Thursday, 9 October 2025

एक जूते से जो बात शुरू हुई …

 जूता चलाने वाले ने जब अपना काम कर दिया तब, जिन पर जूता फेंका गया था उन्होंने जूते को जूते की जगह दिखा कर, अपूर्व संयम दिखाते हुए अपना सामान्य काम शुरू कर दिया. हमारे सर्वोच्च न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई ने ऐसा करके हम सबका सर गर्व से ऊंचा कर दिया. हमारे देश की बड़ी कुर्सियों पर आज जैसी क्षुद्रता से भरे लोग बैठे हैं, उसमें गवई साहब का यह स्थिरचित्त व्यवहार स्वप्नवत् लगता है. 

गुलीवर को लिलिपुट में भी ऐसे छोटे’ लोग नहीं मिले होंगेजैसे हमें मिले हैं. छोटा या नाटा होने में और क्षुद्र’ होने में बहुत बड़ा फर्क है जिस फर्क को इन दिनों जुमलेबाजी से ढकने की चातुरी दिखाई जा रही है. लेकिन क्षद्म भी इतना चरित्रशून्य नहीं होता है कि बहुत वक्त तक क्षद्म चलने दे. देखिए नआज एक जूते ने उसे तार-तार कर दिया है. अब जो नंग सामने आई है उसे प्रधानमंत्री का मौका देख करबड़ी देरी से एक्सपर जारी किया बयान भी नहीं ढक पा रहा है. वह जूता और प्रधानमंत्री का यह बयान कि “ यह हर हाल में निंदनीय है और इससे हर भारतीय क्रुद्ध हो उठा है और ऐसे काम की कोई जगह नहीं है” एक सा-ही दिखाई देता है. आज से आधी शति पहले1973 में लोकनायक जयप्रकाश ने जो कहा था वह आज की सरकार से ऐसे चिपकता है जैसे इनके लिएकल ही कहा गया हो : “ देश के राजनीतिक नेतृत्व की नैतिक हैसियत जब एकदम से बिखर जाती है तब सभी स्तरों पर अनगिनत बीमारियां पैदा हो जाती हैं.

इसलिए ही सारे देश को क्षुद्रता का डेंगू हुआ है. क्यों देश के आज के राजनीतिक नेतृत्व की नैतिक हैसियत एकदम बिखर गई है याकि देश के आज के राजनीतिक नेतृत्व ने नैतिकता को जूता समझ कर किसी पर फेंक दिया है. अब उसके पास न नैतिकता बची हैन जूता ! वह नंगे सर व नंगे पांव सारे देश मेंसभी स्तरों पर अनगिनत बीमारियां फैलाने में जुटा है. यह जूता किसी दलित पर नहीं फेंका गया है. जिस पर फेंका गया वह संयोग से दलित है. सच यह है कि यह असहमति पर फेंका गया वह जूता है जो इस सरकार व इस पार्टी के सभी लोग देश पर लगातार फेंकते आ रहे हैं. घृणा इनके दर्शन की संजीवनी बूटी है. इनकी रोज-रोज की जुमलेबाजी देश को मूर्ख बनाने की बाजीगरी है.     

गवई साहब हमारे सर्वोच्च न्यायाधीश हैं. सभी कह रहे हैंलिख रहे हैं कि वे दलित हैं. कोई यह क्यों नहीं कह रहा है कि न न्याय की कोई जाति होती हैन न्यायाधीश की जब दिल व दिमाग से जाति-धर्म-संप्रदाय-लिंग-भाषा-प्रांत की लकीरें मिट जाती है तब न्याय का ककहरा लिखने की शुरुआत होती है. इसलिए हमें कहना चाहिए कि हमारे गवई साहब न दलित हैंन सवर्ण हैं. वे हमारी न्यायपालिका के सर्वोच्च न्यायमूर्ति हैं. हम इतना ही जानते हैं और उनकी योग्यता का मान करते हैं. हम संपूर्ण न्यायपालिका को भी ऐसे ही देखना चाहते हैं. हमारी चाह आप जानना चाहें तो वह यह है कि सारा देशसंसार के सारे इंसान ऐसे ही होंन हों तो ऐसे ही बनेंऔर उन्हें ऐसा बनाने में हम सब अपने मन-प्राणों का पूरा बल लगाएं. 

