अपनी रोज की चिर-परिचित दुनिया अपनी ही आंखों से बदली हुई, बदलती हुई दिखाई दे रही है. कल तक जो निजी शक्ति के घमंड में मगरूर थे अाज शक्तिहीन याचक से अधिक व अलग कुछ भी बचे नहीं हैं. बच रहे हैं तो सिर्फ अांकड़े… मरने के …अौर मरने से अब तक बचे रहने के.
कोई हाथ जोड़ कर माफी मांग रहा है जबकि उसकी सूरत व सीरत से माफी का कोई मेल बैठता नहीं है… असहायता व मौत सामने देख कर कितने ही हैं जो महानगरों से भाग चले हैं बिना यह जाने कि वे एक मौत से निकल कर, दूसरों की मौत लिए दूसरी मौत के मुंह में ही जा रहे हैं… अौर शक्ति की ऊंची कुर्सी पर बैठा कोई उनसे कह रहा है कि अाप मेरा शहर छोड़ कर मत जाइए… हम अापके लिए खाने-पानी अौर निवास की व्यवस्था करेंगे… जनाब, यदि अापने यह पहले ही कहा होता, किया होता तो अाज इतने कातर बनने की नौबत उनकी या अापकी अाती ही क्यों… पद की ताकत का नशा उतरता है तो सब कुछ इतना ही खोखला अौर कातर हो जाता है … अाप देखिए न, दुनिया के पहले अौर दूसरे नंबर की इकॉनमी का दावा करने वालों के चेहरे पर हवाई उड़ रही है, चेहरे की रंगत बदली हुई है. कोरोना का मुखौटा लगा कर मौत ने सबसे गहरा वार उन देशों पर किया है जो अाधुनिक सभ्यता व विकास के सिरमौर बने फिरते थे… अौर जिनका उच्छिष्ट बटोरने को हम हर दूसरे दिन किसी-न-किसी यात्रा पर निकलते थे… अौर चंपू लोग कहते थे कि यह नई डिप्लोमेसी है … वहां अब सब कुछ लॉकडाउन है. न गले लगने वाला है कोई, न लगाने वाला ! अब तो कह रहे हैं अाप कि दो गज की दूरी से हंसना-बोलना ही अच्छे इंसान की पहचान है. अौर वह बेचारा बहादुरशाह जफर ? … दो गज जमीं भी ना मिली कूए-यार में !
ऐसी दुनिया पहले कब देखी थी हमने ? कभी दादी-नानी बहुत याद कर-कर के बताया करती थीं कि कैसे उनके गांव में हैजा, प्लेग फैला था अौर फिर कैसे गांव ही नहीं बचा था; कि कैसे एक दिन बैलगाड़ी पर लाद कर अपना गांव वे सब कहीं निकल गये थे जो निकलने के लिए जिंदा बचे थे… उनकी यादें भी अब उस बहुत पुराने फोटोग्राफ-सी बची थीं जिनका रंग बदरंग हो गया है… जो समय की मार खा कर फट गया है… उसमें जो दीखता है वह अाकृतिहीन यादों का कारवां है जिसे वे ही पहचान पाते हैं अौर कह पाते हैं जिन्होंने उसे कभी ताजादम, रंगीन देखा था… दादी-नानी कहती थीं कि हम तब बच्चा थे न … लंबे समय बाद जब नाना-दादा कोई अपना गांव-घर देखने वापस गये थे तो उन्हें वहां अपना पूरा गांव वैसा ही खड़ा मिला था जैसा छोड़ कर वे गये थे… उनकी बातें सुनते-सुनते अचानक ही मेरी समझ में यह बात अाई कि जहां अादमी नहीं होता है वहां कुछ भी खराब या बर्बाद नहीं होता है … मैंने यह कहा भी… यादों को समेटती दादी-नानी ने मेरी बात नहीं काटी ( वे लोग कभी कुछ काटते कहां थे, जोड़ते थे !)… तो जोड़ा : नहीं बेटा… अादमी नहीं है जहां वहां घर-मकान तो हो सकते हैं, जिंदगी कहां होती है … मैंने फिर समझा कि अादमी होना जरूरी है… तो बात अागे बढ़ी … तुम्हारे दादा-नाना को गांव के सारे घर-झोपड़े वैसे ही मिले जैसे वे थे… बस नहीं मिला तो कोई अादमी कहीं नहीं मिला… जो मरे अौर जो मरने से डर कर गांव छोड़ कर चले गये, गांव के लिए तो वे सब मर गये न! … तो गांव अपने घर-झोंपड़े संभाले वैसा ही खड़ा था जैसे इंतजार में हो कि कोई अाए तो जीवन अाए… वे कहती थीं कि गांव में कहीं कोई कुत्ता या चिड़िया भी अापके दादा-नाना को नहीं दिखाई दिया… फिर खुद को संभालती हुई कहतीं कि अादमी नहीं तो कुत्ता-बिल्ली भी क्या रहेगी…तो कोरोना पहला नहीं है जो अादमी को जीतने या अादमी को हराने अाया है… पहले भी कई दफा ऐसा हुअा है.
