बिहार की राजधानी पटना; पटना से निकट भोजपुर; अौर भोजपुर का नया चर्चित चेहरा भरत तिवारी ! कहानी की तरह जो बात हर कहीं कही व छापी जा रही है, वह कुछ यूं है कि कुछ लोग भरत तिवारी को अपराधी करार दे रहे हैं, कुछ उन्हें रॉबिनहुड का अवतार बता रहे हैं. लेकिन इन सारी अावाजों व शोर के बीच जो बात उभर ही नहीं पा रही है वह है राज्य द्वारा नागरिकों का शिकार !. इसे एनकाउंटर कहिए या फेक एनकाउंटर कहिए, हत्या कहिए या शिकार कहिए, सच्ची व ठोस हकीकत यह है कि एक कोई भरत तिवारी नाम का युवक था कि जो पुलिस के काबू में नहीं आ रहा था. पुलिस ने अात्मसमर्पण के बाद उसे घेर कर, खुले आसमान के नीचे गोली मार कर काबू में कर लिया. पुलिस के मुताबिक जो अपराधी था, वह नहीं रहा तो कहानी तमाम होती है. लेकिन क्या सच में कहानी तमाम होती है ?
2005 का गुजरात ! सारा देश सोहराबुद्दीन शेख नाम के आतंकी के एंकाउंटर की कहानी से गूंज रहा था. तब आलम ऐसा बनाया गया था मानो अातंकियों का कोई अंतरराष्ट्रीय गैंग है जिसने गुजरात में अपनी तमाम ताकत झोंक दी है. वहां से पुलिस-अातंकवादियों के मुठभेड़ की रोज एक-न-एक कहानी सामने अाती ही थी, अौर कमाल यह था कि हर कहानी के अंत में ‘अातंकवादी’ मारे जाते थे, पुलिस को खरोंच तक नहीं आती थी. ऐसा कैसे होता है कि जान लेने की पूरी तैयारी से आए अातंकवादी ताश के पत्तों से ढह जाते थे ? पुलिस लाशें गिनती थी, प्रशासन उनका प्रदर्शन करता था अौर कहता था कि सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी इनके निशाने पर थी. हमने उसका काम तमाम कर दिया. अाज सोहराबुद्दीन शेख व एनकाउंटर के ऐसे तमाम मामले अदालतों में गहरे शक के घेरे में हैं; अौर कई मामले ऐसे भी हैं कि जिनमें अदालत ने तथाकथित अपराधियों को निर्दोष बता दिया है.
आतंकी कार्रवाईयों का चरम था मुंबई बमब्लास्ट ! उस केस में भी सालों मुकदमे के बाद भी पुलिस-प्रशासन अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका कि वह जिन्हें अातंकवादी या अातंकीषड्यंत्र का सफरमैना कह रहा है, उसमें सत्य व तथ्य हैं. वर्षों जेल में रहने के बाद एक-एक कर वे सभी निरीह लोग रिहा होते गए जिनका जीवन बर्बाद हो चुका था. क्या ये सब निर्दोष थे ? कौन कहे ? पुलिस ने किसी को ऐसा कहने लायक़ नहीं छोड़ा ! लेकिन यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि पुलिस की अपनी भूमिका पर अदालत को गहरा संदेह है.
हैदराबाद का 2019 का वह मामला याद कीजिए जब वहां की पुलिस ने 4 लोगों का दिन-दहाड़े एंकाउंटर किया था अौर कारण यह बताया था कि ये अपराधी पुलिस से उसका हथियार छीन कर, उस पर हमला करने की कोशिश में थे. पुलिस ने बड़ी वाहवाही लूटी कि उसने ऐसे दुर्दांत अपराधियों का काम तमाम कर दिया. बाद में इस कहानी के दूसरे पन्ने खुले अौर खुलते चले गए. अाखिरी पन्ना यह कहता है कि जिस तरह इन 4 अपराधियों का काम तमाम किया गया, उसे पुलिसिया गुंडागर्दी कहना चाहिए. अांध्रप्रदेश हाईकोर्ट की यह टिप्पणी किसी भी पुलिस संगठन को सर उठा कर चलने देगी क्या जिसमें वह कहती है कि पुलिस वर्दीधारी गुंडों की जमात है ?
हमारा संविधान कहता है कि आप इस तरह किसी की कहानी तमाम नहीं कर सकते ! फिर संविधान अागे कहता है कि पुलिस का काम अपराध की रोकथाम करना है अौर जो अपराधी बेकाबू हो जाए उसे गिरफ्तार कर, न्यायालय में ला खड़ा करना है ताकि न्यायालय उसे संविधान के मुताबिक सजा दे सके. अदालत ने जो सजा दी, उसके साथ उस व्यक्ति को जेल तक पहुंचा देना पुलिस का काम है. संविधान इससे अधिक या इससे आगे पुलिस की किसी भूमिका को मान्य नहीं करता है. लेकिन यहीं एक पेंच खड़ा होता है कि संविधान ही यह भी कहता है कि अात्मररक्षा में किसी की जान चली जाए, तो उसे सामान्य अपराध नहीं माना जाएगा है. संविधान की इसी धारा की अाड़ में वह सारी मनमानी चलती है कि जिसे हम यहां एंकाउंटर या फेक एंकाउंटर या पुलिस-अपराधी मुठभेड़ कह रहे हैं.
