Sunday, 8 March 2026

इतिहास से खेलिए नहीं !

  

गांधी और उनसे जुड़े इतिहास के बारे में संघ परिवारी जब भी कुछ कहते या लिखते हैंमैं उसे पढ़ने या उसका जवाब देने की सोचता भी नहीं हूं. इसलिए कि उनकी अवधारणाओं की पीछे निरपवाद रूप से सावरकर-गोलवलकर की वे फूहड़ सीखें होती हैं जिनका आधार मात्र गांधी-द्वेष व अंग्रेजों की गुलामी से प्रेम होता है. इनका इतिहास से और सत्य से दूर-दूर का रिश्ता नहीं होता है. लेकिन इस बार मैं अपना रवैया बदल कर यह लिख रहा हूंक्योंकि 31 जनवरी 2026 के अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस’ मेंराम माधव ने नाथूराम गोडसे की आड़ में छिप कर गांधी पर वार करने की बचकानी कोशिश की है. राम माधव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मान्य प्रवक्ता हैं जो संघ परिवार की चिर-परिचित रणनीति के मुताबिकअलग-अलग मंचों सेअलग-अलग भूमिका में अपनी एक-सी ही बातें रखते रहते हैं. इन दिनों किसी इंडिया फाउंडेशन’ के मंच से वे अपनी बात रख रहे हैं. 

    अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका हिंदी करूं तो कुछ ऐसा बनता है : शैतान बाइबिल को उद्धृत कर आपको भरमाना चाहता है. राम माधव का पूरा लेख कुछ ऐसा ही है जो गांधी के बारे में या इतिहास के बारे में या गांधी-हत्या के इतिहास के बारे में कमउनकी अपनी मंशा के बारे में ज्यादा बताता है. उनकी कुल मंशा यही है कि नाथूराम गोडसे की आड़ में गांधी-हत्या को जायज ऐतिहासिक आधार दिया जाए. इन दिनों राम माधव की या संघ परिवारी बौद्धिकों की योजनाबद्ध कोशिश चल रही है कि जीते जी जो गांधी कभी हाथ नहीं आएअब दूसरे रास्ते उनका काम तमाम किया जाए. इतिहास की यह त्रासदी उन सबको झेलनी पड़ती है जिन्होंने इतिहास बनाने का उद्यम कभी किया ही नहीं. किया है तो बस इतना ही कि इतिहास के साथ खेला है. जो डोर आपने कभी हाथ में धरी ही नहींउस डोर पर जब आप अपनी पतंग उड़ाना चाहते हैं तो आपकी पतंग भी व आप भी चारो खाने चित्त गिरते हैं. संघ परिवार के साथ हमेशा ऐसा ही होता है. 

 बक़ौल राम माधव, “ नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या इसलिए की कि उनका आरोप था कि गांधीजी ने तब राष्ट्रघात किया थाजब उन्होंने देश के विभाजन को अपनी स्वीकृति दी थी. नाथूराम का मानना था कि यदि गांधीजी ने ईमानदारी से पाकिस्तान का विरोध किया होता तो न मुहम्मद अली जिन्नान ब्रिटिश ही पाकिस्तान बना पाते.

जब आप इतिहास को इस तरह उद्धृत करआगे बढ़ जाते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि आप उस स्थापना का समर्थन करते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो गांधी का कोई भी अध्येता ऐसे उद्धरण के बाद यह जरूर लिखता कि नाथूराम गोडसे की ऐसी धारणा का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं थाक्योंकि गांधीजी ने कभी भी देश विभाजन को स्वीकृति नहीं दी थी. यदि नाथूराम का यह कथन अदालत में दिए उनके बयान “ मैंने गांधी को क्यूं मारा” से लिया गया हैतो इतिहास का हर अध्येता यहां यह भी लिखता कि अदालत का यह बयानजिसे संघ परिवार छपवाता ही रहता हैन तो कोई ऐतिहासिक दस्तावेज हैन अब यह कोई छिपी बात रह गई है कि यह सब लिखा तो सावरकर ने था जिसे नाथूराम के मुंह से कहलवाया गया था. संघ परिवार की रणनीति रही है कि झूठ सौ मुंह से निरंतर बोला जाए तो कुछ वक्त के लिए वह सच का दर्जा पा लेता है. राम माधव ने तो गांधीजी की ईमानदारी’ पर ऊंगली उठाने वाली सावरकर-नाथूराम की बात से भी असहमति नहीं लिखी ! गांधीजी अपनी हर बात ईमानदारी से कहते थे व अपना हर कदम ईमानदारी से उठाते थेइतनी ईमानदारी से कि उसके पीछे पागलों-से पड़ जाते थेयह तो गांधीजी के दुश्मन’ भी मानते थे. फिर देश विभाजन का उन्होंने ईमानदारी से विरोध’ नहीं कियाऐसी बात यदि सावरकर-नाथूराम ने कहीतो क्या आप इतिहास के अध्येता बन कर उसका प्रचार करेंगेया उससे अपनी असहमति ज़ाहिर करेंगे ?   

देश विभाजन के पीछे का इतिहास लंबा हैऔर किन-किन ताकतों की क्या-क्या भूमिका रही हैयह सब जानना जरूरी भी है. लेकिन इस लेख में अभी वह सब समेटना संभव नहीं है. इतना जानना जरूरी है कि जिन्ना की मुस्लिम लीग व सावरकर मार्का हिंदू संगठनों की रची सांप्रदायिक आग की हर लपट से जूझते हुए गांधीजी जब देश भर में मानवी दमकल’ बने भाग रहे थेतभी दिल्ली में बैठे सभी रंग-ढंग ने नेताओं ने अंग्रेजों के साथ मिल कर विभाजन का नक्शा बनाया था. इसकी एक भी लकीर गांधी न तो खींची थीन गांधी के मश्विरे से बनी थी. फिर भी राम माधव ने लेख के अंत में अपना मंतव्य लिखा है कि विभाजन’ के हालात पैदा करने के आरोप से गांधी पूरी तरह बरी नहीं किए जा सकते हैं. आगे वे पूछते हैं : “ लेकिन क्या वे इसके लिए अकेले जिम्मेवार थे ?” फिर ख़ुद ही जवाब देते हैं : “ गोडसे ऐसा मानते थेदेश नहीं मानता था.” लेकिन राम माधव यह नहीं लिख सके देश जो मानता थापूरा संघ परिवार वह कभी मानता ही कहां था 