बात कुछ यों भी समझी जा सकती है कि सृष्टि के अस्तित्व में अाने के बहुत-बहुत बाद अादमी का अस्तित्व संभव हुअा था… यह प्राणी दूसरे प्राणियों से एकदम अलग था… यह रहने नहीं, जीतने अाया था… इसे साथ रहना नहीं, काबू करना था… लेकिन सारे दूसरे प्राणी, वायरस या विषाणु अादि कैसे समर्पण कर देते ! सारी सृष्टि अासानी से अादमी के काबू में नहीं अाई. जब, जिसे, जहां मौका मिला उसने अादमी पर हमला किया. अाप याद करें तो पिछले ही कुछ वर्षों में कितने ही विषाणुअों के हमले की अाप याद कर सकते हैं. सबने इसका नामो-निशान मिटाने की कोशिश की. कितनी ही महामारियों ने इसे गंदे दाग की तरह धो कर धरती से साफ करना चाहा… प्रकृति ने इसे हर तरह की प्रतिकूलता में डाला … इसने हर तरह की लड़ाई लड़ कर अपना अस्तित्व बचाया… हर जीत के साथ इसे लगने लगा कि अब सारा कुछ उसकी मुट्ठी में है. बस, यह मुट्ठी ही सबसे बड़ा अभिशाप हो गया ! … अादमी ने मान लिया कि सब कुछ उसकी मुट्ठी में है. वह चाहे जैसे जीएगा, उसकी मर्जी… कि तभी कोरोना ने हमला कर दिया… यह उसी लड़ाई का नया मोर्चा है. उस दिन अमरीका में रह रहे किसी भारतीय डॉक्टर ने कहा कि हम हरा तो इसे भी देंगे ही भले इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़े ! … यह जीतने की अौर हराने की भाषा ही हमारी अादि भाषा है. यह सबसे बड़ा विषाणु है. यह भाषा, यह नजर, यह नजरिया बदला होगा…बदलनी होगी हमें हमारी प्रकृति !
जीतना अौर हराना नहीं, छीनना अौर फिर दया करना नहीं; हम सीखें करुणा ! सबके प्रति, प्रकृति के छोटे-बड़े हर घटक के प्रति करुणा ! दया नहीं, उपकृत करना नहीं, अभय देना नहीं, करुणा से जीना. दया तब तक रचनात्मक नहीं होती है जब तक दया मात्र रहती है - इसे पात्र की जरूरत पड़ती है. कोई चाहिए कि जिस पर हम दया करें. दया जब सक्रिय होती है तो करुणा में बदल जाती है. करुणा में करना जरूरी है. जो करणीय नहीं है, वह करुणा नहीं है. जब गांधी कहते हैं कि प्रकृति से हमें उतना ही लेने का अधिकार है जितना कम-से-कम पर्याप्त है, तब वे हमसे करुणा की भूमिका में जीने की बात कहते हैं. अौर फिर वे यह भी कहते हैं कि वह जो अावश्यक अल्पतम लिया है तुमने, वह भी प्रकृति को वापस करना है, यह याद रखना.