हमें गहरा खेद है कि जिसका जूता था उन वकील राकेश किशोर के पास अब वह जूता भी नहीं रहा. एक वही जूताग्रस्त मानसिकता तो थी उन जैसों के पास ! पिछले 10-12 सालों में इस सरकार ने देश के हर नागरिक के हाथ में यही मानसिकता तो थमाई है कि अपना जूता दूसरों पर फेंको ! प्रधानमंत्री से ले कर उनका पूरा मंत्रिमंडल यही करता हैउनकी पार्टी का अध्यक्ष अपनी पूरी पार्टी को साथ ले कर यही करता है. अपना-अपना स्वार्थ साधने के लिए दूसरे कई छुटभैय्ये भी हैं जो इनके साथ हो लिए हैं. बात पुरानी है लेकिन एकदम खरी है कि तुम वही होते हो जिनके साथ तुम रहते हो. 

यह गवई साहब पर भी उतना ही लागू होता है जितना चंद्रचूड़ साहब पर होता था.  चंद्रचूड़ साहब ने प्रधानमंत्री के साथ मिल कर गणपति वंदना करना जरूरी समझा तो गणपति ने उन्हें मूषक’ बना दिया. अब वे यहां-वहांहर जगह यह बताते-कहते घूम रहे हैं कि मैं मूषक’ नहीं बना था. लेकिन सौ-सौ चूहे वाली बिल्ली हमने-आपने भी देखी तो होगी ! सो चंद्रचूड़ साहब कहते कुछ हैंहमें सुनाई कुछ दूसरा ही देता हैदिखाई कुछ तीसरा देता है. 

गवई साहब ने मुख्य न्यायाधीश बनते ही कहा था कि वे आंबेडकर को माथे पर धर कर चलते हैं. हमने कोई एतराज नहीं कियाहालांकि होना तो यह चाहिए कि उनके व दूसरे किसी भी न्यायमूर्ति के माथे पर संविधान ही हो- न गांधी होंन आंबेडकर ! लेकिन अब हमें दिखाई कुछ और भी देता है. गवई साहब सरकारी मूषकों’ के साथउनके उड़नखटोले में या उनकी गाड़ी में यहां-वहां बेज़रूरत घूमते हैंसरकारी होने का कोई भी फायदा वे छोड़ते नहीं हैं. न्यायमूर्ति की सबसे ऊंची कुर्सी से वे भी वैसी ही गोलमोल बातें करते हैं जैसी बातें उस कुर्सी से हम अक्सर ही सुनते रहे हैं. किसी भी मुकदमे के दौरान फैसलों से इतर न्यायाधीश जो टिप्पणियां करते हैंवे बहुत मतलब की नहीं होती हैं. विष्णु की मूर्ति के संदर्भ में गवई साहब की वह टिप्पणी भी न जरूरी थीन निर्दोष थी. 

हमारी न्यायपालिका आज भी ऐसे ही चल रही है जैसे देश में कुछ भी असामान्य नहीं है. जिस संविधान व लोकतंत्र की वजह से ही न्यायपालिका का अस्तित्व हैउस पर रोज-रोज हमले हो रहे हैंयह हमें दिखाई देता हैअदालतों को नहीं. अदालतों के पास समय बहुत थोड़ा है और हमारा लोकतंत्र बहुत नाज़ुक दौर से गुजर रहा है. वह गुजर ही न जाएइसकी तत्परता गवई साहब की न्यायपालिका के व्यवहार व आचार में दिखाई नहीं देती है. 