नोआखाली का अपना अभियान पूरा कर77 साल के गांधी जब 1947 में दिल्ली लौटे तब तक विभाजन की शतरंज पर सारी गोटियां बिठाई जा चुकी थीं. अब वहां कोई भी उत्सुक नहीं था कि बंटवारे की चर्चा इस बूढ़े से की जाए - सभी वाइसरायों की तरह नये वाइसराय माउंटबेटन को भी लंदन ने इस बूढ़े की तरफ से सावधान किया थाजिन्ना तो गांधी से जितनी दूरी रखनी संभव थीउतनी दूरी रखते ही थेकांग्रेस के सारे बड़े नेता अब गांधी से दूरी ही नहीं रख रहे थे बल्कि उनसे बच कर चल रहे थे. यह इस हद तक था कि अंतत: गांधी ने ही सरदार को कुछ ऐसा लिखा कि मैं यहां जब से आया हूंऐसा महसूस कर रहा हूं कि एक मैं ही हूं कि जिसके पास कोई काम नहीं है… आप सबके पास तो पल भर का भी समय नहीं है. जब बंटवारे की बात उनके साथ बांटने को भी कोई तैयार नहीं था तब कोई ऐसा कैसे लिख सकता है कि बंटवारे की परिस्थिति बनाने की जिम्मेवारी से गांधी भी बरी नहीं किए जा सकते हैं समझना ही हो तो यह समझना आसान है कि गांधी का ऐसे माहौल में काम करना कितना कठिन रहा होगा. लेकिन कांग्रेस के लिए गांधी की पूर्ण उपेक्षा संभव नहीं थीन गांधी उदासीन रहने को किसी तरह तैयार थे. इसलिए बात धीरे-धीरे खुलती गई कि जवाहरलालसरदारमौलाना आजादआचार्य कृपालानी आदि सबने विभाजन को नैतिक व लिखित स्वीकृति दे दी है. गांधी ने इन सबको बड़ी कठोरता से अपने कठघरे में खड़ा भी किया. लेकिन दोषरोपण से बात पूरी तो होती नहीं थीक्योंकि गांधी सितंबर 1940 में कहा अपना यह कथन भूले नहीं थे : “ भारत को दो टुकड़ों में बांटना भारत को एनार्की में झोंक देने से भी बुरा होगा. इसे तो बर्दाश्त किया ही नहीं जा सकता है. मैं उन सबसे कहूंगा : भारत का विभाजन करने से पहले आपको मेरा विभाजन करना होगा… विभाजन मेरी लाश पर ही होगा !”  इसलिए जो बाजी कांग्रेस हार चुकी थीउसे पलटने का लगभग असंभव-सा काम गांधी ने आप ही अपने सर ले लिया. इसे गांधी या दुर्भाग्य कहिए या जिन्ना का सौभाग्य कि इतिहास जब इस मोड़ पर पहुंचा तब सिंध के जी.एम. सैयदसीमा प्रांत के डॉ. खान साहबपंजाब के खिजर हयात खान जैसे लोग दुनिया छोड़ कर जा चुके थे. ये सब होते तो जिन्ना को मुसलमानों की एकमात्र आवाज बनने का मौका मिलता ही नहीं और ये तीनों गांधी के साथ खड़े होते. लेकिन काल जिन पन्नों को पलट देता हैउन्हें फिर कौन खोल सकता है.   

इसके बाद की कहानी एकदम सीधी-सपाट है. उसे मुख्तसर में मैं ऐसे सुना सकता हूं : 

विभाजन टालने की अपनी कोशिश में गांधी सबसे पहले नये वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन के दरवाजे पहुंचे. उनके पास माउंटबेटन से न कहने को बहुत कुछ थान शिकायत करने को. माउंटबेटन से सब कुछ जानने-समझने के बाद गांधी ने उनसे इतना ही कहा कि आप जो करना चाहते हैंउसमें जल्दीबाजी मत कीजिए. मुझे थोड़ा वक्त चाहिए. माउंटबेटन का जवाब एकदम सीधा था : मैं किसी जल्दीबाजी में नहीं हूं. मैं एक कैलेंडर के साथ यहां भेजा गया हूं. मुझे उसके भीतर सत्ता हस्तांतरण का काम पूरा करना ही हैफिर यह काम देश के विभाजन के साथ हो या विभाजन के बिनायह देखना आप सबका काम है. विभाजन के बिना हो तो मुझे खुशी होगी  ( यह वह झूठ था जिसे लगातार बोलते रहने की भूमिका माउंटबेटन को दी गई थी) लेकिन विभाजन ही रास्ता बचा हो तो मैं उधर जाने से भी पीछे नहीं हटूंगा. 

गांधी समझ गए कि यह पहला दरवाजा बंद है. 

अब उन्होंने पाकिस्तान का झंडा उठाए मुहम्मद अली जिन्ना का दरवाजा खटखटाया : आपको पाकिस्तान ही चाहिए न ! वह भी हो जाएगा… हम एक बार अंग्रेजों को यहां से विदा कर लें फिर आपस में बैठ कर बंटवारा भी कर लेंगे … 

जिन्ना साहब ने टका-सा जवाब दिया : नहींयह बंटवारा तो अंग्रेजों की उपस्थिति में ही हो जाना चाहिए. आप हिंदुओं का बहुमत है. हम दोनों के बीच अंग्रेज नहीं रहे तो पता नहीं आप लोग हमारा क्या हाल करेंगे

गांधी समझ गए कि यह दूसरा दरवाजा भी बंद है.

अब वे अपने जवाहर व सरदार के दरवाजे पहुंचे: एक रास्ता है जिससे विभाजन तत्काल टल सकता है… आप दोनों माउंटबेटन से कहें कि वे भारत की सत्ता जिन्ना साहब को सौंप दें तथा जिन्ना साहब केवल लीग के लोगों को ले कर अपनी सरकार बनाएं. कांग्रेस बाहर से लीग की सरकार का समर्थन करेगी. 

राम माधव ने इस प्रसंग का जिक्र तो किया है लेकिन साथ में अपनी टिप्पणी भी जोड़ी है : “ नेहरू व पटेल ने इसका कड़ा विरोध किया.” यह तथ्य वे कहां से निकाल लाए प्यारेलालजी की जिस किताब, ‘द लास्ट फेज’ या पूर्णाहुति’ का बड़े अनमने ढंग सेअपने मतलब से राम माधव ने जिक्र किया हैउसमें ऐसा कुछ तो नहीं लिखा है. 

यह कहानी थोड़ा पीछे से शुरू होती है. 1 अप्रैल 1947 को गांधी ने अपना यह विचित्र प्रस्ताव’ सबसे पहले निजी बातचीत में वाइसराय माउंटबेटन के सामने रखा. जिस विभाजन को कांग्रेस में चाहता कोई नहीं था लेकिन जिसके सामने सभी निरुपाय थेउसे पीछे ठेल करदेश को एक नई संभावना के सामने खड़ा करने की उनकी यह ठोस योजना थी. इस योजना में वे जिन्ना को देश का प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रहे थेऔर कांग्रेस को इस प्रस्ताव के लिए राजी करने की जिम्मेवारी भी ले रहे थे. 

निजी स्तर पर रखे गांधी के इस प्रस्ताव से माउंटबेटन के होश उड़ गए. उन्हें जिस विभाजन को साकार करने का जिम्मा दे कर यहां भेजा गया थागांधी उसमें पलीता लगा रहे थे. माउंटबेटन समझ गए और अपनी टीम से बातचीत में उन्होंने कहा भी कि गांधी का यह प्रस्ताव ऐसा है जिसे जिन्ना आसानी से मना नहीं कर सकेंगे. उन्होंने भारतीय नौकरशाहों की अपनी टीम को समझाया कि गांधी के इस प्रस्ताव के खिलाफ माहौल बनाना हमारा पहला काम है. लंबे समय से साम्राज्य के आकाओं के साथ काम कर रहे वी.पी.मेनन को माउंटबेटन ने इस अभियान की कमान सौंपी. वी.पी. मेनन ने एक गुप्त दस्तावेज तैयार किया : गांधी की योजना के संदर्भ में हमारी रणनीति ! 

