Saturday, 29 May 2021

अफगानिस्तान से भागना रास्ता नहीं है

 अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर अमरीका आज जैसा घिरा है वैसा शायद पहले कभी नहीं था - राष्ट्रपति बाइडन इस बिसात पर जो भी चाल चलने की सोचते हैं वहीं सीधी मात सामने दिखाई देती है. शक्ति की शतरंज पर बेबस अमरीका ! राष्ट्रपति बाइडन का चुनावी नारा था - लौट रहा है अमरीका ! कहना वे चाहते थे कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अमरीका को जिस गतालखाने में डाल रखा हैवे वहां से अमरीका को विश्व रंगमंच पर फिर से ला स्थापित करेंगे. चुनावी नारा तो यह अच्छा था लेकिन इसे करना इतना मुश्किल होगाबाइडन को संभवत: इसका इल्म नहीं था. 

   अफगानिस्तान आज उन्हें इस कठोर वास्तविकता से रू-ब-रू करवा रहा है. अभी-अभी उन्होंने घोषणा की है कि 11 सितंबर 2021 तक अमरीकी फौजें अफगानिस्तान से पूरी तरह निकल आएंगी. आका बनने और बने रहने की अमरीकी विदेश-नीति का यह वह दमतोड़ बोझ है जिसकी कहानी कोई 32 साल पहले1989 में लिखी गई थी. 1978 में अमरीकी कठपुतली दाउद खान की सरकार का तख्ता वामपंथी फौजी नूर मुहम्मद तराकी ने पलटा था और सत्ता हथिया ली. इसी वामपंथी सरकार की रक्षा के नाम पर रूस अफगानिस्तान में दाखिल हुआ था. अफगानिस्तान में ऐसा रूसी प्रवेश अमरीका को क्यों कर बर्दाश्त होता. उसने स्थानीय कबीलों को भड़का कर तराकी व सोवियत संघ दोनों के लिए मुसीबत खड़ी करनी शुरू की. मामला बिगड़ा और बाजी हाथ से निकलती देखसोवियत संघ ने 24 दिसंबर 1979 की रात में 30 हजार फौजियों के साथ अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया और हफिजुल्ला अमीन की सरकार को बर्खास्त करबबराक कर्माल को गद्दी पर बिठा दिया. कठपुतलियां नचाने का अमरीकी खेल अब तथाकथित वामपंथियों ने खेलना शुरू किया. लेकिन जितना भी नचाओकठपुतलियां तो कठपुतलियां ही रहती हैंभरतनाट्यम की उस्ताद नहीं बन जाती हैं. 

   1989 तक रूसी कठपुतलियां नचा सके लेकिन अमरीकी धनछल और हथियारों की शह पा कर खड़े हुए कट्टरखूनी कबीलों के संगठन इस्लामी धर्मांध मुजाहिदीन लड़ाकों ने उसे असहाय करना शुरू कर दिया. अमरीका का पिछलग्गू पाकिस्तान मुजाहिदीनों की पीठ पर था. पराजय के घूंट पी कर सोवियत संघ तब अफगानिस्तान से जो विदा हुआ तो फिर उसने इधर का मुंह भी नहीं किया. अब अमरीकी वहां कठपुतलियां नचाने लगे लेकिन हुआ यह कि इतने लंबे अनुभवों के बाद कठपुतलियों ने नाचना नहींनचाना भी सीख लिया था. असंगठित कबीलों और भाड़े के हत्यारों को अलकायदा और तालिबान की छतरी के नीचे जमा होता देख अमरीका ने अपनी फौजी उपस्थिति बढ़ानी शुरू की और फिर एक ऐसा युद्ध शुरू हुआ जिसमें लाशें तो थींगिनने वाला कोई नहीं था. 

   अमरीका ने अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति के औचित्य में कहा: हमें अफगानिस्तान को एक ऐसा स्थिर व लोकतांत्रिक देश बना देना है जो अलकायदा व तालिबान के दवाब में काम न करता हो. ऐसा कहते हुए अमरीका ने इसे अनदेखा कर दिया कि ऐसा स्वतंत्र अफगानिस्तान अमरीकी दवाब से भी मुक्ति चाहेगा न ! लेकिन अमरीकी समाज इसकी अनदेखी कैसे कर सकता था कि उसके वर्दीधारी बच्चे रोज-रोज अफगानिस्तान में मारे जा रहे हैं ! अमरीकी युवाओं की लाशेंयुद्ध का लगातार बढ़ता आर्थिक बोझ और दिनोदिन गाढ़ी होती आर्थिक मंदी - अमरीकी राष्ट्रपतियों को मजबूर करती जा रही थी कि वे अफगानिस्तान से वैसे ही निकल आएं जैसे सोवियत संघ निकला था. लेकिन चक्रव्यूह में प्रवेश से भी कहीं जटिल होता है उससे बाहर निकलनायह बात जान दे कर अभिमन्यु ने सीखी थी तो जान पर बन आने पर अमरीका ने समझी.            

    बाइडन अफगानिस्तान में अमरीकी फौजों की उपस्थिति के कटु आलोचक रहे हैं और वहां चल रहे युद्ध को अंतहीन युद्ध’ कहते रहे हैं. जब वे राष्ट्रपति ओबामा के उप-राष्ट्रपति थे तब भी हर संभव मौके पर वे अमरीकी वापसी की पैरवी करते रहे थे. यह राष्ट्रपति ओबामा की स्वीकृति व सहमति के बिना नहीं होता था. ओबामा चाहते थे कि अफगानिस्तान से अमरीका की वापसी का श्रेय उन्हें मिले लेकिन ऐसा कोई मौका वे बना नहीं सके. सबसे नायाब मौका उन्हें मिला था 2011 में जब पाकिस्तान के एटाबाबाद शहर में घुस कर अमरीकी सैनिकों ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला था और उसकी लाश समुद्र में दफन करअमरीका लौटे थे. तब व्हाइट हाउस के वाररूम में बैठ करइस पूरे अभियान का जीवंत नजारा ओबामा ने देखा था. यह वह क्षण था जब वे दुनिया से कह सकते थे कि अफगानिस्तान में अमरीकी उपस्थिति का एक अध्याय पूरा हुआ और अब हम अपनी फौज वहां से हटा रहे हैं. यह विजयी अमरीका का ऐसा निर्णय होता जिसे अमरीकी शर्तों पर अलकायदा भीतालिबान भीअफगानिस्तान सरकार भी और लोमड़ी जैसी चालाकी दिखाता पाकिस्तान भी स्वीकार करता. जीत का स्वाद  और जीत का तेवर अलग ही होता है. लेकिन यह नाजुक फैसला लेने से ओबामा हिचक गये. इतिहास कब दूसरा मौका देता है कि ओबामा को देता ! हाथ मलते हुए वे विदा हुए. 

   अब बाइडन अफगानिस्तान के अंतहीन युद्ध’ का अंत करना अपनी नैतिक जिम्मेवारी मानते हों तो स्वाभाविक ही है. अब वे फैसला करने वाली कुर्सी पर बैठे हैं तो उन्हें वह फैसला करना ही चाहिए जिसकी वे अब तक पैरवी करते रहे हैं. लेकिन राजनीति का सच यह है कि आप जो कहते हैं वह कर भी सकते हैंयह न जरूरी हैन शक्य ! अफगानिस्तान से अमरीकी फौजों की वापसी का आज एक ही मतलब होगा : भयंकर खूनी गृहयुद्धइस्लामी अंधता में मतवाले तालिबान का आधिपत्य और पाकिस्तानी स्वार्थ का बोलबाला. यह अमरीकी कूटनीति की शर्मनाक विफलताअमरीकी फौजी नेतृत्व के नाकारापन की घोषणा और एशियाई मामलों से सदा के लिए हाथ धो लेने की विवशता को कबूल करना होगा. यह बहुत बड़ी कीमत होगी. 

   इसलिए 11 सितंबर से पहले अमरीका को अपनी पूरी ताकत लगा कर अफगानिस्तान के सभी पक्षों को एक टेबल पा लाना होगा. सामरिक विफलता को कूटनीतिक सफलता में बदलने का एकमात्र यही रास्ता है. कितना भी टेढ़ा लगता हो लेकिन कोई 3 हजार अमरीकी व नाटो संधि के कोई 7 हजार सैनिकों की उपस्थिति में ही अफगानिस्तान में एक मिली-जुली सरकार का गठन होयह जरूरी है. यह सरकार भले लूली-लंगड़ी भी होबार-बार टूटती-बिखरती भी हो लेकिन उसका बनना एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म देगा जिससे अफगानी समाज आज बहुत कम परिचित है. अफगानिस्तान को अफगानी लोकतंत्र का यह स्वाद चखने देना चाहिए. 

   तालिबान अभी जिस जोम में है उसमें ऐसा करना आसान नहीं है लेकिन अफगानिस्तान के दूसरे सारे कबीलों को साथ लेने की अमरीकी कुशलता तालिबान पर भारी पड़ेगी. यहीं अमरीका को हमारी जरूरत भी पड़ेगी. हमें आगे बढ़ कर अमरीकी कूटनीति में हिस्सेदारी करनी चाहिए ताकि पाकिस्तान को खुला मैदान न मिल सके. हिस्सेदारी व पिछलग्गूपन में क्या फर्क हैयह बताने की जरूरत है क्या अफगानी लोगों को अफगानिस्तान के मामले में पहल करने का जितना मौका दिया जा सकेगाअतिवादी ताकतें उतना ही पीछे हटेंगी. लोग भयभीत हों तथा चुप रहेंअतिवादी इसी की फसल काटते हैं. बाइडन यह समझेंऔर यह भी समझें कि लोकतंत्र का संरक्षण और विकास थानेदारी से नहींभागीदारी से ही हो सकता है. अमरीका को अफगानिस्तान से निकलना ही चाहिए लेकिन भागना नहीं चाहिए. ( 20.04.2021)

Monday, 12 April 2021

क्या हम वापस लौटेंगे

 बस्तर में कुछ भी, किसी के बस में नहीं है. छत्तीसगढ़ सरकार और नक्सलियों के बीच छत्तीस का नाता था, है और जो दीख रहा है वह बताता है कि आगे भी यह रिश्ता ऐसा ही रहेगा.  

3 अप्रैल 2021 को वही हुआ जो इससे पहले भी कई बारकई जगहों पर हो चुका है- जिंदा इंसानों का लाशों में बदलना और फिर हमारा लाशों को गिनना ! बस्तर में पारामिलिट्री सेंट्रल रिजर्व पुलिस के अपने 22 जवानों की लाशें गिन-बटोर कर दोनों सरकारें निकल गई हैंछत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मानें तो अपने साथियों की अनगिनत लाशें दो ट्रैक्टरों में लाद कर नक्सली भी गुम हो चुके हैं. बस्तर के इलाके में सन्नाटा पसरा है. मौत जब भी जिंदगी से जीतती है तो ऐसा ही सन्नाटा तारी होता है. 

