पिक दर्शन आपको प्रेरित करता है. जब सत्ता ही एकमात्र दर्शन हो तब सत् और साहस के पांव रखने की जगह कहां बचती है ? अमरीका में आज कोई ट्रंप नहीं है. इसलिए हास्यास्पद मूर्खताओं व अंतरराष्ट्रीय शर्म का दौर थमा-सा लगता है. लेकिन क्या कोई अमरीकी अध्येता कह सकता है कि बाइडन ने अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक भी ऐसी पहल की है कि जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमरीका की नई छवि गढ़ती हो ? अफगानिस्तान की उनकी अर्थहीन पहल चौतरफा पराजय की ऐसी कहानी है जिसे विफल राजनीतिक निर्णयों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाना चाहिए. अमरीका की अंतरराष्ट्रीय हैसियत दरअसल उसकी आर्थिक शक्ति की प्रतिच्छाया थी. वह आर्थिक शक्ति चूकी तो अमरीका की हैसियत भी टूटी ! बाइडन के पास इन दोनों मोर्चों पर अमरीका को फिर से खड़ा कर सकने का न साहस है, न सपना. कभी महात्मा गांधी ने इसकी तरफ इशारा करते हुए कहा भी था कि जब तक पूंजी के पीछे की पागल दौड़ से अमरीका बाहर नहीं आता है, तब तक मेरे पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं है.  

   ऐसा ही हाल है रूस और चीन का भी. रूस के 69 वर्षीय राष्ट्रपति व्लादामीर व्लादीमीरोविच पुतिन कभी भी रूस के सामाजिक या राजनेता नहीं रहे. वे रहे तो बस 16 लंबे सालों तक रूस की खुफिया सेवा की नौकरी में रहे. सोवियत संघ के बिखरने के बाद जो उथल-पुथल मची, उसके परिणामस्वरूप कई हाथों से गुजरती हुई रूस की सत्ता पुतिन के हाथ लगी; और तब से ही हाथ लगी सत्ता को हाथ से न जाने देने की चालबाजियां ही पुतिन की राजनीति है. 2012 से अब तक रूस की तरफ से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी ऐसा हस्तक्षेप नहीं हुआ है जिससे विचार व आचार का कोई नया दरवाजा खुलता हो. वे खुफियागिरी के अपने अनुभव का इस्तेमाल कर, अपनी राजनीतिक हैसियत इतनी पुख्ता बना लेने में लगे हैं कि वह अंतिम सांस तक उनका साथ दे. वे संसार के सबसे धनी राष्ट्रप्रमुखों में एक हैं उनके रूस में जातीय व भाषाई दमन का जैसा जोर है, वह साम्यवाद के हर मूल्य का दमन करता जाता है. 

   चीन के झिन जिनपिंग पुतिन के छोटे संस्करण हैं हालांकि उनके पांव में पुतिन से बड़ा जूता है. 68 वर्षीय जिनपिंग करीब-करीब तभी, 2012 में चीन की सत्ता में आए जब पुतिन रूस में आए. उनकी राजनीति का आधार भी पुतिन की तरह ही सत्ता आजीवन अपने हाथ में रखना है लेकिन जिनपिंग की हैसियत इसलिए पुतिन से बड़ी हो जाती है कि वे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक व फौजी सत्ता के मालिक हैं. वे रूस को नहीं, अमरीका व भारत को चुनौती देते हैं. अमरीका को सामने कर भारत भी चीन को चुनौती देने की नादानी करता है जिसे जिनपिंग बच्चे की चुहल मान कर दरकिनार करते जाते हैं. लेकिन सभी जानते हैं कि बिल्ली चूहों की नादानी की अनदेखी कभी भले कर देती हो, चूहों की हरकतों को भूलती नहीं है. 

   इसलिए हमारी व्यापक विदेश-नीति की कसौटी चीन ही है. इसलिए स्वाभाविक ही है कि एशिया उपमहाद्वीप के तमाम छोटे मुल्क यही देखने व भांपने में रहते हैं कि भारत चीन से कब, कहां और कैसे-कैसे निबटता है. यह हैरानी की बात नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री की तरह ही जिनपिंग भी लगातार विदेश-दौरों पर रहते हैं लेकिन दोनों के विदेश-दौरों में एक बड़ा फर्क है. कोविड की बंदिश की बात छोड़ दें तो 2012 से अब तक जिनपिंग अपने 42 विदेश-दौरों में जिन 69 देशों में गये हैं, उनमें सबसे बड़ी संख्या एशिया-अफ्रीका आदि के छोटे देशों की है. 3 बार तो वे भारत ही आ चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक 113 विदेशी दौरों में 62 देशों में गए हैं जिनमें 7 बार अमरीका तथा 5 बार चीन, फ्रांस, रूस का दौरा है. मोदीजी की यात्रा में जो छोटे देश आए हैं वे भारत-चीन के मामले में कोई खास वकत नहीं रखते हैं. 