  मेनन सरदार के खास सलाहकार थे. सरदार लीग के साथ कैसा भी नाता रखने के प्रबल विरोधी तथा विभाजन के प्रस्ताव के पीछे मजबूती से खड़े थे. सरदार को अपने पाले में करने के पीछे इन्हीं मेनन को लगाया गया. जिस सुबह गांधी ने माउंटबेटन से अपनी योजना बताई थीउसी दोपहर हम मेनन को सरदार के साथ बैठा पाते हैं. इसके बाद पटेल-माउंटबेटन की मुलाकात भी हुई. 5 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन के साथ दोपहर का खान खाने जिनको आमंत्रित किया गयावे थे नेहरू के परम मित्र कृष्ण मेनन. उन्हें नेहरू को संभालने का काम सौंपा गया. पूरी टीम की सम्मिलित कोशिश एक ही थी : किसी भी तरह गांधी-प्रस्ताव दम तोड़ दे. 

मौलाना आजाद से जब माउंटबेटन ने गांधी-प्रस्ताव का जिक्र किया तो उनके जवाब वे हैरान रह गए. मौलाना ने कहा कि ऐसी बात तो गांधी ही सोच सकते हैं और यह बड़ा उपयुक्त’ प्रस्ताव है : मुझे तो लगता है कि जिन्ना इसे कबूल कर लेंगे. माउंटबेटन के लिए आफत और बड़ी हो गई. 

9 अप्रैल 1947 को माउंटबेटन ने जिन्ना के सामने यह प्रस्ताव रखा लेकिन गांधी के प्रस्ताव के रूप में नहींअपने प्रस्ताव के रूप में : मेरा सपना ही समझिए इसे ! मैं चाहता हूं कि भारत की केंद्रीय सरकार प्रधानमंत्री जिन्ना के नेतृत्व में बने. माउंटबेटन ने इस मुलाकात के बारे में इस तरह लिखा है : … मेरे प्रस्ताव रखने के बाद जिन्ना लंबे समय तक मुझसे अपनी दूसरी बातें कहते रहे जैसे मेरे सपने वाली बात कहीं दर्ज ही नहीं हुई… फिर अचानक हीबिना किसी प्रसंग के बोले : तो आप मुझे भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं ! … उनके चेहरे की चमक से माउंटबेटन समझ गए कि यह बात कहीं उनके भीतर पहुंच गई है. यह चमकीली संभावना जिन्ना को भविष्य के बारे में सचेत कर गई हैयह माउंटबेटन ने साफ समझ लिया. उनकी आफत और बड़ी हो गई. वे कल्पना कर पा रहे थे कि यह प्रस्ताव जब गांधी के मुंह से जिन्ना सुनेंगे तो क्या आलम होगा.        

  अब हम उस तीसरे दरवाजे की तरफ लौटते हैं जहां गांधी सरदार और जवाहरलाल से अपने इस प्रस्ताव का जिक्र कर रहे हैं. माउंटबेटन को वे जो पहले ही बता चुके थेवही उन्होंने इन दोनों को भी बताया. दोनों में से किसी ने भी उसका मुखर विरोध नहीं किया लेकिन गांधी को यह समझते देर नहीं लगी कि उनका प्रस्ताव दोनों को रास नहीं आया. उन्माद के बल पर अपनी शर्तें  मनवाने का लीग का रवैयासांप्रदायिक दंगों व अंतरिम सरकार का कटु अनुभव दोनों को सावधान कर रहा था. उनमें लीग के प्रति गहरी हिकारत भरी थीतो आश्चर्य कैसा ! लेकिन इतिहास कई बार हमें ऐसी जगह ला खड़ा करता है जहां बड़ी संभावनाओं को साकार करने लिएअपना जहर ख़ुद ही पीना पड़ता है. गांधी के सामने सबसे अहम सवाल था कि विभाजन टाल करअंग्रेजों की चाल कैसे विफल की जाए. वे यह भी जान रहे थे कि अंग्रेजों के इस खेल में जिन्ना उनके खास मोहरे हैं. उस मोहरे को बेकाम करने का रास्ता भी उन्हें निकालना था. नेहरू-सरदार दोनों ने एक-सी ही बात कही: आप कह रहे हैं तो हम इसका विरोध नहीं करेंगे लेकिन यह प्रस्ताव ले कर हम देश के सामने नहीं आएंगे. यह काम आपको स्वयं ही करना होगा. और यह भी कि इसकी जो प्रतिक्रिया देश भर में होगीउसमें भी हम आपके साथ खड़े नहीं रह सकेंगे. वह दावानल भी आपको अकेले ही झेलना होगा. 

यह तीसरा दरवाजा इस तरह बंद हुआ. 

कांग्रेस पर अपने असर का उनका आकलन गलत साबित हो रहा था. किसी से भी उन्हें सहमति तो दूरसहानुभूति भी नहीं मिली. बस एक बादशाह खान थे जो चट्टान की तरह उनके साथ खड़े थे. जयप्रकाश मार्का समाजवादीजिन्हें गांधी चाहते भी थे और मानते भी थेजिन्हें वे साथ लेना भी चाहते थेवे सब विभाजन के विरोध में तो थे लेकिन गांधी के साथ नहीं थे. फिर भी गांधी तो गांधी थे. आसानी से हार कैसे मानते ! 

उन्होंने फिर नेहरू-सरदार को विश्वास में लेने की पहल की : तुम लोगों ने माउंटबेटन को विभाजन की स्वीकृति का वादा किया है तो मैं तुम लोगों से वादाखिलाफी करने को कैसे कह सकता हूं. तुम दोनों इतना करो कि माउंटबेटन से कहो कि हम अपने वादे से मुकरते नहीं हैं लेकिन हम गांधी की सहमति के बिना इससे आगे नहीं जा सकेंगे. आपको गांधी को तैयार करना होगा. उन्हें मुझसे बात करने दोमैं कोई रास्ता निकाल लूंगा ! गांधी इन दोनों से जो कोरा चेक मांग रहे थेवह तो इन दोनों ने कब का माउंटबेटन को दस्तखत कर के दे दिया था ! दोनों के पास गांधी को देने के लिए कोरे इंकार के अलावा अब बचा ही क्या था !  

इतिहास तेजी से गांधी को पीछे छोड़ता जा रहा था. 

तीनों दरवाजों का हाल जानने के बाद अब गांधी ने सारी परिस्थिति का अपना आकलन किया : आम तौर पर विभाजन के बारे में मेरी राय के साथ आज जनमानस नहीं है. क्या इस नाज़ुक वक्त में जन-भावना के खिलाफ जाने का अभियान मुझे चलाना चाहिए इस वक्त कांग्रेस का प्रमुख नेतृत्व भी मेरे साथ नहीं है. आज मैं जवाहरलालसरदारमौलानाराजेन बाबूराजाजी जैसा दूसरा नेतृत्व खड़ा करूंयह संभव नहीं है. मुसलमानों पर मेरा जो असर थावह भी आज नहीं रहा है. लीग उनसे मनमाना खेल करवा रही है. अंग्रेज किसी भी तरह विभाजन से पीछे हटेंगे नहीं. ऐसे में मैं किसी आंदोलन की बात देश के सामने रखता हूंतो देश की जनता को अंग्रेजों-लीगियों-कांग्रेसियों के तिहरे दमन की चक्की में पिसना होगा. कोई उनकी रक्षा के लिए सामने नहीं आएगा. मुझे यह भी दिखता है कि देश में आपाधापी का माहौल बनेगा तो संभव हैरियासतों को भारत के खिलाफ भड़का कर अंग्रेज आज की मुसीबत को गहरा कर दें. बाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों को एक साथ फट पड़ने का मौका देना अभी सही होगा ?  मैंने तो अपनी लाश पर बंटवारे की बात कही थीयहां तो निरीह लोगों की लाशें बिछ जाएंगी… यह सारा कुछ गांधी ने कभी स्वगतकभी पत्र मेंकभी चर्चा में अपनी तरह से कहा. जैसे हर लड़ाई में सेनापति परिस्थितियों का आकलन करता हैगांधी ने भी कियाजैसे हर सेनापति अपनी रणनीति में जरूरी बदलाव करता हैगांधी ने भी वैसा ही किया. उन्होंने लड़ाई का मोर्चा बदलने का निश्चय किया.