अब वहां क्या हो रहा है मौत के अगले झपट्टे की तैयारी - बस्तर के भीतरी जंगलों में भी और शासन के गलियारों में भी ! मीडिया में कहानियां भी बहुत चल रही हैं और कयास भी बहुत लगाए जा रहे हैं. लेकिन इस बीच एक खास बात हुई है. 3 अप्रैल के खूनी मुकाबले के बाद मार-मर कर नक्सली भागे तो पुलिस के एक जवान राकेश सिंह मिन्हास को उठा भी ले गए. सब यही मान रहे थे कि जिसे नक्सली तब नहीं मार सकेउसे अब मार डालेंगे. यह भी बात फैल रही थी कि राकेश सिंह को अमानवीय यंत्रणा दी जा रही है. लेकिन उस वारदात के 5 दिन बादनक्सलियों ने राकेश सिंह को सार्वजनिक रूप से सही-सलामतबेशर्त रिहा कर दिया. यह अजूबा हुआ जो अचानक और अनायास नहीं हुआ. जो अचानक व अनायास नहीं होता हैउसमें कई संभावनाएं छिपी होती हैं. उन संभावनाओं को पहचानने की आंख हो और उन संभावनाओं को साकार करने का साहस हो तो बहुत कुछ असंभव संभव हो जाता है. ऐसी आंख व ऐसा साहस राज्य के पास हैऐसा लगता तो नहीं है. पर यह भी सच है कि जो लगता नहीं हैवह होता नहीं हैयह सच नहीं है. आंखें खुलने और साहस जागने का क्षण कब आ जाएकोई कह नहीं सकता है. 

3 अप्रैल की घटना के बाद सदा-सर्वदा चुनाव-ज्वरग्रसित गृहमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री ने मीडिया से जो कुछ कहा और जिस मुखमुद्रा में कहावह अंधकार पर काली स्याही उड़लने से अधिक कुछ नहीं था. आंतरिक असंतोष से निबटने में युद्ध की भाषाधमकी का तेवर और सत्ता की हेंकड़ी दूसरा कुछ नहीं करतीआपके भीतर के बंजर और भयभीत मन की चुगली खाती है. नक्सली समस्या हमारे वक्त की वह ठोस हकीकत है जिसकी जड़ें विफल सरकारअसंवेदशील प्रशासनबांझ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में छिपी हैं. जब राजनीति का स्वार्थीक्रूर और संवेदना-शून्य घटाटोप घिरता है तब सामान्य असमर्थ नागरिक बिलबिला उठता है. वह भटक जाता हैभटका लिया जाता है और फिर सब कुछ हिंसा-प्रतिहिंसा के चक्रव्यूह में फंस जाता है. अगर कहीं कोई संभावना बनती है तो वह हिंसा-प्रतिहिंसा के इस विषचक्र को तोड़ने से बनती है. सिपाही राकेश सिंह की रिहाई इसकी तरफ ही इशारा करती है. हम इस इशारे को समझें. 

यह रिहाई बताती है कि बस्तर के नक्सली राक्षस नहीं हैंहमारी-आपकी तरह के इंसान हैं. यह रिहाई बताती है कि सरकारों के अक्षम्य दमन और प्रशासन की निष्ठुरता और उसकी प्रतिक्रिया में निरुपाय आदिवासियों की क्रूर जवाबी हिंसा के बाद भी नक्सलियों के भीतर कोई मानवीय कोना बचा हुआ है.  वहीं आशा का दीपक जलता है. आप सोच कर देखिए कि यदि 3 अप्रैल की वारदात में कोई नक्सली राकेश सिंह’ पुलिस के हाथ लग गया होता तो क्या उसकी ऐसी बेशर्त व बे-खरोंच रिहाई की जाती एक तरफ हर तरह की हिंसा और मनमानी का लाइसेंस लिए बैठी सत्ता हैदूसरी तरफ गुस्से से भरी असहाय आदिवासी जनता है. ऐसे में हिंसा का दर्शन मानने वाला कोई संगठन उन्हें बतलाता-सिखलाता है कि इनसे इनके ही रास्ते बदला लेना चाहिएतो आदिवासियों की छोड़िएहम या आप भी क्या करेंगे उबल पड़ेंगे और रास्ता भटक जाएंगे. तो क्या जवाब में राज्य-सत्ता भी ऐसा ही करेगी अगर राज्य-सत्ता भी ऐसी ही आदिवासी मानसिकता से काम लेगी तो हिंसा और भटकाव की यह श्रृंखला टूटेगी कैसे 

जवाब धरमपाल सैनी व उनके सहयोगियों ने दिया है. उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार की सहमति व प्रोत्साहन प्राप्त था लेकिन सारा नियोजन तो धरमपाल सैनी का था. धरमपाल सैनी कौन हैं बस्तर या छत्तीसगढ़ के नहीं हैं लेकिन पिछले 40 से अधिक सालों से बस्तर को ही अपना संसार बना करवहीं बस गये हैं. बस्तर के घरों में ताऊ’ तथा बाहर बस्तर के गांधी’ नाम से खूब जाने-माने जाते हैं. आचार्य विनोबा भावे के शिष्य92 वर्षीय धरमपाल सैनी जब युवा थे तब किसी प्रसंगवश उमग कर छत्तीसगढ़ जा कर काम करने की सोची. अनुमति लेने विनोबा के पास गये तो विनोबा ने मना कर दिया. युवा धरमपाल के लिए यह समझ के बाहर था कि विनोबा लोगों की भलाई का काम करने से उन्हें रोक क्यों रहे हैं जब दोबारा अनुमति मांगी तो विनोबा उनसे ही एक वचन मांग लिया : अगर वहां जाने के बाद 10 सालों तक वहीं खूंटा गाड़ कर रहने की तैयारी हो तो मेरी अनुमति है ! धरमपाल ने अपना जीवन ही वहां गाड़ दिया. यह कहानी इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि किसी का गुणगान करना है. इसलिए लिख रहा हूं कि हम भी और राज्य भी यह समझे कि अहिंसा जादू की छड़ी नहीं हैसमाज विज्ञान और मनोविज्ञान की वैज्ञानिक प्रक्रिया है. बस्तर हो कि नक्सली हिंसा की अशांति में घिरा कोई भी क्षेत्रराज्य यदि लोगों को डराने-धमकाने-मारने की असभ्यता दिखाएगा तो जवाब में उसे भी वही मिलेगा. हिंसा का विषचक्र तोड़ना हो तो किसी धरमपाल सैनी को आगे आना होगाराज्य को उसे आगे लाना होगा. ऐसा कोई इंसान जिसकी ईमानदारीसेवा की साख हो और सत्य पर टिके रहने के जिसके साहस को लोग जानते हों. हम देखते ही तो हैं कि रेगिस्तान में बारिश का पानी बहता नहींधरती में जज्ब हो जाता है. प्रताड़ित-अपमानित निरुपाय लोगों को जहां और जिससे सहानुभूतिसमर्थन व न्याय की आस बनती हैवे उसे जज्ब कर लेते हैं. विनोबा या जयप्रकाश के चरणों में चंबल के डाकू समर्पण करते हैं तो यह कोई चमत्कार नहींविज्ञान है.

सिपाही राकेश सिंह की वापसी कह रही है कि हम सभी वापस लौटें ! राज्य ईमानदार बनेन्यायवान बने और धरमपाल सैनी जैसों को पहल करने में अपना पूरा साथ-सहयोग देतो रास्ते आज भी निकल सकते हैं. रास्ते कभी बंद नहीं होतेबंद होती हैं हमारी आंखें ! बस्तर के नक्सलियों ने हमारी आंखें खोलने का माहौल बनाया है. ( 09.04.2021)  

भीड़ में खोया मतदाता : सत्ता के नशे में लोकतंत्र

 स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव से चलें हम और अभी जिन पांच राज्यों में चुनाव का हंगामा मचा है, उस तक का सिलसिला देखें तो हमारे लोकतंत्र की तस्वीर बहुत डरावनी दिखाई देने लगी है. अब हो यह रहा है कि हमारे लोकतंत्र में किसी को भी न लोक की जरूरत है, न मतदाता की. सबको चाहिए भीड़  बड़ी-से-बड़ी भीड़, बड़ा-से-बड़ा उन्माद, बेतहाशा शोर ! लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदल कर सभी दल व सभी नेता मस्त हैं. सबसे कद्दावर उसे माना जा रहा है जो सबसे बड़ा मजमेबाज है. कुछ ऐसा ही आगत भांप कर संविधान सभा में बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था: लोकतंत्र अच्छा या बुरा नहीं होता है. वह उतना ही अच्छा या बुरा होता है जितने अच्छे या बुरे होते हैं उसे चलाने वाले !  

कोई 70 साल पहले हमारी लोकतांत्रिक यात्रा यहां से शुरू हुई थी कि हमें अपने मतदाता को मतदान के लिए प्रोत्साहित करना पड़ता था. मुट्ठी भर धनवान मतदान करने जाने में अपनी हेठी समझते थे तो सामान्य मतदाता इसे व्यर्थ समझता था. यह दौर लंबा चला लेकिन सिमटता भी गया. फिर हमने चुनाव आयोग का वह शेषन-काल देखा जब आयोग की पूरी ताकत बूथ कैप्चरिंग को रोकने और आर्थिक व जातीय दृष्टि से कमजोर वर्गों को बूथ तक नहीं आने देने के षड्यंत्र को नाकाम करने में लगती थी. यह दौर भी आया और किसी हद तक गया भी.

फिर वह दौर आया जब बाहुबलियों के भरोसे चुनाव लड़े व जीते जाने लगे. फिर बाहुबलियों का भी जागरण हुआ. उन्होंने कहा : दूसरों को चुनाव जितवाने से कहीं बेहतर क्या यह नहीं है कि हम ही चुनाव में खड़े हों और हम ही जीतें भी राजनीतिक दलों को भी यह सुविधाजनक लगा. सभी दलों ने अपने यहां बाहुबली-आरक्षण कर लिया. हर पार्टी के पास अपने-अपने बाहुबली होने लगे . फिर हमने देखा कि बाहुबलियों के सौदे होने लगे. सांसदों-विधायकों की तरह ही बाहुबली भी दल बदल करने लगे. लेकिन बढ़ते लोकतांत्रिक जागरणमीडिया का प्रसारचुनाव आयोग की सख्तीआचार संहिता का दबाव आदि-आदि ने बाहुबलियों को बलहीन बनाना शुरू कर दिया. वे जीत की गारंटी नहीं रह गये. यहां से आगे हम देखते हैं कि  चुनाव विशेषज्ञों के जादू’ से जीते जाने लगे.    

