Friday, 19 June 2026

एक युद्ध जिसमें सभी पराजित हुए

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार भी मानते हैं और हमारे प्रधानमंत्री भी मानते हैं, तो मैं भी वही मान कर कह रहा हूं कि जब किसकी मान कर चलें यह पता न चलता हो तब डोनल्ड ट्रंप की मान कर चलना चाहिए. सो, डोनल्ड ट्रंप की मान कर मैं मान रहा हूं कि अमरीका-ईरान युद्ध समाप्त हो चुका है. ट्रंप ने सबको कह दिया है : अपने-अपने जहाज खोलो और तेल की धार बहने दो ! 

   इस खबर से अच्छी दूसरी कोई ख़बर इस वर्ष आई नहीं. जो इस अच्छी ख़बर को सुनने के लिए जिंदा नहीं बचे उनकी संख्या कोई बता सकता है आसमान से बरसती मौत के बीच जा कर यह कौन गिन सकता है कितनी लाशें बिछी पड़ी हैं ! महाभारत के मैदान में तोसूरज ढलने के साथ युद्ध की समाप्ति होती थी और फिर सब मैदान में मुर्दे समेटने व घायलों को चिकित्सा के लिए ले जाने उतरते थे. उनका शील था कि फिर सूर्योदय से पहले युद्ध नहीं होता था. अब हम सभ्य हो गए हैं तो हमारी दुनिया अपनी असभ्यता के प्रदर्शन का कोई वक्त नहीं मानती है. उसकी बनाई मौत कभीकहीं भीकहीं से भी बरस सकती है. इसलिए युद्ध के जो सारे आंकड़े हमें बताए जा रहे हैं वे उसी हद तक विश्वसनीय हैं जिस हद तक ट्रंप या मोदी या पुतीन या नेतन्याहू विश्वसनीय हैं. फिर भी एक अनुमान के मुताबिक इस युद्ध में 540 अमरीकी, 26इस्राइली मारे गए, 7,700 सैनिक व नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए. 

   अब बचता है ईरान जिसके आंकड़े कभी भी जाने नहीं जा सकते हैंक्योंकि वहां मौतें नहीं हुईंसमूल विनाश हुआ. वहां के सुप्रीम लीडर खामनेई सहित शासन के सर्वोच्च 40 लोग मारे गए. बाकी सारा ईरान धूल-धूल कर दिया गया. तो फिर हम क्या करें उन सब मारे गए नागरिकों-सैनिकों से सर झुका कर माफी मांगें - और हमारा सर शर्म से झुका होना चाहिए. शर्म इस बात का कि इस 21वीं सदी में भी दुनिया में कुछ दादा बचे हैं ऐसे कि जो कमजोर व निरीह राष्ट्रों का दिनदहाड़े बलात्कार करते हैं और हम निरुपाय दर्शक भर रह जाते हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ समेत वे सारी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं आज कितनी नपुंसक व बांझ साबित हो रही हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने मानवमात्र की सौगंध खा कर बनाया था. आज अमरीका की स्वतंत्रता देवी अपने ही संविधान व संकल्प के फटे पन्ने ले कर बिसुर रही है.  

   ईरान जीत कर भी शांत है. वह किसी के सामने झुका नहीं है. अमरीका हार कर  भी अकड़ व धौंस दिखा रहा हैजबकि वह भूलुंठित है. अपराधहार व अपमान छुपाने के लिए ऐसी मुद्रा जरूरी होती है. ट्रंप का अमरीका ऐसा मान कर चला था कि युद्ध छेड़ना व जीतना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. ऐसे अहंकारियों के लिए यह समझना मुश्किल होता है कि समय के साथ दुनिया बदलती है. आज ट्रंप-काल में अमरीका जितना टुच्चा व खोखला हो गया हैउसे  दुनिया पहचान रही है. अमरीकी नागरिक जितनी जल्दी उसे पहचान लें व बदल लेंउतना ही भला होगा. आज वह हारा भर हैकल उसे पानी देनेवाला भी कोई नहीं होगा.  

   समझौते के जो 14 बिंदु सामने आए हैंवे अगर सच्चे हैं व अंतिम हैं तो वे अमरीका की चौतरफा पराजय की घोषणा करते हैं. एक अध्ययन बताता है कि 110दिन के इस युद्ध में कोई 170 लाख करोड़ रुपयों का नुक़सान हुआ है. अमरीका की 10 लाख करोड़ रुपयों की मिसाइलें  फुक गईंअरबों रुपयों की कीमत के 2 फ़ाइटर जेट गिराए गए.  खाड़ी देशों में बने अमरीका के 6 बड़े सैनिक अड्डेजिन्हें वह ईगल आई’ - गरुड़ की नज़र - कहता था तथा दावा करता था कि इससे वह सारी दुनिया की निगरानी करता हैतबाह हुए हैं. समझौते के मुताबिक अमरीका क्षतिपूर्ति के नाम से 28 लाख करोड़ रुपयों का हर्जाना ईरान को देगा और अमरीकी कंपनियों में लगे करीब 2.5 लाख करोड़ की ईरानी राशि को प्रतिबंध मुक्त करेगा. यह सब आत्मसमर्पण के बराबर है. 