11 अप्रैल 1947 को उन्होंने माउंटबेटन को पत्र लिखा : मैंने आपके सामने जो एक प्रस्ताव रखा था उस बारे में पंडित नेहरू से मैंने कई बार छोटी-छोटी चर्चाएं कींकल रात हम दोनों के बीच एकांत में लंबी बातचीत भी हुई. कांग्रेस कार्यसमिति के दूसरे भी कई सदस्यों से मेरी बात हुई. मुझे खेद है कि सिवा बादशाह खान के मैं इनमें से किसी को भी अपने प्रस्ताव के साथ जोड़ नहीं सका… इसलिए अब आप मुझे बाद कर के ही आगे की सोचें… अंतरिम सरकार में जो कांग्रेसजन हैं वे सब देश के तपे-तपाये सेवक हैं और उनकी राय ही कांग्रेस की आधिकारिक राय है… मैं अब बिहार जा रहा हूं… 

आगे-पीछे की बहुत सारी बातें छोड़ कर अब हम गांधी को बिहार जाने दें और यह समझने की कोशिश करें कि राम माधव ने जिसे वह उलझनजिसे अपने आखिरी दिनों में गांधी सुलझा नहीं सके’ कहा हैक्या वैसी कोई उलझन गांधी में आपको दिखाई देती है वे शुरू से अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे. विभाजन चाहने व करने वाली ताकतों का हर स्तर पर मुकाबला करते रहे. विभाजक ताकतों को सीधी चुनौती देते रहे. लेकिन इतिहास सीधी रेखा में चलता कहां है ! इसलिए नये रास्ते व नये मौके बनाने व पहचानने पड़ते हैं. 

गांधी ने कभी भी विभाजन का समर्थन नहीं कियातब भी नहीं जब उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति को संबोधित करते हुए कहा कि विभाजन का जो फैसला आपके नेताओं ने किया हैउसे स्वीकार कर लीजिए. यह विभाजन की स्वीकृति नहींबाहर-भीतर घुमड़ रहे कितने ही तूफानों के एक साथ फट पड़ने से देश को बचाने की उनकी कोशिश थी. गांधी उलझन में थे या दूसरे वे सभी जो विभाजन चाहते तो नहीं थे लेकिन इंकार भी नहीं कर पा रहे थेजो दिल से विभाजन चाहते तो थे लेकिन किसी दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने की चालाकी में लगे थे या जो विभाजन से अपनी स्वार्थ सिद्धि चाहते थेउलझन में थे गांधी से अपनी असहमति बताने वाले राम माधव या दूसरे कोई कभी यह क्यों नहीं बताते हैं कि उन्होंने विभाजन रोकने या टालने के लिए क्या किया संघ परिवार अपने प्रयासों के बारे में भी तो देश को कुछ बताए ! लेकिन वहां तो एकदम सन्नाटा है. 


06/02/26

                                                                                                                                     

 

जो कार्नी नहीं कह सके …

2026 में मैं अपनी बात 1948 से शुरू करूंतो आप एतराज तो नहीं करेंगे मैं भी क्या करूंऔर आप भी क्या करेंगे कि इतिहास इसी तरह हमारे साथ चलता हैऔर हम कहते हैं कि इतिहास स्वयं को दोहराता है !… 

वह 27 जनवरी 1948 की सुबह थी. सांप्रदायिक हिंसा की अकल्पनीय आग में झुलसतेअपने खास साथियों के बदले तेवर से आहतएकदम अकेले पड़ गए महात्मा गांधी बाजी पलटने की अपनी आखिरी कोशिश का नक्शा बनाने में लगे थे कि उस रोज सुप्रसिद्ध अमरीकी पत्रकार विन्सेंट शीन मुलाकात के लिए पहुंचे. गांधी के लिए शीन केवल पत्रकार होते तो उन्हें आज मिलने का वक्त न मिला होताक्योंकि गांधी हर तरह की मुलाकात से तब इंकार कर रहे थे. शीन गांधी के आत्मीय अध्येता भी थे. इसलिए गांधी ने उन्हें बुला लिया था. लेकिन आज शीन गहरी उलझन में थे. उनका व्यथित मन कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था तभी वे गांधी तक पहुंचे थे. जिस दूसरे विश्वयुद्ध का शीन ने गांधी से अलग जा करजी-जान से समर्थन किया थामित्र-राष्ट्रों के पक्ष में ख़ुद को झोंक दिया थाउसकी असलियत अब सामने आ रही थी जो बेहद कुरूप व डरावनी थी. 

“ लोकतंत्र को मजबूत बनाने के अच्छे उद्देश्य से जो विश्वयुद्ध लड़ा गयाउसका परिणाम इतना उल्टा क्यों आया ?  एक हिटलर का मुकाबला करने जो लोग निकले थेआज उनके भीतर से कितने ही छोटे-बड़े हिटलर पैदा हो गए हैं !” शीन का सवाल था.

“ सारा खेल साधनों का है !”, गांधी ने नि:शंक जवाब दिया, “ साध्य अच्छा होइतना काफी नहीं हैसाधन शुद्ध होंयह उससे भी ज्यादा जरूरी है. अशुद्ध साधन अच्छे साध्य को भी विकृत बना देते हैं.

“ क्या हर स्थिति मेंहर वक्त ऐसा ही होता है ?”

“ हमेशा ऐसा ही होता हैहोगाक्योंकि सत्य बदलता नहीं है.” 

यह 1948 की दिल्ली थीआज हम 2026 के दावोस में हैं. दोनों के बीच सिर्फ 78 साल का फासला नहीं है बल्कि यह भी है कि आज हमारे बीच कोई गांधी नहीं हैं. हम यहां गांधी को नहींकनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को सुन रहे हैं. वे दावोस के वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम में कह रहे हैं कि महाशक्तियों के वर्चस्व के खिलाफ हम दोयम शक्तियोंको इकट्ठा होना होगा. वे कह रहे हैं कि अमरीकी साम्राज्यवादी शक्तियों का मुकाबला करने की सशस्त्र ताकत नहीं होगी हमारी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे : “ वह देश जिसके पास अपनी ज़रूरत का खाना नहीं हैजिसके पास अपनी जरूरत की ऊर्जा नहीं हैजो अपनी रक्षा में स्वंय समर्थ नहीं हैउसके लिए आज की दुनिया में ज्यादा कुछ विकल्प है नहीं. जब अंतरराष्ट्रीय विधि-विधान आपका संरक्षण नहीं कर सकते तब आपको अपना संरक्षण स्वयं करना होता है.” 