संवैधानिक महत्व के मुद्दों कोनागरिक स्वतंत्रता के सवालों को प्राथमिकता के आधार पर सुना जाए और न्यायपालिका को जो भी कहना होवह स्पष्ट शब्दों में कहा जाएऐसा नहीं हो रहा है. ऐसा रवैया संविधान को मजबूत नहीं बनाता हैआंबेडकर को जिंदा नहीं करता है. बिहार में केंद्र सरकार के इशारे पर चुनाव आयोग ने सर’ का जो ढकोसला खड़ा किया थाउसने चुनावी न्याय को सर के बल खड़ा कर दिया है. उसे न्यायपालिका की सीधी फटकार क्यों नहीं मिली ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग व सर्वोच्च न्यायालय के बीच चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है. आधार कार्ड को मतदाता का न्यायसम्मत प्रमाण मानने की बात को जिस कठोरता से अंतिम तौर पर कह देने की जरूरत थीगवई साहब की अदालत वैसा नहीं कह सकी. इसलिए आयोग रह-रह कर आधार कार्ड का माखौल उड़ता है और कहता है कि आप आधार दो या न दोहमारे बताए दस्तावेज तो देने ही होंगे ! यह मतदाता का अपमान हैन्यायपालिका की खुली अवमानना है.

अब चुनाव आयोग ने न्यायालय को नया शह’ दिया है. उसने  बिहार के मतदाताओं की अंतिम सूची प्रकाशित करचुनाव की तारीखें घोषित कर दी है. यह अदालत को उसकी औकात बताने की कोशिश है. हम सभी जानते हैं कि ज्ञानेश कुमार के ज्ञान’ के पीछे सरकार अभय-मुद्रा में खड़ी है. यह एक चीफ कीदूसरे चीफ को सीधी चुनौती है. आयोग ने यह भी घोषित कर दिया है कि बिहार को निबटा कर हम देश को भी इसी तरह ठिकाने लगाएंगे. देश के मतदाताओं के सर पर सर’ की तलवार लटकी हुईं है. चुनाव आयोग चंद्रचूड़’ बना हुआ है. वह बात का भात पका भी रहा है व खिला भी रहा है. 

जूते की बात छोड़िएलोकतंत्र पर सीधा हमला खरीदे व जुटाए जिस बहुमत की आड़ में हो रहा हैवह बहुमत है ही नहीं. इसके जितने प्रमाण कोई नागरिक जुटा सकता हैउतने प्रमाण सामने रख दिए गए हैं. अब जो काम बचा है वह न्यायपालिका का हैक्योंकि संविधान ने उसे ही यह जिम्मेवारी दी है तथा यही उसके होने की सार्थकता भी है कि वह लोकतंत्र के साथ खड़ा रहे. आज के दौर में यह सबसे आसान काम है. आसान इसलिए है कि आपके पास एक किताब है जिसे आंबेडकर का लिखा संविधान कहते हैं. बस उस किताब को खोलिए और उसके आधार पर सही या गलत का फैसला कीजिए. न एक शब्द बदलना है आपकोन कुछ अलग या नया लिखना है. 

आप वह मत करिए जो आपके कमजोर प्रतिनिधियों ने पहले किया है. संविधान ने नहीं कहा है कि आपको संतुलन साधना हैकि आपको बीच का रास्ता निकालना है. सत्य या न्याय संतुलन से नहींसंविधान के पालन से सिद्ध होता है. चंद्रचूड़ साहब ने अपनी असलियत ढकने के लिए एक बौद्धिक तीर चलाया कि हमारा संविधान नहीं कहता है कि हमारे जजों की निजी आस्थाएं नहीं होनी चाहिए. हांहमारे संविधान ने ऐसा नहीं कहा है लेकिन चंद्रचूड़ साहब बड़ी चतुराई से यह छिपा गए कि संविधान ने साफ शब्दों में कहा है कि आपकी निजी आस्थाओं की छाया भी आपके फैसलों पर नहीं पड़नी चाहिए. यह आसान नहीं हैतो जज बनाना इतना आसान कहां है ! जिस तरह सड़क पर चलता हर ऐरा-गैरा जज नहीं बन सकताठीक उसी तरह बड़ी शिक्षा पा कर या विदेशों से डिग्री ला कर या किसी पूर्व जज का परिजन होने से कोईं जज नहीं बन जाता. जज की कुर्सी पर बैठने से भी लोग जज नहीं बन जाते. यह योग्यता व पात्रता संविधान के साथ खड़े होने की आपकी हिम्मत से आती है. चंद्रचूड़ साहब याद करें तो उन्हें याद आएगा कि आपातकाल में उनके पिता समेट 5 जज थे जिनमें से 4 ने संविधान को रद्दी की टोकरी में फेंक करसरकार की खैरख्वाही की थी. भारतीय न्यायपालिका का मुंह उस दिन जो काला हुआवह दाग आज तक नहीं धुला है. चन्द्रचूड़ों ने उसे और भी कला कर दिया है. किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में फैसला देने की बात नहीं हैजो लिखा हुआ संविधान देश की जनता ने आपको सौंपा हैउसका पालन करने की बात है. 