हमारी यह सर्वग्रासी सभ्यता लोभ अौर हिंसा की प्रेरणा से चलती है. दूसरे से अधिक अौर दूसरे के बिना ! सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा, सबसे ज्ञानी, सबसे ताकतवर जैसे हमारे प्रतिमान करुणा को काटते हैं. सबके बराबर, सबके लिए अौर सबके साथ जीना सीखना करुणा की पहली सीढ़ी अौर अंतिम मंजिल है. मनुष्य को सीखना होगा कि जरूरत भर उत्पादन होगा, जरूरतें बढ़ाने के लिए कोई उत्पादन नहीं होगा. ऐसा होगा तो चीन को अपना पागल उत्पादन अौर हमें उसे समेटने की अपनी पागल होड़, दोनों बंद करनी होगी. जहरीले रसायनों को पी कर जीने वाले विकास को विनाश मानना होगा, अौर उसे बंद करना होगा - एकदम अौर अभी ! यह सब बंद करने के बाद जो बचेगा वही असली अौर स्वस्थ विकास होगा. मान लीजिए कि धरती पर उतना ही विकास, उतनी ही सुविधा, उतने ही संसाधन हमारे हिस्से के हैं. इसलिए तो गांधी समझा रहे थे : लाचारी की नहीं, स्वेच्छा से स्वीकारी गरीबी !
अाज के विकास से मालामाल हुअा कोई काइयां तुरंत पूछेगा : दुनिया की इतनी बड़ी जनसंख्या की भूख अापकी करुणा से तो नहीं मिटेगी ? फिर यह मान कर कि उसका यह रामवाण व्यर्थ नहीं जाएगा, बड़ी अाक्रामकता से वह अपने समर्थकों को उकसाएगा. हां,हां करने वाली बड़ी जमात खड़ी हो जाएगी. लेकिन कोई तो होगा मुझ-सा जो उससे पूछेगा : जरा बताना, क्या यह सारी अापाधापी भूख मिटाने के लिए है ? कितनों की कितनी जरूरतें तुम पूरी करते हो अौर कितनी जरूरतें पैदा करते हो, यह हिसाब भी लगाया है कभी ? तुमने-हमने सोचा है कभी कि दुनिया की इतनी बड़ी जनसंख्या को लोभ व हिंसा से विरत कर दो तो इंसानी जरूरत कितनी थोड़ी-सी बचती है ? देखो न, कोरोना-काल में हम सब कितने कम में अपना काम चलाने पर मजबूर हो गये हैं ? काम चल रहा है न ? … अौर मजबूर हो गये हैं तो यह समझ भी पा रहे हैं कि इतने में काम चल सकता है. जीना बहुत महंगा सौदा नहीं है यदि जीना ही धन्यता है. हड़पना, सब कुछ पर धाक जमाना अौर अपने लिए अौर अपनों के लिए सब कुछ समेट लेना न हो तो कितना चाहिए ? इज्जत की जिंदगी अौर ईमान की रोटी, बस ! यह तुम्हारी बनाई दुनिया में असंभव-सी बात है. लेकिन तुम्हारी सक्रिय करुणा से बनी दुनिया में बात यहीं से शुरू होती है. यह करुणा सबको संपन्न भी कर सकती है, संतुष्ट भी. गांधी फिर कहते हैं : प्रकृति हममें से एक का भी लालच पूरा नहीं कर सकती है, लेकिन जरूरत पूरा करने से वह कभी चूकेगी नहीं. तो बदलना क्या है ? अपना प्रतिमान ! जो सब कुछ हड़प कर, सबसे अागे खड़ा हो गया है वह हमारा प्रतिमान नहीं है; जो सबसे पीछे खड़ा है अौर सबसे अधिक बोझ उठाए है, वह हमारा प्रतिमान है. कतार के इस सबसे अंतिम अादमी का जिस समाज में स्वाभिमानपूर्ण जीवन संभव व स्वीकार्य होगा, वह करुणामय समाज ही होगा. वहां तुम न चाहो तो भी सब एक ही दरी पर अा जाएंगे, अौर तुम जिसे खोज रहे थे वह समता भरा अानंद भी तुम्हारे हाथ में होगा.
कोरोना से ग्रसित यह समाज हमसे कह रहा है कि इसे कोरोना से बच कर निकलना है तो वह करुणा के सहारे ही संभव है. इसलिए बारहखड़ी बदलो. खुद को भी अौर अपने बच्चों को भी सिखाअो : ‘क’ से करोना नहीं, ‘क’ से करुणा !! ( 03.04.2020 )
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