  होना तो यह चाहिए था कि चुनावों को लोकतंत्र के शिक्षण का महाकुंभ बनाया जाता लेकिन यह बनता गया विषकुंभ ! लोकतांत्रिक आदर्श व मर्यादाएं गंदे कपड़ों की तरह उतार फेंकी गई. सबके लिए राजनीति का एक ही मतलब रह गया : येनकेनप्रकारेण सत्ता पानाऔर सत्ता पाने का एकमात्र रास्ता बना चुनाव जीतना ! किसनेकैसे और क्यों चुनाव जीता यह न देखना-पूछना सबने बंद कर दिया गया और जो जीता उसके लिए नारे लगाए जाने लगे : हमारा नेता कैसा हो …  विनोबा भावे ने हमारे चुनावों के इस स्वरूप पर बड़ी ही मारक टिप्पणी की : यह आत्म-प्रशंसापरनिंदा और मिथ्या भाषण का आयोजन होता है. अब किसी ने इसे ही यूं कहा है : चुनाव जुमलेबाजी की प्रतियोगिता होती है. 

जिन पांच राज्यों में चुनाव चल रहे हैं वहां से कैसी-कैसी आवाजें आ रही हैंसुना है आपने कोई धर्म की आड़ ले रहा हैकोई जाति की गुहार लगा रहा हैकोई अपने ही देशवासी को बाहरी कह रहा है तो कोई अपना गोत्र और राशि बता रहा है. कोई किसी की दाढ़ी पर तो कोई किसी की साड़ी पर फब्ती कस रहा है. साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी वर्जित नहीं है इन चुनावों में. सार्वजनिक धन से सत्ता खरीदने का बेशर्म खेल चल रहा है लेकिन न चुनाव आयोग कोन अदालत कोन राष्ट्रपति को ही लगता है कि संवैधानिक नैतिकता का कोई एक धागा उनसे भी जुड़ता है ! आप ध्यान से सुनेंगे तो भी नहीं सुन सकेंगे कि कोई कार्यक्रमों की बात कर रहा हैकोई विकास का चित्र खींच रहा हैकोई मतदाताओं का विवेक जगाने की बात कर रहा है. सभी मतदाता को भीड़ में बदलने का गर्हित खेल खेल रहे हैं ताकि मानवीय विकृतियों-कमजोरियों का बाजार अबाध चलता रह सके. हमारा लोकतंत्र अब इस मुकाम पर पहुंचा है कि किसी भी पार्टी को मतदाता की जरूरत नहीं है. सजगईमानदारस्व-विवेकी मतदाता सबके लिए बोझ बन गया हैउससे सबको खतरा है. नागरिकों का जंगल बना कर उनका शिकार करना सबके लिए आसान है.  

चुनावी प्रक्रिया को इस हद तक भ्रष्ट कर दिया गया है कि इसमें से कोई स्वस्थ लोकतंत्र पैदा हो ही नहीं सकता है. चुनाव आयोग एक ऐसी विकलांग संस्था में बदल गया है जिसके पास भवन के अलावा अपना कुछ भी बचा नहीं है. 2014 और 2019 के आम चुनाव के बारे में चुनाव आयोग ने ही हमें बताया है कि 2014 के चुनाव में देश भर में 300 करोड़ रुपये पकड़े गये जो मतदाताओं को खरीदने के लिए भेजे जा रहे थे. 1.50 करोड़ लीटर से अधिक शराब17 हजार किलो से अधिक ड्रग्स पकड़े गये तथा दलों का अपवाद किए बिना 11 लाख लोगों के खिलाफ काररवाई हुई जिन्हें दलों ने अपना कार्यकर्ता’ बना रखा था. 2019 के आम चुनाव में इस दिशा में अच्छा विकास’ देखा गया जब 844 करोड़ नकद रुपयों जब्ती हुई304 करोड़ रुपयों की शराब12 हजार करोड़ रुपयों के ड्रग्स आदि पकड़े गये. यह भारत सरकार की अपराध शाखा के आंकड़े नहीं हैंचुनाव आयोग के लोकतांत्रिक आंकड़े हैं. तो क्या चुनाव आयोग से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि यदि लोकतंत्र का ऐसा माखौल बनता जा रहा है तो आयोग की प्रासांगिकता ही क्या रह गई हैक्या ये आंकड़े ही हमें नहीं बताते हैं कि स्वतंत्रलोकतांत्रिक चुनाव करवाने की कोई दूसरी व्यवस्था हमें सोचनी चाहिए अगर चुनाव आयोग राष्ट्रपति व सर्वोच्च न्यायालय से ऐसा कुछ कहे तो यह पराजय की स्वीकृति नहींइलाज की दिशा में पहल कदम होगा. लोकतंत्र का मतलब ही है कि इसकी पहली व अंतिम सुनवाई लोक की अदालत में हो. लेकिन वह तो भीड़ बन करभीड़ में खो गया है. 

कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप / जो भी थी रोशनी वह सलामत नहीं रही. 

( 02.04.2021)

इतिहास को भूलने का खतरा

अपनी स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ मना कर बांग्लादेश ने फुर्सत पा ली. प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य मेहमान बना कर अपनी राजनीतिक राह आसान करने की कोशिश की तो भारतीय प्रधानमंत्री ने हमेशा की तरह इस मौके से भी अपने लिए राजनीतिक फायदे की आखिरी बूंद तक निचोड़ लेने की कोशिश की. उन्होंने खुद को बांग्लादेश की आजादी का सिपाही भी घोषित कर लिया और उस भूमिका में अपनी जेलयात्रा का विवरण भी दे दिया जबकि सच तो यह है कि उनकी पार्टी के उस कार्यक्रम में उन जैसे सैकड़ों जनसंघी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था. मैं भी उन कार्यकर्ताओं में एक था’, ऐसा कहने की विनम्रता प्रधानमंत्री की विशेषता नहीं रही है. वे उस फिल्मी संवाद के मूर्तिमान स्वरूप हैं कि मैं जहां खड़ा होता हूं, लाइन वहीं से शुरू होती है. और यह भी तथ्य है कि तब शायद ही कोई विपक्षी दल था कि जिसने सरकार के विरोध में वैसे कार्यक्रम न किए हों और गिरफ्तारी न दी हो. 

लेकिन इतिहास बताता है कि 50वीं वर्षगांठ के इस ऐतिहासिक मौके पर बांग्लादेश व भारत दोनों ने जाने-अनजाने में बला की ऐतिहासिक निरक्षता का परिचय दिया. 2015 में शेख हसीना की सरकार ने एक बड़ा चमकीला आयोजन किया था और उन सबको बांग्लादेश लिबरेशन एवार्ड’ से सम्मानित किया था जिन्होंने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में उल्लेखनीय भूमिका अदा की थी. ऐसे लोगों में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी भी थे. वे तब इतने बीमार थे कि ढाका जा नहीं सकते थे. उनकी तरफ से यह सम्मान ग्रहण करने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ढाका पहुंचे थे - मुक्ति संग्राम के सहयोगी सिपाही के रूप में नहींकिसी अनुपस्थित की जगह भरने ! 

उस समारोह में एक और भारतीय सम्मानित किया गया था जिसे समर्पित सम्मान-प्रतीक मेरे सामने के टेबल पर धरा रहता है और हमेशा मुझे घूरता रहता है. बंगबंधु शेख मुजीब की प्रधानमंत्री बेटी शेख हसीना भले भूल जाएं और भारत के प्रधानमंत्री आत्ममुग्धता से भले बाहर न निकल सकें लेकिन इतिहास तो जानता है कि पहले दिन से ही बांग्लादेश के संघर्ष को सही संदर्भ में समझनेउसे देश-दुनिया को समझाने और उसके लिए देश-दुनिया की अंतररात्मा को झकझोरने का अनथक काम किसी एक व्यक्ति ने किया था तो उसका नाम जयप्रकाश नारायण था. 50वीं वर्षगांठ के समारोह में किसी ने गलती से भी उस जयप्रकाश को याद न करके अपनी छिछली ऐतिहासिक समझ का परिचय दिया. जयप्रकाश के पास न सत्ता की कोई कुर्सी थीन सत्ता पर दावा करने वाली कोई पार्टी थी और न पर्दे के पीछे से काम करने वाला कोई एजेंडा था. वे लोकतंत्र की आराधना करने वाले एक ऐसे नागरिक थे जिसने ताउम्र संसार के किसी भी कोने से उठने वाली लोकतांत्रिक आकांक्षा को हमेशा स्वर भी दिया और समर्थन भी. 

देश-विभाजन का अंत-अंत तक खुला विरोध करने वाले गिने-चुने नामों में जयप्रकाश का नाम आता है. उन्होंने पाकिस्तान की परिकल्पना का कभी भी स्वागत-समर्थन नहीं किया. सांप्रदायिक राजनीति के कट्टर विरोधियों की किसी भी सूची में उनका नाम दर्ज होगा ही. लेकिन वही जयप्रकाश आजादी के तुरंत बाद से हीभारत-पाकिस्तान के बीच संवाद की पहल करने और उसके लिए नागरिक मंच बनाने वालों में हमें सबसे आगे खड़े मिलते हैं. आजादी के तुरंत बाद शांति-सद्भावना के लिए प्रयास करने वालों का एक नागरिक प्रतिनिधि मंडल ले कर पाकिस्तान जाने वाले पहले भारतीय नेता जयप्रकाश ही थे. हम यह भी पाते हैं कि सैनिक बगावत से सत्ता हड़पने वाले पाकिस्तानी जेनरल अयूब खान ने जब बुनियादी लोकतंत्र’ के नाम से एक प्रयोग की बात की तब गलतफहमी का खतरा उठा कर भी जयप्रकाश ने उसे सराहा. गलतफहमी होनी थीहुई और उन्हें तीखी आलोचना का शिकार होना पड़ा लेकिन वे समझाते रहे कि मेरा समर्थन अयूब की तानाशाही को नहींलोकतंत्र के उनके प्रयोग को है. दोनों दो अलग बातें हैं. राजनीति का संकीर्ण मतलब करने व समझने वालों को ऐसे जयप्रकाश को पचाना हमेशा मुश्किल रहा है. संघ परिवार के लिए तो जयप्रकाश हमेशा ही अबूझ पहेली रहे. नरेंद्र मोदी जिस दल के सदस्य हैं व जिसकी तरफ से प्रधानमंत्री हैं उसने जयप्रकाश को देशद्रोही’ भी कहा था और उन्हें फांसी’ देने की मांग भी की थी. इतिहास में ऐसी कितनी ही गलियां मिलेंगी आपको जिनमें नासमझों की फौज कवायद करती दिखाई देती है. लेकिन अभी बात बांग्लादेश की ही करूंगा. 