जूता चला यह बहुत बुरा हुआ. लेकिन यही जूता वरदान बन जाएगा यदि इसने हमारी न्यायपालिका को नींद से जगा दिया. जूता चलाने की असहिष्णुता जिसने समाज का स्वभाव बना दिया हैवह अपराधी पकड़ा जाएइसके लिए सन्नद्ध व प्रतिबद्ध न्यायपालिका अपनी कमर सीधी कर खड़ी होतो जूते का क्यावह फिर से पांव में पहुंच जाएगा. 

( 08.10.2025) 

Sunday, 5 October 2025

आइए, गांधी से मिलते हैं !

 आज 2 अक्तूबर है - महात्मा गांधी का जन्मदिन जो इस वर्ष दशहरे की पोशाक पहन कर आया है. हम दशहरे में दशानन को याद करें या गांधी को, बात एक ही है. इंसान है, इंसान की कमजोरियां हैं लेकिन मां दुर्गा हैं तो इंसान की कमजोरियों का शमन भी है; गांधी हैं तो कमजोरियों से ऊपर उठने का इंसानी अभिक्रम भी है. देख रहे हैं न आप, हर तरफ़ मां दुर्गा की झांकी नानाविध सजी हुई है लेकिन सारी झांकियां बात एक ही कह रही हैं : अपनी कमजोरियों से लड़ो, अपनी कमजोरियों से ऊपर उठो ! 

ऐसा ही तो गांधी के साथ भी है.    

हमारे देश के हर नगर-महानगर-कस्बे-गांव-पंचायत में एक-न-एक ऐसा एक चौराहा जरूर होगा जिस पर एक बूढ़े की घिसी-टूटी-बदरंग मूर्ति लगी होगी- झुकी कमर व हाथ में लाठी कहीं चश्मा होगा कहीं टूट गया होगा. आप चेहरा आदि मिलाने-खोजने जाएंगे तो फंस जाएंगेक्योंकि नए-पुराने सारे लोग जानते होंगे कि यह गांधी-चौक है और यह बूढ़ा दूसरा कोई नहींमहात्मा गांधी हैं. बहुत उपेक्षित होगा वह चौक लेकिन मैंने कई जगह देखा है कि किसी 2 अक्तूबर या 30 जनवरी को किसी ने आ कर वहां कुछ गंदगी साफ कर दी हैदो-चार फूल रख दिए हैं. 

ये देश के गांधी हैं ! लेकिन हमारे गांधी कौन हैं कभी न सोचा हो तो अभीइस 2 अक्तूबर को सोच कर देखिए. यह इसलिए भी जरूरी है कि देख रहा हूं कि इधर आ कर बात कुछ बदली है और देश के युवा — संख्या की बात नहीं है यहां ! — जब घिरते हैं अपने सवालों से और  जवाब मांगने सड़कों पर उतरते हैं तो गांधी को खोज कर साथ रखते हैं.

यह भी देश के गांधी हैं - ग्रेटा थनबर्ग की आवाज में कहूं तो दुनिया के गांधी हैं. इतने जाने-पहचाने हैं गांधी कि हमारे लिए एकदम अजनबी हो गए हैं. इसलिएआइएफिर से उनसे मिलते हैं.   