यह संभवतः: पहला ही अवसर था जब नाटो के मंच सेकिसी यूरोपीय देश ने अमरीका का नाम ले करउसके वर्चस्व को ललकारा ही नहीं बल्कि उससे छूटने के लिए नाटो देशों के साथ आने की बात कही. स्वाभाविक ही था कि डोनल्ड ट्रंप कार्नी से खार खाए बैठे हैं और चीख रहे हैं कि अमरीका के बिना कनाडा एक बड़ा जीरो है जिसे हम उसकी औकात बता देंगे ! यह अंतरराष्ट्रीय संवाद की नई भाषा है. हम भारतीय तो 2014 से ही ऐसी भाषा के आदी हो गए हैं. 

आगे चलने से पहले हम इतिहास का एक दूसरा पन्ना भी पलटते चलते हैं. तब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था. तथाकथित मित्र-राष्ट्रों ने विजेता की भूमिका में दुनिया की कुंडली लिखनी शुरू कर दी थी. वे देशों के मनमाना विभाजन किए जा रहे थाअरबों की धरती पर बंदूक का हल चला कर इसराइल की खेती की जा रही थी. ऐसे वक्त में जवाहरलाल नेहरू नाम का एक आदमी सामने आया. उसने कहा था कि हम महाशक्तियों के इस खेल में किसी की तरफ नहीं हैं. हमारा रास्ता तीसरा है. तटस्थ राष्ट्रों का हम अपना संगठन बनाएंगे. महाशक्तियों के निर्दयी अंतरराष्ट्रीय खेल के बीच यह परम साहस की सोच थीअंधेरे में लगाई एक वीरतापूर्ण छलांग थी. कोई जवाहरलाल ही ऐसी पहल कर सकता थाक्योंकि उसने गांधी की छाया में सांस ली थी. 

नेहरू के आवाज उठाई तो साथ आ जुड़े इंडोनेशिया के सुकार्णोंमिस्र के गमाल नासेर. फिर तो यह बात रफ़्तार पकड़ गई और एक वक्त 120 देश इसमें शामिल हुए. यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो भी साथ आ खड़े हुए. रूसी व अमरीकी खेमा कौतुक से इस नई शक्ति के उदय को देखता रहा. जवाहरलाल ने 120 देशों की तरफ से कहा कि हम वे हैं जो अपना रास्ता ख़ुद बनाते हैं. लेकिन यह साहसी पहल धीरे-धीरे बिखरने लगीक्योंकि सवाल सिर्फ राजनीतिक तटस्थता का नहीं थासवाल तो शक्ति की पूरी अवधारणा का था. शक्ति की अवधारणा वैसी ही हो जैसी महाशक्तियों की हैतब तटस्थता सधती नहीं है. साध्य व साधन के विवेक की जो बात गांधी शीन को समझा रहे थेजवाहरलाल न उसे समझ सकेन समझा सके. आज तटस्थ राष्ट्रों की वह सारी परिकल्पना ढह चुकी हैतो इसलिए कि तटस्थ राष्ट्रों के मानक भी महाशक्तियों जैसे ही थे. इसलिए हम यह शोकांतिका भी देखते हैं कि तटस्थ राष्ट्रों के मलबे में से एक-के-बाद एक तानाशाह या एकाधिकारी शासक उभर आए. नासेरसुकार्णोएंक्रूमाटीटो आदि सबने सत्ता अपनी जेब में रखी ली. अपवाद रहे केवल जवाहरलाल जो तटस्थ कितने रहे यह विवाद का विषय है लेकिन लोकतंत्र को सीने से लगाए रहेइसकी गवाही इतिहास भी देता है.  

मार्क कार्नी क्या यह समझ पाते हैं कि तटस्थता का यह पूरा भव्य दर्शन क्यों विफल हुआ इसलिएसिर्फ इसलिए कि जवाहरलाल समेत सारे तटस्थ नेताओं की आंखों में सपना तो यही था कि हम अमरीका या रूस जैसे कैसे बनें. जवाहरलाल अपने भारत के लिए अमरीका-रूस की एक विचित्र-सी खिंचड़ी बनाने में व्यस्त थे. यहां भी हाल वैसा ही है. कार्नी के कनाडा समेत नाटो के सभी देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आज तक अमरीकी त्रिशूल भांजते चले हैं. अमरीका से ज्यादा अमरीकी बनने की होड़ में इन देशों ने वह सब किया जो अमरीका ने चाहा. वे लुटेरी अमरीकी राजनीति के सिपाही बने रहेलूट में हिस्सेदारी करते रहे. कनाडा तो जी-7 के उस क्लब का सदस्य रहा जो सारी दुनिया में पूंजी के बल पर अट्टहास करता रहा है. यह बात अलग है कि आका जितनी छूट देता थाइन्हें उतने से ही संतोष करना होता था. जंगल का एक सच यह है कि शेर अपना शिकार खा कर जो बचा-खुचा छोड़ देता हैभेड़िए और सियार उसका भोग लगाते हैं. इसलिए कार्नी ने यह नहीं कहा कि मध्यम शक्तियों’ को शक्ति की नई परिभाषा बनानी होगी तथा उसका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पालन भी करना होगा. कार्नी ने यह नहीं कहा कि सारा यूरोप अमरीका का उच्छिष्ठ खाता रहा है. उन्होंने दुख भरे शब्दों में यह जरूर कहा कि हम मध्यम शक्ति’ वालों ने गलत क्या-क्या किया लेकिन यह नहीं कहा उन गलतियों से बचने के लिए अब कनाडा क्या-क्या अलग करेगा हम देख ही तो रहे हैं कि उसी ट्रंप की कृपादृष्टि पाने की कोशिशें आज भी चल रही हैं.

बोर्ड ऑफ पीस का जो नया पासा ट्रंप महाशय ने फेंका हैउसे लपकने वालों की कमी नहीं है. यह नया नाटो हैयह नया संयुक्त राष्ट्रसंघ बनाने की चालाकी है इस सावधानी के साथ कि अब कोई अमरीकी सत्ता को ( ट्रंप को !) आंख न दिखा सके. इसलिए ट्रंप ने घोषणा की है कि बोर्ड अॉफ पीस का अध्यक्ष अमेरिका का राष्ट्रपति नहींडोनल्ड ट्रंप हैं जिन्हें कोई हटा नहीं सकता है. उन्होंने यह भी बता दिया है कि आज जो भी इस बोर्ड की सदस्यता लेंगे वे केवल 3 सालों के लिए सदस्य रहेंगे. स्थायी सदस्यता उन्हें ही मिलेगी जो सदस्यता के पहले वर्ष में ही अमरीकी खजाने में 1 बीलियन डॉलर की फीस नकद भरेंगे. जिस बोर्ड अॉफ पीस की आधी-अधूरी परिकल्पना ट्रंप महाशय ने सिर्फ गजा के संदर्भ रखी थीअब सारी दुनिया उसके दायरे में आ गई है. जब ट्रंप का दावा सारी दुनिया में युद्ध रुकवाने का है तो वे उसकी कीमत सारी दुनिया की स्वायत्तता को अपनी मुट्ठी में कर के क्यों न वसूलें !  