ऐसा जाली मुकाबला सरकार व नागरिकों के बीच, संविधान व उसकी बनाई एजेंसियों के बीच भी इन दिनों ख़ूब चल रहा है. एसआईआर इसका सबसे ख़तरनाक उदाहरण है. संविधान को बाजू कर, जब अाप निहत्थे नागरिकों को घेर कर, उनका तमाम कर देते हो तब इसे लोकतंत्र का एंकाउंटर कहते हैं. अाप देखिए कि यहां बंदूक़ चुनाव आयोग के हाथ में है, ट्रिगर पर अंगुली सत्ताधारियों की है अौर संविधान न्यायपालिका के काले लबादे की जेब में धरा घुट रहा है.
संविधान या ऐसे तमाम दस्तावेजों की एक दिक्कत है — उनके शब्द और उनके हेतु के बीच एक खाई है. शब्द व अर्थ के बीच ऐसी खाई हर जगह है और यह एकदम स्वाभाविक भी है, क्योंकि शब्द हमेशा बेजान होते हैं. शब्द जो कहना चाहते हैं, वे तभी पूरी तरह कह पाते हैं जब कोई उन शब्दों को आचरण में उतारता है. शब्द आचरण में उतरते ही बला के शक्तिवान हो उठते हैं. लेकिन जब अाप शब्दों को अाचरण से दूर कर देते हैं तो वे बेजान व अर्थहीन हो जाते हैं. मसलन, संविधान ने कहा कि पुलिस अपराधी को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा करे, यही उसका काम है. न अागे, न पीछे. अब पुलिस भी जानती है अौर हम भी जानते हैं कि अपराधी हाथ बांध कर तो सामने आएगा नहीं कि लो पुलिस भाई, हम यहां खड़े हैं, अाअो अौर अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी पूरी कर लो ! वह भागेगा, धोखा देगा, धमकी देगा, कभी हमला भी कर सकता है लेकिन पुलिस को अपनी संवैधानिक भूमिका यदि याद है, तो वह ऐसी तमाम कोशिशें को नाकाम करते हुए, बगैर उत्तेजित होते हुए उसे घेरती रहेगी, बांधती-साधती, निरुपाय करती रहेगी. चूहा-बिल्ली का यह खेल लंबा नहीं चल सकता है, क्योंकि अपराधी या अातंकी हमेशा कमजोर पिच पर खेलता होता है व उसका बल्ला भी खोखला होता है. नियमतः चलने वाली पुलिस के पीछे सारा देश, पूरे-का-पूरा संविधान खड़ा होता है. तो अंततः वह अपराधी टूटेगा ही. इधर वह टूटा, उधर पुलिस को अपना काम पूरा करने का मौका मिला. इसमें जितना वक्त लगेगा, पुलिस को जितना धैर्य रखना पड़ेगा, वह संविधान के पालन की कीमत है. लोकतंत्र की यह कम-से-कम क़ीमत है जिसे सबको अदा करनी चाहिए. पुलिस अपनी विफलता, भ्रष्ट अाचरण, अपने ऊपर के अधिकारियों के अहं की तुष्टि याकि सत्ताधीशों के स्वार्थ को पूरा करने का अौजार बन जाती है तब एंकाउंटर वाला रास्ता खुलता है.
वह स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने वाली हिदायत याद रखें हम कि भले कई अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निरपराध को सजा नहीं मिलनी चाहिए. यह हिदायत अपराधियों को नजरंदाज करने या उन्हें किसी तरह की छूट देने की बात नहीं करती है. यह बताना चाहती है कि अपराधी व निरपराधी के बीच एक अत्यंत पतली लकीर होती है जिसे कोई पार न कर जाए, इसकी सावधानी प्रशासन को, सरकार को रखनी ही चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो समाज एक ऐसे जंगल में बदल जाएगा जिसमें हर शक्तिवान अपने से कम शक्तिवान का शिकार खेलेगा. हम ऐसे जंगल में रहना चाहते हैं कि समाज में ? इसके जवाब में अाप जो कहेंगे उससे निर्धारित होगा कि अाप लोकतंत्र के नागरिक हैं या किसी के पोशीदा हेतु को पूरा करने के अौजार ? ( 26.06.2026)
No comments:
Post a Comment