 उनका जीवन जिन रास्तों पर चलाजिन मोड़ों से गुजरा-मुड़ा और जिस मंजिल पर ताउम्र उनकी नजर रहीउन सबकी पर्याप्त चर्चा भी नहीं कर सके हैं हम अब तकआकलन तो दूर की बात है. इसलिए सबसे आसान रास्ता हमने अपनाया है कि 30 जनवरी और 2 अक्तूबर को उनका फोटो सजा लेना व कुछ अच्छी लेकिन गांधीजी के संदर्भ में अर्थहीन-सी बातें कर लेना. दिल्ली के राजघाट पहुंच कर सत्ताधारी सर झुका आते हैं और कुछ लोग ऐसे निकल ही आते हैं कि जो अपनी गहरी समझ का प्रमाण-सा देते हुए गांधीजी से अपनी असहमति जाहिर करते हैं. वह असहमति भी अधिकांशतः अर्थहीन होती हैक्योंकि जिसे हम ठीक से जानते भी नहीं हैंउससे सहमति या असहमति कितना ही मानी रखती है ! जयप्रकाश नारायण ने कभी बड़ी मार्मिक एक बात कही थी : “ गांधी की पूजा ऐसा एक खतरनाक खेल है जिसमें आपको पराजय ही मिलने वाली है.” पूजा नहींगांधी के पास पहुंचने के लिए साधना की जरूरत है - गुफा वाली आसान साधना नहींसमाज के बीच की जाने वाली निजी व सामूहिक कठिन साधना ! 

यह बात सबसे पहले पहचानी थी रूसी साहित्यकार-दार्शनिक लियो टॉल्सटॉय ने. तब बैरिस्टर गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपनी साधना की धरती बनाने में लगे थे और टॉल्सटॉय की किताबें पढ़ कर चमत्कृत-से थे. उन्हें लगा कि वे जो रास्ता खोज रहे हैंयह आदमी उस दिशा में कुछ दूर यात्रा कर चुका हैसो बैरिस्टर साहब ने उन्हें पत्र लिखा. जिसने पत्र लिखाउसे रूसी नहीं आती थीजिसे पत्र लिखा उसे रूसी भाषा के अलावा दूसरी कोई भाषा नहीं आती थी. संप्रेषण-संवाद कितना कठिन रहा होगा ! लेकिन इस अजनबी हिंदू युवक’ का अंग्रेजी में लिखा पत्र किसी से अनुवाद करवा कर जब पढ़ा टॉल्सटॉय ने तो वे चमत्कृत रह गए. अपने एक मित्र को गांधी का परिचय देते हुए लिखा : इस हिंदू युवक पर नजर रखना ! यह कुछ अलग ही इंसान मालूम देता है. हम सब अपनी साधना के लिए कहीं एकांत मेंगांव-पहाड़-गुफा आदि में जाते हैं. देखते ही हो कि मैं भी नगर से निकल कर दूर देहात में आ गया हूं. लेकिन यह आदमी लोगों की भीड़ के बीच बैठ कर अपनी साधना कर रहा है.

तब गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग शहर में अपना टॉल्सटॉय फार्म बनाया ही था. 1910 में बना यह कृषि-केंद्र अहिंसक सत्याग्रहियों का प्रशिक्षण-स्थल था.       

गांधी अत्यंत सरल व्यक्ति थे लेकिन वे अविश्वसनीय हद तक कठिन व्यक्ति थे. उनके साथ जीना भी बहुत कठिन थाउन जैसा होना तो असंभव-सा ही है. ऐसा क्यों है 