1971 में जब पाकिस्तान के आम चुनाव का नतीजा सामने आया और शेख मुजीब की अवामी लीग ने पूर्व पाकिस्तान की 169 सीटों में से 167 सीटें जीत कर पश्चिम पाकिस्तान की दादागिरी को सीधे जमीन पर ला पटका थातब जयप्रकाश ही थे कि जिन्होंने इसका सही संदर्भ समझा था और इसकी हर खुलती परत पर नजर रखी थी. वे इससे पहले से पाकिस्तान के भीतर उठ रही परिवर्तन की लहरों को देख रहे थे और समझा रहे थे कि हमें इन संकेतों के आधार पर अपनी नीतियां बनानी चाहिए. 

शेख मुजीब और जयप्रकाश एक-दूसरे के लिए अजनबी नहीं थे. दोनों आजादी की लड़ाई के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे भले सीधे परिचित न हों और अलग-अलग रास्तों के राही हों. लेकिन पूर्व पाकिस्तान के मुजीब संपूर्ण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनेंसत्ता से पश्चिमी पाकिस्तान का एकाधिकार टूटेयह जयप्रकाश के लिए यह पाकिस्तान की राजनीति का आंतरिक मामला नहींलोकतंत्र के विकास का संकेत था. इसलिए फौजी तानाशाह याहय्या खान व तिकड़मी राजनीतिज्ञ जुल्फिकार अली भुट्टो की जोड़ी ने मिल कर जब शेख मुजीब को उनके इस अधिकार से वंचित करने की चालें शुरू कीं तो जयप्रकाश सावधान हो गए. तब वे देश-दुनिया से प्राय: कटेबिहार के ठेठ ग्रामीण क्षेत्र मुसहरी में ग्रामस्वराज्य का प्रयोग करने बैठे हुए थे. लेकिन एक सावधान समाजविज्ञानी के नाते वे हर नई हलचल पर नजर रखते थे. शेख मुजीब को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की हर तिकड़म करने के बाद पश्चिम पाकिस्तान ने पूर्व पाकिस्तान पर बाजाप्ता हमला ही बोल दिया. फौजी दमन का ऐसा नृशंस दौर शुरू हुआ कि जिसकी तब भी और आज भी कल्पना कठिन है. मुसहरी की अपनी झोपड़ी के अंधेरे मेंट्रांजिस्टर से वहां की खबरें सुनते जयप्रकाश को पत्तों की तरह कांपते और विह्वल होते मैंने देखा है. उन्होंने बांग्लादेश संकट के एकदम शुरुआती दौर में ही अपने संपर्कों से दिल्ली को खबर भिजवाई थी कि भारत सरकार को पूर्व पाकिस्तान की घटनाओं की तरफ से न चुप रहना चाहिएन उदासीन. लेकिन दिल्ली की हवा-पानी का ही दोष है शायद कि वह तब भी और आज भी ऊंचा ही सुनती है. जब किसी ने जयप्रकाश से कहा कि यह सब राजनीतिक बातें राजनीतिज्ञों के लिए ही छोड़ देनी चाहिए तब बहुत दर्द से वे बोले थे : मैं क्या करूंउनकी चीखें मेरे कानों में गूंजती हैं ! पवनार आश्रम से सलाह आई : सरकार के पास ज्यादा जानकारियां होती हैं ! जयप्रकाश ने जवाब भिजवाया : सवाल जानकारी का नहींउसे समझने का है. 

जयप्रकाश पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के दमन को लोकतंत्र के दमन का नाम दिया और शांतिमय जनांदोलन का रास्ता अपनाने के लिए शेख मुजीब का समर्थन किया. तब तक देश-दुनिया इस दमन की दर्शक बनी बैठी थी. शेख मुजीब ने सारे पूर्वी पाकिस्तान को जिस तरह प्रतिकार में खड़ा किया और जैसी राष्ट्रव्यापी हड़ताल आयोजित की उसे देखकर जयप्रकाश झूम उठे और अपने सर्वोदय साथियों से कहने लगे कि यह गांधी की दिशा को उन्नत करने वाला है. पाकिस्तानी दमन देखते-देखते नरसंहार में बदल गया. सड़कों परविश्वविद्यालयों मेंसंस्थानों में निहत्थे लोग थोक के भाव से मारे जाने लगे. घटनाएं इतनी तेजी से घट रही थीं कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी विमूढ़-सी हो रही थीं. विपक्ष के पास कोई दृष्टि नहीं थी. लेकिन यहां देश में भी और वहां दुनिया में भी एक अनोखा विभाजन आकार लेने लगा था : जनता इस दमन के खिलाफ मुखर होती जा रही थी, ‘जनता की सरकारें’ मौन साधे हुई थीं. पश्चिमी देश अधिकांशत: इसे अश्वेतों की असभ्यता’ का नाम दे कर अपनी राजनीतिक चालें चल रहे थे.

संकट आगे बढ़ा तो मुजीब साहब ने पूर्व पाकिस्तान को बांग्ला भाषा व संस्कृति से जोड़ कर एक नया ही संदर्भ खड़ा कर दिया और पूर्व पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश’ नाम हवा में तैरने लगा. जयप्रकाश ने इसे नई राजनीतिक दिशा दी और पहली बार यह मांग उठाई कि भारत सरकार बांग्लादेश को राजनीतिक मान्यता दे ! विनोबा समेत कई लोगों को लगा कि जयप्रकाश सर्वोदय की लक्ष्मण-रेखा लांघ रहे हैं. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को लगा कि जयप्रकाश अपरिपक्वता का परिचय दे रहे हैं. लेकिन बांग्लादेश को राजनीतिक मान्यता की जयप्रकाश की मांग ने विश्व जनमत को एक दिशा दे दी. लोकतंत्र में जनमत एक हथियार हैऐसा कहा था गांधी नेजयप्रकाश उस हथियार को बनाने में जुट गये. इंदिराजी के लिए यह दवाब खासा मुश्किल साबित हुआ. वे अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन व पश्चिमी देशों के रवैये से घबराई हुई थीं. उन्हें कहीं यह भी लग रहा था कि जयप्रकाश उनसे राजनीतिक पहल छीनते जा रहे हैं. उन्होंने मान्यता का सवाल यह कह कर टाल दिया कि दुनिया भर का माहौल तैयार करने के बाद ही ऐसा करना उचित होगा. उन्होंने सोवियत संघ के साथ शांति-सुरक्षा की संधि कर अमरीका को जवाब देने की कोशिश की. जयप्रकाश इस कूटनीति को समझ भी रहे थे और इसका समर्थन भी कर रहे थे लेकिन वे यह भी कह रहे थे कि भारत को मजबूत राजनीतिक पहल करनी चाहिए.  

जयप्रकाश कह ही नहीं रहे थे वे आगे बढ़ते जा रहे थे. भारत सरकार जब ऊहापोह में फंसी थीभारत के जयप्रकाश बांग्लादेश में मुक्ति वाहिनी के साथ तालमेल बना चुके थे और पूर्वी पाकिस्तान की धरती पर जा कर परिस्थिति का आकलन कर आए थे. मुजीब तब तक मंच से गायब कर दिए गए थे लेकिन अवामी लीग के दूसरे नेताओं के साथ जयप्रकाश का सीधा संपर्क बन चुका थाउनमें मंत्रणा चलने लगी थी. जयप्रकाश सरकार से अलग व समानांतर भूमिका में काम  कर रहे थे. वे देश में जगह-जगह सभाएं कर रहे थेप्रेस से बातें कर रहे थेदुनिया भर से नागरिक स्तर पर संवाद चला रहे थे. उनके अनथक प्रयासों व उनके अकाट्य तर्कों से बांग्लादेश को मान्यता देने का सवाल सत्ताओं के गले की फांस बनता जा रहा थातो विश्व जनमत को एक केंद्रबिंदु प्रदान कर रहा था.  

 वे बार-बार यही सवाल पूछते रहे : हम देखते रहें और हमारे पड़ोस में उठी लोकतांत्रिक आकांक्षा को फौजी बूटों तले कुचल दिया जाए तो लोकतंत्र का संरक्षण कैसे होगा ?  वे हर मंच से यह साफ करते थे कि सवाल पाकिस्तान का नहींलोकतंत्र का है. पाकिस्तान ने खुद को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा लिया है तो उसे ही इससे निकलने की पहल करनी होगी.  वे यह भी साफ कह रहे थे कि इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता एक ही है कि पाकिस्तान बंगबंधु मुजीब को वापस मंच पर लाएउनसे बराबरी में बातचीत करे और उनको पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाए. वे बार-बार पूछते थे : अपने ही संविधान और अपने ही चुनाव को धता बता कर कोई लोकतंत्र यशस्वी कैसे हो सकता है पाकिस्तान संभलेदमन बंद करे व अपना देश संभाले ऐसा कहते हुए वे पाकिस्तान को सावधान भी कर रहे थे कि ऐसा करने का वक्त बीतता जा रहा है. बांग्लादेश की स्वतंत्र भूमिका बनती जा रही है. 

इंदिरा गांधी अब समझ रही थीं कि जयप्रकाश की भूमिका देश-दुनिया में लोक-आकांक्षा बन गई है. उन्हें यह भी पता चला कि गांधी-विचार से प्रभावित कई विदेशी समाजशास्त्री अपने मित्र जयप्रकाश को बांग्लादेश के संदर्भ में उनकी भूमिका समझाने के लिए अपने देश में आमंत्रित कर रहे हैं. इंदिराजी को सलाह दी गई कि भारत सरकार जयप्रकाश को भारत का पक्ष समझाने के लिए अपना दूत बना कर भेजे तो वे एक रचनात्मक भूमिका अदा कर सकते हैं. जयप्रकाश ने अपनी स्थिति स्पष्ट की: मैं भारत सरकार की हर संभव मदद करने को तैयार हूं लेकिन उसका दूत या प्रतिनिधि बनकर नहीं. मेरी भूमिका और सरकार की भूमिका अलग-अलग है फिर भी बांग्लादेश को मान्यता देने की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बनेयह हम दोनों चाहते हैं. मैं अपनी निजी हैसियत से ही जाऊंगा लेकिन सरकार के लिए सुविधाजनक जमीन बनाने का काम करूंगा. इंदिराजी ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया और यह सुविधा भी बना दी कि जयप्रकाश जहां भी जाएंगे वहां का भारतीय दूतावास हर तरह की अनुकूलता बनाने में उनकी मदद करेगा. 

