महात्मा गांधी पर लिखते हुए ‘दिनकर’ लिख गए :
“ तू कालोदधि का महास्तंभ,आत्मा के नभ का तुंग केतु
बापू ! तू मर्त्य,अमर्त्य,स्वर्ग,पृथ्वी,भू, नभ का महा सेतु
तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है
जितना कुछ कहूं मगर, कहने को शेष बहुत रह जाता है.”
यह एक तरफ गांधी के प्रति अहोभाव है, तो दूसरी तरफ हम सबके लिए यह अहसास भी है कि हमें कितनी दूरी पाटनीहै, कितने शिखर छूने हैं, प्रज्ञा व ज्ञान के कितनी खिड़कियां खोलनी हैं कि इस आदमी को उसकी संपूर्णता में देख व समझ सकें. थे तो वे भी नश्वर इंसान ही लेकिन इतने सावधान व सन्नद्ध कि इंसान के उन्मेष का मानक बन जाए. भारत की राजनीतिक आजादी की लड़ाई इस तरह खड़ी की उन्होंने कि वह सभी इंसानों की सभी किस्म की अाजादी का यज्ञ बन गया.
1915 की बात है. मोहन दास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से अभी भारत लौटे ही थे. ‘महात्मा’ तो मशहूर नहीं हुए थे अब तक लेकिन सबको हैरान करने वाला ‘सत्याग्रह’ नाम का एक हथियार जरूर साथ था उनके जिसका कारनामा दक्षिण अफ्रीका ने देखा था, भारत ने सुना था. गांधी तब अहमदाबाद के कोचरब में अपना ठिकाना भी बना रहे थे, अपने साथियों-सहयोगियों को जोड़ भी रहे थे. ऐसे में एक लड़का अाया. नाम था महादेव देसाई. तब दोनों एक-दूसरे को जानते नहीं थे. गांधी की जितनी कीर्ति तब फैली थी, उसने इस युवा महादेव देसाई को प्रेिरत किया कि वे इस अनोखे आदमी से मिलें अौर ब्रितानी लेखक-राजनेता जॉन मार्ले की जिस पुस्तक पर वे उन दिनों मुग्ध थे - ‘कांप्रोमाइज’ - उसकी बात करें. दरअसल महादेव देसाई ने उस किताब का गुजराती में अनुवाद भी कर लिया था अौर वे चाहते थे कि लेखक से अनुमति ले कर वे उसे प्रकाशित करें.
गांधी ने जॉन मार्ले के वतन से पढ़ाई की थी, दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष का सवाल ले कर वे इंग्लैंड अाते-जाते भी रहे थे, उन्हें वहां के खास लोग जानते थे. यह सब जानकर ही महादेव देसाई को लगा था कि यह आदमी उस किताब के बारे में भी उन्हें कुछ नया बता सकेगा, इसकी मदद से वे जॉन मार्ले तक पहुंच भी सकेंगे अौर गांधी कहेंगे तो मिस्टर मार्ले अनुवाद करने व उसे प्रकाशित करने की अनुमति भी दे देंगे.
यहां तक सब ठीक ही चला. गांधी किताब को जानते थे. वह एक अच्छी रचना है, यह भी वे मानते थे. वे अपनी अनुशंसा के साथ जॉन मार्ले को लिख भी देंगे, यहां तक बात पहुंची थी. लेकिन अभी एक कांटा बाकी था.