   ईरान के सीमित संख्या के कमजोरपरंपरागत हथियारों ने कैसे अमरीका की अत्याधुनिक हत्यारी मशीनों को धूल कर दिया फौजी रणनीति के माहिर तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं. मैं कह रहा हूं कि हथियारों के पीछे बैठा आदमी जब अपनी लड़ाई के अौचित्य के बारे में नि:शंक होता है तो हथियार कई गुना ज्यादा मारक हो जाते हैं. लेकिन अपने युद्ध की नैतिक भूमिका जब उसे समझती नहीं है और वह अपराधी हत्यारे की भूमिका में ला खड़ा किया जाता हैतब न वह और न उसकी मशीनें काम कर पाती हैं. सच तो यह है कि युद्धमात्र बुरा होता हैमानवद्रोही होता है. लेकिन जब वह एक नैतिक डोर से बंधकर सामने आता हैतो नतीजा बदल देता है. अमरीकी सैनिकों-सेनापतियों को यही पता नहीं था कि आखिर हम लड़ क्यों रहे हैं ईरान का हर फौजी जानता था कि वह न्याय व अपने राष्ट्र  के स्वाभिमान के लिए लड़ रहा है. मुझे अक्सर याद आता है उस यूक्रेनी लड़की का कथन : “ रूस आज लड़ाई बंद कर देता है तो इस क्षेत्र में आज ही शांति आ जाती हैहम यूक्रेनी आज लड़ाई बंद कर दें तो हमारा आज ही विनाश हो जाएगा.” अस्तित्व व विनाश के बीच का चुनाव ही यूक्रेन को ताक़त देता हैवही ईरान को इतना अजेय बना रहा है. 

   दूसरी पराजय हुई खाड़ी देशों की. तेल की कमाई से धन्नासेठ बने ये सारे देश आज अपने ध्वस्त तेल-उद्योग के सामने सर धुन रहे हैं. युद्ध आज रुका है तो तल के इनके कुएं आज ही काम शुरू नहीं कर सकते. ऐसा भी नहीं है कि कल ही ट्रंप डॉलर ले कर हाज़िर हो जाएंगे. ख़ुद ही ख़ुद को अमरीका का उपनिवेश मान कर जी रहे ये देश अपनी दौलत व अमरीकी सरपरस्ती में जमीन से ऊपर ही चलते रहे थे. आज वे सब एकदम लुटे-पिटेईरान को ख़ुद से अंगुली भर ऊंचा पा रहे हैं. वे आज अपना यह विश्वास हारे बैठे हैं कि अमरीकी छाया तले वे सब सुरक्षित हैं. उनकी धरती पर अमरीकी सैन्य अड्डों का जो भग्नावशेष बचा है,  उसे समुद्र में तिरोहित करें कि नये सिरे से संवारेयह न अमरीका को सूझ रहा हैन इन मुल्कों को. खाड़ी देशों की यह सम्मिलित पराजय अब वहां नया राजनीतिक समीकरण बनाएगी जिसके केंद्र में ईरान होगा.  

   तीसरी पराजय मिली है इस्राइल को. हमेशा किसी चतुर लोमड़ी-सा सबके उच्छिष्ट में मुंह मारते फिरना इस्राइल की अंतरराष्ट्रीय भूमिका रही है. आज उसका मुंह भी खाली हैहाथ भी. पराजित व अपमानित ट्रंप ने अपने छूंछे क्रोध में उसे ऐसी फटकार लगाई है कि इस्राइल उसे कभी भूल नहीं सकेगा. ट्रंप ने सीधे ही कहा है कि युद्ध समाप्ति की मेरी घोषणा के बाद तेरी जुर्रत कैसे हुई कि तूने मिसाइल चलाई याद रखफैसला अमरीका करता हैबाकी सब उसे मानते भर हैं. अपनी अौकात में रह. अमरीका न हो तेरे साथ तो ऐसे युद्ध में तू दो घंटे भी ठहर नहीं सकता है. ऐसी अंतरराष्ट्रीय फटकार के बाद नेतन्याहू को हिम्मत नहीं हुई कि वे सीधे अमरीका को जवाब दे सकें. अपने एक अधिकारी से उन्होंने दबे स्वर में कहलवाया है कि यह समझौता अमरीका का अपना मामला है जिससे इस्राइल का कोई नाता नहीं है. नेतन्याहू को पता है कि जो मामला अमरीका का हैवह खुद-ब-खुद इस्राइल का मामला भी बन जाता है.  इस्राइल ने ऐसा नहीं किया तो वह अंतरराष्ट्रीय जगत में पंगु बन जाएगा. ट्रंप भी जानते हैंनेतन्याहू भी पहचानते हैं कि इस्राइल का अस्तित्व अमरीकी कृपा से ही बना व टिका है. इस्राइल के पास दौलत भी अकूत हैबुद्धि भी लेकिन एक स्वाभिमानी राष्ट्र की नैतिक आधारशिला उसके पास नहीं है. भारत समेत सबके लिए यह समझना जरूरी है कि नैतिकता आदर्श मात्र नहीं हैव्यक्ति व राष्ट्र की रीढ़ है. आज का पराजित इस्राइल भी चीख-चीख कर नया नेतृत्व मांग रहा है जो उसे इस्राइल के नागरिक ही दे सकते हैं. 