इसलिए है कि गांधी ने अपनी जैसी कठोर कसौटी कीअपने प्रति वैसी कठोरता निभाना बहुत मुश्किल है. वे दूसरों के लिए बेहद उदार हैंएकदम कमलवत् ! अपने बनाए सारे कड़े नियम-कायदे भी बाजवक्त दूसरों के लिए ढीले करते ही रहते हैं. अपने सेवाग्राम आश्रम में बादशाह खान अब्दुल गफ्फार खान के लिए मांसाहारी भोजन का प्रबंध करने का आदेश उन्होंने ही दिया था : “ यह बेचारा तो भूखा ही रह जाएगा ! उसका यही भोजन है!”; यह बात दूसरी है कि बादशाह खान ने वैसी व्यवस्था के लिए न केवल मना कर दिया बल्कि यह भी कह दिया कि अब मैं भी शाकाहारी हूं. जवाहरलाल हवाना से लौटे तो वहां मिले उपहार गांधीजी को दिखला रहे थे. हवाना की बेशकीमती सिगार भी उसमें थी. गांधीजी ने लपक कर उसे अलग निकाल लिया : “ अरे यह ! … यह तो मौलाना को दे दूंगा ! उन्हें सिगार बहुत पसंद है.” 

उनके पास सबके लिए सब कुछ थाअपने लिए अल्पतम ! जो सबके लिए नहीं हैवह मेरे लिए भी नहीं हैइस बारे में वे लगातार सावधान रहे. ऐसे गांधी के साथ किसकी निभेगी जो अपने को कोई छूट न देने का संकल्प साधने में लगा होवही गांधी की छाया छूने की आशा कर सकता है. यह पेंच समझने लायक है न कि गांधी संभव हद तक कम कपड़े पहनते थे लेकिन कांग्रेस के लिए उन्होंने कभी यह आग्रह नहीं किया कि सभी घुटने तक की धोती पहनें. खादी पहनने व कातने का आग्रह कभी किया जरूर लेकिन सम्मति नहीं मिली तो वह भी छोड़ दिया. लेकिन अपने लिए नियम ही बना रखा था कि हर दिन निश्चित सूत काते बिना सोना नहीं है.

दिन भर की देहतोड़ दिनचर्या के बाद जब सभी सोने जाते थेगांधी अपना चर्खा ले कर बैठते थे : कताई का अपना लक्ष्यांक पूरा कर तो लूं !… अपने लिए कभी यह तय कर दिया कि मेरे भोजन में पांच से अधिक चीजें नहीं होंगीतो फिर गिनती के बगैर खाना नहींफिर यह भी बता दिया कि मेरे भोजन का खर्च इससे अधिक नहीं होना चाहिए. दूसरे गोलमेज सम्मेलन में लंदन पहुंचे तो भोजन की थाली सामने आने पर अपने मेजबान से दो ही सवाल पूछते थे : इस थाली की कीमत कितनी है इस थाली में से कितनी चीजें इंग्लैंड में पैदा हुईं हैं कमखर्ची व स्वदेशी ! उनके लिए ये दोनों जीवन-मंत्र थे. आज संसार का हर पर्यावरणवादी इन्हीं दो मूल्यों की बात करता है. मतलब क्या हुआ 83 साल पहले हमने जिस इंसान को मार डाला थाउसका जीवन-मंत्र ही आज के इंसान का जीवन-मंत्र बने तो धरती बचेप्राण बचे. कितना कठिन रहा होगा यह आदमी ! 

इस गांधी से हम जितनी दोस्ती कर सकेंगेउतने ही इंसान बन सकेंगे.  

तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो 

उम्मीद इंसानों से लगा कर शिकायत खुदा से करते हो 

( 30.09.2025)

जीजी: एक कर्मयोगी

     जिस आदमी ने महात्मा गांधी को देख कर अपनी सामाजिक समझ की आंखें खोली थी, उसने महात्मा गांधी के जन्मदिन 2 अक्तूबर के दिन अपनी आंखें बंद कर लीं; और इन दोनों के बीच उसने 101 साल का लंबा सफर भी तय कर लिया; और यह लंबा सफर शुचिता, सक्रियता, आत्मीयता से भरा रहा; और हमेशा परिवर्तनकारियों के साथ खड़ा रहा. है न हैरानी की बात !