अनुवाद की अनुमति व उसे प्रकाशित करने के संदर्भ में जो पत्र महादेव देसाई ने मार्ले के लिए तैयार किया था, वह उन्होंने गांधी को दिखाया. गांधी जैसे-जैसे उसे पढ़ते गए, उनकी त्योरियां चढ़ती गईं. वे खिन्न स्वर में बोले : यह क्या लिखा है तुमने … इतनी अलंकारिक भाषा में ऐसी निरीह याचना करने की जरूरत क्या है भाई !… मार्ले ने एक किताब लिखी है, तुम्हें वह पसंद आई, तुमने गुजराती जैसी श्रेष्ठ भाषा में उसका अनुवाद किया है, इसमें मार्ले साहब को न सिर्फ आनंदित होना चाहिए भी बल्कि तुम्हारा अहसान भी मानना चाहिए. तुम उस भाषा के पाठकों तक मार्ले साहब की किताब पहुंचा रहे हो जिसकी कल्पना भी उन्हें नहीं होगी. तो ऐसी चापलूस-सी अभिव्यक्ति क्यों ? हम गुलामी की मानसिकता में इतने गहरे तक डूबे हुए हैं कि अहंकार व आत्मसम्मान का भेद भी भूल गए हैं …नहीं, महादेव, ऐसा पत्र हम नहीं लिखेंगे…
महादेव सन्न-से खड़े सुनते ही रह गए ! अहंकार अौर आत्मसम्मान के बीच गहरा भेद है. सामने कोई भी हो, बड़ा-छोटा, धनवान-गरीब, विद्वान-निरक्षर- जो भी हो, सबके साथ विनयपूर्वक बरताना चाहिए लेकिन जहां विनय हीनता-दीनताकी चुगली खाने लगे वहां तन कर खड़े हो जाना चाहिए. दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में, लंदन में, महाराजा के महल में आयोजित पार्टी ! इंग्लैंड के सूट-बूटधारी अहंकारी सम्राट के सामने, अपनी घुटनों तक की धोती-चादर में खड़े हो कर, शालीनता से यह कहने का साहस होना चाहिए कि मैं अौर मेरा देश ऐसी अधनंगी हालत में यूं हैं कि हम सबके कपड़े भी तो आपने ही पहन रखे हैं.
पत्र बदला गया. सीधा-सा निवेदन कि आपकी इस श्रेष्ठ कृति का गुजराती अनुवाद करने तथा उसे प्रकाशित करने की अनुमति चाहता हूं. फिर यह भी बताया कि जिस भाषा में इसका प्रकाशन करना चाहता हूं वह भाषा व उसके भाषी किस स्तर के हैं.
महादेव अौर उनके बापू के बीच जो अनोखा रिश्ता बना आगे चलकर उसकी बुनियाद यहां थी. आत्मसम्मान का सौदा नहीं किया जा सकता है, यह प्रतीति अाजादी की पहली सीढ़ी है.
गांधी के नक्षत्र-मंडल में एक थे भाषाविद्-लेखन-विचारक काका कालेलकर. उनको 1922 में यानी महादेव देसाई के इस प्रसंग से 7-8 साल बाद एक अलग ही महात्मा गांधी का सामना करना पड़ा. तब गांधी आजादी की लड़ाई का सारा सूत्र संभाले हुए देश की चेतना की रगों में दौड़ने लगे थे. काका साहब मराठी भाषी थे अौर गांधीजी के ‘स्टेपनी टायर’ सरीखे थे. जहां कोई नहीं वहां काका साहब ! वे लिखते हैं :
“ मैं जब गांधीजी के आश्रम गया तब मुझे न गुजराती आती थी, न हिंदी. मैंने दोनों भाषाएं सुनी तो थीं लेकिन बोलने–लिखने का तनिक भी अभ्यास नहीं था. मैं गुजरात विद्यापीठ में हिंदी में पढ़ाता जरूर था, क्योंकि वहां मेरी जितनी हिंदी भी कोई नहीं जानता था. फिर थोड़ी हिम्मत आने पर मैं गुजराती में बोलने लगा. फिर यह भी हुआ कि नवजीवन में कॉलम–दो कॉलम की कमी पड़ती, तो स्वामी आनंद मुझसे कुछ लिखवा कर, उसे ठीकठाक कर छाप देते थे. फिर आया 1922. बापू जेल चले गए. तब सारा–का–सारा नवजीवन मेरे खाते में आ गया. मुझे ही वह सारा भरना पड़ता था.