भारत ने तो देश-दुनिया के उन सारे सवालों के बारे में मौन धार लिया है जिनके बारे में कोई नैतिक भूमिका न लें आप तो उसे राजनीतिक चातुरी नहींराजनीतिक कायरता या अवसरवादिता कहते हैं. इसलिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आज भारत की कोई हैसियत नहीं है याकि जैसा ट्रंप बार-बार साबित करते रहते हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय विदूषक भर रह गया है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया की जो बंदरबांट चली हैउसका आधार रूसी व अमरीकी गुटों का निहित स्वार्थ रहा है. अब रूसी गुट जैसा कुछ बचा नहीं है. इधर के दिनों में रूस-चीन गुट-सा जो दिखाई देता हैवह अमरीकी गुट से डरे पुतिन-जिनपिंग की चालबाजी भर है. जो एक-दूसरे से भयभीत होंजैसे उनकी साझेदारी संभव नहीं है वैसे ही जिनका एक-दूसरे पर रत्ती भर भरोसा न होउनकी साझेदारी भी संभव नहीं है. चोरों की साझेदारी भी इसलिए निभती है कि वे एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं. 

ले-दे कर बच रहा था अमरीकी खेमा जिसके साथ नाटो थापाकिस्तान भी जिसे नमस्कार करता थाहिंदुस्तान तो घुटनों पर ही थाइसराइल तथा ऐसे ही दूसरे मुल्क भी थे जिन्हें अॉक्सीजन के लिए अमरीका की तरफ देखना पड़ता था. ट्रंप ने इन सबमें पलीता लगा दिया. यह पागलपन नहीं है. अमेरिका फर्स्ट’ का शंखनाद हो कि मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का उद्घोष हो ( विश्वगुरू !)दोनों कहते यही हैं कि दुनिया में दूसरा कोई भी ऐसा न बचे कि जिसकी गर्दन तनी रहे. इसलिए ट्रंप हैंइसलिए अमरीका है. 

हम ऐसे अमेरिका के सामने हैंऔर हमें उसके साथ अपना रिश्ता सुनिश्चित करना है. नरेंद्र मोदी के भारत ने तय किया था कि ट्रंप के कंधों पर बैठ कर भारत को बड़ा दीखना है. वह सारी फूहड़ डिप्लोमेसी आज सड़क किनारे धूल खाती पड़ी हैक्योंकि ट्रंप जैसों को अपने कंधों की बराबरी का कोई देश नहीं चाहिए. इसलिए कार्नी हों कि मैक्रोंन कि खुमैनी कि दूसरे कोईहर किसी को अंतिम तौर पर समझ लेना चाहिए कि छोटा अमेरिका बनने की हसरत न पालेंक्योंकि बड़े ट्रंप साहब को ऐसी बराबरी सख्त नापसंद है. 

कार्नी मध्यम शक्ति’ की जिस नई भूमिका की बात करते हैं वह अपना रास्ता गढ़ने की बात है. लेकिन इसमें एक पेंच है. अपना रास्ता दूसरों को दबा या कुचल कर न बनाया जा सकता हैन उस पर चला जा सकता है. अपनी पसंद का रास्ता बनाने व उस पर चलने की कीमत अदा करनी पड़ती है जिसे गांधी साधन की शुद्धता’ कहते हैं. जो साधन की शुद्धता की  कीमत अदा करने को तैयार नहीं होते हैं उन्हें ट्रंप के अंगूठे के नीचे जीने की आदत बना लेनी चाहिए. ( 27.01.2026)

छाया भी मत छूना !

 सब तरफ़ तालियां हैं, शोर है, वाहवाही है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय दो सार्वजनिक, खुलेआम किए जा रहे बलात्कार के सामने आ खड़ा हुआ ! अब न कोई उन्नाव की पीड़िता को हाथ लगा सकता है, न अरावली की पर्वतश्रृंखला को बम लगा कर उड़ा सकता है. इसे कहते हैं संविधानसज्जित न्यायपालिका की हैसियत ! सभी की तालियां सभी के साथ शामिल हैं. इसी बहाने हम देख रहे हैं कि गोबरगणेश गोस्वामियों की उंगलियां भी उठने लगी हैं और सारे ज्ञानी ऐसे मौकापरस्तों के इशारों का अर्थ खोजने में व्यस्त हैं. 

हमारे सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी सबकी सारी तालियां कबूल करते हुएबड़ी बारीकी से अपनी सारी व्यवस्था का बचाव कर लिया कि हमारे जज सर्वश्रेष्ठ हैं लेकिन हैं तो इंसान ही नसो गलती हो जाती है. बसबात रफादफा हो गई. कोई यह याद नहीं कर रहा है कि उन्नाव की बलात्कार पीड़िता के फिर से सार्वजनिक बलात्कार की संभावना पैदा ही तब हुई जब हमारे सर्वश्रेष्ठ जजों ने इस मामले को औरत से जघन्य बलात्कार और हत्या की नज़र से नहींकानूनी मीन-मेख की चतुराई से देखने व जांचने की कोशिश की. हम नहीं जानते हैं कि इसके पीछे किसी तरह का राजनीतिक इशारा था या नहीं लेकिन हम खूब जानते हैं कि यह मामला उस गहरी बीमारी में से पैदा हुआ है जिसमें न्यायपालिका भूल जाती है कि उसकी अपनी मर्यादाएं हैं. 

 औरत से बलात्कार का अपराध आज देश में जिस सीमा को पार कर रहा हैवह गहरे बीमार व राजनीतिक शह से बौराए समाज का वह दौर है जो न्यायपालिका के बस से बाहर का मामला है. न्यायपालिका को इसका विवेक होना ही चाहिए कि वह आखिरी बिंदु क्या हैजहां उसकी पहुंच नहीं है. हर स्वस्थ व संयमित न्यायपालिका को अपनी इस मर्यादा का अहसास होना चाहिए. 

न्यायपालिका की मर्यादा यह है कि वह संविधान से बंधी हैऔर संविधान की मर्यादा यह है कि वह अपने जीवंत अनुभवों से आगे की बात नहीं कर सकता है. इसलिए जब कभी समाज या सत्ता का ऐसा चेहरा सामने आता है जिसका कोई सीधा प्रतिकार संविधान सुझाता नहीं है तब न्यायपालिका को संविधानसम्मत व्यवस्था दे करपीछे हट जाना चाहिए. आखिर कातिलक्रूरअमानवीय बलात्कार से गुजरती औरत का न्यायपालिका को क्या अनुभव है जब अदालत बलात्कार से गुजरी किसी औरत की सुनवाई करती हैतो औरत एक नये बलात्कार से गुजरने की दारुण पीड़ा से गुजरती है. कुल जमा यही अनुभव है जो बलात्कार के नाम पर न्यायपालिका की स्मृतियों में जमा होता है. लेकिन न्यायपालिका को यह खूब समझना चाहिए कि यह तकनीकी अनुभवों का नहींदारुण मानवीय अनुभवअपमान व असहायता का सवाल है. इसका कोई अनुभव अदालत के पास नहीं हैइसकी कोई जीवंत कल्पना संविधान के पास नहीं है. दोनों जहां आ कर ठिठक जाते हैं वहां से औरत की यह त्रासदी शुरू होती है. इसलिए बलात्कार के किसी भी मामले के संदर्भ में न्यायपालिका की एक ही भूमिका हो सकती है कि वह औरत को संभलने-संयमित होने का पूरा अवकाश दे और तब तक उसके साथ खड़ी रहे जब तक वह अपना आपा न पा ले. यह लोकतांत्रिक सभ्यता हैमानवीय गरिमा है और यह संविधान की मर्यादा भी है. 