जयप्रकाश का स्वास्थ्य ऐसा नहीं था कि वे ऐसी जटिलकूटनीतिक मुहिम पर निकलते लेकिन अभी मेरे नहींदेश व लोकतंत्र के स्वास्थ्य का सवाल हैकह कर वे अ-सरकारी- सरकारी प्रतिनिधि की दोहरी भूमिका निभाने का करतब करने 1971 के मध्य में निकल पड़े. पहला पड़ाव काहिरा था. फिर वे यासर अराफात से मिले. युगोस्लाविया में मार्शल टीटो और जर्मनी में अपने पुराने मित्र चांसलर विली ब्रांट से मिले. वे पोप से भी मिले. मास्कोहेलसिंकीफ्रांसइंग्लैंड और अमरीका होते हुए वे वापस लौटे. ‘ यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है’, जैसी भूमिका समझाने वालों को उनका यह जवाब अवाक कर गया  था कि लोकतंत्र किसी का भी आंतरिक मामला नहीं होता है. दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र लोक का मामला है और उसका दमन हर किसी की चिंता का विषय होना चाहिए. अमरीका में जब उसके काइयां विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर ने भी आंतरिक मामला’ की ढाल सामने की तो जयप्रकाश ने कहा: मेरे पड़ोसी के घर में लगी आग उसका आंतरिक मामला नहीं हो सकती है क्योंकि उसकी और मेरी छत जुड़ी हुई है. अमरीकी अखबारों ने इसे ही सुर्खी बनाया और यह भी लिखा कि कीसिंजर जयप्रकाश के इस तर्क के सामने निरुत्तर रह गये. उनका कोई 40 दिनों लंबा यह दौरा इस अर्थ में विफल रहा कि वे सरकारों का रवैया नहीं बदल सके लेकिन इस अर्थ में बेहद सफल रहा कि बांग्लादेश को मान्यता देने का नागरिक आंदोलन खूब मजबूत बना. यह दवाब आगे बहुत काम आया. जयप्रकाश ने इस दौरे में तीन बातें पहचानीं : मुस्लिम देश पाकिस्तान की ज्यादतियों की अनदेखी इसलिए करते हैं कि यह मामला इस्लाम का हैपश्चिमी देशों का सफेद चमड़ी का खोखला घमंड’ अब तक गया नहीं है और तीसरा यह कि सारी दुनिया में लोक और तंत्र का आमना-सामना बढ़ता जा रहा है. बाद में इंदिराजी खुद भी 21 दिनों के ऐसे ही मिशन पर निकलीं और जयप्रकाश जैसी ही विफलता के साथ वापस आईं. 

जयप्रकाश देख रहे थे कि उनके अपने भारत में भी तंत्र की जड़ता बनी हुई थी. वह बांग्लादेश की मदद कर तो रहा था लेकिन ऐसी निर्णायक लड़ाई में जैसी खुली मदद जरूरी थीवह मुक्ति वाहिनी को नहीं मिल पा रही थी. जयप्रकाश अपने प्रभाव से हर तरह से मदद जुटाने में लगे थे और सरकार को भी सुझाव दे रहे थे कि वह खुली सैनिक मदद दे. इंदिराजी ने 4 दिसंबर 1971 को जयप्रकाश का दवाब झटकते हुए कहा कि हमें आदेश देना बंद करें लोगऔर दो दिन बाद6 दिसंबर को बांग्लादेश को मान्यता दे दी. सत्ता इसी तरह हमेशा अपना हाथ ऊंचा दिखाने में लगी रहती है. उसके बाद का इतिहास यहां दोहराने का प्रयोजन नहीं है. सोवियत संघ को साथ ले कर इंदिराजी ने कूटनीतिक बारीकियों के मोर्चे पर भी और युद्ध में भी पाकिस्तान को पराजित किया. यह प्रकारांतर से अमरीका की कूटनीतिक पराजय भी थी. इंदिराजी का यश आसमान पर था. जयप्रकाश ने भी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की. लेकिन यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि पाकिस्तान के फौजी शासन की भोंडी कूटनीति और पश्चिम की खोखली हेंकड़ी के कारण अंटक-अंटक कर चलने वाली इंदिरा गांधी को सफलता मिल तो गई लेकिन यह बाजी उल्टी भी पड़ सकती थी और बांग्लादेश का जन उभार कुचला जा सकता था. जयप्रकाश ने देश-विदेश में जैसी हवा बनाईउससे इस विफलता से बचने में बहुत मदद मिली. 

शेख मुजीब ने जयप्रकाश की इस भूमिका को पहचाना और जब वे अपनी अज्ञात कैद से निकल करढाका जाने के लिए लंदन पहुंचे तो विश्व को अपने पहले संबोधन में उन्होंने जयप्रकाश का अलग से जिक्र किया. इंदिराजी ने इसे पसंद नहीं किया. अपने तरीकों से उन्होंने जयप्रकाश से दूरी बनाए रखने की हिदायत भी शेख मुजीब तक पहुंचा दी. ढाका जाने के लिए लंदन से मुजीब दिल्ली पहुंचे तो भी उन्होंने जयप्रकाश को याद किया. ढाका की अपनी विजय-सभा में मुजीब चाहते थे कि जयप्रकाश भी मौजूद रहें लेकिन दिल्ली ने इसे भी हतोत्साहित किया. संघर्ष के दिनों में अवामी लीग के जिन शीर्ष नेताओं से लगातार विार-विमर्श चलता थावे अब जयप्रकाश के पास आने से हिचकने लगे. आगे का इतिहास बताता है कि बांग्लादेश बनने के साथ ही इंदिराजी का भी और बंगबंधु का काम भी पूरा हो गया. लेकिन बांग्लादेश बन जाने और शेख साहब के प्रधानमंत्री बन जाने से जयप्रकाश का काम पूरा नहीं हुआ. 

इतिहास के पन्नों में जयप्रकाश का वह पत्र दबा मिलता है हमें जो पटना से लिखा गया है और जिस पर 31 जनवरी 1972 की तारीख पड़ी है. यह पत्र बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान को लिखा गया है. पत्र भावुकता से शुरू होता है और फिर शेख मुजीब को उनकी गहरी भूमिका समझाता है. शुरू में जयप्रकाश लिखते हैं : “ अपनी इस उम्र और स्वास्थ्य के कारण मुझ जैसे आदमी के मन में अब इसके अलावा कोई लालसा बची नहीं है कि बगैर किसी लोभ-लालच-आकांक्षा केशांत व खुश मन से अपने सिरजनहार से मिल सकूं. लेकिन जिस दिन आप लंदन से दिल्ली आएउस दिन के ऐतिहासिक अवसर पर वहां हाजिर रहने की जबरदस्त इच्छा ने मुझे विवश-सा कर दिया था. आपके दर्शन करनेआपको फूलों की माला पहनाने और पल भर के लिए आपको अपनी पूरी ताकत से गले लगा लेने के लिए मेरा मन मचल उठा था…” फिर पत्र का भाव बदलता है : “ ईश्वर आपको लंबी उम्र व बढ़िया तंदुरुस्ती दे ताकि आप न केवल अपने व अपने साढ़े सात करोड़ बंधुओं के सपनों का सोनार बांग्ला साकार कर सकें बल्कि इस अभागे उपमहाद्वीप को स्वतंत्रस्वायत्त राष्ट्रों का सुसभ्यसुबुद्धसहयोगी और समृद्ध समुदाय बनाने के ऐतिहासिक कार्य में मददगार हो सकें… विनोबाजीजवाहरलालजीराममनोहर लोहिया और मेरे सहित इस देश के कई लोगों का सपना रहा है कि केवल भारतीय उपमहाद्वीप का नहीं बल्कि समूचे दक्षिण एशिया का भविष्य इसमें ही निहित है कि इस क्षेत्र के सभी देश किसी-न-किसी प्रकार के संघ अथवा भाईचारे से बंधे-जुड़े रहें… ऐसा लगता है मानो नियति ने राजनीतिकआर्थिक और अन्य हितों का एक भाईचारा खड़ा करने के लिए इस क्षेत्र की रचना की है !… इस सपने में आपको साझीदार बनाने का कारण यह है कि मेरे विचार में इस सपने को साकार करने के लिए आवश्यक नैतिक और राजनीतिक व्यक्तित्व आपके पास है… इसके अलावा 51 साल की आपकी उम्र आपको इस ऐतिहासिकचुनौती भरे काम को अंजाम तक पहुंचाने का भरपूर समय भी देती है… आपने लंदन में खुद को गांधी परंपरा का व्यक्ति बताया था … तो मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि आजकल चलते-फिरते जिस समाजवाद की बात करना फैशन हो गया है उससे गांधीजी का समाजवाद भिन्न था. वे उसे सर्वोदय कहना पसंद करते थे और उनका समाजवाद या सर्वोदय अंत्योदय’ से शुरू होता था… बांग्लादेश की परिस्थितियों के कारण राज्य की सर्वोच्च सत्ता अपने हाथ में लेना आपके लिए अनिवार्य बन गया था लेकिन गांधीजी की रीति इससे भिन्न थी… इसके बावजूद मैं यह उम्मीद रखता हूं कि जिस तरह अपने लड़खड़ाते स्वास्थ्य और प्रशासन पर अपनी पकड़ ढीली होते जाने के बावजूद जवाहरलालजी सत्ता में बने ही रहेआप वैसा नहीं करेंगे…” वे मुजीब साहब को सावधान करते हैं कि वे भारत की गलतियां न दोहराएं और नौकरशाही को समाजवाद का आधार न बनाएं… “ मैं अपनी तरफ से यह उत्कट आशा रखता हूं कि आपके नेतृत्व में बांग्लादेश को समाजवाद की अपनी खामियों और भूलों को समझने में हमारी तरह चौथाई सदी के बराबर समय नहीं लगेगा… आपको इस तरह लिखने का मुझे कोई अधिकार नहीं है. मेरे समान एक साधारण नागरिक एक महान राष्ट्र के आपके जैसे निर्विवाद महान नेता को सलाह देने की धृष्टता भला कैसे करे ! लेकिन गांधीजनों के एक अदना प्रतिनिधि के रूप में आपके और आपकी बहादुर व धैर्यवान जनता के प्रति  अपनी स्नेह-भावना के वशीभूत होकर मैंने यह सब आपको लिखा है.