“ जेल में बापू ने किसी से सुना कि मैं नवजीवन ठीकठाक संभाल रहा हूं, तो एक दिन उनका पत्र आया : “ जिस तरह अंग्रेजी शब्दों के हिज्जे निश्चित हैं, गुजराती में वैसा नहीं है. मराठी, बंगला, तमिल, उर्दू आदि भाषाओं में भी मैं शुद्ध हिज्जे का आग्रह देखता हूं. गुजराती ही एक ऐसी भाषा है जिसमें जिसे जैसा मन में आए, वैसे हिज्जे कर लेता है. इससे गुजराती भाषा भूत जैसी हो गई है. इस दुर्दशा को दूर करने का काम अगर तुम्हारा नहीं है, तो किसका है ? मुझे एक ऐसा कोश बना कर दो, जिसमें गुजराती के सब शब्द हों, और हर एक शब्द के हिज्जे नियम के अनुसार शुद्ध लिखे हों. हिज्जे के बारे में किसी गुजराती को भी कोई शंका हुई, तो वह तुम्हारा कोश देखकर शुद्ध हिज्जे पता कर लेगा अौर लिख सकेगा. अंग्रेजी में तो हम ऐसा ही करते हैं न !”
“ बापू का ऐसा खत पाकर मैं आश्चर्यचकित रह गया. बाद में मैं भी जेल पहुंच गया. जब छूटा मैं तब बापू भी छूटे. मिलना हुआ तो मैंने उनसे कहा : “ बापूजी, आपने मुझसे यह कैसी अपेक्षा की ? न गुजराती मेरी जन्मभाषा है, न मैं उसके साहित्य का जानकार हूं. मैंने तो उसका व्याकरण भी जानता नहीं !”
“ बापू बोले : “हां, हां, यह सब तो ठीक है लेकिन मैंने कब कहा कि यह सब तुम्हें अकेले करना है ! जिसकी मदद चाहिए लो, जिससे यह काम करा सकते हो, कराओ. मैंने तो यह काम तुमको सौंप दिया है अौर तुमसे ही जवाब मांगूंगा. इस चीज का महत्त्व तुम समझते हो न, तो फिर एक भी भूल न रहे, ऐसा निर्दोष कोश देकर, गुजराती के हिज्जों को व्यवस्थित बना दो. यह काम तुम्हारा है. ”
“ मैंने सिर झुका दिया. अौर कर भी क्या सकता था ! कहावत है न कि ‘संन्यासी को अगर शादी करनी हो, तो उसे सिर पर चोटी रखने से प्रारंभ करना चाहिए,’ सो मैं भी गुजराती का व्याकरण लेकर बैठा. पिछले 40 बरसों से हिज्जों को ले कर जितनी चर्चा-विचारणा हुई थी, सब इकट्ठा की. महादेव भाई, नरहरि भाई और मैं, इस तरह तीन आदमियों की कमिटी बनाई. दूसरे भी जो, जब मिले, उनसे मदद ली अौर पांच बरस की मेहनत के बाद बापू को एक शुद्ध ‘जोडणी कोश’ अर्पण किया.
“ बापू बड़े संतुष्ट हुए ! नवजीवन में उन्होंने लिखा: “अब आगे किसी को गुजराती में मनमाने हिज्जे करने का अधिकार नहीं है. ”
“ आज वही ‘जोडणी कोश’ गुजरात भर में हिज्जे के लिए सबसे प्रामाणिक माना जाता है.बंबई सरकार का शिक्षा विभाग, बंबई यूनिवर्सिटी, गुजरात–काठियावाड़ के देशी राज्य, सब उसी को प्रमाण मान का चलते हैं.”
गांधी आज भी कहीं दूर खड़े होकर कहते मिलते हैं : नहीं, एक अाजाद मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य की ऐसी अवमानना कैसे कर सकता है ! आजादी किसी कुर्सी पर बैठने की ऐषणा नहीं, कुर्सियों के आतंक से बाहर निकलने का नाम है.
आज देश में ऐसी बात कोई सोचता भी है ?
( 01.10.2026)
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