कुलदीप सिंह सैंगर का मामला बलात्कारहत्याराजनीतिक धौंस और अधमतर गुंडागर्दी की ऐसी खिंचड़ी है जो औरत के लिए तिनके का सहारा भी नहीं छोड़ती है. कहानी में पेंच बहुत हो सकते हैं लेकिन जो दृश्य है उसमें कोई पेंच नहीं है. ऐसे मामले को उलटने-पलटने का कोई नैतिक अनुभव न अदालतों के पास हैन संविधान के दायरे में आता है. यह वह मर्यादा है जिसे अदालत व संविधानदोनों को स्वीकार कर चलना चाहिए. औरत पर यौन हिंसा संविधानसम्मत अंतिम सजा का अंतिम पड़ाव है - पुनर्विचार या कानूनी पेंचीदगियों की यहां गुंजाइश ही नहीं है. यह उन्नाव की पीड़िता के संदर्भ में ही सच नहीं हैअंकिता भंडारियों के संदर्भ में भी सच है यानी हर औरत के संदर्भ में यही सच है. समाज व सत्ता को यह जीवंत अहसास होना चाहिए कि यौनिक हिंसा कानूनी पेंचीदगियों व संवैधानिक मीन-मेख से आगे की बात है. जो इसका अपराधी सिद्ध हुआउसे अंतिम सजा मिलेगी ही और उसे वह सजा अंतिम  सांस तक भुगतनी पड़ेगी. बलात्कार औरत को उसकी औकात बताने का अचूक हथियार मानने की मानसिकता वालों को अंतिम तौर पर यह बताना जरूरी हो चला है कि जिसे वे अचूक मानते हैं दरअसल वह दोधारी तलवार है. जिस हथियार से तुम औरत के अस्तित्व के टुकड़े करते होउसी हथियार से तुम्हारे अस्तित्व के भी टुकड़े हो जाते हैं. तुम्हें इससे बचाने न संविधान आगे आ सकता हैन न्यायपािलकाक्योंकि यह उस इंसान का मामला है जिसने यह संविधान भी रचा है और यह न्यायपािलका भी बनाई है. समय-समय पर इससे आगे का रास्ता समाज की सामूहिक चेतना में से उभरता रहेगा जिसे न्यायपालिका व संविधान को पहचानना व स्वीकार करना सीखना पड़ेगा. यह आधी आबादी - गांधी के शब्दों में ‘ बेहतर आधी आबादी !’ के लोकतांत्रिक अस्तित्व को अंतिम रूप से स्वीकार करना है.  

ऐसी ही स्थिति पर्यावरणविनाश की है. करोड़ों-करोड़ साल पहले से प्रकृति ने संतुलन साधने की अपनी जो व्यवस्थाएं खड़ी की हैं फिर चाहे वह अरावली श्रृंखला हो कि नदियों की अपनी बुनावट हो कि हिमालय की नवजात पर्वतमाला हो कि अंदमान-निकोबार के जंगल आदि होंइनके साथ बलात्कार करने की मर्यादा कोई अदालत कैसे तय कर सकती है क्या अनुभव है उसके पास कि जिसे वह अपने फैसले का आधार बना सकती है ये सारी पर्यावरणीय व्यवस्थाएं मनुष्य के अस्तित्व से पहले से बनी हुई हैंये जीवंत हैंसक्रिय हैं और प्राणिमात्र का संरक्षण-संवर्धन करती आ रही हैं. संविधान में इनके प्रति कोई निश्चित नजरिया हमें नहीं मिलता हैक्योंकि संविधान तो अभी-अभी पैदा हुआ है. इस पर्यावरणीय व्यवस्था में वह अपनी जगह भी और अपना संदर्भ भी तलाशने में लगा हुआ है जैसे कोई शिशु अपनी मां की गोद में अपनी जगह बनाने में लगा रहता है. 

फिर कैसे कोई अदालत यह फैसला कर गुजरती है कि अरावली पर्वतश्रृंखला पर 100 मीटर की मर्यादा लादी जाए और फिर सामाजिक दवाब के बादवह अपने ही फैसले पर रोक भी लगाती है कि अभी इस मामले में ज्यादा विमर्श की जरूरत है. किससे विमर्श करेंगे आप श्रीमान जिसकी 100 मीटर की सिफारिश आपने क़बूल कर ली थीवह कौन था वह सत्ता की सिफारिश थी- वही सत्ता जो सर्वभक्षी है. सारी दुनिया में यह सब कुछ लीलती जा रही है. श्रीमानयह आपको भी और आपको जिसे संरक्षित करना है उस संविधान को भी लीलती जा रही है. क्या यह आपको दिखाई नहीं दे रहा है कि हमारा पर्यावरण हर कहींहर जगह तार-तार हुआ जा रहा है. सत्ताकेंद्रित विकास वह अंतरराष्ट्रीय राक्षस बन गया है जिसे हर दिन मूल्यों-मर्यादाओंसंविधान-लोकतंत्र का निवाला न मिले तो वह जी नहीं सकता है. आखिर क्यों दुनिया भर की सड़कों पर लोग उतर आए हैं और उनकी बनाई सत्ता ही लाठी-बंदूक से उन्हें कुचलने पर आमादा है लोगों व लोगों की बनाई सत्ता के बीच यह कैसी रस्साकशी है यह सर्वभक्षी सत्ता से अपने समाज को बचाने की लड़ाई चल रही है जिसे आप पहचान नहीं पा रहे हैं श्रीमान ! 

आपकी परेशानी हम समझते हैं. आपके पास ऐसा कोई जीवंत अनुभव कोष नहीं है कि जिसमें उतर कर आप इस रस्साकशी का असली मतलब जान-पहचान सकें. आप भी विकास की उसी शब्दावली के मारे हैं जिसकी मार से दुनिया बेहाल है. इसलिए तो अदालतें यह कहती मिलती हैं कि हम सारा विकास ठप्प तो नहीं कर दे सकते किसका विकास और किसकी कीमत पर विकासइसका जवाब अदालत से कभी नहीं मिलता हैक्योंकि उसके पास भी विकास की पूरी अवधारणासत्ता की छलनी से छन कर ही पहुंचती है.  