   चौथी पराजय हुई है ईरान की. हम भूल नहीं सकते हैं कि शाह व खामनेई ने ईरान को कभी भी समानता व समता में माननेवाला राष्ट्र बनने नहीं दिया. इन दोनों ने ईरान की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का जैसा क्रूर दमन किया हैवह एक शर्मनाक कहानी है. ईरान से आज हमारी सहानुभूति राष्ट्र के रूप में नहींदबंगई का प्रतिकार करने के साहस के कारण है. लेकिन हम एक क्षण के लिए भी भूल नहीं सकते कि मुल्लाई अंधता ने ईरान में नागरिक अधिकारों व महिलाओं की सामाजिक स्थिति की कैसी गत बना रखी थी. लेकिन इस पूरे युद्ध के दौरान कदम-दर-कदम ईरान के नागरिकों ने न केवल अपूर्व साहस दिखलाया बल्कि अपूर्व एकता का परिचय भी दिया. उन्होंने इस सरकार की अनैतिक भूमिका को भुला कर याद रखा सिर्फ अपने राष्ट्र को. इनके त्यागबलिदान व बहादुरी ने वह प्रतिकार खड़ा किया जिसके आगे ट्रंप ढेर हुए. ईरान के अंदर से विद्रोह फूटेगा और हम उस पर अपनी रोटी सेंकेंगेट्रंप की यह आशा पूरी नहीं हुई तो उसका पूरा श्रेय ईरान की जनता को है. राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन को याद रखना चाहिए कि अपनी जनता से हार करउन्होंने यह युद्ध जीता है. इसलिए अब सुप्रीम लीडर को अपनी जनता का सम्मान भी करना होगा और उसके सारे लोकतांत्रिक अधिकार बहाल करने होंगे. ऐसा नहीं हुआ और ईरान की जनता को अपने लिए फिर सड़कों पर उतरना पड़ा तो ईरान की जीत कड़वी पराजय में बदल जाएगी.      

   और फिर बचते हैं हम ! हम भी पराजित हुए हैंअंतरराष्ट्रीय राजनीति के जोकर साबित हुए हैं. युद्ध से ठीक पहले इस्राइल जा कर प्रधानमंत्री ने जैसी बचकानी समझ का परिचय दियाउसने देश को उपहास का पात्र बना दिया. इस्राइल ने हमें अपने जाल में फांसा और फिर ट्रंप के हवाले कर दिया. ट्रंप ने हमें अपमानित भी कियाविपन्न भी बनाया और गन्ने के रसहीन फोंक-सा फेंक भी दिया. जब हम यूक्रेनी ख़ून की नदी से छान-छान कर सस्ता रूसी तेल लाने को अपनी उपलब्धि बता रहे थे तभी ट्रंप की एक हुड़की ने हमें रसातल में पहुंचा दिया. फिर यह भी हुआ कि सब तरह सेहर स्तर पर विपन्न पाकिस्तान ने इस युद्ध में से अपने लिए एक अंतरराष्ट्रीय भूमिका खोज निकाली लेकिन हम जोकर बने कभी रूस तो कभी अमरीका के धक्के खाते रहे. आज वही पराजित ट्रंप फ़्रांस मेंमोदीजी को अपनी बग़ल में बिठा कर उनकी खूबसूरती’ का बखान करते हैं और कहते हैं कि यदि मोदी के रहते भारत पर किसी ने हमला किया तो अमरीका भारत की मदद में आएगा. इतनी फूहड़ता ! ट्रंप भाईअपनी मदद की सोचो. लेकिन हमने देखा कि अपना सर्वस्व हार चुका हमारा मीडिया ट्रंप को सामने करमोदी जी की अभ्यर्थना कर रहा हैतो हमारा पतन किस हद तक हुआ हैयह सामने है. हार जीत में बदल सकती हैपराजय हड्डियों में प्रवेश कर जाती है. महर्षि वेद व्यास ने कहा और गणपति ने लिखा जो महाभारतवह बताता है कि युद्ध में जय-पराजय होती हैमहायुद्ध में मात्र पराजय होती है- सबकी पराजय ! ( 19.06.2026)

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