जयप्रकाश यह लिख सकेबंगबंधु कोई जवाब नहीं दे सके. इतिहास ने शेख साहब के कंधों पर संभावनाओं की जो गठरी डाल दी थीवे उससे कहीं छोटे साबित हुए. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में जो कुछ हुआ उसे दूसरों से एकदम भिन्न धरातल पर जयप्रकाश ने पहचाना था और उसे साकार करने में अपना पूरा बल लगा दिया था. लेकिन मुजीब न वह दिशा समझ सके और न वैसी हैसियत ही बना सके.  सत्ता की सबसे बड़ी गद्दी पर पहुंच कर वे खो गये. वे न दूरदर्शी राजनेता साबित हुएन कुशल प्रशासक. सत्ता की ताकत से देश को मुट्ठी में रखने की कोशिश में वे सारे अधिकार अपने हाथों में समेटते गये और अंतत: 1975 में खुद को प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति बना लिया और एक तानाशाह की भूमिका में आ गये.  लेकिन उनका अंत बहुत करीब था. 15 जनवरी 1975 को फौजी व राजनीतिक बगावत में वे सपरिवार मार डाले गये. तब जयप्रकाश अपने देश की दिशा मोड़ने के अपने अंतिम अभियान के संचालन के अपराध’ में चंडीगढ़ के अस्पताल में नजरबंद थे. वे नजरबंद तो थे लेकिन उनकी नजर बंद नहीं थी. देश-दुनिया की हलचलों के प्रति वे सावधान थे. चंडीगढ़ की नजरबंदी के दरम्यान वे डायरी लिखते थे. अपनी उस जेल डायरी में16 अगस्त 1975 को वे लिखते हैं : “ बांग्लादेश से अत्यंत पीड़ादायक खबर है- अविश्वसनीय की हद तक ! लेकिन जिस तरह मुजीब ने अपनी निजी व दलीय तानाशाही वहां स्थापित कर रखी थीयह उसका ही नतीजा है. दिल्ली में उन दिनों यह अफवाह गाढ़ी हो चली थी कि मुजीब ने जो किया है उसकी योजनाउनके भरोसे के लोगों के साथ मिल कर दिल्ली में ही बनाई गई थी. उस वक्त अपने एकाधिकार का अौचित्य बताने के लिए मुजीब ने भी वैसे ही कारण दिए थे जैसे अब श्रीमती गांधी दे रही हैं. तब यह बात भी हवा में थी कि यदि श्रीमती गांधी की चली तो वे भी बांग्लादेश के रास्ते ही जाएंगी.” अगले दिन की डायरी में वे फिर बांग्लादेश का सवाल उठाते हैं और मुजीब व बांग्लादेश के प्रति अपनी पुरानी भावनाओं का जिक्र करते हुए लिखते हैं: “ लेकिन जब उन्होंने रंग बदला और एकदलीय शासन की स्थापना कर लीउनके प्रति मेरे कोमल भाव हवा हो गये. मैं उनकी दिक्कतें समझ रहा था. लेकिन यदि उनमें योग्यता होती तो अपनी जनता पर उनका जैसा गहरा असर और अधिकार थाबहुत कुछ जवाहरलाल जैसाउसके सहारे वे लोकतंत्र को दफनाए बिना भी परिस्थिति पर काबू कर सकते थे. लेकिन उन्होंने मूर्खता की और विफल हुए. कल जब मैंने उनकी हत्या की खबर पढ़ी तो मैं उदास जरूर हुआ लेकिन मुझे कोई धक्का नहीं लगान मेरे दिल में उनके लिए कोई गहरा संताप ही जागा.” 22 अगस्त 1975 की डायरी फिर बांग्लादेश का जिक्र करती है : “ बांग्लादेश की खबरें अधिकाधिक भयावह होती जा रही हैं. बगावत के दिन मुजीब के साथ-साथ उनकी पत्नीउनके तीन बेटोंदो बहुओंदो भतीजों जैसे मुजीब के निकटस्थ 18 रिश्तेदारों की हत्या हुई. ऐसी क्रूरता को समझ पाना भी कठिन है… मुजीब को मार कर सारी सत्ता हथिया लेने के बाद अब खोंडकर मुश्ताक अहमद लोकतंत्र की बात कर रहे हैं. मैं यह खेल समझता हूं. सारे तानाशाह ऐसी ही बातें करते हैं. हमारे पास भी तो अपनी श्रीमती गांधी हैं ! लेकिन मुजीब के सारे परिवार को क्यों नष्ट कर दिया ?… जो भी होहाल-फिल्हाल के इतिहास का यह सबसे काला कारनामा है.”        

अब न जयप्रकाश हैंन शेख मुजीबन इंदिराजी. वह बांग्लादेश भी नहीं है जिसे जयप्रकाश ने एक संभावना के रूप में देखा था. आज तमाम देशों की भीड़ में बांग्लादेश भी शरीक है और तमाम भेंड़ियाधसान शासकों की भीड़ में उसकी भी अपनी जगह है. लेकिन आज बांग्लादेश किसी संभावना का नाम नहीं है. वह संभावना क्या थीकैसे बनी और क्यों खो गईयह जानना जरूरी इसलिए हो जाता है कि इतिहास इसी तरह वर्तमान को रचता है. यह लेख इसलिए ही लिखा गया. इसलिए नहीं कि जयप्रकाश की भूमिका का गुणगान किया जाएन इसलिए कि यह खतरा है कि हम जयप्रकाश को भूल जाएं. खतरा यह है कि हम अपना इतिहास ही न भूल जाएं ! बांग्लादेश को भी और हमें भी अपना इतिहास बार-बार पढ़ने की और उसे साफ-साफ समझने की जरूरत है. जो अपना इतिहास भूल जाते हैं वे वर्तमान को न समझ पाते हैंन बना पाते हैं. हम सब इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं. ( 01.04.2021)

यही सच्चा धर्म है

 अनचाही और अमंगलकारी खबरों की भीड़ में कहीं यह शुभ खबर गुम ही न हो जाए, इसलिए इसे लिख रहा हूं और वसीम रिजवी साहब का धन्यवाद कर रहा हूं कि इस अंधे दौर में वे अंधकार की चापलूसी नहीं कर रहे, आंखें खोलने की वकालत कर रहे हैं. 

वसीम रिजवी उत्तरप्रदेश के शिया सेंट्रल वफ्फ बोर्ड के कभी अध्यक्ष रहे हैं. आतंकवादी संगठनों और आतंकी काररवाइयों की लानत-मलानत करने में उनकी आवाज सबसे पहले व सबसे साफ सुनाई देती रही है. वे हवा के साथ बहने और झुनझुना बजाने वालों में नहीं रहे हैं. रिजवी साहब ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है और अदालत से निवेदन किया है कि कुरान से उन 26 आयतों को निकाल दिया जाए जो रिजवी साहब के मुताबिक ‘ आतंकवाद और जेहाद’  को बढ़ावा देते हैं. रिजवी साहब का दावा है कि ये 26 आयतें मूल कुरान का हिस्सा नहीं हैं बल्कि मुहम्मद साहब के बाद आए उन तीन खलिफाओं ने इसे समय-समय पर कुरान में जोड़ा है जो इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने में लगे थे. बात इतनी सीधी और मामूली है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया गैर-मामूलीजहरीली व राजनीतिक चालबाजियों से भरी है. 

देश का कोई भी सांप्रदायिक तबका-संगठन-व्यक्ति नहीं बचा है कि जो रिजवी साहब को धमकाने-डराने व झुकाने में नहीं आ जुटा है. और आप हैरान न हों कि इसमें सबसे आगे भारतीय जनता पार्टी के मुस्लिम चेहरे हैं. कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी की आइटी सेल के प्रभारी मंजूर अहमद भट्ट ने रिजवी साहब के खिलाफ न केवल प्रदर्शन आयोजित किया बल्कि श्रीनगर के पुलिस प्रमुख से आग्रह किया है कि घृणा फैलाने के जुर्म में रिजवी साहब पर एफआइआर दर्ज करें. उन्होंने कहा है कि भाजपा किसी को भीकिसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की इजाजत नहीं देगी. इस विद्रूप को हम पचा पाते कि भारतीय जनता पार्टी के कश्मीर के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने बात को राष्ट्रीय नहींअंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचा दिया. उन्होंने कहा कि इससे सारी दुनिया के मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं पर आघात हुआ है. उन्होंने ताबड़तोड़ रिजवी साहब की गिरफ्तारी की मांग की है. लखनऊ मुस्लिम धर्म के सारे दावेदार नेताओं का अखाड़ा बन गया है. लखनऊ के ही किसी सज्जन ने रिजवी साहब का सर काट लाने वाले को 20 हजार रुपयों का इनाम देने की घोषणा की है और यह भी कहा है कि वे यह रकम सड़क पर चंदा मांग कर जुटाएंगे. रिजवी साहब के लिए सजा की मांग करने वाले मुस्लिम संगठनों की सूची इतनी लंबी है कि पढ़ते हुए आप लंबे हो जाएं. एक सुर से कहा जा रहा है कि रिजवी हिंसा भड़का रहे हैं. 

धमकियोंअपशब्दों और हिंसक इरादों की चादर अोढ़े इतने लोग हैं और उनके इतने बयान हैं लेकिन रिजवी साहब मौन हैं. हिंसा भड़काना तो दूरवे कोई जवाब ही नहीं दे रहे हैं. लगता है कि उन्हें जो कहना था और उनकी जो चिंता थी वह अदालत के सामने रख कर वे मुतमइन हो कर इंतजार में हैं कि कब अदालत हाथ उठाती है और मुंह खोलती है. किसी नागरिक की यही सबसे लोकतांत्रिक और जिम्मेवारी भरी भूमिका हो सकती है. 

रिजवी साहब जो कह रहे हैं वह सही हो सकता हैआधा सही हो सकता है याकि पूरा ही बेबुनियाद हो सकता है. यही तो वे कह रहे हैं कि अदालत में इसकी छानबीन हो. इसमें कहां हिंसा आती हैकहां किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करना आता है क्या किसी का ऐसा कहना है कि अदालत में जाना हिंसा है या अधार्मिक कृत्य है 

केवल कुरान का नहींदुनिया की हर धार्मिक किताब का सच यह है कि उसका सच कहीं खो गया है. बहुत सारी धूल उस पर आ पड़ी है. ये किताबें जब लिखी गई थीं तब भी इंसान ने लिखी थीं. सदियों से उनका पालन भी इंसान ही करते आ रहे हैं. इंसान कमियों-गलतियों का आधा-अधूरा पुतला है तो उसकी छाया भी इन महान किताबों पर पड़ती रहती है. छाया देखती कहां है कि वह कितनी महान रोशनी को धुंधला बना रही है कि फैलने से रोक रही है. छाया छाया का धर्म निभाती हैऔर धर्म को आच्छादित कर लेती है. गीता में भगवान भी कहते तो हैं ही न कि जब-जब धर्म की हानि होती हैमैं उसके संरक्षण के लिए जन्म लेता हूं. मतलब धर्म की हानि हो सकती हैधर्म की हानि होती है और यह धर्म के अनुयायियों द्वारा ही होती है. धर्म धूल-धूसरित हो जाता है तो कोई अवतार उसकी धूल साफ करने आता है. हमने लोकतंत्र का धर्म कबूल किया है तो उसकी व्यवस्था में संविधान ने अदालत को धूल साफ करने का अधिकार भी दिया है और जिम्मेवारी भी दी है. रिजवी साहब उसकी शरण में गए हैं तो यह लोकतांत्रिक भी हैसंविधानसम्मत भी और स्वस्थ भी. विरोध की सारी आवाजें अलोकतांत्रिक हैंसंविधान का माखौल उड़ाती हैं और राष्ट्र के माहौल को अस्वस्थ करती हैं. 