   1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बादमुंबई में सांप्रदायिक दंगा भड़क उठा था. मुंबई का चेहरा कैसा डरावना हो गया था ! उसका ऐसा चेहरा हमने पहले देखा नहीं था. मुंबई के मणि भवन में हम कई रंग के गांधीजन उस रात जमा हुए थे. मणि भवन यानी बंबई में गांधीजी का घर ! 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा करने के बादइसी मणि भवन से गांधीजी की गिरफ्तारी हुई थी. 

   गांधीजी की उस गिरफ्तारी के ठीक आधी सदी बादउसी मणि भवन में विचलित व मुरझाए-से हम कुछ गांधीजन जमा हुए थे यह सोचने के लिए कि हम मुट्ठी भर लोग उस सांप्रदायिकता के जहर से लड़ने के लिए क्या कर सकते हैं जिसने बंबई में और सारे देश में आग लगा दी है. जान देने की तैयारी से कम में इसका मुकाबला संभव नहीं हैयह सभी जानते थे. लेकिन यह जानना व इसकी तैयारी करना दो भिन्न बातें हैंयही बात हमारी बात में से बार-बार उभर रही थी. राय यह ही बन रही थी कि इस विकराल स्थिति में हमारे बस का खास कुछ है नहींइसलिए सरकार जो कर रही है उससे ही हम भी जुड़ जाएं व शांति व राहत का काम करें.

   ऐसे रूख से मैं परेशान था. मैंने शांति सैनिक की भूमिका में पहले भी कई सांप्रदायिक दंगों में काम किया था. वहां की लाचारी मुझे पच नहीं रही थी. मैंने अंत में इतना ही कहा कि हम अभी हारे नहीं हैंबंबई को यह बताने के लिए कल सुबह से ही हमें दंग्राग्रस्त इलाकों में पहुंच जाना चाहिए. हम वहां पहुंचेंगे तभी हमें आगे का रास्ता समझ में आएगा. यह अंधेरे में आंख खोल कर छलांग लगाने की बात थी. 

   सब उठे और अकेले-अकेले घर गए. जीजी बेआवाज-से मेरे पास आएऔर आश्वस्ति से भरी धीमी आवाज में बोले : आपने जो कहावही असली बात है. मैं आपके साथ हूं.” 

   उस दिन से उनके साथ परस्पर विश्वास कास्नेह-सम्मान का वह रिश्ता बना जो अंत तक बना रहा. जीजी समाजवादी पृष्ठभूमि से आते थेमैं उस समाजवाद को कहीं पीछे छोड़ करगांधी के रास्ते चलने वाले विनोबा-जयप्रकाश के रास्ते का यात्री था. यह भेद थाप्रकट भी होता था लेकिन हम दोनों इसे संभाल लेते थे.  

   1974 के संपूर्ण क्रांति के जयप्रकाश-आंदोलन ने देश में तब जैसी खलबली मचाई थी उसमें बहुत कुछ टूटा थातो बहुत कुछ जुड़ा भी था. जो सबसे कीमती जुड़ाव हुआ था वह तब के राजनीतिक दलों में बचे ईमानदार व आदर्शवादी तबके का गांधीजनों से जुड़ाव था. ऐसे समाजवादियों के सिरमौर थे जीजी. उनके आसपास समाजवादगांधी और जयप्रकाश का बड़ा अनोखा त्रिभुज बनता था.       

         लगता है न कि दूसरा कुछ न भी हो तो भी ऐसे आदमी के बारे में हमें ज्यादा जानना चाहिए अगर मैं यह कहूं कि यह डॉ. गुणवंतराय गणपतलाल पारीख की बात हैतो शायद ही कोई इस आदमी को पहचान सकेगाक्योंकि ताउम्र उनका अपना शहर मुंबईउनका अपना प्रांत महाराष्ट्र और उनका अपना देश हिंदुस्तान उन्हें एक ही नाम से जानता आया है : जीजी ! वे सबके जीजी थे. इससे बड़े नाम का बोझ उनका सरल व्यक्तित्व उठाता ही नहीं था. 