   श्रीलंका में चीन का प्रवेश जिस तरह हो रहा है, वह भारत को सावधान करता है. राजधानी कोलंबो से लग कर ही चीन एक नया सिंगापुर या दुबई बसा रहा है. श्रीलंका इसे अपने लिए अपरिमित संभावनाओं का द्वार खोलने वाला प्रोजेक्ट मान रहा है. भारत को इसका जवाब आर्थिक स्तर पर नहीं, राजनीतिक स्तर पर देना चाहिए. लेकिन ऐसा कोई जवाब दिखाई या सुनाई तो नहीं दे रहा है. चीन के इशारे व खुले समर्थन से शू ची की लोकतांत्रिक सरकार की जैसी बिरयानी म्यांमार की फौजी सत्ता ने बनाई और वहां का सारा लोकतांत्रिक प्रतिरोध फौजी बूटों तले रौंद डाला, उसका जवाब भारत कैसे देता है, यह देखने वाले एशियाई मुल्क हैरान व निराश ही हुए हैं. बांग्लादेश संघर्ष के समय जयप्रकाश नारायण ने भारत की विदेश-नीति में एक नैतिक हस्तक्षेप करते हुए, उसे एक कालजयी आधार दिया था कि लोकतंत्र का दमन किसी देश का आंतरिक मामला नहीं है. इस आधार पर म्यांमार के मामले में भारत की घिघियाती चुप्पी उसे चीन के समक्ष घुटने टेकती दिखाती है. भारत की डिप्लोमैसी का कोई अध्येता जब आज से सालों बाद यह प्रकरण खोज निकालेगा तो वही नहीं, पूरा भारत शर्मिंदा होगा कि इस पूरे प्रकरण में भारत ने इतना साहस भी नहीं दिखाया कि अपराध को अपराध कहे और अंतरराष्ट्रीय दवाब खड़ा करने की मुखर कोशिश करे.                                 और जब सवाल हांगकांग का आएगा तब भी और जब ताइवान का आएगा तब भी भारत की भूमिका कहां और कैसे खोजी जाएगी ? चीन का विस्तारवादी रवैया हांगकांग को भी और ताइवान को भी अपना उपनिवेश बना कर रखना चाहता है. हांगकांग का मामला तो एक उपनिवेश से छूट कर दूसरे उपनिवेश का जुआ ढोने जैसा है. यदि इग्लैंड में थोड़ी भी आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना होती तो वह 1842 की नानकिंग जैसी प्राचीन व अनैतिक संधि की आड़ में हांगकांग को चीन को सौंप नहीं देता बल्कि कोई ऐसा रास्ता निकालता ( जनमत संग्रह !) कि जिससे हांगकांग की लोकतांत्रिक चेतना को जागृत व संगठित होने का मौका मिलता. लेकिन खुद को लोकतंत्र की मां कहने का दावा करने वाले इंग्लैंड ने भारत विभाजन के वक्त 1946-47 में जितना गंदा खेल खेला था, उसने वैसा ही गंदा खेल 1997 में खेला और हांगकांग को चीन के भरोसे छोड़ दिया. भारत ने तब भी इस राजनीतिक अनैतिकता के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई और अब भी नहीं जब दमन-हत्या व कानूनी अनैतिकता के रास्ते चीन हांगकांग को निगल जाने में लगा है. 

   ताइवान के बारे में ऐसा माहौल बनाया गया है मानो वह तो चीन का ही हिस्सा था. यह सच नहीं है. ताइवान में जिस जनजाति के लोग रहते थे उनका चीन से कोई नाता नहीं था. लेकिन डच उपनिवेशवादियों ने ताइवान पर कब्जा किया और अपनी सुविधा के लिए वहां चीनी मजदूरों को बड़ी संख्या में ला बसाया. यह करीब-करीब वैसा ही था जैसा बाद में तिब्बत के साथ हुआ. ताइवान ने 1949 में चीन से खूनी गृहयुद्ध के बाद अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम किया और धीरे-धीरे एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप में अपनी जगह बनाई. अब चीन उसे उसी तरह लील लेना चाहता है जिस तरह उसने तिब्बत को लील लिया है. साम्राज्यवाद की भूख दानवी होती है. हांगकांग और ताइवान दोनों ही सामराज्यवाद का दंश भुगत रहे हैं. फिर भारत चुप क्यों है ? क्या उसे ताइवान व हांगकांग के समर्थन में दुनिया भर में आवाज नहीं उठानी चाहिए ताकि इन देशों की मदद हो और चीन को कायर चुप्पी की आड़ में अपना खेल खेलने का मौका न मिले ?आज भारतीय विदेश-नीति का केंद्र-बिंदु चीन को हाशिये पर धकेलते जाने का होना चाहिए न कि चीन की तरफ पीठ कर, उसे हमारी सीमा पर सैन्य-निर्माण का अवसर देने का होना चाहिए. बाजार ही जिनकी राजनीति-अर्थनीति का निर्धारण करता है उन्हें भी यह कौन समझाएगा कि कुछ मूल्य ऐसे भी होते हैं जिनकी खरीद-बिक्री नहीं होती है, नहीं होनी चाहिए ? लेकिन ऐसा करने का नैतिक बल तभी आता है जब आप देश के भीतर भी ऐसे मूल्यों के प्रति जागरूक व प्रतिबद्ध हों.          

   भारत के राजनीतिक हित का संरक्षण और चीन को हर उपलब्ध मौकों पर शह देने की रणनीति आज की मांग है. इस दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों के साथ संपर्क-संवाद की खासी कमी दिखाई देती है. विदेश-नीति गूंगे के गुड़ चुहलाने जैसी कला नहीं होती है. यह सपने देखने और बुनने की बारीक कसीदाकारी होती है. ( 19.01.2022)