पर्यावरण की लड़ाई आज सारे संसार में स्वायत्त समाज के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई में बदल गई है. इसे पहचानने के लिए श्रीमान ज्यादा द्राविड़ी प्राणायाम करने की जरूरत नहीं हैअपने ही गांधी को उलटने-पलटने की मेहनत करने की जरूरत है. बहुत पीछे हम न भी जाएं तो 1920 से वे लगातार विकास के इस राक्षस से सीधी लड़ाई में लगे मिलते हैं. वे देश की राजनीतिक आजादी के लिए प्राणपन से जूझते हुए भीमनुष्य की स्वायत्त जिंदगी की लड़ाई को कमजोर पड़ने नहीं देते हैं. जिस बात को समझने व कहने की हिकमत व हिम्मत आप नहीं दिखा पा रहेनिहत्थे व गुलाम देश की आजादी की लड़ाई लड़ते हुए इस आदमी ने कही और इस तरह कही कि उसका कहा वक्त की सलीब पर आज भी दीपता है : “ आप देखते हैं कि ये राष्ट्र ( यूरोप व अमरीका) संसार की तथाकथित कमजोर व असंगठित जातियों का शोषण करने में समर्थ हैं… मैं साफ शब्दों में अपना यह विश्वास जाहिर कर देना चाहता हूं कि बड़े पैमाने पर माल तैयार करने का पागलपन ही आज के विश्व-संकट के लिए जिम्मेदार है. उद्योग ( आप इसे विकास’ पढ़ें ! ) मानव-जाति के लिए अभिशाप बन जाने वाला है. उद्योगवाद (आज का विकासवाद ! ) सर्वथा इस बात पर निर्भर है कि आपमें शोषण करने की कितनी शक्ति हैविदेशी मंडियां आपके लिए कहां तक खुली हैं और प्रतिस्पर्धियों का कितना अभाव है. चूंकि इंग्लैंड के लिए ये बातें दिनोंदिन कम हो रही हैंइसलिए उनके यहां बेकारों की संख्या रोज बढ़ रही है. जब इंग्लैंड की यह हालत है तो भारत जैसे विशाल देश को तो उद्योगीकरण से लाभ होने की आशा की ही नहीं जा सकती. सच तो यह है कि भारत जब दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने लगेगा - और उसके यहां उद्योगीकरण हो गया तो वह जरूर शोषण करेगा - तब वह अन्य राष्ट्रों के लिए शाप व संसार के लिए खतरा बन जाएगा. तब दूसरे राष्ट्रों का शोषण करने के लिए भारत में कल-कारखाने बढ़ाने का मैं क्यों विचार करूं क्या आप यह करुण स्थिति नहीं देख रहे कि हम अपने 30 करोड़ बेकारों के लिए काम जुटा सकते हैं परंतु इंग्लैंड अपने 30 लाख के लिए कोई काम मुहैया नहीं कर सकताऔर उसके सामने ऐसी समस्या खड़ी है जिसके आगे इंग्लैंड के बड़े-से-बड़े बुद्धिमान चक्कर खा रहे हैं. उद्योगवाद का भविष्य अंधकारमय है. अमरीकाजापानफ्रांस और जर्मनी इंग्लैंड के सफल प्रतिस्पर्धी हैं. भारत की मुट्ठी भर मिलें भी उनकी प्रतिद्वंद्वी हैंऔर जैसे भारत में जागृति हो गई हैवैसे ही दक्षिण अफ्रीका में भी होगीऔर वहां तो प्राकृतिकखनिज और मानवीय साधन भी कहीं अधिक विपुल हैं. अफ्रीका की बलवान जातियों के सामने जबरदस्त अंग्रेज बिल्कुल पिद्दी दिखाई देते हैं. आप कहेंगे कि अंत में तो वे जंगली ही हैं ! वे भले हैंजंगली नहींऔर शायद कुछ ही साल में पश्चिमी राष्ट्रों को अफ्रीका में अपने माल का सस्ता बाजार मिलना बंद हो सकता है. यदि उद्योगवाद का भविष्य पश्चिम के लिए अंधकारमय है,तो क्या भारत के लिए वह और भी अंधकारमय नहीं होगा ?” 

12 नवंबर 1931 को यंग इंडिया’ में यह सब लिखने से पहले भीकई-कई बार वे ऐसी चुनौती उछालते मिलते हैं. 3 नवंबर 1921 को वे यंग इंडिया’ में सवाल खड़ा करते हैं : “ यदि संयोग से कोई एक आदमी अपने किसी यांत्रिक आविष्कार द्वारा भारत की सारी भूमि जोत सके और खेती की तमाम पैदावार पर नियंत्रण कर लेऔर यदि करोड़ों लोगों के पास कोई और धंधा न होतो वे सब भूखों मरेंगे और निकम्मे हो जाने के कारण जड़ बन जाएंगेजैसे कि आज भी बहुत लोग बन गए हैं… मैं जानता हूं कि विद्युत-शक्ति से चलने वाले तकुए जारी कर केहाथ से कातने वालों को हटा देना जुर्म है.” 

वे आंखों-में-आंखें डालकर उस दौर में भी हर आरोप का जवाब देते हैं : “ मुझे आपत्ति स्वयं मशीनों पर नहीं बल्कि उनके लिए पागल बनने पर है. यह पागलपन श्रम बचाने वाले यंत्रों के लिए है… यहां तक कि हजारों लोगों को बेकार कर केभूख से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. मैं भी समय और श्रम बचाना चाहता हूं मगर मानव-समाज के एक अंश के लिए नहींबल्कि सबके लिएमैं भी धन इकट्ठा करना चाहता हूं मगर थोड़े से आदमियों के हाथों में नहींबल्कि सबके हाथों में. आज तो मशीनें मुट्ठी भर लोगों को करोड़ों की पीठ पर सवार होने में मदद करती हैं. इन सबके पीछे प्रेरक शक्ति श्रम बचाने की उदात्त भावना नहींबल्कि लोभ है. मैं इस प्रकार की व्यवस्था के विरुद्ध अपनी सारी शक्ति लगा कर लड़ रहा हूं… मैं थोक उत्पादन की कल्पना जरूर करता हूं मगर उसका आधार मनुष्य का हनन नहीं होगा. आखिर चरखे का संदेश तो यही है ! यह थोक उत्पादन ही है परंतु लोगों के अपने घरों में है. यदि आप व्यक्तिगत उत्पादन को लाखों गुना बढ़ा दें तो क्या वह विशाल पैमाने पर थोक उत्पादन नहीं हो जाएगा ?… चरखा-संघ ने सफलतापूर्वक दिखा दिया है कि देहातों में भारत की जरूरत का सारा कपड़ा तैयार किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्र का केवल अवकाश का समय ही कताई और उसके बाद की क्रियाओं में लगाना पड़ेगा. हमें इस बात पर सारी शक्ति केंद्रित करनी होगी कि गांव स्वाश्रयी बनें और माल मुख्यतः: अपने उपयोग के लिए ही तैयार करें… मुझे विशेषाधिकार और एकाधिकार से घृणा है. मेरे लिए वह चीज निषिद्ध है जिसमें सबका हिस्सा न हो.”  

यह गांधी उन्नाव की पीड़िता के साथ खड़ा होता हैक्योंकि शक्ति का एकाधिकार पुरुषों के लिए संरक्षित हैयह गांधी अरावली के साथ खड़ा होता हैक्योंकि यह विकास पूंजी के साथ ही कदमताल करता है. इसलिए जरूरी है कि लोगसमाजसंविधानन्यायपालिका सभी गांधी के साथ खड़ी हों और कहें कि हमें वह विकास चाहिए ही नहीं जो विशेषाधिकार व एकाधिकार के बिना पंगु हैलंगड़ा व गूंगा है. यह नई लक्ष्मण-रेखा है जो कहती है कि किसी बलात्कारपीड़िता की छाया भी छूने की कोशिश न करना फिर चाहे व औरत हो कि पर्यावरण. ( 07.01.2026)