   गांधी से गांधी तक की अपनी इस यात्रा में जीजी को साम्यवादी मिलेसमाजवादी मिलेजयप्रकाश नारायणराममनोहर लोहियामहाराष्ट्र के पहले दौर के कई विलक्षण समाजवादी नायक मिले. गांधी ने तरुण जीजी को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 10 महीनों की जेल-यात्रा करवाईतो उम्र के उतार के दौर में जयप्रकाश ने उन्हें आपातकाल में 15 महीनों की जेल यात्रा करवाई. “ मैं तो इसी तरह बना हूं !” दोनों जेलों की याद करते हुए जीजी बोले, “ जब हम आजादी के लिए लड़ रहे थे तब नहीं जानते थे कि आजादी पाने के लिए ही नहींआजादी कायम रखने के लिए भी जेल जाना पड़ता है. लेकिन वह हुआ. मुझे अंग्रेज पुलिस ने भी जेल में डाला और भारतीय पुलिस ने भी. तब से ही मैं मानता हूं कि सच बोलना और सच बोलने की जो भी कीमत देनी पड़े वह देनालोकतंत्र के सिपाहियों का धर्म है. गांधीजी ने यही तो सिखाया था हमें कि न अहिंसा कभी छोड़नी हैन लड़ाई लड़ना कभी छोड़ना है. 

   वे ऐसे ही थे. उनकी दो खास विशेषताएं थीं : वे संघर्ष व रचना के दोनों गांधी-तत्वों को समान कुशलता से साध पाते थे व युवकों के साथ संवाद बनाने से कभी हिचकिचाते नहीं थे. उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन समाजवादियों के साथ चलने में कभी पीछे नहीं रहे. मुझे नहीं लगता है कि मुंबई व महाराष्ट्र में कोई भी समाजवादी पहल ऐसी रही होगी कि जिसमें जीजी शामिल न रहे हों या जिसके संयोजन में उनकी भूमिका न रही हो. समाजवादियों की पत्रिका जनता’ गुमनामी में खो नहीं गई या संसाधनों के अभाव में दम नहीं तोड़ गई तो इसके पीछे जीजी की अपूर्व प्रतिबद्धता व कुशलता थी. वे भागते-दौड़ते कहीं-न-कहीं से संसाधन जोड़ते ही रहते थे. मुझे नहीं याद आता है दूसरा कोई नाम जिसने समाज के हर संभव तबकों से धन संग्रह करअपनी हर गतिविधि को जीवंत बनाए रखा. गांधी  कहते थे : “ समाज अपने सच्चे सेवकों के लिए संसाधन जुटाने में कभी कंजूसी नहीं करता है.” जीजी गांधी के इस विश्वास की सबसे उम्दा मिसाल थे. 

   मिसाल ही देखनी हो तो हम महाराष्ट्र के पनवेल में जीजी का यूसुफ मेहरअली सेंटर देख सकते हैं. जीजी न होते तो यूसुफ मेहरअली जैसा समाजवादी सितारा हमारी स्मृति से शायद खो ही जाता. आज हमने अपना देश जैसा बना दिया हैउसमें किसी यूसुफ मेहरअली के नाम से अपना सार्वजनिक काम शुरू करना संभव ही न हो शायद लेकिन जीजी ने रचनात्मक कामों का बड़ा संसार ही इस नाम से खड़ा कर दिया. रचनात्मक कामों के अधिकांश प्रकार आपको यूसुफ मेहरअ ली सेंटर पर जीवंत मिलेंगे. सहकारी भंडारों की अपनी श्रृंखला से उन्होंने खादी-ग्रामोद्योग को आगे बढ़ाने का लंबा प्रयोग चलाया. इतना सारा कुछ करते हुए भी डॉक्टर जीजी पारीख अपने दवाखाने में नियमित बैठ कर इलाज भी करते रहे. यह क्रम तभी टूटा जब शरीर ने इसकी इजाजत देनी बंद कर दी. 

   जीजी की मृ्त्यु के साथ एक ऐसी जीवन-गाथा का पटाक्षेप हो गया जिस पर से पर्दा उठा कर उसे बार-बार पढ़ने-जानने व उस दिशा में चलने के बिना भारतीय समाज का टिकना मुश्किल होगा. ( 05.10.2025)