धर्म के धूल-धूसरित होने की घुटन महात्मा गांधी को भी हुई थी. उन्होंने हिंदू धर्म के दूषण पर जितने प्रहार किए हैंउनकी बराबरी कौन कर सकता हैऔर फिर भी उनका दावा था कि वे सनातनी हिंदू हैं. हिंदू धर्म की तरफ से मारी गई तीन गोलियों से भूलुंठित होने तक वे उस हिंदू धर्म को सीने से लगाए फिरते थे जो मूल थादूषणरहित था. तभी तो वे यह अप्रतिम वाक्य कह सके कि मैं एक सच्चा हिंदू हूंइसलिए मैं एक सच्चा मुसलमान,पारसीईसाई आदि भी हूं. मतलब यह कि तुम एक के प्रति सच्चे हो जाअोगे तो सबसे प्रति सच्चे हो जाओगे. उन पर हमले कम नहीं हुएऔर किन-किन ने हमले किए जानेंगे हम तो अवाक रह जाएंगे. जब उन्हें यह चुनौती दी गई कि वे जो कह व कर रहे हैंवेदों में उसका समर्थन है ही नहींतो वे वज्र-सी यह बात बोले कि जितना वेद मैंने पढ़ा व गुना हैउससे आधार पर मेरा यह दावा है कि मैं जो कह व कर रहा हूं वह सब धर्मसम्मत है. लेकिन कोई यदि मुझे दिखा व समझा दे कि वेद इसका समर्थन नहीं करते हैं तो मैं वैसे वेद को मानने से इंकार कर दूंगा. मतलब वे दृढ़ थे कि मूल वेदों में बहुत कुछ अवांतर कारणों से जुड़ गया है जिसे साफ करने की जरूरत है. सफाई प्रकृति का नियम ही तो है.

विनोबा धर्मज्ञ थे. उन्होंने कई कदम आगे जा कर सारे प्रमुख धर्मों का गहन अध्ययन किया और फिर उन सबका सार निकाल कर समाज के सामने रखा. सार यानी धूलरहित धर्म ! यह वेद रचयिता ऋषियों की बराबरी जैसा उनका कृत्य हैहमारी अनमोल धरोहर है. इस रोशनी में भी हमें रिजवी साहब की बात को देखना चाहिए. धर्मांधता तथा उन्माद से हमें रास्ता नहीं मिलेगा. रास्ते खोजना ही सच्चा धर्म है. 

यह कितने हैरानी की बात है कि इस मामले को उन्माद में बदलने में जो लगे हैंउनके राजनीतिक आका इस बारे में चुप्पी साधे हुए हैं. 6 राज्यों के चुनावों ने सबकी जीभ काट रखी है. यह गूंगापन भी धर्म को राजनीतिक की चाल से मात देने की चालाकी भर है. ( 15.03.2021)   

Tuesday, 9 March 2021

मैं जहां भी जाऊंगा, उसको पता हो जाएगा

  

शीर्षक की पंक्ति जनाब बशीर बद्र के एक शेर से ली गई है.  ऐसा कम होता है कि शेर किसी दूसरे के लिएकिसी दूसरे अंदाज में लिखा जाए और वह एकदम से कहीं और चस्पां हो जाएलेकिन ऐसा होता भी हैऔर अभी-अभी हुआ भी है. बात अमरीका से आई है. यह ठीक है कि अब वहां हमारे ट्रंप भाई’ नहीं हैं और ह्यूस्टन में ट्रंप भाई के साथ मिल कर हाउडी मोदी’ की जो गूंज प्रधानमंत्री ने उठाई गई थीवह दम तोड़ चुकी है.

 

 ट्रंप भाई’ ने जाते-जाते हमें गंदा व झूठा देश’ कह कर मुंह का स्वाद भले खराब कर दिया है लेकिन बाइडन का अमरीका तो है न जिसके साथ मिल कर काम करने का अरमान प्रधानमंत्री ने अभी-अभी जाहिर किया है. तो मुद्दा यह कि अमरीका से बात आती है तो हमारे यहां ज्यादा सुनी जाती हैतो बात अमरीकी संस्थान फ्रीडम हाउस’ से आई है. वह कहती है कि जहां तक लोकतंत्रउससे जुड़ी स्वतंत्रताओंनागरिक अधिकारों व तटस्थ न्यायपालिका का सवाल है हमारा भारत 2019 में स्वतंत्र देश’ की श्रेणी में था2020 में खिसक कर किसी हद तक स्वतंत्र देश’ की श्रेणी में आ गया है. यह क्या हुआ 2019 से चल कर  2020 में हम यह कहां पहुंचे कि अपनी सूरत ही गवां बैठे अगर कोई ऐसा कहने की जुर्रत करे कि अमरीका की क्या सुननातो उसे लेने-के-देने पड़ जाएंगे क्योंकि आज कौन यह कहने की हिम्मत कौन करेगा कि ट्रंप भाई’ का अमरीका हमारा’ था और बाइडन का अमरीका उनका’ है इसलिए हमें देखना यह चाहिए कि 2019-20 के बीच हमने क्या-क्या कारनामे किए कि इस तरह गिरे.  


 मैं जहां भी जाऊंगाउसको पता हो जाएगा’ कि लोकतंत्र की अपनी ही व्याख्या को लोकतंत्र मानने वालों का दौर आ गया है. इस दौर में हमने देश की सारी संवैधानिक संस्थाओं को बधिया कर दिया है और ऐसे लोगों को उनमें ला बिठाया जिनकी रीढ़ है ही नहीं. ऐसे अर्ध-विकसितविकलांगों की कमी समाज में कभी नहीं रही. ऐसे लोगों की भीड़ जुटा कर आप सत्ता में रहने का सुख पा सकते हैंलोकतंत्र नहीं पा सकते हैं. लोकतंत्र का संरक्षण व  विकास ऐसों के बस का होता ही नहीं है. लोकतंत्र होगा तो रीढ़ सीधी और सर स्वाभिमान से तना होगा. 


इसी दौर में हमने यह मिजाज भी दिखलाया कि जिस जनता ने हमें चुना’ हैउसे अब हम चुनेंगे’. नागरिकता का कानून ऐसी ही अहमन्यता से सामने लाया गया था और हेंकड़ी दिखाते हुए उसे लागू करने की घोषणा कर दी गई थी. इसका जिसने जहां विरोध किया उसे वहीं कुचल डालने की असंवैधानिक-अमानवीय कोशिशें हुईं. स्वतंत्र भारत में कभी युवाओं की ऐसी व्यापक धुनाई-पिटाईबदनामी और गिरफ्तारी नहीं हुई थी जैसी नागरिकता आंदोलन के दौरान हुई. बाजाप्ता कहा गया कि जो हमसे सहमत नहीं है उसका ईमान मुसल्लम नहीं है और जिसका ईमान मुसल्लम नहीं है वह देशद्रोही है. लोकतंत्र खत्म होता है तो देशद्रोहियों की जरखेज फसल होती है. 


यही दौर था जब लोकतंत्र को पुलिसिया राज में बदला गयागुंडों को राजनीतिक लिबास पहनाया गयामीडिया को पीलिया हो गया और न्यायपालिका को मोतियाबिंद. और तभी देश में कोविड का प्रकोप फूटा. इस संकट को आनन-फानन में ऐसे अवसर में बदल लिया गया जिसमें आपका कहा ही कानून बन गया. जैसे भय आदमी को आदमी नहीं रहने देता है वैसे ही भयभीत लोक और अहंकारी तंत्र लोकतंत्र को लोकतंत्र नहीं रहने देता है. ऐसा माहौल रचा गया कि एक धर्मविशेष के लोग योजनापूर्वक कोविड फैलाने का ठेका ले कर  भारत में घुस आए हैं. भारत की सड़कों पर जिस तरह कभी जानवर नहीं चले होंगेउस तरह लाखों-लाख श्रमिकों को चलने के लिए मजबूर छोड़ दिया गया. उनके सामने दो मौतों में से एक को चुनने का विकल्प छोड़ा गया था : कोविड से मरो या भूख से ! इसी अंधेरे काल में श्रम कानूनों मेंबैंकिंग व्यवस्था मेंफौजी संरचना मेंपुलिस के अधिकारों मेंविपक्षी राज्यों मेंविश्वविद्यालयों के प्रशासनिक व पाठ्यक्रम के ढांचे मेंकश्मीर की वैधानिक स्थिति में तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की भूमिका ऐसे परिवर्तित की गई कि लोकतंत्र घुटनों के बल आ गया.


 चुनाव व चुनाव परिणाम सत्ता व पैसों की ताकत से बनाए व बिगाड़े जाने लगे. व्यक्तित्वहीन व संदर्भहीन लोगों को राज्यपाल बनाने से ले कर ज्ञान-विज्ञान व शोध के शीर्ष संस्थानों में ला बिठाया गया. अंतरधार्मिक व अंतरजातीय विवाहों को अपराध बना देने वाले लव जेहाद’ जैसे सिरफिरे कानून पारित किए गये. भीड़ को तत्काल न्याय देने का काम सौंपा गया और यह सावधानी रखी गई कि भीड़ एक धर्म या जाति विशेष की हो जो दूसरे धर्म व जाति विशेष को सजा देती फिरे. यह सब है जो भारत को स्वतंत्र देश’ की श्रेणी से किसी हद तक स्वतंत्र’ देश की श्रेणी में उतार लाया है. यह हर भारतीय के लिए अपमान व लज्जा की बात है. इसका मतलब यह है कि लोकतंत्र का आभास देने वाली संरचनाएं भले बनी रहेंगी लेकिन सब आत्माहीन और खोखली होंगी. आखिर चीन भी तो अपनी तरह के लोकतंत्र का दावा करता ही है न लेकिन फ्रीडम हाउस’ चीन को स्वतंत्र राष्ट्र नहीं’ की श्रेणी में रखता है. इसी रिपोर्ट में फ्रीडम हाउस’ यह भी लिखता है कि अमरीका स्वतंत्र राष्ट्र’ की श्रेणी में2010 में 94 अंकों के साथ था लेकिन ट्रंप भाई के कार्यकाल में यहां से गिर कर यह 83 अंकों पर पहुंचा है. फ्रीडम हाउस’ बता रहा है कि सारी दुनिया का लोकतांत्रिक स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है. स्वीडनफिनलैंड और नॉर्वे ही हैं जो पूरे 100 अंक के साथ ‘ स्वतंत्र राष्ट्र’ बने हुए हैं.

              

यह फ्रीडम हाउस’ है क्या फाशीवाद व तानाशाही का लंबा दौर झेलने और दूसरे विश्वयुद्ध की लपटों में घिरी दुनिया को सावधान करने के लिए 31 अक्तूबर 1941को वाशिंग्टन में इसकी स्थापना हुई. इसने दुनिया भर में लोकतंत्र के विकास व विनाश का विधिवत अध्ययन करने और उस आधार देशों को अंक देने की शुरुआत की. आज कोई 80  साल बाद 150 से ज्यादा लोग इस संस्थान में काम करते हैं. दुनिया के कई देशों में इसकी शाखाएं हैं. फ्रीडम इन द वर्ल्ड’ नाम से इसकी एक पत्रिका भी निकलती है जो तानाशाहों और तानाशाही की उभरती प्रवृत्तियों को पहचाने व उसे उजागर करने का ही काम नहीं करती है बल्कि इनका घोर विरोध भी करती है. यह मानती है कि जहां भी सरकारें अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होती हैंलोकतंत्र वहीं पल्लवित व पुष्पित होता है. मतलब लोकतंत्र चुनावोंसंसदों और सांसदों-विधायकों की फौज में न छुपा हुआ हैन सुरक्षित है. आप जहां लोकतांत्रिक प्रतिमानों से गिरे फ्रीडम हाउस’ आपको पहचान लेता है और सारी दुनिया को बता देता है. इसलिए बशीर बद्र साहब का पूरा शेर कहता है : सब उसी के हैंहवाखुश्बू जमीं-ओ-आसमां / मैं जहां भी जाऊंगाउसको पता हो जाएगा. दुनिया को पता हो गया है कि भारत में लोकतंत्र का आसमान सिकुड़ भी रहा है और धुंधला भी रहा है. देखना है कि हमें इसका पता कब चलता है. ( 05.03.2021)           

Monday, 1 March 2021

लोकतंत्र की ‘दिशा’

एक अच्छागहरा व तटस्थ राजनीतिक विश्लेषक या फिर आजाद कलम रखने वाला कोई बे-गोदी पत्रकार चाह कर भी आज की परिस्थिति और उससे उभरते खतरों के बारे में वैसा सधागहन विश्लेषण नहीं लिख पाता जैसा दिल्ली के अतिरिक्त सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने अपने 14 पृष्ठों के आदेश में लिखा है. इसे राजनीतिक विश्लेषकों व पत्रकारों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए. बंगलुरू की 22 साल की लड़की दिशा रवि को जमानत देते हुए राणा साहब ने जो कुछ और जिस तरह लिखा है वह हाल के वर्षों में अदालत की तरफ से सामने आया सबसे शानदार संवैधानिक दस्तावेज है. हमारे सर्वोच्च न्यायालय के तथाकथित न्यायमूर्ति यदि इससे कुछ सीख सकें तो अपने मूर्तिवत् अस्तित्व से छुटकारा पा सकते हैं. 


   कहा जाता है कि जमानत का आदेश अत्यंत संक्षिप्त होना चाहिए क्योंकि मुकदमा तो जमानत के बाद खुलता ही है और वादी-प्रतिवादी-जज तीनों को अपनी बात सविस्तार कहने का मौका मिलता है. लेकिन सारे देश में जैसी जड़ता बनी हुई है उसमें यह किताबी बात बन जाती है. हमारे संविधान की विशेषता ही यह है कि यदि इसका आत्मत: पालन और पूर्ण सम्मान किया जा रहा हो तो इसके किसी भी खंभे को ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ती है. लोकतंत्र जब राष्ट्र-जीवन की रगों में बहता होता है तो वह अपनी तरह से रोज ही संविधान की व्याख्या करता चलता है. लेकिन जब लोकतंत्र जुमला बना दिया जाता है और उसके सारे खंभे अपने गंदे कपड़ों को टांगने की खूंटी में बदल दिए जाते हैं तब जरूरत पड़ती ही है कि कोई एस. मुरलीधरन या कोई धर्मेंद्र राणा बोलें और पूरी बात बोलें. गूंगे न्यायमूर्ति संविधान को भी श्रीहीन कर देते हैं. 


   दिशा के जगजाहिर मामले के विस्तार में जाने की यहां जरूरत नहीं हैइतना कहने की जरूरत है कि उसकी गिरफ्तारी न केवल असंवैधानिक थी बल्कि सत्ता के इशारे पर दिल्ली पुलिस द्वारा की गई एक आतंकवादी काररवाई थी. धर्मेंद्र राणा ने अपने फैसले में कहा कि उनके सामने एक भी ऐसी पुख्ता दलील या सबूत नहीं ला सकी दिल्ली पुलिस जिससे कहीं दूर से भी यह नतीजा निकाला जा सके कि दिशा या उसका टूलकिट’ हिंसा उकसाने वाला था या 26 जनवरी 2021 को दिल्ली में हुई हिंसा का प्रेरक था. ऐसा कहते हुए राणा साहब जाने-अनजाने दिल्ली पुलिस और उसके आका गृहमंत्री को एक साथ ही अयोग्यता का प्रमाणपत्र दे रहे थे. दिशा की गिरफ्तारी का अौचित्य दिल्ली पुलिस प्रमुख व गृहमंत्री ने टीवी पर आ कर जिस तरह बताया था उसके बाद जरूरी था कि कोई चिल्ला कर व अंगुली दिखाकर वह सब कहे कि जो राणा साहब ने कहा है. जब भी और जहां भी संविधान बोलता हैनकली चेहरे ऐसे ही बेपर्दा हो जाते हैं. 


   दिशा की गिरफ्तारी बेबुनियाद व असंवैधानिक थीयह कह कर राणा साहब ने उसे जमानत दे दी. यह तो जरूरी बड़ी बात हुई ही लेकिन इससे अहम हैं उनकी कुछ स्थापनाएं जिसमें वे कहते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में जनता अपनी सरकार की अंतरात्मा की प्रहरी होती है,” और आप किसी को भी “ सिर्फ इसलिए उठा कर सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा दे सकते हैं कि वह राज्य की नीतियों से सहमत नहीं है.” वे यह भी कहते हैं कि “ किसी सरकारी मुखौटे की सजावट पर खम पड़ने से आप किसी पर धारा 124ए के तहत देशद्रोह का अपराध नहीं मढ़ दे सकते हैं.” वे यह भी रेखांकित करते हैं कि “ किसी संदिग्ध व्यक्ति से संपर्क मात्र को आप अपराध करार नहीं दे सकते. देखना तो यह चाहिए कि क्या उसकी किसी गर्हित गतिविधि में आरोपी की संलग्नता है मैं काफी छानबीन के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि आरोपी पर ऐसा कोई अभियोग  लगाया नहीं जा सकता है. ” फिर उन्होंने वह संदर्भ लिया जिसमें दिल्ली पुलिस व गृहमंत्री दोनों ने कहा था कि दिशा ने ‘ टूलकिट’ बना कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न केवल संसार में भारत की छवि बिगाड़ी है बल्कि देश के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र भी खड़ा किया. सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए राणा साहब ने कहा कि संविधान की धारा 19 असहमति के अधिकार को पुरजोर तरीके से स्थापित करती है और “ बोलने और अभिव्यक्त करने की आजादी में दुनिया भर से उसके लिए समर्थन मांगने की आजादी भी शामिल है.” ऋगवेद को उद्धृत करते हुए राणा साहब ने कहा कि हमारी 5 हजार साल पुरानी सभ्यता का ऋषि गाता है कि हमारे पास हर तरफ से कल्याणकारी विचार आने चाहिए. हर तरफ कहने से ऋषि का मतलब है संसार के कोने-कोने से. अगर तब यह आदर्श था तो आज इसे अपराध कैसे मान सकते हैं हम 


   राणा साहब 5 हजार साल पीछे न जाते तो उन्हें ज्यादा नहींकोई 70 साल पहले का अपना आधुनिक ऋषि महात्मा गांधी भी मिल जाता जिसने कहा था: मैं चाहता हूं कि मेरे कमरे के सारे दरवाजे-खिड़कियां खुली रहें ताकि उनसे दुनिया भर की हवाएं मेरे कमरे में आती-जाती रहें लेकिन मेरे पांव मजबूती से मेरी धरती में गड़े हों ताकि कोई मुझे उखाड़ न ले जा सके. लेकिन सवाल तो उनका है जिनका अस्तित्व इसी पर टिका है कि उन्होंने अपने मन-प्राणों की हर खिड़कियां बंद कर रखी हैं ताकि कोई नई रोशनी भीतर उतर न जाए. ये अंधकारजीवी प्राणी हैं. राणा साहब ने इस अंधेरे मन पर भी चोट की है. 


   सवाल एकदम बुनियादी है. लोकतंत्र में मतभिन्नता तो रहेगी ही. वही उसकी प्राणवायु है. लेकिन भिन्न मत लोकतंत्र में कभी भी अपराध नहीं माना जाएगायह उसका अनुशासन है. संविधान इसी की घोषणा करता है और इसके लिए न्यायपालिका नाम का एक तंत्र बनाता है जिसके होने का एकमात्र अौचित्य यह है कि वह संविधान के लिए ही जिएगा और संविधान के लिए ही मरेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं सकाहो नहीं रहा है. संविधान के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता वाली न्यायपालिका हम बना नहीं सके हैं क्योंकि ऐसी न्यायपालिका के लिए प्रतिबद्ध समाज नहीं बना है. यह सबसे अंधेरी घड़ी है तो इसलिए कि यहां हर आदमी अपने लिए तो लोकतंत्र चाहता हैदूसरे के किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान नहीं करता है. ऐसे नागरिकों को ऐसी ही न्यायपालिका मिल सकती है कि जो संविधान की किताब को बंद करकिसी सरकारी निर्देश या संकेत पर सुनती-बोलती और फैसले करती है. 


   दशा रवि मामले को ले कर राणा साहब ने एक बार फिर वह लकीर खींच दी है जो लोक को तंत्र का निशाना बनने से रोकती है. किसी भी लोकतांत्रिक समाज की यही दिशा हो सकती है कि वह लोकतंत्र की नई दिशाएं खोले. ( 26.02.2021)